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चंद्रवासी हमारे नाम रेडियो मैसेज भेज रहे हैं- 'हम चांद से बोल रहे हैं। क्या आपको हमारी आवाज सुनाई दे रही है?' हम इंसान इस मैसेज को सुन नहीं पाते, क्योंकि हमें नहीं मालूम कि वे किस फ्रीक्वेंसी पर हैं। यह आप को किसी साइंस फिक्शन का हिस्सा लगता है, तो दिल थाम लीजिए। पिछले दिनों लंदन के एक सम्मेलन में चंद्रवासियों के बारे में चर्चा हुई और कहा गया कि चांद में ऐसी चीजें मौजूद हैं, जो किसी एलियन या एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल (ईटी) सभ्यता की निशानी हैं। कुछ साइंटिस्ट मानते हैं कि चांद का यह हिस्सा, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता, एलियंस का बेस हो सकता है। अब तक सभी चंद्रयान उस हिस्से में उतरे हैं, जो पृथ्वी से दिखाई देता है। बाकी हिस्सा, जो अंधेरे में खोया रहता है, रहस्यमय बना हुआ है।
चलिए, चांद का किस्सा छोडि़ए। वहां एलियंस की बात करना ज्यादती ही है, लेकिन वहां नहीं तो और कहीं? इंसान का मन यह मानने को कभी तैयार नहीं होगा कि इस अनंत युनिवर्स में वह अकेला है, कि अरबों-खरबों ग्रहों में कहीं जीवन नाम का चमत्कार दोहराया नहीं जा सका। इसलिए एलियंस की खोज हमेशा हमारी साइंस पर हावी रही है। परग्रही प्राणियों की खोज, यानी सेटी प्रोजेक्ट के जरिए अनजान रेडियो संकेतों को पकड़ने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। विशाल रेडियो टेलिस्कोप स्पेस की गहराइयों में कान लगाए हुए हैं। उस क्षण का बेसब्री से इंतजार है, जब किसी एलियन का संकेत देती एक अजनबी क्लिक सुनाई देगी और विस्मय की एक कौंध के साथ हमारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी। वह क्षण इस ग्रह के इतिहास को दो हिस्सों में बांट देगा।
वह क्षण कब आएगा, कोई नहीं जानता। आज अभी या फिर सदियों बाद, लेकिन उसके लिए मुहिम कई मोर्चों पर जारी है। इसी फरवरी में साइंटिस्टों ने हमारी आकाशगंगा में एक तारे की खोज की है, जिसका एक पृथ्वी जैसा ग्रह है, यानी वहां बुद्धिमान परग्रही जीवन की संभावना बनती है। यह तारा २६ प्रकाश वर्ष, यानी १५३ खरब मील दूर है। वॉशिंगटन के कानेर्गी इंस्टीट्यूट की एस्ट्रोनॉमिस्ट मार्ग्रेट टम्बुल इस खोज से इतनी उत्साहित हैं कि परग्रही बुद्धिमान प्राणियों से संपर्क साधने का सिलसिला जारी रखना चाहती हैं। १७,१२९ तारों की लिस्ट में से उन्होंने पांच ऐसे तारे चुने हैं, जहां जीवन की संभावनाएं सबसे अधिक हैं और जहां बुद्धिमान प्राणियों के विकास की सभी भौतिक परिस्थितियां मौजूद हैं। जीवन पनपने के लिए पहली शर्त यह है कि तारा तीन अरब वर्ष पुराना होना चाहिए। इतने ही समय में पृथ्वी पर जीवन का विकास हुआ। अगर मार्ग्रेट की सलाह पर चलें तो बुद्धिमान जीवन का विकास एक नहीं, कई सौर मंडलों पर हुआ होगा। अब यह भी क्या साइंस फिक्शन माना जाएगा कि इन सौर मंडलों के प्राणी चंद्रमा पर किसी तरह आए हों और वहां अपनी निशानियां छोड़ गए हों, जिनकी चर्चा हमने शुरू में की थी।
परग्रही जीवन की खोज इस साल और भी तेज हो गई दिखती है। अमेरिका में मेसाच्युसेट्स वेधशाला ने एक ऐसा ताकतवर टेलिस्कोप बनाया है, जो एक बड़े इलाके में स्पेस से आ रहे बारीक संकेतों को पकड़ सकेगा। यह मौजूदा टेलिस्कोपों की तुलना में एक लाख गुना बड़े स्पेस को कवर कर लेगा। हालांकि रेडियो संकेत पकड़ने की कोशिश १९६० से जारी है, लेकिन इस नए टेलिस्कोप से भारी उम्मीदें हैं। एक साइंटिस्ट का कहना है कि इस टेलिस्कोप का जन्म होना साइंटिफिक फील्ड में ऐसा दुर्लभ क्षण है, जबकि इंसान एक लंबी छलांग लगा सकता है। जाहिर है, अगर चंद्रवासी हैं और संदेश भेज रहे हैं, तो वे इस बार पकड़ में आ जाएंगे।
यह सिर्फ संयोग नहीं कि हम बार-बार घूमकर चांद पर आ जाते हैं। चंद्रमा और धरती का साथ बहुत गहरा है, बल्कि चांद धरती का ही टुकड़ा है। तो यह कैसे हुआ कि जीवन सिर्फ धरती पर पैदा हुआ? चंद्रमा के बिना पृथ्वी पर जीवन हो ही नहीं सकता था। चार अरब साल पहले चांद हमसे अब की तुलना में ज्यादा करीब था। इसके कारण कुछ ही घंटों के अंतर से ज्वार आते थे। इन ज्वार से तटों पर लवणता (सेलिनिटी) में नाटकीय उतार-चढ़ाव होता था, जिससे डीनएन जैसे शुरुआती जैव अणुओं का विकास हुआ होगा। सोचिए, क्या चांद को इसी तरह पृथ्वी जीवन नहीं दे सकती थी?
