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मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

ओशो: अष्‍टावक्र महागीता

अष्‍टावक्र महागीता

पहला सूत्र :

जनक ने कहा, ‘हे प्रभो, पुरुष ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है। और मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे प्राप्त होगा? यह मुझे कहिए! एतत मम लूहि प्रभो! मुझे समझायें प्रभो!’

बारह साल के लड़के से सम्राट जनक का कहना है : ‘हे प्रभु! भगवान! मुझे समझायें!

एतत मम लूहि!

मुझ नासमझ को कुछ समझ दें! मुझ अज्ञानी को जगायें!’ तीन प्रश्न पूछे हैं—

‘कथं ज्ञानम्! कैसे होगा ज्ञान!’

साधारणत: तो हम सोचेंगे कि ‘यह भी कोई पूछने की बात है? किताबों में भरा पड़ा है।’ जनक भी जानता था। जो किताबों में भरा पड़ा है, वह ज्ञान नहीं; वह केवल ज्ञान की धूल है, राख है! ज्ञान की ज्योति जब जलती है तो पीछे राख छूट जाती है। राख इकट्ठी होती चली जाती है, शास्त्र बन जाती है। वेद राख हैं—कभी जलते हुए अंगारे थे। ऋषियों ने उन्हें अपनी आत्मा में जलाया था। फिर राख रह गये। फिर राख संयोजित की जाती है, संगृहीत की जाती है, सुव्यवस्थित की जाती है। जैसे जब आदमी मर जाता है तो हम उसकी राख इकट्ठी कर लेते हैं—उसको फूल कहते हैं। बड़े मजेदार लोग हैं! जिंदगी में जिसको फूल नहीं कहा, उसकी हड्डिया—वड्डिया इकट्ठी कर लाते हैं—कहते हैं, ‘फूल संजो लाये’! 

जनक भी जानता था कि शास्त्रों में सूचनाएं भरी पड़ी हैं। लेकिन उसने पूछा, ‘कथं ज्ञानम्? कैसे होगा ज्ञान?’ क्योंकि कितना ही जान लो, ज्ञान तो होता ही नहीं। जानते जाओ, जानते जाओ, शास्त्र कंठस्थ कर लो, तोते बन जाओ, एक—एक सूत्र याद हो जाये, पूरे वेद स्मृति में छप जायें—फिर भी ज्ञान तो होता नहीं।

‘कथं ज्ञानम्?

कुछ दिनों पहले कुछ जैन साध्वियों की मेरे पास खबर आई कि वे मिलना चाहती हैं, मगर श्रावक आने नहीं देते। यह भी बड़े मजे की बात हुई! साधु का अर्थ होता है, जिसने फिक्र छोड़ी समाज की; जो चल पड़ा अरण्य की यात्रा पर; जिसने कहा, अब न तुम्हारे आदर की मुझे जरूरत है न सम्मान की। लेकिन साधु—साध्वी कहते हैं, ‘श्रावक आने नहीं देते! वे कहते हैं, वहां भूल कर मत जाना। वहां गये तो यह दरवाजा बंद!’ यह कोई साधुता हुई? यह तो परतंत्रता हुई, गुलामी हुई। यह तो बड़ी उलटी बात हुई। यह तो ऐसा हुआ कि साधु श्रावक को बदले, उसकी जगह श्रावक साधु को बदल रहा है। एक मित्र ने आ कर मुझे कहा कि एक जैन साध्वी आपकी किताबें पढ़ती है, लेकिन चोरी से; टेप भी सुनना चाहती है, लेकिन चोरी से। और अगर कभी किसी के सामने आपका नाम भी ले दो तो वह इस तरह हो जाती है जैसे उसने कभी आपका नाम सुना ही नहीं।

यह मुक्ति हुई?

जनक ने पूछा, ‘कथं मुक्ति?

