Sakshatkar.com : Sakshatkartv.com

.

Item Post Navigation Display

Home Recent Posts Display

Related Posts Display

शनिवार, 26 अगस्त 2023

शिव शक्ति' और 'तिरंगा' से पहले चांद पर मौजूद है 'जवाहर पॉइंट', जानिए पूरी कहानी

0

शिव शक्ति' और 'तिरंगा' से पहले चांद पर मौजूद है 'जवाहर पॉइंट', जानिए पूरी कहानी 

Chandrayaan Mission Site Name: यह एक वैज्ञानिक परंपरा है कि जिस जगह लैंडर उतरता है उसका नामकरण किया जाता है. चंद्रयान-3 की इम्पैक्ट साइट को 'शिव शक्ति' और चंद्रयान-2 की साइट को 'तिरंगा' नाम दिया गया है. इससे पहले मनमोहन सरकार में चंद्रयान-1 की इम्पैक्ट साइट को 'जवाहर पॉइंट' नाम दिया गया था, जिसे लेकर अब खूब चर्चा हो रही है.

चंद्रयान-3 के 'विक्रम लैंडर' ने चांद पर जिस जगह कदम रखा है उस पॉइंट को 'शिव शक्ति' नाम दिया गया है. इसके अलावा पीएम मोदी ने उस पॉइंट को 'तिरंगा' नाम दिया है जहां चंद्रयान-2 लैंडर क्रैश हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेंगलुरु में इसरो टेलीमेट्री ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क मिशन कंट्रोल कॉम्प्लेक्स में वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए चांद पर दोनों पॉइंट के नाम की घोषणा की. इसके साथ ही पीएम मोदी ने हर साल 23 अगस्त को नेशनल स्पेस डे मनाने की घोषणा की है.

यह एक वैज्ञानिक परंपरा है कि जिस जगह लैंडर उतरता है उसका नामकरण किया जाता है. लेकिन चांद पर शिव शक्ति पॉइंट और तिरंगा पॉइंट से पचंद्रयान-3 की लैंडिंग के बाद से 'जवाहर पॉइंट' सोशल मीडिया पर ट्रैंड कर रहा है. बीजेपी के कई नेताओं और 'X' (पहले ट्विटर) यूजर्स चंद्रयान-1 मिशन की लैंडिंग साइट के नाम पर आपत्ति जता रहे हैं. आइए जानते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी. हले एक और पॉइंट है जिसका नाम 'जवाहर पॉइंट' है. 
चंद्रयान-3 की लैंडिंग के बाद से 'जवाहर पॉइंट' सोशल मीडिया पर ट्रैंड कर रहा है. बीजेपी के कई नेताओं और 'X' (पहले ट्विटर) यूजर्स चंद्रयान-1 मिशन की लैंडिंग साइट के नाम पर आपत्ति जता रहे हैं. आइए जानते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी. Sabhar aajtak.in

Read more

क्‍या वाकई अजर, अमर, अविनाशी होती है आत्‍मा? क्‍या कहता है विज्ञान

0

क्‍या वाकई अजर, अमर, अविनाशी होती है आत्‍मा? क्‍या कहता है विज्ञान 

Is human soul really immortal - धर्म कहता है कि आत्‍मा अजर, अमर, अविनाशी है. अलग-अलग धर्मों में इसे अलग तरीके से कहा गया है. विज्ञान व तकनीक की दुनिया में इस धारणा को बार-बार तर्कों की कसौटी पर भी परखा गया है. क्‍या विज्ञान इस धारणा को स्‍वीकार करता है? क्‍या वाकई इस धारणा में कोई दम है?

Is human soul really immortal - धर्म कहता है कि आत्‍मा अजर, अमर, अविनाशी है. अलग-अलग धर्मों में इसे अलग तरीके से कहा गया है. विज्ञान व तकनीक की दुनिया में इस धारणा को बार-बार तर्कों की कसौटी पर भी परखा गया है. क्‍या विज्ञान इस धारणा को स्‍वीकार करता है? क्‍या वाकई इस धारणा में कोई दम है?



दर्शन, धर्म और विज्ञान के लिए हमेशा से ये सवाल परेशान करता रहा है कि क्‍या आत्‍मा वाकई अमर होती है. 

दर्शन, धर्म और विज्ञान के लिए हमेशा से ये सवाल परेशान करता रहा है कि क्‍या आत्‍मा वाकई अमर होती है.

Human Soul and Science: दुनिया में सबसे ज्‍यादा पूछा जाने वाला सवाल है कि क्‍या मनुष्‍य के भौतिक शरीर के मरने के बाद भी आत्मा जीवित रहती है? दर्शन, विज्ञान और धर्म ने अलग-अलग तरह से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है. दुनियाभर में माने जाने वाले धर्मों ने इस सवाल का जवाब अपने-अपने तरीके से दिया है. किसी धर्म में कहा जाता है कि आत्‍मा शरीर को कपड़ों की तरह बदलती है. एक शरीर के मरने के बाद आत्‍मा नए शरीर के साथ फिर जन्‍म लेती है. किसी धर्म के मुताबिक, शरीर के मरने के बाद आत्‍मा परम सत्‍ता में विलीन हो जाती है और फिर जन्‍म नहीं लेती है. हम विज्ञान के अलग-अलग सिद्धांतों और अध्‍ययनों के आधार पर जानने की कोशिश करेंगे कि क्‍या वाकई आत्‍मा अमर है?

सबसे पहले यह समझते हैं कि आत्मा का मतलब क्या है? आत्मा शब्द लैटिन एनिमा से आया है, जो ग्रीक एनीमोस से जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ सांस या हवा है. वहीं, सनातन परंपरा में हजारों साल पुराने वेदों, उपनिषदों और पुराणों में भी आत्‍मा का जिक्र किया गया है. भारतीय दर्शन में माना जाता है कि आत्‍मा अजर, अमर, अविनाशी है. कई आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं में आत्मा व्यक्तित्व का सार, आत्मा या मैं है. हालांकि, हाल के दिनों में आत्मा को मन या चेतना की तरह सोच-विचार का हिस्सा माना जाता है, जो विज्ञान की अलग-अलग शाखाओं के सबसे महान रहस्यों में एक है.

क्‍या है ऑर्केस्ट्रेटेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन

कुछ साल पहले एक भौतिक विज्ञानी के सहयोग से एक नया सिद्धांत विकसित किया गया, जिसमें शरीर के मरने के बाद आत्‍मा के अस्तित्‍व पर रोशनी डाली गई. इस सिद्धांत को ऑर्केस्ट्रेटेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (ऑर्क-ओआर) कहा गया है. इसे 1990 के दशक में भौतिकविद रोजर पेनरोज और स्टुअर्ट हैमरॉफ ने विकसित किया था. शोध के मुताबिक, चेतना न्यूरॉन्स के बीच कम्‍युनिकेशन के बजाय उनके भीतर पैदा होती है. बता दें कि रोजर पेनरोज प्रतिष्ठित गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी और ब्रह्मांड विज्ञानी हैं. उन्‍हें भौतिकी में 2020 का नोबेल पुरस्कार दिया गया था. पेनरोज को ब्लैक होल पर उनके काम के लिए विज्ञान के सर्वोच्च सम्मानों में एक मिला है. उन्‍होंने खोज की थी कि ब्लैक होल का निर्माण आइंस्टीन के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत का नतीजा है.

आर्क-ओआर पर चल रहीं परियोजनाएं

रोजर पेनरोज ने कैंब्रिज में एक अन्य महान भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग के साथ लंबे समय तक काम किया था. पेनरोज ने हॉकिंग के साथ ब्लैक होल और गुरुत्वाकर्षण विलक्षणता के बारे में कुछ सिद्धांत विकसित किए थे. वैज्ञानिक स्‍टुअर्ट हैमरॉफ स्टुटिन एनेस्थेसियोलॉजिस्ट और अमेरिका में एरिजोना यूनिवर्सिटी में लेक्‍चरर हैं. वह इस सिद्धंत के लेखकों में एक हैं कि आत्‍मा क्‍या है और क्‍या ये अमर है? बता दें कि ‘ऑर्क-ओआर’ अभी केवल एक सिद्धांत है. लेकिन, माना गया कि इस सिद्धांत पर परीक्षण किया जा सकता है. लिहाजा, इसके परीक्षण और सत्यापन के लिए परियोजनाएं चल रही हैं.

