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बुधवार, 12 जुलाई 2023

सैक्स में ज्यादा सुख किसको आता है

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सेक्स ऐसा अनुभव है, जिसकी ओर व्यक्ति बार-बार आकर्षित होता 

मानव जाति की पांच इन्द्रियां होती हैं।


1.आंख का काम है रूप या वस्तुओं को देखना। देखने के पश्चात अगर रूप लुभावना है, सुंदर है तो उसमें आनंदित होना। अगर रूप सौंदर्य विहीन है, कुरूप है तो उससे घृणा करना एवं उससे दूरी बनाने की कोशिश करना।


2.कान का काम है शब्दों को सुनना। शब्द अगर मधुर है, मोहक हैं, प्रशंसीय है तो कान उनको बार बार सुनना चाहेगा। अगर शब्द दुर्भावना,क्रोध, कटुता एवं कर्कशता से युक्त हैं तो कान फिर से शब्दों से बचेगा।


3.जिह्य(जीभ) का काम है रस का आस्वादन करना। अगर रस मधुर एवं स्वादिष्ट है तो जीभ उसमें बार बार चखना चाहेगी। कड़वे एवं फीके पदार्थों को जीभ कभी नहीं चाहती है।


4.नाक का काम है सुगंध को ग्रहण करना।सुगंधित महक को ग्रहण करने को लालायित रहती है एवं दुर्गंध से बचाना चाहती है।


5.त्वचा अर्थात मानव शरीर स्पर्श चाहता है।स्पर्श अगर सुखदाई है तो उससे चिपकना चाहता है। स्पर्श अगर सुखद अनुभूति नहीं देता तो व्यक्ति उससे अलगाव चाहता है।


6. मन इन सभी इंद्रियों का राजा का काम करता है। मन के अधीन ये पांचों इन्द्रियां अपना अपना साम्राज्य स्थापित कर अपनी तानाशाही चलाती हैं। मन के भी अपने अपने कई विभाग होते हैं जैसे चित,बुद्धि,अहंकार आदि। इनके फीडबैक के आधार पर ही अपनी अधिनस्थ कर्मचारी अर्थात इंद्रियों से उचित या अनुचित काम संपन्न करवाता है।


अब सवाल यह है कि इंद्रियों द्वारा भीगे गए मनचाहे सुख को अनुभव करने की मात्रा को लिंग अर्थात स्त्री एवं पुरुष के आधार पर मापा जा सकता है?


इसका उत्तर है नही।


इसका उत्तर नही होने का कारण यह है कि मानव शरीर में स्थापित सभी इंद्रियों को संसार का सुख भोगने एवं अनुभव करने के लिए ही निर्मित किया गया है। सभी इंद्रियजनीत सुखों को भोगना ही जीवन का परम उद्देश्य है। इसके लिए जीवन के चार लक्ष्य बताए गए हैं काम,अर्थ,धर्म एवं मोक्ष। यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है जब जीवन में संतुलन हो।


लिंग के आधार पर इंद्रिजनित सुख का विभाजन संभव नहीं। क्यों?


चाहे स्त्री हो या पुरुष सभी इंद्रियों के सुख को प्राप्त करना चाहते हैं। तथा उससे होने वाले दुख से बचाना चाहते हैं। सीमित मात्रा में सुख की चाहत बिलकुल न्यायसंगत एवं तर्कसंगत है परंतु जब इन्द्रियां आनंद की चाहत में उन्मादी एवं व्याकुल हो जाती हैं तो व्यक्ति मर्यादाओं की सारी सीमाओं को त्याग देता है। इस प्रवृति का लिंग के आधार पर वर्गीकरण संभव ही नहीं है।कई बार पुरुष अधिक कामुक होता है तो कई बार स्त्री अधिक। यह पूर्णतया प्रत्येक व्यक्ति पर अलग अलग तरीके से लागू होता है। कुछ पुरुष स्पर्श सुख में पागल तक हो जाते हैं जबकि कुछ के लिए यह साधारण शारीरिक आपूर्ति मात्र है। जो स्त्रियां संयमित एवम मर्यादित होती हैं उनके लिए भी यह आनंद एवं भोग विलास का काम न होकर शुद्ध एवं पवित्र प्राकृतिक आनंद की अनुभूति है।


अब यह प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक सोच पर निर्भर करता है की स्पर्श सुख अर्थात स्त्री पुरुष के शारीरिक संबंध में कौन अधिक सुखद अनुभूति करता हैं। यह कोई सार्वभौमिक नियम नही है कि अमुक लिंग को अधिक सुख प्राप्त होता है।


यह अनेक कारकों पर निर्भर है। वैसे इस तरह के कठिन सवाल का उत्तर देने में महान विद्वान शंकराचार्य को भी नाकों चने चबाने पड़े थे। उनकी कहानी अत्यंत ही विस्मयकारी एवं जानने योग्य है।

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