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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

राजा भरथरी का इतिहास: उज्जैन के सम्राट से वैरागी योगी बनने तक की कथा

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राजा भरथरी का इतिहास: उज्जैन के सम्राट से वैरागी योगी बनने तक की कथा



प्रस्तावना


भारतीय इतिहास, लोकसाहित्य और नाथपंथ की परंपरा में राजा भरथरी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें कहीं उज्जैन का प्रतापी राजा बताया गया है, तो कहीं संसार की नश्वरता को समझकर राजपाट त्यागने वाले महान योगी के रूप में याद किया जाता है। उनकी कथा में राजसी वैभव, प्रेम, मोहभंग, वैराग्य और आध्यात्मिक साधना का अनूठा संगम दिखाई देता है।


राजा भरथरी की लोकप्रिय कथा आज भी उत्तर भारत, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल के अनेक क्षेत्रों में लोकगीतों, कथाओं तथा धार्मिक परंपराओं के माध्यम से जीवित है। हालांकि, उनके जीवन से जुड़ी सभी घटनाओं की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती। इसलिए उनके इतिहास को समझने के लिए साहित्यिक प्रमाणों, नाथपंथ की मान्यताओं और लोककथाओं को अलग-अलग देखना आवश्यक है।


1. राजा भरथरी कौन थे?


लोकपरंपरा में राजा भरथरी को उज्जैन का राजा माना जाता है। उनका नाम भर्तृहरि, भरथरी और राजा भरथरी जैसे विभिन्न रूपों में प्रचलित है।


उनके जीवन के संबंध में एक प्रसिद्ध कथा प्रचलित है कि वे महाराजा गंधर्वसेन के पुत्र और महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। इस कथा के अनुसार, गंधर्वसेन की मृत्यु के बाद भरथरी ने उज्जैन का राजपाट संभाला और विक्रमादित्य उनके छोटे भाई थे।


हालांकि, गंधर्वसेन, भरथरी और विक्रमादित्य के पारिवारिक संबंधों तथा उत्तराधिकार की इस पूरी कथा की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हुई है। विक्रमादित्य नाम भी भारतीय साहित्य और लोकपरंपरा में अनेक कथाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए इन पात्रों को एक ही ऐतिहासिक काल का मान लेना उचित नहीं होगा।


2. रानी पिंगला और अमरफल की प्रसिद्ध कथा


राजा भरथरी के जीवन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में रानी पिंगला और अमरफल का प्रसंग आता है।


कथा के अनुसार, राजा भरथरी अपनी रानी से अत्यंत प्रेम करते थे। एक दिन एक योगी अथवा तपस्वी राजा को एक विशेष फल देता है। कहा जाता है कि उस फल को खाने वाला व्यक्ति दीर्घायु या अमर हो सकता था।


राजा अपनी प्रिय रानी को अमर रखने की इच्छा से वह फल उसे दे देते हैं। लेकिन लोककथा में रानी उस फल को अपने प्रिय व्यक्ति को दे देती है। वह व्यक्ति आगे किसी अन्य स्त्री को और अंततः वह फल वापस राजा तक पहुँच जाता है।


जब राजा को पता चलता है कि जिस प्रेम को वे जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानते थे, उसमें भी छल और मोह छिपा हो सकता है, तो उनका मन संसार से विरक्त होने लगता है।


इस प्रसंग के अलग-अलग रूप प्रचलित हैं। पात्रों के नाम, उनके आपसी संबंध और घटनाओं का क्रम भी विभिन्न कथाओं में बदल जाता है।


इस कथा का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य अक्सर प्रेम, धन, सत्ता और प्रतिष्ठा को स्थायी मान लेता है, लेकिन जीवन के अनुभव उसे इन सबकी सीमाओं का बोध करा सकते हैं।


यह ध्यान रखना चाहिए कि अमरफल और रानी पिंगला का यह प्रसंग मुख्यतः लोककथा के रूप में प्रसिद्ध है। इसे राजा भरथरी के जीवन की प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं माना जा सकता।


3. क्या राजा भरथरी ने सचमुच राजपाट त्याग दिया था?


लोकमान्यता के अनुसार, रानी से संबंधित घटनाओं के बाद राजा भरथरी का सांसारिक जीवन से मोहभंग हो गया। उन्होंने राजपाट छोड़ने और योग-साधना अपनाने का निर्णय लिया।


कथाओं में बताया जाता है कि उन्होंने राजसी वस्त्र त्याग दिए, साधु का वेश धारण किया और सांसारिक इच्छाओं से मुक्ति पाने के लिए निकल पड़े।


कुछ परंपराओं में उनके छोटे भाई विक्रमादित्य को उज्जैन का शासन सौंपे जाने की बात भी आती है। लेकिन इस उत्तराधिकार की कहानी की भी ऐतिहासिक पुष्टि सीमित है।


भरथरी के जीवन का यह पक्ष भारतीय वैराग्य परंपरा के एक महत्त्वपूर्ण आदर्श को प्रस्तुत करता है—मनुष्य के पास कितना भी धन, वैभव और अधिकार क्यों न हो, आंतरिक शांति केवल बाहरी उपलब्धियों से सुनिश्चित नहीं होती।


4. गुरु गोरखनाथ और राजा भरथरी का संबंध


राजा भरथरी को नाथपंथ की परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण वैरागी के रूप में याद किया जाता है। कई लोककथाओं में गुरु गोरखनाथ को उनके आध्यात्मिक परिवर्तन का मार्गदर्शक बताया गया है।


प्रचलित कथा के अनुसार, गुरु गोरखनाथ ने भरथरी को संसार की नश्वरता का बोध कराया और उन्हें योग-साधना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।


नाथपंथ की परंपरा में राजा भरथरी का संबंध कभी-कभी जालंधरनाथ जैसे अन्य सिद्धों से भी जोड़ा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी दीक्षा और गुरु के विषय में भिन्न मान्यताएँ मिलती हैं।


