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शुक्रवार, 13 जून 2014

ग़रीबी के चलते यहां बुढ़ापे में जिस्म बेचती हैं औरतें

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उत्सुकता

ऐसा क्यों होता है यहां


किम यून-जो सियोल के जोंगनो-3 सबवे स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठी हैं। उनकी उम्र 71 साल है और वो चमकीली लिपस्टिक लगाए हैं और चमकीला लाल कोट पहने हुए हैं।

उनके बड़े बैग से कांच की बोतलों के आपस में टकराने की आवाज़ आ रही है।

किम दक्षिण कोरिया की "बैकस लेडीज़" में एक हैं यानी ऐसी वृद्ध महिला जो पुरुष ग्राहकों को लोकप्रिय बैकस (एक तरह की शराब) एनर्जी ड्रिंक बेचकर अपनी ज़िंदगी चलाती है।

लेकिन अकसर वो सिर्फ़ इन बोतलों को ही नहीं बेचती हैं। एक ऐसी उम्र में जब कोरियाई दादियों को कुल माता के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए, उनमें से कुछ को अपना जिस्म बेचना पड़ रहा है।

उसने मुझसे कहा, "आप वहां खड़ी बैकस महिलाओं को देख रहे हैं? ये महिलाएं बैकस के अलावा भी कुछ बेचती हैं। वो कभी-कभी दादा की उम्र के लोगों के साथ जाती हैं और उनसे पैसे कमाती हैं। लेकिन मैं उस तरह नहीं रहती।"

उन्होंने बताया, "जब मैं गली में खड़ी रहती हूं तो पुरुष प्रस्ताव देते हैं, लेकिन मैं हमेशा कहती हूं, 'नहीं'।"

उत्सुकता

किम कहती हैं कि वो ड्रिंक बेचकर हर दिन क़रीब 5000 वॉन या क़रीब 300 रुपए कमा लेती हैं। वो कहती हैं, "पुलिस हमेशा मुझ पर नज़र रखती है। वो अंतर नहीं कर पाते हैं।"

इस छिपे हुए सेक्स कारोबार का केंद्र राजधानी सियोल के बीचोंबीच स्थित एक पार्क है। जोंगमयो पार्क ही वो जगह है जहां जीवन के ढलान पर पहुंच चुकी ये महिलाएं आती हैं।

पार्क के किनारों पर खड़ी 50 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की ये महिलाएं पुरुषों को ड्रिंक की पेशकश कर रही हैं। ये उनका पहला क़दम है जो आख़िरकार उन्हें पास के एक सस्ते मोटल तक ले जाएगा।

पार्क में मौजूद पुरुष इन महिलाओं के मुक़ाबले मुझसे बात करने के अधिक इच्छुक हैं।

दादा की उम्र के लोगों का एक दल कोरियाई शतरंज के खेल को ध्यान से देख रहा है। उन्होंने बताया कि क़रीब आधे पुरुष बैकस महिलाओं का इस्तेमाल करते हैं।

साठ साल के किम बताते हैं, "हम पुरुष हैं, इसलिए महिलाओं के प्रति हमें उत्सुकता है।"

वो बताते हैं, "हम एक ड्रिंक लेते हैं और थोड़ा धन उनके हाथों में रख देते हैं, और काम हो जाता है। पुरुष महिलाओं का साथ पसंद करते हैं- चाहें वो बूढ़ी हों या नहीं, यौन रूप से सक्रिय हों या नहीं। ये सीधा सा पुरुष मनोविज्ञान है।"

बुज़ुर्ग गर्लफ्रैंड

एक अन्य 81 वर्षीय पुरुष ने बताया कि "वहां खड़ी महिलाओं में हम गर्लफ़्रेंड तलाश सकते हैं। वो हमसे अपने साथ खेलने के लिए कहेंगी। वो कहेंगी, "ओह! मेरे पास पैसा नहीं है। और फिर वो हमारे साथ चिपक जाएंगी।

उनके साथ सेक्स करने का ख़र्च क़रीब 20000 से 30000 वॉन (क़रीब 1,100 से 1,700 रुपए) तक होता है, लेकिन अगर वो आपको जानती हैं तो कभी-कभी वो आपको छूट भी दे सकती हैं।"

दक्षिण कोरिया के ये बुज़ुर्ग देश की आर्थिक सफलता के शिकार हैं।

उन्होंने अपनी बचत को अगली पीढ़ी में निवेश कर दिया। एक कन्फ्यूशियस समाज में सफल बच्चों को भी पेंशन का सबसे बढ़िया रूप माना जाता है।

