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बुधवार, 23 जुलाई 2014

इस तरह आत्माएं हमसे संपर्क बना लेती हैं

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parapsycholoy how atma contect with human

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केन्द्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं।

अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए पृथ्वी पर भी आते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का इस मामले में कुछ और ही कहना है।
प्रसिद्घ भौतिक विज्ञानी मार्टिन गार्डनर ने लिखा है कि- इस संसार में हर दिन हजारों व्यक्तियों के साथ ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं घटती रहती है जिसे महज संयोग या अपवाद मानकर खारिज कर दिया जाता है।

इन घटनाओं में से कुछ को भले ही संयोग मान लिया जाए लेकिन ऐसी विलक्षण घटनाएं होती हैं उन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।

ब्रिटेन के विख्यात भौतिकशास्त्री और गणितज्ञ एड्रिन डॉब्स ने विभिन्न अनुसंधानों के उपरांत यह निष्कर्ष दिया कि ब्रह्माण्ड में ऐसी सूक्ष्म संदेश वाहक शक्तियां निरंतर प्रवाहित होती रहती है जो मानवी ज्ञानेन्द्रिय से संपर्क स्थापित करती है।
इन तरंगों की वेवलेन्थ तरंग दैर्ध्य लगभग एक समान होती है। द रूट्स ऑफ कोइन्सीडेन्स नामक पुस्तक में आर्थर कोएस्लर ने लिखा है कि- इस माध्यम से ब्रह्माण्ड व्यापी अदृश्य चेतन-शक्तियां शरीरधारी मनुष्यों से संपर्क साधती है, उन्हें पूर्वाभास कराती है, मार्गदर्शन कराती है और संकट के समय मनोबल बढ़ाने वाली चेतना देती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि सूक्ष्म शरीरधारियों में एक्टोप्लाज्म नामक एक सूक्ष्म द्रव्य मौजूद होता है। संभवतः जीवात्मा इन्हीं का उपयोग करके भौतिक आकार ग्रहण करती है।

sabhar :http://www.amarujala.com/

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यौनकर्म को कानूनी दर्जे से घटेगा एड्स

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मेलबर्न में 20वीं अंतरराष्ट्रीय एड्स कांफ्रेंस में कहा गया है कि यौनकर्म पर कानूनी पाबंदी हटा देने से एड्स की रोकथाम में मदद मिलेगी. रिसर्चरों ने कई देशों से जमा आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट पेश की.
एचआईवी के संक्रमण में सबसे बड़ा हाथ महिला यौनकर्मियों का माना जाता है. नीति निर्माताओं का कहना है कि अगर इन्हें कानूनी दर्जा दिया जाता है तो एचआईवी/एड्स के प्रति जागरुकता फैलाने में आसानी होगी. एड्स के फैलाव, कॉन्डोम, और एचआईवी की दवा के बारे में खुलकर बात हो सकेगी और प्रचार बढ़ेगा.
रिसर्चरों के मुताबिक अपने काम को जब यौनकर्मी कानून के दायरे में रह कर करेंगे तो वे सेक्स सुरक्षा संबंधी मामलों पर सलाह लेने में झिझकेंगे नहीं. कॉन्डोम के इस्तेमाल और दवाओं तक उनकी पहुंच भी आसान हो सकेगी. वे अपने ग्राहक से बिना डरे कह सकेंगे कि वे सुरक्षित सेक्स चाहते हैं. असुरक्षित सेक्स एचआईवी वायरस संक्रमण का सबसे बड़ा कारण है.
AIDS Konferenz Melbourne
साइंस पत्रिका लैंसेंट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक अगले एक दशक में 33 से 46 फीसदी तक एड्स के फैलाव को कम किया जा सकता है. हालांकि रिसर्चरों ने माना कि कई इलाकों में दूसरे तरीके ज्यादा मददगार साबित हो सकते हैं. केन्या में अगर एचआईवी संक्रमित यौनकर्मियों को वायरस दबाने वाली दवा दी जाए तो अगले दस सालों में एचआईवी के मामलों में एक तिहाई कमी आ सकती है.
इस मॉडल को तैयार करने के लिए रिसर्चरों ने प्रमुख साइंस पत्रिकाओं के 204 शोधों का अध्ययन किया. 2012 में 20 गरीब और पिछड़े देशों में हुई एक जांच के मुताबिक 12 फीसदी यौनकर्मियों को एचआईवी संक्रमित पाया गया. दक्षिणी सहारा देशों में 50 फीसदी तक यौनकर्मी एचआईवी संक्रमित हैं. एक ताजा रिसर्च के मुताबिक दुनिया भर में एड्स के कारण मरने वाली 92 फीसदी यौनकर्मी अफ्रीकी देशों के हैं.
एसएफ/एमजी (एएफपी) sabhar :http://www.dw.de/