कैसे होती मुक्ति? क्या है मुक्ति? उस ज्ञान को मुझे समझायें, जो मुक्त कर देता है।’

पूछा जनक ने, ‘कैसे होगी मुक्ति और कैसे होगा वैराग्य? हे प्रभु, मुझे समझा कर कहिए!’ अष्टावक्र ने गौर से देखा होगा जनक की तरफ; क्योंकि गुरु के लिए वही पहला काम है कि जब कोई जिज्ञासा करे तो वह गौर से देखे. ‘जिज्ञासा किस स्रोत से आती है? पूछने वाले ने क्यों पूछा है?’ उत्तर तो तभी सार्थक हो सकता है जब प्रश्न क्यों किया गया है, वह समझ में आ जाये, वह साफ हो जाए।

ध्यान रखना, सदज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति, सदगुरु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं देता—तुम्हें उत्तर देता है! तुम क्या पूछते हो, इसकी फिक्र कम है; तुमने क्यों पूछा है, तुम्हारे पूछने के पीछे अंतरचेतन में छिपा हुआ जाल क्या है, तुम्हारे प्रश्नों की आड़ में वस्तुत: कौन—सी आकांक्षा छिपी है..!

दुनियां में चार तरह के लोग हैं—ज्ञानी, मुमुक्षु, अज्ञानी, मूढ़। और दुनियां में चार ही तरह की जिज्ञासाए होती हैं। ज्ञानी की जिज्ञासा तो नि:शब्द होती है। कहना चाहिए, ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा होती ही नहीं—जान लिया, जानने को कुछ बचा नहीं, पहुंच गये, चित्त निर्मल हुआ, शांत हुआ, घर लौट आये, विश्राम में आ गये! तो ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा जैसी होती ही नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि ज्ञानी सीखने को तैयार नहीं होता। ज्ञानी तो सरल, छोटे बच्चे की भांति हो जाता है—सदा तत्पर सीखने को।

ज्ञान—ज्ञान को संगृहीत नहीं करता; ज्ञानी सिर्फ ज्ञान की क्षमता को उपलब्ध होता है। इस बात को ठीक से समझ लेना, क्योंकि पीछे यह काम पड़ेगी। ज्ञानी का केवल इतना ही अर्थ है कि जो जानने के लिए बिलकुल खुला है; जिसका कोई पक्षपात नहीं, जानने के लिए जिसके पास कोई परदा नहीं; जिसके पास जानने के लिए कोई पूर्व—नियोजित योजना, ढांचा नहीं। ज्ञानी का अर्थ है ध्यानी जो ध्‍यान पूर्ण है।

तो देखा होगा अष्‍टावक्र ने गौर से, जनक में झांक कर : यह व्यक्ति ज्ञानी तो नहीं है। यह ध्यान को तो उपलब्ध नहीं हुआ है। अन्यथा इसकी जिज्ञासा मौन होती; उसमें शब्द न होते।

ओशो: अष्‍टावक्र महागीता–(भाग1) प्रवचन1

दो मार्ग: साकार और निराकार

एक उदाहरण के लिए छोटा—सा प्रयोग आप करके देखें
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 तो आपको पता चलेगा। एक दीए को रख लें रात अंधेरे में अपने कमरे में। और अपनी आंखों को दीए पर एकटक लगा दें। दो—तीन मिनट ही अपलक देखने पर आपको बीच—बीच में शक पैदा होगा कि दीया नदारद हो जाता है। दीए की ज्योति बीच—बीच में खो जाएगी। अगर आपकी आख एकटक लगी रही, तो कई बार आप घबड़ा जाएंगे कि ज्योति कहं। गई! जब आप घबड़ाके, तब फिर ज्योति आ जाएगी। ज्योति कहीं जाती नहीं। लेकिन अगर आंखों की देखने की क्षमता बचानी हो, तो बहुत—सी चीजें देखना जरूरी है। अगर आप एक ही चीज पर लगा दें, तो थोड़ी ही देर में आंखें देखना बंद कर देती हैं। इसलिए ज्योति खो जाती है।

जिस चीज पर आप अपने को एकाग्र कर लेंगे, और सब चीजें तो खो जाएंगी पहले, एक चीज रह जाएगी। थोड़ी देर में वह एक भी खो जाएगी। एकाग्रता पहले और चीजों का विसर्जन बन जाती है, और फिर उसका भी, जिस पर आपने एकाग्रता की।