लेकिन यहां इस रुख़ में तेज़ी से बदलाव आया है और अब कई युवा लोग कहते हैं कि वो अपना ही ख़र्च नहीं उठा पा रहे हैं।

ऐसे में जोंगमयो पार्क में इन पुरुषों और महिलाओं के पास कोई बचत नहीं है, वास्तविक पेंशन नहीं है और परिवार नहीं है। वो अपने ही शहर में विदेशियों की तरह हैं।

किम कहते हैं, "जो अपने बच्चों पर निर्भर हैं वो मूर्ख हैं। हमारी पीढ़ी अपने माता-पिता के प्रति विनम्र थी। हम उनका सम्मान करते थे। आज की पीढ़ी अधिक शिक्षित और अनुभवी है, इसलिए वो हमारी नहीं सुनते हैं।"
मजबूरी

मजबूरी

बैकस महिलाओं पर शोध करने वाली डॉक्टर ली हो-सुन के मुताबिक़ ज़्यादातर बैकस महिलाओं ने वृद्धावस्था में ग़रीबी के चलते सेक्स का कारोबार शुरू किया।

वो बताती हैं कि एक महिला ने तो 68 साल की उम्र में वेश्यावृत्ति शुरू की। वो बताती हैं, "एक बैकस महिला ने मुझसे कहा कि मैं भूखी हूं, मुझे सम्मान की ज़रूरत नहीं है, मैं सिर्फ़ दिन में तीन वक़्त का खाना चाहती हूं।"

पुलिस यहां गश्त तो करती है, लेकिन कोई गिरफ़्तारी नहीं होती लेकिन समस्या सिर्फ़ क़ानून को लागू करने की नहीं है।

बैकस महिलाएं अपने बैग में छिपी हुई बीमारी को लेकर भी चल रही है। इन महिलाओं के पास यौन उत्तेजना के लिए विशेष इंजेक्शन होता है और 10 से लेकर 20 बार एक ही इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में कई तरह की बीमारियां भी फैल रही हैं।

इस तरह दक्षिण कोरिया के हाई-टेक समाज में बुज़ुर्गों के लिए खाना महंगा है, सेक्स सस्ता है और आत्मीयता तो उन्हें किसी भी क़ीमत पर मुश्किल से ही उपलब्ध है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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धरती पर होगा मशीनों का राज, यहां कंप्यूटर ने खुद को साबित कर दिया इंसान!

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A compuer that convinced humans that it was a 13 year old boy


मास्को। वो समय जल्द ही आने वाला है जब धरती पर मशीनों का राज होगा और इंसान उनके गुलाम! इसी कड़ी में रूस के एक कम्प्यूटर ने अपने आपको इंसान साबित कर दिखाया जो इस वक्त पूरी दुनिया में चौंकाने वाला विषय बना हुआ है।

दरअसल रूस की एक कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग टीम ने एक ऎसा प्रोग्राम तैयार किया है जिसने इंसानों को यकीन दिला दिया कि वह कोई कम्प्यूटर प्रोग्राम नहीं, बल्कि 13 साल का लड़का है। इस प्रोग्राम ने इंसानों और कम्प्यूटर्स में फर्क करने वाले ट्यूरिंग टेस्ट दिखाया। इससें पहले ऎसा आज तक कोई और कम्प्यूटर नहीं कर सका था।

इसें बनाने वालों के मुताबिक इंसानों और कम्प्यूटर्स बीच का फर्क पहचानने के लिए किए जाने वाले टेस्ट को लैंडमार्क माना जाता है। लेकिन इस तकनीक को इस नए कम्प्यूटर प्रोग्राम फेल कर दिया। दूसरी और बुद्धिजीवियों को डर है कि अब इस तकनीक का इस्तेमाल साइबर की दुनिया में इस्तेमाल न होने लगे। 

हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक, कम्प्यूटिंग की दुनिया के बड़े जानकार माने जाने वाले ऎलन ट्यूरिंग का कहना है कि अगर कोई भी कम्प्यूटर इस टेस्ट को पास कर लेता है तो माना जा सकता है कि वह खुद की सोच रखता है। इसके लिए 5 मिनट की टेक्स्ट कन्वर्जेशन होती है जिसमें कोई कम्प्यूटर 30 फीसदी सवाल पूछने वाले इंसानों मात दे दे।