एल्‍गोरिदम से काबू नहीं हो सकता दिमाग

पेनरोज और हैमरॉफ के ‘ऑर्क-ओआर’ सिद्धांत के पीछे का विचार है कि मस्तिष्क को एल्गोरिदम से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है. इसका मतलब है कि मस्तिष्क के भौतिक गुण पारंपरिक गणितीय औपचारिकताओं से निर्धारित नहीं होते हैं, बल्कि क्‍वांटम मेकेनिक्‍स के दिलचस्प सिद्धांतों ये इनकी व्‍याख्‍या की जा सकती है. सिद्धांत के दोनों लेखकों में हैमरॉफ ने चेतना के जैविक घटक का अध्ययन किया है. उनके मुताबिक, चेतना की मुख्य संरचना मस्तिष्क में माइक्रोट्यूबल सेल्‍स हैं. वहीं, भौतिक विज्ञानी पेनरोज ने आत्‍मा के अमर होने के सवाल का जवाब तलाशने के लिए क्‍वांटम अप्रोच को अपनाया है.

चेतना कहां पैदा करती है कंपन

‘ऑर्क-ओआर’ सिद्धांत के मुताबिक, चेतना सब-एटॉमिक पार्टिकल्‍स के यूनिवर्स में कंपन करने वाली एक तरंग है. वहीं, दिमाग की माइक्रोट्यूबल सेल्‍स वास्तविक क्‍वांटम कंप्यूटर के तौर पर काम करती हैं, जो इन कंपनों को इस्‍तेमाल किए जाने लायक जानकारी में तब्‍दील करती हैं. बता दें कि क्‍वांटम कंप्यूटर सामान्य कंप्यूटर से अलग तरीके से काम करता है. सामान्‍य कंप्यूटर जानकारी को बिट्स यानी ज़ीरो या वन के रूप में प्रॉसेस करता है, जबकि क्‍वांटम कंप्यूटर क्यूबिट्स को प्रॉसेस करता है, जो एक ही समय में शून्य और एक दोनों हो सकता है. इससे क्‍वांटम सुपरपोजिशन बनती है, जो हमारे क्‍लासिकल मेकेनिकल माइंड्स के लिए समझने में दिक्‍कतें पैदा करता है.

क्‍या है कई दुनिया का सिद्धांत

सैद्धांतिक भौतिकविद एवरेट के कई दुनियाओं के सिद्धांत के मुताबिक, जब कोई सेब या नाशपाती में से एक चीज खाने का फैसला करता है, तो सेब खाने का फैसला नाशपाती को अलग कर देता है. लेकिन, इसी फैसले के साथ नाशपाती दूसरी दुनिया में अलग से अस्तित्व में रहती है. दूसरी ओर, ‘ऑर्क-ओआर’ सिद्धांत कहता है कि नाशपाती खाने के विकल्प को चुना ही नहीं गया है. लिहाजा, नाशपाती अलग हो जाती है. लेकिन, यह एक अस्थिर स्थिति है. इसलिए कुछ समय बाद इसमें बदलाव आ जाता है.

कई दुनिया, लेकिन सिर्फ एक में चेतना

एवरेट के सिद्धांत के समर्थकों के मुता‍बिक, कई दूसरी दुनिया हैं, लेकिन केवल एक में चेतना है. वहीं, पेनरोज और हैमरॉफ के मुताबिक, हम ही एकमात्र वास्तविकता हैं, क्योंकि वैकल्पिक वास्तविकताओं का अस्तित्‍व अस्थिर होने के कारण खत्‍म हो जाता है. इस क्‍वांटम सोच को फिर मस्तिष्क में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जहां चेतना को पहले सामान्य कंप्यूटर की तरह काम करने वाले न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन की एक श्रृंखला के रूप में माना जाता था. हैमरॉफ के मुताबिक, जब आप मस्तिष्क कोशिकाओं न्‍यूरॉन के बारे में सोचते हैं तो यह सोचना न्यूरॉन का अपमान है कि ये बंद या चालू हो जाते हैं.  Sabhar News18 India

Read more

शुक्रवार, 25 अगस्त 2023

VIDEO: विक्रम लैंडर ने ली पहली सेल्फी, कुछ ऐसे चांद की सतह पर उतरा था प्रज्ञान रोवर

0

VIDEO: विक्रम लैंडर ने ली पहली सेल्फी, कुछ ऐसे चांद की सतह पर उतरा था प्रज्ञान रोवर 

Chandrayaan-3 Updates: चंद्रयान-3 ने बुधवार शाम 6.04 बजे चंद्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग की, जिसके बाद भारत चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतरने वाला चौथा देश बन गया

.खास बातें

लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रेवर की चंद्रमा की सतह से पहली सेल्फी

चंद्रयान-3 ने बुधवार शाम 6.04 बजे चंद्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग की

भारत चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतरने वाला चौथा देश बना

नई दिल्ली: आखिरकार वह पल आ ही गया जिसका इंतजार एक अरब भारतीय बेसब्री से कर रहे थे. दरअसल, इसरो (ISRO) ने लैंडर विक्रम (Lander Vikram) से प्रज्ञान रोवर (Pragyan Rover) के चांद की सतह पर उतरने का वीडियो जारी किया . जिसमें देखा जा सकता है कि रोवर रैंप के सहारे चांद पर गया. लैंडर और रोवर बिल्कुल ठीक हालत में हैं.

लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रेवर की चंद्रमा की सतह से पहली सेल्फी जारी

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) ने भारत के लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रेवर की चंद्रमा की सतह से पहली सेल्फी शेयर की है. जब प्रज्ञान रोवर अपनी कछुआ की गति से चल रहा था, तब विक्रम लैंडर ने इसके रैंप की फोटो और एक वीडियो लिया है. इसरो ने एक ट्वीट में वीडियो शेयर करते हुए लिखा, "... यहां बताया गया है कि चंद्रयान-3 रोवर लैंडर से चंद्रमा की सतह तक कैसे पहुंचा."

https://twitter.com/i/status/1694713817916473530

Read more

सोमवार, 21 अगस्त 2023

चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर लैंडिंग कल:32000 सालों से कालगणना का पहला साधन है चंद्रमा, चीन-अरब ने भारत से सीखा लूनर कैलेंडर

0

 चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर लैंडिंग कल:32000 सालों से कालगणना का पहला साधन है चंद्रमा, चीन-अरब ने भारत से सीखा लूनर कैलेंडर

23 अगस्त की शाम चंद्रयान-3 चांद पर उतरेगा। चंद्रमा हजारों सालों से दुनिया भर के कल्चर्स में जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है। इंसान जब आदिमानव से सामाजिक प्राणी होने की राह पर था, तभी से चांद उसके लिए समय की गणना करने का साधन रहा है। ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण ये दो ग्रंथ बताते हैं कि हजारों साल से चांद इंसानों के लिए कालगणना का साधन रहा है।

जब समय पता करने का कोई साधन नहीं था, तब चंद्रमा के घटने और बढ़ने की स्थितियों से ही दिन और महीनों का अनुमान लगाया जाता था। 15 दिन अमावस्या और 15 पूर्णिमा के ऐसे दो पक्षों को मिलाकर महीने का कैलकुलेशन किया गया जिसे चांद्रमास यानी चंद्रमा का महीना कहा जाता है।


आज भी भारतीय ज्योतिष में हिंदू कैलेंडर चांद्रमास से ही बनाया जाता है। सारे तीज-त्योहार इसी से तय होते हैं। नासा की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाषाण युग में फ्रांस और जर्मनी की गुफाओं में रहने वाले आदिमानवों ने 32000 साल पहले चंद्रमा की गति का अध्ययन करके पहला कैलेंडर बनाया था। भारत में इसका सबसे सटीक गणित है। चीन और अरब देशों ने भी चांद से कैलेंडर बनाना भारत से सीखा है।


