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शुक्रवार, 2 मई 2014

आत्मरक्षा के लिए शानदार 7 गैजेट्स

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आज हमारी अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी तेजी से भारत में अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है और वो भी खासकर महिलाओं के साथ। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि बाजार में कुछ ऐसे एप्स और गैजेट्स मौजूद हैं जो थोड़े समय के लिए ही सही आपको सुरक्षा मुहैया करवा सकते हैं, जब तक आपका अपना कोई आपके पास न पहुंच जाए। तो आइए आज हम अपको कुछ ऐसे एप्स और गैजेट्स के बारे में बताते हैं जो आपकी आत्मरक्षा के लिए बहुत जरूरी हैं -



निर्भीक रिवॉल्वर - दिल्ली के ‘निर्भया गैंग रेप कांड’ के बाद निर्भया को समर्पित यह रिवॉल्वर मात्र 500 ग्राम की है. निर्भीक रिवॉल्वर टाइटेनियम एलाय से बनी है और देखने में काफी आकर्षक है. यह वजन ओैर साइज में इतनी छोटी है कि महिलायें इसे आसानी से अपने हैंड बैग में रख सकती हैं और कोई मुसीबत आने पर अपनी रक्षा के लिये तुरंत इसका इस्तेमाल भी कर सकती हैं. यह रिवॉल्वर एक बार में छ: फायर कर सकती है साथ ही साथ 50 फीट तक की दूरी के लिए ये बहुत प्रभावशाली है। -

सेल्फ डिफेंस एप्लिकेशन - इस एप्लिकेशन में ये बताया जाता है कि आप मुसीबत के समय किस तरह से अपनी रक्षा कर सकते हैं, खास कर महिलाएं। इस एप्लिकेशन में सेल्फ डिफेंस ट्रेनर के द्वारा सारी चीजों को प्रैक्टिकलरूप से करके दिखाया गया है। जिससे आपको समझने में आसानी होगी।


स्टन बंदूक - ये स्टन गन एक हाथ की दूरी पर मौजूद हमलावर को मारने के लिए बहुत ही अच्छा साधन है। ये जब हमलावर के शरीर के साथ संपर्क में आता है तब हमलावर अपना होश खो बैठता है और वो लगभग 30 मिनट के लिए नाकाम हो जाता है। इस बंदूक से एक प्रकार का बिजली का झटका निकलता है, जो त्वचा के संर्पक में आने के बाद उस तंत्रिका तंत्र को बहुत प्रभावित करता है,जिससे सामने वाला अचेत हो जाता है। -



काली मिर्च स्प्रे - इस स्प्रे का प्रयोग आप अपने बचाव के लिए आसानी से कर सकते हैं।छोटा होने के कारण आप इसे आसानी से अपने बैग में रख सकते है। ये बाजार में अलग-अलग मूल्यों पर आसानी से उप्लब्ध है। इस स्प्रे का असर लगभग 30 मिनट तक रहता है और इतना समय आपको अपने बचाव के लिए काफी है। -



सर्कल ऑफ 6 एप - ये आपको सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा पर ये बहुत ही कारगर एप है। अगर आप किसी मुश्किल में हैं और आपको किसी की जरूरत है तो आपको बस एक बटन को दबाना है और जो भी आप से इस ऐप में जुड़ा होगा उसको GPS से आपका करंट लोकेशन पता चल जाएगा और वो तुरंत आपके पास पहुंच जाएंगे। -



फुट प्रिंट एप्लिकेशन - इस एप्लिकेशन को डाउनलोड करने के बाद आप उन लोगों को आसानी से ट्रैक कर सकेंगे जो आप से इस एप्लिकेशन के द्वारा जुड़े होगे या वो लोग आपको आसानी से ट्रेक करने में कामयाब होंगे। -

पर्सनल अलार्म - सुरक्षा की नजर से ये गैजट सबसे सस्ता और सबसे बेहतरीन है। इसको दबाते ही बहुत ज्यादा तेज आवाज के साथ सायरन बजने लगता है जिससे आपके आसपास के लोगों का ध्यान आपकी तरफ आकर्षित हो जाता है। जिसके कारण आप अपना बचाव बहुत आसानी से कर सकते हैं। - sabhar :http://www.jagran.com/

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भविष्य में होंगे मस्तिष्क प्रत्यारोपण