रूस की इस कम्प्यूटिंग टीम द्वारा बनाए गए इस यह कम्प्यूटर प्रोग्राम ने यूजीन गूस्टमन लंदन की रॉयल सोसायटी में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शिक्षाविदों द्वारा लिए गए टेस्ट में पास होकर दिखा दिया। इस प्रोग्राम ने 33 फीसदी जजों को यकीन दिला दिया कि यह कम्प्यूटर नहीं बल्कि इंसान है।

इसी के साथ ही माना जा रहा है कि यह दुनिया का पहला ऎसा कम्प्यूटर है जिसने यह टेस्ट पास किया है। यह कम्प्यूटर प्रोग्राम अपने आप को ओडेस्सा का एक 13 वर्षीय लड़का बताता है। इस प्रोग्राम को बनाने वाले ब्लादिमिर वेसेलोव कार क हना है कि "हमारी टीम का मानना था कि यह प्रोग्राम यह दावा करे कि यह सबकुछ जानता है, लेकिन इसकी उम्र ऎसी रखी गई है जिससे इस बात को भी बराबर वजन मिले कि इसे सबकुछ तो नहीं ही आता होगा। जिसके हमने एक ऎसा कै रेक्टर इजाद किया जिसके व्यक्तित्व पर यकीन हो सके।"

sabhar :patrika.com


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गुरुवार, 12 जून 2014

नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

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नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी


लंदन( ब्रिटेन निवासी भारतीय लेखक सलमान रश्दी इस समय ब्रिटिश जर्नलिस्ट और फूड राइटर नाइजेला लॉसन के साथ वक्त बिता रहे हैं। हाल ही में दोनों सेंट्रल लंदन स्थित एक रेस्त्रां में देखे गए। दोनों ने करीब दो घंटे का समय साथ बिताया। 
 
रेस्टॉरेंट में मौजूद एक ग्राहक ने बताया कि लंबे समय बाद रश्दी को इस तरह नाइजेला के साथ देखकर सभी की निगाहें उन पर ठहर गईं। दोनों सेलेब्रिटी खुद को लोगों से छिपाने की कोशिश कर रहे थे। 66 वर्ष के रश्दी और 54 वर्ष की नाइजेला रेस्टॉरेंट में बेहद खुश और खूबसूरत नजर आ रहे थे।
 
दोनों की दोस्ती 20 साल पुरानी है। नाइजेला ने पिछले साल अपने 71 वर्षीय पति चार्लेस साची से तलाक होने के बाद रश्दी से अपनी नजदीकियां बढ़ा ली थीं। रश्दी का भी मॉडल पद्मा लक्ष्मी से 2008 में तलाक हो गया था।
नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

नाइजेला के साथ वक्त बिता रहे हैं सलमान रश्दी

sabhar :http://bollywood.bhaskar.com/



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मां बनने की नहीं होती कोई उम्र

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एक चीनी महिला ने 60 साल की उम्र में दोबारा मां बनकर दुनिया की सबसे वृद्ध मांओं की सूची में जगह बना ली है और दिखा दिया है कि मां बनने के लिए ममता की जरूरत होती, इसका उम्र से कोई लेना देना नहीं.



शेंग हाइलिन अपनी एकलौती बेटी को खोने के बाद फिर से मां बनना चाहती थीं. उनकी बेटी करीब 30 साल की होने वाली थी. तभी 2009 में जहरीली गैस की वजह से हुई एक दुर्घटना में उसने अपनी जान गवां दी. 60 साल की उम्र में इस अरमान को पूरा करने के लिए शेंग को आईवीएफ तकनीक की मदद लेनी पड़ी.
वह बताती हैं, "जीने के लिए और अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए मैंने इस उम्र में एक और बच्चा पैदा करने की ठान ली." चीन के पूर्वी शहर हेफेई के एक सैनिक अस्पताल में 2010 में शेंग ने दो जुड़वा बच्चियों को जन्म दिया.
एक बच्चे की नीति में बदलाव
शेंग का मामला एक और वजह से असाधारण है. चीन में लम्बे समय से एक बच्चे का नियम लागू है. चीन में परिवार नियोजन का यह कानून करीब 30 सालों से है. इस कानून को कई बार माता पिता की इच्छा के विरूद्ध भी बहुत सख्ती से मनवाया जाता है. गांव के किसी परिवार में अगर पहली संतान एक लड़की हो, अल्पसंख्यक समुदायवासी या फिर अगर माता पिता दोनों ही अपने अपने परिवारों की एकलौती संतान हों, तो उन्हें इस कानून में अपवाद बन कर एक से ज्यादा बच्चों की आज्ञा है.
भारत की रज्जो देवी बनीं थीं 69 साल की उम्र में मां
एक अनुमान के मुताबिक 1979 में चीन में इस कानून के आने के बाद से करीब दस लाख लोग अपने वंशज खो चुके हैं और अगले 20 से 30 सालों में इस फेहरिस्त में करीब 40 से 70 लाख लोग और शामिल हो जाएंगे. ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की देखभाल और उनकी तबीयत खराब होने पर इलाज का खर्च उठाने के लिए भी कोई नहीं होता. साथ ही वे जीवन में अकेलेपन की समस्या से भी जूझते रहते हैं.
इन सब समस्याओं को ध्यान में रखते हुए चीन की प्रमुख कानूनी समिति 'एक बच्चे की नीति' वाले कानून में कुछ और अपवादों को मान्यता देने जा रही है. इस नए कानून के अंतर्गत वे दंपत्ति भी दो बच्चे पैदा कर सकेंगे जिनमें से कोई एक अपने माता पिता की एकलौती संतान हो.sabhar :http://www.dw.de/