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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

टीवी पर एंकर की जगह दिखाई देंगे रोबोट

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कैसा होगा वो दिन जब टीवी पर किसी खूबसूरत एंकर को आप खबरें पढ़ते हुए देख रहे हैं और आपकोपता चलेकि वो एंकर कोई इंसान नहीं बल्कि एक रोबोट है. जी हां आने वाला समय अब रोबोटिक होने वाला है.
जापान के एक कंप्यूटर साइंटिस्ट हिरोशी इशीगोरो ने ऐसे रोबोट टीवी प्रेजेंटर बनाए हैं जो दिखने में एकदम इंसान की तरह लगते हैं. ये रोबोट न कि खबरें पढ़ते हैं, बल्कि आंखें, भौंए और होंठ भी हिलाते हैं. ये अनोखे रोबोट बिल्कुल इंसानों की तरह डिस्कस करते हैं.
इसमें चौंकाने वाली यह भी है कि इन रोबोट्स इस तरह से बनाया गया है कि जरूरत पड़ने इन्हें मेल या फिर फीमेल टीवी प्रेजेंटर के रूप में भी काम में लिया जा सकता है.
इन दोनों अनोखे रोबोट्स में एक का नाम कोडोमोरॉयड है जबकि दूसरे का नाम ओटोनोरॉयड. इन्हें हाल ही में टोक्यो म्यूजियम में लोगों के बीच डिस्पले किया गया है sabhar :http://www.palpalindia.com/

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अफगानिस्तान में मिला ५००० साल पुराना महाभारतकालीन विमान

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अभी तक हम धर्मग्रंथों में ही पढ़ते ही रहे हैं कि रामायणकाल और महाभारत काल में विमान होते थे। पुष्पक विमान के बारे में भी हम सबने पढ़ा है।...लेकिन हाल ही में एक सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक अफगानिस्तान में एक ५००० साल पुराना विमान मिला है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह महाभारतकालीन हो सकता है।
 
वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने एक विमान को हाल ही में अफ‍गानिस्तान की एक गुफा में पाया गया है। कहा जाता है कि यह विमान एक 'टाइम वेल' में फंसा हुआ है अथवा इसके कारण सुरक्षित बना हुआ है। यहां इस बात का उल्लेख करना समुचित होगा कि 'टाइम वेल' इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है।
कहा जा रहा है कि यह विमान महाभारत काल का है और इसके आकार-प्रकार का विवरण महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में‍ किया गया है। इस कारण से इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं। रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज (एसवीआर) का कहना है कि यह महाभारत कालीन विमान है और जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। इस एजेंसी ने २१ दिसंबर २०१० को इस आशय की रिपोर्ट अपनी सरकार को पेश की थी।
घातक हथियार भी लगे हैं इस विमान में..
रूसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि यह प्रागेतिहासिक मिसाइलों से संबंधित विवरण है। अमेरिकी सेना के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाशगंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों।
एसवीआर रिपोर्ट का कहना है कि यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप ४० सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। संस्कृत भाषा में विमान केवल उड़ने वाला वाहन ही नहीं होता है वरन इसके कई अर्थ हो सकते हैं, यह किसी मंदिर या महल के आकार में भी हो सकता है।
चीन को भी तलाश है भारत के प्राचीन ज्ञान की
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कुछेक वर्ष पहले ही चीनियों ने ल्हासा, ति‍ब्बत में संस्कृत में लिखे कुछ दस्तावेजों का पता लगाया था और बाद में इन्हें ट्रांसलेशन के लिए चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में भेजा गया था।
यूनिवर्सिटी की डॉ. रूथ रैना ने हाल ही इस बारे में जानकारी दी थी कि ये दस्तावेज ऐसे निर्देश थे जो कि अंतरातारकीय अंतरिक्ष विमानों (इंटरस्टेलर स्पेसशिप्स) को बनाने से संबंधित थे।
हालांकि इन बातों में कुछ बातें अतरंजित भी हो सकती हैं कि अगर यह वास्तविकता के धरातल पर सही ठहरती हैं तो प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के बारे में ऐसी जानकारी सामने आ सकती है जो कि आज के जमाने में कल्पनातीत भी हो सकती है।
स्त्रोत : हिंदी वेबदुनिया SABHAR :http://www.hindujagruti.org/

