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बुधवार, 5 मार्च 2014

(गीतकार समीर)- दिल को छू लेने वाले गीतों के जादूगर

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बॉलीवुड के जाने-माने गीतकार समीर गीत लेखन के साथ उन्हें मर्मस्पर्शी बनाने की दक्षता भी रखते हैं। समीर ने एक से बढकर एक गीत लिखकर श्रोताओं को आज तक मंत्रमुंग्ध कर रखा है। समीर ने अपने तीन दशक के अपने कैरियर में लगभग 500 हिंदी फिल्मों के लिये गीत लिखे।

Sameer: Who writes songs from his heart

Sameer: Who writes songs from his heart

बैंक अधिकारी के रुप में अपने कैरियर की शुरूआत करने के बाद बालीवुड में अपने गीतों से श्रोताओं को मंत्र मुग्ध करने वाले गीतकार समीर लगभग चार दशक से सिनेप्रेमियों के दिलों पर राज कर रहे है। समीर ने लगभग 6,000 फिल्मी और गैर फिल्मी गाने लिखे है। उन्होंने हिन्दी के अलावा भोजपुरी, मराठी फिल्मों के लिये भी गीत लिखे है।80 के दशक में गीतकार बनने का सपना लिये समीर ने मुंबई की ओर रूख कर लिया। लगभग 3 साल तक मुंबई में रहने के बाद वह गीतकार बनने के लिये संघर्ष करने लगे। काफी मेहनत करने के बाद 1983 में उन्हें बतौर गीतकार ''बेखबर'' फिल्म के लिये गीत लिखने का मौका मिला।इस बीच समीर को इंसाफ कौन करेगा, जवाब हम देगे, दो कैदी, रखवाला, महासंग्राम, बीबी हो तो ऐसी, बाप नंबरी बेटा दस नंबरी जैसी कई बड़े बजट की फिल्मों में काम करने का अवसर मिला लेकिन इन फिल्मों की असफलता के कारण वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में नाकामयाब रहे।लगभग 10 वर्ष तक मुंबई में संघर्ष करने के बाद वर्ष 1990 में आमिर खान-माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म ''दिल'' में अपने गीत 'मुझे नींद ना आये' की सफलता के बाद समीर गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये।वर्ष 1990 में ही उन्हें महेश भट्ट की फिल्म आशिकी में भी गीत लिखने का अवसर मिला। फिल्म 'आशिकी' में 'सांसों की जरूरत है जैसे', 'मैं दुनिया भूला दूंगा' और 'नजर के सामने जिगर के पास' गीतों की सफलता के बाद 'समीर' को कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गये।जिनमें बेटा, बोल राधा बोल, साथी, और 'फूल और कांटे' जैसी बडे बजट की फिल्में शामिल थी। इन फिल्मों की सफलता के बाद उन्होंने सफलता की नयी बुलंदियों को छुआ और एक से बढकर एक गीत लिखकर श्रोताओं को मंत्रमुंग्ध कर दिया
Sameer: Who writes songs from his heart
वर्ष 1997 में अपने पिता अंजान की मौत और अपने मार्गदर्शक गुलशन कुमार की हत्या के बाद समीर को गहरा सदमा पहुंचा। इस हत्याकांड में संगीतकार नदीम का नाम आने पर उन्होंने कुछ समय तक फिल्म इंडस्ट्री से किनारा कर लिया और वापस बनारस चले गये।
Suchitra Singh


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मंगलवार, 4 मार्च 2014

प्‍लेब्‍वॉय’ के कवर पर दिखेंगी पद्मा लक्ष्‍मी

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भारतीय मूल की मशहूर अमेरिकी मॉडल पद्मा लक्ष्‍मी 'प्‍लेब्‍वॉय' पत्रिका के कवर पेज पर जल्‍द ही दिखाई देंगी.बॉलीवुड अभिनेत्री शर्लिन चोपड़ा के बाद पद्मा लक्ष्‍मी ऐसी दूसरी भारतीय हैं जो प्‍लेब्‍वॉय पत्रिका के कवर पेज पर नजर आएंगे.शर्लिन जहां इस पत्रिका के कवर पेज पर न्‍यूड नजर आएंगी, वहीं पद्मा लक्ष्‍मी सफेद लॉन्‍जरी में दिखाई देने वाली है.ऐसा नहीं कहा जा सकता पद्मा लक्ष्‍मी का फोटोशूट हॉट नहीं है क्‍योंकि इन तस्‍वीरों में भी वह काफी सेक्‍सी नजर आ रही है.भले ही पद्मा ने प्‍लेब्‍वॉय न्‍यूड पोज नहीं दिया हो लेकिन वह इससे पहले कई पत्रिका के लिए ऐसी तस्‍वीरें खींचा चुकी है.अपने गर्भ को 'चिकित्सकीय चमत्कार' करार देने वाली पद्मा लक्ष्मी ने 20 फरवरी को एक बच्ची को जन्म दिया था.वर्ष 2007 में मशहूर लेखक सलमान रुश्दी से तलाक लेने वाली पद्मा लक्ष्मी ने अपनी बच्ची के पिता का नाम बताने से इंकार कर दिया.पद्मा लक्ष्‍मी इससे पहले कई पत्रिका के लिए ऐसी तस्‍वीरें खींचा चुकी है.


















पद्मा लक्ष्‍मी





पद्मा लक्ष्‍मी



पद्मा लक्ष्‍मी
पद्मा लक्ष्‍मी

पद्मा लक्ष्‍मी


पद्मा लक्ष्‍मी

पद्मा लक्ष्‍मी

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यूट्यूब से मिला नाम, पैसा और शोहरत

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शाहरुख़ ख़ान, यूट्यूब फ़ेस्ट


फ़ेसबुक और ट्विटर के अलावा इंटरनेट पर यूट्यूब एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जो रोज़ाना इस्तेमाल किया जाता है. यूट्यूब पर अलग-अलग विषयों पर कई करोड़ वीडियो हैं. आप मनोरंजन से लेकर न्यूज़ और संगीत से लेकर टीवी प्रोग्राम सब यूट्यूब पर देख सकते हैं.
लेकिन अब यूट्यूब का इस्तेमाल अपना हुनर दिखाने के लिए भी किया जा रहा है. भारत और विदेश में कई ऐसे लोग हैं जो अपना पेट अपने हुनर से पालते हैं. इन लोगों को आम बोल चाल की भाषा में यूट्यूबर्स कहा जाता है.
ये वो लोग हैं जो सिर्फ़ यूट्यूब के लिए ओरिजिनल वीडियो बनाते हैं और उसे यूट्यूब पर अपलोड कर शोहरत और हिट्स पाते हैं.
बीबीसी ने मुंबई में ऐसे ही कुछ यूट्यूबर्स से मुलाक़ात की जिन्होंने यूट्यूब के ज़रिए पैसा, नाम और शोहरत कमाया.