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सोमवार, 9 जून 2014

सिर्फ 16 साल और सूख जाएगी पवित्र गंगा नदी?

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फिर कहां से आएगा गंगा में जल

फिर कहां से आएगा गंगा में जल


करीब ढाई हजार किलोमीटर लंबी गंगा नदी के बारे में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो इसे सदानीरा बनाए रखने वाला हिमनद सिर्फ सोलह साल और किसी न किसी तरह जिंदा रहेगा।

उसके बाद यह पूरी तरह लुप्त हो जाएगा। आशय यह है कि गंगोत्री ही सूख जाएगी तो गंगा में वह पानी कहां से आएगा जिसे बड़े आदर के साथ नीर और जल कहा जाता है।

गंगा जल में अब वह बात नहीं

सीलिसबर्ग स्थित महर्षि वैदिक इंस्टीट्यूट की चिंता दूसरी तरह की है। इंस्टीट्यूट के कराए अध्ययन के मुताबिक गंगा नदी और उसके स्रोत गंगा ग्लेशियर को किसी तरह फिर भी बचा लिया जाए, और गंगा नदी बहती रहे। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि उसकी तीर्थवत्ता बनी रहे।

गंगा के पवित्र होने की बात शुरु से प्रचलित है। इसका वैज्ञानिक आधार सिद्ध हुए वर्षों बीत गए। उसके अनुसार नदी के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते।

गंगाजल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस कारण पानी से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। लेकिन अब वह बात नहीं रही।

गंगा आखिर कैसे बन गई गंदाजल

गंगा में 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा प्रतिदिन गिर रहा है। गंगा-जल न पीने के योग्य रहा, न स्नान के योग्य। महर्षि इंस्टीट्यूट के निदेशक डा. अर्जुन गोड़दिया के अनुसार इस संकट का निवारण थोड़ी सी जागरूकता और इंतजामों से हो सकता है।

लेकिन जो विशेषताएं गंगा स्नान कर या उसके किनारे रह चुके लोगों को या वहां के वातावरण को जिस ऊर्जा से भर देती हैं, उन्हें लौटा लाने को कोई उपाय नहीं है।
गंगा किनारे तीर्थ और स्नान के नियम

गंगा किनारे तीर्थ और स्नान के नियम

कम से कम कुछेक वर्षों में तो कतई संभव नहीं है। उनके अनुसार किसी समय ढाई हजार किलोमीटर क्षेत्र में फैली गंगा के किनारे छोटे बड़े आठ सौ तीर्थ हुआ करते थे। इन तीर्थों में रहने, जाने और स्नान आदि करने का अनुशासन था।

अंपायर आफ द मुगल पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक अलक्स रदरफोर्ड ने लिखा है कि करीब छह सौ साल के सल्तनत और मुगल काल के शासन में भी इन तीर्थों की आंतरिक संरचना और व्यवस्था में कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई।

लेकिन पिछले साठ वर्ष में बाजारवाद और आधुनिकता अभिमानी तंत्र ने तीर्थों की उस व्यवस्था को तहस नहस कर दिया। अब उस व्यवस्था का न जानकार हैं और न ही उसे ढूंढा व खोज सकने वाला तंत्र। ऐसे में उस व्यवस्थित करने वाली ऊर्जा और ज्ञान का भी अंनुसंधान किया जाना sabhar :http://www.amarujala.com/