लगभग ढाई साल पहले अमेरिकी प्रेजिडेंट बुश ने कहा था- 'आदमी की अंतरिक्ष यात्राओं का कहां अंत होगा, हम नहीं कह सकते, लेकिन हम एक बात जानते हैं कि आदमी ब्रह्मांड में जा रहा है।' तब उन्होंने २०१५ तक चंद्रमा पर लौटने का पक्का इरादा जताया था
अपोलो के बाद के ३५ वर्ष में चंद्रमा की काफी पड़ताल हुई है, लेकिन इसके अंधेरे हिस्से पर रोशनी पड़नी अभी बाकी है। यह काम अब होगा और इससे हमें चांद पर एलियंस के होने-न होने का पता चल जाएगा। यकीनन चंद्रमा पर हालात इतने खराब हैं कि वहां आदमी का रहना मुश्किल है। वहां सांस लेने के लिए हवा नहीं है, दिन में तापमान १०० डिग्री और रात में माइनस १५० डिग्री सेल्सियस रहता है। लेकिन ये बातें वहां जीवन होने की संभावना को खत्म नहीं करतीं। हमारे लिए कहना मुश्किल है कि परग्रही जीवन कैसा होगा और यह कतई जरूरी नहीं कि वह हूबहू हमारी तरह हो। दरअसल चांद और मंगल जैसी जगहों पर गहरी पड़ताल के लिए वहां इंसानों का लंबे समय तक रहना जरूरी है, जो अभी मुमकिन नहीं हो पा रहा है। लेकिन अब खबर है कि साइंटिस्टों ने चंद्रमा के वातावरण के मुताबिक ट्रांसहेब नाम के मल्टीस्टोरी आवास बनाने शुरू कर दिए हैं, जो २०१५ तक तैयार हो जाएंगे।
एक सवाल, जो हमें अंतिम समय तक स्थगित रखना होगा, वह यह है कि क्या एलियंस हमसे दोस्ती करेंगे? फिल्मों की बात अलग है, लेकिन इस सवाल का जवाब हमें तभी मिलेगा, जब हमारी उनसे सचमुच मुलाकात होगी। यह खयाल हमें हैरानी, उत्साह और खौफ जैसे अहसासों से भर देता है, लेकिन यकीन मानिए एलियंस का हाल भी हमारे जैसा ही होगा।
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एक प्रतिद्वंद्वी सेना को हराने के बाद उन्होंने अपना धर्म बौद्ध धर्म में परिवर्तित कर लिया | ( धर्म परिवर्तन का कारण : अशोका फिल्म देखी ही होगी | )
'नौ अज्ञात पुरुष' ने कुल नौ पुस्तकों को लिखा है | गुरुत्व का राज ! यह पुस्तक , इतिहासकारों के लिए भी खोज का विषय है |
गुरुत्वाकर्षण नियंत्रण पुस्तक का प्रमुख केन्द्र है | यह संभाव्यतः अभी भी कहीं आस-पास है | भारत, तिब्बत में या कहीं और (शायद यह भी उत्तरी अमेरिका में कहीं) के पुस्तकालय में रखी है | निश्चित रूप से इस तरह के ज्ञान को गुप्त रखने के लिए मै क्या आप सभी भी अशोक के तर्क को समझ सकते है |
कुछ साल पहले चीन , तिब्बत में , कुछ संस्कृत दस्तावेजों की खोज की और उन्हें चंडीगढ़ के विश्वविद्यालय में अनुवाद किया जा करने के लिए भेजा |विश्वविद्यालय के डॉ. रूथ ने हाल ही में कहा है कि दस्तावेजों के आधार पर तारों के बीच से ग्रहों के निर्माण के लिए निर्देश होते हैं | उनके प्रणोदन की विधि भी दी हुई है |
'विरोधी गुरुत्वाकर्षण' आदमी की शारीरिक अज्ञात आकाश शक्ति प्रणाली पर आधारित था | एक केन्द्रापसारक बल सभी गुरुत्वाकर्षण प्रतिक्रिया के विरोध में पर्याप्त है | हिंदू योगियों के अनुसार, यह आसान उत्थान और आकाश गमन है जो व्यक्ति उड़ने के लिए सक्षम बनाता है | (यदि अधिक जानना चाहते है या स्वयं पढ़ना चाहते है तो मेरे को बताये | मै इस विषय के लिये पुस्तक बता सकता हूँ | )
उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय पाठ के द्वारा किसी भी ग्रह पर पुरुषों की एक टुकड़ी भेजी सकते थे | दस्तावेज़, जो हजारों साल पुराने माना जाता है उनके अनुसार पांडुलिपियों में भी रहस्य को प्रकट किया गया | स्वाभाविक रूप से, भारतीय वैज्ञानिकों ने ग्रंथों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया , लेकिन वे तब उन के मूल्य के बारे में अधिक सकारात्मक हो गये जब चीन ने घोषणा की , कि वे अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में अध्ययन के लिए डेटा के कुछ भागों रहे है | यह एक सरकार का विरोधी गुरुत्व शोध स्वीकारने का पहला उदाहरण था |
उड़न तश्तरी आकाश में उड़ती किसी अज्ञात उड़ती वस्तु (यूएफओ ) को कहा जाता है। इन अज्ञात उड़ती वस्तुओं का आकार किसी डिस्क या तश्तरी के समान होता है या ऐसा दिखाई देता है, जिस कारण इन्हें उड़न तश्तरीयों का नाम मिला। कई चश्मदीद गवाहों के अनुसार इन अज्ञात उड़ती वस्तुओं के बाहरी आवरण पर तेज़ प्रकाश होता है और ये या तो अकेले घुमते हैं या एक प्रकार से लयबद्ध होकर और इनमें बहुत गतिशीलता होती है। ये उड़न तश्तरीयाँ बहुत छोटे से लेकर बहुत विशाल आकार तक हो सकतीं हैं।"
उड़न तश्तरी शब्द १९४० के दशक में निर्मित किया गया था और ऐसी वस्तुओं को दर्शाने या बताने के लिए प्रयुक्त किया गया था जिनके उस दशक में बहुतायत में देखे जानें के मामले प्रकाश में आए। तब से लिकर अब तक इन अज्ञात वस्तुओं के रंग-रूप में बहुत परिवर्तन आया है लेकिन उड़न तश्तरी शब्द अभी भी प्रयोग में है और ऐसी उड़ती वस्तुओं के लिए प्रयुक्त होता है जो दिखनें में किसी तश्तरी जैसी दिखाई देती हैं और जिन्हें धरती की आवश्यकता नहीं होती।उड़न तश्तरीयों के अस्तित्व को आधिकारिक तौर पर दुनिया भर की अधिकांश सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन कुछ गवाह उड़न तश्तरीयों के देखे जाने का दावा करते हैं। इनके देखे जाने के बहुतेरे रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं। ऐसा माना जाता है की इन उड़ती वस्तुओं का संबंध परग्रही दुनिया से है क्योंकि इनके संचालन की असाधारण और प्रभावशाली क्षमता मनुष्यों द्वारा प्रयुक्त किसी भी उपकरण से बिल्कुल मेल नहीं खाती, चाहे वह सैन्य उपकरण हों या नागरिक।यू॰एफ॰ओ उड़न तश्तरीयों को अन्य यू॰एफ॰ओ समझ लेना एक आम बात है। जैसे इरिडियम नक्षत्र की निचली घुमावदार कक्षाओं में घूमते कृत्रिम उपग्रह और पृथ्वी के चारों ओर तेज़ गती से चक्कर लगाते जीपीएस के उच्च घुमावदार परिसंचारी, जो अपने पैनलों द्वारा सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करते हैं जो विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है, लेकिन इस उत्सुकता के पीछे एक छोटा चमकदार बिन्दु है जो शाम से लेकर लगभग रात ८ से ९ बजे तक किसी के द्वारा भी देखा जा सकता है।१ जुलाई, १९३१ को न्यू जर्सी, अमेरिका में एक अभिकथित उड़न तश्तरी का खींचा गया छायाचित्र।
मानव इतिहास के प्राचीन काल से ही उड़न तश्तरीयों के देखे जाने के प्रतिवेदन हैं, लेकिन ये पिछले ५०-६० वर्षों में अधिक प्रकाश में आई हैं। इनके अध्ययन को यूफ़ोलॉजी कहा जाता है। ये वे लोग होते हैं जो इस प्रकार के घटनावृत की खोज करते हैं। अन्य वस्तुएं जिन्हें उड़न तश्तरी समझ लिया जाता है, वे हैं: आपातकालीन झंडे, मौसमी गुब्बारे, उल्काएं, चमकदार बादल इत्यादि।