यूट्यूब पर देख एआर रहमान ने दिया मौक़ा: जोनिता

यूट्यूब के चैनल '88 कीज़ टू यूफ़ोरिया' को डेढ़ करोड़ से भी ज़्यादा बार देखा जा चुका है. इस चैनल के संचालक आकाश गांधी हैं, जो भारतीय मूल के अमरीकी हैं.
आकाश अपने इस यूट्यूब चैनल पर बॉलीवुड की धुनें पियानो पर बजाकर गानों को एक नया रूप देते हैं. इस चैनल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जोनिता गांधी. जोनिता और आकाश का कोई रिश्ता नहीं है. जोनिता कनाडा में पली बड़ी गायिका हैं और उन्हें बॉलीवुड गीत गाना पसंद है. जोनिता ने आकाश के यूट्यूब चैनल के लिए कई गाने गए है.
यूट्यूब, आकाश और जोनिता गांधी
जोनिता की आवाज़ यूट्यूब के ज़रिए संगीतकार एआर रहमान के कानों में पड़ी. थोड़े समय बाद एआर रहमान फ़िल्म हाइवे के लिए आवाज़ ढूंढ रहे थे, जोनिता की आवाज़ उन्हें पसंद आई और उन्होंने जोनिता को तुरंत चेन्नई रिकॉर्डिंग के लिए बुलाया.
जोनिता ने बीबीसी को बताया, "यूट्यूब से रहमान तक पहुंच जाऊंगी, ऐसा सोचा भी नहीं था. मैं रिकॉर्डिंग के समय कांप रही थी. मेरे गानों को बॉलीवुड के कई दिग्गजों ने यूट्यूब पर देखा और पसंद भी किया है. अमिताभ बच्चन ने भी मेरे गानों के लिंक ट्वीट किए हैं."
एआर रहमान के लिए गाने के बाद जोनिता की झोली में अब बॉलीवुड के कई प्रोजेक्ट हैं. जोनिता और आकाश यूट्यूब पर गाने बनाने के अलावा प्राइवेट संगीत कार्यक्रम भी करते हैं.

रिएलिटी शो ने निकाला, यूट्यूब ने स्टार बनाया: श्रद्धा शर्मा

श्रद्धा शर्मा, यूट्यूब, सिंगर
देहरादून के एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी श्रद्धा शर्मा एक यूट्यूब स्टार हैं.
18 साल की श्रद्धा को गाने का शौक़ बचपन से ही था. इस शौक़ की वजह से उन्होंने कई टीवी रियलिटी शो में हिस्सा लिया. कभी पहले राउंड से तो कभी दूसरे राउंड से बाहर निकलने के बाद भी श्रद्धा ने कभी हार नहीं मानी.
अपने घर में एक वीडियो रिकॉर्डर पर गाने गाकर श्रद्धा ने यूट्यूब पर अपलोड करना शुरू किया. अब श्रद्धा के यूट्यूब चैनल पर एक करोड़ से ज़्यादा हिट्स हैं और हाथ में यूनिवर्सल म्यूज़िक का कॉन्ट्रैक्ट.
श्रद्धा बताती हैं, "मैंने यूट्यूब पर बस मज़े-मज़े में वीडियो डालने शुरू किए, वो कैसे रातोंरात इतने लोकप्रिय हुए मुझे नहीं पता. बेशक मुझे रिएलिटी शो में हिस्सा लेने का मौक़ा न मिला हो लेकिन असलियत यही है कि मैंने अपने गायिका बनने के ख़्वाब को जी लिया है."
संगीतकार लेज़्ली लेविस ने अपने संगीत से श्रद्धा शर्मा की एल्बम ‘रस्ते’ को सजाया है.

लिल्ली सिंह उर्फ़ सुपरवूमन

लिल्ली सिंह, सुपरवूमैन
लिल्ली सिंह के वीडियो यूट्यूब पर काफ़ी पसंद किए जाते हैं.
कनाडा में जन्मी भारतीय पंजाबी लिल्ली सिंह यानी सुपरवुमन की यूट्यूब पर बहुत बड़ी फ़ैन फॉलोविंग है. लिल्ली के यूट्यूब चैनल पर क़रीब 20 करोड़ हिट हैं. लिल्ली अपने चैनल पर रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर व्यंग्यात्मक वीडियो डालती हैं.
शाहरुख़ ख़ान और बॉलीवुड की फ़ैन लिल्ली को हाल ही में माधुरी दीक्षित के साथ फ़िल्म 'गुलाब गंग' का प्रमोशन करने का अवसर मिला. इसके अलावा लिल्ली पंजाबी और अंग्रेज़ी में रैप भी करती हैं.
उन्हें पंजाबी गायक जस्सी सिद्धू के गीत 'हिपशेकर' में रैप करने का मौक़ा भी यूट्यूब पर बढ़ती लोकप्रियता की वजह से मिला. भारत में सुपरवूमन के कई करोड़ फ़ैन हैं, ख़़ास तौर पर 11 से 20 साल के लड़के-लड़की.

स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं, यूट्यूब है ना: शाहरुख़

बीते शनिवार को मुंबई में भारत और विदेश से आए कई यूट्यूबर्स को एक मंच पर अपने प्रशंसकों से मिलने का मौक़ा मिला. ये समारोह था यूट्यूब द्वारा आयोजित भारत का पहला यूट्यूब फ़ैन फ़ेस्ट.

इस फ़ेस्ट में शाहरुख़ ख़ान भी अपने बच्चों के साथ पहुंचे. शाहरुख़ ने कहा, "यूट्यूब एक बेहतरीन प्लेटफ़ॉर्म है, अब आपको स्ट्रगल करने की ज़रूरत नहीं है. आप अपने कमरे से ही सुपरस्टार बन सकते हैं.
sabhar :http://www.bbc.co.uk/


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रहस्यमय इस पहाड़ के पत्थरों से निकला है अनोखा संगीत

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रहस्यमय इस पहाड़ के पत्थरों से निकला है अनोखा संगीत

किसी पहाड़ से टकराने पर कोई आवाज आए, ऐसा आपने शायद ही कभी सुना होगा, मगर पेनसिल्वेनिया में ऐसे पत्थर हैं, जो बजते हैं और इनसे संगीत निकलता है। 128 एकड़ में फैले इस पहाड़ को 'रिंगिंग रॉक्स' कहा जाता है।

ये बड़े-बड़े पत्थर एक खास मैटलिक ध्वनि निकालते हैं। यहां के स्थानीय अमेरिकी इन्हें सालों से जानते हैं। इन्हें हथोड़े और पत्थरों से बजाते भी रहे हैं।
इन पत्थरों से निकलने वाली आवाज किसी को भी भ्रम में डाल सकती है। कोई भी सोच में पड़ सकता है कि क्या ये पत्थर के बने हुए ही पहाड़ हैं। वैज्ञानिकों और जिओलॉजिस्ट वर्षों से इन पर शोध कर रहे हैं। कई शोध के बाद भी यह पता नहीं चल पाया कि आखिर ये पहाड़ क्यों बजते हैं।
पेनसिल्वेनिया के जिओलॉजिस्ट रिचर्ड फास का कहना है, उन्होंने लैब में कई पत्थरों पर टेस्ट किया। उन्होंने पाया कि इन्हें मारने पर हर पत्थर एक लो फ्रीक्वेंसी साउंड पैदा करता है। जो हम सुन सकते हैं। हर पत्थर की ध्वनि के आपस में टकराने से जो सामूहिक ध्वनि पैदा होती है, वह हमारे कानों को सुनाई देती है।
 रहस्यमय इस पहाड़ के पत्थरों से निकला है अनोखा संगीत
यह ध्वनि कैसे पैदा होती है यह तो डॉब्फास ने पता कर लिया, मगर यह पहाड़ इतने खास क्यों हैं, यह पता नहीं कर पाए। यह पहाड़ वॉल्केनिक सबस्टेन्स डायाबेस से बने हैं। इनमें भी अन्य पत्थरों की तरह लोहा और अन्य मिनरल मौजूद हैं। मगर इनमें कुछ ऐसा भी है जो इनकी कंपोजिशन को अलग बनाता है। कुछ वैज्ञानिक पत्थरों में मौजूद तनाव को इनके बजने की वजह बनाते हैं।सिर्फ इनसे निकलने वाली आवाज ही इन पत्थरों को अलग नहीं बनाती है। यह पत्थरों की फील्ड पहाड़ के शीर्ष पर है। यानी यह कैसे बनी यह भी साफ नहीं है। साथ ही पत्थरों की इस फील्ड के आसपास कोई वनस्पति या पेड़-पौधे भी नहीं हैं। हर साल यहां हजारों पर्यटक इन्हें देखने और बजाने आते  हैं। कई लोग इन्हें इंस्ट्रूमेंट्स की तरह बजाते हैं।

