पोस्ट

2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ओशो: अष्‍टावक्र महागीता

अष्‍टावक्र महागीता पहला सूत्र : जनक ने कहा, ‘हे प्रभो, पुरुष ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है। और मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे प्राप्त होगा? यह मुझे कहिए! एतत मम लूहि प्रभो! मुझे समझायें प्रभो!’ बारह साल के लड़के से सम्राट जनक का कहना है : ‘हे प्रभु! भगवान! मुझे समझायें! एतत मम लूहि! मुझ नासमझ को कुछ समझ दें! मुझ अज्ञानी को जगायें!’ तीन प्रश्न पूछे हैं— ‘कथं ज्ञानम्! कैसे होगा ज्ञान!’ साधारणत: तो हम सोचेंगे कि ‘यह भी कोई पूछने की बात है? किताबों में भरा पड़ा है।’ जनक भी जानता था। जो किताबों में भरा पड़ा है, वह ज्ञान नहीं; वह केवल ज्ञान की धूल है, राख है! ज्ञान की ज्योति जब जलती है तो पीछे राख छूट जाती है। राख इकट्ठी होती चली जाती है, शास्त्र बन जाती है। वेद राख हैं—कभी जलते हुए अंगारे थे। ऋषियों ने उन्हें अपनी आत्मा में जलाया था। फिर राख रह गये। फिर राख संयोजित की जाती है, संगृहीत की जाती है, सुव्यवस्थित की जाती है। जैसे जब आदमी मर जाता है तो हम उसकी राख इकट्ठी कर लेते हैं—उसको फूल कहते हैं। बड़े मजेदार लोग हैं! जिंदगी में जिसको फूल नहीं कहा, उसकी हड्डिया—वड्डिया इकट्ठी कर लाते हैं—कहते ह

दो मार्ग: साकार और निराकार

एक उदाहरण के लिए छोटा—सा प्रयोग आप करके देखें ********************************************  तो आपको पता चलेगा। एक दीए को रख लें रात अंधेरे में अपने कमरे में। और अपनी आंखों को दीए पर एकटक लगा दें। दो—तीन मिनट ही अपलक देखने पर आपको बीच—बीच में शक पैदा होगा कि दीया नदारद हो जाता है। दीए की ज्योति बीच—बीच में खो जाएगी। अगर आपकी आख एकटक लगी रही, तो कई बार आप घबड़ा जाएंगे कि ज्योति कहं। गई! जब आप घबड़ाके, तब फिर ज्योति आ जाएगी। ज्योति कहीं जाती नहीं। लेकिन अगर आंखों की देखने की क्षमता बचानी हो, तो बहुत—सी चीजें देखना जरूरी है। अगर आप एक ही चीज पर लगा दें, तो थोड़ी ही देर में आंखें देखना बंद कर देती हैं। इसलिए ज्योति खो जाती है। जिस चीज पर आप अपने को एकाग्र कर लेंगे, और सब चीजें तो खो जाएंगी पहले, एक चीज रह जाएगी। थोड़ी देर में वह एक भी खो जाएगी। एकाग्रता पहले और चीजों का विसर्जन बन जाती है, और फिर उसका भी, जिस पर आपने एकाग्रता की। अगर सारी वासना को संसार से खींचकर परमात्मा पर लगा दिया, तो पहले संसार खो जाएगा। और एक दिन आप अचानक पाएंगे कि परमात्मा बाहर से खो गया। और जिस दिन परमात्मा भी बाहर से खो

सांस, मानव मुक्ति का मार्ग

यहाँ सद्‌गुरु सांस की प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए बता रहे हैं कि कैसे सांस को बड़ी सम्भावनाओं की ओर जाने के लिये एक द्वार की तरह प्रयोग किया जा सकता है? सद्‌गुरु: जैसे-जैसे हमारी जागरूकता में तीव्रता और पैनापन आने लगता है, एक बात जिसके बारे में हम स्वभाविक रूप से सबसे पहले जागरूक होते हैं, वह है सांस। हमारे शरीर में चलने वाली सांस, एक यांत्रिक प्रक्रिया है, जो लगातार बिना रुके चलती है। यह बहुत आश्चर्यजनक है कि कैसे अधिकतर लोग इसके बारे में जागरूक हुए बिना ही जीते रहते हैं। लेकिन, एक बार जब आप सांस के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो ये एक अदभुत प्रक्रिया बन जाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि आज 'सांस को देखना' संभवतः ध्यान की सबसे अधिक लोकप्रिय विधियों में से है। यह मूलभूत और सरल है, तथा इतनी आसानी से और स्वाभाविक रूप से होती है कि इसके लिये कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती। अगर आप थोड़े से ज्यादा सचेत हो जाते हैं, तो आप की सांस स्वाभाविक रूप से आप की जागरूकता में आ जायेगी। मैं छः - सात वर्ष का था, जब मैंने अपनी सांस का आनंद लेना शुरू किया। अपनी छोटी सी छाती और पेट को लयबद्ध ढं

शिव भगवान का काम विजय

इमेज
एक बार नारद जी तप करने के लिए हिमालय पर्वत की एक सुन्दर गुफा में चले गये । और वहाँ बहुत वर्षो तक समाधिस्थ होकर ब्रम्हा साक्षत्कार का विधान प्राप्त किया । देवेन्द्र ने उनके तप को विघ्न पहुँचाने के लिए काम को भेजा । काम (काम देव) अर्थात (मोह , राग , आदि का देव माना जाने वाला काम) ने नारद जी का तप भंग करने के लिए वहाँ पहुँच कर उनसे अपनी सम्पूर्ण कलाओं की रचना की । वसंत ऋतु ने मदोन्मत्त हो कर अपनी सुंदरता से नारद मुनि के चित्त मे विकार उत्पन्न करने का प्रयास किया । परन्तु शिव की कृपा से इंद्र का गर्व (अभिमान) नष्ट हो गया । क्योंकि हिमालय के इसी स्थान पर पूर्व काल में शिवजी ने तप कर काम को जला कर राख कर दिया था और काम की पत्नी रति को वरदान था की यहाँ पर काम का कोई स्थान नहीं है । इसीलिए जिस स्थान पर योगियो ,तपस्वियों , पुण्य आत्माओं का तप प्रभाव संचित होता है । उस स्थान पर किसी भी बाहरी मोह , माया का प्रभाव निस्किर्य हो जाता है । काम देव ने अपने  बाहरीकर्षण बाहरी स्वरुप को गति हीन जानकर हिमालय काम पर विजयप्राप्त कर दी । मनुष्य का बाहरी आकर्षण व्यर्थ है । बाह्य सौंदर्य केवल भ्र्म

Indo Russian relation in 2020 - addressed by Ambassador D.B.Venkatesh in...

इमेज

Presence of Russia in Global Encyclopedia of The Ramayan by Hon Chief mi...