अगर सारी वासना को संसार से खींचकर परमात्मा पर लगा दिया, तो पहले संसार खो जाएगा। और एक दिन आप अचानक पाएंगे कि परमात्मा बाहर से खो गया। और जिस दिन परमात्मा भी बाहर से खो जाता है, आप अचानक भीतर पहुंच जाते हैं। क्योंकि अब बाहर होने का कोई उपाय न रहा। संसार पकड़ता था, उसे छोड़ दिया परमात्मा के लिए। और जब एक बचता है, तो वह अचानक खो जाता है। आप अचानक भीतर आ जाते हैं।

फिर यह जो परमात्मा की धारणा हमने बाहर की है, यह हमारे भीतर जो छिपा है, उसकी ही श्रेष्ठतम धारणा है। वह जो आपका भविष्य है, वह जो आपकी संभावना है, उसकी ही हमने बाहर धारणा की है। वह बाहर है नहीं, वह हमारे भीतर है, लेकिन हम बाहर की ही भाषा समझते हैं। और बाहर की भाषा से ही भीतर की भाषा सीखनी पड़ेगी।

अभी मनोवैज्ञानिक इस पर बहुत प्रयोग करते हैं कि एकाग्रता में आब्जेक्ट क्यों खो जाता है। जहां भी एकाग्रता होती है, अंत में जिस पर आप एकाग्रता करते हैं, वह विषय भी तिरोहित हो जाता है; वह भी बचता नहीं। उसके खो जाने का कारण यह है कि हमारे मन का अस्तित्व ही चंचलता है। मन को बहने के लिए जगह चाहिए, तो ही मन हो सकता है। मन एक बहाव है। एक नदी की धार है। अगर मन को बहाव न मिले, तो वह समाप्त हो जाता है। वह उसका स्वभाव है।

स्थिर मन जैसी कोई चीज नहीं होती। और जब हम कहते हैं, चंचल मन, तो हम पुनरुक्ति करते हैं। चंचल मन नहीं कहना चाहिए, क्योंकि चंचलता ही मन है। जब हम चंचल मन कहते हैं, तो हम दो शब्दों का उपयोग कर रहे हैं व्यर्थ ही, क्योंकि मन का अर्थ ही चंचलता है। और घिर मन जैसी कोई चीज नहीं होती। जहां थिरता आती है, मन तिरोहित हो जाता है। जैसे स्वस्थ बीमारी जैसी कोई बीमारी नहीं होती। जैसे ही स्वास्थ्य आता है, बीमारी खो जाती है; वैसे ही थिरता आती है, मन खो जाता है। मन के होने के लिए अथिरता जरूरी है।

ऐसा समझें कि सागर में लहरें हैं, या झील पर बहुत लहरें हैं। झील अशात है। तो हम कहते हैं, लहरें बड़ी अशांत हैं। कहना नहीं चाहिए, क्योंकि अशांति ही लहरें हैं। फिर जब शात हो जाती है झील, तब क्या आप ऐसा कहेंगे कि अब शांत लहरें हैं! लहरें होतीं ही नहीं। जब लहरें नहीं होतीं, तभी शांति होती है। जब झील शांत होती है, तो लहरें नहीं होतीं। लहरें तभी होती हैं, जब झील अशात होती है। तो अशांति ही लहर है।

आपकी आत्मा झील है, आपका मन लहरें है। शांत मन जैसी कोई चीज नहीं होती। अशांति ही मन है।

तो अगर हम किसी भी तरह से किसी एक चीज पर टिका लें अपने को, तो थोड़ी ही देर में मन खो जाएगा, क्योंकि मन एकाग्र हो ही नहीं सकता। जो एकाग्र होता है, वह मन नहीं है; वह भीतर का सागर है। वह भीतर की झील है। वही एकाग्र हो सकती है।

