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रविवार, 31 जनवरी 2021

भारतीय कृषि की अर्थब्यवस्था में योगदान

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भारतीय कृषि भारतीय कृषि में लगभग 70% से अधिक जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है भारत की भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है इसका सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 14% योगदान है यह देश के लिए खाद्य सामग्री सुनिश्चित करती है और उद्योगों के लिए कच्चा माल पैदा करती है कृषि विकास किस लिए हमारी संपूर्ण खुशहाली की पहली शर्त है एग्रीकल्चर लेकिन भाषा के 2 शब्दों एग्रोस तथा कल्चर से बना है एग्रोस का अर्थ है भूमि और कल्चर का अर्थ है जुताई अर्थात कृषि का अर्थ है भूमि की जुताई कृषि के अंतर्गत पशुपालन मत्स्य अन्य विषय भी आते हैं वर्ष में एक बार बो गई भूमि को शुद्ध बोया क्षेत्र कहते हैं शुद्ध बोये गए क्षेत्र तथा 1 बार से अधिक बोये गए क्षेत्र को कुल मिलाकर कुल बोया गया क्षेत्र कहते हैं भारत में शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 17 करोड हेक्टेयर है कुल भौगोलिक क्षेत्र का 52% है पौधों से परिष्कृत उत्पाद तक की रूपांतरण में तीन प्रकार की आर्थिक क्रियाएं सम्मिलित हैं प्रथम द्वितीय तृतीय प्रथम प्राथमिक क्रियाओं के अंतर्गत कौन सभी क्रियाओं को शामिल किया जाता है जिनका संबंध पर आर्थिक प्राकृतिक संसाधन के उत्पादन निष्कर्षण से एक कृषि मत्स्य अच्छे उदाहरण है बुटीक इन संसाधनों के प्रसंस्करण से संबंधित है इस्पात निर्माण डबल रोटी पकाना कपड़ा बोलना तृतीय कन्या प्राथमिक उद्योग क्षेत्र को सेवा द्वारा सहयोग प्रदान करती हैं यातायात व्यापार बैंकिंग बीमा विज्ञापन प्रतिक्रियाओं के उदाहरण है इस प्रकार कृषि कृषि प्राथमिक क्रियाओं के अंतर्गत आता है ऐसी दो प्रकार से की जाती है हाथ निर्वाह कृषि इस प्रकार की कृषि कृषक परिवार की आवश्यकता को पूरा करने के लिए की जाती है पारंपरिक रूप से कम उपज प्राप्त करने के लिए निम्न स्तरीय प्रौद्योगिकी पारिवारिक श्रम का उपयोग किया जाता है निर्वाह कृषि को पुनः निर्वाह कृषि आदि निर्वाह कृषि में वर्गीकृत किया जा सकता है गहन निर्वाह कृषि कृषि में किसान एक छोटे भूखंड प्रसाधन औजार आदिम श्रम से खेती करता है अधिक धूप वाले दिनों में उपायुक्त जलवायु एवं उर्वरक मृदा वाले खेत में 1 वर्ष में 1 से अधिक फसलें उगाई जा सकती हैं चावल मुख्य फसल होती है गहन निर्माण कृषि दक्षिणी दक्षिणी पूर्वी पूर्वी एशिया के सघन जनसंख्या वाले मानसूनी प्रदेशों में प्रचलित है स्थानांतरण शामिल है स्थानांतरित कृषि में सबसे पहले भूमि वन भूमि से पेड़ों को काटकर तरह तन्हा शाखाओं को जलाकर साफ किया जाता है जब उनका टुकड़ा साफ हो जाता है तो उसमें दो या 3 सालों तक फसलें उगाई जाती हैं भूमि की उर्वरा शक्ति के घटने पर भूमि के कुछ टुकड़े को छोड़ दिया जाता है और किसान नए भूखंड पर चला जाता है भारत में स्थानांतरित कृषि पूर्वोत्तर राज्य में की जाती है जैविक कृषि में रासायनिक खादों के स्थान पर जैविक खाद और प्राकृतिक पीड़कनाशी का प्रयोग किया जाता है मक्का को कारण के नाम से भी जाना जाता है विश्व में इसकी रंग बिरंगी प्रजातियां पाई जाती हैं संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे प्रेशर नार्मल और नेवला को हरित क्रांति का पिता कहा जाता है भारत में हरित क्रांति का श्रेय डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन को जाता है भारत में हरित क्रांति की शुरुआत 9768 क्रांति के जनक भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला नारियल भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला नारियल काजू पपीता और भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला नारियल काजू पपीता और अनार का सबसे बड़ा उत्पादक है और मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है भारत का दूध उत्पादन मेंं विश्व्व में भारत का मछली उत्पादन मेंं विश्व इस प्रकार भारतीय कृषि देश की अर्थव्यवस्था् में योगदान देती है

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मौसम टाइम मशीन का निर्माण

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अभी तक मौसम विज्ञानियों को मौसम से संबंधित ऐतिहासिक डेटा नहीं मिल पाता था जिसकी वजह से वह सटीक तौर पर मौसम की भविष्यवाणी नहीं कर पाते थे मौसम वैज्ञानिकों ने ऐसे सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का विकास किया है जिससे मौसम पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों को पूरे विश्व का ऐतिहासिक मौसम डाटा मिल जाएगा इस सॉफ्टवेयर में महासागरों को भी शामिल किया गया है

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शनिवार, 30 जनवरी 2021

हड़प्पा सभ्यता ऋतु परिवर्तन से नष्ट हुई

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सिंधु घाटी सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है यह विश्व की पहली शहरी सभ्यता थी जो भारतीय महाद्वीप में फली फूली सिंधु सभ्यता का चरम काल लगभग 26 ईसवी पूर्व से उन्नीस सौ ईसवी पूर्व के बीच में था इस सभ्यता के विकसित शहरों की मिसाल आज तक दी जाती है आज भी लोगों के लिए यह रहस्य है कि ऐसी फलती फूलती सभ्यता किसी समय अचानक समाप्त कैसे हो गई थी काफी समय से एक सिद्धांत या प्रस्तुत किया जाता है कि उत्तर-पश्चिम से हुए आर्यों के आक्रमण की वजह से उच्च विकसित सभ्यता नष्ट हो गई थी हालांकि इस सिद्धांत के पक्ष में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका था अब वैज्ञानिकों और पुरातत्व नेताओं ने इसका वास्तविक कारण ऋतु परिवर्तन को बताया है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और बनारस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि सिंधु घाटी क्षेत्र में लगभग 200 वर्ष तक सूखे के प्रकोप की श्रृंखला खेली जिसकी वजह से यह सभ्यता नष्ट हो गई यह बताता है कि 4100 वर्ष पूर्व उत्तर पश्चिम भारत अचानक कमजोर पड़े कृष्ण मानसून से प्रभावित हुआ था जिससे इस क्षेत्र में मरुस्थल जैसी स्थिति बन गई थी पुरातत्व व्यक्तियों ने को इस बात की भी प्रमाण मिले हैं कि लगभग इसी कालखंड के दौरान जो गलियां पहले साफ-सुथरी रहती थी वह गंदगी से भरने लगी थी उनकी हस्तकला की खुशियां धीरे-धीरे घटने लगी थी उनकी लिपि भी लुप्त होने लगी थी उस सीमा तक जनसांख्यिकीय स्थानांतरण भी हुआ इसी दौरान सिंध घाटी के बड़े शहर जिनकी जनसंख्या 100000 तक की तेजी से घटी संख्या घटने के साथ-साथ उनकी सभ्यता नष्ट हो गई

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शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

घेरता बचपन में बुढ़ापा प्रोजेरिया

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 फिल्म पा में जब लोगों ने अमिताभ बच्चन की को प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीड़ित बच्चे की भूमिका निभाते देखा तो कई लोगों को यकीन भी नहीं हुआ ऐसी भी कोई बीमारी होती है हमें से शायद ही किसी ने इस बीमारी का नाम सुनाओ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शायद कुछ लोग ही इस बीमारी के बारे में जानते होंगे दरअसल यह बीमारी सामान्य नहीं है इसलिए लोग इसकी जानकारी से अनजान है प्रोजेरिया के बारे में सबसे पहले जानकारी 1886 में जो नाथन ने दी थी इसके बाद 18 97 में हिस्ट्री गिलफोर्ड ने इसके बारे में बताया था इसलिए इस बीमारी को हर्ट चिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा गया है आज भी देश विदेश में पुरस्कृत वैज्ञानिक किस बीमारी की जड़ का पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बीमारी के बारे में पता चलने के बाद यह साफ हो जाएगा कि मनुष्य मनुष्य के बूढ़े होने की प्रक्रिया क्या है प्रोजेरिया सामान्य बीमारी की श्रेणी में नहीं आती 40 से 45 लाख बच्चों में से यह बीमारी किसी एक में पाई जाती है अब तक प्रोजेरिया से ग्रसित बच्चों की संख्या 45 से 40 से ज्यादा नहीं है गौर मतलब बिहार में एक ही परिवार के 5 बच्चों में यह बीमारी पाई गई थी इसमें से 3 बच्चों की मृत्यु हो चुकी है प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रसित बच्चे की उम्र महज महज 17 से 21 वर्ष की होती है यह बीमारी बच्चों के जीवन काल को काफी कम कर देती है प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चा 2 वर्ष की उम्र से ही बुरा दिखने लगता है इसकी उम्र 3 गुना रफ्तार से बढ़ने लगती है सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में वह पूरी तरह बूढ़ा हो जाता है पीड़ित बच्चों के सिर के सारे बाल झड़ जाए उसके सिर का आकार काफी बड़ा हो जाता है नरसिंह भरकर साफ दिखने लगती हैं और शरीर की बिलकुल रुक जाती है बच्चा बिल्कुल दूसरे ग्रह के प्राणी जैसा दिखने लगता है दरअसल यह बीमारी जींस और कोशिकाओं में बदलाव के कारण पैदा होने लगती है बहुत शोधों के बाद इस बीमारी के बारे में कुछ पता नहीं चल पाया है इस बीमारी के बारे में लोगों में जागरूकता लाना बेहद जरूरी है ऐसे बच्चे नफरत से नहीं बल्कि तैयार के हकदार है ताकि इस बीमारी से लड़ने की हिम्मत मिल सके

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अनुमानित समय से भी एक करोड़ वर्ष पहले थे डायनासोर

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 एक नए शोध के अनुसार डायनासोरों के बारे में जितना माना जाता रहा है डायनासोर उससे भी एक करोड़ वर्ष पहले धरती पर अस्तित्व में थे द नेचर की रिपोर्ट के अनुसार एक अंतरराष्ट्रीय दल ने यह परिणाम तंजानिया में जीवाश्मों के अध्ययन के बाद दी है जीवाश्म विज्ञानियों के मुताबिक डायनासोर और उनके करीबी संबंधी जैसे उससे टीरो सार्स भी पहले अस्तित्व में थे जितना अब तक माना जाता रहा है शोध में बताया गया है कि अब तक माना जाता था कि डायनासोर केवल 23 करोड़ वर्ष पुराने थे लेकिन अब उनके पुराने करीबी सहयोगियों साहिलेसारस के लगभग 1करोड़ वर्ष और पुराने होने की पुष्टि हुई है शोध में यह भी कहा गया है कि धीरे-धीरे सालेसारस के साथ ही डायनासोर की उत्पत्ति हो गई शोधकर्ताओं को दक्षिण तंजानिया से लगभग 14 जीवाश्म हड्डियां मिली है जिन पर शोध किया गया है

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भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया टीवी के जीवाणु का जिनोम मैप

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तपेदिक गरीबों की बीमारी है इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके इलाज पर खास दिलचस्पी नहीं लेती टीबी से अंतिम लड़ाई का नेतृत्व करते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने इसके जीवाणु माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस के जीनोम की संपूर्ण सिक़्वेन्सिंग कर ली है सीएसआईआर के नेतृत्व में डेढ़ सौ वैज्ञानिकों ने एमटीवी के सभी 4000 जिलों को चिन्हित कर उसका डिजिटल मैप तैयार किया है इतना ही नहीं सीएसआईआर ने इन्हें फार्मा कंपनियों को निशुल्क उपलब्ध कराने के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध कराने का ऐलान किया है कि निदेशक ने बताया था कि इससे कम कीमत में और ज्यादा असरदार दवा इलाज की नई तकनीक हासिल करने का रास्ता खुल गया है 146 करोड़ की लागत से डिलीवरी ओपन कोर्स ड्रग डिलीवरी कार्यक्रम शुरू किया था इसके तक यह बड़ी सफलता है इसी कार्यक्रम में कनेक्ट टू द कोर्ट कॉन्फ्रेंस शुरू हुई थी उसमें वैज्ञानिकों ने टीबी जीन और उनकी सीक्वेंसिंग को अंतिम रूप प्रदान किया था वैज्ञानिकों ने कहा हां कहा था कि हालांकि दुनिया में एमटीवी के जीनोम को एक दशक पहले ही डिकोड कर लिया गया था लेकिन तब वैज्ञानिकों ने इसके 4000 जीन में से करीब 1000 जीन की ही सीक्वेंसिंग की थी हमने आगे सभी 4000 जीन की सीक्वेंसिंग की है इस डेटाबेस को वह osdd.net पर डाला जाएगा टीबी की कोई नई दवा ईज़ाद नहीं हुई है 1960 के बाद गौरतलब है कि इतने वर्षों में बीमारियों के जीवाणु ने खुद को बदल डाला और अब इसकी कुछ नई प्रजातियों को दवाओं का असर नहीं होता

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बुधवार, 27 जनवरी 2021

मृत्यु के बाद का जीवन

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"अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है आत्‍मा" आत्मा और भूत-प्रेतों की दुनया बड़ी रहस्यमयी है। जिनका इससे सामना हो जाता है वह मानते हैं की आत्मा और भूत-प्रेत होते हैं और जिनका इनसे सामना नहीं होता है वह इसे कल्पना मात्र मानते हैं। लेकन भूत-प्रेत या आत्माओं का वजूद नहीं है इसे सरे से खारिज करना सही नहीं होगा कई बार कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो अशरीरी आत्मा के वजूद को मानने पर विवश कर देती है। विज्ञानं भी इस विषय पर परीक्षण कर रहा है और कई ऐसे प्रमाण सामने आए हैं जो यह बताते हैं कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है और यह कभी भी अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है। इसी तरह की एक घटना के बारे में यहां हम बात कर रहे हैं।हम जिस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुधयाना के एक निवासी की है जो कारोबार के सिलसिले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक दिल का दौड़ा पड़ा और स्‍थि गंभीर हो गई।कत्सकों ने काफी प्रयास किया लेकन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग दया। मरने से पहले इन्होंने अपने अंतिम संस्कार की जैसी बात की थी उसी विधऔर तरीके से अंतम संस्कार कर दिया गया।हम जिस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुधियाना के एक निवासी की है जो कारोबार के सलसले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक दिल का दौड़ा पड़ा और स्थिति गंभीर हो गई।चिकित्सकों ने काफी प्रयास कया लेकिन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग दिया। मरने से पहले इन्होंने अपने अंतम संस्कार की जैसी बात की थी उसी और तरीके से अंतम संस्कार कर दिया गया।कुछ ऐसे बीता और कारोबारी की तबीयत भी खराब हो गयी और चिकित्सकों ने लंदन जाकर उपचार कराने की सलाह दी। लंदन में जब चित्सकों ने जांच की और बताया क रोग अधिक गंभीर नहीं है कुछ दिन के उपचार से स्वस्‍थ हो जाएंगे तो तैयार होकर कारोबारी अपने होटल में पहुंचे।उस रात जैसे ही इन्होंने ने कमरे का दरवाजा खोला इन्हें लगा कि कमरे में कोई पहले से मौजूद है। आगे बढ़कर जब इन्होंने देखा तो सामने इनकी मरी हुई पत्नी पलंग पर बैठी नजर आई। इस दृश्य को देखकर कारोबारी ठिठक गए लेकिन इनकी पत्नी की आत्मा ने आगे बढ़कर बोलना शुरु कया।कारोबारी की पत्नी बोली तुमने जो मेरा अंतिम संस्कार करवाया है उससे मैं संतुष्ट हूं। मैंने दक्षिणा में दी हुई अंगूठी भी देखी है। मैं हमेशा आपके साथ रहती हूं और अफ्रीका से साथ-साथ लंदन आई हूं। यहां डाक्टरों की जांच के बाद अब मुझे शांति मिली है।अमेरिका में कुछ दिनों पहले हुई दुर्घटना में अपने दूसरे बेटे की जान मैंने ही बचाई थी। जब पत्नी की आत्मा ने विदाई मांगी तो कारोबारी की आंखें भर आई और उन्होंने अपनी पत्नी को गले लगा लिया कारोबारी ने अपने इस अनुभव को 'रूहों की दुनिया' नामक की पुस्तक में लिखा है। यह लखते हैं क उस समय जब इन्होंने पत्नी को गले लगाया तो उसका शरीर वैसा ही था जैसे वह जीवनकाल में थी। इसके बाद वह अदृश्य हो गई।इस घटना का उल्लेख परलोक और पुनर्जन्म नाम की पुस्तक में भी है साभार अमरउजाला डाट कॉम

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मंगलवार, 26 जनवरी 2021

प्राण ऊर्जा के असंतुलन के 10 लक्षण

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प्राण संस्कृत का शब्द है जिसका संबंध जीवन शक्ति से है। यदि आप जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता चाहते हैं तो प्राण ऊर्जा को संतुलित करना बहुत जरूरी है। जब हमारी प्राण ऊर्जा मजबूत होती है तो हम प्रसन्न, स्वस्थ और संतुलित महसूस करते हैं लेकिन यदि हमारी आदतें और जीवनशैली खराब हो तो प्राण शक्ति कमजोर हो जाती है। इसकी वजह खराब डायट, खराब जीवनशैली और नकारात्मक सोच है। ऐसा होने पर हमें शारीरिक और मानसिक स्तर पर कुछ लक्षण दिखाई देते हैं जो वास्तव में खतरे की घंटी है कि आपकी प्राण ऊर्जा कमजोर पड़ रही है।प्राण ऊर्जा का कार्यजब हम सांस लेते हैं हम प्राण ऊर्जा ग्रहण करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि हम तो ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं लेकिन आपको जानने की जरूरत है, प्राण शक्ति वो अनछुआ और अनदेखा एहसास है जो अध्यात्म में मौजूद तो है लेकिन इसे आप तभी महसूस कर पाएंगे जब आपका रुख अध्यात्म की तरफ होगा।ये जीवन शक्ति ऊर्जा के रूप में शरीर में फैलती है बिल्कुल वैसे ही जैसे नसों के जरिए खून संपूर्ण शरीर में दौड़ता है। यह प्राण शक्ति 7 चक्रों से होती हुई पूरे शरीर में बहती है ठीक उसी तरह जैसे रक्त सभी अंगों तक पहुंचता है। जब यह ऊर्जा ब्लॉक हो जाती है तो हमें कुछ शारीरिक और भावात्मक लक्षण दिखाई देते हैं। प्राण ऊर्जा के असंतुलन के 10 लक्षण 1. अत्यधिक थकान और आलस 2. तनाव और काम से थकान या चाहकर भी इसे नहीं बदल पाना 3. बार-बार नकारात्मक और हानिकारक विचार 4. प्रेरणा की कमी 5. जो भी चीज़ नकारात्मक लगे उसके प्रति फौरन और बार-बार भावात्मक प्रतिक्रिया देना 6. सिर दर्द और उलझन 7. जुकाम, एलर्जी या रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ा कोई विकार 8. परेशान रहना 9. पाचन तंत्र की परेशानी जैसे खराब पेट या डायरिया 10. सेक्सुअल दिक्कतें< ये 10 लक्षण यदि आपको अपने अंदर बार-बार दिख रहे हों और वो भी तब जब आपको कोई बड़ी बीमारी ना हो और आप चिकित्सीय रूप से स्वस्थ हों तब समझिए आपकी प्राण ऊर्जा को रिचार्ज करने की जरूरत है। sabhar :https://hindi.speakingtree.iin