अमेरिका के पेंसिलवेनिया राज्य में पीट्सबर्ग से ६४ किमी दूर दक्षिण पूर्व में केक्सबर्ग के जंगलों के उपर एक अज्ञात वस्तु बहुत देर तक मंडराती रही। जिसने इसे देखा वो देखता ही रह गया। लेकिन देखते देखते ये अज्ञात वस्तु आग की लपटों से घिर गई। फिर इसमें एक भयंकर विस्फोट हुआ। आसपास का क्षेत्र हिल उठा। इस घटना के तुरंत बाद इस क्षेत्र को घेर लिया गया। और किसी को भी वहीं जाने नहीं दिया गया। बाद में उड़न तश्तरी की बात सामने आई। हालांकि नासा ने इसे उल्का पिंड का नाम दिया।१९९१ में एलिटालिया विमान सेवा के एक यात्री विमान ने उड़न तश्तरी का दर्शन काफी समिप से किया था।बीबीसी के मुताबिक इटली के राष्ट्रीय अभिलेखागार की ओर से जारी रक्षा मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेजों में इस बात का वर्णन दिया गया है।
रूस में तिकोने आकार की दूसरे ग्रह से आई एक उड़नतश्तरी के कारण रूसवासी हैरत में पड़ गए थे। डेली मेल के अनुसार, यह उड़नतश्तरी कथित तौर पर ९ दिसंबर, २००९ को दिखाई दी। इसी दिन नार्वे के आसमान में नीले रंग का वृत्ताकार प्रकाश देखा गया था लेकिन बाद में बताया गया कि यह रूस से प्रक्षेपित एक असफल रॉकेट था।
रूस के इतिहास में 1989 का साल काफी दिलचस्प रहा है। इस साल यहां कई बार यूएफओ देखे जाने की खबर मिली थी। सबसे पहले 14 अप्रैल के दिन चेरेपोवेस्क के इवान वेसेलोवा ने बहुत बड़ा यूएफओ देखने का दावा किया। फिर 6 जून के दिन कोनेंटसेवो में बहुत से बच्चों ने ऐसा दावा किया। 11 जून के दिन वोलागडा की एक महिला ने 17 मिनट तक उड़न तश्तरी देखने की बात कही। एक और मामले में करीब 500 लोगों ने ऐसा दावा किया। सबसे ज्यादा रोमांचक किस्सा 17 सितंबर 1989 का है। इस दिन वोरोनेज़ के एक पार्क में बच्चे खेल रहे थे। ऐसे में बहुत बड़ा लाल रंग का अंडाकार यान उतरा था। देखते ही देखते वहां बहुत से लोग जमा हो गए। कुछ देर बाद यान में से दो एलियन निकले। एक करीब 12 से 14 फीट लंबा था और उसकी तीन आंखें थीं। दूसरा रोबोट जैसा लग रहा था। बच्चे उसे देखकर चीखने लगे तो उसने एक बच्चे पर लाइट की बीम छोड़ी और बच्च लकवे जैसी स्थिति में पहुंच गया। उस जगह की रिसर्च करने पर वहां मिट्टी में रेडिएशन के निशान मिले। वहां फॉस्फोरस की मात्रा ज्यादा पाई गई। वैज्ञानिकों के अनुसार यूएफओ का वजन कई टन था।
तकरीबन 42 साल पहले अमेरिका के आकाश में एक ऐसी ही घटना घटी थी। अमेरिका का पेंसिलवेनिया राज्य पीट्सबर्ग से 40 मील दूर दक्षिण पूर्व में केक्सबर्ग के जंगलों के उपर एक अनजानी चीज काफी देर तक मंडराती रही। जिसने इसे देखा वो देखता ही रह गया। लेकिन देखते देखते ये अनजानी चीज आग की लपटों से घिर गई
फिर इसमें एक भयंकर विस्फोट हुआ। आसपास का इलाका हिल उठा। इस घटना के तुरंत बाद इस इलाके को घेर लिया गया। और किसी को भी वहीं जाने नहीं दिया गया।
किसी की कुछ समझ में नहीं आया कि वो चीज क्या थी। बाद में उड़न तश्तरी की थ्योरी सामने आई। लेकिन अमेरिकी सरकार इस पर चुप्पी साधे रही। बेशक अमेरिकी एयर फोर्स ने इसे उल्का पिंड करार दिया लेकिन लोगों को अमेरिकी एयर पोर्स की इस बात पर भरोसा नहीं हुआ।
क्योंकि जो लोग इस घटना के चश्मदीद थे उनका कहना था कि विस्फोट के बाद एक ट्रक से किसी बड़ी चीज को ढो कर ले जाया गया। जाहिर ये अल्का पिंड नहीं हो सकता। जरुर कुछ ऐसा था जिसे सरकार और नासा के वैज्ञानिक छिपाना चाहते थे।
जब सरकार इस पर लंबे वक्त तक चुप्पी साधी रही तो न्यूयार्क की एक पत्रकार लेजली केयन ने इस बारे में लोगों को और बताने के लिए चार साल पहले नासा पर मुकदमा कर दिया।
वैसे तो नासा ने कई दलीलें दी। लेकिन जज भी नासा की दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने नासा की उस अपील को ठुकरा दिया जिसमें नासा ने इस केस को खत्म करने की गुहार की थी।