ऐतिहासिक दृष्टि से यह निश्चित करना कठिन है कि भरथरी नाम से प्रसिद्ध राजा और नाथपंथ के वैरागी एक ही व्यक्ति थे या नहीं। फिर भी, धार्मिक और लोकपरंपराओं में उनका संबंध गहरा है।


5. भर्तृहरि और संस्कृत साहित्य


राजा भरथरी की चर्चा करते समय एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। संस्कृत साहित्य में भर्तृहरि नाम के एक प्रसिद्ध कवि और विचारक का उल्लेख मिलता है।


उनके नाम से तीन प्रसिद्ध काव्यशतकों का संबंध जोड़ा जाता है:


- नीतिशतक: नीति, व्यवहार, सदाचार और मानवीय स्वभाव पर विचार।

- शृंगारशतक: प्रेम, सौंदर्य और मानवीय भावनाओं का वर्णन।

- वैराग्यशतक: संसार की नश्वरता, इच्छाओं की सीमाओं और वैराग्य का विवेचन।


इन रचनाओं में जीवन, प्रेम, धन, प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक शांति से संबंधित गहरे विचार मिलते हैं।


हालांकि, इन ग्रंथों के रचनाकार की पहचान और उनके जीवनकाल को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। यह निश्चित रूप से सिद्ध नहीं है कि संस्कृत के प्रसिद्ध कवि भर्तृहरि, उज्जैन के राजा भरथरी और नाथपंथ के वैरागी भरथरी एक ही व्यक्ति थे।


इसलिए इन तीनों पहचानों को बिना अतिरिक्त प्रमाण के एक मान लेना उचित नहीं है।


6. राजा भरथरी की कथा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व


राजा भरथरी की कथा केवल एक राजा के जीवन की कहानी नहीं है। यह भारतीय समाज में वैराग्य, त्याग और आध्यात्मिक खोज की व्यापक परंपरा का भी प्रतिनिधित्व करती है।


उनकी कथा में तीन प्रमुख विचार दिखाई देते हैं।


पहला—सत्ता की सीमाएँ: राजपाट और धन मनुष्य को सुख-सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान नहीं कर सकते।


दूसरा—मोह और विवेक: मनुष्य अपने संबंधों और इच्छाओं में इतना उलझ सकता है कि जीवन के दूसरे पक्षों को भूल जाता है। अनुभव उसे अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।


तीसरा—आत्मज्ञान की खोज: भारतीय साधना परंपराओं में वैराग्य का अर्थ केवल संसार से दूर जाना नहीं, बल्कि मोह, अहंकार और अनियंत्रित इच्छाओं पर विजय प्राप्त करना भी है।


राजा भरथरी की लोकप्रिय कथा इन्हीं विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाती है।


7. राजा भरथरी की समाधि और उनसे जुड़े धार्मिक स्थल


भारत के विभिन्न क्षेत्रों में राजा भरथरी अथवा भर्तृहरि से संबंधित गुफाएँ, मंदिर और साधना-स्थल प्रसिद्ध हैं। मध्य प्रदेश के उज्जैन में भी भर्तृहरि की गुफाएँ धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।


इन स्थलों से जुड़ी स्थानीय मान्यताएँ बताती हैं कि भरथरी ने यहाँ तपस्या की थी। हालांकि, किसी स्थान की धार्मिक परंपरा और उससे संबंधित ऐतिहासिक घटना की पुष्टि दो अलग-अलग विषय हैं। किसी स्थल को उनके जीवन से जोड़ने के लिए पुरातात्त्विक साक्ष्यों, अभिलेखों और प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन आवश्यक है।


8. इतिहास और लोककथा में क्या अंतर है?


राजा भरथरी के जीवन को समझने के लिए उपलब्ध जानकारी को तीन श्रेणियों में देखना उपयोगी है।


साहित्यिक तथ्य: भर्तृहरि के नाम से प्रसिद्ध संस्कृत नीतिपरक, शृंगारपरक और वैराग्यपरक काव्यपरंपरा मौजूद है। इन ग्रंथों के रचनाकार और काल को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं।


धार्मिक परंपरा: नाथपंथ में भरथरी को वैरागी और योग-साधना से जुड़ा व्यक्तित्व माना जाता है। उनके गुरु और जीवन की घटनाओं के विवरण विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग हैं।


लोककथा: गंधर्वसेन, विक्रमादित्य, रानी पिंगला, अमरफल और राजपाट त्यागने की लोकप्रिय कहानी कई रूपों में प्रचलित है। इसकी प्रत्येक घटना को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता।


इतिहास लेखन में इन तीनों का महत्त्व है, लेकिन इनके प्रमाणों की प्रकृति अलग-अलग होती है।


निष्कर्ष


राजा भरथरी की कथा भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में राजसी वैभव से वैराग्य की ओर यात्रा का एक लोकप्रिय उदाहरण है। उनके जीवन से जुड़ी लोककथाएँ मनुष्य को प्रेम, सत्ता, धन और सांसारिक आकर्षण की सीमाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।


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मंगलवार, 25 अगस्त 2026

इंसानी चेतना के विस्तार

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 “इंसानी चेतना के विस्तार



के लिए दो लोगों का रिश्ते में होना बहुत कम देखने को मिलता है, लेकिन जब ऐसा होता है, तो उनसे निकलने वाली चुंबकीय ऊर्जा किसी पवित्र चीज़ से कम नहीं होती।

ज़्यादातर लोग रिश्तों का इस्तेमाल मुश्किलों से निपटने के ज़रिया के तौर पर करते हैं। वे अपने अतीत के किसी दुख से उबर नहीं पाते, और अपनी अंदर की दुनिया का सामना करने के बजाय, वे बाहर की चीज़ों को पकड़ने की कोशिश करते हैं, कभी-कभी तो उन्हें जो भी चीज़ मिल जाती है, उसी से चिपक जाते हैं।