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रोटी बनाने वाला रोबोट

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भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां आज भी तीनों वक्त का खाना गर्म खाया जाता है और जहां रोटी भी ताजा ही बनाई जाती है. मां के हाथ ही रोटी का स्वाद तो सबको पसंद होता है लेकिन आज कल की भाग दौड़ की जिंदगी में उस स्वाद के लिए कई बार लोग तरस जाते हैं. खास कर अगर महिला और पुरुष दोनों ही कामकाजी हों, तो खाना पकाने का वक्त कम ही मिल पाता है.इस समस्या से निपटने के लिए भारत में लोग रसोइये रख लेते हैं. लेकिन जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, उनके पास यह विकल्प भी नहीं है. उन्हीं को ध्यान में रखते हुए यह रोटी बनाने वाला रोबोट तैयार किया गया है. इसे बनाने वाली कंपनी का दावा है कि उनकी मशीन आटा गूंथने से ले कर, पेड़े बनाने, बेलने और रोटी को सेंकने तक का सारा काम खुद ही कुछ मिनटों में कर लेती है. हालांकि इसके दाम को देख कर लगता नहीं है कि बहुत लोग इसे खरीदेंगे. एक रोटी मेकर के लिए एक हजार डॉलर यानि 65 हजार रुपये तक खर्च करने होंगे. sabhar :www.dw.com

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सोमवार, 25 जनवरी 2021

दूरानुभूति परामनोविज्ञान

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क्या आप अपनी बातों को बिना मोबाईल, टेलीफोन या दूसरे भौतिक क्रियाओं और साधनों के दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। एक बारगी आप कहेंगे ऐसा संभव नहीं है, लेकिन यह संभव है। आप बिना किसी साधन के दूसरों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं यह संभव है दूरानुभूति से, एफडब्ल्यूएच मायर्स ने इस इस बात का उल्लेख किया है इसे टेलीपैथी भी कहते हैं। इसमें ज्ञानवाहन के ज्ञात माध्यमों से स्वतंत्र एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क में किसी प्रकार का भाव या विचार पहुंचता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक दूसरे व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं के बारे में अतींद्रिय ज्ञान को ही दूरानुभूति की संज्ञा देते हैं। परामनोविज्ञान में एक और बातों का प्रयोग होता है। वह है स्पष्ट दृष्टि। इसका प्रयोग देखने वाले से दूर या परोक्ष में घटित होने वाली घटनाओं या दृश्यों को देखने की शक्ति के लिए किया जाता है, जब देखने वाला और दृश्य के बीच कोई भौतिक या ऐंद्रिक संबंध नहीं स्थापित हो पाता। वस्तुओं या वस्तुनिष्ठ घटनाओं की अतींद्रिय अनुभूति होती है यह प्रत्यक्ष टेलीपैथी कहलाती है।टेलीपैथी के जरिए किसी को किसी व्यक्ति को कोई काम करने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है। ऐसा ही एक मामला तुर्की में आया है। यहां कुछ लोगों को टेलीपैथी के जरिए इतना विवश कर दिया गया कि उन्होंने आत्म हत्या कर लिया sabhar amarujala.com

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मानव मल से बनेगा सोना और खाद

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न्यूयॉर्क। भले ही यह सुनने में अजीब लगे, लेकिन सच है, क्योंकि अमेरिकी शोधकर्ता इंसान के मल से सोना और कई दूसरी कीमती धातुओं को निकालने में लगे हुए हैं। शोधदल ने अमेरिका के मैला निष्पादन संयत्रों में इतना सोना निकालने में कामयाबी हासिल की है जितना किसी खान में न्यूनतम स्तर पर पाया जाता है। एक अंग्रेजी वेबसाइट पर छपी खबर के मुताबिक डेनवर में अमेरिकन केमिकल सोसायटी की 249वीं राष्ट्रीय बैठक में मल से सोना निकालने के बारे में विस्तार से बताया गया है यूएस जिओलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) के सह-लेखक डॉक्टर कैथलीन स्मिथ के मुताबिक हमने खनन के दौरान न्यूनतम स्तर पर पाई जाने वाली मात्रा के बराबर सोना कचरे में पाया है। उन्होंने बताया कि इंसानी मल में सोना, चांदी, तांबा के अलावा पैलाडियम और वैनेडियम जैसी दुर्लभ धातु भी होती है।शोधदल का मानना है कि अमेरिका में हर साल गंदे पानी से 70 लाख टन ठोस कचरा निकलता है। इस कचरे का आधा हिस्सा खेत और जंगल में खाद के रूप में उपयोग मे लिया जाता है बचे हुए आधो हिस्से को जला दिया जाता है या फिर जमीन भरने के काम में ले लिया जाता है।

धातु निकालने के लिए औद्योगिक खनन प्रक्रियाओं में जिस रासायनिक विधि का प्रयोग किया जाता है वैज्ञानिक उसी विधि से कचरे से धातु निकलने का प्रयोग कर किया जा रहा है। इससे पहले वैज्ञानिकों के एक दूसरे दल ने अनुमान कि आधार पर बताया था कि दस लाख अमेरिकी जितना कचरा पैदा करते हैं उस कचरे में से एक करोड़ तीस लाख डॉलर की धातु निकाली जा सकती है। मल त्यागना हम सबकी दिनचर्या का हिस्सा है. लेकिन क्या इंसानी मल किसी काम आ सकता है? बिल्कुल. जर्मनी में रिसर्चर कहते है कि इससे खाद बनाया जा सकता है जिसका खेती में इस्तेमाल किया जा सकता है. देखिए ये कैसे संभव होता है. sabhat webdunia dw.de

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रविवार, 24 जनवरी 2021

इंसान मशीन में बदल जायेगा

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आने वाले समय में इंसान में मशीन का कम्बीनेशन एक साथ हो सकता है कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.पूरी तरह रोबोटिकआइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.हाथों से शुरु जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप. बेहद सटीक डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने में कामयाबी पाई और इसे एक्सो-स्केलेटन में भी डाल सके रूस का रिमोट कंट्रोलकेवल जर्मन ही नहीं, रूसी रिसर्चर भी रिमोट कंट्रोल सिस्टम वाले एक्सो-स्केलेटन बना चुके हैं. डीएफकेआई ब्रेमन के रिसर्चरों को 2013 में रूसी रोबोट को देखने का अवसर मिला. इसके अलावा रूसी साइंटिस्ट भी आइला रोबोट पर अपना हाथ आजमा चुके हैं.बिल्कुल असली से हाथदुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है. भार ढोएंगे रोबोटिक पैर डीएफकेआई 2017 से रोबोटिक हाथों के साथ साथ पैरों का एक्सो-स्केलेटन भी पेश करेगा. यह इंसान की लगभग सभी शारीरिक हरकतों की नकल कर सकेगा. अब तक एक्सो-स्केलेटन को पीठ पर लादना पड़ता था, लेकिन भविष्य में रोबोट के पैर पूरा बोझ उठा सकेंगे.लकवे के मरीजों की मदद इन एक्सो-स्केलेटनों का इस्तेमाल लकवे के मरीजों की सहायता के लिए हो रहा है. ब्राजील में हुए 2014 फुटबॉल विश्व कप के उद्घाटन समारोह में वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी उपलब्धि को पेश किया था. आगे चलकर इन एक्सो-स्केलेटन में बैटरियां लगी होंगी और इन्हें काफी हल्के पदार्थ से बनाया जाएगा. फिलहाल इन एक्सो-स्केलेटन की अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता का परीक्षण त्रिआयामी सिमुलेशन के द्वारा किया जा रहा है. इन्हें लेकर एक महात्वाकांक्षी सपना ये है कि ऐसे रोबोटों को दूर दूर के ग्रहों पर रखा जाए और उनका नियंत्रण धरती के रिमोट से किया जा सके. भविष्य में खतरनाक मिशनों पर अंतरिक्षयात्रियों की जगह रोबोटों को भेजा जा सकता है.बिल्कुल असली से हाथ दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे और सफल भी रहे sabhar dW.COM

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"हल्दी और एंटीबायोटिक्स का मिश्रण कई गुना उपयोगी

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भारत के हैदराबाद विश्वविद्यालय और रूस के नोवोसिबिर्स्क राजकीय विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना के अंतर्गत ऐसी दवाइयां तैयार करने के काम में जुटे हुए हैं जिनके लिए हल्दी सहित अन्य पारंपरिक भारतीय मसालों का उपयोग किया जा सकता है। नोवोसिबिर्स्क राजकीय विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई एक सूचना के अनुसार, "प्रोफेसर अश्विनी नानिया के नेतृत्व में हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अगर हल्दी और एंटीबायोटिक्स को मिलाकर क्रिस्टल बनाए जाएं और आगे इन क्रिस्टलों को पीसकर दवाइयां बनाई जाएं तो ऐसी दवाइयों का असर कई गुना बढ़ जाएगा।"इस परियोजना में शामिल रूसी वैज्ञानिकों का नेतृत्व नोवोसिबिर्स्क राजकीय विश्वविद्यालय के ठोस रसायनिक विज्ञान विभाग की प्रमुख और इस विश्वविद्यालय की एक वरिष्ठ शोधकर्ता, प्रोफेसर ऐलेना बोल्दरेवा कर रही हैं। sabhar : sputanik news

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शनिवार, 23 जनवरी 2021

पहली जीरो बजट फिल्म

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बॉलीवुड क्या हॉलीवुड के इतिहास में भी कभी कोई जीरो बजट फिल्म नहीं बनी लेकिन लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होने वाला यह कारनामा कर दिखाया कुछ युवाओं ने इन युवाओं ने सोचा कि कुछ ऐसा क्यों ना किया जाए जो हॉलीवुड और बॉलीवुड में कभी ना किया गया हो नतीजे के तौर पर दुनिया की पहली जीरो बजट मूवी लो हो गई पार्टी बनकर सामने आई लेखक निर्देशक तेजस हरपालिया के निर्देशन में अनिरुद्ध दवे वैदेही हमेशा परेश भट्ट मानव वासवानी और लुविना भाटिया जैसे युवाओं ने बिना एक पैसा लिए दिन रात एक कर के इस फिल्म को बनाई थी इसमें सतीश कौशिक और मनोज ऐसे मनोज जोशी जैसे वरिष्ठ कलाकारों का सहयोग इन युवाओं को मिला इस फिल्म में जो घर दिखाया गया वह अनुरोध जगह का है फिल्म के तकनीकी पक्ष में कई वर्ष तक नीचे उन्होंने बिना किसी पैसे के सहयोग किया है उल्लेखनीय है कि तेजस 
 मोबाइल मूवी बनाकर अपना नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करा चुकी है

