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रविवार, 31 जनवरी 2021

भारतीय कृषि की अर्थब्यवस्था में योगदान

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भारतीय कृषि भारतीय कृषि में लगभग 70% से अधिक जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है भारत की भारत की अर्थव्यवस्था का आधार है इसका सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 14% योगदान है यह देश के लिए खाद्य सामग्री सुनिश्चित करती है और उद्योगों के लिए कच्चा माल पैदा करती है कृषि विकास किस लिए हमारी संपूर्ण खुशहाली की पहली शर्त है एग्रीकल्चर लेकिन भाषा के 2 शब्दों एग्रोस तथा कल्चर से बना है एग्रोस का अर्थ है भूमि और कल्चर का अर्थ है जुताई अर्थात कृषि का अर्थ है भूमि की जुताई कृषि के अंतर्गत पशुपालन मत्स्य अन्य विषय भी आते हैं वर्ष में एक बार बो गई भूमि को शुद्ध बोया क्षेत्र कहते हैं शुद्ध बोये गए क्षेत्र तथा 1 बार से अधिक बोये गए क्षेत्र को कुल मिलाकर कुल बोया गया क्षेत्र कहते हैं भारत में शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 17 करोड हेक्टेयर है कुल भौगोलिक क्षेत्र का 52% है पौधों से परिष्कृत उत्पाद तक की रूपांतरण में तीन प्रकार की आर्थिक क्रियाएं सम्मिलित हैं प्रथम द्वितीय तृतीय प्रथम प्राथमिक क्रियाओं के अंतर्गत कौन सभी क्रियाओं को शामिल किया जाता है जिनका संबंध पर आर्थिक प्राकृतिक संसाधन के उत्पादन निष्कर्षण से एक कृषि मत्स्य अच्छे उदाहरण है बुटीक इन संसाधनों के प्रसंस्करण से संबंधित है इस्पात निर्माण डबल रोटी पकाना कपड़ा बोलना तृतीय कन्या प्राथमिक उद्योग क्षेत्र को सेवा द्वारा सहयोग प्रदान करती हैं यातायात व्यापार बैंकिंग बीमा विज्ञापन प्रतिक्रियाओं के उदाहरण है इस प्रकार कृषि कृषि प्राथमिक क्रियाओं के अंतर्गत आता है ऐसी दो प्रकार से की जाती है हाथ निर्वाह कृषि इस प्रकार की कृषि कृषक परिवार की आवश्यकता को पूरा करने के लिए की जाती है पारंपरिक रूप से कम उपज प्राप्त करने के लिए निम्न स्तरीय प्रौद्योगिकी पारिवारिक श्रम का उपयोग किया जाता है निर्वाह कृषि को पुनः निर्वाह कृषि आदि निर्वाह कृषि में वर्गीकृत किया जा सकता है गहन निर्वाह कृषि कृषि में किसान एक छोटे भूखंड प्रसाधन औजार आदिम श्रम से खेती करता है अधिक धूप वाले दिनों में उपायुक्त जलवायु एवं उर्वरक मृदा वाले खेत में 1 वर्ष में 1 से अधिक फसलें उगाई जा सकती हैं चावल मुख्य फसल होती है गहन निर्माण कृषि दक्षिणी दक्षिणी पूर्वी पूर्वी एशिया के सघन जनसंख्या वाले मानसूनी प्रदेशों में प्रचलित है स्थानांतरण शामिल है स्थानांतरित कृषि में सबसे पहले भूमि वन भूमि से पेड़ों को काटकर तरह तन्हा शाखाओं को जलाकर साफ किया जाता है जब उनका टुकड़ा साफ हो जाता है तो उसमें दो या 3 सालों तक फसलें उगाई जाती हैं भूमि की उर्वरा शक्ति के घटने पर भूमि के कुछ टुकड़े को छोड़ दिया जाता है और किसान नए भूखंड पर चला जाता है भारत में स्थानांतरित कृषि पूर्वोत्तर राज्य में की जाती है जैविक कृषि में रासायनिक खादों के स्थान पर जैविक खाद और प्राकृतिक पीड़कनाशी का प्रयोग किया जाता है मक्का को कारण के नाम से भी जाना जाता है विश्व में इसकी रंग बिरंगी प्रजातियां पाई जाती हैं संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे प्रेशर नार्मल और नेवला को हरित क्रांति का पिता कहा जाता है भारत में हरित क्रांति का श्रेय डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन को जाता है भारत में हरित क्रांति की शुरुआत 9768 क्रांति के जनक भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला नारियल भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला नारियल काजू पपीता और भारत विश्व में फलों और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है या आम केला नारियल काजू पपीता और अनार का सबसे बड़ा उत्पादक है और मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है भारत का दूध उत्पादन मेंं विश्व्व में भारत का मछली उत्पादन मेंं विश्व इस प्रकार भारतीय कृषि देश की अर्थव्यवस्था् में योगदान देती है