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बेहद गोपनीय अमेरिकी सैन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले कुछ महीनों में वे मस्तिष्क प्रत्यारोपण के विकास से जुड़ी नई प्रगति के बारे में जानकारी पेश करने वाले हैं. मस्तिष्क प्रत्यारोपण की मदद से याददाश्त बहाल की जा सकेगी.
अमेरिका की डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (डीएआरपीए) प्रबुद्ध स्मृति उत्तेजक को बनाने की योजना के कार्यक्रम का नेतृत्व कर रही है. यह इंसानी दिमाग को बेहतर तरीके से समझने के लिए बनाई गई योजना का हिस्सा है. इस योजना में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दस करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता दी है.
विज्ञान ने पहले ऐसा काम नहीं किया है. और इस पर नैतिक सवाल भी उठ रहे हैं कि जख्मी सैनिक की याददाश्त को बहाल करने और बूढ़े होते मस्तिष्क के प्रबंधन के नाम पर क्या इंसानी दिमाग के साथ छेड़छाड़ जायज है.
कुछ लोगों का कहना है कि जिन लोगों को इससे लाभ पहुंचेगा उनमें पचास लाख अमेरिकी हैं जो अल्जाइमर बीमारी से पीड़ित हैं और करीब तीन लाख अमेरिकी फौजी हैं जिनमें महिलाएं और पुरुष शामिल हैं. ये वो सैनिक हैं जो इराक और अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान घायल हुए और उनके मस्तिष्क में चोटें आई.
डीएआरपीए के प्रोग्राम मैनेजर जस्टिन साचेंज ने इसी हफ्ते अमेरिकी राजधानी में हुई एक कॉन्फ्रेंस में कहा, "अगर आप ड्यूटी के दौरान घायल हो जाते हैं और आप अपने परिवार को याद नहीं रख पाते हैं, ऐसे में हम चाहते हैं कि हम इस तरह के कामों को बहाल कर सकें. हमें लगता है कि हम न्यूरो कृत्रिम उपकरण का विकास कर सकते हैं जो सीधे हिप्पोकैंपस से इंटरफेस कर सकें और पहली प्रकार की यादें बहाल कर सकें. हम यहां एक्सप्लिसिट मेमरी के बारे में बात कर रहे हैं."
बहाल होंगी यादें
एक्सप्लिसिट मेमरी यानि स्पष्ट यादें, ये लोगों, घटना, तथ्य और आंकड़ों के बारे में स्मरणशक्ति है और किसी भी शोध ने यह साबित नहीं किया है कि इन्हें दोबारा बहाल किया जा सकता है. अब तक शोधकर्ता पार्किंसन बीमारी से पीड़ित लोगों में झटके कम करने में मदद कर पाए हैं और अल्जाइमर के पीड़ितों में डीप ब्रेन सिमुलेशन प्रक्रिया की मदद से याददाश्त मजबूत करने में सफल हुए हैं.
इस तरह के उपकरण हृदय पेसमेकर से प्रोत्साहित हैं और दिमाग में बिजली को पहुंचाते हैं लेकिन यह हर किसी के लिए काम नहीं करता है. जानकारों का कहना है कि स्मृति बहाली के लिए और अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण की जरूरत होगी. वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर रॉबर्ट हैंपसन कहते हैं, "स्मृति, पैटर्न और कनेक्शन की तरह है." डीएआरपीए की योजना पर टिप्पणी से इनकार करते हुए वे कहते हैं, "हमारे लिए स्मृति कृत्रिम बनाना वास्तव में ऐसा कुछ बनाने जैसा है जो विशिष्ट पैटर्न देता हो."
चूहों और बंदरों पर हैंपसन के शोध से पता चलता है कि हिप्पोकैंपस में न्यूरॉन्स तब अलग तरह से प्रक्रिया देते हैं, जब वे लाल या नीला रंग या फिर चेहरे की तस्वीर या भोजन के प्रकार को देखते हैं. हैंपसन का कहना है कि मानव की विशिष्ट स्मृति को बहाल करने के लिए वैज्ञानिकों को उस स्मृति के लिए सटीक पैटर्न जानना होगा. सिंथेटिक जीव विज्ञान पर डीएआरपीए को सलाह देने वाले न्यूयॉर्क के लैंगोनी मेडिकल सेंटर में चिकित्सा विज्ञान में नैतिकता पर काम करने वाले आर्थर कैपलान कहते हैं, "जब आप दिमाग से छेड़छाड़ करते हैं तो आप व्यक्तिगत पहचान से भी छेड़छाड़ करते हैं. दिमाग में फेरबदल की कीमत आप स्वयं की भावना को खोने की जोखिम से करते हैं. इस तरह का जोखिम नई तरह का है, जिसका हमने कभी सामना नहीं किया है."
एए/आईबी (एएफपी) sabhar:http://www.dw.de/

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गुरुवार, 1 मई 2014

ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !

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ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !

सबसे अधिक डरावने और विचित्र प्राणियों के धरती पर अस्तित्व को लेकर कई बातें हमेशा होती रही हैं। भय पैदा करने वाले इन प्राणियों पर कई फिल्में, डॉक्यूमेंटरीज और किताबें लिखी गई हैं। विचित्र प्राणी कई गीतों की थीम भी रहे हैं। हमेशा सवाल उठते रहें कि क्या ऐसे डरावने जीवों का अस्तित्व पृथ्वी पर कभी रहा है या फिर महज कपोल कल्पना है। इस बारे में आप यहां डरावने और विचित्र प्राणियों से जुड़ी कुछ स्‍टोरी जान सकते हैं।
 
1-लिजार्डमैन: दुनिया के सबसे डरावने विचित्र प्राणियों में अमेरिका का लिजार्डमैन भी है। साउथ कैरोलिना की ली काउंटी के स्वाम्पलैंड क्षेत्र में इसे 29 जून 1988 को देखा गया। हरी त्वचा वाले इस विचित्र प्राणी की लंबाई 7 फीट 2 इंच लंबी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार लिजार्डमैन हर पैर में तीन अंगूठे और हर हाथ में तीन उंगलियां थीं। वह दीवारों और सीलिंग पर चढ़ जाता था। एक प्रमाण यह भी है कि उसने एक कार को भी नुकसान पहुंचाया था। वह इतना ताकतवर था कि उसने कार तक को तोड़ दिया था।

ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !

2- जर्सी डेविल : इस डरावने प्राणी के बारे में 1800 से लेकर 20 वीं सदी तक तरह-तरह की बातें जाती रहीं। इसे न्यू जर्सी के दक्षिणी क्षेत्र में देवदार वृक्ष वाले जंगल में देखा गया था। जर्सी डेविल के बारे में कहा जाता था कि उसके दो पैर, चमगादड़ की तरह पंख और घोड़े की तरह मुंह था। इस विचित्र प्राणी को लेकर किंवदंती प्रचलित थी कि एक चुड़ैल जब अपने 13वें बच्चे को जन्म दे रही थी, उस समय उसने शैतान को जगा दिया। जन्म लेते ही इस बच्चे का विचित्र ढंग से रूप बदल गया। जर्सी डेविल ने जानवरों को मारा था। उसके विचित्र तरह के पदचिन्ह मिलते थे। वह अजीब तरह की आवाज निकालता था। न्यू जर्सी और उसके आसपास के इलाके में इस प्राणी के देखने का दावा बहुत से लोगों ने किया।
ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !
3- फ्लैटवुड मॉन्स्टर : फ्लैटवुड मॉन्स्टर भी किसी पारलौकिक प्राणी की तरह दिखाई देता था। इसे वेस्ट वर्जीनिया की ब्राक्सटॉन काउंटी के फ्लैटवुड कस्बे में 12 सितंबर 1952 को देखा गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार वह 10 फीट लंबा था और उसका चेहरा लाल रंग का था। उसका विचित्र चेहरा था और उसकी आंखें इंसानों जैसी नहीं थीं। ऐसा लगता था वह गहरे रंग की स्कर्ट पहने हुए है
ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !

4-आउलमैन: ब्रिटेन के मावनैन कॉर्नवेल एरिया में इस विचित्र प्राणी के बारे में 1976 में जब रिपोर्ट्स आईं, तो उसे आउलमैन नाम दिया गया। इसे मावनैन चर्च टावर पर उड़ते हुए देखा गया था। इसे अगस्त 1978 में  चर्च के पास फिर देखा गया। यह उल्लू जैसा दिखता था, लेकिन आकार एक इंसान के बराबर था था। इसके कान नुकीले, आंखें लाल और पंजे काले थे। माना जाता था कि ग्रे कलर के उसके पंख थे।

ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !


5-डोवर डीमन : यह विचित्र और डरावना प्राणी अमेरिका में दिखाई दिया। मैसाचुसेट्स के डोवर टाउन में यह 1977 में 21 अप्रैल और 22 अप्रैल को दिखाई दिया। इसके विचित्र रूप को लेकर अनुमान लगाए जाते रहे कि यह एलियन था या फिर कोई प्रयोग का हिस्सा। वह हाईब्रिड एलियन भी हो सकता था। कुछ लोगों का कहना यह किसी दूसरे लोक से आया था। डोवर डीमन का सिर बड़ा था और आंखें ऑरेंज कलर की और हाथ-पैर पतले दिखाई दे रहे थे। बताया जाता है कि यह बिना बालों का था। इसमें फेशियल फीचर्स बहुत कम थे। यह विचित्र प्राणी लगभग तीन फीट लंबा था। डोवर डीमन सांप की तरह फुफकारता और बाज की तरह चीखता था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किसी दूसरे ग्रह से आया होगा या फिर बॉयोलॉजिकल कारणों से कोई धरती के ही किसी जीव का आकार बदल गया होगा।
ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !

6- पोप लिक मॉन्स्टर: इस विचित्र प्राणी का आकार इंसान जैसा, लेकिन कुछ फीचर्स बकरी-भेड़ जैसे थे। उसके पैर शक्तिशाली थे, लेकिन वह बकरियों के फर से ढंके हुए थे। उसकी विचित्र नाक और चौड़ी आंखें थी। उसके माथे पर भेड़ जैसे सींग उगे थे। अरब देशों में इस प्राणी को लेकर कई तरह की किंवदंतियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यह हिप्नोसिस का उपयोग करता था। अपने शिकार को विचित्र ढंग से गाते हुए या मिमिक्री करके आकर्षित करता और फिर उन्हें मार देता था। यह भी कहा जाता था कि वह लोगों को चलती ट्रेन के सामने फेंक देता था। पोप लिक मॉन्स्टर के बारे में अन्य स्टोरीज में कहा गया है कि चलती कारों की छतों पर चढ़ जाता था। वह अपने शिकार को कुल्हाड़ी से भी मारता था।

ये हैं दुनिया के सबसे रहस्यमयी जीव...आज भी है लोगों के बीच आश्चर्य !