सूर्य से गणना मुश्किल थी तो चांद को साधन बनाया


जर्मन स्कॉलर प्रो. मैक्समूलर ने अपनी किताब “इंडिया व्हाट कैन इट टीच अस” में लिखा है- भारत ज्योतिष, आकाश मंडल और नक्षत्रों के बारे में जानने के लिए किसी दूसरे देश का ऋणी नहीं है, ये उसने खुद ईजाद किया है।


उन्होंने लिखा है कि चंद्रमा ही कालगणना का पहला साधन था। सूर्योदय के बाद नक्षत्रों और तारों को देख पाना या उनके बारे में अनुमान लगा पाना मुश्किल था। भारतीय विद्वानों ने चंद्रमा के आधार पर ही दिन, पक्ष, मास और साल की गणना की। चंद्रमा की विभिन्न कलाओं को देखते हुए आकाश को 27 नक्षत्रों में बांटा। मूल ज्योतिष का तत्व भारत से ही हजारों साल पहले उपजा है।


भारत से ही कालगणना चीन और अरब पहुंची


भारत के अलावा चीन और अरब देशों में भी कालगणना का पहला साधन चंद्रमा ही था। हिजरी संवत कैलेंडर में भी चांद से ही महीनों की गणना हुई है। अमूमन अरब देशों में सैकड़ों साल पहले दिन की बजाय चांद रातों की संख्या से ही समय तय किया जाता था। मुगल काल में भी कई कामों के लिए चांद रातों का जिक्र मिलता है। ये चंद्रमा और नक्षत्रों की गणना भारत से ही चीन और अरब देशों में पहुंची।


प्रो. कोलब्रुक और बेवर ने अपनी किताब ‘लेटर्स ऑन इंडिया’ में लिखा है कि भारत को ही सबसे पहले चंद्रमा और नक्षत्रों का ज्ञान था। चीन और अरब देशों के ज्योतिष का विकास भारत की ही देन है। उनकी कालगणना की चांद्र विधि भारत से ही प्रेरित है।

वेद और पुराणों में चंद्रमा


वैदिक काल से अब तक चंद्रमा की पूजा ग्रह और देवता, दोनों रूप में हो रही है। वहीं, ज्योतिर्विज्ञान में चंद्रमा को उपग्रह नहीं बल्कि ग्रह कहा गया है। धरती के काफी नजदीक होने से सूर्य के बाद चंद्रमा दूसरा ग्रह है, जो पृथ्वी पर रहने वाले हर इंसान को प्रभावित करता है। चंद्रमा के कारण ही धरती पर पानी और औषधियां हैं। जिससे इंसान लंबी उम्र जी पाता है। वेदों से लेकर पुराणों और ज्योतिष ग्रंथों में भी चंद्रमा को खास बताया गया है।


वेदों में चंद्रमा की गति, चमक और उसकी परिक्रमा के रास्ते के बारे में जानकारी दी गई है। वहीं, पुराणों में बताया गया है कि चंद्रमा की उत्पत्ति कैसे हुई।


चंद्रमा से कालचक्र का निर्धारण


ऋग्वेद के पहले मंडल के 84वें सूक्त मंत्र में बताया गया है कि चंद्रमा स्वत: प्रकाशमान नहीं है इस सिद्धांत की पुष्टि मंत्र में है। इसी के 105वें सूक्त में कहा है कि चंद्रमा आकाश में गतिशील है और नित्य गति करता रहता है।


एतरेय ब्राह्मण ग्रंथ के मुताबिक वैदिक काल में तिथियां चंद्रमा के उदय और अस्त होने से तय होती थी। चंद्रमा ही तिथियों के साथ महीने को शुक्ल और कृष्ण पक्ष में बांटता है। इस बारे में तैत्तरीय ब्राह्मण में बताया गया है कि चंद्रमा का एक नाम पंचदश भी है। जो 15 दिनों में क्षीण हो जाता है और 15 दिनों में पूर्ण हो जाता है।


इसके बाद ऋतुओं की बात करें तो अथर्ववेद के 14वें कांड के पहले सूक्त में कहा गया है कि चंद्रमा से ही ऋतुएं बनती हैं। वेदों में बताया गया है कि चंद्रमा के कारण ही ऋतुएं बदलती हैं। वहीं चंद्रमा के प्रभाव से ही 13 महीने हो जाते हैं, जिसे अधिकमास कहते हैं। इस बात का जिक्र वाजस्नेयी संहिता में किया गया है।


शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि पृथ्वी पर उगने वाली औषधियों और वनस्पतियों में रस चंद्रमा से ही आता है। जो सोम रस देवता पीते हैं, उस बारे में ऋग्वेद में कहा गया है कि सोम नाम की लता चंद्रमा से ही रस बनाती है। चंद्र मंडल से देवताओं तक सोम का भाग पहुंचता है। चंद्रमा से ही देवगण सोमपान करते हैं।

चंद्रमा का रथ, गति और रूप


लिंग पुराण में चंद्रमा के रथ के बारे में कहा गया है कि चंद्रमा अपने रास्ते में मौजूद नक्षत्रों की परिक्रमा करता है। उसका रथ तीन पहियों का है। रथ के दोनों ओर सफेद रंग के सुन्दर और ताकतवर मन के समान तेजी से दौड़ने वाले दस घोडे़ जुते हुए हैं। चंद्रमा पितरों और देवताओं के साथ यात्रा कर रहा है।


मत्स्य पुराण के अनुसार ब्रह्मा ने ऋषियों के कहने पर चंद्रमा को उत्तर दिशा का लोकपाल बना दिया है। चंद्रमा देवताओं में गंधर्वों का, मनुष्यों में ब्राह्मणों का, पशुओं में शश, औषधियों में लताओं और धर्म में तप-यज्ञ का अधिष्ठाता है।


एक्सपर्ट्स और रेफरेंस


डॉ. गणेश मिश्रा, ज्योतिषाचार्य, पुरी (उड़ीसा)

भारतीय ज्योतिष, नेमीचंद शास्त्री sabhar bhaskar.com 


Read more

रविवार, 20 अगस्त 2023

Chandrayaan-3: चांद से महज 25 किलोमीटर दूर लैंडर विक्रम, जानें लैंडिंग के लिए किस बात का है इंतजार

0

 चंद्रयान 3 मिशन ने सफलतापूर्वक अंतिम डीबूस्टिंग चरण पूरा कर लिया है। जिसके बाद चंद्रयान-3 की चांद की सतह से दूरी महज 25 किलोमीटर रह गई है। इसरो ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है। इसरो ने बताया कि अब लैंडर मॉड्यूल की आंतरिक जांच की जाएगी और चांद पर उतरने की तय साइट पर अब बस सूरज के निकलने का इंतजार किया जा रहा है। इसरो ने बताया कि लैंडर मॉड्यूल 23 अगस्त 2023 को शाम करीब 5.45 बजे चांद की सतह पर उतर सकता है। सूरज निकलने का क्यों हो रहा इंतजार

चांद पर एक दिन पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर होता है। अभी चांद पर रात है और 23 अगस्त को सूरज निकलेगा। यही वजह है कि दिन की रोशनी में ही लैंडर चांद की सतह पर उतरने की कोशिश करेगा ताकि रोवर बेहतर तरीके से वहां रिसर्च कर सके और बेहतर तस्वीरें भेज सके। भारत का चंद्रयान-3 मिशन चांद की सतह पर पानी की खोज करेगा, साथ ही चांद पर रसायनिक विश्लेषण भी करेगा। 
रूसी मिशन से है मुकाबला
चांद की सतह पर चंद्रयान 3 की सफल लैंडिंग के साथ ही इसरो इतिहास रच देगा। अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा। चंद्रयान-3 के साथ ही रूस का लूना-25 स्पेसक्राफ्ट भी चांद की सतह पर उतरने की कोशिश करेगा। लूना-25 को 21 अगस्त को चांद की सतह पर लैंडिंग करनी है लेकिन फिलहाल रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने बताया है कि लूना-25 में कुछ तकनीकी खराबी आ गई है। ऐसे में लूना-25 को चांद की सतह पर उतरने में परेशानी हो सकती है। 

बता दें कि चंद्रयान-3 मिशन का बजट करीब 615 करोड़ रुपये का है। इसरो चेयरमैन ने बताया कि चंद्रयान के लैंडर मॉड्यूल को चांद पर लैंड कराने में सबसे बड़ी चुनौती उसे लैंडिंग से पहले मोड़ना है। उन्होंने बताया कि जब लैंडर चांद की सतह पर लैंड करने के लिए उतरेगा तो वह क्षैतिज अवस्था में होगा लेकिन उसे लैंडिंग से पहले 90 डिग्री सेल्सियस पर मोड़कर लंबवत करना होगा। अगर यह सफलतापूर्वक हो गया लैंडर की चांद पर सफल लैंडिंग के चांस बढ़ जाएंगे। Chandrayaan-3 LIVE: चांद से महज 25 किलोमीटर दूर लैंडर विक्रम, बस सूरज निकलने का है इंतजार

Read more

उत्तराखंड-हिमाचल में बारिश से आफ़त, क्यों ख़तरनाक बन रहा है हिमालय?