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मौसम टाइम मशीन का निर्माण

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अभी तक मौसम विज्ञानियों को मौसम से संबंधित ऐतिहासिक डेटा नहीं मिल पाता था जिसकी वजह से वह सटीक तौर पर मौसम की भविष्यवाणी नहीं कर पाते थे मौसम वैज्ञानिकों ने ऐसे सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का विकास किया है जिससे मौसम पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों को पूरे विश्व का ऐतिहासिक मौसम डाटा मिल जाएगा इस सॉफ्टवेयर में महासागरों को भी शामिल किया गया है

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शनिवार, 30 जनवरी 2021

हड़प्पा सभ्यता ऋतु परिवर्तन से नष्ट हुई

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सिंधु घाटी सभ्यता अथवा हड़प्पा सभ्यता विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है यह विश्व की पहली शहरी सभ्यता थी जो भारतीय महाद्वीप में फली फूली सिंधु सभ्यता का चरम काल लगभग 26 ईसवी पूर्व से उन्नीस सौ ईसवी पूर्व के बीच में था इस सभ्यता के विकसित शहरों की मिसाल आज तक दी जाती है आज भी लोगों के लिए यह रहस्य है कि ऐसी फलती फूलती सभ्यता किसी समय अचानक समाप्त कैसे हो गई थी काफी समय से एक सिद्धांत या प्रस्तुत किया जाता है कि उत्तर-पश्चिम से हुए आर्यों के आक्रमण की वजह से उच्च विकसित सभ्यता नष्ट हो गई थी हालांकि इस सिद्धांत के पक्ष में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका था अब वैज्ञानिकों और पुरातत्व नेताओं ने इसका वास्तविक कारण ऋतु परिवर्तन को बताया है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और बनारस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि सिंधु घाटी क्षेत्र में लगभग 200 वर्ष तक सूखे के प्रकोप की श्रृंखला खेली जिसकी वजह से यह सभ्यता नष्ट हो गई यह बताता है कि 4100 वर्ष पूर्व उत्तर पश्चिम भारत अचानक कमजोर पड़े कृष्ण मानसून से प्रभावित हुआ था जिससे इस क्षेत्र में मरुस्थल जैसी स्थिति बन गई थी पुरातत्व व्यक्तियों ने को इस बात की भी प्रमाण मिले हैं कि लगभग इसी कालखंड के दौरान जो गलियां पहले साफ-सुथरी रहती थी वह गंदगी से भरने लगी थी उनकी हस्तकला की खुशियां धीरे-धीरे घटने लगी थी उनकी लिपि भी लुप्त होने लगी थी उस सीमा तक जनसांख्यिकीय स्थानांतरण भी हुआ इसी दौरान सिंध घाटी के बड़े शहर जिनकी जनसंख्या 100000 तक की तेजी से घटी संख्या घटने के साथ-साथ उनकी सभ्यता नष्ट हो गई

