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शनिवार, 27 नवंबर 2021

छाया पुरुष सिद्ध योगी एक ही समय में कई स्थानों में एक साथ छाया शरीर के माध्यम से प्रकट हो सकता है और अलग अलग कार्य-सम्पादन भी कर सकता है

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----------:छाया पुरुष सिद्ध योगी एक ही समय में कई स्थानों में एक साथ छाया शरीर के माध्यम से प्रकट हो सकता है और अलग अलग कार्य-सम्पादन भी कर सकता है:-------------
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                      भाग--तीन
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परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन

पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन

       
        साधारणतया शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति का छाया शरीर बहुत कम ही बाहर निकलता है। यदि कभी किसी कारणवश निकलना पड़ा तो बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है छाया शरीर को। धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक व्यक्ति के अलावा उच्च विचार रखने वाले तथा प्रबल इच्छा-शक्ति सम्पन्न व्यक्ति का छाया शरीर शीघ्र अलग नहीं होता और यही कारण है कि इस प्रकार के लोग कभी बीमार नहीं पड़ते।
       यह समझ लेना चाहिए कि स्थूल शरीर और छाया शरीर एक दूसरे के पूरक शरीर हैं। दोनों की भौतिक एकता इतनी घनिष्ठ है कि छाया शरीर में लगी चोट स्थूल शरीर की क्षति के रूप में देखी जा सकती है। इस क्रिया को प्रतिप्रभाव कहते हैं। कमज़ोर, शिथिल, रोगग्रस्त व्यक्ति का छाया शरीर स्थूल शरीर से थोड़ी दूरी  बनाकर रहता है, लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति स्वस्थ होता जाता है, वैसे-ही-वैसे उसका छाया शरीर भी उसके स्थूल शरीर में समाने लग जाता है और जब वह पूरी तरह समा जाता है, तभी रोगी पूर्ण स्वस्थ होता है। कहने का आशय यह है कि मनुष्य की स्वस्थता-अस्वस्थता उसके छाया शरीर पर निर्भर करती है।
       छाया शरीर बिना स्थूल शरीर अधूरा है। छाया शरीर उस समय अलग होता है जब हम मिलन करते हैं, नशा करते हैं, क्रोध या चिन्ता करते हैं, चोरी करते हैं, झूठ बोलते हैं, लड़ाई-झगड़ा करते हैं, आवेश करते हैं, भय की स्थिति में होते हैं या किसी बड़े और प्रभावशाली व्यक्ति के सामने जाते हैं। ऐसी स्थिति में छाया शरीर स्थूल शरीर से थोड़ा अलग हो जाता है। समझ लेना चाहिए कि दोनों शरीरों की सामंजस्यता में कमी होने पर मनुष्य को कमजोरी, मानसिक दुर्बलता का अनुभव तुरंत होने लगता है। दोनों में थोड़ा-सा भी अन्तर होने पर कोई-न कोई-रोग उत्पन्न होता है। सभी प्रकार के रोगों का एकमात्र कारण स्थूल शरीर और छाया शरीर में वैषम्य उत्पन्न हो जाना ही होता है। उचित सामंजस्य होने के लिए उचित आहार, निद्रा, मानसिक सन्तुलन बनाये रखना आवश्यक है। वाणी का कम-से-कम उपयोग ,अधिक-से-अधिक एकान्त का सेवन और अल्प भोजन आवश्यक है।sabhar Shiva ram Tiwari Facebook wall

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