गॉटमैन : बकरी और इंसान के फीचर्स लिए हुए यह विचित्र अमेरिका में देखा गया था। इसके बारे में पहली बार रिपोर्ट 1957 में आई थी। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि बालों वाले और सींग वाला एक दैत्य जैसा दिखने वाले प्राणी को देखा है। इसे फॉरेस्टविले और अपर मार्लबोरा की प्रिंस जॉर्ज काउंटी में देखा गया। यह 1962 तक छिपा रहा लेकिन इसने एक दर्जन बच्चों और दो वयस्क लोगों की हत्या कर दी। यह लोगों पर कुल्हाड़ी से हमला करता था और शव को कई टुकड़ों में काट डालता था। sabhar :http://www.bhaskar.com/



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दिन पर दिन और बेशर्म होती जा रही है शर्लिन

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sherlyn chopra new photoshoot




शर्लिन चोपड़ा 'कामसूत्र 3D' में काम करने के बाद से लगातार अपनी हॉट फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट पर डालती है। देखिए, इन तस्वीरों की एक झलक। फोटोः फेसबुक/ट्विटर

sherlyn chopra new photoshoot





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sherlyn chopra new photoshoot

sabhar :
http://www.amarujala.com/

शर्लिन चोपड़ा 'कामसूत्र 3D' में काम करने के बाद से लगातार अपनी हॉट फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट पर डालती है। देखिए, इन तस्वीरों की एक झलक। फोटोः फेसबुक/ट्विटर
शर्लिन चोपड़ा 'कामसूत्र

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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

अमेरिका की बैड ग्रैंडमां, 86 साल की उम्र में छाई जवानी और मचा दी सनसनी

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अमेरिका की बैड ग्रैंडमां, 86 साल की उम्र में छाई जवानी और मचा दी सनसनी

केनटकी। कहते हैं जब दिल जवां हो, तो उम्र का भी उस पर जोर नहीं चलता। कुछ ऐसी ही हैं केनटकी के विलियम्सटाउन की 86 वर्षीय बैडी विन्कल। स्विमसूट में पोज देती, पॉपिंग पिल्स के साथ पार्टीज का मजा लेती और डांस करती उनकी तस्वीरें इन दिनों इंटरनेट पर सनसनी मचाए हुए है। इंस्टाग्राम की बैड ग्रैंडमां ने अपनी ये तस्वीरें क्या शेयर की, इंटरनेट पर छा गईं। 
 
बैडी को ट्विटर पर एक्टिव हुए एक महीने से भी कम वक्त बीता है, लेकिन इतने ही दिन में उनके 189,000 फॉलोअर बन चुके हैं। बैडी अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि 1928 से लेकर अब तक वो इसी अंदाज में जिंदगी बिता रही हैं। वो हर रंग में तरह-तरह की पोशाक पहनती आ रही हैं। 
 
हाल ही में, बैडी ने जब अपने हमउम्र लोगों को अपनी पोस्ट की नकल करते देखा, तो उन्होंने कहा कि बाकी सारी ग्रैंडमां कॉपी कैट की तरह हैं, जो नकल करती हैं। उन्होंने कहा कि वो अकेली रियल कैट हैं। एलन डेजेनरस के चैट शो में जाने के लिए बैडी कैंपेन भी चला रही है।
अमेरिका की बैड ग्रैंडमां, 86 साल की उम्र में छाई जवानी और मचा दी सनसनी

sabhar : bhaskar.com

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पचास साल बाद की दुनिया-देवेंद्र मेवाड़ी