0

हिमालय के क्षेत्रों में तेज बारिश से अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि हो रही है. मूसलाधार बारिश और बेतहाशा निर्माण दो महत्वपूर्ण कारण हैं जिससे हिमालय के इलाकों में प्राकृतिक आपदाएं आती है. लेकिन इलाके में बारिश में असामान्य वृद्धि ने इस इलाके को और ख़तरनाक बना दिया है. इसी महीने बादल फटने से हुई तेज़ बारिश और भूस्खलन से हिमाचल प्रदेश में कई लोगों की मौत हो गई. कई इमारतें, सड़कें और रेलवे ट्रैक बर्बाद हो चुके हैं. इस तरह के मौसम से पाकिस्तान और नेपाल के कुछ हिस्से भी प्रभावित हुए हैं. एक नई स्टडी में पाया गया है कि हिमालय सहित दुनिया भर के पहाड़ों में अब ऊंचाई वाली जगहों पर अधिक बारिश हो रही है, जहां अतीत में ज़्यादातर बर्फ़बारी होती थी. 

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बदलाव ने पहाड़ों को और अधिक खतरनाक बना दिया है, क्योंकि बढ़ता तापमान न केवल बारिश का कारण बन रहा है बल्कि बर्फ के पिघलने में भी तेज़ी आ रही है.


बारिश का पानी भी मिट्टी को ढीला कर देता है जिसके परिणामस्वरूप भूस्खलन, चट्टानें गिरना, बाढ़ आने की घटनाएं बढ़ जाती हैं.


'नेचर जर्नल' में जून में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है, "हमारी फ़ाइंडिंग में पता चला है कि काफ़ी ऊंचाई पर, खासकर उत्तरी गोलार्ध के बर्फ वाले क्षेत्रों में बारिश में काफ़ी वृद्धि हुई है और इसके हमें कई सबूत मिले हैं."


यह अध्ययन 2019 में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की एक विशेष रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है, जिसमें कहा गया था कि बर्फबारी में कमी आई है, खासकर पर्वतीय क्षेत्रों पर ऐसा देखा जा रहा है.

जरूरत से ज्यादा बारिश

फ्रांस में राष्ट्रीय मौसम विज्ञान अनुसंधान केंद्र के कार्यकारी निदेशक और विशेष आईपीसीसी रिपोर्ट के लेखकों में से एक सैमुअल मोरिन कहते हैं कि अब अधिक ऊंचाई पर हर मौसम में बारिश हो रही है. ये बारिश ज़रूरत से काफ़ी अधिक है.


ग्लोबल वार्मिंग के कारण ज़ीरो-डिग्री इज़ोटेर्म(वो हिमांक स्तर जिस पर बर्फ़ गिरती है) वह भी बढ़ गया है.


इस अध्ययन में कहा गया है, “परिणामस्वरूप, इन पर्वतीय क्षेत्रों को हॉटस्पॉट के रूप में माना जाता है जो अत्यधिक बारिश की घटनाओं, बाढ़, भूस्खलन और मिट्टी के कटाव के खतरों के प्रति संवेदनशील होते हैं.”


स्टडी के लीड ऑथर मोहम्मद ओम्बाडी ने बीबीसी को बताया कि उत्तरी गोलार्ध के रोकिज और आल्प्स पर्वतीय क्षेत्र की तुलना में हिमालय के क्षेत्र में ख़तरा अधिक है.


उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में ऐसी अतिरिक्ति परिस्थितियां हैं, जिससे यहां भीषण तूफान आते हैं.

जरूरत से ज्यादा बारिश

फ्रांस में राष्ट्रीय मौसम विज्ञान अनुसंधान केंद्र के कार्यकारी निदेशक और विशेष आईपीसीसी रिपोर्ट के लेखकों में से एक सैमुअल मोरिन कहते हैं कि अब अधिक ऊंचाई पर हर मौसम में बारिश हो रही है. ये बारिश ज़रूरत से काफ़ी अधिक है.


ग्लोबल वार्मिंग के कारण ज़ीरो-डिग्री इज़ोटेर्म(वो हिमांक स्तर जिस पर बर्फ़ गिरती है) वह भी बढ़ गया है.


इस अध्ययन में कहा गया है, “परिणामस्वरूप, इन पर्वतीय क्षेत्रों को हॉटस्पॉट के रूप में माना जाता है जो अत्यधिक बारिश की घटनाओं, बाढ़, भूस्खलन और मिट्टी के कटाव के खतरों के प्रति संवेदनशील होते हैं.”


स्टडी के लीड ऑथर मोहम्मद ओम्बाडी ने बीबीसी को बताया कि उत्तरी गोलार्ध के रोकिज और आल्प्स पर्वतीय क्षेत्र की तुलना में हिमालय के क्षेत्र में ख़तरा अधिक है.


उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में ऐसी अतिरिक्ति परिस्थितियां हैं, जिससे यहां भीषण तूफान आते हैं.

हिमालय क्षेत्र भारत, भूटान, नेपाल और पाकिस्तान में फैला हुआ है और इस इलाके में बहुत ही कम मौसम स्टेशन हैं जिससे बारिश के बारे सटीक आंकड़े हासिल करना भी मुश्किल है.


यही नहीं, कम ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में जो स्टेशन हैं, वो भी बारिश और बर्फबारी में अंतर नहीं कर पाते.


हालांकि, माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप स्थित मौसम स्टेशन ने पहाड़ पर एक जून से 10 अगस्त के बीच 245.5 मिमी वर्षण (बारिश और बर्फ दोनों के लिए इस्तेमाल होना वाला शब्द) दर्ज किया. इसमें से 70 प्रतिशत आंकड़ा बारिश का है.


पिछले साल जून और सितंबर में 32 फ़ीसदी बारिश दर्ज की गई थी, वहीं 2021 में 43 फ़ीसदी और 2020 में 41 फ़ीसदी बारिश दर्ज की गई थी.


नेशनल जियोग्राफिक के एक्सप्लोरर बेकर पेरी और टॉम मैथ्यूज ने बताया, ''हमारा मानना है कि बर्फबारी की तुलना में ज़्यादा बारिश होना हाल की स्थितियां हैं लेकिन हमारे पास लंबे समय का डेटा नहीं है जो इसको पूरी तरह साबित करे.''


क्षेत्रीय मौसम कार्यालय के प्रमुख बिक्रम सिंह ने बताया कि वर्षण में ये बदलाव हिमालयी राज्य उत्तराखंड में स्पष्ट दिख रहा है.


उन्होंने बताया, ''हम निश्चित तौर पर ये कह सकते हैं कि बर्फबारी में कमी आई है और 6,000 मीटर की ऊंचाई से नीचे वाले क्षेत्रों में ऐसा हुआ है. मानसून के दौरान निचले इलाकों में भारी बारिश होती है.''

नदियों का बदलता रूप

कुमाऊं यूनिवर्सिटी के भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर जे एस रावत ने कहा कि बर्फबारी में कमी और बारिश में वृद्धि का मतलब है कि इलाके की नदियों की प्रकृति बदली है.


उन्होंने कहा, ''अब अचानक बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हुई है और नदियां जो कभी ग्लेशियर से पोषित थीं अब उनमें बारिश का पानी आता है. ''


तापमान में वृद्धि ने समस्या को और गंभीर कर दिया है क्योंकि इससे हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. इससे ग्लेशियर के झीलों में पानी भरता है और इससे बाढ़ आने का खतरा बढ़ जाता है.