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रूसी भौतिकविदों ने टेलीपोर्टेशन को यथार्थ में बदला

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रूसी भौतिकविदों ने टेलीपोर्टेशन को यथार्थ में बदला

मास्को भौतिकी और प्रौद्योगिकी संस्थान (MPTI) के वैज्ञानिकों ने साबित कर दिया है कि टेलीपोर्टेशन कोई कल्पना या कथा नहीं है|

निकट भविष्य में शारीरिक बल का उपयोग किये बिना लंबी दूरी की यात्रा और दो ​​स्थानों पर एक साथ होना संभव होगा| उदाहरण के लिए, बीजिंग या मास्को में और साइबेरिया और न्यूजीलैंड के द्वीपों में| टेलीपोर्टेशन द्वारा अंतरिक्ष की खोज की भी संभावनाएं हैं| "क्वांटम उलझाव" के रूप में एक भौतिक प्रभाव के कारण यह सब सच हो सकता है| यह क्वांटम वस्तुओं की अविभाज्य रहते हुए अलग अलग स्थान पर रहने की क्षमता है|
पारंपरिक भौतिकी में ऐसा कोई प्रभाव नहीं है| रूसी वैज्ञानिकों को काफी दूरी तक सूचना प्रसारण में "क्वांटम उलझाव" संरक्षित करने के लिए एक रास्ता मिल गया है| यह अनिवार्य रूप से टेलीपोर्टेशन ही है| MPTI के वैज्ञानिकों में से एक शोधकर्ता सेर्गेई फिलिप्पोव ने "रेडियो रूस" को बताया:
“यदि धागे के गोले में एक गांठ पड़ जाये तो हम हताश हो जाते हैं, लेकिन ऐसी जटिल स्थिति भौतिकी में वैज्ञानिकों को बहुत खुश करती है क्योंकि इन स्थितियों में एक संबंध है। तार के एक सिरे पर जो कुछ हो रहा है वह दूसरे सिरे के साथ जुड़ा हुआ है। इस प्रकार के सहसंबंध को कहीं भी भेजा जा सकता है| इस प्रकार एक महान दूरी पर रहने वाले लोग एक दूसरे से सहसंबद्धित हो जाएंगे और उनका व्यवहार एक दूसरे से स्वतंत्र नहीं होगा|
भौतिकविदों का मूल अनुसंधान एक फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क पर संकेत संचरण के अध्ययन के साथ जुड़ा हुआ है| वैज्ञानिक फिलिप्पोव के अनुसार यह तथाकथित "गुप्त क्वांटम संचार" है| मास्को भौतिकी और प्रौद्योगिकी संस्थान में विकसित एक एल्गोरिथ्म इस रिश्ते को और भी अधिक रहस्यमय बनाने की अनुमति देता है| जहाँ तक टेलीपोर्टेशन का सवाल है, यह अनुसन्धान के एक "अतिरिक्त" प्रभाव की तरह बन गया है| वैज्ञानिक ने बताया कि वस्तुओं या लोगों को स्थानांतरित करने के लिए कैसे इस प्रभाव का उपयोग किया जाएगा|
मान लीजिए कि आप एक व्यक्ति का टेलीपोर्टेशन करना चाहते हैं| ऐसा करने के लिए आपको सभी परमाणुओं को आगे भेजने की आवश्यकता नहीं है| आपको पता है कि व्यक्ति के शरीर में ऑक्सीजन 20 किलो, कार्बन 10 किलो, कुछ मात्रा में हाइड्रोजन है, और आप दूसरे छोर पर उतनी ही राशि ले सकते हैं और फिर उनके आपसी सम्बन्ध के बारे में परमाणुओं में जो जानकारी दर्ज की गई है वह भेज सकते हैं| और दूसरे छोर पर आपके द्वारा भेजी गयी जानकारी की सहायता से एक वैसे ही इंसान का "गठन" कर लिया जाता है|
एक अर्थ में, यह "गठन" एक लेजर के साथ दर्ज की गई और फिर बाद में होलोग्राफ़ी द्वारा असली रूप में पुनर्निर्मित वस्तुओं की इसी तरह की तीन आयामी छवि की याद दिलाता है| फर्क केवल यह है कि एक विशेष प्रकार की फोटोग्राफी के बदले "गठन" सभी विशिष्ट लक्षणों, योग्यताओं और उमंगों के साथ, "मांस और खून" से बने, बातचीत करने में समर्थ व्यक्ति के टेलीपोर्टेशन की बात है| इतनी ऊंचाई तक विज्ञान अभी तक निश्चित रूप से नहीं पहुंचा है| वैज्ञानिकों को केवल फोटॉनों को टेलिपोर्ट करने में सफ़लता मिली है| वे आम तौर पर भेजी गई जानकारी के वाहक हैं| लाइन के दूसरे छोर पर विशेषज्ञ एक सूक्ष्म वस्तु का उसी स्थिति में पुनर्निर्माण कर सकते हैं जैसा कि दूसरे सिरे से भेजा गया था| अब हम इस सिद्धांत को और अधिक जटिल प्रणालियों में लागू करने के लिए प्रयास कर रहे हैं| यह एक बहुत मुश्किल काम है: जब आकार बढ़ता है तो टेलीपोर्टेशन प्रणाली में नाटकीय रूप से जटिलता बढ़ती है| अध्ययन के लेखक ने बताया: "दो परमाणुओं का टेलिपोर्ट एक परमाणु के प्रसारण से दुगना कठिन है और तीन परमाणुओं का प्रसारण आठ गुना कठिन है| यदि हम मानव टेलीपोर्टेशन की जटिलता की डिग्री का आकलन करना चाहते हैं, तो इस बात पर विचार करना चाहिए: मानव शरीर की रचना में 10²4  परमाणुओं का समावेश होता है...SABHAR :http://hindi.ruvr.ru/
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2014_07_19/274827391/