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शनिवार, 7 जून 2014

अरे ये क्या! टीचर बनी नाबालिग स्टूडेंट के बच्चे की मां

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अपने ही छात्र से संबंध बनाकर बनी मां

अपने ही छात्र से संबंध बनाकर बनी मां


एक स्कूल टीचर ने अपने ही नाबालिग स्टूडेंट के साथ शारीरिक संबंध बनाकर बच्चे को जन्म ‌दिया है।

42 वर्षीय इस महिला के पहले भी दो बच्चे हैं और वह अपने पति को छोड़ चुकी है।

इस पूरे मामले में इंग्लैंड की टीचर हेलेन कार्टराइट को कोर्ट केस का सामना करना पड़ रहा है।

वहां के स्‍थानीय कोर्ट का कहना है कि यह संबंध सरासर गलत है। इसके लिए अदालत ले टीचर को ही जिम्‍मेदार ठहराया है। 

नाबालिग होने की थी जानकारी

मामला ऑस्ट्रेलिया के वूलमर हेमटन शहर का है। वहां पुलिस के समक्ष हेलेन कार्टराइट ने कबूल किया है जब कुछ समय पूर्व स्टू्डेंट के साथ उसने संबंध बनाए तो उसे यह जानकारी थी कि वह नाबालिग है।

डेली मेल के मुताबिक बावजूद इसके उसने शारीरिक संबंध बनाए और बच्चे की मां भी बनी। पता चला है कि दोनों के बीच काफी समय से आपसी संबंध बनाए जाते रहे थे।

इसकी जानकारी स्कूल प्रबंधन सहित अन्य छात्रों को भी थी। मगर यह सच्चाई उस समय सामने आई जब हेलेन बच्चे की मां बनी। 

पांच माह का हो गया बच्चा

15 वर्षीय स्टूडेंट और टीचर हेलेन कार्टराइट का बच्चा अब पांच माह का हो चुका है और पूरी तरह से स्वस्‍थ है।

इस मामले में अदालत ने टीचर का फटकार लगाते हुए 10 वर्ष तक सैक्स ऑफेंडर की लिस्ट में डाल दिया है।

इसके साथ ही पुलिस द्वारा दो सालों तक उसके ऊपर नजर भी रखी जाएगी ताकि इस बात का पता रहे कि कहीं वह भविष्य में भी इस तरह के कृत्यों को अंजाम तो नहीं दे रही है।� sabhar :http://www.amarujala.com/

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चमत्कार! ये औरत अचानक ही बोलने लगी तीन अनजान भाषाएं

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हुआ था माइग्रेन

हुआ था माइग्रेन


49 साल की जूली माथहियास की कहानी किसी को भी हैरत में डाल देने के लिए काफी है। हम सभी जानते हैं कि एक भाषा सीखने में ही सालों लग जाते हैं।

डेली मेल 
के मुताबिक मिलिए इस महिला से जो पेशे से एक हेयर ड्रेसर है। उसे कई सालों से सिर में भयंकर दर्द की शिकायत रहती थी। जांच में पता चला कि उसे माइग्रेन है।

साल 2011 में उसे माइग्रेन का इतना भयानक अटैक आया कि उसे हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा। फिर तभी...
अरे ये क्या हो गया?
हॉस्पिटल में माइग्रेन का भयंकर अटैक आने पर जब पहली बार उसने डॉक्टर से बात करना शुरू किया तो वो पता नहीं किस लहेजे में बोलने लगी।

जूली इंग्लैंड के चैथम की रहने वाली थी और बचपन से ही सिर्फ शैव भाषा बोलना जानती थी। 

लेकिन डॉक्टर से बात करने पर वो बोल तो शैव ही रही थी लेकिन बोलने का अंदाज यानी के एक्सेंट किसी विदेशी भाषा जैसा आ रहा था। थोड़ी देर में उसने देखा कि अब वो अपनी भाषा शैव बोल ही नहीं पा रही थी। 

वो तो कुछ ऐसा बोलने लगी कि सुनने वालों को लगता कि वो कभी चाइनीज बोल रही है, कभी इटैलियन और कभी फ्रेंच।

हो गई दुर्लभ बीमारी

इसका इलाल करावाने पर पता चला कि उसे फॉरेन एक्सेंट सिंड्रोम हो गया है। इस बीमारी से दुनिया भर में बस 60 लोग ही पीड़ित पाए गए हैं।

ज्यादातर ये बीमारी होने की वजह कोई जानलेवा स्ट्रोक या फिर भयानक सिरदर्द होता है। जूली के साथ भी ऐसा ही हुआ।