जब भी किसी रिश्ते (या दोस्ती) का इस्तेमाल भागने के ज़रिया के तौर पर किया जाता है, तो यह आपके रास्ते को धीमा कर देता है और आखिरकार आपकी ज़िंदगी में उथल-पुथल मचा देता है।


पवित्र रिश्ते या दोस्ती, पूरी तरह से खुद के प्रति ईमानदार होने से बनते हैं। जब दो लोग न सिर्फ़ एक-दूसरे के लिए, बल्कि 'स्रोत' (परमात्मा) के लिए भी अपना दिल खोलने को तैयार होते हैं, तो यह जुड़ाव ऊँची चेतना के आने का ज़रिया बन जाता है। इससे एक 'प्रिज़्म' जैसा असर पैदा होता है, जहाँ उनके ऊर्जा-क्षेत्र से निकलने वाली रोशनी सामूहिक चेतना में और दूर तक फैलती है। इस जुड़ाव में इंसानी चेतना को चेतना के मध्ययुगीन/अंधकारमय दौर से निकालकर दिव्यता के दौर के करीब लाने की क्षमता होती है।


अक्सर, लोग खुद को छिपाकर या जो वे नहीं हैं, वैसा दिखावा करके रिश्तों में आते हैं। इससे रिश्ते में एक हल्का तनाव पैदा होता है जो आरोप लगाने या शर्मिंदा करने जैसे तरीकों में बदल जाता है, जिससे कभी रोमांटिक रहा रिश्ता 'दुश्मन' के साथ लड़ाई में बदल जाता है।


अहंकार (ego) अनजाने में ही एक दुश्मन चाहता है जिस पर वह अपनी परछाई डाल सके। इस तरह, अहंकार को अपने रास्ते की ज़िम्मेदारी नहीं लेनी पड़ती। अपने रास्ते की ज़िम्मेदारी न ले पाना असल में सच्चाई से मुँह मोड़ने जैसा है।


एक पवित्र जुड़ाव में, दोनों पक्ष अपनी कमियों की पूरी ज़िम्मेदारी लेते हैं और शांति से चेतना की बेहतर अवस्थाओं की ओर बढ़ते हैं। रिश्ते और दोस्ती आध्यात्मिक विकास के लिए सबसे शक्तिशाली ज़रिया बन सकते हैं, बशर्ते दोनों लोग खुद को देखने के लिए तैयार हों।


जब मैं दो ऐसे लोगों को देखता हूँ जो एक-दूसरे के सामने पूरी तरह खुले और संवेदनशील होते हैं, जो इस नाज़ुक लेकिन शक्तिशाली प्रक्रिया के दौरान एक-दूसरे पर आरोप लगाए या शर्मिंदा किए बिना अपनी कमियों (shadows) को समझने से नहीं डरते, तो मुझे मानवता के लिए अद्भुत संभावनाएँ दिखाई देती हैं।”


जुड़ाव की शक्ति को सलाम।


हिम्मत सिंह

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सोमवार, 22 जून 2026

अखिलेश बहादुर पाल: अपनी जड़ों की खोज और कत्यूरी-पाल विरासत के संवाहक

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अखिलेश बहादुर पाल: अपनी जड़ों की खोज और कत्यूरी-पाल विरासत के संवाहक


लेखक: विशेष लेख


उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक संबंधों में अखिलेश बहादुर पाल का नाम उन लोगों में लिया जाता है जिन्होंने अपने पूर्वजों के इतिहास और वंश परंपरा को समझने तथा संरक्षित करने का प्रयास किया। वे विशेष रूप से कत्यूरी-पाल वंश, अस्कोट, महुली-हरिहरपुर तथा अयोध्या से जुड़े ऐतिहासिक संबंधों पर अध्ययन और जनजागरूकता के लिए जाने जाते हैं।


ऐतिहासिक विरासत से जुड़ाव

अखिलेश बहादुर पाल का मानना है कि इतिहास केवल पुस्तकों का विषय नहीं, बल्कि समाज की पहचान और सांस्कृतिक धरोहर का आधार है। इसी उद्देश्य से उन्होंने कत्यूरी राजवंश की विभिन्न शाखाओं और उनके इतिहास के अध्ययन में रुचि दिखाई तथा अनेक ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया।


अस्कोट यात्रा

उनकी अस्कोट यात्रा विशेष रूप से चर्चा में रही, जहाँ उन्होंने स्थानीय राजपरिवार, इतिहासकारों और समाज के लोगों से मुलाकात कर अपने पूर्वजों से जुड़े तथ्यों की जानकारी प्राप्त की। इस यात्रा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत वंशावली जानना नहीं था, बल्कि कत्यूरी-पाल परंपरा के ऐतिहासिक सूत्रों को समझना भी था।


अस्कोट में उन्होंने स्थानीय परंपराओं, मंदिरों और ऐतिहासिक अभिलेखों का अध्ययन किया तथा यह जानने का प्रयास किया कि कत्यूरी वंश की विभिन्न शाखाओं का विस्तार किस प्रकार हुआ।


सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण

अखिलेश बहादुर पाल का विश्वास है कि इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है। वे चाहते हैं कि युवा वर्ग अपने क्षेत्र, वंश और संस्कृति के बारे में प्रमाणिक स्रोतों से जानकारी प्राप्त करे और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में योगदान दे।


शोध और जनजागरूकता

उन्होंने कत्यूरी-पाल वंश, अस्कोट तथा महुली-हरिहरपुर से संबंधित विषयों पर जानकारी एकत्र करने, चर्चाओं में भाग लेने और लोगों को ऐतिहासिक स्रोतों के महत्व से अवगत कराने का प्रयास किया है। उनका जोर इस बात पर रहता है कि किसी भी ऐतिहासिक दावे का आधार उपलब्ध अभिलेख, ताम्रपत्र, शिलालेख, गजेटियर और विश्वसनीय शोध होना चाहिए।