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सोमवार, 21 जुलाई 2014

ब्लड ग्रुप के मुताबिक चुनें अपना भोजन

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ग्रुप ए
ब्लड ग्रुप ए के लोगों के लिए हरी सब्जियां, अनाज, बींस अंकुरित भोजन, फल, ड्राई फ्रूट्स और ब्रेड, नूडल्स, चाइनीज फूड्स, डिनर रोल, बर्गर जैसे फूड्स को प्राथमिकता देनी चाहिए। वजन घटाने के लिए मीट, दूध से बने उत्पाद, गेहूं को अवॉइड करें।


ग्रुप बी
ब्लड ग्रुप बी वाले लोग विभिन्न तरह का भोजन ले सकते हैं। इनमें अनेक प्रकार का मांस, सब्जियां, अनाज शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्लड ग्रुप बी के लोगों को अनेक प्रकार का भोजन सूट करता है। लेकिन संयमित रूप से लें। अगर दिन में मीट लिया है तो शाम में वेजीटेबल आदि खाएं। हालांकि पैकेट बंद खाद्य पदार्थ, गोभी मक्का, मूंगफली, मसूर, तिल आदि को नजरअंदाज करें।
- ग्रुप एबी
इस ब्लड ग्रुप के लोगों को मांस-मछली, सब्जियां, कार्बोहाइड्रेट्स, दूध, दही व दूध से बने पदार्थ और अनाज सूट करते हैं। यानी अधिक से अधिक प्रोटीन लेना चाहिए। इस तरह का भोजन खाने से वे ज्यादा हेल्थी रह सकते हैं। इस ग्रुप के लोग मिश्रित आहर ले सकते हैं लेकिन फिर भी रेड मीट, मक्का आदि को नजरअंदाज करना चाहिए।
-ग्रुप ओ
सबसे पुराना ग्रुप होने के कारण ब्लड ग्रुप ओ के लोगों को उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ और मांस अधिक लेना चाहिए, लेकिन दूध के उत्पाद को नजरअंदाज करना चाहिए।
sabhar :http://www.onlymyhealth.com/