इमेज

वैराग्य का अर्थ

वैराग्य का अर्थ है, अब मुझे कुछ भी आकर्षित नहीं करता। वैराग्य का अर्थ है, अब ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए मैं कल जीना चाहूं। वैराग्य का अर्थ है, ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए मैं कल जीना चाहूं। ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे पाए बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। वैराग्य का अर्थ है, वस्तुओं के लिए नहीं, पर के लिए नहीं, दूसरे के लिए नहीं, अब मेरा आकर्षण अगर है, तो स्वयं के लिए है। अब मैं उसे जान लेना चाहता हूं, जो सुख पाना चाहता है। क्योंकि जिन-जिन से सुख पाना चाहा, उनसे तो दुख ही मिला। अब एक दिशा और बाकी रह गई कि मैं उसको ही खोज लूं, जो सुख पाना चाहता है। पता नहीं, वहां शायद सुख मिल जाए। मैंने बहुत खोजा, कहीं नहीं मिला; अब मैं उसे खोज लूं, जो खोजता था। उसे और पहचान लूं, उसे और देख लूं। वैराग्य का अर्थ है, विषय से मुक्ति और स्वयं की तरफ यात्रा। ओशो

ऑर्गेनिक शक्ति.

इमेज
#..... आने वाला वक्त किसानी और किसानों का ही है। MS धौनी के इजा फार्म का रांची में खुला पहला आउटलेट, ग्राहकों की उमड़ी भीड़.... MS Dhoni EEJA Farms Opened in Ranchi क्रिकेट के बाद धौनी के किसानी अवतार को भी लोगों को बड़ा प्यार मिल रहा है। महेंद्र सिंह धौनी के प्रशंसकों की दिवानगी आउटलेट में देखने को मिली। उद्घाटन के साथ ही लोगों की भाड़ी भीड़ वहां खरीदारी के लिए जुटी।  इस आउटलेट का उद्घाटन रांची के मेन रोड में सुजाता चौक के पास हुआ है। इस आउटलेट का उद्घाटन धौनी के सबसे करीबी दोस्‍त परमजीत सिंह ने किया। इस मौके पर उनके कई अन्य दोस्त भी मौजूद थे। धौनी के फार्म की सब्जियों की बाजार में भारी डिमांड है। अभी तक धौनी की जो आर्गेनिक सब्जियां केवल विदेश जा रहीं थी, अब रांची के लोगों के लिए उपलब्ध होंगी। पहले दिन उद्घाटन के बाद चार घंटे में ही आउटलेट में लाई गई आधे से ज्यादा उत्पाद की बिक्री हो गई। हालांकि इससे पहले लालपुर में एक आउटलेट से इजा फार्म के दूध की होम डिलिवरी की जा रही थी। महेंद्र सिंह धौनी के प्रशंसकों की दिवानगी आउटलेट में देखने को मिली। इजा फार्म आउटलेट के उद्घाटन के स

इलायची_की_खेती

इमेज
#। वैसे तो पूरे भारत भर में इसकी खेती संभव है बहुत सारे लोग इसे अपनी दैनिक जरूरतों के लिए अपने बागवानी में भी लगाया करते हैं लेकिन कर्नाटक, केरल और तमिलनाडू इसकी खेती के लिए प्रसिद्ध और अनुकूल है। दक्षिण भारत के केरल में मालाबार की पहाड़ियों में उत्कृष्ट गुणवत्ता की इलायची की खेती की जाती है जो पूरी दुनिया में मशहूर है।  इलाइची की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु तापमान 10 डिग्री से 35 डिग्री सेल्सियस और 1500 मिमी से 4000 मिमी की वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रो में इसकी खेती की जाती है जो की समुद्री स्तर से 600 मीटर से 1500 मीटर की ऊचाई पर हो| खेती कैसे तैयार करें सबसे पहले आप अपने खेती के स्थान की जांच करा लें|इलायची की खेती के लिए मिट्टी का PH मान 4.5 से 7.0 तक ऐसी काली गहरी अम्लीय दोमट मिट्टी को इलायची की खेतो के लिए उपयुक्त माना जाता है| रेतीली भूमि में इलायची की खेती करना संभव नहीं है इसलिए आप भी इसे करने से बचें| इसकी खेती के लिए खाद के रूप में आप नीम की खली का प्रयोग कर सकते हैं|मुर्गी के द्वारा उत्पन्न खाद का भी इस्तेमाल किया जा सकता है| खाद को अगर तेज़ गर्मी के दिनों में खेत म

जैविक खाद से ज्यादा उत्पादन

आप जानते है फसलों के उत्पादन में जैव उर्वरक की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन अभी भी किसान, फसलों में रासायनिक उर्वरक का उपयोग कर रहे हैं। जिससे फसलों की लागत तो बढ़ रही है लेकिन किसानों के अपेक्षानुसार उपज नहीं बढ़ रही है। किसानों को इस नई उपज और जैविक खाद के माध्यम से इसकी उपज बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। दरअसल जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञानी ने गेहूं की ऐसी फसल (सीड) तैयार की है, जो रासायनिक उर्वरक की बजाए जैविक उर्वरक के उपयोग से अधिक उपज देती है। विवि के कृषि विज्ञान केंद्र जबलपुर एवं नेशनल फर्टीलाइजर्स लिमिटेड द्वारा इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को इस नई उपज और जैविक खाद के माध्यम से इसकी उपज बढ़ाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जैविक खाद से ज्यादा उत्पादन : शहपुरा के अंतर्गत आने वाले पिपरिया कला में गेहूं के दो प्रयोग का किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण देते हुए मृदा विज्ञानी डॉ.एके सिंह ने बताया कि खेतों पर पीएसबी एवं जेडएसबी जैविक उर्वरक एक तरह उर्वरक एवं बेंटोनाइट सल्फर के उपचार के साथ प्रयोग किए गए, जिनके अच्छे परिणाम सामने आए। जैव उर्

भारत की पहली लिथियम रिफाइनरी

 गुजरात में भारत की पहली लिटियम रिफाइनरी स्थापित की जाएगी इस रिफाइनरी को स्थापित करने के लिए देश की सबसे बड़ी नवीकरण ऊर्जा कंपनियों में से एक मणिकरण पावर लिमिटेड लगभग ₹1000 का निवेश करेगी इस रिफाइनरी के लिए लिथियम आयन को ऑस्ट्रेलिया से आयात किया जाएगा क्योंकि लिथियम एक दुर्लभ तत्व है जो आमतौर पर भारत में नहीं पाया जाता वर्तमान में भारत सबसे बड़े इलेक्ट्रिक कार बाजार के रूप में उभर रहा है ऐसे में देश को बैटरी का उत्पादन करने के लिए कच्चे माल के रूप में लिथियम की आवश्यकता है भारत अपनी लिथियम संबंधित आवश्यकता ओं का अधिकांश हिस्सा आयात करता है भारत में बोलीबीआई लिथियम भंडार भंडार तक पहुंच प्राप्त की है भारत ने साल 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहन संख्या को 36 परसेंट तक बढ़ाने का एक महत्वकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है

यूपी में खुलेगा देश का पहला वर्चुअल माल

उत्तर प्रदेश में सरकार देश का पहला वर्चुअल एग्जीबिशन माल की योजना पर काम कर रही है यह माल ऑनलाइन कारोबार का एक ऐसा फोरम होगा जहां पर क्रेता विक्रेता अपनी सुविधा के मुताबिक किसी भी समय उत्पादों की खरीद बिक्री कर सकेंगे इस माल में एक बार में 500 स्टाल लगेंगे क्रेता विक्रेता ऑनलाइन संवाद भी स्थापित कर सकेंगे में स्टालों के आवंटन में चक्रीय व्यवस्था लागू की जाएगी

