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नैनों तकनीक यानि इंजीनियरिंग की ऐसी विधा जिसमें एक कण से भी छोटे पदार्थों का अध्ययन किया जाता है, शोध किए जाते हैं। इस तकनीक का इंसान के हित में कैसे इस्तेमाल किया जाए ये एक बड़ा सवाल रहा है।
अगर आप दांत की समस्या से परेशान हैं तो नैनों तकनीक के जरिए इलाज कराना बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। सिंगापुर की बायोमर्स कंपनी ने इस दिशा में काफी काम भी किया है। सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधार्थियों की मदद से कंपनी ने दंत चिकित्सा के लिए ऐसे तार विकसित किए हैं जिनके इस्तेमाल के बाद दांतों को कसने के लिए धातु के तार लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।
बायोमर्स के सह संस्थापक और उपाध्यक्ष जॉर्ज एलिफट्रियास कहते हैं, 'हमारी ये सोच है कि पॉलीमर दांत के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। दांतों पर कोई भी ट्रैने के आकार वाले धातु के तार नहीं देखना चाहता।'
कई वैज्ञानिक और शोधकर्ता मानते हैं कि नैनों तकनीक की मदद से इंसान के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव किए जा सकते हैं। रिजर्ववायर और नहरों में पानी की पारगम्यता कम करने के लिए भी इसका इस्तेमाल फायदेमंद साबित हो सकता है।
कपड़ा उद्योग, जंग प्रतिरोधक सामान तैयार करने में और दवाएं बनाने में भी इसका इस्तेमाल हो सकता है। सिंगापुर के मैटेरियल रिसर्च एंड इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर एंडी होर कहते हैं, 'पिछले पांच सालों में इस क्षेत्र में काफी काम हुआ है।'
नुकसान भी कम नहीं : नैनो तकनीक के अगर फायदे हैं तो नुकसान भी कम नहीं। प्रोफसर होर कहते हैं, 'अभी तक वैज्ञानिक मानते थे कि अगर किसी पदार्थ की रासायनिक संरचना के बारे में पता चल जाए तो उसके व्यवहार के बारे में पता लगाया जा सकता है। जैसे कि नमक का स्वाद नमकीन ही होता है फिर चाहे नमक का टुकड़ा छोटा हो या बड़ा। लेकिन आज ऐसा नहीं है। अब साबित हो चुका है कि आकार प्रकार का पदार्थ के व्यवहार पर असर पड़ता है। अगर ज्यादा बड़ा आकार है तो पदार्थ नए तरीके का व्यवहार कर सकता है।'
नैनो तकनीक का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है अभी तक इसके बारे में ठीक से पता नहीं किया जा सका है।
बदलता रहा नजरिया : नैनो तकनीक के बारे में दुनिया का नजरिया पिछले दो दशकों में काफी बदला है। नोबेल विजेता वैज्ञानिक एरिक द्रेक्सलर ने दुनिया के खात्मे का एक काल्पनिक सीन तैयार किया था।
इसमें उन्होंने मॉलिक्यूलर नैनो तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ऐसे रोबोट की कल्पना की थी जो पूरी धरती को खा सकता है। इस पूरी तस्वीर में दिखाया गया था कि दुनिया का विनाश करने के दौरान रोबोट स्वयं का विकास भी करता रहता है। हालांकि यह एक तरह की कोरी कल्पना थी लेकिन इससे साबित होता है कि नैनो तकनीक का इस्तेमाल कितना खतरनाक हो सकता है।
स्वास्थ्य पर नैनो तकनीक के प्रभाव का सटीक आंकलन अभी किया जाना बाकी है। जर्मनी के फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ रिस्क एसेसमेंट का कहना है कि अभी तक इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलें हैं कि नैनो तकनीक के इस्तेमाल का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
अगर देशों की बात की जाए तो 2006 के बाद से ही सिंगापुर नैनो तकनीक के क्षेत्र में काफी आगे रहा है। इस देश में नैनो तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों का स्वागत किया जाता है। फिलहास यहां 13 कंपनियां काम कर रही हैं।
सिंगापुर इकोनॉमिक डेवलपमेंट बोर्ड के निर्देशक यी सेन गियान कहते हैं, '2011 से 2015 के बीच सरकार ने इसके शोध के बजट में 25 फीसदी की बढ़ोतरी की है। हम लोग टैक्स में छूट देते हैं, विकास के लिए कर्ज देते हैं।' sabhar :http://hindi.webdunia.com/