निष्कर्ष

अखिलेश बहादुर पाल का कार्य अपनी जड़ों की खोज और ऐतिहासिक चेतना को बढ़ावा देने का एक प्रयास माना जा सकता है। उनकी अस्कोट यात्रा और कत्यूरी-पाल वंश के प्रति रुचि इस बात का उदाहरण है कि व्यक्तिगत इतिहास की खोज समाज के व्यापक इतिहास को समझने का भी माध्यम बन सकती है।

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रविवार, 3 मई 2026

आने वाले भविष्य के लिए बच्चों को कैसे तैयार करे

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 जिस मानसिक नक़्शे के साथ हमारी परवरिश हुई है, वह हमें पहले ही निराश कर चुका है, और वह हमारे बच्चों को भी निराश करेगा। हर पीढ़ी को लगता है कि वह अपने बच्चों को ज़िंदगी के लिए तैयार कर रही है, फिर भी अक्सर वह बस वही मानसिक ढाँचा उन्हें सौंप देती है, जिसकी मदद से उसने अपने ज़माने का सामना किया था। समस्या तब खड़ी होती है, जब समय हमारी विरासत में मिली पक्की धारणाओं से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बदलता है, और हमारा अपना अनुभव उस नई हकीकत के सामने बेमानी हो जाता है, जो अब बिल्कुल अलग नियमों पर चलती है।

एक समझदार सभ्यता उन चीज़ों का सम्मान करती है, जो उसे यहाँ तक लाई हैं, लेकिन उन चीज़ों को छोड़ देती है, जिनसे वह अब आगे निकल चुकी है। अतीत सम्मान का हकदार है, लेकिन भविष्य एक बिल्कुल अलग तरह के मानवीय ढाँचे की माँग करता है। यह नया दौर हमें उस चीज़ की जड़ों को फिर से जाँचने पर मजबूर करता है, जिसे हम "गठन" कहते हैं। बहुत लंबे समय से, हमने शिक्षा को बस इस बात से जोड़कर देखा है कि बच्चे को समाज द्वारा तय किए गए किसी साँचे में कैसे फिट किया जाए — और ऐसा करते हुए हमने इंसान के उन पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर दिया है, जो अब इस तेज़ी से जटिल होती जा रही दुनिया का सामना करने के लिए सबसे ज़रूरी बन गए हैं।

हो सकता है कि किसी बच्चे के पास बहुत सारा ज्ञान हो, फिर भी उसमें अपने भीतर की राह खोजने की काबिलियत न हो। हो सकता है कि कोई समाज बहुत सारे पेशेवर लोग तैयार कर दे, लेकिन फिर भी उसमें ऐसे लोग न हों, जो किसी ऐतिहासिक बदलाव को बनाए रखने में सक्षम हों। इस अहम मोड़ की ज़िम्मेदारी उन बड़ों पर आती है, जिन्हें उसी पुराने नक़्शे के हिसाब से गढ़ा गया था। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे एक नए दौर के लिए तैयार हों, फिर भी हम उसी पुराने दौर की आदतों को दोहराते रहते हैं, जो अब ढह रहा है। हम चाहते हैं कि वे सोचें, फिर भी अक्सर हम उनके सवालों पर उन्हें डाँटते हैं। हम चाहते हैं कि वे कुछ नया रचें, फिर भी हम बस आँख मूँदकर आज्ञा मानने वालों को ही इनाम देते हैं। हम चाहते हैं कि उनकी अपनी एक समृद्ध भीतरी दुनिया हो, फिर भी हम अपनी ज़िंदगी दूसरों की तारीफ़ पाने की होड़ में बिता देते हैं।

आज के बच्चों को सचमुच किस चीज़ की ज़रूरत है, ताकि वे उस आने वाले कल का सामना कर सकें, जो अब तक हमारे जाने-पहचाने हर अनुभव — चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामूहिक — से बिल्कुल ही अलग होगा? यह सवाल हर घर, हर स्कूल और हर परिवार के सामने आज भी खुला है। 2030 तक वैश्विक श्रम बाजार में भारी उथल-पुथल का अनुमान है। 92 मिलियन नौकरियां खत्म हो जाएंगी, मौजूदा पदों में से 22% का स्वरूप बदल जाएगा, 39% मुख्य कौशल बदल जाएंगे और अधिकांश नौकरियों में इस्तेमाल होने वाले 70% कौशल कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभाव से अप्रचलित हो जाएंगे। पारंपरिक कार्यालय अपना दबदबा खो देंगे, करियर के सीधे रास्ते टूट जाएंगे, डिप्लोमा अब पर्याप्त नहीं रह जाएंगे और दोहराव वाले, प्रशासनिक, परिचालन और बुनियादी देखभाल से संबंधित नौकरियां सबसे अधिक प्रभावित होंगी। हमारे माता-पिता के जीवन को आकार देने वाली कार्य जगत हमारे बच्चों के लिए वैसी कार्य जगत नहीं रहेगी।


उन्हें निर्माण करना सिखाएँ। व्यवसाय, विचार, समुदाय, प्रौद्योगिकी। भविष्य उन लोगों को पुरस्कृत करेगा जो मूल्य सृजित करते हैं, न कि केवल कार्यों को पूरा करने वालों को। जिज्ञासा को प्रोत्साहित करें। प्रयोग को प्रोत्साहित करें। असफलता को प्रोत्साहित करें। निर्माता ही दुनिया बदलते हैं। उन्हें लोगों का नेतृत्व करना सिखाएं। एआई प्रणालियों का प्रबंधन करेगा। लेकिन मनुष्यों को अभी भी ऐसे नेताओं की आवश्यकता होगी जो दूरदृष्टि का संचार कर सकें, संघर्षों का समाधान कर सकें, विश्वास कायम कर सकें और सामंजस्य स्थापित कर सकें। भावनात्मक बुद्धिमत्ता दुनिया की सबसे शक्तिशाली संपत्तियों में से एक बन जाएगी।