कोविड-19 और भारत की वैक्सीन कूटनीति

हाल ही में भारत ने कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण शुरू करने के कुछ दिनों बाद अपने अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों और प्रमुख साझेदार देशों को स्वदेशी रूप से निर्मित कोविड-19 वैक्सीन की लाखों पूरा भेजना शुरू कर दिया है कोविड-19 महामारी से लड़ने में मदद करने के लिए परीक्षण किट व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण वेंटिलेटर और अन्य देशों को दवाओं की खेत भेजे जाने के बाद भारत अब वैक्सीन कूटनीति के साथ उन तक पहुंच बढ़ा रहा है इसी परिपेक्ष में भारत में अपने पड़ोसी और प्रमुख साझेदार देशों को कोविड-19 वैक्सीन प्रदान करने का निर्णय लिया है नेबरहुड फर्स्ट पहल को ध्यान में रखते हुए भारत द्वारा वैक्सीन को अपने निकटतम पड़ोसी बांग्लादेश भूटान मालदीव म्यानमार नेपाल और श्रीलंका तथा मारीशस और से सेल्स जैसे महत्वपूर्ण हिंद महासागरीय भागीदार देशो ko विशेष विमान द्वारा भेजा गया है भारत में सार्क देशों को भी वैक्सीन प्रदान करने का निर्णय लिया भारत की वैक्सीन मैत्री पहल कोविड-19 टीका को विकासशील देशों के लिए अधिक सुलभ बनाकर दुनिया में टीका असमानता को कम करने में मदद मिलेगी भारतीय टीका ने कम दुष्प्रभाव दिखाए हैं तथा यह कम लागत

पूर्वजन्म की घटना

वर्ष 1930 में एक संपन्न और भले परिवार में शांति देवी का जन्म हुआ था। लेकिन जब वे महज 4 साल की थीं तभी उन्होंने अपने माता-पिता को पहचानने से इनकार कर दिया और यह कहने लगीं कि ये उनके असली अभिभावक नहीं हैं। उनका कहना था कि उनका नाम लुग्दी देवी है और बच्चे को जन्म देते समय उनकी मौत हो गई थी। इतना ही नहीं वह अपने पति और परिवार से संबंधित कई और जानकारियां भी देने लगीं।जब उन्हें, उनके कहे हुए स्थान पर ले जाया गया तो उनकी कही गई हर बात सच निकलने लगी। उन्होंने अपने पति को पहचान लिया और अपने पुत्र को देखकर उसे प्यार करने लगीं। कई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में भी शांति देवी की कहानी प्रकाशित हुई। यहां तक कि महात्मा गांधी भी शांति देवी से मिले। शांति देवी को ना सिर्फ अपना पूर्वजन्म याद था बल्कि उन्हें यह भी याद था कि मृत्यु के बाद और जन्म से पहले भगवान कृष्ण के साथ बिताया गया उनका समय कैसा था। उनका कहना था कि वह कृष्ण से मिली थीं और कृष्ण चाहते थे कि वह अपने पूर्वजन्म की घटना सबको बताएं इसलिए शांति देवी को हर घटना याद है। बहुत से लोगों ने प्रयास किया लेकिन कोई भी शांति देवी को झूठा साबित नहीं कर प

अद्भुत स्मरणशक्ति

;हमें अपने जीवन और आसपास हुई कुछ अहम घटनाओं के अलावा शायद ही कोई बीती बात याद रहती है, लेकिन क्वींसलैंड की रबेका के पास अद्भुत स्मरणशक्ति;है. उनके मुताबिक, 12 दिन की उम्र से लेकर अब तक की हर दिन की बात याद है. यहां तक कि उन्होंने किस दिन क्या पहना था और उस दिन का मौसम कैसा था तक बता देती हैं.रबेका बताती हैं कि उनके जन्म के 12वें दिन उनके माता-पिता ने उन्हें ड्राइविंग सीट पर रखा था और उनकी तस्वीर ली थी. रबेका को अपना पहला जन्मदिन भी याद है. उन्होंने बताया कि वह जन्मदिन पर रोने लगी थीं, क्योंकि उनकी ड्रेस उन्हें असहज लग रही थी.डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रबेका के पास हाइली सुपीरियर ऑटोबायॉग्रफिकल मेमोरी (एचएसएएम) है. ऐसी स्मरणशक्ति वाले लोगों के पास असाधारण यादें संजोकर रखने की क्षमता होती है. बताया जा रहा है कि दुनियाभर में सिर्फ 80 लोगों के पास ऐसी स्मरणशक्ति है. रबेका को हैरी पॉटर बुक का एक-एक शब्द याद है. उनकी अपने जीवन से जुड़ी सबसे पहली बात जो याद है वह उनका जन्म है. उन्हें याद कि उनके पहले जन्मदिन पर उन्हें क्या गिफ्ट मिला था. उन्होंने ये सारी बातें अपने ब्लॉग पर लिखी हैं

भारतीय कृषि की अर्थब्यवस्था में योगदान

भारतीय कृषि भारतीय कृषि में लगभग 70% से अधिक जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है भारत की भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है इसका सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 14% योगदान है यह देश के लिए खाद्य सामग्री सुनिश्चित करती है और उद्योगों के लिए कच्चा माल पैदा करती है कृषि विकास किस लिए हमारी संपूर्ण खुशहाली की पहली शर्त है एग्रीकल्चर लेकिन भाषा के 2 शब्दों एग्रोस तथा कल्चर से बना है एग्रोस का अर्थ है भूमि और कल्चर का अर्थ है जुताई अर्थात कृषि का अर्थ है भूमि की जुताई कृषि के अंतर्गत पशुपालन मत्स्य अन्य विषय भी आते हैं वर्ष में एक बार बो गई भूमि को शुद्ध बोया क्षेत्र कहते हैं शुद्ध बोये गए क्षेत्र तथा 1 बार से अधिक बोये गए क्षेत्र को कुल मिलाकर कुल बोया गया क्षेत्र कहते हैं भारत में शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 17 करोड हेक्टेयर है कुल भौगोलिक क्षेत्र का 52% है पौधों से परिष्कृत उत्पाद तक की रूपांतरण में तीन प्रकार की आर्थिक क्रियाएं सम्मिलित हैं प्रथम द्वितीय तृतीय प्रथम प्राथमिक क्रियाओं के अंतर्गत कौन सभी क्रियाओं को शामिल किया जाता है जिनका संबंध पर आर्थिक प्राकृति

मौसम टाइम मशीन का निर्माण

अभी तक मौसम विज्ञानियों को मौसम से संबंधित ऐतिहासिक डेटा नहीं मिल पाता था जिसकी वजह से वह सटीक तौर पर मौसम की भविष्यवाणी नहीं कर पाते थे मौसम वैज्ञानिकों ने ऐसे सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का विकास किया है जिससे मौसम पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों को पूरे विश्व का ऐतिहासिक मौसम डाटा मिल जाएगा इस सॉफ्टवेयर में महासागरों को भी शामिल किया गया है