तो कोई भी आब्जेक्ट, चाहे परमात्मा की प्रतिमा हो, चाहे कोई यंत्र हो, चाहे कोई मंत्र हो, चाहे कोई शब्द हो, चाहे कोई आकार—रूप हो, कोई भी हो, इतना ही उसका उपयोग है बाहर रखने में कि आप पूरे संसार को भूल जाएंगे और एक रह जाएगा। जिस क्षण एक रहेगा—युगपत—उसी क्षण एक भी खो जाएगा और आप अपने भीतर फेंक दिए जाएंगे।

यह बाहर का जो विषय है, एक जंपिंग बोर्ड है, जहां से भीतर छलांग लग जाती है।

तो किसी भी चीज पर एकाग्र हो जाएं। इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उस एकाग्रता के बिंदु को अल्लाह कहते हैं; कोई फर्क नहीं पड़ता कि ईश्वर कहते हैं, कि राम कहते हैं, कि कृष्ण कहते हैं, कि बुद्ध कहते हैं। आप क्या कहते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप क्या करते हैं, इससे फर्क पड़ता है। राम, बुद्ध, कृष्ण, क्राइस्ट का आप क्या करते हैं, इससे फर्क पड़ता है। क्या कहते हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता।

करने का मतलब यह है कि क्या आप उनका उपयोग अपने को एकाग्र करने में करते हैं? क्या आपने उनको बाहर का बिंदु बनाया है, जिससे आप भीतर छलांग लगाएंगे? तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि आपने क्राइस्ट से छलांग लगाई, कि कृष्ण से, कि राम से! जिस दिन भीतर पहुंचेंगे, उस दिन उसका मिलना हो जाएगा, जो न क्राइस्ट है, न राम है, न बुद्ध है, न कृष्ण है—या फिर सभी है। कहां से छलांग लगाई, वह तो भूल जाएगा।

कौन याद रखता है जंपिंग बोर्ड को, जब सागर मिल जाए! सीढ़ियों को कौन याद रखता है, जब शिखर मिल जाए! रास्ते को कौन याद रखता है, जब मंजिल आ जाए! कौन—सा रास्ता था, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सभी रास्ते काम में लाए जा सकते हैं। काम में लाने वाले पर निर्भर करता है।

अभी आप बाहर हैं, इसलिए बाहर परमात्मा की धारणा करनी पड़ती है आपकी वजह से। परमात्मा की वजह से नहीं, आपकी वजह से। भीतर की भाषा आपकी समझ में ही न आएगी।

ओशो - गीता दर्शन – भाग - 6, - अध्‍याय — 12
(प्रवचन—दूसरा) — दो मार्ग: साकार और निराकार

Rajesh Saini

सांस, मानव मुक्ति का मार्ग



यहाँ सद्‌गुरु सांस की प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए बता रहे हैं कि कैसे सांस को बड़ी सम्भावनाओं की ओर जाने के लिये एक द्वार की तरह प्रयोग किया जा सकता है?

सद्‌गुरु: जैसे-जैसे हमारी जागरूकता में तीव्रता और पैनापन आने लगता है, एक बात जिसके बारे में हम स्वभाविक रूप से सबसे पहले जागरूक होते हैं, वह है सांस। हमारे शरीर में चलने वाली सांस, एक यांत्रिक प्रक्रिया है, जो लगातार बिना रुके चलती है। यह बहुत आश्चर्यजनक है कि कैसे अधिकतर लोग इसके बारे में जागरूक हुए बिना ही जीते रहते हैं। लेकिन, एक बार जब आप सांस के बारे में जागरूक हो जाते हैं, तो ये एक अदभुत प्रक्रिया बन जाती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि आज 'सांस को देखना' संभवतः ध्यान की सबसे अधिक लोकप्रिय विधियों में से है। यह मूलभूत और सरल है, तथा इतनी आसानी से और स्वाभाविक रूप से होती है कि इसके लिये कोई तैयारी नहीं करनी पड़ती।
अगर आप थोड़े से ज्यादा सचेत हो जाते हैं, तो आप की सांस स्वाभाविक रूप से आप की जागरूकता में आ जायेगी। मैं छः - सात वर्ष का था, जब मैंने अपनी सांस का आनंद लेना शुरू किया। अपनी छोटी सी छाती और पेट को लयबद्ध ढंग से ऊपर-नीचे होते देखने में मुझे बहुत रूचि थी और मैं घंटों तक बस यही करता रहता था। ध्यान का विचार तो काफी बाद में मेरे जीवन में आया। तो अगर आप थोड़े से भी सचेत हैं तो आप सांस की सरल लय को अनदेखा नहीं कर सकते, जो बिना रुके चलती रहती है।
अधिकतर लोगों का ध्यान अपनी सांस की ओर तभी जाता है जब उनकी श्वास – नलियों में ऐंठन आ जाती है, या सांस ज्यादा तेजी से चलती है। वे अपनी सामान्य सांस को अनदेखा कर रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनमें ध्यान देने की कमी एक गंभीर समस्या है। और आजकल तो लोग ध्यान की कमी को एक योग्यता की तरह देख रहे हैं।