उनकी ऐसी भाषा होने पर कई लोग उन्हें चिढ़ाते हैं। हांलाकि जूली ने अपना पेशा जारी रखा है लेकिन वो ये बताना नहीं भूलती हैं कि उन्हें बहुत जिल्लतों का सामना करना पड़ता है और इसमें उनका कोई दोष नहीं है।� sabhar :
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शुक्रवार, 6 जून 2014

अब बच्चों के होंगे तीन मां बाप

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तीन लोगों के डीएनए से भ्रूण तैयार करने की रिसर्च को हरी झंडी मिलती नजर आ रही है. ब्रिटेन का कहना है कि इस तकनीक में कोई खतरा नहीं है और जल्द ही ऐसा मुमकिन होगा.

Bildergalerie Mutterliebe

यह तकनीक इस्तेमाल से पहले ही विवादों में घिरी है. कुछ महीनों से अमेरिका भी इस पर विचार कर रहा है. अब ब्रिटेन भी इसमें शामिल हो गया है. एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि इस तकनीक से कोई नुकसान पहुंच सकता है. रिपोर्ट की अध्यक्षता करने वाले डॉक्टर एंडी ग्रीनफील्ड ने बताया कि नतीजे लैब में हुए प्रयोगों और जानवरों पर किए गए टेस्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं. उन्होंने कहा, "जब तक एक स्वस्थ शिशु पैदा नहीं हो जाता, तब तक हम 100 फीसदी कुछ नहीं कह सकते."
बच्चे की दो मांएं
इस तरह की तकनीक का मकसद है मां से बच्चे में आनुवंशिक बीमारियों के खतरे को रोकना. खून की जांच से पता लगाया जाएगा कि महिला को किसी तरह की आनुवंशिक बीमारी तो नहीं है. अगर उसके डीएनए में कोई गड़बड़ मिलती है, तो किसी और महिला के डीएनए का इस्तेमाल कर मां के अंडाणु में मिला दिया जाएगा. इसके बाद लैब में ही इसे शुक्राणु के साथ मिला कर फर्टिलाइज किया जाएगा और फिर मां के शरीर में डाल दिया जाएगा. इस तरह से सुनिश्चित किया जा सकेगा कि मां की आनुवंशिक बीमारी भ्रूण तक न पहुंचे.रिसर्च के मकसद से इस तरह की तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति पहले से है. अब लंदन के स्वास्थ्य विभाग ने कहा है कि उसे उम्मीद है कि इस साल के अंत तक देश में ऐसे कानून को पारित कर दिया जाएगा जिसकी मदद से अस्पतालों में भी इस तकनीक का इस्तेमाल हुआ करेगा. अगर ऐसा हुआ तो ब्रिटेन दुनिया का पहला ऐसा देश बन जाएगा जहां तीन व्यक्तियों के डीएनए वाले भ्रूण को अनुमति होगी.
डिजाइनर बेबी का खतरा
इस तकनीक के आलोचकों का कहना है कि यह एक अनैतिक और खतरनाक तरीका है. इसके जवाब में डॉक्टर ग्रीनफील्ड ने कहा कि 1970 के दशक में जब आईवीएफ को ले कर चर्चा शुरू हुई थी, तब भी लोगों में सुरक्षा को लेकर इसी तरह के डर थे लेकिन पहले टेस्ट ट्यूब बेबी के बाद से यह बहस धीरे धीरे कम होने लगी. वहीं अमेरिका के सेंटर फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी के मेर्सी डेरनोव्स्की का कहना है कि इस तरह की तकनीक डॉक्टरों और दंपतियों को डिजाइनर बेबी बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगी.
जानकार बताते हैं कि कानून पारित होने के बाद से ब्रिटेन में हर साल कम से कम एक दर्जन महिलाओं को इसका फायदा मिलेगा, जिनके माइटोकॉन्ड्रिया में गड़बड़ है. इस तरह की गड़बड़ी से भ्रूण में दिल के रोग और मानसिक बीमारियों का खतरा होता है.
आईबी/एजेए (एपी)
sabhar :http://www.dw.de/

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दर्द को समझने वाला रोबोट

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जापान आधुनिक तकनीक और तरह तरह के रोबोट्स बनाने के लिए मशहूर है. अब जापान एक ऐसा रोबोट बाजार में उतारने के लिए तैयार है जो आपकी भावनाएं भी समझ सकेगा.