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शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

घेरता बचपन में बुढ़ापा प्रोजेरिया

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 फिल्म पा में जब लोगों ने अमिताभ बच्चन की को प्रोजेरिया नामक बीमारी से पीड़ित बच्चे की भूमिका निभाते देखा तो कई लोगों को यकीन भी नहीं हुआ ऐसी भी कोई बीमारी होती है हमें से शायद ही किसी ने इस बीमारी का नाम सुनाओ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शायद कुछ लोग ही इस बीमारी के बारे में जानते होंगे दरअसल यह बीमारी सामान्य नहीं है इसलिए लोग इसकी जानकारी से अनजान है प्रोजेरिया के बारे में सबसे पहले जानकारी 1886 में जो नाथन ने दी थी इसके बाद 18 97 में हिस्ट्री गिलफोर्ड ने इसके बारे में बताया था इसलिए इस बीमारी को हर्ट चिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा गया है आज भी देश विदेश में पुरस्कृत वैज्ञानिक किस बीमारी की जड़ का पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं वैज्ञानिकों का मानना है कि इस बीमारी के बारे में पता चलने के बाद यह साफ हो जाएगा कि मनुष्य मनुष्य के बूढ़े होने की प्रक्रिया क्या है प्रोजेरिया सामान्य बीमारी की श्रेणी में नहीं आती 40 से 45 लाख बच्चों में से यह बीमारी किसी एक में पाई जाती है अब तक प्रोजेरिया से ग्रसित बच्चों की संख्या 45 से 40 से ज्यादा नहीं है गौर मतलब बिहार में एक ही परिवार के 5 बच्चों में यह बीमारी पाई गई थी इसमें से 3 बच्चों की मृत्यु हो चुकी है प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रसित बच्चे की उम्र महज महज 17 से 21 वर्ष की होती है यह बीमारी बच्चों के जीवन काल को काफी कम कर देती है प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चा 2 वर्ष की उम्र से ही बुरा दिखने लगता है इसकी उम्र 3 गुना रफ्तार से बढ़ने लगती है सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में वह पूरी तरह बूढ़ा हो जाता है पीड़ित बच्चों के सिर के सारे बाल झड़ जाए उसके सिर का आकार काफी बड़ा हो जाता है नरसिंह भरकर साफ दिखने लगती हैं और शरीर की बिलकुल रुक जाती है बच्चा बिल्कुल दूसरे ग्रह के प्राणी जैसा दिखने लगता है दरअसल यह बीमारी जींस और कोशिकाओं में बदलाव के कारण पैदा होने लगती है बहुत शोधों के बाद इस बीमारी के बारे में कुछ पता नहीं चल पाया है इस बीमारी के बारे में लोगों में जागरूकता लाना बेहद जरूरी है ऐसे बच्चे नफरत से नहीं बल्कि तैयार के हकदार है ताकि इस बीमारी से लड़ने की हिम्मत मिल सके

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अनुमानित समय से भी एक करोड़ वर्ष पहले थे डायनासोर

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 एक नए शोध के अनुसार डायनासोरों के बारे में जितना माना जाता रहा है डायनासोर उससे भी एक करोड़ वर्ष पहले धरती पर अस्तित्व में थे द नेचर की रिपोर्ट के अनुसार एक अंतरराष्ट्रीय दल ने यह परिणाम तंजानिया में जीवाश्मों के अध्ययन के बाद दी है जीवाश्म विज्ञानियों के मुताबिक डायनासोर और उनके करीबी संबंधी जैसे उससे टीरो सार्स भी पहले अस्तित्व में थे जितना अब तक माना जाता रहा है शोध में बताया गया है कि अब तक माना जाता था कि डायनासोर केवल 23 करोड़ वर्ष पुराने थे लेकिन अब उनके पुराने करीबी सहयोगियों साहिलेसारस के लगभग 1करोड़ वर्ष और पुराने होने की पुष्टि हुई है शोध में यह भी कहा गया है कि धीरे-धीरे सालेसारस के साथ ही डायनासोर की उत्पत्ति हो गई शोधकर्ताओं को दक्षिण तंजानिया से लगभग 14 जीवाश्म हड्डियां मिली है जिन पर शोध किया गया है

