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गुरुवार, 21 अगस्त 2014

क्या आप जानते हैं आपका शरीर आपकी आत्मा का बच्चा है

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शरीर, मन और आत्मा की तंदुरुस्ती

ज्यादातर लोग यही चाहते हैं कि उनका शरीर उन्हें कोई तकलीफ न दे। अगर उन्हें कोई रोग या कष्ट न हो, तो वे स्वयं को स्वस्थ समझते हैं। वे इस बात से अनजान रहते हैं कि शरीर और मस्तिष्क के बीच का असंतुलन अंततः उन्हें बीमार बना देगा। योग का स्वास्थ्य पर तीन गुना असर होता है। यह लोगों को स्वस्थ रखता है, रोगों को पनपने नहीं देता और बीमार व्यक्तियों को स्वस्थ बनाता है।

लेकिन बीमारियां केवल शारीरिक नहीं होतीं। हर वह चीज, जो आपके आध्यात्मिक जीवन और व्यवहार को अव्यवस्थित करता है, बीमारी है। भले ही वह तत्काल बीमारी न लगे, पर अंततः वह बीमारी के रूप में ही प्रकट होगा। चूंकि ज्यादातर आधुनिक लोगों ने अपने मस्तिष्क को अपने शरीर से अलग मान लिया है, इसलिए उनकी आत्मा उनके सामान्य जीवन से निर्वासित हो गई है। वे भूल जाते हैं कि शरीर, मन और आत्मा, तीनों की तंदुरुस्ती हमारी मांसपेशियों के तंतुओं की तरह आपस में घनिष्ठता से जुड़ी होती हैं।
 आत्मा का बच्चा शरीर
स्वस्थ रहने, तंदुरुस्त रहने और शरीर को लचीला बनाए रखने के लिए किए जाने वाले योगासन योग के केवल बाह्य अभ्यास हैं। बेशक यह योग की वैधानिक शुरुआत है, लेकिन यही अंत नहीं है। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने आंतरिक शरीर में गहरी पैठ बनाता है, उसका मन आसन में डूबने लगता है।

पहला बाह्य अभ्यास सूखा और सतही रह जाता है, जबकि दूसरा गहन अभ्यास योग करने वाले को पसीने से भिगो देता है, उसे आसन के गहरे प्रभाव को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त रूप से गीला कर देता है। आसनों की महत्ता को कम करके मत आंकिए।

यहां तक कि एक सामान्य आसन में भी कोई व्यक्ति जिज्ञासा के तीन स्तरों का अनुभव करता हैः बाह्य जिज्ञासा, जो शरीर में मजबूती लाती है; आंतरिक जिज्ञासा, जो ज्ञान की स्थिरता लाती है; और अंतरतम की जिज्ञासा, जो आत्मा को दयावान बनाती है। योग की शुरुआत करने वाले जब आसन कर रहे होते हैं, तो सामान्यतः वे इन पहलुओं से अनजान होते हैं, लेकिन वे रहती हैं।
अक्सर हम लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि थोड़े से योगासन के बाद ही वे स्वयं को सक्रिय और हल्का महसूस करते हैं। यानी योग की सामान्य शुरुआत करने वाला व्यक्ति भी ऐसी तंदुरुस्ती का अनुभव करता है। यह केवल योग का बाहरी या शारीरिक प्रभाव भर नहीं है, बल्कि यह योग का आंतरिक शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है।

जब तक शरीर पूरी तरह से स्वस्थ नहीं होता, आप मात्र शारीरिक चेतना में फंसे होते हैं। यह आपको मानसिक विकास और स्वास्थ्य से रोकता है। हमें मजबूत शरीर चाहिए, तो हम दृढ़ मस्तिष्क का विकास कर सकते हैं। जब तक हम शरीर को उसकी सीमाओं से आगे नहीं ले जाएंगे और उसकी विवशताओं को दूर नहीं करेंगे, शरीर बाधक साबित होगा।

इसलिए हमें यह सीखना होगा कि हम अपनी ज्ञात सीमाओं से परे की खोज कैसे करें, जो हमारी जागरूकता को विस्तृत करे और हम स्वयं पर नियंत्रण किस तरह से करें। आसन इसके लिए सबसे आदर्श उपाय है।

योगगुरु बी के एस आयंगर को याद करते हुए उनकी किताब लाइन ऑन लाइफ: द योगा जर्नी टू होलनेस, इनर पीस, ऐंड अल्टीमेट फ्रीडम से एक अंश।
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