Japan Roboter Pepper

घर के काम काज में या फिर रिसर्च के लिए लैब में मदद करने के लिए तो रोबोट का इस्तेमाल हो ही रहा है, लेकिन इन्हें अब तक मशीनों की ही तरह रखा गया है. वक्त के साथ साथ इनकी तकनीक में इतना विकास हो गया है कि वे भावनाएं भी समझने लगे हैं और एक हद तक दिखाने भी लगे हैं.
जापान की मोबाइल फोन कंपनी सॉफ्टबैंक एक ऐसे ही रोबोट के साथ बाजार में उतर रही है. उम्मीद है कि फरवरी से 'पैपर' नाम का यह रोबोट करीब दो हजार डॉलर में खरीदा जा सकेगा. बिक्री पहले जापान में शुरू होगी और उसके बाद विदेशों में.
टोक्यो में 'पैपर' को लॉन्च करते हुए कंपनी के मालिक और जापान के जाने माने अरबपति मासायोशी सन ने कहा कि रोबोट को 'नरमदिल' होना चाहिए ताकि वे लोगों के चेहरे पर 'मुस्कुराहट' ला सकें. 'पैपर' जब गुनगुनाता हुआ स्टेज पर आया और फिर उसने मासायोशी सन से हाथ मिलाया तो स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म 'एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल' के किरदार 'ईटी' की याद आ गयी.
पैपर की प्रोग्रामिंग
सन ने बताया कि 'पैपर' को इस तरह से प्रोग्राम किया गया है कि वह लोगों की आवाज सुन कर और उनके हाव भाव को देख कर भावनाओं को समझ लेता है. यानि आपके पास अपना खुद का एक ऐसा रोबोट दोस्त हो सकता है जो जानता है कि आप खुश हैं या फिर उदास. और उदासी को दूर करने का जिम्मा भी रोबोट का ही होगा. उसे कुछ ऐसा करना होगा कि उदास व्यक्ति भी मुस्कुरा दे.
'पैपर' एक ह्यूमनॉयड है यानि एक ऐसा रोबोट जो इंसानों जैसा ही दिखता है. 28 किलोग्राम भारी और 48 इंच ऊंचे सफेद रंग के इस रोबोट के सिर पर बाल तो नहीं हैं, पर बड़ी बड़ी आंखें किसी खूबसूरत गुड़िया जैसी लगती हैं. 'पैपर' के पूरे शरीर में कई तरह के सेंसर लगे हुए हैं. दो टच स्क्रीन सेंसर उसके हाथ में हैं और तीन सर में. इसके अलावा निचले हिस्से में छह लेजर सेंसर और तीन बंपर सेंसर भी हैं. सिर में दो कैमरे और चार माइक्रोफोन हैं. साथ ही छाती पर एक डिस्प्ले पैनल लगा हुआ है.
हाईटेक 'पैपर' हर वक्त वाईफाई से जुड़ा रहता है और आईफोन के 'सिरी' की तरह आवाज पहचानता है. हालांकि कई बार यह ठीक से जवाब नहीं दे पाता. ऐसे में वह कहता है, "मैं ठीक से सुन नहीं पाया, क्या आप अपना सवाल दोहरा सकते हैं?" कोई चीख चिल्ला कर अपनी भड़ास उतार रहा हो तो वह सांत्वना डेते हुए कहता है, "तुम एक नेक इंसान लगते हो." लॉन्च के दौरान 'पैपर' ने 'आई वॉन्ट टु बी लव्ड' गाना गा कर लोगों का दिल जीता.
आईबी/एमजे (एपी) sabhar :http://www.dw.de/


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मैं रेप की पैदाइश हूं', मिस यूएसए 2014 की रेस में शामिल मॉडल ने बताया सच

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'मैं रेप की पैदाइश हूं', मिस यूएसए 2014 की रेस में शामिल मॉडल ने बताया सच

हैरिसबर्ग। मिस यूएसए 2014 पीजेंट में पेन्सिलवेनिया का प्रतिनिधित्व करने वाली 24 वर्षीय वेलेरी गाटो ने अपनी पैदाइश से जु़ड़े एक ऐसे सच का खुलासा किया है, जिसने सभी को चौंका दिया है। वेलेरी ने कहा है कि वो बलात्कार की पैदाइश है। चाकू की नोंक पर उसकी मां का रेप किया था, जिसके बाद उसका जन्म हुआ। उन्होंने बताया कि एक शख्स ने उसकी मां पर उस वक्त हमला बोला था, जब वो महज 19 साल की थी।  
 