हड़प्पा सभ्यता ऋतु परिवर्तन से नष्ट हुई

सिंधु घाटी सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है यह विश्व की पहली शहरी सभ्यता थी जो भारतीय महाद्वीप में फली फूली सिंधु सभ्यता का चरम काल लगभग 26 ईसवी पूर्व से उन्नीस सौ ईसवी पूर्व के बीच में था इस सभ्यता के विकसित शहरों की मिसाल आज तक दी जाती है आज भी लोगों के लिए यह रहस्य है कि ऐसी फलती फूलती सभ्यता किसी समय अचानक समाप्त कैसे हो गई थी काफी समय से एक सिद्धांत या प्रस्तुत किया जाता है कि उत्तर-पश्चिम से हुए आर्यों के आक्रमण की वजह से उच्च विकसित सभ्यता नष्ट हो गई थी हालांकि इस सिद्धांत के पक्ष में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका था अब वैज्ञानिकों और पुरातत्व नेताओं ने इसका वास्तविक कारण ऋतु परिवर्तन को बताया है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और बनारस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि सिंधु घाटी क्षेत्र में लगभग 200 वर्ष तक सूखे के प्रकोप की श्रृंखला खेली जिसकी वजह से यह सभ्यता नष्ट हो गई यह बताता है कि 4100 वर्ष पूर्व उत्तर पश्चिम भारत अचानक कमजोर पड़े कृष्ण मानसून से प्रभावित हुआ था जिससे इस क्षेत्र में मरुस्थल जैसी स्थिति बन गई

घेरता बचपन में बुढ़ापा प्रोजेरिया

 फिल्म पा में जब लोगों ने अमिताभ बच्चन की को प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीड़ित बच्चे की भूमिका निभाते देखा तो कई लोगों को यकीन भी नहीं हुआ ऐसी भी कोई बीमारी होती है हमें से शायद ही किसी ने इस बीमारी का नाम सुनाओ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शायद कुछ लोग ही इस बीमारी के बारे में जानते होंगे दरअसल यह बीमारी सामान्य नहीं है इसलिए लोग इसकी जानकारी से अनजान है प्रोजेरिया के बारे में सबसे पहले जानकारी 1886 में जो नाथन ने दी थी इसके बाद 18 97 में हिस्ट्री गिलफोर्ड ने इसके बारे में बताया था इसलिए इस बीमारी को हर्ट चिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा गया है आज भी देश विदेश में पुरस्कृत वैज्ञानिक किस बीमारी की जड़ का पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बीमारी के बारे में पता चलने के बाद यह साफ हो जाएगा कि मनुष्य मनुष्य के बूढ़े होने की प्रक्रिया क्या है प्रोजेरिया सामान्य बीमारी की श्रेणी में नहीं आती 40 से 45 लाख बच्चों में से यह बीमारी किसी एक में पाई जाती है अब तक प्रोजेरिया से ग्रसित बच्चों की संख्या 45 से 40 से ज्यादा नहीं है गौर मतलब बिहार में एक ही परिवार के 5

अनुमानित समय से भी एक करोड़ वर्ष पहले थे डायनासोर

 एक नए शोध के अनुसार डायनासोरों के बारे में जितना माना जाता रहा है डायनासोर उससे भी एक करोड़ वर्ष पहले धरती पर अस्तित्व में थे द नेचर की रिपोर्ट के अनुसार एक अंतरराष्ट्रीय दल ने यह परिणाम तंजानिया में जीवाश्मों के अध्ययन के बाद दी है जीवाश्म विज्ञानियों के मुताबिक डायनासोर और उनके करीबी संबंधी जैसे उससे टीरो सार्स भी पहले अस्तित्व में थे जितना अब तक माना जाता रहा है शोध में बताया गया है कि अब तक माना जाता था कि डायनासोर केवल 23 करोड़ वर्ष पुराने थे लेकिन अब उनके पुराने करीबी सहयोगियों साहिलेसारस के लगभग 1करोड़ वर्ष और पुराने होने की पुष्टि हुई है शोध में यह भी कहा गया है कि धीरे-धीरे सालेसारस के साथ ही डायनासोर की उत्पत्ति हो गई शोधकर्ताओं को दक्षिण तंजानिया से लगभग 14 जीवाश्म हड्डियां मिली है जिन पर शोध किया गया है

भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया टीवी के जीवाणु का जिनोम मैप

तपेदिक गरीबों की बीमारी है इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके इलाज पर खास दिलचस्पी नहीं लेती टीबी से अंतिम लड़ाई का नेतृत्व करते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने इसके जीवाणु माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस के जीनोम की संपूर्ण सिक़्वेन्सिंग कर ली है सीएसआईआर के नेतृत्व में डेढ़ सौ वैज्ञानिकों ने एमटीवी के सभी 4000 जिलों को चिन्हित कर उसका डिजिटल मैप तैयार किया है इतना ही नहीं सीएसआईआर ने इन्हें फार्मा कंपनियों को निशुल्क उपलब्ध कराने के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध कराने का ऐलान किया है कि निदेशक ने बताया था कि इससे कम कीमत में और ज्यादा असरदार दवा इलाज की नई तकनीक हासिल करने का रास्ता खुल गया है 146 करोड़ की लागत से डिलीवरी ओपन कोर्स ड्रग डिलीवरी कार्यक्रम शुरू किया था इसके तक यह बड़ी सफलता है इसी कार्यक्रम में कनेक्ट टू द कोर्ट कॉन्फ्रेंस शुरू हुई थी उसमें वैज्ञानिकों ने टीबी जीन और उनकी सीक्वेंसिंग को अंतिम रूप प्रदान किया था वैज्ञानिकों ने कहा हां कहा था कि हालांकि दुनिया में एमटीवी के जीनोम को एक दशक पहले ही डिकोड कर लिया गया था लेकिन तब वैज्ञानिकों ने इसके 4000 जीन में से करीब 1000 जीन की

मृत्यु के बाद का जीवन

"अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है आत्‍मा" आत्मा और भूत-प्रेतों की दुनया बड़ी रहस्यमयी है। जिनका इससे सामना हो जाता है वह मानते हैं की आत्मा और भूत-प्रेत होते हैं और जिनका इनसे सामना नहीं होता है वह इसे कल्पना मात्र मानते हैं। लेकन भूत-प्रेत या आत्माओं का वजूद नहीं है इसे सरे से खारिज करना सही नहीं होगा कई बार कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो अशरीरी आत्मा के वजूद को मानने पर विवश कर देती है। विज्ञानं भी इस विषय पर परीक्षण कर रहा है और कई ऐसे प्रमाण सामने आए हैं जो यह बताते हैं कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है और यह कभी भी अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है। इसी तरह की एक घटना के बारे में यहां हम बात कर रहे हैं।हम जिस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुधयाना के एक निवासी की है जो कारोबार के सिलसिले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक दिल का दौड़ा पड़ा और स्‍थि गंभीर हो गई।कत्सकों ने काफी प्रयास किया लेकन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग दया। मरने से पहले इन्होंने अपने अं