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भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया टीवी के जीवाणु का जिनोम मैप

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तपेदिक गरीबों की बीमारी है इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां इसके इलाज पर खास दिलचस्पी नहीं लेती टीबी से अंतिम लड़ाई का नेतृत्व करते हुए भारतीय वैज्ञानिकों ने इसके जीवाणु माइक्रोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस के जीनोम की संपूर्ण सिक़्वेन्सिंग कर ली है सीएसआईआर के नेतृत्व में डेढ़ सौ वैज्ञानिकों ने एमटीवी के सभी 4000 जिलों को चिन्हित कर उसका डिजिटल मैप तैयार किया है इतना ही नहीं सीएसआईआर ने इन्हें फार्मा कंपनियों को निशुल्क उपलब्ध कराने के लिए इंटरनेट पर उपलब्ध कराने का ऐलान किया है कि निदेशक ने बताया था कि इससे कम कीमत में और ज्यादा असरदार दवा इलाज की नई तकनीक हासिल करने का रास्ता खुल गया है 146 करोड़ की लागत से डिलीवरी ओपन कोर्स ड्रग डिलीवरी कार्यक्रम शुरू किया था इसके तक यह बड़ी सफलता है इसी कार्यक्रम में कनेक्ट टू द कोर्ट कॉन्फ्रेंस शुरू हुई थी उसमें वैज्ञानिकों ने टीबी जीन और उनकी सीक्वेंसिंग को अंतिम रूप प्रदान किया था वैज्ञानिकों ने कहा हां कहा था कि हालांकि दुनिया में एमटीवी के जीनोम को एक दशक पहले ही डिकोड कर लिया गया था लेकिन तब वैज्ञानिकों ने इसके 4000 जीन में से करीब 1000 जीन की ही सीक्वेंसिंग की थी हमने आगे सभी 4000 जीन की सीक्वेंसिंग की है इस डेटाबेस को वह osdd.net पर डाला जाएगा टीबी की कोई नई दवा ईज़ाद नहीं हुई है 1960 के बाद गौरतलब है कि इतने वर्षों में बीमारियों के जीवाणु ने खुद को बदल डाला और अब इसकी कुछ नई प्रजातियों को दवाओं का असर नहीं होता