वेलेरी ने अब फैसला लिया है कि वो इस प्लेटफॉर्म के जरिए महिलाओं को यौन उत्पीड़न के बारे में जानकारी देने का काम करेंगी। वेलेरी  कहती हैं कि उन्हें इस बात का विश्वास है कि भगवान ने उन्हें किसी खास मकसद के लिए भेजा है। वो लोगों को ये विश्वास दिलाना चाहती हैं कि दुनिया में सबकुछ संभव है और कभी भी परिस्थितियों के हिसाब से अपनी जिंदगी को निर्धारित नहीं किया जा सकता। 
 
वेलेरी अभी एक वकील के तौर पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ लोगों में जागरुकता लाने की कोशिश में लगी हैं। देश में जगह-जगह दौरे कर वो 18 से 30 साल की उम्र की महिलाओं के बातचीत कर रही हैं और उन्हें उत्पीड़न का शिकार होने से बचने के लिए जानकारी दे रही हैं। वेलेरी कहती हैं कि मिस यूएसए का ताज जीतने के बाद उन्हें अपने इस काम के लिए और बढ़ा मंच मिलेगा। 

'मैं रेप की पैदाइश हूं', मिस यूएसए 2014 की रेस में शामिल मॉडल ने बताया सच
अपने बायोग्राफी बेवसाइट पर वेलेरी ने लिखा है कि जब वो छह साल की थीं, तभी से वो मां से अपने पिता के बारे में सवाल करने लगी थीं, जिससे वो कभी मिली ही नहीं थी। आखिरकार उन्हें अपने सवाल का जवाब मिला और वो भी 10 साल की उम्र में। 
 
वेलेरी की मां ने परिवार के लोगों को अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में नहीं बताया था। बाद में उसने अपनी दादी से इस बारे में बात की और तय किया कि वो इस बच्चे को पैदा करना चाहती। 
 
वेलेरी कहती हैं कि रेप की पैदाइश होने के चलते उन्हें नहीं पता कि उनका पिता कौन है। वो ये भी नहीं जानती हैं कि अपने पिता से वो कभी मिल पाएंगी या नहीं। वो कहती हैं कि बहुत से लोग सोचते हैं कि ये बहुत खराब परिस्थिति है, लेकिन वो अपनी इस जिंदगी से बहुत खुश हैं। वो अपनी मां के लिए एक रोशनी की तरह हैं। 

'मैं रेप की पैदाइश हूं', मिस यूएसए 2014 की रेस में शामिल मॉडल ने बताया सच


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गुरुवार, 5 जून 2014

मिल जाएगा दांतों के दर्द भरे ऑपरेशन से छुटकारा

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वाशिंगटन। नई जीवनशैली में दांत की शिकायतें आमबात हैं। अक्सर इनके इलाज के लिए रुट कैनाल थेरेपी (आरसीटी) जैसे आपरेशन से गुजरना पड़ता है। जो कुछ हदतक दर्दभरा है। जल्दी ही इस दर्द से छुटकारा मिल सकता है। पहली बार वैज्ञानिकों ने दांत के भागों को फिर से उगाने के लिए प्रकाश का प्रयोग किया है।
इनमें एक भारतीय मूल के वैज्ञानिक भी शामिल हैं। हार्वर्ड में वायिस इंस्टीट्यूट फॉर बायोलॉजिकली इंस्पायर्ड इंजीनियरिंग के फैकल्टी सदस्य डेविड मूने के नेतृत्व इस बारे में एक अध्ययन किया गया। पता चला कि ऊतकों को फिर से उत्पन्न करने के लिए कम शक्ति के लेजर का प्रयोग उपयोगी हो सकता है। ये शरीर के अंदर की स्टेम कोशिकाओं को सक्रिय कर सकते हैं। यह शोध साइंस ट्रांसनेशनल मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
सप्ताहांत में सर्जरी कराने से बढ़ता है मौत का खतरा
सप्ताहांत, दोपहर और फरवरी माह में सर्जरी कराने से मौत का खतरा सर्वाधिक रहता है। जर्मनी में नए अध्ययन में यह दावा किया गया है। यूनिवर्सिटी मेडिसिन बर्लिन के डॉक्टर फेलिक्स कॉर्क और प्रोफेसर क्लाउडिया स्पाइस तथा उनके साथियों ने सर्जरी के बाद अस्पताल की मौत को लेकर एक अध्ययन किया। उन्होंने जांच की कि अलग-अलग समय में अस्पताल में होने वाली सर्जरी और मौतों के बीच क्या संबंध रहता है। sabhar :http://www.jagran.com/

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