जबकि कहीं से कोई चारा नजर नहीं आया तो अब नासा ने मान लिया है कि वो इस मुद्दे पर और खोजबीन करेगा और सच्चाई को सबके सामने जाहिर कर दिया जाएगा। यानी अब उड़न तश्तरी की सच्चाई से पर्दा उठने ही वाला है।
इसके साथ ही हम आपको ये भी बता दें कि हाल ही में रुस ने प्राब्दा एजेंसी के हवाले से कहा था कि अमेरिका जब चांद पर पहुंचा तो उसका सामना वहां एलिएंस से हुआ था। प्राब्दा के हवाले से ये भी कहा गया था कि अमेरिका एलियंस और उड़नतश्तरी जैसे मामलों पर लगातार पर्दा डालता रहा है।एलिटालिया के एक यात्री विमान ने वर्ष 1991 में उड़न तश्तरी का दीदार काफी करीब से किया था।
बीबीसी के मुताबिक इटली के राष्ट्रीय अभिलेखागार की ओर से जारी रक्षा मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेजों में इस बात का खुलासा किया गया है |
इसके मुताबिक केंट के समीप लिड में एलिटालिया के एक यात्री विमान के चालक ने जब आसमान में काफी करीब मिसाइल के आकार की कोई वस्तु बड़ी तेजी के साथ उड़ते देखी तो वह अपने सहचालक की ओर मुड़कर आश्चर्य से चिल्लाया-वह देखो कैसी अजीब-सी वस्तु आसमान में तैर रही है। उसे ऐसा लगा कि संभवतः यह कोई मिसाइल ही है, जो विमान से टकराने जा रही है।
विमान के पायलट की इस बात की उस समय रक्षा मंत्रालय और नागरिक विमान मंत्रालय की ओर से कोई जाँच नहीं की गई। सबसे हैरानी वाली बात यह है कि विमान और हेलिकॉप्टर के चालकों को उस समय ऐसी किसी वस्तु की तस्वीर उतारने की सख्त मनाही थी।
शायद ऐसा इसलिए था कि सरकार और सेना इस मामले में गोपनीयता बनाए रख सके और उनसे यह न पूछा जाए कि आखिर ऐसे मामलों की जाँच क्यों नहीं की गई।
शेफ्लि हल्लाम विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ और पत्रकारिता के प्रोफेसर डेविड क्लार्क के मुताबिक अभिलेखागार की ओर से जो दस्तावेज जारी किए जा रहे हैं, उनसे उड़न तश्तरियों के बारे में काफी अहम जानकारी मिलेगी।
रूस में तिकोने आकार की दूसरे ग्रह से आई एक उड़नतश्तरी के कारण रूसवासी हैरत में पड़ गए और यू-ट्यूब पर सनसनी के तौर पर छाई हुई है।
एक कार से रात में बनाई गई और एक अन्य वीडियो की हालाँकि फिलहाल पुष्टि नहीं हो पाई है लेकिन इंटरनेट फोरम इस अनूठी घटना से पटे हुए हैं।
रूसी खबरों में इसके उड़नतश्तरी होने से इनकार किया गया है। पुलिस ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।
डेली मेल के अनुसार, यह उड़नतश्तरी कथित तौर पर नौ दिसंबर को दिखाई दी। इसी दिन नार्वे के आसमान में नीले रंग का वृत्ताकार प्रकाश देखा गया था लेकिन बाद में बताया गया कि यह रूस से प्रक्षेपित एक असफल रॉकेट था।
इस बीच विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रूस की राजधानी में रेड स्क्वायर के उपर उड़ रही इस उड़नतश्तरी का वास्तव में अस्तित्व था, तो इसका आकार एक मील रहा होगा।
बीजिग.चीन में एक हवाई अड्डे पर उड़न तश्तरी (यूएफओ) दिखने के कारण हवाई यातायात करीब एक घंटे तक बाधित रहा। यह बात गुरुवार को मीडिया की खबरों में कही गई। समाचार पत्र 'शंघाई डेली' के अनुसार उड़नतश्तरी चोंगकिंग नगरपालिका क्षेत्र स्थित जियांगबेई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के ऊपर दिखाई दी।
समाचार पत्र के अनुसार 12.30 बजे दोपहर से एक घंटे लिए हवाई यातायात ठप्प रहा।चोंगकिंग के अधिकारियों ने इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