ध्यान को अपने जीवन में उतारना

अपने जीवन में, और ख़ास तौर पर अपने बच्चों के जीवन में, ध्यान देने की प्रवृत्ति लाना बहुत महत्वपूर्ण है। आखिर में, बात चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक, दुनिया से आप को उतना ही मिलता है जितना आप ध्यान देने को तैयार हैं।
सांस पर ध्यान देना वैसे तो एक जबरन प्रयास है। लेकिन यह आपको सचेत करने का एक तरीका भी है। महत्वपूर्ण चीज़ अपनी सांस पर ध्यान केन्द्रित करना नहीं है, बल्कि अपनी जागरूकता के स्तर को इतना ऊँचा उठाना है कि आप स्वाभाविक रूप से अपनी सांस के प्रति सचेत हो जायें। सांस लेना एक यांत्रिक प्रक्रिया है। मूल रूप से देखें तो जब भी आप सांस लेते या छोड़ते हैं, तो आप के शरीर में स्पंदन होता है। जब तक आप अपने मनोवैज्ञानिक ढाँचे में पूरी तरह मग्न हैं, तभी तक आप का ध्यान सांस पर नहीं होता। यदि आप अपनी भावनाओं या विचारों में पूरी तरह नहीं खोये हैं, और आप बस शांति से बैठते हैं तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि आप का ध्यान अपनी सांस की प्रक्रिया पर न जाये। किसी चीज़ को अपनी जागरूकता में लाना कोई काम नहीं है। इसके लिये कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
आप में से जिन लोगों ने 'शून्य' की दीक्षा ली है, वे देख सकते हैं कि जैसे ही आप बिना कुछ किये, शांत हो कर बैठते हैं, आप की सांस अचानक ही बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। वास्तव में, सांस एक बहुत बड़ी चीज़ है, बस आप को तब तक यह बात पता नहीं चलती जब तक आप इसे खो नहीं देते। हम जब कोई ख़ास प्रक्रिया सिखाते हैं तो लोगों को सांस पर ध्यान देने के लिये कहते हैं, क्योंकि उनमें जागरूकता का आवश्यक स्तर नहीं होता। लेकिन अगर आप बस आराम से बैठें, तो ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपनी सांस के प्रति सचेत न हों, जब तक कि आप अपने विचारों में खोये हुए न हों। तो अपने विचारों में खोये मत रहिये, इनका कोई ख़ास महत्व नहीं है, क्योंकि यह बहुत सीमित जानकारी से आते हैं। आप अगर अपनी सांस के साथ रहें, तो यह आप को एक बड़ी सम्भावना की ओर ले जा सकता है। अभी तो सांस की प्रक्रिया ही ज्यादातर लोगों की जागरूकता में नहीं होती। वे सिर्फ अपने नथुनों या फेफड़ों में हवा के आवागमन के कारण हो रही हलचल को ही जान पाते हैं।

