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मंगलवार, 24 जून 2014

भारतीय वैदिक गणित और अध्यात्म

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क्या भारत में गणित का संबंध जीवन, मृत्यु और निर्वाण के दर्शन से रहा है? बीबीसी के विज्ञान कार्यक्रम के लिए इसी विषय की पड़ताल कर रहे हैं गणित से जुड़े विषयों पर लिखने वाले लेखक एलेक्स बेलौस.
भारत के गणितज्ञों को संख्याओं की शुरुआत करने का श्रेय जाता है. सदियों पहले भारत ने दुनिया को संख्याओं का चमत्कारिक तोहफा दिया था.

भारत में हिंदू, बुद्ध और जैन धर्म में संख्याओं और निर्वाण के आपसी संबंध की अलग-अलग व्याख्या की गई है.शून्य का आविष्कार भी भारत में ही हुआ, जिसके आधार पर गणित की सारी बड़ी गणनाएँ होती हैं.
लेकिन क्या वाकई गणित की संख्याओं और निर्वाण का आपस में कोई संबंध है?

शून्य और ध्यान

"यदि आप शून्य के भाव को देखें तो आप देखेंगे कि शून्य का अपना एक महत्व है. बौद्ध धर्म में इसके महत्व का वर्णन किया गया है जो कि बहुत प्रसिद्ध भी है."
प्रोफेसर कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम, आईआईटी मुंबई
भारत के प्रतिष्ठित गणितज्ञ और आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर एसजी दानी गणित और निर्वाण के संबंध में कहते हैं, ''आमतौर पर बातचीत के दौरान भी हम संख्याओं का प्रयोग करते हैं. 10 से 17 तक की संख्याओं को 'परार्ध' कहा गया है और इसका अर्थ होता है स्वर्ग यानी मुक्ति का आधा मार्ग तय होना.''
प्रो. दानी कहते हैं, ''बौद्ध धर्म में तो एक के बाद 53 शून्य लगाकर (जिन्हें 'लक्षण' कहा गया है) चिंतन, ध्यान लगाया जाता है. यह एक बहुत बड़ी संख्या है, जबकि इसकी तुलना में जैन धर्म में अनंत संख्याओं को अध्यात्म से जोड़ा गया है. हम कह सकते हैं कि ये एक प्रकार से संतुष्टि हासिल करने का एक तरीका है, इसका कोई प्रायोगिक कारण नहीं है.''
मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में गणित के इतिहासकार जॉर्ज गैवगीज जोसेफ के मुताबिक ''भारत द्वारा दी गई गणित की पद्धति अद्भुत है. जैसे यदि हम 111 लिखते हैं तो इसमें पहला 'एक' इकाई को दर्शाता है, जबकि दूसरे 'एक' का मतलब दहाई से और तीसरे 'एक' का मतलब सैकड़े से है. अर्थात् भारतीय गणित पद्धति में किसी एक संख्या के स्थान से ही उसकी स्थानिक मान का निर्धारण होता है.''
भारतीय गणित पद्धति से हम बड़ी से बड़ी संख्या को बहुत आसानी से और कम से कम संख्या के प्रयोग से व्यक्त कर सकते हैं. जबकि ग्रीक या रोमन पद्धति इतनी विकसित नहीं है.

शून्य का प्रयोग

भारतीय गणित में शून्य को दर्शाने के लिए वृत्त का प्रयोग करने के पीछे भी दार्शनिक कारण हो सकते हैं.
संख्याओं के बारे में अपनी उत्सुकता के चलते मैं मध्य प्रदेश के ग्वालियर भी गया. यहाँ के एक प्राचीन मन्दिर की एक दीवार पर '270' लिखा है, यह एक हस्तलिखित अभिलेख है. माना जाता है कि इसका अर्थ 'हस्तास्त' है जिसका मतलब भूमि माप से है.
इस अभिलेख का अर्थ जानने के लिए कई विद्वानों और इतिहासकारों ने पहले भी कई शोध किए हैं. ऐसा माना जाता है कि बाकी दुनिया को जब शून्य का पता भी नहीं था तब भारत में 75वीं ईसवी में शून्य का चलन बहुत ही आम था.
लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने शून्य के प्रयोग से जुड़ी एक किताब लिखी. जिसमें उन्होंने शून्य के प्रयोग के बारे में विस्तार से बताते हुए इसके आधारभूत सिद्धांतों की जानकारी भी दी.
शून्य के आविष्कार पर आईआईटी मुंबई में संस्कृत के प्रोफेसर कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम कहते हैं, ''यदि आप शून्य के भाव को देखें तो आप देखेंगे कि शून्य का अपना एक महत्व है. बौद्ध धर्म में इसके महत्व का वर्णन किया गया है जो कि बहुत प्रसिद्ध भी है. शून्य को ही बाद में जीरो कहा गया. ''
वो कहते हैं, "प्राचीन भारतीय शास्त्रों और इतिहास के श्लोकों में गणित के तथ्य छिपे हुए हैं."

कुछ न होकर भी सब कुछ

ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में गणित की प्रोफेसर रेणु जैन कहती हैं, ''जीरो कुछ भी प्रदर्शित नहीं करता है. लेकिन भारत में इसकी उत्पत्ति शून्य की अवधारणा से हुई. यह एक तरह की मुक्ति को दिखाता है. जब व्यक्ति अपने चरम पर होता है तो वह निर्वाण चाहता है. जब उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो चुकी होती हैं. शून्य कुछ भी नहीं है और सब कुछ है. हम कह सकते हैं कि कुछ भी न होना ही सब कुछ है.''
शून्य के लिए वृत्त या गोले का प्रयोग करने के पीछे भी दार्शनिक कारण हो सकते हैं.
पुरी के वर्तमान शंकराचार्य संख्याओं और अध्यात्म के संबंध पर कहते हैं, ''वेदांतों में जिसे ब्रह्म और परमात्मा कहा गया है, वह शून्य परमात्मा का प्रतीक है. अनंत का नाम ही शून्य है. गणित के अभ्यास से निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है.''

गणितज्ञों और धार्मिक गुरुओं दोनों का ही मानना है कि गणित की संख्याओं और निर्वाण यानी मुक्ति के बीच संबंध है.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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