रहस्यमय इस पहाड़ के पत्थरों से निकला है अनोखा संगीत
sabhar : bhaskar.com

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सोमवार, 3 मार्च 2014

अब आभूषण की तरह कान पर पहन सकेंगे कंप्यूटर

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अब आभूषण की तरह कान पर पहन सकेंगे कंप्यूटर


जापान के तकनीकी वैज्ञानिक कान पर पहना जा सकने वाला एक छोटा कंप्यूटर [पीसी] विकसित कर रहे हैं।

इसे पलकें झपकाकर, चेहरे की विभिन्न भावभंगिमाओं या जीभ की हरकतों से नियंत्रित किया जा सकेगा।
महज 17 ग्राम वजनी यह वायरलैस उपकरण ब्लूटूथ, ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम [जीपीआरएस], कंपास [दिशा सूचक यंत्र], बैटरी, बैरोमीटर, स्पीकर और माइक्रोफोन से लैस है। हिरोशिमा सिटी यूनिवर्सिटी के इंजीनियर कजाउहिरो तानीगुची ने कहा, यह पीसी तकनीक के क्षेत्र में गूगल ग्लास की तरह मील का पत्थर साबित हो सकता है। फिलहाल हमने इसे 'इयरक्लिप टाइप वियरेबल पीसी' नाम दिया है। इसमें माइक्रोचिप और डाटा स्टोरेज भी है जिसमें यूजर्स अपने सॉफ्टवेयर सुरक्षित रख सकते हैं।' यह वियरेबल पीसी अगले साल क्रिसमस के बाद बाजार में उपलब्ध हो सकता है। इसे आइपॉड या किसी भी दूसरे गैजेट के साथ जोड़ा जा सकता है। यह पीसी इंफ्रारेड सेंसर के इस्तेमाल से कार के अंदर होने वाली हरकतों पर नजर रख सकता है। इस पीसी को नियंत्रित करने के लिए हाथों की नहीं बल्कि आंखों और चेहरे की विभिन्न भाव भंगिमाएं ही काफी हैं।
संक्रमण से बचाने वाले एंजाइम का रहस्य खुला :
वाशिंगटन। शरीर में संक्रमण के खिलाफ लड़ने वाले एक एंजाइम के पीछे के रहस्य को शोधकर्ताओं ने सुलझा लिया है। शोध के नतीजों से संक्रमणकारी तत्वों के खिलाफ रणनीति तैयार करने, प्रोस्टेट कैंसर व मोटापे से लड़ने में मदद मिल सकेगी। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने आरनेस एल नाम के इस एंजाइम की थ्रीडी संरचना तैयार की है। इससे किसी भी वायरस के अनुवांशिक तत्वों के बारे में जानकारी हासिल करने और बैक्टीरिया से लड़ने में मदद मिलेगी। मनुष्य के शरीर में मौजूद यह एंजाइम प्रतिरक्षा प्रणाली के प्रति सबसे पहले प्रतिक्रिया करता है। सबसे अधिक लोकप्रिय होने के बावजूद भी इसके बारे में अभी तक पूरी जानकारी हासिल नहीं हो पाई थी।
यूनिवर्सिटी में मॉलीक्युलर बायोलॉजी के सहायक प्रोफेसर एलेक्सी कोरेनेक ने कहा, अब हमारे पास आरनेस एल का पूरी संरचना मौजूद है जिससे हमें वंशानुगत प्रोस्टेट कैंसर और मोटापे के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने में मदद मिलेगी। यह शोध जर्नल साइंस में प्रकाशित हुआ है। sabhar ;http://hindi.ruvr.ru/

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जोसेफ स्टालिन का रहस्यवादी युद्ध

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जोसेफ स्टालिन का रहस्यवादी युद्ध

दुनिया के इतिहास में द्वितीय विश्व युद्ध बीसवीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण और शायद सबसे दुखद घटना थी| यह भयानक युद्ध (द्वितीय विश्व युद्ध की घटनाओं का वर्णन इतिहास में विस्तार से किया गया हैं ) केवल मैदान पर ही नहीं, बल्कि एक अज्ञेय रहस्यमय स्तर पर भी लड़ा गया था|