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photo : googale


कितनी तेजी से बदल रही है हमारी यह दुनिया! जो आज है, वह कल नहीं था। जो कल होगा, वह आज नहीं है। आइए, कल्पना करते हैं कि कल क्या होगा हमारे इस खूबसूरत ग्रह का? हमारी इस दुनिया का?
काश, हमारे पास ऐसी कोई टाइम मशीन होती जो हमें समय की सैर कराती। पीछे और पीछे अतीत में ले जाती, जहां हम देखते-बियाबान जंगल, जंगल में विचरते हजारों जंगली जानवर और उनके शिकार की टोह में भटकता आदिमानव। गुफा में उन जानवरों के बच्चों को पालता उसका परिवार। घास के दाने बोती, छिटकती आदिम औरत। आसमान को ताकते, चिड़ियों को उड़ते हुए देखते आदिमानव जो शायद सोच रहे होते कि काश हम भी ऐसे उड़ते, चांद-तारों को छू सकते…
हम टाइम मशीन में आगे बढ़ते और चौंक जाते यह देख कर कि यह हम कहां आ गए? वहां हमें दिखतीं, विशाल नदियां, हरे-भरे खेत, झोपड़ियां। खेतों में काम करते आदमी, औरतें, खेलते बच्चे। भौं-भौं भौंकते कुत्ते, गायों-भैंसों के झुंड, घोड़े। हम देखते कि गुफाओं में रहने वाले परिवार बस्तियां बना कर रह रहे हैं। जंगली जानवर पालतू बना लिए गए हैं। खेतों में खेती होने लगी है। आदमी के कल के सपने साकार हो गए हैं।
हम फिर आगे बढ़ते और देखते आसमान में चिड़ियों की तरह उड़ता आदमी। उसका उड़ने का सपना सच हो गया! हम देखते सागर में तैरते, जहाजों में यात्रा करते और पनडुब्बियों में सागर तल की सैर करते आदमी। पटरियों पर धड़धड़ाता इंजन, सीटी देकर भागती रेल और मोटर-कारें।
फिर हमें दिखाई देते विकास की अंधी दौड़ में धराशायी होते सदियों के साथी हरे-भरे पेड़, उजड़ते जंगल। गांवों को लीलते शहर। सीमेंट कंक्रीट के जंगल…महानगर, जहां हवा बदली, फिजा बदली, मौसम का मिजाज बदला। आदमी परेशान, पशु परेशान, पक्षी परेशान। विकास की इस दौड़ में आखिर कहां जाएगा यह आदमी?
आज से पचास वर्ष पहले मैंने सफेद मिट्टी के घोल में नरकुल की कलम डुबा कर लकड़ी की तख्ती पर लिखना सीखा था। दिन के उजाले में या रात को छोटे-से लैंप या लालटेन के उजाले में पढ़ता था। गांव में बिजली नहीं थी। टेलीफोन भी नहीं था। पहली बार जब रेडियो का डिब्बा आया तो लोग दूर-दूर से उसे देखने-सुनने आते थे। टेलीविजन, फोन, मोबाइल के बारे में तो हम सोच भी नहीं सकते थे।
लेकिन, पचास वर्ष बाद आज हमारे पास शानदार पेन, कापियां हैं, केलकुलेटर हैं, मोबाइल फोन हैं, टेबलेट, कंप्यूटर और लैपटाप हैं, टेलीविजन हैं, खाना पकाने की गैस है, प्रेशर कुकर हैं, फ्रिज हैं, माइक्रोवेव और ओवन हैं। गर्मी से बचने के लिए ए सी है, कपड़े धोने-सुखाने की मशीन है। बच्चे मोबाइल और पी एस पी पर वीडियो गेम खेल रहे हैं। चारों ओर मोटरकारें, रेलगाड़ियां दौड़ रहीं हैं। हवाई जहाज उड़ रहे हैं। आदमी चांद पर पहुंच चुका है। अंतरिक्षयान ग्रह-नक्षत्रों के रहस्यों का पता लगा रहे हैं, आदमी के बनाए वाएजर यान सौरमंडल के पार अनंत अंतरिक्ष में पहुंच चुके हैं, मानव मंगल ग्रह पर विजय की तैयारियों में जुटा हुआ है। यानी, पचास वर्ष के भीतर हमारी दुनिया की तस्वीर ही बदल गई है।
यह बदलाव इतनी तेजी से हो रहा है कि पचास वर्ष बाद की दुनिया को तो शायद पहचानना भी मुश्किल हो जाएगा। वैज्ञानिक कहते हैं, कल कारें उड़ेंगी। कारों का भी दिमाग होगा, कम्प्यूटर का दिमाग। इसीलिए कार अपने आप चलेगी। उसे बस वह जगह बतानी होगी, जहां जाना है। वह न किसी से टकराएगी, न रास्ता भूलेगी। न यातायात के नियम तोड़ेगी। इसी तरह रेलगाड़ियां और हवाई जहाज भी कम्प्यूटर के दिमाग से चलेंगे। गांव और शहर सूरज की ऊर्जा से जगमगाएंगे क्योंकि धरती के गर्भ में डीजल-पेट्रोल का भंडार दिन-ब-दिन घटता ही जाएगा। डीजल-पेट्रोल ही क्या, पानी के लिए भी त्राहि-त्राहि मच जाएगी, इतनी कि शायद पानी के लिए विश्वयुद्ध छिड़ जाए।
तब मकान अपनी देखभाल खुद करेंगे। शाम होते ही उनमें अपने आप रोशनी जल जाएगी। सुबह उजाला होने पर बुझ जाएगी। सर्दियों में घर अपने आप गर्म और गर्मियों में ठंडे हो जाएंगे। घरों, कल-कारखानों और खेत-खलिहानों में काम करने के लिए रोबोट होंगे। घर में रोबोट डागी और रोबोट पूसी होगी। दिमागदार खिलौने बच्चों का मन बहलाएंगे। रोबोट बूढ़े-बुजुर्गों को सुबह-शाम की सैर कराएंगे। उनकी तीमारदारी करेंगे। उनकी संतानें आफिसों, माल-बाजारों या क्लबों में व्यस्त होंगी।  स्कूल-कालेजों में रोबोट शिक्षक पढ़ाएंगे। वे घर में कम्प्यूटर के स्क्रीन पर भी पढ़ाएंगे। पुस्तकें इंटरनेट पर भी पढ़ी जाएंगी। लाइब्रेरी नेट पर उपलब्ध होगी।
हो सकता है, आने वाले पचास वर्षों में हमारी मुलाकात किसी और ग्रह के एलियनों से हो जाए! वैज्ञानिक कहते हैं कि इस विशाल ब्रह्मांड में अरबों-खरबों ग्रह-उपग्रह हैं। हमारी पृथ्वी की तरह उनमें कहीं तो जीवन होगा। जीवन होगा तो वे भी हमारी तरह दूसरे ग्रहों में जीवन की खोज कर रहे होंगे। इसलिए हो सकता है, आने वाले समय में हमें एलियन मिल जाएं या फिर उन्हें हम मिल जाएं।
हो सकता है,तब तक मानव चांद पर कोई बस्ती बना ले और वहां के अंतरिक्ष अड्डों से अन्य ग्रहों के लिए उड़ान भरे। मंगल ग्रह पर भी तब तक विजय प्राप्त कर ली जाएगी। हो सकता है, तब तक हमारे देश के अंतरिक्ष यात्री भी चंद्रमा और मंगल पर उतर चुकें हों।