वैश्विक औसत दर की तुलना में हिमालय के तीन गुना अधिक गर्म होने की आशंका है, और कई अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि इससे वहां वर्षा में काफी वृद्धि होगी.

सब कुछ तबाह हो गया'

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के स्थानीय लोगों का कहना है कि मानसून के मौसम में इलाकों में भूस्खलन और बारिश की घटनाओं में उन्होंने वृद्धि देखी है.


उत्तराखंड के चमोली जिले के मायापुर गांव के रहने वाले प्रभाकर भट्टा बताते हैं, ''पहाड़ों पर अधिक बारिश की वजह से मेरा गांव भूस्खलन के ख़तरों का सामना कर रहा था इसलिए इस जगह को खाली कर हमें कहीं और जाना पड़ा.''


14 अगस्त को रात में अचानक से बाढ़ आई और प्रभाकर का दो मंजिला घर मलबे, कीचड़ और पत्थर से दब गया.


प्रभाकर का परिवार अपनी जान इसलिए बचा सका क्योंकि उनसे ऊपर के इलाकों में रहने वाले लोगों ने उन्हें खतरे के बारे में बताया था इसलिए वो रात में जगे हुए थे और जैसे ही अजीब सी आवाजें सुनाई देने लगी, वो वहां से भाग खड़े हुए.


प्रभाकर का कहना है कि उनके पिता ने जिंदगी भर की कमाई लगाकर घर बनाया था और अब सब कुछ तबाह हो गया.

सर्दी में बर्फबारी की जगह हो रही है बारिश

विशेषज्ञों का कहना है कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में सड़क, सुरंग और जल विद्युत परियोजनाओं जैसे बुनियादी ढांचे के अंधाधुंध विकास से भी यहां प्राकृतिक विपदा आने की घटनाएं बढ़ी हैं.


हिमालय भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है जो हालात को और बदतर बनाता है.


बारिश में वृद्धि का असर सीमा पार भी दिखने लगा है. पाकिस्तान का उत्तरी क्षेत्र जहां हिमालय काराकोरम और हिंदूकुश की पहाड़ियों से मिलता है, वहां अचानक से बाढ़ आने की घटनाएं आम होती जा रही हैं.


इस इलाके के क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी के महानिदेशक कमल कमर ने बताया कि पिछले मानसून में गिलगित बाल्टिस्तान के इलाकों में अचानक बाढ़ की 120 घटनाएं आई हैं.


अगर इसकी तुलना 10-20 साल पहले से करें तो इसमें काफी बड़ा अंतर आया है.


उन्होंने बताया कि 4,000 मीटर की ऊंचाई पर गर्मी और सर्दी दोनों में बारिश हो रही है, जबकि सर्दी में तो बर्फबारी होनी चाहिए थी. नेपाल का भी हाल कुछ ऐसा ही है. यहां हाइड्रोपावर और पीने वाले पानी के प्लांट, सड़कें और पुल भारी बारिश और मलबे से तबाह हो रहे हैं.


नेपाल के स्वतंत्र पावर प्रोड्यूसर एसोसिएशन ने बताया कि इस मानसून में पूर्वी नेपाल में 30 हाइड्रोपावर प्लांट क्षतिग्रस्त हुए हैं. Sabhar BBC.COM 

Read more

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

आयी कहानियों में एआई, लेखक डरे हुए हैं और मंत्रमुग्ध भी

0


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग करने वाले ही नहीं, कहानियां लिखने वाले भी डरे हुए हैं. बहुत से लेखकों को लगता है कि एआई उनकी आजीविका के लिए खतरा हो सकता है.

हाल ही में अमेरिका के ऑथर्स गिल्ड ने एक खुला खत लिखा, जिसका दस हजार से ज्यादा लेखकों ने समर्थन किया. इस पत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से आग्रह किया गया कि वे कॉपीराइट के तहत सुरक्षित सामग्री का बिना इजाजत और भुगतान इस्तेमाल ना करे.


हालांकि एआई अपने आप में एक कहानी है, और यह अब सिर्फ साइंस फिक्शन नहीं बल्कि सच्ची कहानी है. राजनीति, महामारी या जलवायु परिवर्तन की तरह एआई भी अब कहानियों में एक अहम मुद्दा बन गया है और बड़ी संख्या में उपन्यासकार और कहानीकार अब उसे अपनी कहानियों में शामिल कर रहे हैं.


संस्कृतियूरोप

आयी कहानियों में एआई, लेखक डरे हुए हैं और मंत्रमुग्ध भी

14.08.2023१४ अगस्त २०२३

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग करने वाले ही नहीं, कहानियां लिखने वाले भी डरे हुए हैं. बहुत से लेखकों को लगता है कि एआई उनकी आजीविका के लिए खतरा हो सकता 


हाल ही में अमेरिका के ऑथर्स गिल्ड ने एक खुला खत लिखा, जिसका दस हजार से ज्यादा लेखकों ने समर्थन किया. इस पत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से आग्रह किया गया कि वे कॉपीराइट के तहत सुरक्षित सामग्री का बिना इजाजत और भुगतान इस्तेमाल ना करे.


हालांकि एआई अपने आप में एक कहानी है, और यह अब सिर्फ साइंस फिक्शन नहीं बल्कि सच्ची कहानी है. राजनीति, महामारी या जलवायु परिवर्तन की तरह एआई भी अब कहानियों में एक अहम मुद्दा बन गया है और बड़ी संख्या में उपन्यासकार और कहानीकार अब उसे अपनी कहानियों में शामिल कर रहे हैं.









हेलेन फिलिप्स एक उपन्यासकार हैं. उनकी नयी किताब का नाम है ‘हम'. इस किताब में वह एक ऐसी मां-बेटी की कहानी सुनाती हैं जिनकी नौकरी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से चली गयी है. फिलिप्स कहती हैं, "मैं एआई से डरी हुई हूं और मंत्रमुग्ध भी हूं. (ब्रह्मांड के) पूरे ज्ञान को जमा करने के लिए एक उम्मीद है लेकिन साथ ही यह डर भी है कि एक ऐसी इंटेलिजेंस हमारी जगह ले सकती है, जो इंसानी नहीं है.”


कहानियों में एआई

सिलाडोन बुक्स के उपाध्यक्ष और संपादकीय निदेशक रायन डोहर्टी कहते हैं, "हमारे पास ऐसी किताबों के बहुत प्रस्ताव आ रहे हैं जो एआई के बारे में हैं.” सिलाडोन ने हाल ही में फ्रेड लुंत्सकर के उपन्यास साइक के लिए एग्रीमेंट साइन किया है. यह किताब एक एआई मनोवैज्ञानिक के बारे में है.


डोहर्टी कहते हैं, "यह आज की युगचेतना है. और सांस्कृतिक युगचेतना हमेशा कहानियों में पहुंच जाती है.”


आने वाले दो साल में ऐसे कई उपन्यास आने वाले हैं जिनमें एआई के बारे में बात होगी. इनमें शॉन माइकल का "डू यू रिमेंबर बीइंग बॉर्न?', ब्रायन वैन डाइक का ‘इन आवर लाइकलीनेस' और एई ओसवर्थ का ‘अवेकंड' शामिल हैं. ‘अवेकंड' एक समलैंगिक चुड़ैल और एआई के साथ उसकी जंग के बारे में है जबकि ‘इन आवर लाइकलीनेस' में एक नौकरशाह है जो एक ऐसे फैक्ट-चेकिंग प्रोग्राम का इस्तेमाल करता है जिसमें तथ्यों को बदलने की क्षमता है.


संस्कृतियूरोप

आयी कहानियों में एआई, लेखक डरे हुए हैं और मंत्रमुग्ध भी

14.08.2023१४ अगस्त २०२३

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग करने वाले ही नहीं, कहानियां लिखने वाले भी डरे हुए हैं. बहुत से लेखकों को लगता है कि एआई उनकी आजीविका के लिए खतरा 


हाल ही में अमेरिका के ऑथर्स गिल्ड ने एक खुला खत लिखा, जिसका दस हजार से ज्यादा लेखकों ने समर्थन किया. इस पत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों से आग्रह किया गया कि वे कॉपीराइट के तहत सुरक्षित सामग्री का बिना इजाजत और भुगतान इस्तेमाल ना करे.