जर्मन फ्यूरेर एडॉल्फ हिटलर के रहस्यवादी जूनून के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है| जर्मन संगठन "Ahnenerbe" (पूर्वजों की विरासत ) गूढ़ अनुसंधान और रहस्यमय शक्तियों से जुडी कलाकृतियों को खोजने में व्यस्त था और उस की गतिविधियों के बारे में भी विशेषज्ञ अच्छी तरह से जानते हैं| लेकिन इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन के लिए भी रहस्यवाद वास्तव में अनजाना विषय नहीं था, हालांकि सोवियत संघ का सरकारी रवैया नास्तिकता के प्रचार का था| हमारी आज की कहानी स्टालिन और उनके रहस्यवाद के बारे में है|
जोसेफ स्टालिन को पता था कि नाजी जर्मनी के साथ युद्ध अपरिहार्य था, लेकिन उन्होंने सोचा था कि यह युद्ध1941 में नहीं लेकिन दो या तीन साल बाद शुरू होगा| हिटलर द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण स्टालिन के लिए एक अप्रिय आश्चर्य के रूप में प्रकट हुआ| 22 जून 1941 के दिन बख्तरबंद जर्मन सेना ने सोवियत संघ की सीमा को पार कर लिया| हिटलर की सेना, जिसने उस समय तक आधे से अधिक यूरोप पर कब्जा कर लिया था, अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली थी| हिटलर की योजना एक आकस्मिक हमले के माध्यम से मास्को पर कब्जा करने की थी| प्रारंभ में जर्मन सैनिकों को उनके हमले में सफलता मिली और सोवियत सेना को हार के बाद हार का सामना करना पड़ा| शत्रु तेजी से मास्को की ओर बढ़ रहा था| शरद ऋतु तक सोवियत राजधानी में आतंक छा गया| स्टालिन के मास्को से प्रस्थान के बारे में अफवाहें चारों ओर फैल गई थीं| सरकार को स्थानांतरित करने के लिए तैयारी वास्तव में जारी थी| इस प्रयोजन के लिए एक विशेष ट्रेन को पूरी गोपनीयता में एक गुप्त स्थान पर तैयार रखा गया था|
मास्को के बाहरी इलाके में धन्य मात्रोना रहती थी जो रूसी ईसाइयों द्वारा अत्यधिक सम्मानित की जाती थी| वह जन्म से अंधी थी, लेकिन उसमें आध्यात्मिक आंखों के माध्यम से आम लोगों की तुलना में अधिक देखने की क्षमता थी| वह बीमार लोगों की चिकित्सा करती थी और उसे भविष्यवाणी करने की ईश्वरीय देन प्राप्त थी| मास्को छोड़ने के बारे में अंतिम निर्णय लेने से एक दिन पहले स्टालिन उसे मिलने के लिए गया| कहा जाता है कि जब स्टालिन ने कमरे में प्रवेश किया तो मात्रोना की पीठ दरवाजे की ओर थी और वह खिड़की के पास बैठीथी| कहते हैं कि स्टालिन कमरे में आया और उसने सहायक को बर्खास्त करने के लिए इशारा किया. मात्रोना चुपचाप बैठी थी| स्टालिन ने खांस कर अपनी उपस्थिति जताने की कोशिश की|
" जोसेफ क्या तुम्हें ठण्ड लग गई है ? तुम खाँस रहे हो," मात्रोना ने मुड़े बिना पूछा|
" नमस्ते", स्टालिन ने धीरे से जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ "|
"यह अच्छी बात है| तुम्हें अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत है| यह कठिन समय है और जल्द खत्म होने वाला नहीं है| हालांकि बचने के लिए एक विशेष ट्रेन तैयार करने कीकोई ज़रूरत नहीं थी | आपको इसकी आवश्यकता नहीं है| "
" आपको कैसे पता चला? " स्टालिन हैरान था |
" भगवान से", मात्रोना ने शांति से उत्तर दिया, “मत जाओ, जर्मन आक्रामक मास्को नहीं ले पाएगा|”
"और यह मेरी जीत होगी ? "
मात्रोना ने सिर हिलाकर जवाब दिया :
"तुम्हारी नहीं,हमारी| सभी लोगों की जीत| भगवान हमारे साथ है| खैर, तुम्हारी भी| तो तुमने नहीं जाने का फैसला किया है ? "
अपने चरमराते जूतों में स्टालिन ने एक पैर से दूसरे पैर पर भार बदलते हुए कहा, "इस के बारे में सोचना होगा|"
स्टालिन ने मास्को नहीं छोड़ा| हिटलर ने 7 नवम्बर 1941 के दिन रूसी राजधानी पर जीत के लिए योजना बनाई थी, लेकिन इस दिन लाल सेना द्वारा क्रेमलिन की दीवार के नीचे परेड का आयोजन किया गया| परेड का निरीक्षण स्वयं जोसेफ स्टालिन ने किया| नए टैंक परेड के मैदान में उतारे गए, साइबेरिया और सुदूर पूर्व से सैनिकों के दस्ते और नौसैनिक दल भी सेनानियों में शामिल हो गए| परेड से वे सीधे युद्धक्षेत्र की ओर रवाना हो गए| दुनिया में इस परेड के बारे में संदेश से अधिक कोई महत्वपूर्ण खबर नहीं थी| मास्को के निकट लाल सेना के जवाबी हमले ने नाजियों को आश्चर्यचकित कर दिया| सोवियत कैमरामैनों द्वारा निर्मित फिल्म "मास्को के पास जर्मन सैनिकों की हार" कई देशों में स्क्रीन पर दिखाई गई| भारत में यह फिल्म खास तौर पर लोकप्रिय हुई, क्योंकि भारत लड़ाई में हिटलर विरोधी गठबंधन में शामिल होने वाले पहले देशों में से एक था और यूरोप और अफ्रीका के मोर्चों पर नाजियों के विरुद्ध लड़ा| 1943 में, मास्को की लड़ाई के बारे में बनाए गए वृत्तचित्र ने सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र फीचर फिल्म के लिए "ऑस्कर" जीता|
दिव्यदृष्टा लोगों की एक विशेष क्षमता यह थी कि अच्छाई और बुराई के बीच सबसे बड़ी लड़ाई के परिणाम का चित्र उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाता था| वास्तविक घटनाओं से पता चला कि उनकी भविष्यवाणी कभी कभी बहुत सटीक रहती थी|
प्रसिद्ध मोहनिद्राप्रेरक और भेदक जादूगर वुल्फ मेस्सिंग ने कई देशों में दौरा किया| उन्होंने एक बार कहा था कि यदि जर्मनी सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध छेड़ेगा तो जर्मन फ्यूरर खुद मर जाएगा| जब हिटलर को इसके बारे में पता चला तो उसे बहुत क्रोध आया और उसने मेस्सिंग के सिर के लिए दो लाख जर्मन मार्क के पुरस्कार की घोषणा की| नाजी गुप्त सेवाओं को वुल्फ मेस्सिंग को वारसा में गिरफ्तार करने में कामयाबी मिली| परन्तु मेस्सिंग गेस्टापो को सौंपे जाने के बाद गार्ड को सम्मोहित करने में कामयाब रहे और हिरासत से भाग निकले| फिर वह सोवियत संघ पहुँच गए|
सोवियत शहरों में मेस्सिंग के दौरों को भारी लोकप्रियता मिली| वह सम्मोहन द्वारा लोगों का वशीकरण करते थे, और दर्शकों के विचारों को पढ़ लेते थे| सोवियत संघ पर जर्मन हमले से कुछ ही महीने पहले 1940 की सर्दियों में मेस्सिंग ने लाल सेना की जीत की भविष्यवाणी की| मेस्सिंग ने बताया कि उन्होंने अंतर्दृष्टि से वास्तविकता के रूप में बर्लिन की सड़कों पर सोवियत टैंक देखे थे| 1943 में एक प्रदर्शन के दौरान उन्होंने विजय का निर्दिष्ट दिनांक भी बताया-- मई 9| इस भविष्यवाणी के बारे में स्टालिन को भी पता चला| और जब 9 मई 1945 के दिन जर्मनी ने आत्मसमर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर किए तो स्टालिन ने मेस्सिंग को बधाई का तार भेजा|
युद्ध के बाद स्टालिन ने मेस्सिंग को क्रेमलिन बुलाया| कलाकार ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया परन्तु सोवियत नेता ने इसमें ज्यादा उत्साह व्यक्त नहीं किया| केवल अपने पाइप से धुआं उड़ाते हुए उन्होंने मेस्सिंग से पूछा:
अगर मैं आपको बाहर न निकलने देने के आदेश दूँ तो क्या आप क्रेमलिन के बाहर निकल सकते हैं?”
“मैं कोशिश कर सकता हूँ, कॉमरेड स्टालिन|” .
मेस्सिंग ने स्टालिन को अलविदा कहा और दरवाजा खोलकर बाहर चला गया| समूची सुरक्षा व्यवस्था को पार करने के बाद घर लौट आया| शाम को स्टालिन ने फोन किया:
“आप ऐसा कैसे कर पाए, मुझे बताओ? सभी चौकिओं पर आप को नहीं निकलने देने की चेतावनी दी गई थी|”
“यह बहुत आसान है। आप ने मेस्सिंग को रोकने का आदेश दिया था| मैं रक्षकों के मन में यह विश्वास पैदा कर पाया कि मैं मार्शल वराशीलोव हूँ|”
महान युद्ध के प्रकोप के साथ भी एक रहस्यमय इतिहास जुड़ा हुआ है| नाजी जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमले से कुछ ही समय पहले 1941 की गर्मियों में स्टालिन ने व्यक्तिगत रूप से तैमूर राजवंश की कब्र की खुदाई की शुरुआत के निर्देश पर हस्ताक्षर किए थे| अक्सर कहा जाता है कि तैमूर लंग या तैमूर इतिहास में सबसे बड़े विजेताओं में से एक था जिसने 14वीं सदी में मध्य एशिया में एक विशाल राज्य बनाया और रूस, भारत, ईरान और चीन के विरुद्ध कई लम्बे सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया| तैमूर का मकबरा समरकंद में सोवियत संघ के क्षेत्र पर था| बड़ी संख्या में पुरातत्वविदों और खुफिया कर्मियों का दल वहाँ भेजा गया| खुदाई का काम तेजी से किया गया| सबसे पहले तैमूर लंग के बेटे और पोते के अवशेष पाए गए| उन्के नीचे हरिताश्म पत्थर की तीन टन की एक स्लैब पर तैमूर लंग के अनेक नाम और ताबूत खोलने की चष्ट करने वालों के नाम एक चेतावनी दिखाई दी| शिलालेख पर लिखा था: "यदि कोई भी व्यक्ति तैमूर की कब्र खोलने की कोशिश करेगा तो वह सजा का भागी होगा और दुनिया भर में भयंकर युद्ध छिड़ जाएगा| " खतरनाक शब्दों ने शोधकर्ताओं का जोश ठंडा कर दिया लेकिन फिर भी स्लैब उठाने का फैसला किया गया| तैमूर लंग के अवशेष 21 जून 1941 को निकाले गए और अगले दिन 22 जून को पुरातत्वविदों ने रेडियो पर सुना कि नाजी जर्मनी ने आक्रमण न करने की संधि का उल्लंघन करते हुए सोवियत संघ की सीमा को पर कर लिया|
पुरातत्वविदों का दल मॉस्को लौट आया| स्टालिन को खुदाई और कड़ी चेतावनी के बारे में कुछ महीनों के बाद ही बताया गया| उन्होंने तुरंत महान
विजेता और उसके रिश्तेदारों के अवशेष फिर से दफनाने के लिए आदेश दिया| महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सम्बन्ध में तीन रोचक तथ्य
सामने आये: पहला तथ्य यह है कि तैमूर वंश के अवशेषों के
विधिपूर्ण शवाधान के लिए उस समय के लिए एक बड़ी राशि का
आवंटन किया गया- इस राशि से 16 टैंकों का निर्माण किया जा सकता था| दूसरा तथ्य: दफन से से पहले तैमूर लंग के अवशेष एक महीने के लिए पुरातत्वविदों की दृष्टि से ओझल हो गए|
लाल सेना में भर्ती मुस्लिम सैनिकों के मुताबिक, जिनकी संख्या काफी बड़ी थी, तैमूर लंग के अवशेष इस समय में युद्ध मोर्चों पर दिखाई
दिए| वे ईसाई धार्मिक स्मृति चिन्हों की तरह प्रतिष्ठित किए गए ताकि योद्धाओं को प्रेरित कर सकें|. स्टालिन ने उन्हें हवाई जहाज पर
युद्धक्षेत्र की लाइन पर ले जाने का आदेश दिया| तीसरा और अंतिम तथ्य: तैमूर लंग और उसके परिवार के अवशेषों को पूर्ण सम्मान के साथ 20 दिसम्बर 1942 को दफनाया गया| और इन दिनों सोवियत सेना ने स्टालिनग्राद की लड़ाई में घिरी फ़ील्डमार्शल Paulus की सेना को छुड़ाने की कोशिश कर रहे जर्मन सैनिकों को पछाड़ दिया| इस सफलता ने जर्मन सेना की स्थिति को बिलकुल निराशाजनक बना दिया| और छह हफ्ते बाद फील्ड मार्शल Paulus ने अपनी सेना के अवशेष के साथ आत्मसमर्पण कर दिया| स्टालिनग्राद में सोवियत सेना की जीत द्वितीय विश्व युद्ध में एक महत्वपूर्ण मोड़ था|