आने वाले पचास वर्षों में खेती की जमीन के घटते जाने से खाद्यान्नों के उत्पादन पर बुरा असर पड़ेगा लेकिन नए वैज्ञानिक तरीकों से उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें की जाएंगी।  जमीन घटने के कारण विशाल खड़ी इमारतों की तमाम मंजिलों में फसलें उगाई जाएंगीं। इमारतों के भूतल के बाजार में अनाज और फल-सब्जियां बेची जाएंगी। घर की रसोई में खाना पकाने का रिवाज शायद घटता जाएगा और तुरत-फुरत भोजन का प्रचलन बढ़ता जाएगा। बची-खुची जमीन और खेत-खलिहानों में रोबोट काम करेंगे। रोबोट गाय-भैंसों का दूध भी दुहेंगे और उन्हें समय पर चारा-दाना भी देंगे।
वैज्ञानिकों को लगता है कि प्रजनन की नई तकनीकों के कारण लोग मनचाही स्वस्थ संतान पैदा कर सकेंगे और शुक्राणु बैंक से प्राप्त स्वस्थ शुक्राणुओं से किराए की कोख से संतान सुख प्राप्त कर सकेंगे। शुक्राणु तथा डिंब बैंकों से शुक्राणु और डिंब खरीद कर अविवाहित अथवा एकाकी युवतियां या ‘गे’ दम्पती भी किराए की कोख से अपनी संतान पैदा करा सकेंगे। कई कामकाजी महिलाएं नौ माह तक गर्भधारण का झंझट नहीं पालना चाहेंगीं। दिवंगत लोगों के शुक्रागुणों और डिबों से वर्षों बाद भी संताने पैदा की जा सकेंगी। लालन-पालन की कठिन जिम्मेदारी और महंगाई के कारण लोग बच्चों की संख्या एक या दो तक ही सीमित रखना चाहेंगे। इसके बावजूद विश्व की मौजू़दा 7 अरब आबादी वर्ष 2050 तक 8.5 से 10 अरब तक बढ़ जाएगी।
चिकित्सा विज्ञान की नई खोजों के कारण बेहतर स्वास्थ सेवाएं उपलब्ध होंगी और लोगों की उम्र बढ़ेगी। शतायु लोगों की संख्या बढ़ेगी। वे अपने 70-80 साल के बच्चों को सलाह देंगे। लेकिन, पुरानी पीढ़ी के उम्रदराज़ लोगों से युवा पीढ़ी में रोजगार, घरेलू सम्पत्ति और दोनों पीढ़ियों के जीने के तौर-तरीकों में अंतर होने के कारण मनमुटाव बढ़ेगा। वे साइबर मीडिया के जरिए विरोध प्रकट करके संचार सुविधाओं को ठप करने की कोशिश करेंगे। वही साइबर मीडिया का विश्वव्यापी नेटवर्क जिससे आज हमारी हवाई, रेलवे, स्वास्थ्य और बैंकिंग जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं जुड़ी हुई हैं।
टेलीविजन आया तो लगा अब रेडियो गया और सिनेमा की भी छुट्टी हो जाएगी। बुद्धू-बक्से के रूप में सारी दुनिया हमारे घर भीतर सिमट आई। लेकिन, अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ रेडियो और सिनेमा आज भी मौजूद है और पचास साल बाद भी रहेगा। एफ एम के रूप में रेडियो फिर से घर-घर में पहुंच गया है। इसी तरह कम्प्यूटर, टेबलेट और इंटरनेट से किताबें विदा नहीं होंगी। नए गैजेटों का मोह इनकी संख्या घटा भले ही दे, इन्हें गायब नहीं कर सकेगा। पचास वर्ष बाद भी किताबों के कागज की खुशबू सूंघने और उन्हें पृष्ठ-दर-पृष्ठ पढ़ने और सहेजने वाले शौकीन मौजूद रहेंगे।
आज करोड़ों लोग हथेली में समा जाने वाले नन्हें मोबाइल का उपयोग करके दुनिया के कोने-कोने में बात कर रहे हैं। इस नन्हे गैजेट ने टेलीफोन की सुविधा देने के साथ-साथ कैमरे और संगीत की सुविधा भी मुहैया कर दी है। यह अपने मालिक की मौजूदगी का पता बता रहा है। पचास वर्ष बाद यह कई और सुविधाएं दे रहा होगा। कल यह हमारे मन-मस्तिष्क के साथ ही शरीर की गतिविधियों को भी पढ़ेगा और फेमिली डाॅक्टर को हमारे दिलो-दिमाग उसकी खबर देगा।
दिलो-दिमाग की खबर वह नन्हीं-सी चिप भी देगी जो हमारे दिमाग में फिट कर दी जाएगी। वह हमें हमारे प्रियजनों और दोस्तों से ही नहीं बल्कि फेमिली डाक्टर और कम्प्यूटर, इंटरनेट से भी जोड़ देगी। तब गणित के सारे गुणा-भाग और किताबों का ज्ञान हमारे दिमाग में भरा होगा। इंटरनेट से जुड़ कर हम मन ही मन सारी दुनिया का ज्ञान टटोल रहे होंगे।
ज्ञान तो टटोल रहे होंगे, लेकिन डर यह भी है कि वह चिप हमें दुनिया सौंप कर कहीं हमारी एक अलग एकाकी दुनिया न रच दे। आज नगरों-महानगरों की भीड़ में, सड़क-चैराहों पर बसों और रेलगाड़ियों तक में कान से मोबाइल चिपकाए लोग साथ होते हुए भी अपनी-अपनी अलग दुनिया में खोए रहते हैं। उन्हें पता नहीं कि उनके आसपास भी लोग हैं, सहयात्री हैं जिनसे बातें की जा सकती हैं, यात्रा और जीवन के अनुभव बांटे जा सकते हैं, उन अनुभवों से कुछ सीखा-सिखाया जा सकता है।
लेकिन, नहीं, उनकी दुनिया मोबाइल में सिमट गई है। वे कान पर मोबाइल लगा कर गुमनाम आते हैं और मोबाइल लगाए-लगाए गुमनाम निकल जाते हैं। यह अकेलापन इस नन्हे गैजेट की देन है और मोबाइल इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ इनसे आदमी के जीवन में अपरिचय और अकेलेपन का अंधेरा भी बढ़ता जा रहा है। अपने साथी मनुष्यों के साथ सुख-दुख बांटने का सहज मोह खत्म होता जा रहा है।
कम्प्यूटर, इंटरनेट और फेसबुक भी इसी तरह आदमी का अकेलापन बढ़ा रहे हैं। यह अकेलापन आदमी को धीरे-धीरे अपने आसपास ही नहीं बल्कि पूरे समाज से काटता जा रहा है। पचास वर्ष बाद इसका क्या परिणाम सामने आएगा, यह उस समय के समाज विज्ञानी और मनोवैज्ञानिक बताएंगे। उस समाज की एक झलक देखने के लिए भी काश आज हमारे पास कोई टाइम मशीन होती!
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dmewari