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बुधवार, 27 जनवरी 2021

मृत्यु के बाद का जीवन

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"अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है आत्‍मा" आत्मा और भूत-प्रेतों की दुनया बड़ी रहस्यमयी है। जिनका इससे सामना हो जाता है वह मानते हैं की आत्मा और भूत-प्रेत होते हैं और जिनका इनसे सामना नहीं होता है वह इसे कल्पना मात्र मानते हैं। लेकन भूत-प्रेत या आत्माओं का वजूद नहीं है इसे सरे से खारिज करना सही नहीं होगा कई बार कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो अशरीरी आत्मा के वजूद को मानने पर विवश कर देती है। विज्ञानं भी इस विषय पर परीक्षण कर रहा है और कई ऐसे प्रमाण सामने आए हैं जो यह बताते हैं कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है और यह कभी भी अपनी इच्छा से प्रकट और अदृश्य हो सकती है। इसी तरह की एक घटना के बारे में यहां हम बात कर रहे हैं।हम जिस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुधयाना के एक निवासी की है जो कारोबार के सिलसिले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक दिल का दौड़ा पड़ा और स्‍थि गंभीर हो गई।कत्सकों ने काफी प्रयास किया लेकन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग दया। मरने से पहले इन्होंने अपने अंतिम संस्कार की जैसी बात की थी उसी विधऔर तरीके से अंतम संस्कार कर दिया गया।हम जिस घटना की बात करने जा रहे हैं वह लुधियाना के एक निवासी की है जो कारोबार के सलसले में पूर्वी अफ्रीका की राजधानी नैरोबी में जाकर बस गए। एक बार इनकी पत्नी अफ्रीका से पंजाब आई तो अचानक दिल का दौड़ा पड़ा और स्थिति गंभीर हो गई।चिकित्सकों ने काफी प्रयास कया लेकिन वह नाकामयाब रहे और व्यवसायी की पत्नी ने देह त्याग दिया। मरने से पहले इन्होंने अपने अंतम संस्कार की जैसी बात की थी उसी और तरीके से अंतम संस्कार कर दिया गया।कुछ ऐसे बीता और कारोबारी की तबीयत भी खराब हो गयी और चिकित्सकों ने लंदन जाकर उपचार कराने की सलाह दी। लंदन में जब चित्सकों ने जांच की और बताया क रोग अधिक गंभीर नहीं है कुछ दिन के उपचार से स्वस्‍थ हो जाएंगे तो तैयार होकर कारोबारी अपने होटल में पहुंचे।उस रात जैसे ही इन्होंने ने कमरे का दरवाजा खोला इन्हें लगा कि कमरे में कोई पहले से मौजूद है। आगे बढ़कर जब इन्होंने देखा तो सामने इनकी मरी हुई पत्नी पलंग पर बैठी नजर आई। इस दृश्य को देखकर कारोबारी ठिठक गए लेकिन इनकी पत्नी की आत्मा ने आगे बढ़कर बोलना शुरु कया।कारोबारी की पत्नी बोली तुमने जो मेरा अंतिम संस्कार करवाया है उससे मैं संतुष्ट हूं। मैंने दक्षिणा में दी हुई अंगूठी भी देखी है। मैं हमेशा आपके साथ रहती हूं और अफ्रीका से साथ-साथ लंदन आई हूं। यहां डाक्टरों की जांच के बाद अब मुझे शांति मिली है।अमेरिका में कुछ दिनों पहले हुई दुर्घटना में अपने दूसरे बेटे की जान मैंने ही बचाई थी। जब पत्नी की आत्मा ने विदाई मांगी तो कारोबारी की आंखें भर आई और उन्होंने अपनी पत्नी को गले लगा लिया कारोबारी ने अपने इस अनुभव को 'रूहों की दुनिया' नामक की पुस्तक में लिखा है। यह लखते हैं क उस समय जब इन्होंने पत्नी को गले लगाया तो उसका शरीर वैसा ही था जैसे वह जीवनकाल में थी। इसके बाद वह अदृश्य हो गई।इस घटना का उल्लेख परलोक और पुनर्जन्म नाम की पुस्तक में भी है साभार अमरउजाला डाट कॉम