उन्हें जीवन का अर्थ खोजना सिखाएँ। भले ही मशीनें अंततः जीवनयापन की कई समस्याओं का समाधान कर दें, फिर भी आपका बच्चा इस सबसे गहरे मानवीय प्रश्न से जूझता रहेगा: मैं यहाँ क्यों हूँ? उद्देश्य, ज़िम्मेदारी, सेवा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली दुनिया में इन चीजों का महत्व कम नहीं, बल्कि और भी अधिक होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर उत्पन्न कर सकती है। लेकिन किन समस्याओं को हल करना सार्थक है, यह निर्णय अभी भी मनुष्यों को ही लेना होगा।

हमारा लक्ष्य ऐसे मनुष्यों का निर्माण करना है जो आत्मनिर्भर हों और भविष्य का निर्माण कर सकें। जिज्ञासु मन वाले, दृढ़ चरित्र वाले और स्वतंत्र विचारक। दुनिया को केवल बुद्धिमान लोगों की ही नहीं, बल्कि ऐसे समन्वित मनुष्यों की आवश्यकता है जो भविष्य का निर्माण करने में सक्षम हों। जो माता-पिता इस बात को अभी समझ लेंगे, वे अपने बच्चों को असाधारण लाभ प्रदान करेंगे।

लेकिन सवाल वही बना हुआ है, हर पिता, हर माता, हर शिक्षक और हर उस वयस्क के लिए जो अब भी यह सोचता है कि वह जानता है कि शिक्षा क्या है — हम अपने बच्चों को वह चीज कैसे सिखाएंगे जिसे हम खुद अभी ठीक से सीख रहे हैं? हम आंतरिक नेतृत्व कैसे सिखा सकते हैं यदि कई वयस्क अभी भी भय, तुलना, सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता, मान्यता की आवश्यकता और उन संरचनाओं के प्रति स्वचालित आज्ञाकारिता से शासित होकर जीवन जी रहे हैं जिनका वे अब सम्मान भी नहीं करते हैं? हम स्वतंत्र सोच कैसे सिखा सकते हैं यदि वर्षों से हमने परिपक्वता को अनुकूलन के साथ, जिम्मेदारी को सहनशीलता के साथ, सफलता को स्थिरता के साथ और शिक्षा को एक ऐसी प्रणाली के भीतर कार्य करने की क्षमता के साथ भ्रमित किया है जिसने हमसे कभी यह नहीं पूछा कि हम कौन हैं?

अगर हम खुद अतीत के मानसिक मानचित्रों के सहारे जीने की कोशिश कर रहे हैं, तो हम उन्हें भविष्य का निर्माण करना कैसे सिखा सकते हैं? इस बातचीत में यही सबसे ईमानदार पहलू है, क्योंकि आने वाले बच्चे को ऐसे वयस्कों की आवश्यकता है जो अपने जीवन से यह प्रदर्शित कर सकें कि वे शब्दों के माध्यम से उससे क्या अपेक्षा करना चाहते हैं।

उन्हें निर्माण करना सिखाएँ। व्यवसाय, विचार, समुदाय, प्रौद्योगिकी। भविष्य उन लोगों को पुरस्कृत करेगा जो मूल्य सृजित करते हैं, न कि केवल कार्यों को पूरा करने वालों को। जिज्ञासा को प्रोत्साहित करें। प्रयोग को प्रोत्साहित करें। असफलता को प्रोत्साहित करें। निर्माता ही दुनिया बदलते हैं। उन्हें लोगों का नेतृत्व करना सिखाएं। एआई प्रणालियों का प्रबंधन करेगा। लेकिन मनुष्यों को अभी भी ऐसे नेताओं की आवश्यकता होगी जो दूरदृष्टि का संचार कर सकें, संघर्षों का समाधान कर सकें, विश्वास कायम कर सकें और सामंजस्य स्थापित कर सकें। भावनात्मक बुद्धिमत्ता दुनिया की सबसे शक्तिशाली संपत्तियों में से एक बन जाएगी।

उन्हें जीवन का अर्थ खोजना सिखाएँ। भले ही मशीनें अंततः जीवनयापन की कई समस्याओं का समाधान कर दें, फिर भी आपका बच्चा इस सबसे गहरे मानवीय प्रश्न से जूझता रहेगा: मैं यहाँ क्यों हूँ? उद्देश्य, ज़िम्मेदारी, सेवा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली दुनिया में इन चीजों का महत्व कम नहीं, बल्कि और भी अधिक होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर उत्पन्न कर सकती है। लेकिन किन समस्याओं को हल करना सार्थक है, यह निर्णय अभी भी मनुष्यों को ही लेना होगा।

हमारा लक्ष्य ऐसे मनुष्यों का निर्माण करना है जो आत्मनिर्भर हों और भविष्य का निर्माण कर सकें। जिज्ञासु मन वाले, दृढ़ चरित्र वाले और स्वतंत्र विचारक। दुनिया को केवल बुद्धिमान लोगों की ही नहीं, बल्कि ऐसे समन्वित मनुष्यों की आवश्यकता है जो भविष्य का निर्माण करने में सक्षम हों। जो माता-पिता इस बात को अभी समझ लेंगे, वे अपने बच्चों को असाधारण लाभ प्रदान करेंगे।