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गुरुवार, 21 जनवरी 2021

अस्कोट के पालों का प्रभुत्व

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ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह तथ्य सामने आता है कि अस्कोट राज्य की स्थापना सन 1238 ई. में हुई और यह 1623 ई. तक स्वतंत्र रूप में विद्यमान रहा। अपनी स्थिति एवं विशिष्टता के कारण यह कत्यूरी, चन्द, गोरखा व अंग्रेजी शासन के बाद स्वतंत्र भारत में जमींदारी उन्मूलन तक रहा।अस्कोट परगना महा व उप हिमालयी पट्टी के मिलन पर बना एक विस्तृत भू-खण्ड है, जिसमें छिपला एवं घानधुरा जैसे सघन वनों से आवृत्त पर्वत मालायें, गोरी, काली, धौली नदियों की गहरी घाटियों के क्षेत्र और आकर्षक सेरे मानव बसाव के लिये उपयुक्त रहे। अस्कोट काली जल-ग्रहण क्षेत्र में पड़ता है। इसमें छिपला से उतरने वाली अनेक छोटी नदियाँ जैसे मदकनी, बरमगाड़, रौंतीसगाड़, चरमगाड़, चामीगाड़, गुर्जीगाड़ के ढालों में भी काश्त के लिये सीढ़ीदार उपजाऊ खेत और इन खेतों से लगे छोटे-छोटे बनैले गाँव आकर्षण का कारण बनते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से अस्कोट एक सम्पन्न परगना माना जा सकता है।अभिलेखों में बंगाल, काबुल, कटोर, कश्मीर, देव प्रयाग, टिहरी गढ़वाल एवं बैजनाथ के पाल मुख्य हैं। विभिन्न स्थानों से पालों के अभिलेख उपलब्ध होने से पालों के साम्राज्य का सन्दर्भ सहज प्राप्त होता है। इस दृष्टि से अस्कोट राज्य के पाल वंश का सन्दर्भ उकु, देथला, विण (नेपाल), घुईसेरा (घुन्सेरा), बत्यूली, बचकोट, रावलखेत (मुवानी), भिसज (भेटा), सिंगाली एवं ऊँचाकोट से प्राप्त ताम्रपत्रों से मिलता है। इसके साथ ही अस्कोट राज्य के तिब्बत व नेपाल में फैले प्रभाव का भी पता चलता है। अस्कोट के पालों का प्रभुत्व 13वीं से लेकर 16वीं शताब्दी तक दिखता है। अंग्रेजी शासन काल में वे 154 गाँवों के मुआफीदार की हैसियत पा रहे थे।अस्कोट के पाल वंश के पूर्वज बैजनाथ (कत्यूर घाटी) से आये थे। रजबारों की अपनी रागभाग के अनुसार दो तीर्थयात्री श्री शैल तथा मल्लिकार्जुन दक्षिणी भारत से कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिये अस्कोट मार्ग से गये। तिब्बत में ये यात्री डाकुओं द्वारा लूट लिये गये और कठिन परिस्थितियों के बीच वे कत्यूरी नरेश त्रिलोक पाल देव के पास पहुँचे। श्री शैल तथा मल्लिकार्जुन ने क्षेत्र की दयनीय स्थिति व सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी उन्हें दी और इस व्यवस्था को निष्कंटक करने के लिये एक युवराज की माँग की। राजा त्रिलोकपाल देव ने अपने सबसे छोटे पुत्र अभय देव को नीमनाथ, जोगेश्वर एवं भ्यूराज पाण्डे के साथ इस क्षेत्र की रक्षा के लिये भेजा।अस्कोट राज्य का संस्थापक अभय देव को माना जाता है। एट्किंसन और बद्रीदत्त पाण्डे अस्कोट राज्य की स्थापना शाके 1201 सन 1279 ई. मानते हैं, किन्तु कुछ इतिहासकार साक्ष्यों के अभाव में अभयपाल को अस्कोट राज्य का वास्तविक संस्थापक नहीं स्वीकारते हैं। वे उकु के शिलालेख को ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हुए नागपाल को वास्तविक संस्थापक के रूप में देखते हैं। इस शिलालेख से स्पष्ट होता है कि इस राज्य की स्थापना शाके 1160 सन 1238 में ही हो गयी थी। उकु शिलालेख में त्रिविक्रम राजा नागपाल देव का वर्णन है। घुन्सेरा ताम्रपत्र में राजा भारथी पाल ने नागपाल को अपना पूर्ववर्ती राजा माना है। इस तरह यह स्पष्ट है कि नागपाल ने ही अस्सी खस राजाओं के प्रभाव को हटाकर अस्कोट राज्य की स्थापना की। शायद इसीलिये यह क्षेत्र अस्सी कोटों से मिलकर अस्कोट कहलाता रहा।पाल राजाओं के अन्य महत्त्वपूर्ण अभिलेखों में निर्भय पाल का बत्यूली अभिलेख शाके 1275 सन 1353 ई., भारथी पाल का घुन्सेरा ताम्र पत्र शाके 1316 सन 1394, तिलकपाल का बचकोट ताम्रपत्र शाके 1343 सन 1421, रजबार कल्याण पाल का भीषज भेटा ताम्रपत्र शाके 1525 सन 1603, रजबार महेन्द्र पाल का क्रमशः सिंगाली ताम्रपत्र शाके 1544 सन 1622 और ऊँचाकोट ताम्रपत्र शाके 1543 सन 1623 ज्ञात हैं।इन अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि 375 वर्षों तक अस्कोट स्वतंत्र राज्य के रूप में विद्यमान था। स्वतंत्र शासक ही भूमिदान सम्बन्धी ताम्रपत्र दिया करते थे। इन ताम्रपत्रों से इस राज्य की प्रारम्भिक राजधानी उकु के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त होती है। इसी ताम्रपत्र के अनुसार राजा भारथी पाल ने घुन्सेरा गाँव के भतभाट को अपने पूर्ववर्ती राजाओं के समान निर्वहन करने के अधिकार निर्गत किये थे। इन ताम्रपत्रों से राजाओं की उपाधियों का भी ज्ञान होता है। जैसे नागपाल ने अस्कोट राज्य की स्थापना के बाद ‘त्रि-विक्रम’ की उपाधि धारण की थी। निर्भय पाल ने ‘रायताराम्रगांग परम महीश्वर राजाधिराज महाराज’ की उपाधि ग्रहण की थी। यह क्रम बाद में रजबार के रूप में जाना जाने लगा था, क्योंकि बाद के शासकों जैसे भारथीपाल, तिलकपाल, कल्याणपाल, महेन्द्रपाल के नाम के आगे रजवार उपाधि लिखी जाने लगी थी किन्तु महेन्द्रपाल ने सिंगाली ताम्रपत्र में अपनी उपाधि रजबार के साथ ‘राजाधिराज महाराज’ भी लिखी थी।अस्कोट के पाल रजबार सूर्यवंशीय एवं सौनव गोत्री माने जाते हैं। मूल कत्यूरी साम्राज्य 14वीं सदी में आन्तरिक व बाह्य परिस्थितियों के कारण विघटित हो चुका था। कत्यूर राज के अन्तर्गत विभिन्न छोटे राज्यों ने अपनी स्वतंत्र ठकुराइयाँ स्थापित कर ली थीं। सम्भवतः तभी इस स्वतंत्र राज्य के शासकों ने अपने को श्रेष्ठ मानते हुए रजबार घोषित कर दिया होगा। इस तरह का उदाहरण उकु शिलालेख में भी मिलता है कि राजा नाग ने ‘देव’ से ‘पाल’ पदवी धारण कर ली थी। सहण पाल के बोध गया लेख से यह ज्ञात होता है कि 13वीं सदी में पाल कोई जातीय शब्द नहीं था। सहण पाल ने अपने पिता का नाम चाटब्रह्म तथा पितामह का नाम ऋषिब्रह्म कहा है।ताम्रपत्रों के अध्ययन से पालों की नयी वंशावली का सृजन सन 1238 से सन 1613 ई. तक होता है। अस्कोट की पाल वंशावली में 108 पीढ़ी तक के नाम सुरक्षित हैं। नामों के क्रम में भूल-चूक हो सकती है लेकिन पीढ़ी की संख्या में नहीं।अस्कोट के शासक भी मंत्री का पद ब्राह्मणों के लिये सुरक्षित रखते थे। प्रारम्भिक समय में ओझा मंत्री और राजगुरु के पद पर थे। सन 1588 ई. में राजा रायपाल श्री गोपी ओझा द्वारा मारे गये। ओझा जाति के इस कृत्य के बाद राजगुरु का पद छीनकर वास्थी (अवस्थी) ब्राह्मणों को दे दिया गया। बड़े पुत्र को राजगद्दी मिलती थी। युवराज को ‘लला’ तथा विरादरों को ‘गुसाईं’ कहते थे। जगराज पाल का यह मानना है कि अस्कोट राज्य में पहले प्रतिष्ठित ब्राह्मण भट्ट थे, जिन्हें कत्यूरी युग में परम भट्टारक भी कहा जाता था। विविध ब्राह्मण पाँचवी-छठी शताब्दी के बाद ही उत्तराखण्ड में आये और अपने को उच्च श्रेणी का घोषित कर राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर आ गये। अनुश्रुतियों के आधार पर अस्कोट परगने में पटवारी एवं तहसीलदार का पद ब्राह्मण खानदान वालों को मिलता रहा। राजा रूप चन्द के समय कुँवर गुरु गुसाईं को दारमा व जोहार का बन्दोबस्ती ऑफीसर व शासक बनाया गया था। संसाधनरजबारों के पास आय के साधनों में काश्त की गई भूमि, जंगल, खान एवं खनिज थे। विभिन्न ताम्रपत्रों से लगान एवं करों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। ‘छत्तीस रकम बत्तीस कलम’ वाली प्रथा कायम थी। ताम्रपत्रों से घोड़ालो, कुकरालों, (घोड़ों एवं कुत्तों पर कर), चराई कर, भराई कर, दसौत एवं विसौत के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। बेलवासो, कल्लो आदि करों को भी कड़ाई से वसूल किया जाता था। राज्य में प्रत्येक ब्यायी गाय-भैंस पर भी कर लिया जाता था। गोरखा युग में ‘रसून’ को घी कर कहा जाने लगा था। ‘ज्यूलिया’ (झूलिया) नदी पार करते कमय पुलों पर लिया जाने वाला कर था। ‘बैकर’ राजदरबार में अन्न के रूप में ली जाने वाली भेंट, राजा के दर्शन करने पर राजा को दी जाने वाली राशि या नजराना, ‘सिरती’ राजा को दी जाने वाली नकद राशि थी, जिसे कालान्तर में ‘रकम’ भी कहा जाता था। सेना के लिये जाने वाले कर को ‘कटक’ या स्यूक कहा जाता था। भूमिदान प्राप्तकर्ता को ‘डणै’ एवं पालकी के साथ अन्य करों से भी मुक्त रखा जाता था।सन 1588 ई. में अस्कोट राज्य की स्थिति बिगड़ने से इसका सीधा प्रशासन राजा रूप चन्द के पास आ गया था। रूप चन्द ने ही 300 रुपये वार्षिक कर पर कुँवर महेन्द्र पाल को अपना करद राजा बनाया। गोरखों ने मालगुजारी बढ़ाकर 2000 वार्षिक कर दी थी। अंग्रेजी शासनकाल में सन 1815 ई. में गार्डनर ने कुमाऊँ के साथ अस्कोट का पहला बन्दोबस्त किया था। यह बन्दोबस्त गोरखा अधिकारियों द्वारा गत वर्ष वसूल की गई वार्षिक वसूली पर आधारित था। नई बात यह थी कि वसूली गोरखाली सिक्कों एवं जिन्सों के रूप में न होकर फरूखाबादी रुपयों में होने लगी थी। सन 1817 में दूसरा, 1818 में तीसरा, 1820 में चौथा तथा 1823 में पाँचवा बन्दोबस्त ट्रेल ने किया। इसे अस्सी साला बन्दोबस्त के नाम से जाना जाता है। सन 1829 में छठा, 1832 में सातवाँ, 1833-34 में आठवाँ भूमि बन्दोबस्त हुआ था। नवाँ भूमि बन्दोबस्त बैटन द्वारा किया गया था। 10वाँ बैकेट द्वारा 1863 में किया, जो 1873 तक चला। इसे तीस साला बन्दोबस्त भी कहा गया। डोरी पैमाइश के आधार पर सर्वे की गई, फाट खाता, रकबा, मुन्तखिव तैयार किया गया। गाँव की दर उपजाऊ, दोयम आदि को जमीन की किश्त माना गया।11वाँ बन्दोबस्त मि.गूँज ने करवाया। सन 1940-41 में परगने का 12वाँ बन्दोबस्त हुआ। गोबिन्दराम काला सहायक बन्दोबस्त अधिकारी थे। उन्होंने परगने में प्लेन टेबुल सर्वे करायी। नये बन्दोबस्त के फलस्वरूप परगने की मालगुजारी 7596 रुपये आयी। किन्तु रजबार अस्कोट पर कुल रकम 5000 रुपये सालाना 40 वर्ष के लिये पिछले बन्दोबस्त में तय की गई थी। इस बन्दोबस्त की यह विशेषता थी कि इसे मात्र अस्कोट परगने में ही करवाया गया था। संख्या के हिसाब से अगला बन्दोबस्त 1964-65 में करवाया गया। अस्कोट रजबार अपने खायकरों एवं सिरतानों से बेगार भी लेते थे। यह बेगार गोरखा युग में बहुत अधिक चलन में आ गयी थी। अंग्रेजी शासन के आने पर अस्कोट परगने की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव आया और शासन पर अंग्रेजों का अंकुश बढ़ गया। इस पर भी अस्कोट के राजनैतिक महत्व को स्वीकारते हुए इसे विशेष स्थान मिलता रहा। अंग्रेजों से प्राप्त शक्तियों का दुरुपयोग रजबारों द्वारा अनेक अवसरों पर किया गया और यों भी इस क्षेत्र की गरीब जनता पर रजबार का आतंक, शोषण, उत्पीड़न किसी से छिपा नहीं है। शासन की दोहरी प्रणाली के कारण ही इस इलाके के उत्पीड़ित किसानों ने सन 1936-37 ई. में रजबार के विरुद्ध जन आन्दोलन खड़ा किया और तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व ने इस आन्दोलन को महत्व दिया और तत्कालीन रजबार को परिस्थितियों में सुधार के लिये निर्देशित व बाध्य किया पड़ोस तथा प्रजा पाल रजबार के अपने पड़ोसी राज्यों से महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध रहते थे। उनके निकटस्थ परगने दारमा, जोहार तथा तिब्बत, नेपाल, बजांग, मणिकोट, सोर तथा सीरा आदि राज्य थे। शाके 1275 में सीरा के मल्लों का प्रभाव निर्भयपाल ने कम किया था तथा बत्यूली ग्राम के रत्तू जोशी को भूमि दान में उपरोक्त गाँव देकर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया था। समय-समय पर सीमाओं का विस्तार भी इनके द्वारा किया गया। सोर परगने से लगे गाँव घुन्सेरा में भी इन्होंने अपना अधिकार कर लिया था। कभी रजबार उचित चिकित्सा के कारण भी भू-दान किया करते थे, जैसे शाके 1525 सन 1603 में रजबार कल्याण पाल और चम्पावत के राजा लक्ष्मण चन्द के सामूहिक रूप से भिषज ग्राम के महानन्द वैद्य को उचित चिकित्सा के फलस्वरूप भूमि दान किया था।अस्कोट का समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा शूद्र वर्गों में विभाजित था। यही जातियाँ व्यापार भी करती थीं। वैश्य जाति अलग से नहीं थी। प्राचीन परम्परागत नियमों के अनुसार पाल वंश के सबसे बड़े पुत्र को राजगद्दी प्राप्त होती थी। राजगद्दी के लिये कई बार राज्य में झगड़े की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी। रजबार के अन्य भाइयों की सन्तानें रजबार से प्राप्त गाँवों में बस जाती थीं और यही गाँव उनकी आजीविका के साधन होते थे। यह क्षेत्र शौका तथा राजी समुदायों का निवास स्थल था। राजी व छिपला के जंगलों में निवास करते थे। यहाँ बौद्ध, इस्लाम तथा सिक्ख धर्मावलम्बी गिने-चुने थे। सन 1850 ई. में अजिमुल्ला शेख काशीपुर से व्यापार के लिये अस्कोट आये थे। इनकी तिजारत अस्कोट के साथ सीमान्त तक थी। सन 1886 ई. में घासी शेख नाम के एक-दूसरे व्यापारी यहाँ आये। वे हकीम भी थे और जानवरों की भी औषधि किया करते थे। पुष्कर पाल के समय में ही इन्होंने अस्कोट और जौलजीवी में मस्जिद बनाने के लिये जगह ली थी। मुस्लिम व्यापारी वर्ष में एक बार रजबार को खाना व भेंट दिया करते थे।स्वामी प्रणवानन्द के अनुसार इन तिजारती मुस्लिमों ने यहाँ स्थानीय हरिजन स्त्रियों से विवाह किया, जिससे यह स्त्रियाँ स्वतः ही इस्लाम धर्म में आ गईं। सन 1870-71 में अस्कोट में आने वाली पहली गौरांग महिला डॉ. ब्रूमन थी। इसके साथ डॉ. हल्कू विल्सन भी आया था। सन 1874 में मि. ग्रे इस क्षेत्र में आये थे। बाद के वर्षों में ई.वी. स्टाईनर और इनकी पत्नी इली शिवा स्टाईनर भी यहाँ पहुँची। इन्डो तिब्बतन फ्रंटियर इविंजिकल एलाइन्स मिशन के नाम से इन्होंने काम किया। यद्यपि जितने भी मिशन यहाँ आये, उनका उद्देश्य धर्म प्रचार ही नहीं, तिब्बत व नेपाल की राजनैतिक गतिविधियों पर भी दृष्टि रखना था। इन मिशनरीज ने चिकित्सा सेवा का काम धर्म समझकर किया। ईसाई धर्म का पाल वंश तथा यहाँ के लोगों पर हल्का प्रभाव पड़ा। भूपेन्द्र सिंह पाल ने ईसाई धर्म ग्रहण किया था। भोट प्रदेश के मदन सिंह सिर्ताल ने भी ईसाई धर्म अपनाया था, जो धारचूला में स्थित चर्च के पादरी भी रहे। रजबार टिकेन्द्र के भाई चित्तवन पाल ने डच महिला से विवाह किया यात्रापथ एवं व्यापार कैलास मानसरोवर का परम्परागत यात्रापथ इसी परगने से होकर जाता था किन्तु अस्कोट में यात्रा पथों व सम्पर्क मार्गों की स्थिति बड़ी दयनीय थी। रजबार कैलास मानसरोवर यात्रा में जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिये अनेक सुविधायें दिया करते थे लेकिन इस क्षेत्र में पड़ने वाले कठिन मार्गों में पड़ाव स्थलों पर किसी प्रकार की आवास सुविधा नहीं दी गई थी। निष्कंटक यात्रा पथों का निर्माण न किया जाना रजबारों की अपने क्षेत्र व रियाया के प्रति तटस्थता को उजागर करता है। उनके लिये आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ तक उपलब्ध कराने की कोई सोच इनके पास न थी। इन्हें तो सीधे-सीधे उन सेवाओं की जरूरत थी, जो इनके रजवाड़े की आय को बढ़ाते थे।अस्कोट का क्षेत्र वनों, खनिज एवं खानों के लिये प्रसिद्ध रहा है। तांबे की खानों के होने की जानकारी इस क्षेत्र के लोगों को थी। द्वालीसेरा गाँव के पारकी जाति के लोग बालू से सोना शोधन की प्रक्रिया जानते थे। यद्यपि यह सोना शुद्धता की दृष्टि से उत्तम नहीं माना जाता था, फिर भी रसकपूर से इसकी शुद्धि के कारण इसे 16 आने की जगह 12 आने के मूल्य पर खरीदा जाता था। रजबार इस पर 5वाँ हिस्सा कर वसूल करता था। इस इलाके में हाथ से निर्मित वस्त्र, तिब्बती ऊन से बनने वाले थुलमे, चुटके, दन, पशमीने, कालीन आदि का निर्माण शौका प्रवासियों के द्वारा किया जाता था और इनका विपणन ये शौका व्यापारी दूर-दूर तक गाँवों तथा जौलजीवी जैसे मेलों में भी किया करते थे। इन्हीं शौका व्यापारियों द्वारा अस्कोट के सुदूर गाँवों में नमक की तिजारत की जाती और इसके बदले अनाज एकत्र किया जाता, जिसे ये तिब्बत की मण्डियों तक पहुँचाते। राजियों द्वारा इस क्षेत्र में लकड़ी के बरतन, ठेकी, माने, बिण्डे, मथनी, हल आदि बनाये जाते थे। अस्कोट क्षेत्र में रिंगाल की चटाइयाँ, मोस्टे, पुतके, डोके, डालियाँ भी छिटपुट रूप से बनायी जातीं या इन आवश्यक सामानों को यहाँ के किसान के डोटी (नेपाल) के लोगों से अदल-बदलकर प्राप्त कर लेते थे लोक देवता तथा संस्कृति अस्कोट एवं नेपाल दोनों में मल्लिकार्जुन महादेव की पूजा परम्परागत रूप से की जाती थी। रजबार मल्लिकार्जुन महादेव को अपना इष्टदेव मानते थे। अकु, देथला और नेपाल में भुवनेश्वरी देवी को अपनी कुल देवी मानने की परम्परा विद्यमान थी। अस्कोट के पाल कनार देवी को भी अपनी कुलदेवी मानते थे। साह एवं पोखरिया जाति के लोग हुष्कर को अपना इष्ट मानते हैं। गर्खा, डांगटी या अन्य स्थानों पर पोखरिया जाति के लोग औंतलेख में जात ले जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। इस परगने में स्त्रियों का विशेष त्यौहार गमरा था। नाथ पन्थ के प्रवर्तकों के रूप में पूजित मलयनाथ, गंगनाथ, हरू, सैम, जगन्नाथ, छुरमल आदि स्थानीय देवताओं की उपासना की जाती थी। कुछ विशेष तथ्यों को लेकर रजबारों का दृष्टिकोण सहिष्णु था। होली, दीपावली तथा रक्षाबन्धन आदि उत्सव देवल दरबार में विशेष रूप से मनाये जाते थे। खान-पान, रीति-रिवाज एवं धार्मिक तथा सामाजिक परम्पराओं को रजबार विशेष मान्यता देते थे। जनेऊ संस्कार के बाद पुत्र अपनी माँ और विवाहित पुरुष अपनी पत्नी के हाथ का भोजन नहीं करते थे। खान-पान के नियम इतने कड़े थे कि तिब्बत यात्रा में खड़क सिंह पाल, जो तिब्बत में पॉलिटिकल एजेन्ट थे, के लिये रसोइया लकड़ी को धोकर भोजन बनाता था।अस्कोट परगने के विभिन्न स्वरूपों के साथ की सांस्कृतिक छटा भी वर्णनीय है। विभिन्न प्रकार के लोक वाद्य यंत्रों द्वारा लोक नृत्य, छोलिया, हिरण चित्तल, जागर, हिल जात्रा, झोड़े, चाँचरी, भगनौले गाकर अपना मनोरंजन किया करते थे। हाट एवं मेलों में भी यहाँ की सांस्कृतिक छटा देखने को मिलती है। छिपलाकेदार, कनार एवं हुस्कर की जात यात्रा धार्मिक एवं सांस्कृतिक मानी जाती है। जौलजीवी मेला आज भी इस परगने का प्रमुख मेला है। सन 1970 तक यह मेला उत्तर भारत का प्रमुख मेला था जहाँ सेंधा नमक, ऊन, स्वर्ण चूर्ण, शहद, सुहागा, सैमूर की खालें तथा तिब्बती घोड़े, चँवर गाय की पूँछ, सोने-चाँदी का लाखों रुपये का व्यापार होता था। धीरे-धीरे यह सिमटकर मात्र सरकारी मेला बनकर रह गया है, जिसमें आज से 50 वर्ष पूर्व की रौनक देखने को नहीं मिलती है।प्राचीन धरोहर को परम्परागत रूप से यहाँ सुरक्षित रखा गया है। देवल दरबार में खण्डित सूर्य प्रतिमा, शेषशायी नारायण की प्रतिमा, जिसे विरणेश्वर भी कहा जाता है तथा दशावतार फलकों में विष्णु के 10 अवतारों से चिन्हित मूर्तियाँ भी देवल दरबार में हैं। चतुर्भुज, नारायण मूर्ति के शीर्ष फलक में ध्यानावस्थित गंगा तथा चतुर्मुखी शिवलिंग के साथ उकु में हनुमान की नमस्कार एवं उत्कृष्टासन में बैठी मूर्ति भी महत्त्वपूर्ण है। पगड़ीधारी यक्ष की मूर्ति, उदीच्य वेषधारी सूर्यमूर्ति तथा 40 पंक्तियों का एक शिलालेख भी अकु के मन्दिर की विशेषता है। बलुवाकोट में रखी देवी की प्रतिमा भी काफी प्राचीन मालूम पड़ती है। अस्कोट परगने में अनेक गाँवों में हरगौरी तथा गणेश प्रतिमाओं तथा अस्कोट के पुराने महल में दरवाजे एवं खिड़कियों के पल्ले में गणेश प्रतिमा का अंकन अद्वितीय है। सन्दर्भ : इस लेख में मैंने अपने शोध प्रबन्ध के अलावा एटकिंसन, बद्रीदत्त पाण्डे, प्रणवानन्द के ग्रन्थों, अस्कोट सेटलमेंट रिपोर्ट, पहाड़ के अंकों तथा अभिलेखागार की सामग्री का उपयोग किया है। साथ ही, श्री गजराज पाल, श्री राजेन्द्र सिंह पाल, मियाँ हामिद से पत्राचार और भेंटवार्ता द्वारा प्राप्त सामग्री से भी सहायता ली है। sabhar https://hindi.indiawaterportal.org

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नमक का स्थान ले सकता है समुद्री शैवाल

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आप अगर आप को नमक का सेवन करना है तो आप उसकी जगह समुद्री शैवाल का इस्तेमाल कर सकते हैं वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री शैवाल के दानों ग्रेनल का इस्तेमाल अधिक नमक खाने से होने वाली परेशानियों को दूर कर सकता है ब्रिटेन के से फील्ड हां लायन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि समुद्री शैवाल के दानों को खाने में मिलाने से अच्छा स्वाद आता है और उसमें नमक की मात्रा कम होती है दूसरी तरफ अधिक नमक के इस्तेमाल से प्रत्येक वर्ष दुनिया में हजारों लोगों के असमय मौत हो जाती है वैज्ञानिकों का दावा है कि ब्रेड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में नमक की जगह इसका इस्तेमाल करने से उच्च रक्तचाप हृदयाघात और मृत्यु के खतरे से बचा जा सकता है शैवाल का नमक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल तो बहुत इसका एकमात्र पहलू है सवाल में बहुत गुण है इसमें समुद्री सेवा में बड़ी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जिससे पेट भरा हुआ महसूस होता है इसलिए मोटापा घटाने में भी सहायक है इसलिए यह मोटापा घटाने में भी सहायक है जिन वैज्ञानिकों ने इस परियोजना पर शोध किया उन्होंने पाया कि सहवाग के दानों में सोडियम का स्तर मात्र तीन 3.5 था जैविक खाद उद्योगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले मन में यह 40% था वैज्ञानिकों का मानना है कि सवाल जो कि लंबे समय से चीन और जापान के भोजन में शामिल है बढ़ती जनसंख्या को नया भोजन स्रोत उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है वैज्ञानिक आर्कटिक में पाए जाने वाले शैवाल के ग्रैनुअल के लिए व्यवसायिक आपूर्तिकर्ता से बातचीत कर रहे हैं और ब्रिटेन के पांच प्रमुख सुपर मार्केट में से दो इसका इस्तेमाल ब्रेड में करने का विचार कर रहे हैं विशेषज्ञों का कहना है कि 11 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को 1 दिन में 6 ग्राम से अधिक नमक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए

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170 वर्ष बाद मिली अंधेरे में चमकने वाली मशरूम

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ब्राजील के वर्षा वनों में वैज्ञानिकों को फिर से वह मशरूम मिल गई है जो 1840 के बाद से नहीं देखी गई थी इस चमकदार मशरूम की खोज सन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस डेस जार्डिन और उनकी टीम द्वारा की गई है या मशरूम अंधेरे में इतनी तेजी से चमकती है कि उसके प्रकाश में अखबार पढ़ा जा सकता है शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इसकी खोज के बाद वे इस बात का पता लगाने में सफल होंगे कि क्यों कुछ फंगस में चमकने की क्षमता होती है वैज्ञानिकों ने इस मशरूम को फिर से नियमों को पाना गार्डनर के नाम से वर्गीकृत किया है न्यू नोट ओपनस गार्डनर को आखरी बार 1840 में ब्रिटिश वनस्पति विज्ञानी जॉर्ज गार्डनर ने तब देखा था जब कुछ बच्चे इस प्रकार चमकदार मशरूम से खेल रहे थे इस मशरूम के हरे प्रकाश का पता लगाने के लिए डॉ डेस जारटिन और उनके सहयोगियों को कई सप्ताह तक अंधेरी रातों में ब्राजील के जंगलों में भटकना पड़ा तथा डिजिटल कैमरों की मदद से वे रात में चमक रहे इस मशरूम की फोटो कैमरे में उतारने में सफल रहे जेलीफिश और जुगनू ऐसे ही कुछ जंतु है जो चमक पैदा करते हैं बैटरी ओं से संगी संगी और मछली से की रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा इस तरह चमक पैदा करते हैं लेकिन खोजे के मसलों को लेकर अभी यह स्पष्ट नहीं है या किस प्रकार अंधेरे में चमक पैदा करता है

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वैज्ञानिकों ने विकसित किया इलेक्ट्रॉनिक पौधा, विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत "

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लन्दन में ;वैज्ञानिकों ने पौधे के संवहन तंत्र में सर्किट लगाकर एक इलेक्ट्रॉनिक पौधे का निर्माण किया है। इससे विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत हो सकती है।स्वीडन के लिकोंपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के दल ने पौधों के अंदर लगाए गए तारों, डिजिटल लॉजिक और प्रदर्शनकारी तत्वों को दिखाया गया है, जो आर्गेनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के नए अनुप्रयोगों और वनस्पति विज्ञान में नए उपकरण विकसित करने में मददगार हो सकते हैं।उमीआ प्लांट साइंस सेंटर के निदेशक और प्लांट रिप्रोडक्शन बायलॉजी के प्रोफेसर ओव निल्सन ने कहा, इससे पहले वैज्ञानिकों के पास जीवित पौधे में विभिन्न अणुओं के सकेंद्रण को मापने के लिए कोई अच्छा उपकरण नहीं था, लेकिन इस शोध के बाद हम पौधों का विकास करने वाले उन विभिन्न पदार्थो की मात्रा को प्रभावित करने में सक्षम हैं।शोधकर्ताओं ने कहा, पौधों में रासायनिक मार्गो पर नियंत्रण से प्रकाश संश्लेषण आधारित ईंधन सेल, सेंसर्स (ज्ञानेंद्रियों) और वृद्धि नियामकों के लिए रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही ऐसे उपकरण भी तैयार किए जा सकते हैं, जो पौधों की आंतरिक क्रियाओं को व्यवस्थित कर सकें।उन्होंने कहा, यह सफलता वनस्पति विज्ञान और ऑर्गेनिक साइंस के विविध क्षेत्रों के विलय की ओर पहला कदम है। हमारा उद्देश्य उर्जा की मदद से पर्यावरण और वनस्पति विज्ञान के नए रास्तों को खोजना है। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है sabhar : zeenews

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बुधवार, 20 जनवरी 2021

अमेरिकी लोग योग के बाद ध्यान में प्रविष्ट हो रहे है

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बाहरी दुनिया शोर गुल से भरी है और भीतर मन की उथल पुथल है. ऐसे में क्या ध्यान शांति दे पाएगा? योग के बाद अब ध्यान अमेरिका को अपनी आगोश में ले रहा शाम के पांच बजते ही 31 साल की जूलिया लायंस अपना काम काज समेटती हैं. न्यू यॉर्क से सटे शहर मैनहटन में रहने वाली जूलिया सीधे ध्यान केंद्र की ओर बढ़ती हैं. वहां वह आधे घंटे गहरे ध्यान में डूबने की कोशिश करेंगी. जूलिया इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. अप्रैल 2016 में अचानक उन्होंने ध्यान शुरू किया. ध्यान केंद्र के सोफे में बैठकर वह कहती हैं, "मैं शांति का एक लम्हा चाहती हूं. इस शहर में आप हमेशा भाग रहे होते हैं और यहां कोई भी ऐसा कोना नहीं जहां शांति हो."योग भले ही दुनिया भर में मशहूर हो चुका हो, लेकिन ध्यान अभी भी चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है. पश्चिम में अब तक ध्यान को आध्यात्मिकता की ओर् झुके हुए लोगों से जोड़कर देखा जाता रहा है. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. अमेरिका के कई अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज में ध्यान की मदद ली जा रही है. स्कूलों में टेलिविजन के जरिये ध्यान सिखाया जा रहा है. स्मार्टफोन तक सिमट चुकी जिंदगी का ही नतीजा है कि अमेरिका में अब निर्वाण और ध्यान बड़ा कारोबार बन रहा है.2015 में ग्रीनविच नाम के गांव में लोड्रो रिंजलर ने मेडिटेशन स्टूडियो खोला. अब ब्रुकलिन और मैनहटन में भी उनके दो स्टूडियो हैं. लॉस एजेंलेस, मियामी, वॉशिंगटन और बॉस्टन में भी कई मेडिटेशन स्टूडियो खुल चुके हैं. रिंजलर कहते हैं, "यहां न्यू यॉर्क के समाज के हर तबके के लोग आते हैं. सब एक ही बात कहते हैं कि मुझे बहुत तनाव है. मैं जानना चाहता हूं कि अपने मन को को कैसे एकाग्र करू और भाग दौड़ से भरी जिंदगी"से मुक्ति मिले तनाव और भाग दौड़ से भरी जिंदगी ज्यादातर शहरों में ध्यान के आधे घंटे का सेशन 10 डॉलर का है. स्टूडियो में हल्की रोशनी होती है, खास तरह की सुगंध होती है और ऑर्गेनिक टी भी मिलती है.सिलिकॉन वैली की कई कंपनियां भी अपने कर्मचारियों के लिए ध्यान के कोर्स आयोजित कर रही हैं. हॉलीवुड की पूर्व अभिनेत्री एमिली फ्लेचर ने 2012 में कंपनियों के कर्मचारियों के लिए मेडिटेशन कोर्स शुरू किया. शुरूआत में सिर्फ 150 लोग थे. आज यह संख्या 7,000 से ज्यादा है. ऑनलाइन कोर्स के जरिये वह क्लीवलैंड, ओहायो और फ्लोरिडा जैसे शहरों तक पहुंचना चाहती हैं.जीवा मेडिटेशन की प्रमुख एमिली फ्लेचर कहती हैं, "मैं कंपनियों के सीईओ को ध्यान सिखाती हूं और इससे उन्हें फायदा होता है और वो मुझे अपनी कंपनी तक ले जाते हैं. शुरूआत में कर्मचारी स्वार्थ के कारण ध्यान सत्र में हिस्सा लेते हैं. एमिली के मुताबिक, "वे बेहतर ढंग से बात करना चाहते हैं, अपने बॉस को खुश रखना चाहते हैं, ज्यादा पैसा कमाना चाहते हैं या फिर सेक्स लाइफ बेहतर करना चाहते हैं."लेकिन एमिली उनसे एक ही बात कहती हैं, "अगर आप ध्यान करने लगेंगे तो आप अपने जीवन का आनंद लेने लगेंगे, आपका मस्तिष्क बेहतर ढंग से काम करेगा, आपके शरीर को अच्छा अहसास होगा, आप कम बीमार पड़ेंगे." अमेरिका में अब ध्यान के ऐप्स भी तेजी से फैलने लगे हैं. सबसे लोकप्रिय ऐप्स में से एक है, हेडस्पेस. अब तक इसे 1.1 करोड़ बार डाउनलोड किया जा चुका है. इसके 4,00,000 पेड यूजर्स हैं. साभार dw de

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बुद्धि को प्रखर बनाती हैं ये 5 आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

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आज के समय ज्यादातर जॉब्स ऐसे हैं, जिनमें शार्प ब्रेन की जरूरत होती है। साथ ही लगातार मेंटल प्रेशर लेते हुए सही तरह से काम कर सकनेवाले इंप्लॉयज ही हर किसी को चाहिए होते हैं। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता है यह जानना कि आखिर हम अपने ब्रेन को लगातार ऐक्टिव कैसे रख सकते हैं। प्रकृति ने हमें बहुत सारी जड़ी-बूटियां और औषधियां दी हैं, जो हमारे शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने का काम करती हैं। दिमाग को लगातार ऊर्जा देनेवाली इन प्राकृतिक औषधियों को आयुर्वेद में एक खास वर्ग में रखा गया है, इसे आयुर्वेद मेध्या और नॉट्रोपिक ग्रुप कहते हैं। आइए, यहां जानते हैं कि ये जड़ी-बूटियां किस तरह ब्रेन को ऐक्टिव रखने में मदद करती हैं... ब्राह्मी (बकोपा मोननेरी) -ब्राह्मी एक एडाप्टोजेनिक जड़ी बूटी है। यह ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर जैसे सेरोटोनिन, डोपामाइन और गाबा को संशोधित करने का काम करती है। साथ ही तंत्रिका तंतुओं के कुशल संचरण में सुधार करती है। -ब्राह्मी का सेवन करनेवाले लोगों के दिमाग पर तनाव में का बहुत अधिक असर नहीं हो पाता है। क्योंकि ब्राह्मी मस्तिष्क की कोशिकाओं में लचीलापन बढ़ाने का काम करती है। इससे याददाश्त बढ़ती है, सीखने की क्षमता बढ़ती है और ताजगी बनी रहती है। वाचा (एकोरस कैलमस) -वाचा में चिंता, भय और अवसाद जैसे लक्षणों को दूर करने के गुण पाए जाते हैं। यह सेंट्रल नर्वस सिस्टम (सीएनएस) पर काम करती है और इससे अवसाद के लक्षणों और कारणों से मुक्ति मिलती है। -वाचा व्यक्ति के मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में मोनोमाइन स्तरों में परिवर्तन करती है। मानसिक संतुलन बनाए रखनेवाली इलेक्ट्रॉनिक वेव्स को सही बनाए रखने के कार्य में मदद करती है। जटामांसी (नारदोस्तच्स जटामांसी) -जटामांसी केंद्रीय मोनोमाइन और निरोधात्मक अमीनो एसिड के स्तर को बढ़ाती है, जिसमें सेरोटोनिन, 5-हाइड्रॉक्सिंडोल एसिटिक एसिड, (जीएबीए) गामा-एमिनो ब्यूटेनिक एसिड और टॉरिन के स्तर में बदलाव शामिल है। ये सभी तत्व निराशा को दिमाग पर हावी होने से रोकते हैं और डिप्रेशन से बचाते हैं। मंडुकपर्णी (सेंटेला एशियाटिक) -मंडुकपर्णी मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता में सुधार करती है और न्यूरोट्रांसमीटर्स - डोपामाइन, नॉरपेनेफ्रिन या सेरोटोनिन स्राव को संतुलित करती है। इसके सेवन से न्यूरॉन्स (मस्तिष्क की कोशिकाओं) को पुनर्जीवित होती हैं और मानसिक तनाव को कम करती हैं।शंखपुष्पी (एवलवुलस अलसिनोइड्स) -शंखपुष्पी तनाव बढ़ानेवाले हॉर्मोन कोर्टिसोल के स्तर को नियंत्रित करती है। इससे तनाव आपके दिमाग पर हावी नहीं हो पाता है। शंखपुष्पी के सेवन से मन को शांत बनाए रखने में सहायता मिलती है। शंखपुष्पी तंत्रिका तंत्र को शांत करती है और अनिद्रा से निपटने में बेहद प्रभावी है। sabhar :navbharattimes.indiatimes.com

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गंजेपन का इलाज

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न्यूयॉर्क।अगर आपके सिर के बाल पूरी तरह से झड़ गए हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है। अमेरिका के कुछ रिसर्चर्स ने ऐसी दवा खोजने का दावा किया है जो गंजे लोगों के सिर पर बाल उगाने में मददगार हो सकेगी। अभी इस दवा का यूज कैंसर के इलाज के लिए किया जा रहा है यह दावा अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में किए गए एक एक्सपेरिमेंट के बाद किया गया है। रिसर्चर्स एन्जेला क्रिस्टियानो और सहयोगियों द्वारा किए गए इस एक्सपेरिमेंट में कैंसर के इलाज के काम आ रही रुक्सोलिटाइनिब और टोफासिटाइनिब नामक दवाएं गंजेपन के इलाज में भी यूजफुल पाई गई है। रिसचर्च ने चूहों पर यह सफल एक्सपेरिमेंट किया है। जिन चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया गया, उनके शरीर के सारे बाल गिर चुके थे। रिसर्चर्स का कहना है कि बाल झड़ने की समस्या वाले इन चूहों की स्किन पर इन दवाओं का पांच दिनों तक लेप किया गया और दस दिनों के भीतर ही बालों की जड़ें फूटनें लगीं। लगभग तीन हफ्ते में ही काफी घने बाल आ गए।रिसर्चर्स ने एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी के इलाज के लिए चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया था। मेल पैटर्न बाल्डनैस के लिए ज़िम्मेदार एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी बालों की जड़ों के इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी के कारण पैदा होती है क्या है एलोपेशिया एरिटा (Alopecia Areata) एलोपेशिया गंजेपन की बीमारी है। एलोपेशिया की बीमारी कई तरह की होती है जिनमें से एक टाइप को ‘एलोपेशिया एरिटा’ कहते। एलोपेशिया एरिटा में बाल झड़ने लगते हैं। इससे बाल जड़ों से ही पैचेस के रूप में झड़ने लगते हैं। सिर के अलावा दाढ़ी मूछों के बालों पर भी ये बीमारी अटैक करती है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में से किसी को भी हो सकती है। अधिकांश मामलों में एलोपेशिया एरिटा की बीमारी परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आती है और कम उम्र के पुरुष भी इसका शिकार हो जाते हैं भारतीय आयुर्वेद में भी हैं एलोपेशिया एरिटा का इलाज एलोपेशिया एरिटा की बीमारी को संस्कृत में इंद्रलुप्त भी कहा जाता है। भारतीय आयुर्वेद में इस बीमारी के इलाज के कई नुस्खे मिलते हैं।आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ.बी.एस. राठोर बता रहे हैं एलोपेशिया एरिटा के इलाज के तीन आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में. त्रिफला चूर्ण और भृंगराज की पत्तियों का तेल एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए घर पर ही हेयर ऑइल बनाया जा सकता है। इसके लिए चाहिए त्रिफला चूर्ण 300 ग्राम, भृंगराज की पत्तियों का जूस 300 मिलीग्राम और काला तिल का ऑइल 300 मिलीग्राम ( ये सारी चीज़ें पंसारी या जड़ी बूटी बेचने वालों की दुकान पर मिलेंगी)। इन सारी चीज़ों को आपस में मिला लें और धीमी आंच पर तब तक उबालें, जब तक कि पूरा पानी भाप बनकर उड़ न जाए और सिर्फ गाढ़े हरे रंग का तेल बाकी रहे। इस मिक्सचर को छान लें और एक बोतल में भर कर अंधेरे स्थान पर रखें। रोज रात को इस तेल की मालिश अफैक्टेड एरिया में करें और सुबह शिकाकाई व रीठा पाउडर से धो लें। इससे बालों की ग्रोथ होने की संभावना बढ़ जाती है। ध्यान रहे कि बालों पर केमिकल बेस शैम्पू का इस्तेमाल न करें।कच्ची प्याज का रस ;प्याज सल्फर का एक रिच सोर्स है और सल्फर ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने में काफी मददगार है। ऐसे में एलोपेशिया एरिटा से निजात पाने के लिए प्याज का रस काफी असरदार साबित हुआ है। कई एक्सपेरिमेंट्स में प्याज के रस का यूज़ करने के अच्छे रिज़ल्ट मिले हैं। प्याज का रस न केवल बाल झड़ने से रोकता है बल्कि एलोपेशिया एरिटा की वजह से हुआ गंजापन दूर करने में भी इफैक्टिव है। प्याज का रस और पेस्ट अफैक्टेड एरिया पर सीधे लगाना काफी फायदेमंद है। इसके लिए बस कच्ची प्याज़ लीजिए और उसका रस निकाल लीजिए। इस रस और पेस्ट को सीधे स्कैल्प में लगाएं और चालीस मिनट तक लगा रहने दें। इसके बाद किसी माइल्ड शैम्पू से धो लें। और बेहतर रिजल्ट के लिए प्याज के रस में दो चम्मच शहद और एक चम्मच नारियल का तेल भी मिलाया जा सकता है।. टमाटर की पत्तियों का जूस एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए टमाटर की पत्तियों का जूस भी काफी इफैक्टिव माना गया है। टमाटर की पत्तियों का जूस अफेक्टेड एरिया पर मालिश करने के अलावा इन पत्तियों का तीन चम्मच जूस रोज पीने से भी बाल आने शुरू हो जाते हैं। shabhar : bhaskar.com

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मंगलवार, 19 जनवरी 2021

हींग का सेवन पुरूषो की पौरूष छमता बढ़ाते है

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"पान चबाइए, सेक्स पावर बढ़ाइए!" ;अगर आप अपनी सेक्स क्षमता में कमी से परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज आपके घर में ही है। सेक्स क्षमता यानी सेक्स पावर बढ़ाने में हींग बहुत ही फायदेमंद है। हींग का इस्तेमाल सदियों से पुरुषों के नपुसंकता की समस्या का समाधान घरेलू नुस्खे के रूप में किया जाता रहा है। हींग कामोत्तेजक के रूप में काम करती है। इसलिए जिन पुरुषों को समय पूर्व स्खलन की समस्या होती है उनके इस समस्या को हींग नैचुरल तरीके से ठीक करने में बहुत मदद करती है।हर्ब दैट हील: नैचुरल रेमिडी फॉर गुड हेल्थ पुस्तक के अनुसार 40 दिनों तक 6 सेंटीग्राम (0.06 ग्राम) हींग का सेवन करने से आप सेक्स ड्राइव को बेहतर बना सकते हैं। मिक्सचर के रूप में लगभग 0.06 ग्राम हींग को घी में फ्राई करें और उसमें शहद और बरगद के पेड़ का लैटेक्स मिलाकर इस मिश्रण को बना लें। नपुसंकता को ठीक करने के लिए सुबह सूर्य निकलने के पहले इस मिश्रण का सेवन खाली पेट 40 दिनों तक करें।इरेक्टाइल डिसफंक्शन और समय पूर्व स्खलन की समस्या को अगर आप नैचुरल तरीके से ठीक करना चाहते हैं तो हींग एक अच्छा विकल्प बन सकता है। एक गिलास गुनगुना गर्म पानी में एक चुटकी हींग का पाउडर मिलाकर सेवन करना फायदेमंद होता है। हींग का इस्तेमाल डायट के रूप में करना सबसे अच्छा तरीका होता है। किसी-किसी को इसका ड्राई रूप में सेवन करना अच्छा नहीं लगता है इसलिए हींग को तड़के के रूप में इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। असल में हींग इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या को बिना किसी साइड इफेक्ट के दूर करने में बहुत सहायता करती है। हींग शरीर के प्रजनन अंग में रक्त संचार को बढ़ाकर काम के उत्तेजना को बढ़ाती है।