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अमेरिका तक सुरंग के जरिए दौड़ेगी चीन की बुलेट ट्रेन

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पेइचिंग. चीन अमेरिका तक रेल लाइन बिछाने और बुलेट ट्रेन सेवा शुरू करने की योजना बना रहा है. इसके लिए चीन ने प्रशांत महासागर के नीचे सुरंग बनाकर अमेरिका तक 13 हजार किलोमीटर लंबी बुलेट ट्रेन चलाने के लिए रेल लाइन बिछाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है. यह रेलवे लाइन अलास्का और कनाडा होते हुए अमेरिका तक पहुंचेगी.
प्रस्तावित रेल लाइन उत्तर-पूर्वी चीन से शुरू होकर रूस के पूर्वी साइबेरिया, बेरिंग स्ट्रैट, अलास्का, कनाडा होते हुए अमेरिका तक बिछाई जाएगी. चीन की इंजिनियरिंग अकादमी के अधिकारी एवं रेलवे के जानकार वांग मेंगशु ने पत्रकारों को यह जानकारी दी.
इस रेलवे लाइन पर बुलेट ट्रेन 350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकेगी. इससे उत्तर पूर्वी चीन के यात्री मात्र दो दिनों में अमेरिका पहुंच जाएंगे. उन्होंने बताया कि चीन की ही तरह रूस भी रेल नेटवर्क पर बहुत अधिक निर्भर है और उसने भी इस योजना में रूचि दिखाई है.
इस प्रोजेक्ट का नाम रखा गया है-चीन-रूस प्लस अमेरिका रेल लाइन. यह कुल 13,000 किलोमीटर की होगी. दूसरी ओर चीन ट्रांस एशियन रेल लाइन पर अगले महीने से काम शुरू कर रहा है. इसके तहत चीन से रेल लाइन वियतनाम, मलेशिया, सिंगापुर होते हुए थाईलैंड तक जाएगी.


पेइचिंग टाइम्स समाचार पत्र ने वांग के हवाले से लिखा है कि रूस के मध्य बेरिंग स्ट्रैट और अलास्का से जाने वाली रेलवे लाइन के लिए 200 किमी की भूमिगत सुरंग बनायी जाएगी.
sabhar :http://www.palpalindia.com/

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शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

दिल के अंदर ही बन जाएगा पेसमेकर

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जैविक पेसमेकर, सेडार्स सिनाई

अपने ही शरीर में खुद का पेसमेकर तैयार करने की कल्पना जल्द ही हक़ीक़त में बदल सकती है. वैज्ञानिकों ने सुअरों में इसके कामयाब प्रयोग किए हैं.
वैज्ञानिकों ने हृदय की कोशिकाओं में एक जीन डालकर उन्हें पेसमेकर कोशिका में बदल दिया.

क्लिक करें
लॉस एंजेलिस के सिडार्स-सिनाई हार्ट इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार 'जैविक पेसमेकर एक बीमारी का प्रभावी ढंग इलाज करने में' कामयाब रहा है.
ब्रिटिश हार्ट फ़ाउंडेशन के अनुसार क्लिक करेंसाइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित शोध को प्रयोग में आने में 'अभी बहुत समय लगेगा.'
शोधकर्ताओं ने ऐसे सुअरों में एक जीन को डाला जिन्हें हृदयगति धीमी रहने की बीमारी थी.
इस जीन थैरेपी ने करोड़ों की संख्या में मौजूद दिल की मांसपेशियों में से कुछ को बहुत दुर्लभ उन विशेष कोशिकाओं में बदल दिया जो दिल की धड़कन को एक समान रखती हैं.