अमेरिकी पत्रिका "टाइम" ने 1942 में स्टालिन को Man of the Year के रूप में मान्यता दी| इस साप्ताहिक पत्रिका की रेटिंग में स्टालिन ने पहले भी खुद को पाया था लेकिन एक तानाशाह और एक दुष्ट
प्रतिभाशाली आदमी के रूप में| इस बार स्टालिन को बुराई के खिलाफ लड़ाई में एक नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया| इंग्लैंड के किंग जॉर्ज VI ने उन्हें एक प्रतीकात्मक तलवार निम्नलिखित उत्कीर्ण शब्दों के साथ भेजी: "स्टालिनग्राद के फौलादी लोगों को समर्पित"
1943 में तेहरान में आयोजित एक सम्मेलन में हिटलर विरोधी गठबंधन के तीन नेता जोसेफ स्टालिन, फ्रेंकलिन रूजवेल्ट और विंस्टन चर्चिल पहली बार मिले| सम्मेलन के परिणाम स्टालिन के लिए काफी अनुकूल निकले| सबसे पहले, मित्र राष्ट्रों ने मई 1944 से पहले ब्रिटिश चैनल के इस पार दूसरे मोर्चे को खोलने का वादा किया| और दूसरी बात, जीत के बाद प्रतिभागियों के बीच जर्मनी के विभाजन पर एक प्रारंभिक समझौते पर भी सहमति बन गई|
विद्वान् विंस्टन चर्चिल के अनुसार स्टालिन में कुछ रहस्यमय शक्ति थी: “जब स्टालिन हॉल में आया तो मैं, एक रईस, कूद कर, और दोनों हाथ सिपाही की तरह सीधे रख कर खड़ा हो गया," विंस्टन चर्चिल ने अपने संस्मरण में इस भेंट की चर्चा करते हुए बाद में लिखा|
उसी वर्ष 1943 में राज्य द्वारा प्रोत्साहित नास्तिकता के समर्थक देश सोवियत संघ में आर्थोडक्स चर्च का उत्पीड़न बंद कर दिया गया| ईसाई चर्चों, मठों, धार्मिक अकादमी को फिर से खोल दिया गया और रूसी चर्च के पैट्रिआर्क को चुना गया| यह एक और रहस्यमय कहानी का परिणाम था|
लेबनान के पहाड़ों पर बसे Antiochian आर्थोडक्स ईसाई चर्च के मेट्रोपोलिटन एलिजा शत्रुओं के आक्रमण से रूस की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने वालों में अग्रणी थे| उन्होंने एकांत में प्रार्थना करने के लिए एक गहरे पथरीले तहखाने को चुना जहाँ बाहर की दुनिया से कोई आवाज नहीं आ सकती थी| भोजन, पानी और नींद का परिष्कार करते हुए उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया| तीन दिन बाद उन्होंने एक आवाज सुनी जिसने उन्हें बताया कि रूस में क्या किया जाना जरूरी है| कहा जाता है कि एलिजा ने लिखा: मंदिरों, मठों, धार्मिक अकादमियों और मदरसों को खोल दिया जाए| पुजारियों को युद्ध के मोर्चे से तुरंत वापिस बुलाया जाए ताकि वे ईश्वर की सेवा कर सकें| गुफा से बाहर निकलने के बाद मेट्रोपोलिटन एलिजा ने रूसी आर्थोडक्स चर्च के प्रतिनिधियों और सोवियत सरकार से संपर्क किया| भूतपूर्व सोवियत संघ की राज्य सुरक्षा समिति के अभिलेखागार में आजतक उनका टेलीग्राम और पत्र सुरक्षित हैं| स्टालिन ने उनकी शर्तें पूरी तरह से स्वीकार कर लीं|
युद्ध में जीत के बाद अक्टूबर 1947 में स्टालिन ने मेट्रोपोलिटन एलिजा को रूस आमंत्रित किया| इस बैठक पर खींची गई फिल्म की फुटेज आज भी संरक्षित है| मेट्रोपोलिटन एलिजा को रत्नों से सजाया पवित्र आइकॉन और क्रॉस उपहार में दिये गये| परन्तु मेट्रोपोलिटन एलिजा ने दो लाख डॉलर के स्टालिन पुरस्कार से इंकार कर दिया और इस राशि को उन अनाथ बच्चों के रखरखाव पर खर्च करने का आदेश दिया जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में अपने पिता को खो दिया था| sabhar :http://hindi.ruvr.ru/