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कैसी होंगी आने वाली समय की दवाएं

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अगर इस संदेशवाहक आरएनए के साथ बैक्टीरिया या वायरस के प्रोटीन को शरीर में भेजा जाए तो शरीर का प्रतिरोधी तंत्र ऐसे प्रोटीन की पहचान करना सीख जाता है और उसके लिए प्रतिक्रिया देता है. नए तरह के इलाज में किसी कृत्रिम चीज को शरीर में नहीं डाला जाएगा, बल्कि प्राकृतिक रूप से संदेशवाहक आरएनए में कुछ ऐसे अंश मिलाए जा रहे हैं, जिससे उसकी गुणवत्ता बढ़ाई जा सके.रिसर्चर इन बायोमॉलिक्यूल्स की मदद से कैंसर के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता तक हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे कई तरह के संक्रमण वाली बीमारियों के खिलाफ टीके विकसित किए जा सकते हैं. बायोकेमिस्ट्री के विशेषज्ञ फ्लोरियान फॉन डेय मुएलबे बताते हैं, "आरएनए के इस्तेमाल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां हम एक ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिसमें हर बार एक ही तरीके का इस्तेमाल होगा. चाहे कैंसर हो या फिर कोई और बीमारी, टीका बनाने का तरीका हमेशा एक जैसा ही होगा. फर्क सिर्फ इतना होगा कि हम प्रक्रिया को शुरू करने के लिए मैसेंजर आरएनए को जानकारी अलग अलग तरह की देंगे.2014 में इस रिसर्च कॉन्सेप्ट को यूरोपीय संघ ने अपने पहले 'इनोवेशन इंड्यूसमेंट प्राइज' से सम्मानित किया. यह पुरस्कार ऐसी रिसर्चरों को दिया जाता है जो पूरी दुनिया के सामने खड़ी समस्याओं के नए हल खोजने में जुटे हैं. इसकी संभावनाएं अपार हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इसे उत्पाद यानि दवाइयों और टीकों में कैसे बदला जाए. इस पर जर्मन फार्मा कंपनी क्योर वैक के सीईओ, इंगमार होएर कहते हैं, "फिलहाल हम प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों पर टेस्ट कर रहे हैं. शुरुआती नतीजे अच्छे हैं. अगर शोध के नतीजे ऐसे ही रहे, तो इसका मतलब होगा कि हम इस तकनीक पर आधारित पहली दवा को बाजार में उतारने के अपने लक्ष्य के बहुत करीब हैं."भविष्य में ऐसी दवाओं और टीकों पर भी काम शुरू हो सकता है, जिन्हें रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की जरूरत ना हो. खास कर फेफड़ों के कैंसर के इलाज में यह तरीका मील का पत्थर साबित हो सकता ह

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सोमवार, 18 जनवरी 2021

सौंफ में हैं इतने सारे गुण

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;भारत में सदियों से किसी भी रोग को ठीक करने के लिए आयुर्वेद का सहारा लिया जाता रहा है। प्राचीनकाल के वैद्य बड़ी से बड़ी बीमारी को आयुर्वेदिक तरीके से जड़ी-बूटियों से ठीक कर देते थे। आज भी आयुर्वेदिक तरीकों का प्रयोग भारत में किया जाता है। अब तो भारतीय आयुर्वेद पद्धति को विदेशों में भी अपनाया जाने लगा है।हमारे घर में कुछ ऐसी आयुर्वेदिक चीजें उपलब्ध होती हैं, जिनके गुण के बारे में कम ही लोग जानते हैं। इनमें से एक बहुत गुणकारी वस्तु है सौंफ। अक्सर जब आप कहीं खाना खाने बाहर जाते हैं तो वहां आपको सौंफ देखने को मिलती ही है। जब आप खाना खाकर बिल चुकाने जाते हैं तो वहीं पास में सौंफ और मिश्री रखी होती हैपाचन क्रिया ठीक करने में सहायक है सौंफ:दरअसल सौंफ बहुत पहले से ही पाचन क्रिया को ठीक करने में इस्तेमाल की जाती रही है। ठीक इसी तरह सौंफ के अन्य बहुत से फायदें हैं, जिनसे ज्यादातर लोग अनजान हैं। आज हम आपको सौंफ के कुछ ऐसे ही फायदों के बारे में रूबरू करवाने वाले हैं।इसलिए इस्तेमाल की जाती है सौंफ: खाना खाने के बाद हर दिन आधा चम्मच सौंफ खाने से पेट सम्बन्धी सभी बीमारियां दूर हो जाती हैं। आंखों में जलन हो रही हो, आंखें लाल हों या आंखें थकी-थकी लग रही हों तो आप सौंफ के पत्ते के रस और सौंफ के पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।- अगर बहुत ज्यादा खांसी से परेशान हैं तो सौंफ के अर्क को लेकर उसे शहद में मिलाकर लें। खांसी से राहत मिलेगीसौंफ में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। यह शरीर के रक्त से कोलेस्ट्राल को कम करने में मदद करता है। यह हानिकारक एलडीएल की मात्रा को शरीर से कम करके दिल की बीमारियों से रक्षा करता है। हाथ-पांव में जलन होने पर बराबर मात्रा में सौंफ और धनिया लेकर उसे अच्छी तरह कूट लें। अब इसमें मिश्री मिलाकर खाना खाने के बाद 6-7 ग्राम लें। कुछ ही दिनों में समस्या से राहत मिलेगी।सौंफ की तासीर ठंढी होती है, यही वजह है कि यह ठंढाई में भी मिलाई जाती है। यह गर्मी के दिनों में शरीर के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। यह शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी ठंढा रखता है।

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रविवार, 17 जनवरी 2021

नपुंसकता कारण सरल इलाज

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;नपुंसकता के मरीज़ लगातार बढ़ रहे है। ज़्यादातर मरीज़ो में तनाव मुख्य वजह है। एक रिसर्च के मुताबिक ज़्यादातर मरीज युवा होते है। इनकी उम्र 25 से 40 के बीच होती है। साथ ही यह ज़रूरी नहीं की बॉडी बिल्डर व्यक्ति इस समस्या से ग्रहसित नहीं होते। यह किसी को भी हो सकती है। यह कहना हैकेजीएमसी के आयुर्वेदिक चिक्त्सिक डॉ सुनित कुमार मिश्र का। उन्होंने बताया कीं नपुंसकता के दो कारण होते हैं। शारीरिक और मानसिक। चिन्ता और तनाव से ज्यादा घिरे रहने से मानसिक रोग होता है।नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण भी होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को यदि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है;नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण भी होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को यदि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है।नपुंसकता के रोगी को अपने खाने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आहार में पौष्टिक खाद्य पदार्थों घी, दूध, मक्खन के साथ सलाद भी ज़रूर खाना चाहिए। फ़ल और फ़लों के रस के सेवन से शारीरिक क्षमता बढ़ती है। नपुंसकता की चिकित्सा के चलते रोगी को अश्लील वातावरण और फिल्मों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इसका मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इससे बुरे सपने भी आते हैं, जिसमें वीर्यस्खलन होता है। के आयुर्वेदिक चिक्त् डॉ सुनित कुमार मिश्र की माने तो इन नुस्खों से आप घर में अपने आयुर्वेदिक औषधियां बनाकर सरल इलाज कर सकते है।-सफेद प्याज़ का रस 8 मिलीलीटर, अदरक का रस 6 मिलीलीटर और शहद 4 ग्राम, घी 3 ग्राम मिलाकर 6 हफ्ते खाने से नपुंसकता खत्म हो सकती है। sabhar patrika.com

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दिमाग का बैकअप लिया जा सकता है अमरता की ओर

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इंसान सदियों से गुफ़ाओं की दीवारों पर चित्र उकेरकर अपनी यादों को विस्मृत होने से बचाने की कोशिश कर रहा है.पिछले काफ़ी समय से मौखिक इतिहास, डायरी, पत्र, आत्मकथा, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म और कविता इस कोशिश में इंसान के हथियार रहे हैं.आज हम अपनी यादें बचाए रखने के लिए इंटरनेट के पेचीदा सर्वर पर - फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, जीमेल चैट, यू-ट्यूब पर भी भरोसा कर रहे हैं.ये इंसान की अमर बने रहने की चाह ही हो सकती है कि इटर्नी डॉट मी नाम की वेबसाइट तो मौत के बाद लोगों की यादों को सहेज कर ऑनलाइन रखने की पेशकश करती है.लेकिन आपको किस तरह से याद किया जाना चाहिए? अब तो ये भी संभव है कि हमारी आने वाली पुश्तों के लिए हमारे दिमाग को संरक्षित करके रखा जा सके.मतलब ये कि यदि आपके ब्रेन को हार्ड ड्राइव पर सेव करना संभव हो, तो क्या आप ऐसा करना चाहेंगे दादी ने सहेजना बंद किया अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले, मेरी दादी ने एक फ़ैसला किया. उन्होंने 1950 के दशक से परिवार के सदस्यों के फ़ोटो, दादा को लिखे प्रेम पत्र और कई और चीज़ों को संभालकर रखा था.पर मृत्यु से कुछ महीने पहले, इन यादों को सहेजने की बजाय उन्होंने इन्हें साझा करना शुरु कर दिया. मैं जब उन्हें मिलकर आती तो मेरी कार में उनकी भीगी और पुरानी किताबें, शीशे के खाली जार, धुँधलाते पुराने फ़ोटोग्राफ्स भरे होते थे.अपने अनुभवों से भरे पत्र उन्होंने अपने बच्चों, पोते-पोतियों और मित्रों को भेज दिए. जिस रात उन्होेंने अंतिम सांस ली, उससे पहले की दोपहर को उन्होंने अपने स्वर्गीय पति के एक घनिष्ठ मित्र को डाक से एक पत्र और कुछ फ़ोटो भेजे और लिखा - “ये फ़ोटो आपके पास अवश्य होने चाहिए.” यह एक मांग थी, पर एक आग्रह भी था.आज हम अपनी यादों का संग्रहण और रक्षण पहले के मुक़ाबले कहीं ज्यादा व्यापक रूप से करते हैं. क्या यह पर्याप्त है? हम उसे सेव करते हैं जिसे महत्वपूर्ण समझते हैं. लेकिन क्या होगा अगर हम उसे खो दें जो महत्वपूर्ण है? या, क्या होगा जब हमारे शब्दों और चित्रों के ज़रूरी संदर्भ खो जाएँ?आपके दिमाग़ की हू-ब-हू कॉपी क्या सब कुछ सेव करना कितना बेहतर होगा? न सिर्फ कुछ लिखे हुए विचारों को, बल्कि पूरे मस्तिष्क को, हर उस चीज़ को जिसे हम जानते हैं और जो हमें याद है, हमारे प्रेम-प्रसंग और दिलों का टूटना, विजयी और शर्मनाक क्षण, हमारे झूठ और सच.ये सवाल कुछ लोग हमसे जल्द पूछेंगे. ये वो इंजीनियर हैं जो ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो हमारे दिमाग़ और याददाश्त की हू-ब-हू कॉपी बनाकर रख पाएँगे.अगर वो सफल रहे, तो क्या मौत से हमारा संबंध ही हमेशा के लिए बदल जाएगा?सेन फ्रांसिस्को के एरोन सनशाइन की दादी का हाल ही में निधन हुआ. 30 वर्षीय सनशाइन कहते हैं, “मुझे ये बात खटकी कि उनके पीछे उनकी कुछ ही यादें रह गई हैं. उनकी टी-शर्ट, जो मैं कभी-कभी पहनता हूँ, उनकी संपत्ति है पर वो तो किसी भी डॉलर के नोट के समान है...”उनकी मौत ने सनशाइन को इटर्नी डॉट मी वेब सर्विस में साइनअप करने के लिए प्रेरित किया. इस वेब सर्विस का दावा है कि ये आपकी याद को मृत्यु के बाद ऑनलाइन कायम रखेगी.जब तक आप ज़िंदा हैं तब तक आप इसे अपने फ़ेसबुक, ट्विटर और ईमेल तक पहुँचने की इजाज़त देते हैं, फ़ोटो अपलोड करते हैं और यहाँ तक कि गूगल ग्लास से उन चीजों की रिकॉर्डिंग भी दे सकते हैं जिन्हें आपने देखा है. वो इस तरह आपके बारे में डेटा का संग्रह करते हैं, उसको फिल्टर करते हैं और फिर उस अवतार को ट्रांस्फ़र कर देते हैं जो आपके चेहरे के लुक और आपके व्यक्तित्व की नकल करता है.आपका अवतारजीते जी आप अवतार से जितनी ज़्यादा बात करते हैं, वह आपके बारे में उतना ही ज़्यादा जान पाता है. समय बीतने के साथ वह आपकी पर्सनेलिटी को अपना लेता है.इटर्नी डॉट मी के सह संस्थापकों में से एक मारियस उर्साच का कहना है, “उद्देश्य एक ‘इंटरएक्टिव लेगेसी’ तैयार करने और भविष्य में पूरी तरह भुला दिए जाने से बचना है. आपकी नाती-पोते के भी नाती-पोते आपके बारे में जानने के लिए किसी सर्च इंजन या टाइमलाइन का प्रयोग करने के बजाय इसका प्रयोग करेंगे."इटर्नी डॉट मी और इसी तरह की अन्य सेवाएं समय बीतने के साथ-साथ खो जाने वाली यादों को सहेजने का तरीका इजाद कर रहे हैं.गूगल, यूएस, ईयू, ऑक्सफ़ोर्ड...हमें डिजिटल फॉर्म में क्या रखना है और क्या छोड़ना है, इसके चुनाव में सिर खपाने से क्या ये बेहतर न हो कि मस्तिष्क की विषय वस्तु को ही पूरी तरह रिकॉर्ड कर लिया जाए?यह काम न तो विज्ञान की काल्पनिक कथा की परिधि में आता है और न ही यह अति महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक कार्य है.सैद्धान्तिक रूप से, इस प्रक्रिया की सफलता के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें जरूरी हैं.वैज्ञानिकों को सबसे पहले यह पता लगाना पड़ेगा कि मरने के बाद किसी के मस्तिष्क को बचाकर रखा जाए कि वह नष्ट न हो.दूसरा, इस मस्तिष्क में मौजूद विवरणों का विश्लेषण और उसकी रिकॉर्डिंग ज़रूरी होंगे.और अंततः इस तरह इंसानी दिमाग़ के अंदर की बातों को “कैप्चर” करने के बाद सिम्यूलेशन से इसी तरह के दिमाग़ का निर्माण.इसके लिए ज़रूरी है कि पहले एक कृतिम मानव दिमाग़ बनाया जाए. जिसमें याददाश्त के बैकअप को 'रन' किया जा सके. यूएस ब्रेन प्रौजेक्ट, ईयू ब्रेन प्रौजेक्ट लाखों न्यूरॉन्स से दिमाग़ में होने वाली हरकतों को रिकॉर्ड कर इसके मॉडल तैयार कर रहे हैं.ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इन्स्टीच्यूट से जुड़े एंडर्स सैंडबर्ग के 2008 में लिखे शोध पत्र ने इन प्रयासों को सीढ़ी बताया है.उन्होंने कहा कि यह इंसानी मस्तिष्कका पूर्ण तरीके से अनुकरण करने की दिशा में महत्वपूर्ण है.गूगल ने ब्रेन एम्यूलेशन के क्षेत्र में ख़ासा पूँजी निवेश किया है और रे कुर्ज़वेल को गूगल ब्रेन प्रौजेक्ट का निदेशक बनाया है.वर्ष 2011 में एक रूसी उद्यमी दिमित्री इत्स्कोव ने "2045 इनिशिएटिव" शुरु किया.ये नाम रे कुर्जवेल की इस भविष्यवाणी पर आधारित था कि वर्ष 2045 में हम अपने दिमाग़ का क्लाउड तकनीक पर बैक-अप बना पाएंगे मेमोरी डंप इंसानी दिमाग़ की नकल करना एक बात है और याददाश्त का डिजिटल रिकॉर्ड बनाना दूसरी बात.यह साधारण सी प्रक्रिया उपयोगी होगी कि नहीं इस बारे में सैंडबर्ग थोड़े आशंकित हैं. सैंडबर्ग कहते हैं, "यादें कम्यूटर में सफ़ाई से उन फाइलों की तरह स्टोर नहीं की जातीं, जिनको हम एक इंडेक्स के माध्यम से खोज सकें.एक समस्या यह भी है कि किसी व्यक्ति के दिमाग़ से उसकी याददाश्त को निकालने की प्रक्रिया को, दिमाग़ को क्षति पहुंचाए बिना कैसे अंजा सैंडबर्ग का कहना है कि दिमाग़ को क्षति पहुंचाएं बिना इसको स्कैन कर पाएँगे, इस बारे में शक़ है.पर वे इस बात से सहमत हैं कि अगर हम सिम्यूलेटिड दिमाग़ को पूरी तरह से 'रन' कर पाते हैं तो किसी व्यक्ति विशेष की यादों का डिज इसके नैतिक और नीतिगत मुद्दों पर भी ग़ौर करना पड़ेगा. जैसे वॉलाटियर्स का चुनाव, विशेषकर तब जब स्कैनिंग से शरीर को क्षति पहुँच सकती हो. नए तरह के अधिकारों की भी बात उठेगी."थिंकस्टॉक इम किसी व्यक्ति की निजता की सीमाएँ क्या हैं और उसकी विशेष यादों के स्वामित्व का मामला भी जटिल है.अपने आत्मलेख में आप अपनी किन यादों को रिकॉर्ड करना चाहते हैं इसका चुनाव आप कर सकते हैं. अगर आपकी किन यादों तक कोई पहुँच सकता है, यह तय करने की आप में क्षमता ही नहीं है तो यह एक बहुत ही अलग तरह का मामला बन जाता है. और फिर यह सवाल कि क्या किसी 'एम्यूलेटिड दिमाग़' को हम इंसान मान सकते हैअसमंजस कायम मैं सनशाइन से पूछता हूं कि वह क्यों अपने जीवन को इस तरह रिकॉर्ड कराना चाहते हैं"थिंकस्टॉक इमेज" वह कहते हैं, "सच पूछो तो मुझे पता नहीं है. मेरी जिंदगी के जो यादगार लम्हे हैं वो हैं दावतें, संभोग, दोस्ती का आनंद. और इनमें सब इतने क्षणिक हैं कि इनको किसी सार्थक तरीके से संरक्षित नहीं किया जा सकता सनशाइन कहते हैं, "मेरा एक मन चाहता है मेरे लिए कोई स्मारक हो और दूसरा कहता है पूरी तरह से बिना कोई निशान छोड़े गायमुझे लगता है कि हम सब इसी तरह से सोचते हैं. शायद हम सभी यही चाहते हैं कि हमारे बारे में वो याद रखा जाए जो याद रखने लायक है. बाक़ी को छोड़ देना ही बेहतर साभार :बीबीसी डाट काम

