वर्जिनिया विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि मक्खी के लार्वा की महज 24 फोटोरिसेप्टर वाली आंखें पर्याप्त मात्रा में प्रकाश या फिर तस्वीरों का इनपुट भेजती हैं जिन्हें मस्तिष्क विश्लेषित कर तस्वीरों में बदल देता है।
अनुसंधानकर्ता बेरी कोड्रोन ने कहा, ‘यह दृष्टि के प्रति हमारी समझ को बढ़ाता है। यह बताता है कि देखने के लिए विजुअल इनपुट इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है जितना कि उसके पीछे काम करने वाला मस्तिष्क। इस मामले में तो मस्तिष्क बहुत कम मात्रा में मिले विजुअल इनपुट से भी काम चला सकता है।’ इन अनुसंधान के परिणाम ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। (भाषा)
इटली के उदीन विश्वविद्यालय के संवेदी तंत्रिका विज्ञानी कोसिमो उरगेसी, रोम के सैपिएंजा विश्वविद्यालय के संवेदी तंत्रिका विज्ञानी साल्वातोर एग्लिओती ने मस्तिष्क ट्यूमर के 88 मरीजों के साथ साक्षात्कार के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। इन मरीजों से ऑपरेशन से पहले और उसके बाद कुछ सच्चे या झूठे सवाल पूछकर उनके आध्यात्मिक स्तर का आकलन किया गया। उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने खुद को कालातीत अनुभव किया। किसी अन्य व्यक्ति और प्रकृति के साथ उन्हें तादात्म्य की अनुभूति हुई और क्या वह किसी उच्च सत्ता में विश्वास रखते हैं।
अध्ययन से पता चला कि मस्तिष्क ट्यूमर के जिन मरीजों के पैरिएटल कोर्टेक्स (पार्श्विक प्रांतस्था) में मस्तिष्क के पिछले हिस्से से ट्यूमर हटा दिया गया। उन्होंने ऑपरेशन के तीन से सात दिन के बाद दिव्य ज्ञान की गहरी अनुभूति होने की बात कही, लेकिन जिन मरीजों के मस्तिष्क के आगे के हिस्से से ट्यूमर निकाला गया था। उनके साथ यह घटना नहीं हुई।
एग्लिओती ने कहा कि यह माना जाता था कि पारलौकिक ज्ञान का चिंतन दार्शनिकों और नए जमाने के झक्की लोगों का विषय है, लेकिन यह वास्तव में आध्यात्मिकता पर पहला गहन अध्ययन है। हम एक जटिल तथ्य का अध्ययन कर रहे हैं, जो मनुष्य होने का सारतत्व समझने के करीब की बात है।
पहले के अध्ययनों में बताया गया था कि मस्तिष्क के आगे और पीछे का एक व्यापक संजाल धार्मिक विश्वासों को रेखांकित करता है, लेकिन ऐसा लगता है कि पारलौकिक ज्ञान में मस्तिष्क के वही हिस्से शामिल नहीं है जिनसे धार्मिक ज्ञान का पता लगता है। तंत्रिका विज्ञानियों ने पहले भी क्षतिग्रस्त मस्तिष्क वाले मरीजों में आध्यात्मिक बदलावों का निरीक्षण किया है, लेकिन इसका वह व्यवस्थित ढंग से मूल्यांकन नहीं कर पाए थे।
बेल्जियम के ल्यूवेन में गैस्थुइसबर्ग मेडिकल विश्वविद्यालय के तंत्रिका विज्ञानी रिक वंडेनबर्ग का कहना है। हम सामान्यतः इससे दूर ही रहे। इसलिए नहीं कि यह महत्वपूर्ण विषय नहीं है बल्कि इसकी वजह यह थी कि यह नितांत व्यक्तिगत मामला है। हालाँकि यह शोध काफी दिलचस्प है, लेकिन कई पुरोगामी अध्ययनों की तरह इससे भी कई सवाल उठते हैं। आँकडों का सावधानी के साथ विश्लेषण कि या जाना चाहिए। यह बड़ी असंभावित बात है कि इंद्रियातीत ज्ञान का मस्तिष्क के केवल दो हिस्सों में स्थान निर्धारित किया जाए।
वह कहते हैं कि पारलौकिक ज्ञान एक अमूर्त धारणा है और विभिन्न लोग अलग-अलग तरीके से इसका मतलब लगाते हैं। परानुभूति की बात कहने वाला मरीज हमेशा सही नहीं हो सकता। अधिक कड़े व्यावहारिक उपायों से आध्यात्मिकता और उन विशेष विचारों और भावनाओं का ठीक-ठीक पता लगाना, जो इसे बनाते हैं। निश्चित रूप से अगला कदम होगा।
विस्कांसिन मैडिसन विश्वविद्यालय के संवेदी तंत्रिका विज्ञानी रिचर्ड डेविडसन का भी कुछ यही मत है। उनका कहना है कि शोधकर्ताओं ने जिस तरीके से इंद्रियातीत अनुभव को मापा है, वह संभवतः इस अध्ययन का सबसे चिन्ताजनक पहलू है। सबसे महत्वपूर्ण यह मानना है कि पूरा अध्ययन आत्मानुभूति के एक मापदंड में आए बदलावों पर आधारित है। जो एक अपरिष्कृत मापदंड है और जिसमें कुछ अजीबोगरीब बातें हैं। डेविडसन कहते हैं कि भविष्य में यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि क्यों पैरिएटल कोर्टेक्स में क्षति से इस पैमाने पर बदलाव हो जाता है। (वार्ता) sabhar :webdunia.com