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जब देवी के सामने सबको 'सेक्स' करने की आज्ञा मिली'

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ये अंश दीवान जरमनी द्वारा रचित उपन्यास 'महाराजा' से लिया गया है। 'महाराजा' उपन्यास हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं की निजी जीवनचर्या, प्रेम-प्रसंग और षड्यंत्र पर आधारित है।

मोती बाग पैलैस के उत्तर-पूर्व कोने में, एकांत में, एक बहुत बड़ा हाल था। उसी में सप्ताह में दो बार तांत्रिक सभाएं होने लगीं। इनमें सिर्फ वहीं लोग शरीक हो सकते थे जो नियमानुसार दीक्षा ले चुके हों और जिनकी अच्छी तरह परीक्षा ली जा चुकी हो।अनेक युवतियां, जिनमें कुछ कुंवारी भी थीं, इस नए मत में शामिल हो गईं। महाराजा के कुछ खास मुसाहिब और नातेदार भी दीक्षा लेकर सदस्य बन गए। परंतु महाराजा एक मामले में सावधान रहे कि उनकी सीनियर महारानियों या पुराने बुद्धिमान अफसर लोगों में से कोई इस मत में शामिल ना होने पाए जो उनके असली इरादे की जानकारी हासिल कर सके।
दीक्षा लेने वालें की तादात 300 से 400 तक पहुंच गई। धर्म सभा की हर बैठक में कम से कम 150 से 200 तक व्यक्ति शरीक होते थे, जिनमें दो तिहाई तादात औरतों की और एक तिहाई मर्दों की होती थी।कौलाचार्य व्याध्रचर्म पहने, घुटे सिर, संबी शिखा और सिंदूर से चेहरे को रंगे हुए आधायात्मिक गुरु की हैसियत से धर्म सभा का संचालन करता था। देखने में वह भयानक लेकिन गंभीर और तपस्वी लगता था। उसने अपने हाथ से देवी की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई थी जिसे भांति-भांति के रंगों से रंग कर महाराजा के खजाने से लाए गए हीरे, मोतियों और कीमती रत्नों से जड़े हुए हार, बाजूबंद और बालियां वगैरह जेवरात पहनाए गए थे।शुरू में कोलाचार्य की आज्ञा पाकर सभा में एकत्र साधक भक्त देवी की पार्थना के भजन गाते। इसके बाद हर एक को देवी के प्रसाद की तरह-तरह की तेज मदिराओं को एक में मिलाकर तैयार की हुई शराब पीने को दी जाती। मद्यपान का यह दौर जब एक-दो घंटे चल चुकता और भक्तों को नशा चढ़ता तब कौलाचार्य कुंवारी युवतियों को बुलाता कि वे आगे आकर देवी के सामने एकदम नंगी हो जाएं और प्रार्थना के गीत गाएं। सभा में हर एक समारोह के मौके पर कौलाचार्य वहां मौजूद भक्तों में से किसी को - खास तौर पर महाराजा को ही- धार्मिक कृत्यों का संचालक नियुक्त करता है। कुंड में आग जलती रहती जिसमें भांत‌ि-भांति के मसाले, घी, अनाज, धूप आदि की आहुतियों देकर हवन होता रहता।ज्यो-ज्यों रात बीतती, साधक भक्तों को नशा चढ़ता जाता और वे अपनी सुध-बुध खो बैठते। तब कौलाचार्य पुरूषों और महिलाओं को आज्ञा देता था कि वे एकदम नंगे होकर देवी के सामने मैथुन (सेक्स) करें। रनिवास के घाय घर से बुलाई हुई 12 से 16 साल तक उम्र की कुंवारी लड़कियां नशे में चूर देवी के सामने नंगी करके लाईं जातीं।ये कुंवारी लड़कियां पहाड़ी इलाकों तथारियासत के गांवों से लाकर महल के घायघर में पाली जाती थी। जब वे सयानी हो जाती तब महाराजा की खिदमत में पेश होती और धर्म सभाओं में भी उनको शरीक होना पड़ता। उनकी गर्दन पर से शराब उड़ेली जाती जो उनके स्तनों पर से बहती हुई नीचे के अंगों तक पहुंचती। महाराजा तथा दूसरे पुरूष भक्त अपने होंठ लगाकर उस बहते हुए द्रव की कुछ बूंदे पीते, क्योंकि उसे बड़ा पवित्र और आत्मा को शुद्ध करने वाला प्रसाद माना जाता था। उसी समय देवी के आगे पशुओं की बलि दी जाती थी। उस हाल में जहां देवी की पूजा होती थी, चारो तरफ लहू बहने लगता।बधिक के सधे हुए हाथ के एक ही वार से बलि होने वाले पशुओं के खून से दरबार के हट्ठे-कठ्ठे सरदारों द्वारा पूरी ताकत से बलात्कार की शिकार कुंवारी लड़कियों की योनियों से निकला खून उनके बदन के निचले अंगों पर बहता हुआ आकर मिल जाता। sabhar :http://www.amarujala.com/

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रविवार, 2 मार्च 2014

सनी लियोनी शरमा रहीं हैं इन दृश्‍यों से

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शरमा क्यों रही हैं सनी


जिस्म की नुमाइश नहीं

शरमा क्यों रही हैं सनी


सनी लियोनी चाहती हैं कि उनकी इमेज ठेठ पोर्न एक्ट्रेस के रूप में अब न हो। लेकिन रागिनी एमएमएस 2 के कई ऐसी सीन हैं जिन्हें करने में सनी लियोनी को आपत्ति थी। लेकिन बाद में वह दृश्य फिल्माए गए।

नहीं दिखाना चाहती थीं क्लीवेज


नहीं दिखाना चाहती थीं क्लीवेज

फिल्‍म की शूटिंग के दौरान ही सनी लियोनी चाहती थीं कि उनके क्लीवेज न दिखाएं जाएं। एक सीन में जब सनी की टॉप उतरनी थी तो सनी ने बॉडी डबल की मांग की थी। हालांकि उनकी यह मांग खारिज हो गई थी। 


नहीं चाहतीं कि सेक्‍सी फिल्‍म कही जाए


नहीं चाहतीं कि सेक्‍सी फिल्‍म कही जाए

असल में यह फिल्म ‘रागिनी एमएमएस’ का सीक्वल है। अब एकता और उनकी टीम सीक्वल को हॉरर के साथ सेक्सी बता कर इसकी मार्केटिंग कर रहे हैं। जबकि सनी चाहती हैं कि फिल्म को सिर्फ हॉरर के रूप में प्रमोट किया जाए। सनी नहीं चाहती कि फिल्म को दो रूपों में पेश किया जाए।

जिस्म की नुमाइश नहीं

अभी तक इस फिल्म के जो भी पोस्टर, ट्रेलर या गाने सामने आए हैं, उनसे साफ है कि पूरा जोर सनी के जिस्म की नुमाइश पर दिया जा रहा है। सनी को यह बात अखर रही है क्योंकि वह नहीं चाहतीं कि दर्शक उन्हें उनके अतीत के लिए याद करें। वह अपनी पोर्न स्टार वाली इमेज छोड़ कर बॉलीवुड में आगे बढ़ना चाहती हैं। 