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आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका

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हिंदू धर्म में आद्यात्मिक काम विज्ञानं का बहुत महत्व है तंत्र विद्या जिसके जनक भगवान शिव माने जाते है पुरुष और प्रकृति के सयोग पे आधारित है सम्भोग से समाधी में जो विचार शून्यता की अनुभूति सेक्स के चरम पे होती है वही विचार शून्यता की अनुभूति समाधी में होती है धयान की ११२ विधियों में से सम्भोग से समाधी भी एक बिधि है सम्भोग के चरम में जब विचार शून्य हो जाते है स्त्री पुरुष को शिव शक्ति का स्वरुप मानकर साधना मन को एकाग्र करने के लिए की जाती है यानि ऋणात्मक शक्ति धनात्मक शक्ति एक हो जाती है जो की ब्रम्ह की अवस्था है हर कण कण में शिव और शक्ति का वास है काम सूत्र की रचना नंदी ने शिव और पार्वती के प्रणय सम्बाद पे आधारित भगवान शिव की इच्छा पे संसार के लिए किया ताकि लोगो को आध्यात्मिक काम का ज्ञान मिल सके इसी पे आधारित वात्सायन ने काम सूत्र की रचना की और चंदेल राजाओ ने खजुराहो के काम मंदिर की स्थापना की आगे चल के ओशो ने सम्भोग से समाधी का समर्थन किया और इसकी विवेचना की यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी महिमा बरवान की गयी है। परंतु आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका को अस्वीकार नहीं किया गया है। उसकी उचित मांग स्वीकार की गयी है किंतु उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देने से इंकार किया गया है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है तब यौन-आकर्षण स्व्यं ही विलीन हो जाता है; उसका निग्रह करने के लिए मनुष्य को प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वह पके फल की भाँति झड जाता है। इन विषयों में मनुष्य को अब और रूचि नहीं रह जाती। समस्या केवल तभी होती है जब मनुष्य चाहे सकारात्मक चाहे नकारात्मक रूप में कामेच्छा में तल्लीन या उससे ग्रस्त होता है।) दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य यौन चिंतन करता है व ऊर्जा का उपव्यय करता रहता है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि जब हम यौन ऊर्जा के सरंक्षण की या ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तब प्रश्न यह नहीं होता कि कामवृत्ति बुरी है या अच्छी, पाप है या पुण्य। यह तो प्रकृति की एक देन है। प्रत्येक मानव शरीर में कुछ द्रव्य होते हैं, ज्यों-ज्यों शरीर का विकास होता है वे संचित होते जाते हैं शारीरिक विकास की एक विशेष अवस्था आने पर प्रकृति जोर लगाने व दबाव डालने का तरीका काम में लेती है ताकि वे यौन द्रव्य बाहर निक्षिप्त कर दिए जांए और मानव जाति की अगली कडी (पीढ़ी) का निर्माण हो सकें। अब जो व्यक्ति प्रकृति का अतिक्रमण करना चाहता है, प्रकृति के नियम का अनुसरण करने, और प्रकृति की सुविधाजनक मंथर गति आगे बढ़ने से संतुष्ट नहीं होता वह अपनी शक्ति के संचय संरक्षण के लिए यत्नशील होता है, जिसे वह बाहर निक्षिप्त नहीं होने देता। यदि इस शक्ति की तुलना पानी से की जाए तो जब यह संचित हो जाती है तब शरीर में गरमी की, उष्णता की एक विशेष मात्रा उत्पन्न होती हैं यह उष्णता ‘तपस्’ प्रदीप्त ऊष्मा कहलाती है। वह संकल्प शक्ति को, कार्य निष्पादन की सक्रिय शक्तियों को अधिक प्रभावशाली बनाती है। शरीर में अधिक उष्णता, अधिक ऊष्मा होने से मनुष्य अधिक सक्षम बनता है, अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य संपादन कर सकता है और संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है। यदि वह दृढ़तापूर्वक इस प्रयत्न में लगा रहे, अपनी शक्ति को और भी अधिक संचित करता रहे तो धीरे-धीरे यह ऊष्मा प्रकाश में, ‘तेजस्’ में रूपांतरित हो जाती है। जब यह शक्ति प्रकाश में परिवर्तित होती है तब मस्तिष्क स्वयं प्रकाश से भर जाता है, स्मरणशक्ति बलवान हो जाती है और मानसिक शक्तियों की वृद्धि और विस्तार होता है। यदि रूपातंर की अधिक प्रारंभिक अवस्था में सक्रिय शक्ति को अधिक बल मिलता है तो प्रकाश में परिवर्तन रूपांतर की इस अवस्था में मन की, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है। इससे भी आगे शक्ति-संरक्षण की साधना से ऊष्मा और प्रकाश दोनों ही विद्युत् में, एक आंतरिक वैद्युत् शक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं जिसमें संकल्प शक्ति और मस्तिष्क दोनों की ही प्रवृद्ध क्षमताएं संयुक्त हो जाती है। दोनों ही स्तरों पर व्यक्ति को असाधारण सामथ्र्य प्राप्त हो जाती है। स्वाभाविक है कि व्यक्ति और आगे बढ़ता रहेगा और तब यह विद्युत् उस तत्व में बदल जाती है जिसे 'ओजस्' कहते हैं। ओजस् अस आद्या सूक्ष्म ऊर्जा ‘सर्जक ऊर्जा’ के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द है जो भौतिक सृष्टि की रचना से पूर्व वायुमडंल में विद्यमान होती है। व्यक्ति इस सूक्ष्म शक्ति को जो एक सृजनात्मक शक्ति है, प्राप्त कर लेता है और वह शक्ति उसे सृजन की व निर्माण की यह असाधारण क्षमता प्रदान करती है। यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी महिमा बरवान की गयी है। परंतु आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका को अस्वीकार नहीं किया गया है। उसकी उचित मांग स्वीकार की गयी है किंतु उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देने से इंकार किया गया है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है तब यौन-आकर्षण स्व्यं ही विलीन हो जाता है; उसका निग्रह करने के लिए मनुष्य को प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वह पके फल की भाँति झड जाता है। इन विषयों में मनुष्य को अब और रूचि नहीं रह जाती। समस्या केवल तभी होती है जब मनुष्य चाहे सकारात्मक चाहे नकारात्मक रूप में कामेच्छा में तल्लीन या उससे ग्रस्त होता है।) दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य यौन चिंतन करता है व ऊर्जा का उपव्यय करता रहता है।इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि जब हम यौन ऊर्जा के सरंक्षण की या ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तब प्रश्न यह नहीं होता कि कामवृत्ति बुरी है या अच्छी, पाप है या पुण्य। यह तो प्रकृति की एक देन है। प्रत्येक मानव शरीर में कुछ द्रव्य होते हैं, ज्यों-ज्यों शरीर का विकास होता है वे संचित होते जाते हैं शारीरिक विकास की एक विशेष अवस्था आने पर प्रकृति जोर लगाने व दबाव डालने का तरीका काम में लेती है ताकि वे यौन द्रव्य बाहर निक्षिप्त कर दिए जांए और मानव जाति की अगली कडी (पीढ़ी) का निर्माण हो सकें। अब जो व्यक्ति प्रकृति का अतिक्रमण करना चाहता है, प्रकृति के नियम का अनुसरण करने, और प्रकृति की सुविधाजनक मंथर गति आगे बढ़ने से संतुष्ट नहीं होता वह अपनी शक्ति के संचय संरक्षण के लिए यत्नशील होता है, जिसे वह बाहर निक्षिप्त नहीं होने देता। यदि इस शक्ति की तुलना पानी से की जाए तो जब यह संचित हो जाती है तब शरीर में गरमी की, उष्णता की एक विशेष मात्रा उत्पन्न होती हैं यह उष्णता ‘तपस्’ प्रदीप्त ऊष्मा कहलाती है। वह संकल्प शक्ति को, कार्य निष्पादन की सक्रिय शक्तियों को अधिक प्रभावशाली बनाती है। शरीर में अधिक उष्णता, अधिक ऊष्मा होने से मनुष्य अधिक सक्षम बनता है, अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य संपादन कर सकता है और संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है। यदि वह दृढ़तापूर्वक इस प्रयत्न में लगा रहे, अपनी शक्ति को और भी अधिक संचित करता रहे तो धीरे-धीरे यह ऊष्मा प्रकाश में, ‘तेजस्’ में रूपांतरित हो जाती है। जब यह शक्ति प्रकाश में परिवर्तित होती है तब मस्तिष्क स्वयं प्रकाश से भर जाता है, स्मरणशक्ति बलवान हो जाती है और मानसिक शक्तियों की वृद्धि और विस्तार होता है। यदि रूपातंर की अधिक प्रारंभिक अवस्था में सक्रिय शक्ति को अधिक बल मिलता है तो प्रकाश में परिवर्तन रूपांतर की इस अवस्था में मन की, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है। इससे भी आगे शक्ति-संरक्षण की साधना से ऊष्मा और प्रकाश दोनों ही विद्युत् में, एक आंतरिक वैद्युत् शक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं जिसमें संकल्प शक्ति और मस्तिष्क दोनों की ही प्रवृद्ध क्षमताएं संयुक्त हो जाती है। दोनों ही स्तरों पर व्यक्ति को असाधारण सामथ्र्य प्राप्त हो जाती है। स्वाभाविक है कि व्यक्ति और आगे बढ़ता रहेगा और तब यह विद्युत् उस तत्व में बदल जाती है जिसे 'ओजस्' कहते हैं। ओजस् अस आद्या सूक्ष्म ऊर्जा ‘सर्जक ऊर्जा’ के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द है जो भौतिक सृष्टि की रचना से पूर्व वायुमडंल में विद्यमान होती है। व्यक्ति इस सूक्ष्म शक्ति को जो एक सृजनात्मक शक्ति है, प्राप्त कर लेता है और वह शक्ति उसे सृजन की व निर्माण की यह असाधारण क्षमता प्रदान करती है। (सुंदर जीवन, माधव पण्डित पाण्डिचरी) स्रोत speakingtree.in

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शादीशुदा पुरुष किशमिश के साथ करें इस 1 चीज का सेवन, होते हैं ये जबर्दस्त 6 फायदे

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किशमिश के फायदे के बारे में आपने पहले भी जरूर पढ़ा होगा लेकिन यहां पर वैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित कुछ ऐसे बेहतरीन फैक्ट बताए जा रहे हैं जो शादीशुदा पुरुषों की जिंदगी को खुशनुमा बना सकते हमारे घर में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद होते हैं जिनका हम किसी विशेष पकवान के जरिए ही सेवन करते हैं। इन्हीं में से एक ऐसा ही खाद्य पदार्थ किशमिश है जो ड्राई फ्रूट की श्रेणी में आता है। इसका सेवन आमतौर पर लोग दूध के साथ ज्यादा करते हैं। जबकि शादीशुदा पुरुषों के द्वारा अगर किशमिश का सेवन एक अन्य फूड के साथ किया जाए तो यह बेहतरीन और जबर्दस्त फायदे पहुंचा सकता है। देखा जाए तो ज्यादातर घरों में यह चीज हमेशा मौजूद रहती है और लोग उसे अलग-अलग तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं।आइए अब सबसे पहले यह जानते हैं कि किशमिश का किस चीज के साथ सेवन करना है जिससे शादीशुदा पुरुषों को बेहतरीन फायदे मिल सकते हैं।: शादीशुदा पुरुष किशमिश के साथ करें इस 1 चीज का सेवन, होते हैं ये जबर्दस्त 6 फायदे" किशमिश के साथ शहद का सेवन किया जाए तो शादीशुदा पुरुषों को बेहतरीन फायदा मिल सकता है। इसके वैज्ञानिक कारण को अगर समझने की कोशिश की जाए तो यह और भी आसान हो जाएगा। दरअसल, किशमिश और शहद दोनों ही टेस्टोस्टोरोन बूस्टिंग फूड्स की श्रेणी में गिने जाते हैं। यह एक ऐसा हार्मोन है जो पुरुषों की सेक्सुअल समस्याओं को दूर करने और उनकी विभिन्न शारीरिक समस्याओं को दूर करने के लिए प्रभावी रूप से कार्य करता है। इसी गुण के कारण यह शादीशुदा पुरुषों के लिए और भी बेहतरीन साबित हो जाता है ऑफिस का वर्क लोड और कई सारी जिम्मेदारियां कुछ पुरुषों पर भारी पड़ जाती है। इसका असर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बढ़ता है बल्कि पौरुष शक्ति कमजोर हो जाने के कारण रोमांटिक लाइफ में भी खलल बढ़ जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए शहद और किशमिश के साथ आप चाहे तो दूध का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। एक हफ्ते तक लगातार इसका सेवन करने के बाद आपको खुद ही इससे होने वाले फायदे को महसूस करने लगेंगे। स्पर्म काउंट को बढ़ाने में जिन पुरुषों को लो स्पर्म काउंट की शिकायत है उन्हें सबसे पहले अल्कोहल और स्मोकिंग को पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। इसके बाद उन्हें अपने खाने पीने पर विशेष ध्यान देने की भी जरूरत होती है। वहीं, शहद और किशमिश का एक साथ किया गया सेवन प्रभावी रूप से स्पर्म काउंट को बढ़ाने में सक्रियरूप से अपना असर दिखाता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी लेकिन यह सच है कि इसकी कई प्रकार की क्वालिटी भी होती है। पतला स्पर्म मोटेलिटी की क्रिया में काफी धीमा होता है और इससे प्रजनन क्षमता पर भी विपरीत असर पड़ सकता है। जबकि शहद और किशमिश में ऐसे विशेष औषधीय गुण पाए जाते हैं जो स्पर्म की क्वालिटी को बेहतरीन बनाने में प्रभावी रूप से मददगार हो सकते हैं।पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है और इसकी चपेट में कई सारे लोग आ भी जाते हैं। जबकि वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार शहद और किशमिश दोनों में एंटी कैंसर गुण पाया जाता है। एंटी कैंसर गुण शरीर के किसी भी अंग में कैंसर सेल्स को विकसित होने से रोकती हैं और आपको कैंसर की चपेट में आने से बचाए भी रख सकती हैं। इस कैंसर से बचने के लिए भी आपको किशमिश और शहद के फायदे काफी लाभ पहुंचा सकते हैं।शरीर के विभिन्न अंगों का विकास होना बहुत जरूरी है। मांसपेशियों और कोशिकाओं के निर्माण के लिए हमें बेहद जरूरी और पावरफुल पौष्टिक तत्वों की जरूरत होती है। सेहतमंद बने रहने के लिए शहद और किशमिश का सेवन काफी लंबे समय से किया जा रहा है। जबकि इनमें मौजूद टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बूस्टिंग का गुण शारीरिक विकास को बढ़ावा देने में भी विशेष रूप से सहयोग प्रदान कर सकता है ब्लड प्रेशर की समस्या महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को ज्यादा परेशान करती है और यह उनकी दिनचर्या में शामिल खराब आदत व खानपान पर ठीक तरह से ध्यान न देने के कारण भी होता है। इससे बचे रहने के लिए शहद और किशमिश में मैग्नीशियम की मात्रा पाई जाती है जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में बेहतरीन पोषक तत्व की भूमिका निभाती है। आप इसे नियमित रूप से भी अपनी डायट में शामिल कर सकते हैं। साभार नवभारत टाइम्स

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शनिवार, 16 जनवरी 2021

कत्युर_राजवंश (पाल सूर्यवंशी )

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#कत्युर_राजवंश (पाल सूर्यवंशी )आज आपको उत्तराखंड के सबसे पुराने राजवंश से अवगत करवाते है ।उत्तराखंड पर आज तक कत्यूरियो के अतिरिक्त कोई भी राजवंश एकछत्र राज नही कर पाया चाहे गढ़वाल का परमार राजवंश हो या चंद राजवंश ।उत्तराखंड का सबसे पुराना राजवंश है ।कत्यूरियो के राज स्थापना के बारे मैं अलग अलग राय है ईसा के 2500 पूर्व से 7वी सदी तक इनका शासन एक छत्र रहा । उसके बाद चंद राजाओं ने इनके शासन का अंत किया ।इनकी राजधानी अस्कोट है कहा जाता है एक समय वह अस्सी कोट थे इस वजह से अस्कोट नाम भी पड़ा जो अब भी पिथोरागढ़ जिले में है ।कत्युरी प्राचीन सूर्यवंशी राजपूत माने जाते है शालिवाहन देव इनके मूल पुरुष है जो अयोध्या से आकर यहाँ अपना साम्राज्य बनाया । इनके राज्य का विस्तार पूर्व में सिक्किम से पश्चिम में काबुल तक था बंगाल में मिले शिलालेखो इनके शिलालेखों से मिलते है जिस से इनके राज्य के विस्तार के संभावना बनती है । कुछ शिलालेख बिहार के मुंगेर और भागलपुर से भी मिले है जो वैसे ही है जैसे शिलालेख कत्यूरियो के है एकमात्र सूर्य मंदिर जो उत्तराखंड में है वो कत्युरी राजाओ का ही बनाया हुआ है इसके आलावा अस्कोट का किला भी इन्होने ही बनवाया और भी कई किलो का निर्माण कराया नौले बनवाए शिव मंदिर बनवाये ।इस से राज्य विस्तार की उड़ीसा और बिहार तक होने की सम्भावनाये है । इसमें कोई संदेह नही की ये प्रतापी राजा हुए है । 13वी शताब्दी में इनकी एक शाखा भारी सेना लेकर नए राज्य स्थापना को अलखदेव और तिलकदेव के नेतृतव में गोंडा बस्ती गोरखपुर की और आई और अपना नया राज्य बसाया जो की महासु स्टेट के नाम से आज भी स्थित है जो की बस्ती जिला उत्तरप्रदेश में है ।चन्द राजाओ के आअने के बाद इनका राज्य छिन भिन्न हो गया कई जगहों से चंदो ने इनको निकाल भगाया कई जगहों पर ये चंदो के अधीन छोटे मोटे जमींदार या प्रशासक बन गये ।राजघराने के लोग अब रजबार कहलाते है रजबार मल्ल ,शाही,बम,मनराल, कड़ाकोटि,कैंतुरा गुसाई आदि शाखाओ में बंट गये शाही --अर्जुनदेव के वंशज । चोकोट के रजबार -किशनदेव के वंशज । मनराल -लाडदेव के वंशज । डोटी के मल्ल - नागमल्ल के वंशज । कुछ लोग गुसाई पदवी का प्रयोग सरनेम की तरह करते है । चोकोट में इनकी कुलदेवी का मन्दिर है कुछ लोग मनिला देवी को भी इनकी कुलदेवी कहते है जो सल्ट पट्टी अल्मोड़ा मे है । यधपि पोस्ट में सभी जानकारिया जांच परख कर तथ्यों को देखते हुए दी गयी है यदि कुछ जानकारी पर संदेह हो तो कमेंट में तथ्यों के साथ बताये । https://palrajvancehariharpur.blogspot.com

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कत्यूरी राजवंश: उत्तराखण्ड का शक्तिशाली साम्राज्य