लेकिन सवाल वही बना हुआ है, हर पिता, हर माता, हर शिक्षक और हर उस वयस्क के लिए जो अब भी यह सोचता है कि वह जानता है कि शिक्षा क्या है — हम अपने बच्चों को वह चीज कैसे सिखाएंगे जिसे हम खुद अभी ठीक से सीख रहे हैं? हम आंतरिक नेतृत्व कैसे सिखा सकते हैं यदि कई वयस्क अभी भी भय, तुलना, सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता, मान्यता की आवश्यकता और उन संरचनाओं के प्रति स्वचालित आज्ञाकारिता से शासित होकर जीवन जी रहे हैं जिनका वे अब सम्मान भी नहीं करते हैं? हम स्वतंत्र सोच कैसे सिखा सकते हैं यदि वर्षों से हमने परिपक्वता को अनुकूलन के साथ, जिम्मेदारी को सहनशीलता के साथ, सफलता को स्थिरता के साथ और शिक्षा को एक ऐसी प्रणाली के भीतर कार्य करने की क्षमता के साथ भ्रमित किया है जिसने हमसे कभी यह नहीं पूछा कि हम कौन हैं?

अगर हम खुद अतीत के मानसिक मानचित्रों के सहारे जीने की कोशिश कर रहे हैं, तो हम उन्हें भविष्य का निर्माण करना कैसे सिखा सकते हैं? इस बातचीत में यही सबसे ईमानदार पहलू है, क्योंकि आने वाले बच्चे को ऐसे वयस्कों की आवश्यकता है जो अपने जीवन से यह प्रदर्शित कर सकें कि वे शब्दों के माध्यम से उससे क्या अपेक्षा करना चाहते हैं।

इसलिए यह एक बड़ी चुनौती है। बच्चों को शिक्षित करने के तरीके में बदलाव लाना इस परिवर्तन का सिर्फ एक हिस्सा है। सबसे असहज हिस्सा है खुद को शिक्षित करने के तरीके में बदलाव लाना, जो एक ऐसी दुनिया द्वारा नियंत्रित है जिसने भविष्य पर अपना अधिकार पहले ही खो दिया है।

एक अभिभावक अपने बच्चे का स्कूल बदल सकता है और उसे उसी आज्ञाकारी अनुशासन के साथ पाल-पोस सकता है। एक माँ रचनात्मकता की बातें कर सकती है और अपने बच्चे को डराने वाली किसी भी भिन्नता के लिए उसे दंडित करना जारी रख सकती है। एक परिवार तकनीकी पाठ्यक्रम खरीद सकता है और अपने बच्चों को अपने निर्णय लेने में असमर्थ बनाकर उन्हें पालना जारी रख सकता है। एक स्कूल एआई, रोबोटिक्स या प्रोग्रामिंग को शामिल कर सकता है और सही उत्तर, तुलना और अनुरूपता को पुरस्कृत करना जारी रख सकता है।

शायद सबसे बड़ा लाभ ऐसे वयस्कों के साथ पलना-बढ़ना है जो सब कुछ जानने का दिखावा नहीं करते, लेकिन अपनी अज्ञानता के आगे भी नहीं झुकते। ऐसे वयस्क जो सीखते हैं, नवीनतम जानकारी से अवगत रहते हैं, चिंतन करते हैं, गलतियाँ करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, बदलते हैं, ज़िम्मेदारी लेते हैं और अपने जीवन से यह सिद्ध करते हैं कि मानवीय बुद्धि कभी समाप्त नहीं होती। ऐसे वयस्क जो उम्र को ढाल बनाना छोड़ देते हैं और अंतरात्मा को अधिकार मानते हैं। ऐसे वयस्क जो समझते हैं कि बच्चे को उस जीवन का पालन करने की आवश्यकता नहीं है जिसके बारे में उनके माता-पिता भी आश्वस्त नहीं हैं कि वह अभी भी सही है या नहीं।

वे वयस्क जो यह स्वीकार करते हैं कि इस युग में प्रेम करने का अर्थ आने वाले समय के लिए स्वयं को तैयार करना भी है। वे वयस्क जो अपने बच्चों को बिना यह अपेक्षा किए देख सकते हैं कि वे भविष्य का भार अकेले ही उठाएं। और शायद यही सबसे बड़ा सवाल है जो यह समय हमारे सामने रख रहा है, न केवल हमारे बच्चों को किस प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता है, बल्कि हमें किस प्रकार के वयस्क बनने की आवश्यकता है ताकि वह शिक्षा संभव हो सके।

अगर यह लेख आपको असहज महसूस कराता है, तो यहीं रुकिए। यहीं से ज़िम्मेदारी शुरू होती है। अपने बच्चों को देखिए, खुद को देखिए, अपनी शिक्षा को देखिए, उन वाक्यों को देखिए जिन्हें आप बार-बार दोहराते हैं, उस डर को देखिए जो अब भी आपके फैसलों को निर्देशित करता है, और ईमानदारी से खुद से पूछिए कि क्या आप अपने बच्चों को उस नई दुनिया का हिस्सा बनने के लिए तैयार कर रहे हैं जो, चाहे हम इसे पसंद करें या न करें, पहले से ही मौजूद है।

नए जोड़े गए विस्तार: आने वाले सालों में AI न सिर्फ नौकरियाँ छीनेगा बल्कि मानवीय संबंधों, रचनात्मकता की परिभाषा और नैतिक निर्णय लेने की क्षमता को भी चुनौती देगा। अगर हम आज भी पुरानी शिक्षा पर अड़े रहे तो हमारे बच्चे न सिर्फ बेरोजगार होंगे बल्कि भावनात्मक रूप से भी टूटे हुए, दिशाहीन और मशीनों के सामने बेबस महसूस करेंगे। हमें अब स्कूलों से आगे जाकर घर पर ही प्रयोग, असफलता, गहन चर्चा और स्वतंत्र सोच का माहौल बनाना होगा। माता-पिता को खुद AI टूल्स सीखने, नई किताबें पढ़ने और पुरानी आदतों को तोड़ने की हिम्मत दिखानी होगी। तभी हम अपने बच्चों को एक बेहतर, मजबूत और सार्थक भविष्य दे पाएंगे। साभार सुरेश z मीडिया 


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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

क्या "इंडो-आर्यन" और "द्रविड़" शब्द फूट डालने वाले शब्द हैं?