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मंगलवार, 26 जनवरी 2021

प्राण ऊर्जा के असंतुलन के 10 लक्षण

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प्राण संस्कृत का शब्द है जिसका संबंध जीवन शक्ति से है। यदि आप जीवन में खुशहाली और सकारात्मकता चाहते हैं तो प्राण ऊर्जा को संतुलित करना बहुत जरूरी है। जब हमारी प्राण ऊर्जा मजबूत होती है तो हम प्रसन्न, स्वस्थ और संतुलित महसूस करते हैं लेकिन यदि हमारी आदतें और जीवनशैली खराब हो तो प्राण शक्ति कमजोर हो जाती है। इसकी वजह खराब डायट, खराब जीवनशैली और नकारात्मक सोच है। ऐसा होने पर हमें शारीरिक और मानसिक स्तर पर कुछ लक्षण दिखाई देते हैं जो वास्तव में खतरे की घंटी है कि आपकी प्राण ऊर्जा कमजोर पड़ रही है।प्राण ऊर्जा का कार्यजब हम सांस लेते हैं हम प्राण ऊर्जा ग्रहण करते हैं। आप सोच रहे होंगे कि हम तो ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं लेकिन आपको जानने की जरूरत है, प्राण शक्ति वो अनछुआ और अनदेखा एहसास है जो अध्यात्म में मौजूद तो है लेकिन इसे आप तभी महसूस कर पाएंगे जब आपका रुख अध्यात्म की तरफ होगा।ये जीवन शक्ति ऊर्जा के रूप में शरीर में फैलती है बिल्कुल वैसे ही जैसे नसों के जरिए खून संपूर्ण शरीर में दौड़ता है। यह प्राण शक्ति 7 चक्रों से होती हुई पूरे शरीर में बहती है ठीक उसी तरह जैसे रक्त सभी अंगों तक पहुंचता है। जब यह ऊर्जा ब्लॉक हो जाती है तो हमें कुछ शारीरिक और भावात्मक लक्षण दिखाई देते हैं। प्राण ऊर्जा के असंतुलन के 10 लक्षण 1. अत्यधिक थकान और आलस 2. तनाव और काम से थकान या चाहकर भी इसे नहीं बदल पाना 3. बार-बार नकारात्मक और हानिकारक विचार 4. प्रेरणा की कमी 5. जो भी चीज़ नकारात्मक लगे उसके प्रति फौरन और बार-बार भावात्मक प्रतिक्रिया देना 6. सिर दर्द और उलझन 7. जुकाम, एलर्जी या रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़ा कोई विकार 8. परेशान रहना 9. पाचन तंत्र की परेशानी जैसे खराब पेट या डायरिया 10. सेक्सुअल दिक्कतें< ये 10 लक्षण यदि आपको अपने अंदर बार-बार दिख रहे हों और वो भी तब जब आपको कोई बड़ी बीमारी ना हो और आप चिकित्सीय रूप से स्वस्थ हों तब समझिए आपकी प्राण ऊर्जा को रिचार्ज करने की जरूरत है। sabhar :https://hindi.speakingtree.iin

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रोटी बनाने वाला रोबोट

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भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां आज भी तीनों वक्त का खाना गर्म खाया जाता है और जहां रोटी भी ताजा ही बनाई जाती है. मां के हाथ ही रोटी का स्वाद तो सबको पसंद होता है लेकिन आज कल की भाग दौड़ की जिंदगी में उस स्वाद के लिए कई बार लोग तरस जाते हैं. खास कर अगर महिला और पुरुष दोनों ही कामकाजी हों, तो खाना पकाने का वक्त कम ही मिल पाता है.इस समस्या से निपटने के लिए भारत में लोग रसोइये रख लेते हैं. लेकिन जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, उनके पास यह विकल्प भी नहीं है. उन्हीं को ध्यान में रखते हुए यह रोटी बनाने वाला रोबोट तैयार किया गया है. इसे बनाने वाली कंपनी का दावा है कि उनकी मशीन आटा गूंथने से ले कर, पेड़े बनाने, बेलने और रोटी को सेंकने तक का सारा काम खुद ही कुछ मिनटों में कर लेती है. हालांकि इसके दाम को देख कर लगता नहीं है कि बहुत लोग इसे खरीदेंगे. एक रोटी मेकर के लिए एक हजार डॉलर यानि 65 हजार रुपये तक खर्च करने होंगे. sabhar :www.dw.com