पारंपरिक पेसमेकर

जैविक पेसमेकर कोशिकाओं की तस्वीर
(जैविक पेसमेकर कोशिकाओं की तस्वीर)
शोध दल का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर एडुआर्डो मार्बन ने कहा, "पहली बार हम एक जैविक पेसमेकर तैयार करने में कामयाब हुए हैं जिसमें कम से कम बाहरी दखल दिया गया है. इससे यह भी पता चला है कि जैविक पेसमेकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी का बोझ उठा सकता है."

पारंपरिक पेसमेकर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है जिसे छाती के अंदर लगाया जाता है और ये अनियमित हृदयगति को नियंत्रित करता है.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

सावधान! नहीं तो आपको भी हो सकता है ब्रेन स्ट्रोक

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शरीर में रक्त प्रवाह में किसी तरह की बाधा आपको भारी नुकसान पहुंचा सकती है। आपकी जान भी जा सकती है। खासकर उस स्थिति में जब मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति बाधित होती हो। इसे हम ब्रेन स्ट्रोक भी कहते हैं। ब्रेन स्ट्रोक किसी बाधा के कारण इश्चेमिया (रक्त संचार में कमी) या फिर हेमरेज (रक्तस्त्राव) के कारण होता है।
हलांकि एक आम इंसान को ब्रेन स्ट्रोक के बारे में पता नहीं होता। इसके क्या प्रभाव होते हैं, इसके होने पर तुरन्त क्या करना चाहिए, क्या इसका इलाज संभव है आदि बातों से वह पूरी तरह से अंजान रहता है। वैसे एक आम इंसान के सामने सबसे जरूरी सवाल तो यही होता है कि ब्रेन स्ट्रोक के सामान्य लक्षण क्या हैं?
तनाव, मधुमेह, धूम्रपान, मोटापा, उच्च कोलेस्ट्रॉल स्तर और हृदय रोग ब्रेन स्ट्रोक के लिए प्रमुख खतरे हो सकते हैं। अगर आप भी इस तरह के खतरों से पीड़ित हैं तो हो जाइए सावधान!
ब्रेन स्ट्रोक के सामान्य लक्षण
1. बांह में कमजोरी :
स्ट्रोक के मरीज को एक या दोनों बांहों में सुन्न होने या कमजोरी का एहसास हो तो जरूर डॉक्टर को दिखाना चाहिए। याद रहे सुन्न होने की स्थिति में मरीज का हाथ उपर नहीं उठता।
2. चेहरे का झुकना :
अगर मरीज का चेहरा एक तरफ झुक जाए या फिर चेहरा सुन्न हो जाए तो समझ लीजिए मामला गंभीर है। इस दौरान आप उसे हंसने के लिए कहें, यदि वह ऐसा न कर सके तो तुरन्त अस्पताल ले जाएं।
3. बोलने में परेशानी :
स्ट्रोक के दौरान यदि मरीज को बोलने में परेशानी होती है, साधारण से सवाल का वह जवाब नहीं दे पाता, तो समझिए की उसे डॉक्टर की जरूरत है।
4. सन्तुलन खोना
शरीर को सन्तुलित करने में परेशानी, सीधे खड़ा नहीं हो पाना या चलने में परेशानी आदि ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण हैं।
5. सिर में दर्द
बिना किसी कारण सिर में भयंकर दर्द हो तो यह सामान्यत: हेमरेज (रक्तस्त्राव) के कारण स्ट्रोक का संकेत हो सकता है।
6. यदि सामान्य अवस्था में थोड़े समय के लिए यादाश्य भी चली जाती है तो समझे यह बीमारी होने वाली है।
7. कई बार आंखों के सामने अंधेरा छा जाना और चक्कर आना भी ब्रेन स्ट्रोक की वजह हो सकती है।sabhar :http://www.jagran.com/

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स्टीफन हॉकिंग ने लांच किया सुपर कंप्यूटर