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 क्या "इंडो-आर्यन" और "द्रविड़" शब्द फूट डालने वाले शब्द हैं?


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बहुत से लोग अपने आप ही यह मान लेते हैं कि "इंडो-आर्यन" या "द्रविड़" जैसे तटस्थ भाषाई शब्दों का इस्तेमाल करने का मतलब अपने आप ही 'आर्यन आक्रमण सिद्धांत' (AIT) का समर्थन करना है।


यह सच है कि AIT के दौर की औपनिवेशिक विद्वता ने भारत में उत्तर और दक्षिण के बीच एक सभ्यतागत विभाजन खड़ा करने के लिए इन शब्दों को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था।


आज, इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल ऐसे ढांचों के भीतर किया जाता है जो साफ तौर पर AIT को खारिज करते हैं, जिनमें 'आउट ऑफ़ इंडिया थ्योरी' (OIT) भी शामिल है।


यहाँ AIT के बिना इंडो-यूरोपियन, इंडो-ईरानी और इंडो-आर्यन का क्रम दिया गया है:-


OIT के दायरे में, भाषाई क्रम संरचनात्मक रूप से मान्य बना रहता है: प्रोटो-इंडो-यूरोपियन (PIE) > प्रोटो-इंडो-ईरानी > प्रोटो-इंडो-आर्यन > वैदिक संस्कृत।


जो चीज़ बदलती है, वह है भूगोल और आवाजाही की दिशा, न कि भाषाई वंश।


भारतीय मूल के मॉडलों में, PIE को भारत के भीतर ही माना जाता है, न कि इसके बाहर। श्रीकांत तलागेरी PIE को पूर्वी उत्तर प्रदेश में मानते हैं। लेकिन हम इसे सरस्वती घाटी में मानते हैं। आज के समय में ये दो प्रमुख OIT मॉडल हैं।


जिन लोगों को PIE नाम से हिचक होती है, वे इसे सीधे तौर पर "सरस्वती भाषा" कह सकते हैं, लेकिन भाषाई संबंध जस के तस बने रहते हैं।


इस भारतीय मूल-स्थान से, इंडो-ईरानी लोग पश्चिम की ओर ईरान चले गए। इंडो-यूरोपियन की अन्य शाखाएँ यूरेशिया की ओर बढ़ गईं। इंडो-आर्यन लोग यहीं भारत में ही रहे और यहीं फैल गए।


यह OIT का मुख्य दावा है, और इसके लिए मानक भाषाई शब्दावली को छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं है।


उपमहाद्वीप के भीतर, इंडो-आर्यन भाषाएँ सरस्वती क्षेत्र से ही फैलीं। इनका फैलाव मुख्य रूप से पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम की ओर हुआ।


यह फैलाव ऋग्वैदिक काल के बाद हुआ था, न कि किसी हिंसक विस्थापन के ज़रिए। दक्षिण भारत में इंडो-आर्यन भाषाओं द्वारा द्रविड़ भाषाओं की जगह लेने का कोई भी लिखित या पुरातात्विक प्रमाण मौजूद नहीं है। दक्षिण भारत में द्रविड़ भाषाओं की जगह कभी भी इंडो-आर्यन भाषाओं ने नहीं ली।


भाषाई शब्द तटस्थ औज़ार होते हैं, न कि किसी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता। इंडो-आर्यन, द्रविड़ या PIE शब्दों का इस्तेमाल करने का मतलब AIT का समर्थन करना नहीं है।


OIT इन सभी शब्दों को भारतीय मूल और भारत से बाहर की ओर हुए फैलाव के संदर्भ में पूरी तरह से स्वीकार करता है। भारत के भीतर जो वास्तविक ऐतिहासिक संकुचन हुआ था, उसका असर ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाओं पर पड़ा था, न कि द्रविड़ भाषाओं पर। ऋग्वैदिक प्रमाण एकीकरण की ओर संकेत करते हैं, न कि द्रविड़ और भारत-आर्यों के बीच किसी जातीय या भाषाई संघर्ष की ओर।


AIT (आर्यन इन्वेजन थ्योरी) को अस्वीकार करने का मतलब यह नहीं है कि हम भाषा-विज्ञान को या भाषा-परिवारों को दर्शाने के लिए इस्तेमाल होने वाले 'भारत-आर्य' या 'द्रविड़' जैसे शब्दों को भी अस्वीकार कर दें। अन्यथा, हमें 'भाषा-परिवार X' और 'भाषा-परिवार Y' जैसे भ्रमित करने वाले शब्दों का उपयोग करना पड़ेगा।


इसके लिए सही भूगोल, सही कालक्रम और सही दिशा-निर्धारण की आवश्यकता होती है।


द्रविड़ मूल-स्थान (Homeland) के संबंध में दो सिद्धांत प्रचलित हैं।


'मध्य भारतीय मूल-स्थान सिद्धांत' के अनुसार, द्रविड़ भाषा का विस्तार उत्तर-पश्चिम की ओर—गुजरात और बलूचिस्तान तक हुआ।


'एलाम (दक्षिण-पश्चिम ईरान) मूल-स्थान सिद्धांत' के अनुसार, द्रविड़ लोग ईरान से बलूचिस्तान, गुजरात और मध्य भारत की ओर प्रवास कर गए।


इन दोनों ही प्रतिरूपों (models) में, द्रविड़ लोग मध्य भारत से दक्षिण भारत तक पहुँचे।


ऋग्वैदिक काल के मुख्य क्षेत्र (heartland) में भारत-आर्यों और द्रविड़ों के बीच किसी भी प्रकार के संघर्ष-क्षेत्र का कोई अस्तित्व नहीं था।