हवाई अड्डा के अधिकारियों के अनुसार यह 'आकाशीय लालटेन' या 'बड़ा गुब्बारा' हो सकता है। चीन में खुशकिस्मती के लिए पूजा में 'आकाशीय लालटेन' का प्रयोग किया जाता है |
एविएशन जर्नल डेली रिकॉर्ड के एडीटर और पायलट जॉन एच जेनसीन ने 10 जुलाई 1947 को न्यूजर्सी के मरिस्टोन एयरपोर्ट से उड़ान के दौरान 6 चमकदार गोलाकार क्राफ्ट को उड़ते हुए देखा।उन्होंने अपने कैमरे से इसे कैद किया। पिक्चर की गुणवत्ता सही न होने के कारण बाद में ये सवाल उठाए गए कि वे छह क्राफ्ट थे या एक ही क्राफ्ट था, जिसमें छह लाइट जल रहीं थीं। दूसरी बार उन्होंने यूएफओ को 23 जुलाई को देखा, जो उनके जहाज के ठीक ऊपर था। इस दौरान उनके प्लेन का स्पीडोमीटर क् स्पीड दिखा रहा था।इसके अलावा सेवानिवृत्त अमेरिकी सैन्य अधिकारी कर्नल फिलिप जे कार्सो ने दावा किया कि उन्होंने 1947 में रूसवेल मलबे से मृत एलियन को बरामद किया। उन्होंने प्रसिद्ध न्यू मैक्सिको क्रैश की पूरी जानकारी दी। उन्होंने दावा किया कि न्यू मैक्सिको में मिला मलबा किसी गुब्बारे का नहीं है।यह एक अंतरिक्षयान है। कार्सो के दावे के बारे में जानकारी उनकी किताब ‘द डे ऑफ्टर रूसवेल’ से मिलती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस घटना को इसलिए दबा दिया गया क्योंकि वे इसे छुपाना चाहते थे।
इंग्लैंड के वेस्ट ससेक्स के जंगलों को क्लैपहैम वुड कहा जाता है। इस इलाके के साथ कई रहस्यमयी घटनाएं जुड़ी हुई हैं। यहां कई बार विचित्र चीजें देखी गईं, कई लोगों को अजीब-सा अहसास हुआ, कई बार जानवर गायब हो गए या फिर अनोखी बीमारी के शिकार हुए। इसी तरह बहुत से लोगों की मौत का कारण भी समझा नहीं जा सका।1960 के बाद से यहां कई बार यूएफओ देखे जाने की बात भी कही गई। कई लोगों का कहना था कि किसी अनदेखी ताकत ने उन्हें धक्का दिया। जंगलों से गुजरने वाले इन रास्तों पर अचानक ग्रे रंग की धुंध छा जाती थी। कई लोगों ने महसूस किया कि कोई अनदेखी ताकत उनका पीछा कर रही है।इस इलाके में जंगल काफी घना है इसलिए रिसर्च करना भी आसान नहीं था। रिसर्च से पता चला कि यहां एक तरह का रेडिएशन है। ये आश्चर्य की बात थी क्योंकि ये इलाका खड़िया मिट्टी वाला है। ऐसे इलाकों में पोटैशियम 40 का लेवल कम होता है, इसलिए रेडिएशन नहीं होना चाहिए।इस इलाके में चार लोगों की मौत होने के बाद यह विवादों में घिर गया था। पहला मामला जून 1972 का है। एक पुलिस अफसर पीटर गोल्डस्मिथ यहां से गायब हो गया था। उसका शरीर छह महीने बाद जंगलों में मिला था। दूसरे केस में लियॉन फॉस्टर का शरीर अगस्त 1975 में मिला। तीसरे में हैरी नील की जान गई और चौथे केस में क्लैपहैम के पूर्व वाइसर का शव तीन साल बाद मिला। बहुत से जानवर भी यहां से गायब हो गए थे।कुछ जानवर काफी समय बाद वापस मिले तो उनमें अजीब-सी बीमारी देखी गई। 1987 में इस पर द डेमोनिक कनेक्शन किताब लिखी गई थी। इसी साल यहां भयानक तूफान आया था। इस सब के पीछे क्या था, यह आज तक कोई नहीं समझ सका।राज है गहराइंग्लैंड के क्लैपहैम वुड जंगलों में अब तक कई लोगों की जानें गईं, कई जानवर गायब हुए, लोगों को कई रहस्यमयी अनुभव हुए और यूएफओ देखे जाने के दावे भी किए गए। फिर भी वहां क्या होता है, यह आज तक राज ही है।