हालांकि एआई अपने आप में एक कहानी है, और यह अब सिर्फ साइंस फिक्शन नहीं बल्कि सच्ची कहानी है. राजनीति, महामारी या जलवायु परिवर्तन की तरह एआई भी अब कहानियों में एक अहम मुद्दा बन गया है और बड़ी संख्या में उपन्यासकार और कहानीकार अब उसे अपनी कहानियों में शामिल कर रहे हैं.










हेलेन फिलिप्स एक उपन्यासकार हैं. उनकी नयी किताब का नाम है ‘हम'. इस किताब में वह एक ऐसी मां-बेटी की कहानी सुनाती हैं जिनकी नौकरी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से चली गयी है. फिलिप्स कहती हैं, "मैं एआई से डरी हुई हूं और मंत्रमुग्ध भी हूं. (ब्रह्मांड के) पूरे ज्ञान को जमा करने के लिए एक उम्मीद है लेकिन साथ ही यह डर भी है कि एक ऐसी इंटेलिजेंस हमारी जगह ले सकती है, जो इंसानी नहीं है.”


कहानियों में एआई

सिलाडोन बुक्स के उपाध्यक्ष और संपादकीय निदेशक रायन डोहर्टी कहते हैं, "हमारे पास ऐसी किताबों के बहुत प्रस्ताव आ रहे हैं जो एआई के बारे में हैं.” सिलाडोन ने हाल ही में फ्रेड लुंत्सकर के उपन्यास साइक के लिए एग्रीमेंट साइन किया है. यह किताब एक एआई मनोवैज्ञानिक के बारे में है.


डोहर्टी कहते हैं, "यह आज की युगचेतना है. और सांस्कृतिक युगचेतना हमेशा कहानियों में पहुंच जाती है.”


आने वाले दो साल में ऐसे कई उपन्यास आने वाले हैं जिनमें एआई के बारे में बात होगी. इनमें शॉन माइकल का "डू यू रिमेंबर बीइंग बॉर्न?', ब्रायन वैन डाइक का ‘इन आवर लाइकलीनेस' और एई ओसवर्थ का ‘अवेकंड' शामिल हैं. ‘अवेकंड' एक समलैंगिक चुड़ैल और एआई के साथ उसकी जंग के बारे में है जबकि ‘इन आवर लाइकलीनेस' में एक नौकरशाह है जो एक ऐसे फैक्ट-चेकिंग प्रोग्राम का इस्तेमाल करता है जिसमें तथ्यों को बदलने की क्षमता है.


फेसट्यूनिंग: एक खतरनाक जुनून


अपराध-कथा लिखने वाले जेफरी डिगर ग्रीस के बारे में लिखे गये अपने थ्रिलर उपन्यासों के लिए मशहूर हैं. वह एक नया उपन्यास लिख रहे हैं जो एआई और मेटावर्स के बारे में है. वह कहते हैं कि वह हमेशा ऐसे मुद्दों की तलाश में रहते हैं जो सामाजिक बदलाव के मुहाने पर नजर आ रहे हों.


लेखन में तकनीक

ये सभी लेखक अपनी कहानियों में एआई के जरिये मानवीय सवालों को उठाने की कोशिश कर रहे हैं. सिएरा ग्रीअर का उपन्यास ‘एनी बॉट' एक एआई दोस्त के बारे में है जो एक पुरुष के लिए तैयार किया जाता है. ग्रीअर कहती हैं कि वह अपने किरदार के जरिये खुशी की जरूरत को समझने की कोशिश कर रही हैं और उन्होंने "चाह, सम्मान और तड़प” जैसी भावनाओं को गहराई से समझने के लिए एक रोबोट गर्लफ्रेंड का किरदार गढ़ा है.


बहुत से लेखक एआई का इस्तेमाल लिखने के लिए भी कर रहे हैं. ऑसवर्थ ने एक नया प्रोग्राम तैयार किया है जो मैकियाविली और अन्य मशहूर लेखकों के स्टाइल का इस्तेमाल करता है. वह कहते हैं, "चैटजीपीटी एक फेरारी है, जबकि मैंने जो बनाया है वो एक स्केटबोर्ड है जिस पर एक चौकोर पहिया लगा है. लेकिन मैं चौकोर पहिये वाले स्केटबोर्ड की ओर ज्यादा आकर्षित था.”


इसी तरह ‘डू यू रिमेंबर बीइंग बॉर्न?' के लिए शॉन माइकल ने ऐसा प्रोग्राम इस्तेमाल किया है जो कविता और गद्य दोनों लिख सकता है. वह अपने उपन्यास में अलग-अलग तरह से लिख रहे हैं ताकि लोगों को पता चल सके कि कौन सा हिस्सा एआई ने लिखा है और कौन सा उन्होंने.


वीके/एए (रॉयटर्स) sabhar Dw.de 

Read more

बुधवार, 16 अगस्त 2023

चांद तक रेस में भारत का चंद्रयान-3 आगे रहेगा या रूस का लूना-25

0

चांद तक रेस में भारत का चंद्रयान-3 आगे रहेगा या रूस का लूना-25 

बीते महीने भारत ने एक बार फिर चांद के लिए अपना मिशन भेजा है. वहीं, क़रीब पांच दशक के लंबे अंतराल के बाद चांद तक पहुंचने की रेस में रूस भी कूद पड़ा है.


यानी एक रूसी और एक भारतीय स्पेसक्राफ्ट चांद पर उतरने के इरादे से आगे बढ़ रहे हैं.


भारत का चंद्रयान-3 और रूस का लूना-25 अपने साथ एक-एक लैंडर लेकर अंतरिक्ष में गए हैं, ताकि चांद के दक्षिणी ध्रुव में यानी अंधेरे वाले हिस्से में उतर कर इतिहास रच सकें.


ये चांद का वो इलाक़ा है जहां अब तक कोई लैंडर सफलतापूर्वक उतर नहीं पाया है.

रूस ने 11 अगस्त 2023 (मॉस्को समय के अनुसार) को लूना-25 लॉन्च किया है, वहीं भारत ने 14 जुलाई को चंद्रयान-3 चांद के लिए रवाना किया है. जानकार कहते हैं कि ये दोनों ही मिशन लगभग समान वक्त चांद पर अपना-अपना लैंडर उतारेंगे.


ऐसे में दुनिया भर में लोग ये देखने का इंतज़ार कर रहे हैं कि भारत या रूस में से कौन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपना लैंडर सबसे पहले और सफलतापूर्व उतारेगा?

1960 के दशक में शुरू हुई रेस

हालांकि चांद तक की ये रेस आज नहीं बल्कि 1960 के दशक में शुरू हुई थी. उस वक्त अमेरिका और सोवियत संघ के बीच ये होड़ थी कि चांद पर सबसे पहले इंसान को कौन उतार सकता है.


पृथ्वी की कक्षा में पहला सैटलाइट स्थापित करने, अंतरिक्ष में पहली बार इंसान को भेजने और मानवरहित मिशन को चांद पर उतारने के मामले में रूस बाज़ी मार ले गया. लेकिन अपोलो मिशन के ज़रिए अमेरिका ने चांद की सतह पर पहली बार इंसान को उतारा और ये बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली.


अमेरिका की इस उपलब्धि को दुनियाभर के लाखों लोगों ने टेलीविज़न पर देखा. इसके बाद अमेरिका ने और भी कई मानव मिशन चांद के लिए भेजे.


अमेरिका का अपोलो कार्यक्रम 1972 में ख़त्म हुआ. इसके पांच दशक बाद भी आज तक अमेरिका के अलावा कोई और देश चांद पर इंसान को उतार नहीं पाया है.

 जुलाई 2023 को भारत के चंद्रयान ने पृथ्वी से उड़ान भरी. चांद की सतह से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करने के लिए इसमें वैज्ञानिक उपकरणों के साथ-साथ छह चक्कों वाला एक रोवर भी है.


उम्मीद की जा रही है कि चांद की कक्षा में कई बार चक्कर लगाते हुए ये पहले चांद पर उतरने की तैयारी करेगा और फिर लैंडर 23 अगस्त को चांद की सतह पर उतरेगा.