प्राण ऊर्जा के असंतुलन के 10 लक्षण

प्राण संस्कृत का शब्द है जिसका संबंध जीवन शक्ति से है। यदि आप जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता चाहते हैं तो प्राण ऊर्जा को संतुलित करना बहुत जरूरी है। जब हमारी प्राण ऊर्जा मजबूत होती है तो हम प्रसन्न, स्वस्थ और संतुलित महसूस करते हैं लेकिन यदि हमारी आदतें और जीवनशैली खराब हो तो प्राण शक्ति कमजोर हो जाती है। इसकी वजह खराब डायट, खराब जीवनशैली और नकारात्मक सोच है। ऐसा होने पर हमें शारीरिक और मानसिक स्तर पर कुछ लक्षण दिखाई देते हैं जो वास्तव में खतरे की घंटी है कि आपकी प्राण ऊर्जा कमजोर पड़ रही है।प्राण ऊर्जा का कार्यजब हम सांस लेते हैं हम प्राण ऊर्जा ग्रहण करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि हम तो ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं लेकिन आपको जानने की जरूरत है, प्राण शक्ति वो अनछुआ और अनदेखा एहसास है जो अध्यात्म में मौजूद तो है लेकिन इसे आप तभी महसूस कर पाएंगे जब आपका रुख अध्यात्म की तरफ होगा।ये जीवन शक्ति ऊर्जा के रूप में शरीर में फैलती है बिल्कुल वैसे ही जैसे नसों के जरिए खून संपूर्ण शरीर में दौड़ता है। यह प्राण शक्ति 7 चक्रों से होती हुई पूरे शरीर में बहती है ठीक उसी तरह जैसे रक्त सभी अंगों तक पहुंचता है

रोटी बनाने वाला रोबोट

इमेज
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां आज भी तीनों वक्त का खाना गर्म खाया जाता है और जहां रोटी भी ताजा ही बनाई जाती है. मां के हाथ ही रोटी का स्वाद तो सबको पसंद होता है लेकिन आज कल की भाग दौड़ की जिंदगी में उस स्वाद के लिए कई बार लोग तरस जाते हैं. खास कर अगर महिला और पुरुष दोनों ही कामकाजी हों, तो खाना पकाने का वक्त कम ही मिल पाता है.इस समस्या से निपटने के लिए भारत में लोग रसोइये रख लेते हैं. लेकिन जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, उनके पास यह विकल्प भी नहीं है. उन्हीं को ध्यान में रखते हुए यह रोटी बनाने वाला रोबोट तैयार किया गया है. इसे बनाने वाली कंपनी का दावा है कि उनकी मशीन आटा गूंथने से ले कर, पेड़े बनाने, बेलने और रोटी को सेंकने तक का सारा काम खुद ही कुछ मिनटों में कर लेती है. हालांकि इसके दाम को देख कर लगता नहीं है कि बहुत लोग इसे खरीदेंगे. एक रोटी मेकर के लिए एक हजार डॉलर यानि 65 हजार रुपये तक खर्च करने होंगे. sabhar :www.dw.com

दूरानुभूति परामनोविज्ञान

इमेज
क्या आप अपनी बातों को बिना मोबाईल, टेलीफोन या दूसरे भौतिक क्रियाओं और साधनों के दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। एक बारगी आप कहेंगे ऐसा संभव नहीं है, लेकिन यह संभव है। आप बिना किसी साधन के दूसरों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं यह संभव है दूरानुभूति से, एफडब्ल्यूएच मायर्स ने इस इस बात का उल्लेख किया है इसे टेलीपैथी भी कहते हैं। इसमें ज्ञानवाहन के ज्ञात माध्यमों से स्वतंत्र एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क में किसी प्रकार का भाव या विचार पहुंचता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक दूसरे व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं के बारे में अतींद्रिय ज्ञान को ही दूरानुभूति की संज्ञा देते हैं। परामनोविज्ञान में एक और बातों का प्रयोग होता है। वह है स्पष्ट दृष्टि। इसका प्रयोग देखने वाले से दूर या परोक्ष में घटित होने वाली घटनाओं या दृश्यों को देखने की शक्ति के लिए किया जाता है, जब देखने वाला और दृश्य के बीच कोई भौतिक या ऐंद्रिक संबंध नहीं स्थापित हो पाता। वस्तुओं या वस्तुनिष्ठ घटनाओं की अतींद्रिय अनुभूति होती है यह प्रत्यक्ष टेलीपैथी कहलाती है।टेलीपैथी के जरिए किसी को किसी व्यक्ति को कोई काम करने के लिए मजबूर भी किया जा सकता ह

मानव मल से बनेगा सोना और खाद

इमेज
न्यूयॉर्क। भले ही यह सुनने में अजीब लगे, लेकिन सच है, क्योंकि अमेरिकी शोधकर्ता इंसान के मल से सोना और कई दूसरी कीमती धातुओं को निकालने में लगे हुए हैं। शोधदल ने अमेरिका के मैला निष्पादन संयत्रों में इतना सोना निकालने में कामयाबी हासिल की है जितना किसी खान में न्यूनतम स्तर पर पाया जाता है। एक अंग्रेजी वेबसाइट पर छपी खबर के मुताबिक डेनवर में अमेरिकन केमिकल सोसायटी की 249वीं राष्ट्रीय बैठक में मल से सोना निकालने के बारे में विस्तार से बताया गया है यूएस जिओलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) के सह-लेखक डॉक्टर कैथलीन स्मिथ के मुताबिक हमने खनन के दौरान न्यूनतम स्तर पर पाई जाने वाली मात्रा के बराबर सोना कचरे में पाया है। उन्होंने बताया कि इंसानी मल में सोना, चांदी, तांबा के अलावा पैलाडियम और वैनेडियम जैसी दुर्लभ धातु भी होती है।शोधदल का मानना है कि अमेरिका में हर साल गंदे पानी से 70 लाख टन ठोस कचरा निकलता है। इस कचरे का आधा हिस्सा खेत और जंगल में खाद के रूप में उपयोग मे लिया जाता है बचे हुए आधो हिस्से को जला दिया जाता है या फिर जमीन भरने के काम में ले लिया जाता है। धातु निकालने के लिए औद्योगिक खनन प्रक्र

इंसान मशीन में बदल जायेगा

आने वाले समय में इंसान में मशीन का कम्बीनेशन एक साथ हो सकता है कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.पूरी तरह रोबोटिकआइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.हाथों से शुरु जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप. बेहद सटीक डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने

"हल्दी और एंटीबायोटिक्स का मिश्रण कई गुना उपयोगी

भारत के हैदराबाद विश्वविद्यालय और रूस के नोवोसिबिर्स्क राजकीय विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत ऐसी दवाइयां तैयार करने के काम में जुटे हुए हैं जिनके लिए हल्दी सहित अन्य पारंपरिक भारतीय मसालों का उपयोग किया जा सकता है। नोवोसिबिर्स्क राजकीय विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई एक सूचना के अनुसार, "प्रोफेसर अश्विनी नानिया के नेतृत्व में हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अगर हल्दी और एंटीबायोटिक्स को मिलाकर क्रिस्टल बनाए जाएं और आगे इन क्रिस्टलों को पीसकर दवाइयां बनाई जाएं तो ऐसी दवाइयों का असर कई गुना बढ़ जाएगा।"इस परियोजना में शामिल रूसी वैज्ञानिकों का नेतृत्व नोवोसिबिर्स्क राजकीय विश्वविद्यालय के ठोस रसायनिक विज्ञान विभाग की प्रमुख और इस विश्वविद्यालय की एक वरिष्ठ शोधकर्ता, प्रोफेसर ऐलेना बोल्दरेवा कर रही हैं। sabhar : sputanik news

