डोम राजवंश के वंशज आज भी बाजा बजा कर निभाते हैं परंपरा
कौन थे डोम राजा इतिहासकार डॉ. विजय रक्षित के मुताबिक 18 वी सदी के मध्य में डोम राजवंश के अंतिम शासक रायभान थे। डोम राजा रायभान के राज में अराजकता से उनकी प्रजा में असंतोष की भावना पनप रही थी। इसी वक्त जशपुर की धरती पर बिहार के सोनपुर रियासत के राजा सुजान राय ने कदम रखा। राजा सुजान राय ने ही जशपुर रियासत की नींव रखी थी
27 पीढ़ी पुराना नगाड़ा आज भी है सुरक्षित
बैगाओं, मिरधाओं के बिना भी महोत्सव अधूरा
नगाड़ा वादकों के अलावा बैगाओं व मिरधाओं के बिना भी जशपुर दशहरा महोत्सव अधूरा है। पुराने समय में नवरात्रि के दौरान बलि देने वाले को मिरधा कहा जाता था। तपकरा क्षेत्र के रौतिया जाति के लोग बलि देने का कार्य करते थे, जिन्हें यह उपाधि दी गई थी। यह उपाधि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इसके अलावा बैगाओं के बिना भी दशहरा महोत्सव पूरा नहीं होता। बैगा वनवासियों के पुजारी होते हैं।
दशहरा महोत्सव के दौरान पूजा-पाठ, हवन कुंड की देखभाल बैगा ही करते आए हैं।
एतवा राम ने बताया कि उनके पास जो नगाड़ा रखा हुआ है वह 27 पीढ़ी पुराना है अौर दशहरा उत्सव में उनके द्वारा इसे लेकर जशपुर पहुंचते हैं।दशहरा उत्सव प्रारंभ होने के साथ ही उनके द्वारा इस नगाड़े की पूजा अर्चना करने के बाद उस बाजा को प्रतीकात्मक रूप से बजाने के बाद देवी पूजा के दौरान और दशहरा उत्सव तक उनके ही वंशजों के लोग उत्सव में बाजा बजाने की परंपरा निभाते हैं। खासबात यह है कि वे इसका कोई शुल्क नहीं लेते।उनका कहना है कि इस पूजा में उनकी भूमिका अहम होती है और विशेष सूर से वाद्ययंत्र को बजाया जाता है।पूर्वजों के अनुसार वे इसे अपना कर्तव्य मान कर निभाते चले आ रहे हैं।
उनका यह भी कहना है कि उनके समाज में पढ़े लिखे लोग भी हैं लेकिन इस उच्च परंपरा को निभाना गौरव की बात समझते हैं।

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