नाम पर भी आपत्ति

नाम पर भी आपत्ति

रागिनी एमएमएस 2 के नाम के आगे इस बाद दोगुना मजा शब्द जोड़ दिया गया है। इस नाम से भी सनी लियोनी को आपत्ति हो रही है। सनी ‌को लगता है कि लोगों को लगेगा कि यह पूरी तरह से मसाला फिल्‍म है।
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शनिवार, 1 मार्च 2014

अजब चमत्‍कार कही दूसरे ग्रह से आई बताने वाली बाबी डाल माडल कही सेक्सी महिला रोबोट

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बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली लड़की





वह दिखती है बार्बी डॉल की तरह। उसकी आंखें, उसका शरीर, उसकी स्टाइल आपको चौंका देगी कि इतनी बड़ी, असली लड़की दिखने वाली, सांस लेने वाली बार्बी डॉल कब बन गई? लेकिन सच यह है कि यह बच्चों के खेलने वाली बार्बी डॉल गुडि़या की तरह दिखती जरूर है पर है एक जीती-जागती असली लड़की। जी हां, एक शक्ल वाले दो इंसानों को देखकर आप भगवान के करिश्मे की बात करते हैं। पर दुनिया की सबसे मशहूर गुडि़या बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली इस लड़की को देखकर आप शायद कह उठें, भगवान तू भी इंसानों का मॉडल चुराने लगा । इससे भी ज्यादा रोमांचक इस लड़की की बातें हैं जो खुद को समय में घूमने वाली आध्यात्मिक गुरु बताती है और यहां आने का मकसद संसार में पनप रही नकारात्मक सोच को खत्म करना बताती है।
यूक्रेन की मॉडल वलेरिया लुक्यानोवा को पहली बार देखकर शायद आप चकमा खा जाएं कि आपके सामने कोई आदमकद बार्बी डॉल खड़ी है। वलेरिया लुक्यानोवा हूबहू बार्बी डॉल की तरह दिखती हैं। शारीरिक बनावट, कद काठी, चेहरे के भावों से आपको कहीं भी उनके बार्बी डॉल न होने का शक नहीं होता है। पर आप सोचते हैं कि सांस लेने वाली, आदमकद बार्बी डॉल कब बन गई! बार्बी डॉल की तरह दिखने वाले अपने चेहरे और कद-काठी के कारण 21 वर्षीय यह यूक्रेननियन मॉडल आजकल हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि इससे भी अधिक दिलचस्प वलेरिया की बातें हैं। उनके अनुसार वह समय से यात्रा करने वाली आध्यात्मिक गुरु हैं और दुनिया में बढ़ रही नकारात्मकता को कम करने के लिए ही वह आई हैं। sabhar :http://www.jagran.com/
महिलाओं की तरह सेक्स रोबोट

सेक्स रोबोट की मांग को देखते हुए अमेरिका की एक कंपनी ने सेक्‍स रोबोट बनाया है। इस रोबोट का हर हिस्‍सा स्‍त्री शरीर की तरह हैं। स्‍कॉट मैकलीन का कहना है कि 2004 से रोबोट पर कार्य चल रहा था अब यह पूरा हो पाया है। सेक्‍स रोबोट की मांग इतनी है कि दुनिया के कई देशों के लोग रोबोट के निर्माता कंपनी से एडवांस बुकिंग करवा रहे हैं। यूके, रूस और कोरिया के कंज्‍यूमर एडवांस बुकिंग करवा चुके हैं। वे आगे कहते हैं कि लोग मुझसे ऐसे रोबोट बनाने की मांग करते हैं जो हॉलीवुड सेलीब्रिटी एंजेलिना जोली, पामेला एंडसन और माइकल जैक्‍सन से मिलते जुलते हो। लेकिन उनकी हम शक्‍ल रोबोट बनाने के लिए मुझे उनसे इजाजत लेनी पड़ेगी।
48 वर्षीय डगलस हिंस ने रॉकी नाम की यह रोबोट तैयार किया है। यह 5 फीट 6 इंज लंबा है। इसे सिलीकोन से बनाया गया है तथा महिलाओं की तरह बाल लगाए गए हैं। यह बातें भी करती है। साथ ही यह मानव अंगों को उत्‍तेजित करने में भी समर्थ है। इस रोबोट की खासियत यह है कि अगर गर्ल फ्रेंड छोड़कर चली गई हो तो इससे दिल बहलाया जा सकता है। यह कभी आपका दिल नहीं तोड़ेगी। न ही यह कुछ डिमांड करेगी। sabhar :http://dainiktejkhabar.blogspot.in/

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अब ब्रेनटॉप

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प्रीतंभरा प्रकाश
सुनने में भयावह लग सकता है कि आपका हाथ किसी और की इच्छा के हिल-डुल रहा है और उस 'किसी और' को आप देख भी नहीं पा रहे। लेकिन अब यह संभव हो गया है। पिछले दिनों वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में ह्यूमन टु ह्यूमन ब्रेन इंटरफेस को पहली बार दफे सफल पाया गया।

यहां के वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम डिवेलप किया है, जिसमें एक व्यक्ति एक खास इंटरफेस का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति की सोच को कंट्रोल कर सकता है। यह इंटरफेस इंटरनेट के जरिए दोनों के दिमागों को कनेक्ट करता है। एक और खास बात यह कि इसे डिवेलप करने वाली रिसर्च टीम में एक भारतीय भी शामिल है।

वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रफेसर राजेश राव ने इलेक्ट्रिकल ब्रेन रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके अपना दिमागी सिग्नल अपने साथी को भेजा। इस सिग्नल की वजह से उनके साथी की कीबोर्ड पर टिकी उंगली में हरकत हुई। राव के असिस्टेंट स्टोको का कहना है कि कंप्यूटरों की तरह ही इंटरनेट दो दिमागों को भी कनेक्ट कर सकता है, और हम दिमाग में बसे ज्ञान को एक इंसान से दूसरे के दिमाग में ट्रांसफर करना चाहते हैं।
इससे पहले ड्यूक यूनिवसिर्टी के रिसर्चरों ने दो चूहों के बीच और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इंसान और चूहे के बीच ब्रेन टु ब्रेन कम्युनिकेशन का प्रयोग किया था। राव का मानना है कि उनका प्रयोग इंसानों के बीच ब्रेन कम्युनिकेशन का पहला साइंटिफिक प्रयोग है।

ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस पर वैज्ञानिक लंबे समय से काम करते रहे हैं। जल्दी ही हम अपने स्मार्टफोन या कंप्यूटर को केवल अपने दिमाग से निर्देशित कर सकेंगे। कुछ सालों में नौबत यहां तक आ सकती है कि आपका रोबोट असिस्टेंट आपके पास नींबू पानी का ग्लास लेकर खड़ा हो, क्योंकि आपके बताए बगैर ही उसे पता चल चुका है कि आपको प्यास लगी है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जर्नल में छपे रिव्यू के मुताबिक, एक जानी-मानी टेक्नोलॉजी कंपनी ऐसे टैबलेट का परीक्षण कर रही है, जिसे दिमाग से ही नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके लिए एक हैट पहनने की जरूरत पड़ेगी, जिसमें मॉनिटरिंग इलेक्ट्रोड्स लगे होंगे।