वैज्ञानिक सोलर सिस्टम में एककोशकीय जीवों के सबूतों की खोज के लिए मंगल और चंद्रमा की सतह का अध्ययन कर रहे हैं। बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा में भी जीवन की खोज के लिए एक अभियान शुरु करने का प्रस्ताव है। यहां सतह के नीचे जल के होने की संभावना है, जहां जीवन हो सकता है। इस बात के भी थोड़े सबूत हैं कि मंगल ग्रह पर सूक्ष्म जीव हैं। हालांकि, फरवरी २क्क्५ में नासा के दो वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि उन्होंने मंगल ग्रह पर जीवन के मजबूत सबूत पाए हैं।
इंग्लैंड के वेस्ट ससेक्स के जंगलों को क्लैपहैम वुड कहा जाता है। इस इलाके के साथ कई रहस्यमयी घटनाएं जुड़ी हुई हैं। यहां कई बार विचित्र चीजें देखी गईं, कई लोगों को अजीब-सा अहसास हुआ, कई बार जानवर गायब हो गए या फिर अनोखी बीमारी के शिकार हुए। इसी तरह बहुत से लोगों की मौत का कारण भी समझा नहीं जा सका।1960 के बाद से यहां कई बार यूएफओ देखे जाने की बात भी कही गई। कई लोगों का कहना था कि किसी अनदेखी ताकत ने उन्हें धक्का दिया। जंगलों से गुजरने वाले इन रास्तों पर अचानक ग्रे रंग की धुंध छा जाती थी। कई लोगों ने महसूस किया कि कोई अनदेखी ताकत उनका पीछा कर रही है।इस इलाके में जंगल काफी घना है इसलिए रिसर्च करना भी आसान नहीं था। रिसर्च से पता चला कि यहां एक तरह का रेडिएशन है। ये आश्चर्य की बात थी क्योंकि ये इलाका खड़िया मिट्टी वाला है। ऐसे इलाकों में पोटैशियम 40 का लेवल कम होता है, इसलिए रेडिएशन नहीं होना चाहिए।इस इलाके में चार लोगों की मौत होने के बाद यह विवादों में घिर गया था। पहला मामला जून 1972 का है। एक पुलिस अफसर पीटर गोल्डस्मिथ यहां से गायब हो गया था। उसका शरीर छह महीने बाद जंगलों में मिला था। दूसरे केस में लियॉन फॉस्टर का शरीर अगस्त 1975 में मिला। तीसरे में हैरी नील की जान गई और चौथे केस में क्लैपहैम के पूर्व वाइसर का शव तीन साल बाद मिला। बहुत से जानवर भी यहां से गायब हो गए थे।कुछ जानवर काफी समय बाद वापस मिले तो उनमें अजीब-सी बीमारी देखी गई। 1987 में इस पर द डेमोनिक कनेक्शन किताब लिखी गई थी। इसी साल यहां भयानक तूफान आया था। इस सब के पीछे क्या था, यह आज तक कोई नहीं समझ सका।राज है गहराइंग्लैंड के क्लैपहैम वुड जंगलों में अब तक कई लोगों की जानें गईं, कई जानवर गायब हुए, लोगों को कई रहस्यमयी अनुभव हुए और यूएफओ देखे जाने के दावे भी किए गए। फिर भी वहां क्या होता है, यह आज तक राज ही है।
कहते हैं मनुष्य की जिज्ञासा का कोई अंत नहीं है | इसे जितना दबाओ यह उतना ही अपने पंख फैलाने लगती है | यही वजह है कि पृथ्वी से बहुत दूर और अलग-थलग रहने वाला मंगल ग्रह हमेशा से ही पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के लिए जिज्ञासा और रोमांच का केंद्र रहा है | एलियन से जुड़ी अफवाहें हों या मंगल पर जीवन होने जैसा मुद्दा, वैज्ञानिकों से लेकर आम जन तक लगभग सभी के लिए लाल रंग का यह ग्रह एक रोमांचक पहेली बन गया है जिसे सुलझाने के लिए पिछले काफी समय से कोशिशें की जा रही हैं | आम जनता के लिए भले ही यह दिलचस्प मसला हो लेकिन वैज्ञानिकों के लिए मंगल ग्रह और इससे जुड़े रहस्य अब चुनौती बन गए हैं, जिसका सामना उन्हें यदा-कदा करना ही होता आखिर मंगल ग्रह की सच्चाई है क्या? क्या वाकई यहां जीवन मुमकिन है? जिस प्रकार पृथ्वी पर इंसान रहते हैं क्या उसी प्रकार मंगल ग्रह पर भी एलियन वास करते हैं, जो समय-समय पर धरती का चक्कर लगाते रहते हैं? ऐसे ही कई सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना मानव के लिए चुनौती बन गया है | यूं तो थोड़े अंतराल के बीच देशी और अंतरराष्ट्रीय स्पेस संस्थाओं द्वारा मंगल पर उपग्रह भेजे जाते रहे हैं लेकिन हाल ही में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अपना अत्याधिक हाइटेक मार्स रोवर क्यूरियोसिटी मंगल की सतह पर सफलतापूर्वक पर उतारा है जिसके बाद यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि अब शायद मंगल की हकीकत ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रह सकती भूवैज्ञानिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मंगल ग्रह को विभिन्न अवधियों में विभाजित किया जा सकता है | आज से 4.5 अरब वर्ष पूर्व से लेकर 3.5 अरब वर्ष पूर्व तक की एक अवधि है जिसेनोएचियन काल के नाम से जाना जाता है, इनमें सबसे अधिक प्रमुख है | वैज्ञानिकों के अनुसार इस दौरान मंगल की सबसे पुरानी सतह का गठन हुआ था | दूसरा है हेस्पेरियन काल, जो 3.5 अरब वर्ष पूर्व से लेकर 2.9-3.3 अरब वर्ष पूर्व तक की अवधि है | इस काल में व्यापक तौर पर लावा मैदानों का गठन हुआ था | तीसरे स्थान पर है अमेजोनियन युग, जो 2.9-3.3 अरब वर्ष पूर्व से वर्तमान तक की अवधि को कहा जाता है | सौरमंडल का सबसे बड़ा पर्वत ओलंपस मोन्स इसी दौरान बना था | sabhar : http://hariyanainfo.com/
ब्लैक होल में रहते हैं एलियन
हालाँकि यह दूर की कौड़ी लगती है लेकिन इस बात की संभावना है कि एलियन कुछेक ब्लैक होल के भीतर मौजूद ग्रहों में रह रहे हों।
डेली मेल के अनुसार, रशियन अकादमी साइंसेंज के प्रोफेसर व्याचेस्लाव दोकुचाएव के अनुसार, कुछ ब्लैक होल की जटिल आंतरिक संरचना होती है जिसके कारण फोटोन, कण और ग्रह एक ‘केन्द्रीय एकलता’ में घूमने लगते हैं। यह ब्लैक होल का वह क्षेत्र है जहाँ समय और काल अनंत हो जाता है।
प्रो. दोकुचाएव ने कहा, हालाँकि कुछेक ब्लैक होल के केन्द्र पर और उपयुक्त परिस्थितियों के तहत एक ऐसा क्षेत्र भी होता है जहाँ समय और काल का तंतु मौजूद होता है।
उन्होंने दावा किया कि यदि कोई आवेशित और घूर्णन करता ब्लैक होल काफी बड़ा है तो तो यह उन ताकतों को कमजोर कर सकती है जो उस बिन्दु के परे हैं जहाँ ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण से कुछ भी, यहाँ तक कि प्रकाश भी, बाहर नहीं निकल सकता। (भाषा)
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1 टिप्पणियाँ:
Space se adrashya kiran aati hui bahut dino pahle maine kuch samay ke liye mehsoos ki. Isskebaad mujhe pata chala ki ye kiran lagataar mere upar aati rahti hai lekin mehsoos nahi hoti hai. Aur pata chala ki ye kiran makan, bus, train aadike aar-paar chali jatee hai aur insaan ke mind me bhi pravesh kar jatee hai. Ye kiran dharti par bahut si jagaho par aa rahi hai. Isski sahayata se koi (Shayad Alien )vah padh rahe hai jo hum apne mind me soch-samajh rahe hai aur hamari soch-samajh me badlaav bhi kar rahe hai. Isse logo ke saath bura ho jaa raha hai. Main bilkul sach bata raha hoon. Koi chahe to mera lie-detecter test kara le. Isske allava iss baat ka aur koi suboot prapt nahi kiya jaa sakta hai kyonki ve uss jagah par apni adrashya kiran nahi dalenge jahan unhe pakda jaa sakta hai.
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