पहली जीरो बजट फिल्म

बॉलीवुड क्या हॉलीवुड के इतिहास में भी कभी कोई जीरो बजट फिल्म नहीं बनी लेकिन लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होने वाला यह कारनामा कर दिखाया कुछ युवाओं ने इन युवाओं ने सोचा कि कुछ ऐसा क्यों ना किया जाए जो हॉलीवुड और बॉलीवुड में कभी ना किया गया हो नतीजे के तौर पर दुनिया की पहली जीरो बजट मूवी लो हो गई पार्टी बनकर सामने आई लेखक निर्देशक तेजस हरपालिया के निर्देशन में अनिरुद्ध दवे वैदेही हमेशा परेश भट्ट मानव वासवानी और लुविना भाटिया जैसे युवाओं ने बिना एक पैसा लिए दिन रात एक कर के इस फिल्म को बनाई थी इसमें सतीश कौशिक और मनोज ऐसे मनोज जोशी जैसे वरिष्ठ कलाकारों का सहयोग इन युवाओं को मिला इस फिल्म में जो घर दिखाया गया वह अनुरोध जगह का है फिल्म के तकनीकी पक्ष में कई वर्ष तक नीचे उन्होंने बिना किसी पैसे के सहयोग किया है उल्लेखनीय है कि तेजस   मोबाइल मूवी बनाकर अपना नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करा चुकी है

अस्कोट के पालों का प्रभुत्व

ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह तथ्य सामने आता है कि अस्कोट राज्य की स्थापना सन 1238 ई. में हुई और यह 1623 ई. तक स्वतंत्र रूप में विद्यमान रहा। अपनी स्थिति एवं विशिष्टता के कारण यह कत्यूरी, चन्द, गोरखा व अंग्रेजी शासन के बाद स्वतंत्र भारत में जमींदारी उन्मूलन तक रहा।अस्कोट परगना महा व उप हिमालयी पट्टी के मिलन पर बना एक विस्तृत भू-खण्ड है, जिसमें छिपला एवं घानधुरा जैसे सघन वनों से आवृत्त पर्वत मालायें, गोरी, काली, धौली नदियों की गहरी घाटियों के क्षेत्र और आकर्षक सेरे मानव बसाव के लिये उपयुक्त रहे। अस्कोट काली जल-ग्रहण क्षेत्र में पड़ता है। इसमें छिपला से उतरने वाली अनेक छोटी नदियाँ जैसे मदकनी, बरमगाड़, रौंतीसगाड़, चरमगाड़, चामीगाड़, गुर्जीगाड़ के ढालों में भी काश्त के लिये सीढ़ीदार उपजाऊ खेत और इन खेतों से लगे छोटे-छोटे बनैले गाँव आकर्षण का कारण बनते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से अस्कोट एक सम्पन्न परगना माना जा सकता है।अभिलेखों में बंगाल, काबुल, कटोर, कश्मीर, देव प्रयाग, टिहरी गढ़वाल एवं बैजनाथ के पाल मुख्य हैं। विभिन्न स्थानों से पालों के अभिलेख उपलब्ध होने से पालों के साम्राज्य का सन्

नमक का स्थान ले सकता है समुद्री शैवाल

आप अगर आप को नमक का सेवन करना है तो आप उसकी जगह समुद्री शैवाल का इस्तेमाल कर सकते हैं वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री शैवाल के दानों ग्रेनल का इस्तेमाल अधिक नमक खाने से होने वाली परेशानियों को दूर कर सकता है ब्रिटेन के से फील्ड हां लायन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि समुद्री शैवाल के दानों को खाने में मिलाने से अच्छा स्वाद आता है और उसमें नमक की मात्रा कम होती है दूसरी तरफ अधिक नमक के इस्तेमाल से प्रत्येक वर्ष दुनिया में हजारों लोगों के असमय मौत हो जाती है वैज्ञानिकों का दावा है कि ब्रेड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में नमक की जगह इसका इस्तेमाल करने से उच्च रक्तचाप हृदयाघात और मृत्यु के खतरे से बचा जा सकता है शैवाल का नमक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल तो बहुत इसका एकमात्र पहलू है सवाल में बहुत गुण है इसमें समुद्री सेवा में बड़ी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जिससे पेट भरा हुआ महसूस होता है इसलिए मोटापा घटाने में भी सहायक है इसलिए यह मोटापा घटाने में भी सहायक है जिन वैज्ञानिकों ने इस परियोजना पर शोध किया उन्होंने पाया कि सहवाग के दानों में सोडियम का स्तर मात्र तीन 3.5 था

170 वर्ष बाद मिली अंधेरे में चमकने वाली मशरूम

ब्राजील के वर्षा वनों में वैज्ञानिकों को फिर से वह मशरूम मिल गई है जो 1840 के बाद से नहीं देखी गई थी इस चमकदार मशरूम की खोज सन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस डेस जार्डिन और उनकी टीम द्वारा की गई है या मशरूम अंधेरे में इतनी तेजी से चमकती है कि उसके प्रकाश में अखबार पढ़ा जा सकता है शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इसकी खोज के बाद वे इस बात का पता लगाने में सफल होंगे कि क्यों कुछ फंगस में चमकने की क्षमता होती है वैज्ञानिकों ने इस मशरूम को फिर से नियमों को पाना गार्डनर के नाम से वर्गीकृत किया है न्यू नोट ओपनस गार्डनर को आखरी बार 1840 में ब्रिटिश वनस्पति विज्ञानी जॉर्ज गार्डनर ने तब देखा था जब कुछ बच्चे इस प्रकार चमकदार मशरूम से खेल रहे थे इस मशरूम के हरे प्रकाश का पता लगाने के लिए डॉ डेस जारटिन और उनके सहयोगियों को कई सप्ताह तक अंधेरी रातों में ब्राजील के जंगलों में भटकना पड़ा तथा डिजिटल कैमरों की मदद से वे रात में चमक रहे इस मशरूम की फोटो कैमरे में उतारने में सफल रहे जेलीफिश और जुगनू ऐसे ही कुछ जंतु है जो चमक पैदा करते हैं बैटरी ओं से संगी संगी और मछली से की रासायनिक प्र

वैज्ञानिकों ने विकसित किया इलेक्ट्रॉनिक पौधा, विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत "

लन्दन में ;वैज्ञानिकों ने पौधे के संवहन तंत्र में सर्किट लगाकर एक इलेक्ट्रॉनिक पौधे का निर्माण किया है। इससे विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत हो सकती है।स्वीडन के लिकोंपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के दल ने पौधों के अंदर लगाए गए तारों, डिजिटल लॉजिक और प्रदर्शनकारी तत्वों को दिखाया गया है, जो आर्गेनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के नए अनुप्रयोगों और वनस्पति विज्ञान में नए उपकरण विकसित करने में मददगार हो सकते हैं।उमीआ प्लांट साइंस सेंटर के निदेशक और प्लांट रिप्रोडक्शन बायलॉजी के प्रोफेसर ओव निल्सन ने कहा, इससे पहले वैज्ञानिकों के पास जीवित पौधे में विभिन्न अणुओं के सकेंद्रण को मापने के लिए कोई अच्छा उपकरण नहीं था, लेकिन इस शोध के बाद हम पौधों का विकास करने वाले उन विभिन्न पदार्थो की मात्रा को प्रभावित करने में सक्षम हैं।शोधकर्ताओं ने कहा, पौधों में रासायनिक मार्गो पर नियंत्रण से प्रकाश संश्लेषण आधारित ईंधन सेल, सेंसर्स (ज्ञानेंद्रियों) और वृद्धि नियामकों के लिए रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही ऐसे उपकरण भी तैयार किए जा सकते हैं, जो पौधों की आंतरिक क्रियाओं को व्यवस्थित कर सकें।उन्होंने कहा, यह