कैलिफोर्निया की कंपनी न्यूरोस्काई ने हाल ही में एक ब्लूटूथ वाला हेडसेट रिलीज किया है, जो ब्रेन वेव्स के हलके-फुलके बदलाव भी मॉनिटर कर सकता है। इससे लोगों को कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर कंसंट्रेशन बनाकर रखने वाले गेम्स खेल पाने की सुविधा मिल रही है। इसके सहारे जो गेम्स खेले जा रहे हैं, उनमें दिमाग का रोल जॉयस्टिक वाला है। एक और कंपनी इमोटिव ऐसा हेडसेट बेच रही है, जो एक बड़े से एलियन हाथ की तरह दिखती है।

यह ब्रेन वेव्स को पढ़ सकती है और इसका इस्तेमाल फ्लिकर फोटोज तलाशने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए कीवर्ड्स नहीं चाहिए। खुशी या उत्साह जैसे आपके मनोभाव को समझकर उसी के मुताबिक तस्वीरें यह तलाशेगा। एक और लाइटवेट वायरलेस हेडबैंड म्यूज में एक ऐसा ऐप है जो ब्रेन को एक्सरसाइज करने के लिए उकसाता है।

कार बनानेवाली कंपनियां भी ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैँ, जिनसे ड्राइविंग के दौरान झपकी आने पर सीट को ही इसका आभास हो जाए और वह आपको सचेत कर दे। आंख लग जाने पर स्टीयरिंग व्हील खड़खड़ाने लगे तो ड्राइव करने वाले की नींद अपने आप खुल जाए। हालांकि इस बारे में ब्राउन इंस्टीट्यूट के न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन डी़ का कहना है कि ऐसी तमाम तकनीकें दिमागी बातचीत को बाहर से सुनने की कोशिश भर हैं, जबकि दिमाग की उथल-पुथल को सही मायनों में जानने के लिए हमें ब्रेन में सेंसर्स इंप्लांट करने की जरूरत पड़ेगी। ये सेंसर चिप के रूप में भी हो सकते हैं।


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ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस नामक तकनीक की कल्पना वैज्ञानिकों ने इसलिए की थी, ताकि पैरालिसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग कंप्यूटर से संवाद बनाकर रोबोट को कंट्रोल कर सकें और तरह अपने छोटे-मोटे काम खुद ही संपन्न करके अपनी असमर्थता पर काबू पा सकें। पिछले दिनों ब्रेनगेट नाम के एक प्रोजेक्ट में टोटल पैरालिसिस से ग्रस्त दो लोगों ने केवल अपने दिमाग के इस्तेमाल से मनचाहे काम किए।

इनमें से एक महिला 15 सालों से अपने हाथ हिलाने में भी असमर्थ थी, लेकिन रोबोटिक आर्म और अपनी ब्रेन एक्टिविटी को रेस्पांड करने वाले कंप्यूटर के सहारे उसने कॉफी की बोतल पकड़ी, अपने लिए कॉफी सर्व की और बोतल को वापस टेबल पर रख दिया। यह सब रोबोटिक आर्म के मूवमेंट्स के बारे में सोचने भर से संभव हो गया।

हालांकि दिमाग के भीतर लगे चिप के लंबे समय तक काम कर सकने के बारे में वैज्ञानिक अभी कुछ खास नहीं कर सके हैं। फिलहाल अमेरिका में जारी ब्रेन एक्टिविटी मैप प्रोजेक्ट में इस समस्या पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट के बाद स्मार्टफोन और टैबलेट्स की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव होंगे।

केवल सोचने भर से टीवी चैनल बदल लेने की संभावना भी जताई जा रही है। कुछ फ्यूचरिस्ट वैज्ञानिकों का दावा है कि सन 2045 तक इंसान अपने दिमाग को ही कंप्यूटर पर अपलोड करने में कामयाब हो जाएगा।

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इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे रोबॉट, पैदा करेंगे बच्चे!

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लंदन
आपने रजनीकांत की रोबॉट फिल्म तो देखी होगी। इसमें रोबॉट बने रजनीकांत का उसके साथी मजाक बनाते हैं कि वह सेक्स नहीं कर सकता, इसलिए वह इंसानों जैसा नहीं है। लेकिन जरा सोचिए क्या हो, अगर रोबॉट भी सेक्स करने लगें और बच्चे पैदा करने लगें। हालांकि इंजीनियर और नोवेलिस्ट जॉर्ज जैरकैडाकिस का मानना है कि अगले 20-30 साल में ऐसा संभव है। जॉर्ज के मुताबिक, भविष्य में रोबॉट न सिर्फ दूसरे रोबॉट के साथ सेक्स कर सकेंगे, बल्कि इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इंजीनियर जॉर्ज का मानना है कि ऐसा करने से बेहतर रोबॉट पैदा होंगे। उनके मुताबिक, रोबॉट के इंसानों के साथ संबंध बनाने से हाइब्रिड प्रजाति विकसित होगी। रोबॉट और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञों के अनुसार, यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि वर्तमान में ही ऐसे रिसर्च और तकनीक उपलब्ध हैं, जिससे ऐसा संभव हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों को भी इसके बुरे प्रभाव को लेकर चिंता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रोबॉट इंसानों से ज्यादा पैदा होने लगे, तो वह समय बुरे सपने से कम नहीं होगा।

बच्चे पैदा नहीं, प्रिंट होंगे: रोबॉट के विकास से जुड़े वैज्ञानिकों की अगर मानें तो यह रोबॉट बच्चे पैदा नहीं प्रिंट करेंगे। शेफील्ड यूनिवर्सिटी के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और रोबॉटिक्स के प्रफेसर नोएल शार्की के अनुसार, रोबॉट 3-डी तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चों को जन्म दे सकते हैं। नोएल के अनुसार, रोबॉट अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव लाकर सेक्स के दौरान अपनी खूबियों को बढ़ा या एक्सचेंज कर सकते हैं। उनके बच्चों में इन खूबियों का मिश्रण देखने को मिल सकता है। इन रोबॉट के पास कार्बन और सिलिकन से बना डिजिटल दिमाग होगा।


वायरस से भी होगी सुरक्षा: विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि रोबॉट द्वारा सेक्स करने से उनके सॉफ्टवेयर वायरस से भी बचे रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे सेक्स करने से मनुष्यों को कई संक्रमित बीमारियां नहीं होतीं।

बुढ़ापे का इलाज: वैज्ञानिकों के अनुसार इन रोबॉट-इंसानों के हाइब्रिड की दिशा में हो रही रिसर्च से बुढ़ापे के बारे में भी और जानकारी मिल सकती है। यह रिसर्च इंसानी शरीर को जानने की दिशा में लाभदायक होगी और यह जाना जा सकेगा कि बुढ़ापे के लिए जिम्मेदार अल्टशाइमर्त्स बीमारी का असर इंसानी दिमाग पर किस तरह और कितना होता है। प्रफेसर वार्विक ने कहा कि रोबॉट का एक दूसरे से सेक्स करना और रोबॉट पैदा करना सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करेगा। 20 साल के बाद जब यह पूरी तरह से संभव हो जाएगा तब इस तकनीक को स्वीकार करने मे नैतिक दिक्कते आएंगी। वैसे वैज्ञानिकों की इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं। वैज्ञानिका जॉर्ज डायसन का मानना है कि ऐसे रोबॉट शनि के चांद एनक्लेडस से मंगल ग्रह पर बर्फ लाने में मदद कर सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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