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>कत्यूरी राजवंश ने उत्तराखण्ड पर लगभग तीन शताब्दियों तक एकछत्र राज किया. कत्यूरी राजवंश की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने अजेय मानी जाने वाली मगध की विजयवाहिनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. (Katyuri Dynasty of Uttarakhand) कत्यूरी राजवंश की पृष्ठभूमि, प्रवर्तक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में उभरने का कोई प्रमाणिक लेखा-जोखा नहीं मिलता है. यह इतिहासकारों के लिए अभी शोध का विषय ही है. इस सम्बन्ध में मिलने वाले अभिलेखों से कत्यूरी शासकों का परिचय तो मिलता है लेकिन इसके काल निर्धारण में सहायता नहीं करते. इसी वजह से कत्यूरी शासन के कालखंड को लेकर इतिहासकारों में मतभेद बने हुए हैं. कहा जाता है कि कत्यूरी शासक अयोध्या के सूर्यवंशियों के वंशज थे, हालाँकि इसका भी सुस्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. कत्यूरों ने स्थानीय खश शासकों को पराजित करके यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया था. इतिहासकारों का मानना है कि इसके प्रथम शासक प्रतापी राजा ललित सूरदेव हुए. ललित सूरदेव से लेकर वीरदेव तक कत्यूरों की 13 पीढ़ियों ने उत्तराखण्ड में शासन किया, हालाँकि इसका क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता. माना जाता है कि कत्यूरी शासन का आरंभ 850 ई. के लगभग हुआ, जो कि 1015 तक रहा. लेकिन समुद्रगुप्त (335 से 375 ई.) के मंत्री हरिषेणकृत प्रयाग स्तम्भ पर उत्कीर्ण प्रशस्ति के अनुसार कर्तिकेयपुर का राज्य अन्य सीमावर्ती राज्यों से समृद्ध राज्य था. इसके अवशेष आज भी बैजनाथ में रणचूलाकोट, तैलिहाट, सेलिहाट में देखे जा सकते हैं. कत्यूरी साम्राज्य का विस्तार पूर्व में डोटी से लेकर पश्चिम में यमुना तक तथा उत्तर में मानसरोवर से दक्षिण में रूहेलखंड तक हुआ करता था. कत्यूरी शासनकाल में कलाकौशल के क्षेत्र में भारी तरक्की हुई. इस दौरान कई भव्य मंदिरों, मूर्तियों तथा उत्कृष्ट शिल्प वाले भवनों का निर्माण हुआ. (Katyuri Dynasty of Uttarakhand) कत्यूरी साम्राज्य का प्रशासनिक ढांचा गणतांत्रिक हुआ करता था. इसका संचालन 18 सदस्यों वाली ‘अधिष्ठान’ द्वारा किया जाता था. उत्तरवर्ती काल में इसकी जगह ‘रजबार अधिष्ठान’ ने ले ली, जिसे 12 राजाओं की सभा भी कहा जाता था. इतिहासकारों के अनुसार कत्यूरों की राजधानी मूलतः जोशीमठ में हुआ करती थी, जिसे ब्रह्मपुर नाम से पहचाना जाता था. राजा असन्तिदेव के समय में इसे कत्यूर (बैजनाथ) में स्थानांतरित कर दिया गया. अटकिंसन ने अस्कोट, डोटी, पालीपछाऊँ से प्राप्त गुरुपादुका नामक पुस्तक के आधार पर एक चौथी वंशावली का भी वर्णन किया है. इसे अन्य तीनों की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें वंशावली के अलावा कई राज कर्मचारियों के अलावा महत्वपूर्ण राजनीतिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन भी मिलता है. इसके अनुसार जोशीमठ से शासन करने वाले कत्यूरी शासक थे— 1. अग्निराय, 2. फेलाराय, 3. सुबतीराय, 4. केशवराय, 5. बगड़राय, 6. आसन्तीराय, 7. वासन्तीराय, 8. गोरारे, 9. श्यामलराय, 10. इलणा देव, 11. प्रितमदेव, 12. धामदेव. प्रख्यात इतिहासकार मदनचन्द्र भट्ट के अनुसार के अनुसार कट कत्यूरी युग 1200 से 1545 ई. तक माना जा सकता है. इस समय कत्यूरी शासन की राजधानी रणचूलाकोट में थी. इसी के पश्चिम में 2 राजधानियां वैराट (चौखुटिया और लखनपुर) थी तथा पूर्व में हाटथर्प (डीडीहाट) और ऊकू (नेपाल) थीं. रामायण प्रदीप के अनुसार देवलगढ़ का राजा अजयपाल (1500 से 1548 ई.) कत्यूरियों का सोने का सिंहासन छीनकर श्रीनगर ले गया था. अतः कत्यूरी राज्य का पतन अजयपाल के अभुदय के बाद ही हुआ. sabhar:https://www.kafaltree.com/katyuri-dynasty-uttarakhand

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विज्ञान और अध्यात्म

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विज्ञान का सफर आदि काल से शुरू हो गया था | जब मनुष्य कृषि और पत्थर के औंजारो का प्रयोग किया विज्ञान ने जहा हमे तकनीको के द्वार खोल कर जीवन को सरल एवं सुगम्य बनाया है परंतु अध्यात्म के विना जीवन मे शांती नहीं मिल सकती कही ना कही विज्ञान और अध्यात्म एक हो जाते है आगे देखे कैसे तकनीक ने हमारा जीवन आसान कर दिया है विज्ञान और आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है। वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी। अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांड का अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है। हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है। हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है | ईश्वर को अनन्त माना गया है , और उसकी लीलाओ को अनन्त कहा गया है | धर्म के अनुसार ईश्वर का वास हर कण मे है और उसकी माया अनन्त है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है | उन्होने अपनी पिछली पुस्तक “द एम्पर्स न्यू माएंड ” मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब ” साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स ” मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है |आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक ‘एओन ‘ या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है | भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है तो क्या वैज्ञानिक कही ना कही ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे

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क्या इस ब्रह्मांड में हमारे सिवा भी कोई और है

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गुजरे वर्ष में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया तथा कार्नेजी इंस्टिट्यूट ऑफ़ वाशिंगटन से संबंध का गोल विद के एक दल को एक जीवन अनुकूल ग्रह की खोज करने में सफलता मिली जिसे ग्लास 510 नाम दिया गया है हालांकि अब तक सौरमंडल के बाहर सैकड़ों ग्रहों की को खोजा जा चुका है लेकिन इस नए खोजे गए ग्रह के बारे में यह कहा जा रहा है कि जीवन के पनपने योग्य तमाम परिस्थितियों की दृष्टि से यह सर्वाधिक अनुकूल है ग्लास 581 ग्रह का मूल तारा है लाइफ 581 जो एक लाल बोना तारा है यह ग्रह 37 दिन में अपने मूल तारीख की एक प्रतिमा पूरी करता है गौर मतलब है कि लाइफ 581 की ग्रह मालिका प्लेनेटरी सिस्टम में भी और भी ग्रह पाए गए हैं लेकिन ग्लास 581 जी को ही जीवन के अनुकूल पाया गया है हवाई स्थित टेलीस्कोप की मदद से लगातार 11 वर्षों के परीक्षण के बाद लाइफ 58 15 मालिका में आईसीटी ग्रह की खोज करने में सफलता मिली पृथ्वी से 20 प्रकाश वर्ष की दूरी पर तुला तारामंडल में स्थित यह ग्रह पृथ्वी से 3 गुना बड़ा है लेकिन इसका ग्रुप टेबल पृथ्वी के मुकाबले कहीं कम है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसंधानकर्ताओं को बीते वर्ष में कैलीफोर्निया की एक झील में  arsanik पर पलटने वाले जीवाणुओं यानी बैटरी या की एक प्रजाति की खोज करने में सफलता मिली सौरमंडल से बाहर जीवन अनुकूल ग्रह की खोज के साथ बैक्टीरिया की इस नई प्रजाति की खोज में फिर से इस तथ्य को रेखांकित किया है कि दुर्गम से दुर्गम और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन पनप सकता है तो क्या इस ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं यानी हमारे सिवा भी कोई और है

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इस डिवाइस के आते ही बदल जाएगा सेक्स लाइफ

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वायग्रा और सेक्‍स पिल्‍स के साइड इफेक्‍ट को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इन दिनों एक ऐसा डिवाइस बनाया है जो सेक्‍स लाइफ को लंबे समय तक स्‍पाइसी बनाए रखता है। वैज्ञानिक इन दिनों एक ऐसे डिवाइस पर काम कर रहे हैं जिसे दिमाग में फिट किया जा सकेगा और इससे सेक्स का आनंद कई गुना बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों ने इसका नाम सेक्‍स चिप रखा है। प्रयोग के तौर पर वैज्ञानिकों ने इस चिप को एक ऐसे महिला के दिमाग में इंप्‍लांट कर दिया जिसे सेक्‍स में कोई इंटरेस्‍ट नही था। मगर इस चिप के इंप्लांट के बाद उसकी सेक्स रिलेटेड इच्छाएं तेजी से बढ़ गईं। बाद में इस चिप को निकाल दिया गया, क्योंकि वह सामान्‍य लाइफ और सेक्‍स लाइफ के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रही थीं। ऑक्सफर्ड में जॉन रेडक्लिफ हॉस्पिटल के प्रोफेसर टीपू अजीज का कहना है कि सेक्स चिप 10 सालों के भीतर एक सचाई बन सकती है। उनका कहना है कि इस चिप की सफलता के सबूत भी हैं। उनका कहना है कि यह तकनीक वायरलेस होगी और सेल्फ पावर्ड ब्रेन चिप्स के सहारे चले sabhar baskar.com

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गुरुवार, 14 जनवरी 2021

दिल की धड़कन से चलेंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

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 चीन के वैज्ञानिक एक ऐसी सुरक्षा तकनीक विकसित कर रहे हैं जिसमें दिल की धड़कन की मदद से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को संचालित किया जा सकेगा ताइवान के टाइम है है सिंह यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि हर एक इंसान का दिल अलग तरीके से धड़कता है वैज्ञानिकों का कहना है जब तक व्यक्ति जीवित रहता है उसके दिल की धड़कन ए चालू रहती है ऐसे में धड़कनों को करती है प्रणाली में बदलकर कंप्यूटर सुरक्षा तकनीकी हथियार के रूप में विकसित किया जा सकता है दिल अलग तरीके से धड़कने के कारण हर एक व्यक्ति का की दिल की धड़कन का इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम संकेत भी अलग होता है वास्तव में किन्ही दो व्यक्तियों को इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम संकेत एक जैसे नहीं होते इसी विशेषता को नए बायोमेट्रिक हथियार के रूप में विकसित किया जा रहा है प्रमुख शोधकर्ता सुन लिया मैंने कहा है कि इस तकनीकी योग्यता जांचने के लिए हमने 2 लोगों के ; इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम अर्थात ईसीजी संकेतों को उनकी हथेलियों के माध्यम से प्राप्त किया फिर उन्हें गणितीय आंकड़ों में परिवर्तित किया लिन ने कहा हमने पाया कि इन आंकड़ों का इस्तेमाल पासवर्ड के रूप में किया जा सकता है उनका दावा है कि यह अन्य प्राणियों के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षित है अब तक बायोमेट्रिक पहचान सुनिश्चित करने के लिए उंगलियों के निशान आंखों की पुतली का इस्तेमाल होता था इसके बावजूद लोग तस्वीर में से इसे धावली करते हुए पाए गए लेकिन इस तकनीकी में हथेलियों से रिकॉर्ड की गई है दोनों को एक बार करने के बाद हमेशा पासवर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है इसमें धोखाधड़ी किए जाने की आशंका नहीं होगी

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कुत्ते से हुआ प्यार, साइंस की छात्रा ने कर दी सारी हदें पार!

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अहमदाबाद।शहर के पॉश इलाके में रहने वाली और साइंस (कक्षा 12वीं) की एक छात्रा का एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। छात्रा को अपने घर पर पले कुत्ते से इस कदर प्यार हो गया कि अब वह उसे अपना ब्वॉयफ्रेंड मानने लगी है।  छात्रा कुत्ते को लेकर सारी हदें पार कर चुकी है। बताया जाता है कि छात्रा के कमरे से उसके परिजनों को अश्लील साहित्य भी मिले हैं। मजबूरीवश अब परिजनों को मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी है। लगभग 5 वर्ष पहले छात्रा के पिता जर्मन शैफर्ड ब्रीड के एक कुत्ते को घर लाए थे। जैसे-जैसे कुत्ता बड़ा होता गया, छात्रा का उससे प्रेम उतना ही बढ़ता गया। अब तो स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि छात्रा रात-दिन कुत्ते के साथ ही रहती थी और उसे कुत्ते से एक पल के लिए भी दूर रहना पसंद नहीं। कुत्ते को लेकर छात्रा का पागलपन इस कदर बढ़ चुका था कि यह बात उसकी सहेलियों तक को पता थी। इन्हीं में से एक सहेली ने यह बात परिजनों बता दी, तब जाकर इस मामले का खुलासा हुआ। पिता ने यह बात सुनते ही कुत्ते को एक स्वैच्छिक संस्था को सौंप दिया। लेकिन छात्रा कुत्ते के प्यार में इस कदर पागल थी कि उसने परिजनों को धमकी दे दी कि अगर कुत्ते को वापस नहीं लाया गया तो वह आत्महत्या कर लेगी। इकलौती बेटी की इस हरकत से परिजन भी घबरा गए और कुत्ते को घर वापस ले आए। परिजन कुत्ते को वापस तो ले आए लेकिन अब उन्होंने कुत्ते को एक पिंजरे में रखना शुरू कर दिया है और उसकी देखभाल के लिए एक वॉचमैन भी रखना पड़ा है।इधर, कुत्ते से अलग रहने पर छात्रा की मानसिक हालत बिगड़ गई और वह डिप्रेशन में चली गई। अन्य चिकित्सकों की सलाह पर पिता ने उसे शहर के जाने-माने मनोचिकित्सक को दिखाया है।
छात्रा के कमरे से मिले अश्लील साहित्य:   पुत्री के कुत्ते से इस कदर प्रेम के चलते परिजनों ने जब उसके कमरे और सामानों की तलाशी ली तो काफी मात्रा में अश्लील साहित्य भी बरामद हुआ है।
यह बीमारी ‘जूफिलिया’ कहलाती है:   चिकित्सीय भाषा में इस बीमारी को जूफिलिया (जानवरों से अत्यधिक प्रेम व संभोग की स्थिति) कहा जाता है। इसकी शुरुआत ‘अनकंडिशन लव’ के रूप में होती है जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए अंत तक ‘अनकंडिशनल फिजिकलिटी’ में बदल जाती है। पशु के प्रति बढ़ता प्रेम, संभोग तक पहुंच जाता है, जिसे ‘सैक्सुअल परवरजन’ भी कहा जाता है। विज्ञान में इस समस्या का निदान सिर्फ मनोवैज्ञानिक तरीके से ही संभव है।

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विशिष्ट गुणों वाली जीएम फसलों का विकास

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आईसीएआर और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विशिष्ट गुणों वाली जीएम फसलों का विकास किया है फसलों में विभिन्न रोगों की रोकथाम में जीन संपादन द्वारा सफलता प्राप्त करने के बाद वैज्ञानिक अब सूखा  
 चार पाला और लवण रोड़ी फसलों के विकास के साथ ही खनिज संपदा से भरपूर प्रजातियों के विकास के लिए कार्य कर रहे हैं भारत में सूखा रोधी धान और सरसों की किस्मों पर जीनों के फेरबदल के प्रयोग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और दिल्ली विश्वविद्यालय में किए जा रहे हैं पूसा में डीएम चोपड़ा और उनकी टीम ने सरसों की जय किसान नामक प्रजाति का विकास सोमैक्लोनल  वेरिएशन तकनीक
से किया सरसों की फसल सुखा रोटी और अगेती होने के कारण किसानों द्वारा पसंद की गई इसी प्रकार चेन्नई के एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाऊंडेशन की प्रयोगशाला में समुद्र के खारे पानी को चाहने वाले जीन को समुद्री maigro tree से अलग करके तंबाकू में सफलतापूर्वक प्रवेश किया गया  अब उसे paddy में प्रविष्ट करा दिया गया है इस प्रकार समुद्र के खारे पानी से धान पैदा होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं  भारत में कोल्ड स्टोरेज कोल्ड चीन की सुविधा की कमी और अनियमित बिजली आपूर्ति के कारण फल फूल और सब्जियों को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता ऐसी स्थिति में यदि जिलों के फेरबदल से इन फसलों को अधिक देर तक टिकाऊ ताजा और सुरक्षित बना दिया जाए तो किसानों के साथ-साथ वक्ताओं को भी लाभ होगा वैज्ञानिक इस दिशा में कार्य कर रहे हैं स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने रॉकफेलर प्रतिष्ठान की सहायता से धान की गोल्डन राइस किस्म को विकसित किया है इसमें विटामिन ए पैदा करने वाला जीन डाला गया है फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने अधिक लोहे और जस्टिस से युक्त धान के बीजों का विकास किया है यह बी एनीमिया से ग्रस्त बच्चों और महिलाओं के लिए वरदान सिद्ध होगा जीएम फसलों के उत्पादन बढ़ाया जा सकता है वैज्ञानिक शोध पर आधारित विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विकासशील देशों में जीएम तकनीक से प्रायः सभी फसलों का उत्पादन 25% बढ़ाया जा सकता है चीन के किसानों ने 1997 से बीटी कपास हुआ कर कपास उत्पादन लागत को 8% कम किया है दुनिया में एक तिहाई सिंचित क्षेत्र सिर्फ इस लिए खेती के लिए अनुपयुक्त हो गया है क्योंकि वहां की जमीन छारीय हो चुकी है ऐसी जमीन पर जीएम फसलों को उगाया जा सकता है यह फसलें सूखे को भी काफी हद तक सहन करने के योग्य होती हैं सबसे बड़ी बात है कि हम जीएम फसलों को पूर्णता कृतिम वातावरण में उगने लायक बना सकते हैं

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कया ब्रमांड पहले से था और रहेगा

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वैसे तो ब्रह्मांड के निर्माण के संबंध में कई सिद्धांत और और धारणाएं प्रचलित है लेकिन महा विस्फोट के संबंधी अवधारणा को सबसे ज्यादा मान्यता मिली है और आप सभी आमतौर पर इसे स्वीकारते हैं बिग बैंग थ्योरी के अनुसार अरबों साल पहले यह ब्रह्मांड अत्यधिक घनीभूत अवस्था में था और एक बिंदु के रूप में था इस बिंदु को वैज्ञानिकों ने विलक्षणता का बिंदु कहा इस बिंदु में एक महा विस्फोट हुआ इसका विस्तार होना शुरू हो गया इस महा विस्फोट ने अति सघन बिंदु बिंदु को छिन्न-भिन्न कर दिया और इस पिंड के टूटे हुए हंस अंतरिक्ष में दूर-दूर तक छुट्टी है अभी भी हजारों किलो मीटर प्रति सेकेंड की दर से गतिमान है इन्हीं गतिशील आंसुओं से अकाश गंगा निर्मित हुई है और ब्रह्मांड का वर्तमान स्वरूप सामने आया हरमन बॉडी गोल्ड पायल नाम के तीन सिद्धांत दिया इस सिद्धांत में एक सी फील्ड वहां से फील्ड का मतलब क्रिएशन यानी निर्माण से है कि कल्पना की गई बहुत ही घने हो मुझे द्रव्यमान वालों के आसपास मौजूद इस फील्ड की ऊर्जा को और बना देता है जिससे पदार्थ का निर्माण होता है इस प्रक्रिया में उर्जा में बढ़ोतरी के साथ में भी बढ़ोतरी होती है जिससे तेज गति के साथ बाहर करता है इससे छोटे स्तर पर विस्फोट की होती है छोटे छोटे बड़े विस्तार होता है इस प्रकार की संरचना होती है हरमन बॉडी थम्स गोल्ड रेट हायर नामक के तीन ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने महा विस्फोट के इस सिद्धांत को चुनौती दी उन्होंने 1948 में ब्रह्मांड की उत्पत्ति के एक नए सिद्धांत को प्रस्तुत किया जिसे अस्थाई अवस्था सिद्धांत कहा जाता है इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का ना तो महा विस्फोट के साथ आरंभ हुआ ना ही कभी इसका अंत होगा यानी इस विशाल ब्रह्मांड का ना आदि है न अंत इस सिद्धांत के अनुसार आकाशगंगा ए आपस में दूर तो हो जाती है