अमेरिकी लोग योग के बाद ध्यान में प्रविष्ट हो रहे है

बाहरी दुनिया शोर गुल से भरी है और भीतर मन की उथल पुथल है. ऐसे में क्या ध्यान शांति दे पाएगा? योग के बाद अब ध्यान अमेरिका को अपनी आगोश में ले रहा शाम के पांच बजते ही 31 साल की जूलिया लायंस अपना काम काज समेटती हैं. न्यू यॉर्क से सटे शहर मैनहटन में रहने वाली जूलिया सीधे ध्यान केंद्र की ओर बढ़ती हैं. वहां वह आधे घंटे गहरे ध्यान में डूबने की कोशिश करेंगी. जूलिया इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. अप्रैल 2016 में अचानक उन्होंने ध्यान शुरू किया. ध्यान केंद्र के सोफे में बैठकर वह कहती हैं, "मैं शांति का एक लम्हा चाहती हूं. इस शहर में आप हमेशा भाग रहे होते हैं और यहां कोई भी ऐसा कोना नहीं जहां शांति हो."योग भले ही दुनिया भर में मशहूर हो चुका हो, लेकिन ध्यान अभी भी चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है. पश्चिम में अब तक ध्यान को आध्यात्मिकता की ओर् झुके हुए लोगों से जोड़कर देखा जाता रहा है. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. अमेरिका के कई अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज में ध्यान की मदद ली जा रही है. स्कूलों में टेलिविजन के जरिये ध्यान सिखाया जा रहा है. स्मार्टफोन तक सिमट चुकी जिंदगी का ही नतीजा है कि अमेर

बुद्धि को प्रखर बनाती हैं ये 5 आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

आज के समय ज्यादातर जॉब्स ऐसे हैं, जिनमें शार्प ब्रेन की जरूरत होती है। साथ ही लगातार मेंटल प्रेशर लेते हुए सही तरह से काम कर सकनेवाले इंप्लॉयज ही हर किसी को चाहिए होते हैं। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता है यह जानना कि आखिर हम अपने ब्रेन को लगातार ऐक्टिव कैसे रख सकते हैं। प्रकृति ने हमें बहुत सारी जड़ी-बूटियां और औषधियां दी हैं, जो हमारे शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने का काम करती हैं। दिमाग को लगातार ऊर्जा देनेवाली इन प्राकृतिक औषधियों को आयुर्वेद में एक खास वर्ग में रखा गया है, इसे आयुर्वेद मेध्या और नॉट्रोपिक ग्रुप कहते हैं। आइए, यहां जानते हैं कि ये जड़ी-बूटियां किस तरह ब्रेन को ऐक्टिव रखने में मदद करती हैं... ब्राह्मी (बकोपा मोननेरी) -ब्राह्मी एक एडाप्टोजेनिक जड़ी बूटी है। यह ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर जैसे सेरोटोनिन, डोपामाइन और गाबा को संशोधित करने का काम करती है। साथ ही तंत्रिका तंतुओं के कुशल संचरण में सुधार करती है। -ब्राह्मी का सेवन करनेवाले लोगों के दिमाग पर तनाव में का बहुत अधिक असर नहीं हो पाता है। क्योंकि ब्राह्मी मस्तिष्क की कोशिकाओं में लचीलापन बढ़ाने का काम करती है। इससे य

गंजेपन का इलाज

न्यूयॉर्क।अगर आपके सिर के बाल पूरी तरह से झड़ गए हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है। अमेरिका के कुछ रिसर्चर्स ने ऐसी दवा खोजने का दावा किया है जो गंजे लोगों के सिर पर बाल उगाने में मददगार हो सकेगी। अभी इस दवा का यूज कैंसर के इलाज के लिए किया जा रहा है यह दावा अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में किए गए एक एक्सपेरिमेंट के बाद किया गया है। रिसर्चर्स एन्जेला क्रिस्टियानो और सहयोगियों द्वारा किए गए इस एक्सपेरिमेंट में कैंसर के इलाज के काम आ रही रुक्सोलिटाइनिब और टोफासिटाइनिब नामक दवाएं गंजेपन के इलाज में भी यूजफुल पाई गई है। रिसचर्च ने चूहों पर यह सफल एक्सपेरिमेंट किया है। जिन चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया गया, उनके शरीर के सारे बाल गिर चुके थे। रिसर्चर्स का कहना है कि बाल झड़ने की समस्या वाले इन चूहों की स्किन पर इन दवाओं का पांच दिनों तक लेप किया गया और दस दिनों के भीतर ही बालों की जड़ें फूटनें लगीं। लगभग तीन हफ्ते में ही काफी घने बाल आ गए।रिसर्चर्स ने एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी के इलाज के लिए चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया था। मेल पैटर्न बाल्डनैस के लिए ज़िम्मेदार एलोपेशिया

हींग का सेवन पुरूषो की पौरूष छमता बढ़ाते है

"पान चबाइए, सेक्स पावर बढ़ाइए!" ;अगर आप अपनी सेक्स क्षमता में कमी से परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज आपके घर में ही है। सेक्स क्षमता यानी सेक्स पावर बढ़ाने में हींग बहुत ही फायदेमंद है। हींग का इस्तेमाल सदियों से पुरुषों के नपुसंकता की समस्या का समाधान घरेलू नुस्खे के रूप में किया जाता रहा है। हींग कामोत्तेजक के रूप में काम करती है। इसलिए जिन पुरुषों को समय पूर्व स्खलन की समस्या होती है उनके इस समस्या को हींग नैचुरल तरीके से ठीक करने में बहुत मदद करती है।हर्ब दैट हील: नैचुरल रेमिडी फॉर गुड हेल्थ पुस्तक के अनुसार 40 दिनों तक 6 सेंटीग्राम (0.06 ग्राम) हींग का सेवन करने से आप सेक्स ड्राइव को बेहतर बना सकते हैं। मिक्सचर के रूप में लगभग 0.06 ग्राम हींग को घी में फ्राई करें और उसमें शहद और बरगद के पेड़ का लैटेक्स मिलाकर इस मिश्रण को बना लें। नपुसंकता को ठीक करने के लिए सुबह सूर्य निकलने के पहले इस मिश्रण का सेवन खाली पेट 40 दिनों तक करें।इरेक्टाइल डिसफंक्शन और समय पूर्व स्खलन की समस्या को अगर आप नैचुरल तरीके से ठीक करना चाहते हैं तो हींग एक अच्छा विकल्प बन सकता है।