वहीं रूस का लैंडर लूना-25, 11 अगस्त को चांद के लिए रवाना हुआ है. ये सीधे रास्ते से और चंद्रयान की अपेक्षा बेहद तेज़ गति से चांद की तरफ जा रहा है और उम्मीद की जा रही है कि ये लॉन्च होने के 10 दिनों के भीतर ही चांद तक पहुंच जाएगा.


रूसी स्पेस एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने भी अपनी इस महत्वाकांक्षा को खुल कर सामने रखा है कि चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने के मामले में रूस दुनिया का पहला देश बनना चाहता हैं.


लेकिन माना जा रहा है कि लूना-25 की यात्रा थोड़ी धीमी हो सकती है और हो सकता है कि वो चांद तक पहुंचने में थोड़ा अधिक वक्त ले. ऐसे में ये बिल्कुल संभव है कि चंद्रयान-3 का लैंडर पहले चांद की सतह पर लैंड करे.


बात रूस की हो या भारत की, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चांद तक पहुंचने की होड़ में अब एक बार फिर कई देशों की दिलचस्पी बढ़ रही है.


हाल के दिनों में चांद पर पानी के होने के संकेत पाए गए हैं जिसके बाद वैज्ञानिकों में उत्साह है. उनका मानना है कि भविष्य में चांद पर बेस बनाना हो तो इस जमे हुए पानी के हाइड्रोजन से ईंधन तैयार किया जा सकता है. एक वजह ये भी है कि हो सकता है कि इस पानी को भविष्य में पीने लायक बनाया जा सकेगा.

लूना-25 बनाम चंद्रयान-3

रूस के लूना-25 और भारत के चंद्रयान-3 के बीच की रेस निस्संदेह चांद की सतह के अन्वेषण के एक नए दौर की शुरूआत कर दी है.


इसमें भारत और रूस के अलावा अमेरिका, चीन, इसराइल, जापान के अलावा निजी कंपनियां भी चांद के लिए मानवरहित और इंसान को लेकर जाने वाले कार्यक्रम की योजना बना रही हैं.


कुछ मुल्कों के लिए ये दोस्ताना प्रतिस्पर्धा है, लेकिन ये बात सच है कि अन्वेषण का हर कार्यक्रम चांद के बारे में जानकारी की किताब का एक नया चैप्टर साबित होगा. चांद पर लैंडर उतारने का हर मुल्क का छोटा कदम सौर मंडल के सदस्यों को समझने में मानव की मदद ही करेगा.


लेकिन कुछ जानकार मानते हैं कि कौन चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहले उतरेगा ये बात बेहद महत्वपूर्ण है.


यूएस एयर और स्पेस फोर्ट की एयर यूनिवर्सिटी में रणनीति और सुरक्षा मामलों की प्रोफ़ेसर वेंडी व्हिटमैन कॉब कहती हैं, "ऐसा लग रहा है कि ये मात्र संयोग है कि दोनों मून लैंडर एक ही वक्त चांद पर उतर सकते हैं. लेकिन ये बेहद दिलचस्प है."


वो बताती हैं कि रूस 2021 में लूना-25 का लॉन्च करना चाहता था लेकिन किन्हीं कारणों से इसके लॉन्च में देरी होती गई और ये इस साल प्रक्षेपित किया जा सका.


वो कहती हैं कि इस मामले में भारत रूस से एक कदम आगे है क्योंकि उसका स्पेसक्राफ्ट पहले ही चांद की कक्षा में है.


वो कहती हैं, "हो सकता है कि इस कारण रूस पर चांद तक पहले पहुंचने का कुछ दवाब भी हो, क्योंकि उन्होंने इसके लिए सीधा रास्ता चुना है."

लूना-25 के मुक़ाबले चंद्रयान-3 दोगुने वज़न का है और रूसी स्पेसक्राफ्ट के मुक़ाबले उसे कम क्षमतावाले रॉकेट से प्रक्षेपित किया गया है. इसका मतलब ये है कि चंद्रयान-3 पृथ्वी के चारों तरफ कक्षा में दीर्घ वृत्ताकार चक्कर काटेगा और फिर उसके बाद खुद को चांद की तरफ उछाल लेगा.


दोनों के कार्यक्रमों में सबसे अधिक दबाव ऑपरेटरों पर रहेगा जिन्हें चांद पर लैंडर उतारने से पहले उसका सटीक आकलन करना होगा ताकि टचडाउन की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी न हो.


आख़िरी वक्त पर हुई मामूली-सी तकनीकी गड़बड़ी से पूरे अभियान के नाकाम होने का ख़तरा है और दोनों ही अभियानों को तब तक सफल नहीं माना जाएगा जब तक वो अपने लैंडर को चांद की सतह पर सही तरीके से नहीं उतारते.


हालांकि ये भी सच है कि दोनों देशों के लिए ये मामला राष्ट्रीय गौरव से भी जुड़ा है. यूक्रेन के ख़िलाफ़ 'विशेष सैन्य अभियान' छेड़ने के बाद रूस कई स्तर पर पाबंदियों का सामना कर रहा है. ऐसे में वो ये साबित करना चाहता है कि स्पेस के क्षेत्र में उसकी क्षमता किसी भी कारण से प्रभावित नहीं हुई है.


व्हिटमैन कॉब कहती हैं, "इन पाबंदियों का रूस के स्पेस कार्यक्रम पर बुरा असर पड़ा है."

यूके की क्वीन मार्गरेट युनिवर्सिटी में स्पेस इंडस्ट्री की पढ़ाई कर रही स्टीफ़ानिया पालादिनी कहती हैं कि जब रूस अस्तित्व में नहीं था, उस वक्त 50 साल पहले सोवियत संघ चांद पर लैंडर और रोवर उतारने में सक्षम रहा था, ये पूरी रेस दरअसल चांद तक पहुंचने की नहीं है.


देखा जाए तो रूस ये रेस पहले ही जीत चुका है, लेकिन फिर 1976 में लूना-24 के बाद रूस ने इस मिशन पर अधिक ध्यान नहीं दिया. लूना-25 सालों बाद रूस के चांद मिशन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश है.


माना जाता है कि रूस का लूना-1 चांद तक पहुंचने वाला पहला रोवर था. जानकार कहते हैं कि इसका डिज़ाइन कुछ ऐसा था कि ये चांद तक पहुंच कर वहां उतरे लेकिन जब 1959 में ये चांद के पास पहुंचा तो ये उसकी सतह से 3,725 मील (5,995 किलोमीटर) दूर से होता हुआ गुज़र गया.


स्टीफ़ानिया पालादिनी कहती हैं, "ऐसे में अगर भारत का चंद्रयान-3 योजना के अनुसार चांद पर उतरता है तो भारत के लिए ये सॉफ्ट लैंडिग पहली बड़ी उपलब्धि होगी."


वो कहती हैं कि 2019 में चंद्रयान-2 के साथ भी भारत ने यही कोशिश थी कि वो चांद की सतह पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिग करा सके. लेकिन ये लैंडर चांद की सतह के साथ टकरा गया जिस कारण ये मिशन नाकाम हो गया.


हालांकि चांद के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने की कोशिश भारत ने इससे पहले ही की है. भारत ने अक्तूबर 2008 में चंद्रयान-1 चांद की कक्षा में स्थापित किया था, इसने मून इम्पैक्ट प्रोब भेजा था जो शैकलटन क्रेटर के पास जा कर क्रैश कर गया था. हालांकि इस प्रोब को कभी भी सॉफ्ट लैंडिंग के लिए तैयार नहीं किया गया था.

 इस बार क्या अलग है?

लेकिन इस बार का रूस और भारत का मिशन पहले से अलग है क्योंकि दोनों की इस बार की कोशिश है कि वो चांद के दक्षिणी ध्रुव में लैंडिंग की सही जगह खोज पाएं.


अब तक चांद के लिए जो भी मिशन भेजे गए हैं वो चांद के उत्तर में या फिर मध्य में लैंड करने के लिए भेजे गए हैं. यहां पर लैंडिंग के लिए जगह समतल है और सूरज की सही रोशनी भी आती है. लेकिन दक्षिणी ध्रुव चांद का वो इलाक़ा है जहां रोशनी नहीं पहुंचती. साथ ही इस जगह पर चांद की सतह पथरीली, ऊबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरी है.


यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो बोल्डर में एस्ट्रोफ़िज़िक्स और प्लेनटरी साइंस के प्रोफ़ेसर जैक बर्न्स कहते हैं, "यहां पहुंचने वाली सूरज की किरणें टेढ़ी होती हैं. चांद का अधिकतर हिस्सा अपेक्षाकृत समतल है, लेकिन दक्षिणी हिस्से में सूरज की रोशनी के कारण गड्ढों की परछाईं बहुत लंबी होती है. इस कारण यहां गड्ढों और ऊबड़-खाबड़ ज़मीन की पहचान कर पाना बेहद मुश्किल है."


आर्टेमिस-3 के साथ साल 2025 में अमेरिका चांद के दक्षिणी ध्रुव की तरफ इंसान को भेजना चाहता है. ऐसे में भारत और रूस के लैंडर से जो जानकारी मिलेगी वो बेहद महत्वपूर्ण होगी.


हालांकि ह्विटमैन कॉब कहती हैं कि इंसान को भेजना, मानवरहित स्पेसक्राफ्ट भेजने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है. वो कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि ये दोनों किसी तरह से एक जैसी योजनाएं हैं

असल रेस वक्त की....

यूनिवर्सिटी ऑफ़ एरिज़ोना में प्लैनेटरी साइंस के प्रोफ़ेसर विष्णु रेड्डी कहते हैं कि आने वाले वक्त में ये महत्वपूर्ण नहीं रहेगा कि कौन पहले गया और कौन बाद में.


वो कहते हैं, "आने वाले वक्त में हम ये देखेंगे कि कौन वहां अधिक देर तक मौजूदगी बना सका है. आज के वक्त में निजी कंपनियों और सरकारों के बीच की होड़ की जो चर्चा हो रही है वो बेतुकी है. प्रतियोगिता केवल आपको एक जगह तक पहुंचा सकती है, लेकिन ये वहां लंबे वक्त तक आपकी मौजूदगी सुनिश्चित नहीं कर सकेगी."


वो कहते हैं कि भारत और रूस दोनों के लैंडर लगभग एक जैसे हैं. उन्हें उम्मीद है कि इन दोनों से वैज्ञानिकों को चांद पर मौजूद पानी, खनिज, वहां के वातावरण और दूसरी चाज़ों के बारे में और जानकारी मिल सकेगी.


वो कहते हैं कि अगर दक्षिणी ध्रुव से चांद की एक साफ तस्वीर मिल सकी तो ये भी बड़ी उपलब्धि होगी क्योंकि मूल संघर्ष लैंडर को सफलतापूर्वक उस हिस्से में उतारने की है. Sabhar BBC.COM 

Read more

शनिवार, 12 अगस्त 2023

दुनिया का नया 'बादशाह' बनना चाहता है सऊदी अरब!, जानिए क्यों यूक्रेन शांति वार्ता में दिखाई दिलचस्पी

0

बदलती दुनिया में जब इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, सऊदी अरब अब अपने देश को पूरी तरह से बदलना चाहता है। जानिए इसके लिए वह क्या क्या उपाय कर रहा है? किस तरह वह दुनिया के घटनाक्रमों में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है? जानिए आखिर इन सबके क्या हैं मायने?Saudi Arab: रूस और यूक्रेन की जंग का हल निकालने के लिए सऊदी अरब के जेद्दा में यूक्रेन शांति शिखर सम्मेलन का आयोजन 5 और 6 अगस्त को किया गया। भारत ने भी इसमें हिस्सा लिया। सऊदी अरब में हुए इस शांति सम्मेलन में यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने भी हिस्सा लिया और 10 सूत्रीय शांति फॉर्मूला रखा, जिस पर विचार विमर्श हुआ। सवाल यह है कि आखिर दुनिया के बड़े मसलों पर सऊदी अरब अचानक क्यों इतनी दिलचस्पी लेने लगा? सुन्नी देश सऊदी अरब क्यों वैश्विक घटनाक्रमों में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है? क्यों रूस और चीन जैसे देशों के साथ उसके ताल्लुकात इतने गहरे होते जा रहे हैं? अमेरिका का करीबी रहा सऊदी अरब अब क्यों और किस वजह से अमेरिका से दूर दूसरी 'लॉबी' में अपनी सक्रियता दिखा रहा है। सऊदी अरब के मुखिया मोहम्मद बिन सलमान क्यों दुनिया के नए 'बादशाह' बनना चाहते हैं? यहां जानिए ऐसे ही सभी सवालों के जवाब। सऊदी अरब ने दो दिन की यूक्रेन शांति वार्ता आयोजित कर दुनिया को यह संकेत दिया कि वह अब सिर्फ 'तेल' बेचने वाला कारोबारी ही नहीं है, बल्कि वैश्विक घटनाक्रमों में सक्रियता बढ़ाकर अपने 'नए इरादे' दुनिया को दिखा रहा है। सऊदी अरब पर हाल ही में यूक्रेन और रूस की जंग के कारण विपरीत असर पड़ा है। उससे तेल खरीदने वाले परंपरागत ग्राहक अब रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहे हैं। इन सबके बीच अब बदलती दुनिया में जब इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, सऊदी अरब अब अपने देश को पूरी तरह से बदला चाहता है। एक तेल उत्पादक देश होने के साथ ही वह अपने देश का इंफ्रास्ट्रक्चर बदल रहा है। ऐसा करके वह यह जताना चाहता है कि अब वह टूरिज्म इंडस्ट्री में तेजी से अपने आपको 'शिफ्ट' कर रहा है। ताकि दूसरे माध्यमों से भी अरब को तगड़ी आया भविष्य में हो सके। वह तेजी से इस दिशा में वह काम कर रहा है। इसके लिए उसे नए दोस्तों की जरूरत है, जो उसके इस सपने को साकार करने में अपना सहयोग दे सकें।

Read more

भारत का चंद्रयान-3, चांद की सतह पर जहां उतरेगा, वो इतनी ख़ास क्यों है?

0

भारत का चंद्रयान-3, चांद की सतह पर जहां उतरेगा, वो इतनी ख़ास क्यों है? 

इंसान के लिए धरती से पूरा चांद देखना मुमकिन नहीं है. धरती से चंद्रमा का सिर्फ़ एक हिस्सा दिखता है और जो हिस्सा नज़र नहीं आता, उसे कहते हैं ‘डार्क साइड ऑफ द मून’ या ‘फ़ार साइड ऑफ द मून.’ भारत के चंद्रयान 3 का लक्ष्य यही है कि वो चांद के डार्क साइड में सॉफ्ट लैंडिंग कर सके, तो आइए समझते हैं चांद के इस छिपे हुए डार्क साइड के रहस्य को.

Read more

गुरुवार, 10 अगस्त 2023

Brain Computer Interface: आपके सोचने से काम करेगा स्मार्टफोन, आ रही है यह नई टेक्नोलॉजी

0



What Is The Brain Computer Interface: तकनीक के क्षेत्र में जिस तेजी से विकास हो रहा है। ऐसे में वह दिन दूर नहीं जबसाइंस फिक्शन में दिखने वाली हाईटेक चीजें यथार्थ रूप ले लेंगीआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी जगत में नित नए अविष्कार हो रहे हैं। ऐसे में रोज हमें कई हैरतअंगेज करने वाली तकनीकें देखने को मिल रही हैं। वहीं क्या कभी आपने किसी ऐसे स्मार्टफोन के बारे में सोचा, जिसका इस्तेमाल करने के लिए आपको उसे टच करने की भी जरूरत नहीं होगी। आप अपने मन से स्मार्टफोन को चला सकेंगे। 
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस एक खास तरह की तकनीक है, जिसकी मदद से दिमागी इलेक्ट्रिकल गतिविधियों को बाहरी डिवाइस के साथ जोड़ा जाता है। इस तकनीक के अंतर्गत व्यक्ति के मस्तिष्क में स्टेंट्रोड नाम की एक चिप लगाई जाएगी। 


 

Read more

Ads

 
Design by Sakshatkar.com | Sakshatkartv.com Bollywoodkhabar.com - Adtimes.co.uk | Varta.tv