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लंदन। प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग ने सुपर कंप्यूटर लांच किया है। हॉंिकंग का मानना है कि एसजीआइ कंपनी द्वारा निर्मित कॉसमॉस सुपरकंप्यूटर अपनी तरह का पहला कंप्यूटर है जो संभावनाओं के नए द्वार खोल सकेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के सेंटर फॉर मैथेमेटिकल साइंसेज में न्यूमेरिकल कॉस्मोलॉजी कार्यशाला में सुपरकंप्यूटर के लांच के मौके पर हॉकिंग ने कहा कि हमने हाल ही में पार्टिकल फिजिक्स और कॉस्मोलॉजी
[ब्रह्मांड विज्ञान] के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। कॉस्मोलॉजी अब एक वास्तविक विज्ञान है। इसलिए हमें वास्तविक ब्रह्मांड तक पहुंच और उसके बारे में अनुसंधान करने के लिए कॉस्मॉस की जरूरत है। कार्यशाला का आयोजन इनटेल की मदद से किया गया था। इसमें कंप्यूटेशनल कॉस्मोलॉजी से जुड़े प्रमुख लोगों ने हिस्सा लिया। हॉंिकंग ने कहा, 'मुझे उम्मीद है कि जल्द ही ऐसी परिकल्पना मिल जाएगी जिससे सैद्धांतिक तौर पर ब्रह्मांड में होने वाली प्रत्येक घटना की भविष्यवाणी की जा सकेगी।' कॉस्मॉस संघ का वर्तमान शोध कार्यक्रम ब्रह्मांड की उत्पत्तिऔर संरचना को लेकर समझ बढ़ाने से संबंधित है। sabhar :http://www.jagran.com/

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शोधकर्ताओं ने ढूंढा स्टीफन हाकिंग की बीमारी का इलाज

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लंदन। शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन के मशहूर भौतिक शास्त्री स्टीफन हॉकिंग की तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारी मोटर न्यूरोन का उपचार खोज निकालने की उम्मीद जताई है। नई तकनीक का अगले साल तक चिकित्सकीय परीक्षण किया जा सकता है।
शेफील्ड इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसलेशनल न्यूरोसाइंस के मुताबिक, इस तकनीक से मोटर न्यूरोन बीमारी के उपचार का मार्ग प्रशस्त होगा। इसकी मदद से ऐसे लोगों की पहचान की जा सकेगी, जिसके परिवार में तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारी रही हो। इससे जीन संबंधी गड़बड़ी को पहले ही सुधारा जा सकेगा।
जीन थेरेपी के प्रोफेसर मिमोन अजोज के मुताबिक, मोटर न्यूरोन बीमारी का कोई इलाज नहीं है। इससे पीड़ित व्यक्ति के जिंदा बचने की संभावना बहुत कम होती है। व्यक्ति अपनी मांसपेशियों पर नियंत्रण खो बैठता है। इसके कुछ मामले अनुवांशिक होते हैं जिनमें एसओडी1 जीन की गड़बड़ी पाई जाती है। हम इस जीन की गड़बड़ी को सही करने के प्रयास कर रहे हैं। ताकि बीमारी के लक्षण उभरने से पहले ही जीन का उपचार किया जा सके।
प्रोफेसर अजोज ने कहा, मौजूदा समय में रिलुजोल नाम की दवा से मरीज के जीवनकाल को तीन से छह महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसका प्रभाव सभी मरीजों पर एक जैसा नहीं होता।
दुनिया भर में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम' के लेखक और कैम्ब्रिज सेंटर फॉर थ्योरेटिकल कॉस्मोलॉजी में शोध निदेशक स्टीफन हाकिंग बोलने के लिए कंप्यूटर तकनीक की मदद लेते हैं, जिससे उनके जबड़े की मांसपेशियों से संचालित होती हैं। यह पहेली शोधकर्ताओं की समझ से अभी तक बाहर है कि वह मोटर न्यूरोन जैसी खतरनाक बीमारी के साथ 40 साल से कैसे जीवित हैं
sabhar : http://www.jagran.com/

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