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रविवार, 10 जनवरी 2021

चीनी वैज्ञानिकों ने खोजा ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदियों का उद्गम

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 ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाने समेत तिब्बत में कई जल परियोजनाओं को अंजाम देने के लिए तैयार बैठे चीन के वैज्ञानिकों ने तिब्बत की सीमा से बहने वाली नदियों के उद्गम स्थल और उनके मार्ग की लंबाई का व्यापक उपग्रह अध्ययन पूरा कर लिया है चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिकों ने ब्रह्मपुत्र के मार्ग की उपग्रह से ली गई तस्वीरों का विश्लेषण करने के साथ भारत पाकिस्तान से बहने वाली सिंधु और म्यांमार के रास्ते बहने वाली सालवीन और इरावडी के बहाव के बारे में भी पूरा विवरण उठा लिया है सी ए एस के तहत आने वाली इंस्टीट्यूट आफ रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन के शोधकर्ता न्यू साउथ शिवांग ने बताया कि इसके बाद पहले 4 नदियों के उद्गम कभी स्पष्ट नहीं हुए थे और इनकी लंबाई क्षेत्र के बारे में आ रहे विभिन्न जानकारियों ने शोधकर्ताओं को कई साल तक भ्रम में रखा था क्योंकि इस कार्य में प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़ी कई बाधाएं आती थी और सर्वेक्षण की तकनीक भी सीमित थी न्यू ने अपने विश्लेषण के आधार पर बताया कि ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल तिब्बत के दौरान काउंटी स्थित हिमालय पर्वत के उत्तरी क्षेत्र में स्थित सांसी ग्लेशियर है न कि सीमा युंग डुंग ग्लेशियर इसे भूगोल विद स्वामी प्रणवानंद ने 1930 के दशक में ब्रह्मपुत्र का उद्गम बताया था

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भ्रूण में दिल धड़कने की सफल विडिओग्राफी

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अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भ्रूण में दिल धड़कने की शुरआती अवस्था का सजीव वीडियो तैयार करने में सफलता अर्जित की है में चिकित्सा स्टान विश्वविद्यालय के बेयलर कालेज विभाग के वैज्ञानिक high-resolution और इमेजिंग उपकरण से स्तनपाई के दिल के निर्माण की प्रक्रिया को दर्ज कर रहे हैं यह एक महत्वपूर्ण की सबसे बढ़िया और जीवन तस्वीर होगी वैज्ञानिकों ने ऑप्टिकल्स को हरेंद्र टोमोग्राफी की मदद से परिसंचरण संबंधी अनियमितताओं का विश्लेषण किया है इस तकनीक में किसी बिंदु पर पड़ने वाले इंफ्रारेड लेजर कुंज के परावर्तन से बहुत गहराई वाली तस्वीर प्राप्त होती है अल्ट्रासाउंड की ध्वनि तरंगों से जहां दानेदार जो इमेज प्राप्त होती है वही उसी में कल कष्ट और उसे प्राप्त करने में मदद मिलती है

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शनिवार, 9 जनवरी 2021

हमजा अमेजॉन के नीचे बहने वाली नदी

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 वैज्ञानिकों ने हाल में ही एक ऐसी भूमिगत नदी का पता लगाया है जो विशाल अमेजन के मिलो नीचे बहती है वैज्ञानिकों ने ब्राजील के आयल कंपनी पेट्रोब्रास द्वारा 1970 एवं 1980 के दशक में अमेजन क्षेत्र में खुदाई किए गए तेल कुआं के आंकड़े के विश्लेषण के आधार पर इसकी खोज की है उन्होंने इस नदी को ब्राजील के नेशनल ऑब्जर्वेटरी के वैज्ञानिक वालिया हमजा के नाम पर हम जा रखा कंप्यूटर विश्लेषकों के द्वारा यह बताया गया कि यह नदी अमेजन कि भारत ही पश्चिम से पूर्व तक पृथ्वी तल से 13000 फीट नीचे बहती है वैज्ञानिकों ने अभी बताया कि पृथ्वी से लगभग 2000 फीट की गहराई पर या नदी ऊर्ध्वाधर रूप में बहती है यह नदी लगभग अमेजॉन जितनी लंबी है लेकिन इसमें अमेजन के कुल जल प्रवाह का एक बटे 33 वां भाग ही जल प्रभावित होता है हमजा की चौड़ाई 125 से 250 मील के बीच है जबकि अमेजन की चौड़ाई 0.6 मील से 7 मील के बीच है वैज्ञानिकों के इस दल ने अपने इस विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी के अन्य भागों में भी हमजा जैसे भूगर्भीय नदियां हो सकती हैं वैज्ञानिकों ने कहा उल्लेखनीय है कि वालिया हमजा तथा एलिजाबेथ तेरस के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल ने 2 वर्ष के गहन अध्ययन के बाद यह रिपोर्ट तैयार की  जिसे कांग्रेश ऑफ द ब्राजीलियन सोसाइटी ऑफ जियोफिजिक्स में प्रस्तुत किया जिले में प्रस्तुत किया गया

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भालिया गेहूं की जीआईसी टैग

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 गुजरात के बाल क्षेत्र के प्रख्यात भालिया गेहूं को विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के उत्पाद के रूप में मान्यता प्रदान की गई है गेहूं की इस किस्म को भौगोलिक संकेतक जी आई कानून के तहत पंजीकृत कर लिया गया है इस पंजीकरण से अर्थ की और क्षेत्र में पैदा होने वाले गेहूं को इस के नाम से नहीं बेचा जा सकेगा गुजरात के अहमदाबाद से लेकर भावनगर तक तथा खंभात तक बोले जाने वाले बाल गेहूं गेहूं की लंबी किस में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है

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एलन मस्क: कहानी दुनिया का सबसे अमीर शख़्स बनने की

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स्पेस-एक्स के संस्थापक और टेस्ला के सीईओ एलन मस्क दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गये हैं. उनकी कुल संपत्ति 185 बिलियन डॉलर (1 खरब 85 अरब डॉलर) को पार कर गई है.बीते गुरुवार को मस्क की कंपनी ने शेयर की क़ीमतों में बड़ा उछाल देखा, जिसके बाद कुल संपत्ति के मामले में वे पहले पायदान पर पहुँच गये.ये जगह मस्क ने ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म 'अमेज़न' के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस को पीछे छोड़कर हासिल की है. जेफ़ बेज़ोस साल 2017 से इस स्थान पर थे.मस्क की इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला ने इस साल अपनी मार्केट वैल्यू में काफ़ी वृद्धि की है. बुधवार को यह पहली बार 700 बिलियन डॉलर तक पहुँच गई जो कार कंपनी टोयोटा, फ़ॉक्सवैगन, ह्युंदै, जीएम और फ़ोर्ड की कुल मार्केट वैल्यू से भी अधिक है.अमेरिका के कई आर्थिक विश्लेषकों ने लिखा है कि 'अमेरिका में सत्ता बदलने के बाद, एलन मस्क की कंपनी का भविष्य और भी सुनहरा हो सकता है.'उनका मानना है कि 'डेमोक्रैट्स के आने से इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला का काम और भी बढ़ेगा क्योंकि जो बाइडन की पार्टी ने चुनाव अभियान के दौरान 'ग्रीन-एजेंडे' को बढ़ावा देने के लगातार वादे किये थे.' कौन हैं एलन मस्क और क्या-क्या करते हैं? एलन मस्क के काम का दायरा सिर्फ़ भविष्य की कारें बनाने वाली कंपनी तक सीमित नहीं है. उनकी कंपनी टेस्ला इलेक्ट्रिक कारों में लगने वाले पुर्ज़े और बैट्रियाँ बनाती है जिन्हें दूसरे कार निर्माताओं को बेचा जाता है.वे घरों में लगने वाले 'सोलर एनर्जी सिस्टम' बनाते हैं जिसकी माँग वक़्त के साथ बढ़ी है. वे एक अंतरिक्ष अन्वेषण कंपनी भी चलाते हैं. साथ ही वे अमेरिका में 'सुपर-फ़ास्ट अंडरग्राउंड ट्रांसपोर्ट सिस्टम' का ख़ाका तैयार कर रहे हैं.आज के समय 49 वर्षीय एलन मस्क के बिज़नेस की शुरुआत असल में साल 1999 में हुई, जब उन्होंने और उनके भाई किंबल ने अपनी सॉफ़्टवेयर कंपनी 'ज़िप-2' के लिए एक सफल डील तलाश ली.इससे मिले पैसे को, 27 वर्ष की उम्र में मस्क ने एक नई कंपनी में लगाया जिसका नाम था 'एक्स डॉट कॉम' और इस कंपनी का दावा था कि 'वो पैसा ट्रांसफ़र करने की व्यवस्था में क्रांति लाने वाली है.'मस्क की इसी कंपनी को आज 'पे-पाल' के नाम से जाना जाता है जिसे साल 2002 में ई-बेय ने ख़रीद लिया था और इसके लिए मस्क को 165 मिलियन डॉलर मिले थे. यह उनके करियर की बड़ी उपलब्धि थी.इसके बाद मस्क ने अंतरिक्ष अन्वेषण की तकनीकों पर काम करना शुरू किया. उनके इसी प्रोग्राम को 'स्पेस-एक्स' का नाम दिया गया जिसने कहा कि 'मनुष्य आने वाले वक़्त में दूसरे ग्रहों पर भी रह सकेंगे.'साल 2004 में एलन मस्क ने इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला की बुनियाद रखी और उन्होंने कहा, "भविष्य में सब कुछ इलेक्ट्रिक होगा, स्पेस में जाने वाले रॉकेट भी और टेस्ला इस बदलाव को लाने में अहम भूमिका निभायेगी."में एलन मस्क की पहचान एक अमेरिकी उद्यमी के तौर पर है, पर उनका जन्म दक्षिण अफ़्रीका में हुआ था. उनकी माँ मूल रूप से कनाडा की हैं और पिता दक्षिण अफ़्रीका के. मस्क के अनुसार, उन्हें बचपन से ही किताबें पढ़ने का बहुत शौक़ था.वे कहते हैं कि 'बचपन में मैं बहुत ज़्यादा शांत रहता था, इस वजह से मुझे बहुत परेशान भी किया गया.'10 साल की उम्र में एलन मस्क ने कम्यूटर प्रोग्रामिंग सीखी और 12 साल की उम्र में उन्होंने 'ब्लास्टर' नामक एक वीडियो गेम तैयार किया जिसे एक स्थानीय मैग्ज़ीन ने उनसे पाँच सौ अमेरिकी डॉलर में ख़रीदा. इसे मस्क की पहली 'व्यापारिक उपलब्धि' कहा जा सकता है.मस्क की सफलता का राज़ क्या है? बीबीसी के संवाददाता जस्टिन रॉलेट ने एलन मस्क से एक साक्षात्कार के दौरान यह प्रश्न पूछा था कि 'आपकी सफलता का राज़ क्या है?' और रॉलेट को इसका जो जवाब समझ आया वो है: 'एलन मस्क का बिज़नेस के प्रति 'एटिट्यूड' यानी व्यापार और अपने काम को लेकर उनका अलग नज़रिया.'कुछ वर्ष पहले हुए इस साक्षात्कार में मस्क ने कहा था, "मैं नहीं जानता कि मेरे पास कितनी संपत्ति है. ये इस तरह से नहीं है कि कहीं नोट के बंडल पड़े हुए हैं. इसे ऐसे देखना चाहिए कि टेस्ला, स्पेस-एक्स और सोलर सिटी में मेरी हिस्सेदारी है और बाज़ार में उस हिस्सेदारी की कुछ क़ीमत है. पर मुझे वाक़ई इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि मेरे काम करने का लक्ष्य ये नहीं है." रॉलेट लिखते हैं कि 'मस्क का यह नज़रिया शायद काम कर रहा है. उनके पास आज जितनी संपत्ति है, उसमें वे चाहें तो दुनिया की कई बड़ी कार निर्माता कंपनियों को एक साथ ख़रीद सकते हैं. वे इस साल 50 वर्ष के हो जायेंगे, पर एक 'दौलतमंद शख़्स' के तौर पर दुनिया को अलविदा कहने का उनका सपना बिल्कुल नहीं है.'मस्क कहते हैं कि वे मंगल ग्रह पर एक बेस बनाने में अपनी पूंजी का सबसे बड़ा हिस्सा लगाना चाहते हैं और उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर उन्होंने इस मिशन को सफल बनाने में अपनी सारी पूंजी लगा दी. मंगल ग्रह पर मनुष्यों का एक बेस, मस्क की नज़र में बहुत बड़ी सफलता होगी. वे मानते हैं कि 'इससे भविष्य बेहतर होगा.' स्पेस-एक्स की स्थापना को लेकर भी बीबीसी से हुए साक्षात्कार में मस्क ने कहा था, "मैंने कंपनी इसलिए बनाई क्योंकि मैं इस बात से असंतुष्ट था कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी अंतरिक्ष अन्वेषण को लेकर और महत्वकांक्षी क्यों नहीं है, वो क्यों और आगे का नहीं सोच पा रही. मैं उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में चाँद और मंगल ग्रह पर हमारा बेस हो और वहाँ के लिए लगातार फ़्लाइट्स चलें." ' लोग मुझे इंजीनियर के रूप में जानें' मस्क चाहते हैं कि लोग उन्हें एक निवेशक से ज़्यादा, एक इंजीनियर के रूप में जानें. रॉलेट से साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "मैं हर सुबह किसी नई तकनीकी समस्या का हल ढूंढने के लिए उठना चाहता हूँ. बैंक में कितना पैसा है, इसे मैं सफलता का पैमाना नहीं मानता." रॉलेट लिखते हैं कि "मस्क कार उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाना चाहते हैं, वे मंगल ग्रह पर कॉलोनी बनाना चाहते हैं, वैक्यूम टनल में चलने वाली सुपर-फ़ास्ट ट्रेनें चलाना चाहते हैं, मनुष्यों के दिमाग़ से एआई यानी आर्टिफ़िशयल इंटेलिजेंस को जोड़ना चाहते हैं और सौर उर्जा से दुनिया चलाना चाहते हैं. इन सब चीज़ों में एक चीज़ समान है, वो ये कि ऐसी भविष्य की कल्पनाएं आपको 1980 के दशक की शुरुआत में मिलने वाली बच्चों की पत्रिकाओं में मिलती थीं. और इसमें कोई छिपी हुई बात नहीं कि मस्क का बचपन दक्षिण अफ़्रीका में बहुत सारी पत्रिकाएं, क़िताबें पढ़कर और फ़िल्में देखकर गुज़रा." मस्क बदलाव की धीमी गति में विश्वास नहीं रखते. वे जल्द से जल्द जीवाश्म ईंधनों को पीछे छोड़ देना चाहते हैं. साथ ही मानवता के अस्तित्व को लंबे समय तक बनाये रखने के लिए वे मंगल ग्रह पर उपनिवेश विकसित करने के पक्षधर हैं. जोख़िम उठाने की आदत एलन मस्क जोख़िम उठाने वाले शख़्स हैं और उन्होंने यह साबित किया है. 2008 में जब दुनिया ने आर्थिक मंदी का सामना किया तो मस्क की हालत भी काफ़ी ख़राब हो गई थी. इसके बाद उनकी नई कंपनियों ने कई असफलताएं देखीं. स्पेस-एक्स के पहले तीनों लॉन्च फ़ेल हुए. टेस्ला में भी उत्पादन से जुड़ी कई समस्याएं आती रहीं और मस्क तंगी में फँस गये.अपने साक्षात्कार में एलन मस्क ने बताया था कि एक वक़्त ऐसा भी आया जब उन्हें अपने ख़र्चों के लिए दोस्तों से पैसे उधार लेने पड़े.पर क्या उन्हें कभी दिवालिया होने का डर नहीं हुआ? इस सवाल के जवाब में एलन मस्क ने जस्टिन रॉलेट से कहा था, "ज़्यादा से ज़्यादा क्या होता, मेरे बच्चों को सरकारी स्कूल में जाना पड़ता, तो इसमें क्या बड़ी बात होती, मैं ख़ुद सरकारी स्कूल में पढ़ा हूँ."रॉलेट लिखते हैं, "हमारी मुलाक़ात के दौरान मैंने पाया था कि मस्क एक चीज़ से ज़रूर निराश थे और वो थीं आलोचनाएं. उनका कहना था कि आलोचनाएं किसी आधार पर होनी चाहिए, पर यहाँ तो लोग खुलेतौर पर टेस्ला के डूबने का इंतज़ार कर रहे हैं. हालांकि, उन्होंने कहा कि वे आलोचनाओं की वजह से अपने इरादों में कभी बदलाव नहीं करते. मस्क के अनुसार, जब उन्होंने स्पेस-एक्स और टेस्ला की नीव रखी थी, तब उन्हें ख़ुद विश्वास नहीं था कि वो इससे पैसा कमा सकेंगे."काम करने की लत एलन मस्क को क़रीब से जानने वाले कहते हैं कि उन्हें काम करने की लत है. टेस्ला मॉडल-3 को तैयार करते समय उन्होंने कहा था कि 'वे हफ़्ते में 120 घंटे काम करते हैं और उसमें उन्हें मज़ा आता है.'कोरोना महामारी के दौरान जब सैन फ़्रांसिस्को स्थित उनकी फ़ैक्ट्री को बंद करना पड़ा, तो लॉकडाउन के प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ एलन मस्क खुलकर बोले. उन्होंने कहा, 'जो लोग महामारी का हौवा बना रहे हैं, वो बेवक़ूफ़ हैं.' उन्होंने घर में रहने के आदेशों को 'ज़बरदस्ती' बताया और कहा कि 'कोविड लॉकडाउन संवैधानिक अधिकारों के ख़िलाफ़ है.' महामारी के दौरान ही एलन मस्क के घर बेटे का जन्म हुआ. इस मौक़े पर उन्होंने ट्विटर के ज़रिये दुनिया को बताया कि उन्होंने बेटे का नाम X Æ A-12 रखा है.कुछ लोग मानते हैं कि एलन मस्क के मन को पढ़ा नहीं जा सकता और उनके व्यवहार का पूर्वानुमान मुश्किल है. लेकिन इसका उनके काम पर ज़रा भी असर नहीं दिखता. बतौर उद्यमी वे एक दूरदर्शी इंसान हैं.सितंबर, 2020 में उन्होंने कहा कि 'जल्द ही उनकी कंपनी की सभी कारें सेल्फ़ ड्राइविंग वाली होंगी.' वे अगले तीन वर्षों में सस्ती इलेक्ट्रिक कारें लाने का भी इरादा रखते हैं. sabhar : bbc.com

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