उत्तर-पश्चिमी भारत के ऋग्वैदिक क्षेत्र में प्राप्त साहित्यिक प्रमाण सह-अस्तित्व और एकीकरण को दर्शाते हैं, न कि किसी प्रकार की शत्रुता को।


इसका एक स्पष्ट उदाहरण 'इरिम्बिथ' और 'सिरिम्बिथ' हैं—ये दो द्रविड़ ऋग्वैदिक ऋषि थे, जिन्हें क्रमशः 'काण्व' और 'भारद्वाज' गोत्रों में सम्मिलित कर लिया गया था। इस बात का उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलता है। यह सांस्कृतिक आत्मसातीकरण (assimilation) का उदाहरण है, न कि किसी भाषाई युद्ध का।


यदि भारत में किसी प्रकार का भाषाई विस्थापन हुआ भी था, तो वह द्रविड़ों और भारत-आर्यों के बीच नहीं था; बल्कि वह 'ऑस्ट्रो-एशियाई' भाषाओं का विस्थापन था, जिन्हें भारत-आर्यों और द्रविड़ों ने विस्थापित कर दिया था!


ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाएँ 'नोस्ट्रैटिक महा-परिवार' का हिस्सा नहीं हैं। जबकि, PIE (आदि-भारत-यूरोपीय) और 'आदि-द्रविड़' भाषाएँ नोस्ट्रैटिक महा-परिवार का ही हिस्सा हैं।


ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाओं का प्रभुत्व मध्य भारत में सदियों तक बना रहा

(लगभग 2500–1500 ईसा पूर्व तक)।


भारत-आर्यों और द्रविड़ों—दोनों के ही विस्तार ने मध्य और पूर्वी भारत में स्थित ऑस्ट्रो-एशियाई क्षेत्रों में अतिक्रमण किया!


उत्तर-पूर्वी भारत में, ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाओं का स्थान आगे चलकर 'सिनो-तिब्बती' भाषाओं ने ले लिया।


आज ऑस्ट्रो-एशियाई भाषाएँ केवल मध्य और पूर्वी भारत के कुछ छिटपुट और अलग-थलग पड़े क्षेत्रों में ही जीवित बची हैं। इनका मुख्य भौगोलिक विस्तार या निरंतरता दक्षिण-पूर्वी एशिया में देखने को मिलती है। साभार Facebook 

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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

कांसे धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति

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 पैरों के तलवों पर #कांसे धातु की कटोरी से मालिश करना एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है, जिसे कांसा वाटी मसाज कहा जाता है। 

यह मालिश सिर्फ आराम ही नहीं देती, बल्कि इसके कई गहरे शारीरिक और मानसिक फायदे भी हैं,,,,,,


कांसे की धातु, जो तांबे और टिन का मिश्रण होती है, आयुर्वेद में इसके औषधीय गुणों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह मालिश शरीर के ऊर्जा बिंदुओं (मर्म) को उत्तेजित करती है, जिससे कई लाभ होते हैं।


कांसे की कटोरी से मालिश के फायदे ,,,,,,,,,:


शरीर की गंदगी (टॉक्सिन) बाहर निकालना:

कांसे की धातु में शरीर की गर्मी और विषाक्त पदार्थों (toxins) को खींचने का गुण होता है।

जब तलवों पर तेल या घी लगाकर कांसे की कटोरी से मालिश की जाती है, तो कटोरी का निचला हिस्सा धीरे-धीरे काला या भूरा हो जाता है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि कटोरी शरीर से जमी हुई गंदगी को बाहर निकाल रही है।


  तनाव और थकान दूर करना:


 पैरों के तलवों में हजारों तंत्रिकाएं (nerves) होती हैं। मालिश करने से ये तंत्रिकाएं शांत होती हैं, जिससे पूरे शरीर को गहरा आराम मिलता है।

 यह दिन भर की थकान, तनाव और चिंता को दूर करने का एक बेहतरीन तरीका है।


 बेहतर नींद में सहायक:


  तनाव और थकान दूर होने से मन शांत होता है।

  यह मस्तिष्क को आराम देता है, जिससे रात में गहरी और आरामदायक नींद आने में मदद मिलती है।


 रक्त संचार बढ़ाना:


 तलवों पर मालिश से रक्त वाहिकाओं (blood vessels) में रक्त का प्रवाह बढ़ता है।

 बेहतर रक्त संचार से पैरों में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे पैरों की सूजन और दर्द में कमी आती है।


 आंखों की रोशनी के लिए:


 आयुर्वेद और रिफ्लेक्सोलॉजी (Reflexology) के अनुसार, पैरों के तलवे में कुछ खास बिंदु आंखों से जुड़े होते हैं।

  कांसे की कटोरी से इन बिंदुओं पर दबाव पड़ने से आंखों की रोशनी बेहतर होती है और आंखों का तनाव कम होता है।


 वात और पित्त दोष को शांत करना:


  कांसे की तासीर ठंडी मानी जाती है, जो शरीर की अतिरिक्त गर्मी (पित्त दोष) को शांत करती है।

 मालिश की क्रिया से वात दोष (जो दर्द और सूखापन का कारण बनता है) संतुलित होता है। इस तरह, यह शरीर में तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने में मदद करती है।

 पैरों की त्वचा और मांसपेशियों को स्वस्थ रखना:

  यह मसाज पैरों की मांसपेशियों को आराम देती है और उनकी कठोरता को कम करती है।

यह तलवों की सूखी और फटी हुई त्वचा को नरम बनाने में भी मदद करती है।


इस मालिश को करने के लिए आप घी या कोई भी प्राकृतिक तेल (जैसे नारियल तेल) का उपयोग कर सकते हैं। यह बहुत ही सरल और प्रभावी तरीका है अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का। साभार Facebook 


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