7 मार्च 1944 को ग्राम कालाआगर, पट्टी-चौगढ़, जिला नैनीताल (उत्तराखंड) में जन्म। एम.एस-सी. (वनस्पति विज्ञान), एम.ए. (हिंदी), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। विगत 45 वर्षों से हिंदी में नियमित रूप से विज्ञान लेखन, अनुवाद और संपादन। प्रमुख कृतियां: ‘मेरी यादों का पहाड़’,‘मेरी विज्ञान डायरी’, ‘भविष्य’, ‘कोख’, ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’ (विज्ञान कथा संग्रह), ‘विज्ञान प्रसंग’, ‘हार्मोन और हम’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘सौरमंडल की सैर’, ‘फसल­ कहें कहानी’, ‘पशुओं की प्यारी दुनिया’ आदि (लोकप्रिय विज्ञान), हमारे पक्षी, जीन और जीवन, कहानी रसायन विज्ञान की (अनुवाद)। तेरह वर्ष तक मासिक कृषि पत्रिका ‘किसान भारती’ का संपादन। ‘विज्ञान प्रसार’ फैलो (2007-08)। आकाशवाणी तथा टेलीविजन के लिए विज्ञान नाटक पटकथा लेखन / वार्ताएं, वैज्ञानिक विषयों पर व्याख्यान। हिंदी माध्यम से विज्ञान लोकप्रियकरण में उत्कृष्ट योगदान के लिए विज्ञान परिषद् प्रयाग शताब्दी सम्मान (2012), उत्कृष्ट विज्ञान लेखन के लिए प्रतिष्ठित ‘आत्माराम पुरस्कार’ (2005), राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार) का राष्ट्रीय पुरस्कार (2000), भारतेंदु हरिश्चंद्र राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (1994-99 तथा 2002), मेदिनी पुरस्कार, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (2009), उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार (1978-79), विज्ञान परिषद प्रयाग द्वारा स्तरीय विज्ञान लेखन के लिए सम्मानित (1986) तथा ‘विज्ञान’ का ‘देवेंद्र मेवाड़ी सम्मान अंक’ प्रकाशित (2006)। सदस्यः ‘रक्षा उत्पादन विभाग की हिंदी सलाहकार समिति’ (रक्षा मंत्रालय) , भारत सरकार,

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मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