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सोमवार, 25 जनवरी 2021

दूरानुभूति परामनोविज्ञान

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क्या आप अपनी बातों को बिना मोबाईल, टेलीफोन या दूसरे भौतिक क्रियाओं और साधनों के दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। एक बारगी आप कहेंगे ऐसा संभव नहीं है, लेकिन यह संभव है। आप बिना किसी साधन के दूसरों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं यह संभव है दूरानुभूति से, एफडब्ल्यूएच मायर्स ने इस इस बात का उल्लेख किया है इसे टेलीपैथी भी कहते हैं। इसमें ज्ञानवाहन के ज्ञात माध्यमों से स्वतंत्र एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क में किसी प्रकार का भाव या विचार पहुंचता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक दूसरे व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं के बारे में अतींद्रिय ज्ञान को ही दूरानुभूति की संज्ञा देते हैं। परामनोविज्ञान में एक और बातों का प्रयोग होता है। वह है स्पष्ट दृष्टि। इसका प्रयोग देखने वाले से दूर या परोक्ष में घटित होने वाली घटनाओं या दृश्यों को देखने की शक्ति के लिए किया जाता है, जब देखने वाला और दृश्य के बीच कोई भौतिक या ऐंद्रिक संबंध नहीं स्थापित हो पाता। वस्तुओं या वस्तुनिष्ठ घटनाओं की अतींद्रिय अनुभूति होती है यह प्रत्यक्ष टेलीपैथी कहलाती है।टेलीपैथी के जरिए किसी को किसी व्यक्ति को कोई काम करने के लिए मजबूर भी किया जा सकता है। ऐसा ही एक मामला तुर्की में आया है। यहां कुछ लोगों को टेलीपैथी के जरिए इतना विवश कर दिया गया कि उन्होंने आत्म हत्या कर लिया sabhar amarujala.com

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मानव मल से बनेगा सोना और खाद

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न्यूयॉर्क। भले ही यह सुनने में अजीब लगे, लेकिन सच है, क्योंकि अमेरिकी शोधकर्ता इंसान के मल से सोना और कई दूसरी कीमती धातुओं को निकालने में लगे हुए हैं। शोधदल ने अमेरिका के मैला निष्पादन संयत्रों में इतना सोना निकालने में कामयाबी हासिल की है जितना किसी खान में न्यूनतम स्तर पर पाया जाता है। एक अंग्रेजी वेबसाइट पर छपी खबर के मुताबिक डेनवर में अमेरिकन केमिकल सोसायटी की 249वीं राष्ट्रीय बैठक में मल से सोना निकालने के बारे में विस्तार से बताया गया है यूएस जिओलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) के सह-लेखक डॉक्टर कैथलीन स्मिथ के मुताबिक हमने खनन के दौरान न्यूनतम स्तर पर पाई जाने वाली मात्रा के बराबर सोना कचरे में पाया है। उन्होंने बताया कि इंसानी मल में सोना, चांदी, तांबा के अलावा पैलाडियम और वैनेडियम जैसी दुर्लभ धातु भी होती है।शोधदल का मानना है कि अमेरिका में हर साल गंदे पानी से 70 लाख टन ठोस कचरा निकलता है। इस कचरे का आधा हिस्सा खेत और जंगल में खाद के रूप में उपयोग मे लिया जाता है बचे हुए आधो हिस्से को जला दिया जाता है या फिर जमीन भरने के काम में ले लिया जाता है।

धातु निकालने के लिए औद्योगिक खनन प्रक्रियाओं में जिस रासायनिक विधि का प्रयोग किया जाता है वैज्ञानिक उसी विधि से कचरे से धातु निकलने का प्रयोग कर किया जा रहा है। इससे पहले वैज्ञानिकों के एक दूसरे दल ने अनुमान कि आधार पर बताया था कि दस लाख अमेरिकी जितना कचरा पैदा करते हैं उस कचरे में से एक करोड़ तीस लाख डॉलर की धातु निकाली जा सकती है। मल त्यागना हम सबकी दिनचर्या का हिस्सा है. लेकिन क्या इंसानी मल किसी काम आ सकता है? बिल्कुल. जर्मनी में रिसर्चर कहते है कि इससे खाद बनाया जा सकता है जिसका खेती में इस्तेमाल किया जा सकता है. देखिए ये कैसे संभव होता है. sabhat webdunia dw.de

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