कैसी होंगी आने वाली समय की दवाएं

अगर इस संदेशवाहक आरएनए के साथ बैक्टीरिया या वायरस के प्रोटीन को शरीर में भेजा जाए तो शरीर का प्रतिरोधी तंत्र ऐसे प्रोटीन की पहचान करना सीख जाता है और उसके लिए प्रतिक्रिया देता है. नए तरह के इलाज में किसी कृत्रिम चीज को शरीर में नहीं डाला जाएगा, बल्कि प्राकृतिक रूप से संदेशवाहक आरएनए में कुछ ऐसे अंश मिलाए जा रहे हैं, जिससे उसकी गुणवत्ता बढ़ाई जा सके.रिसर्चर इन बायोमॉलिक्यूल्स की मदद से कैंसर के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता तक हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे कई तरह के संक्रमण वाली बीमारियों के खिलाफ टीके विकसित किए जा सकते हैं. बायोकेमिस्ट्री के विशेषज्ञ फ्लोरियान फॉन डेय मुएलबे बताते हैं, "आरएनए के इस्तेमाल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां हम एक ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिसमें हर बार एक ही तरीके का इस्तेमाल होगा. चाहे कैंसर हो या फिर कोई और बीमारी, टीका बनाने का तरीका हमेशा एक जैसा ही होगा. फर्क सिर्फ इतना होगा कि हम प्रक्रिया को शुरू करने के लिए मैसेंजर आरएनए को जानकारी अलग अलग तरह की देंगे.2014 में इस रिसर्च कॉन्सेप्ट को यूरोपीय संघ ने अपने पहले 'इनोवेशन इंड

सौंफ में हैं इतने सारे गुण

;भारत में सदियों से किसी भी रोग को ठीक करने के लिए आयुर्वेद का सहारा लिया जाता रहा है। प्राचीनकाल के वैद्य बड़ी से बड़ी बीमारी को आयुर्वेदिक तरीके से जड़ी-बूटियों से ठीक कर देते थे। आज भी आयुर्वेदिक तरीकों का प्रयोग भारत में किया जाता है। अब तो भारतीय आयुर्वेद पद्धति को विदेशों में भी अपनाया जाने लगा है।हमारे घर में कुछ ऐसी आयुर्वेदिक चीजें उपलब्ध होती हैं, जिनके गुण के बारे में कम ही लोग जानते हैं। इनमें से एक बहुत गुणकारी वस्तु है सौंफ। अक्सर जब आप कहीं खाना खाने बाहर जाते हैं तो वहां आपको सौंफ देखने को मिलती ही है। जब आप खाना खाकर बिल चुकाने जाते हैं तो वहीं पास में सौंफ और मिश्री रखी होती हैपाचन क्रिया ठीक करने में सहायक है सौंफ:दरअसल सौंफ बहुत पहले से ही पाचन क्रिया को ठीक करने में इस्तेमाल की जाती रही है। ठीक इसी तरह सौंफ के अन्य बहुत से फायदें हैं, जिनसे ज्यादातर लोग अनजान हैं। आज हम आपको सौंफ के कुछ ऐसे ही फायदों के बारे में रूबरू करवाने वाले हैं।इसलिए इस्तेमाल की जाती है सौंफ: खाना खाने के बाद हर दिन आधा चम्मच सौंफ खाने से पेट सम्बन्धी सभी बीमारियां दूर हो जाती हैं। आंखों में

नपुंसकता कारण सरल इलाज

;नपुंसकता के मरीज़ लगातार बढ़ रहे है। ज़्यादातर मरीज़ो में तनाव मुख्य वजह है। एक रिसर्च के मुताबिक ज़्यादातर मरीज युवा होते है। इनकी उम्र 25 से 40 के बीच होती है। साथ ही यह ज़रूरी नहीं की बॉडी बिल्डर व्यक्ति इस समस्या से ग्रहसित नहीं होते। यह किसी को भी हो सकती है। यह कहना हैकेजीएमसी के आयुर्वेदिक चिक्त्सिक डॉ सुनित कुमार मिश्र का। उन्होंने बताया कीं नपुंसकता के दो कारण होते हैं। शारीरिक और मानसिक। चिन्ता और तनाव से ज्यादा घिरे रहने से मानसिक रोग होता है।नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण भी होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को यदि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है;नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण भी होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को यदि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है।नपुंसकता के रोगी को अपने खाने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आहार में पौष्टिक खाद्य पदार्थों घी, दूध, मक्खन के साथ सलाद भी ज़रूर खाना चाहिए। फ़ल और फ़लों के रस के सेवन से शारीरिक क्षमता बढ़ती है। नपुंसकता की चिकित्सा के चलते र

दिमाग का बैकअप लिया जा सकता है अमरता की ओर

इंसान सदियों से गुफ़ाओं की दीवारों पर चित्र उकेरकर अपनी यादों को विस्मृत होने से बचाने की कोशिश कर रहा है.पिछले काफ़ी समय से मौखिक इतिहास, डायरी, पत्र, आत्मकथा, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म और कविता इस कोशिश में इंसान के हथियार रहे हैं.आज हम अपनी यादें बचाए रखने के लिए इंटरनेट के पेचीदा सर्वर पर - फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, जीमेल चैट, यू-ट्यूब पर भी भरोसा कर रहे हैं.ये इंसान की अमर बने रहने की चाह ही हो सकती है कि इटर्नी डॉट मी नाम की वेबसाइट तो मौत के बाद लोगों की यादों को सहेज कर ऑनलाइन रखने की पेशकश करती है.लेकिन आपको किस तरह से याद किया जाना चाहिए? अब तो ये भी संभव है कि हमारी आने वाली पुश्तों के लिए हमारे दिमाग को संरक्षित करके रखा जा सके.मतलब ये कि यदि आपके ब्रेन को हार्ड ड्राइव पर सेव करना संभव हो, तो क्या आप ऐसा करना चाहेंगे दादी ने सहेजना बंद किया अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले, मेरी दादी ने एक फ़ैसला किया. उन्होंने 1950 के दशक से परिवार के सदस्यों के फ़ोटो, दादा को लिखे प्रेम पत्र और कई और चीज़ों को संभालकर रखा था.पर मृत्यु से कुछ महीने पहले, इन यादों को सहेजने की बजाय उन्होंने इन्हें साझा

आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका

हिंदू धर्म में आद्यात्मिक काम विज्ञानं का बहुत महत्व है तंत्र विद्या जिसके जनक भगवान शिव माने जाते है पुरुष और प्रकृति के सयोग पे आधारित है सम्भोग से समाधी में जो विचार शून्यता की अनुभूति सेक्स के चरम पे होती है वही विचार शून्यता की अनुभूति समाधी में होती है धयान की ११२ विधियों में से सम्भोग से समाधी भी एक बिधि है सम्भोग के चरम में जब विचार शून्य हो जाते है स्त्री पुरुष को शिव शक्ति का स्वरुप मानकर साधना मन को एकाग्र करने के लिए की जाती है यानि ऋणात्मक शक्ति धनात्मक शक्ति एक हो जाती है जो की ब्रम्ह की अवस्था है हर कण कण में शिव और शक्ति का वास है काम सूत्र की रचना नंदी ने शिव और पार्वती के प्रणय सम्बाद पे आधारित भगवान शिव की इच्छा पे संसार के लिए किया ताकि लोगो को आध्यात्मिक काम का ज्ञान मिल सके इसी पे आधारित वात्सायन ने काम सूत्र की रचना की और चंदेल राजाओ ने खजुराहो के काम मंदिर की स्थापना की आगे चल के ओशो ने सम्भोग से समाधी का समर्थन किया और इसकी विवेचना की यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी महिमा ब