आप अगर बस बैठते हैं या लेटते हैं, एकदम स्थिर हो कर, तो आप की सांस एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया बन जायेगी। और यह हर समय चलती ही रहती है। यह बहुत आश्चर्यजनक है कि कैसे इतने सारे लोग इस पर ध्यान दिये बिना जीते हैं, अपने जीवन के हर पल में बिना इसकी जागरूकता के। अपनी सांस पर ध्यान देना वहां पहुँचने का एक तरीका है। आप में से जिन लोगों ने 'शून्य' की दीक्षा ली है, वे देख सकते हैं कि जैसे ही आप बिना कुछ किये, शांत हो कर बैठते हैं, आप की सांस अचानक ही बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। वास्तव में, सांस एक बहुत बड़ी चीज़ है, बस आप को तब तक यह बात पता नहीं चलती जब तक आप इसे खो नहीं देते।
आप ने 'भज गोविन्दम' मन्त्र सुना होगा जिसमें यह भी आता है, ' निश्चल तत्वं, जीवन मुक्ति'। इसका अर्थ यह है कि अगर आप बिना विचलित हुए, किसी एक ही वस्तु पर लगातार ध्यान देते हैं, चाहे वह कुछ भी हो, तो मुक्ति को, मुक्ति की सम्भावना को आप के लिये नकारा नहीं जा सकता। दूसरे शब्दों में मनुष्य की मूल समस्या ध्यान की कमी ही है। ध्यान देने के पैनेपन और तीव्रता से आप ब्रह्माण्ड का कोई भी दरवाजा अपने लिये खोल सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप का ध्यान कितना पैना और तीव्र है, और इस ध्यान के पीछे कितनी उर्जा है? इस संदर्भ में सांस एक सुन्दर साधन है क्योंकि यह हमेशा ही चलती रहती है। जब तक हम जीवित हैं, सांस हर समय उपस्थित ही है। बस आप को उसके प्रति सचेत होना है।

Isha Foundation

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

शिव भगवान का काम विजय


एक बार नारद जी तप करने के लिए हिमालय पर्वत की एक सुन्दर गुफा में चले गये । और वहाँ बहुत वर्षो तक समाधिस्थ होकर ब्रम्हा साक्षत्कार का विधान प्राप्त किया । देवेन्द्र ने उनके तप को विघ्न पहुँचाने के लिए काम को भेजा । काम (काम देव) अर्थात (मोह , राग , आदि का देव माना जाने वाला काम) ने नारद जी का तप भंग करने के लिए वहाँ पहुँच कर उनसे अपनी सम्पूर्ण कलाओं की रचना की । वसंत ऋतु ने मदोन्मत्त हो कर अपनी सुंदरता से नारद मुनि के चित्त मे विकार उत्पन्न करने का प्रयास किया । परन्तु शिव की कृपा से इंद्र का गर्व (अभिमान) नष्ट हो गया । क्योंकि हिमालय के इसी स्थान पर पूर्व काल में शिवजी ने तप कर काम को जला कर राख कर दिया था और काम की पत्नी रति को वरदान था की यहाँ पर काम का कोई स्थान नहीं है । इसीलिए जिस स्थान पर योगियो ,तपस्वियों , पुण्य आत्माओं का तप प्रभाव संचित होता है । उस स्थान पर किसी भी बाहरी मोह , माया का प्रभाव निस्किर्य हो जाता है । काम देव ने अपने  बाहरीकर्षण बाहरी स्वरुप को गति हीन जानकर हिमालय काम पर विजयप्राप्त कर दी । मनुष्य का बाहरी आकर्षण व्यर्थ है । बाह्य सौंदर्य केवल भ्र्म पैदा करता है किन्तु यदि मनुष्य अपने तप , ज्ञान और विवेक के द्वारा अपने आंतरिक सौंदर्य को सजाता है तो वास्तविक सौंदर्य वही है । जिससे भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है । इसी तप , साधना से प्रभावित हो कर उन्होंने माता पार्वती को स्वीकार किया था । 

{{डॉ लक्ष्मी भट्ट - 9013219622}} [[ महामृत्युंजय धाम ]]

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