तीन साल का बच्चा लौटा मरने के बाद

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यूके: तीन साल के एक बच्चे के अनुसार अपने जटिल ऑपरेशन के दौरान उसने महसूस किया कि उसका शरीर हवा में उठकर ऊपर की ओर जा रहा था। उसके मां-बाप इस दौरान जोर जोर से रो कर उसके ठीक होने की दुआएं मांग रहे थे।
इस दौरान सभी डॉक्टर इस बच्चे को बताने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। ऑपरेशन सफल रहा लेकिन सबसे हैरतअंगेज रहा इस बच्चे का अनुभव। उसने बताया कि ऑपरेशन के दौरान पूरे समय स्वर्ग में उसे प्रभू जीसस अपनी गोद में बैठाकर थपथपाते रहे। उसने जीसस के इंद्रधनुषी घोड़े की सवारी भी की। वहां पर वह अपनी मरी हुई दादी और बहन से भी मिला। इस बच्चे की बहन इस के जन्म से भी पहले एक हादसे में अपनी जान गंवा चुकी थी।
बच्चा धरती पर अपने शरीर के जटिल ऑपरेशन के दौरान स्वर्ग मे नीली आंखों और सुनहरे बालों वाले एक देवदूत की गोद में बैठा था। उसने इस देवदूत को प्रभू जीसस बताया है।
इस बच्चे के इस अनोखे अनुभव पर एक सुपर डुपर हिट हॉलीवुड फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म ने अपने पहले हफ्ते में ही 22.5 मिलियन डॉलर की कमाई की और अब तक यह फिल्म 52 मिलियन डॉलर कमा चुकी है। यह फिल्म यूके में अब 9 मई को रिलीज होने जा रही है।
फिल्म का डायरेक्शन करने वाला शख्स और कोई नहीं बल्कि जाने माने लेखक रांडाल वॉलस है जिन्होंने ब्रेवहार्ट और पर्ल हार्बर जैसी मशहूर हॉलीवुड फिल्में लिखी हैं। यूके में यह फिल्म 9 मई को रिलीज होने जा रही है। इस बच्चे को नाम है कॉलटन बर्पो और अब इसकी उम्र 14 साल है। sabhar :http://khabarmantra.com/

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ड्रैकुला थेरपी: थम जाएगी उम्र

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photo :navbharattimes.indiatimes.com

ब्लड निकालकर उसे वैंपायर्स के लिए कलेक्ट करना तो हम सबने सुना है , लेकिन उसे ब्यूटी के लिए यूज करना थोड़ा नया कॉन्सेप्ट है। कॉस्मेटोलॉजी में अब अपने ही ब्लड को इंजेक्ट करके रिंकल्स को दूर किया जा रहा है। आइए जानते हैं इस ट्रेंड के बारे में-

बोटोक्स और कॉस्मेटिक फिलर्स के बाद अब बारी है , ड्रैकुला थेरपी की। आपके चेहरे पर उम्र का असर न दिखे , इसके लिए आपके ही ब्लड को आपके फेस पर इंजेक्ट किया जाता है। गौरतलब है कि ड्रैकुला थेरपी में बगैर किसी सर्जरी के बेहद यूथफुल लुक मिलता है। बता दें कि इस थेरपी को पहली बार ब्रिटेन में इंट्रोड्यूस किया गया था। लंदन - बेस्ड फ्रेंच कॉस्मेटिक डॉक्टर डेनियल सिस्टर का यह कॉन्सेप्ट अब इंडिया में अपने रिजल्ट की वजह से पॉप्युलर हो रहा है। इस थेरपी के बाद बेबी - सॉफ्ट और नेचरल स्किन मिलती है। दरअसल , इस थेरपी में आपके ही प्लेटलेट रिच प्लाज्मा को इंजेक्ट किया जाता है। इसे इंजेक्ट करने से स्किन रिजेनरेट हो जाती है और साथ में रिजुनेवेट भी। अगर आपको सिंथेटिक प्रॉडक्ट्स से प्रॉब्लम है , तो यह आपके लिए बेहतर है। 

क्या है प्रोसेस 
फोर्टिस हॉस्पिटल के सीनियर कॉस्मेटिक सर्जन डॉ . अजय कश्यप बताते हैं कि इस नॉन - सर्जिकल एज डिफाइंग ट्रीटमेंट में डॉक्टर आपका ब्लड निकालते हैं। फिर उसे उसे रेड ब्लड सेल्स , सीरम और प्लेटलेट्स में सेपरेट कर देते हैं। फिर इसे छोटे सीरिंज नीडल से पेशंट के फेस में इंजेक्ट किया जाता है। इसके बाद नए यंगर सेल्स बनने की प्रोसेस शुरू हो जाती है। चूंकि इस प्रोसेस में कोई फॉरन बॉडी इंजेक्ट नहीं की जाती , इसलिए यह सेफ है। यही नहीं , जरूरत पड़ने पर इसे दोबारा भी करवाया जा सकता है। 

बोटोक्स से अलग 
अगर बोटोक्स की बात करें , तो यह एक नर्व पारालिटिक एजेंट है। यह फेशियल लाइंस के लुक को इंप्रूव तो करता है , लेकिन सेल्स को रिजेनरेट नहीं करता , जबकि ड्रैकुला थेरपी से स्किन की कंडीशनिंग हो जाती है।

हेयर फॉल में भी 
ड्रैकुला थेरपी का यूज बालों की प्रॉब्लम्स में भी किया जाता है। स्किन स्पेशलिस्ट डॉ . रोहित बतरा बताते हैं कि अगर इसे स्कैल्प में इंजेक्ट किया जाता है , तो बहुत अच्छा रिजल्ट मिलता है। इसका रिजल्ट इंस्टैंट नहीं दिखता , लेकिन आपकी स्किन बिल्कुल इंप्रूव हो जाती है। वैसे , इसे स्टिमुलेटेड सेल्फ सीरम स्किन थेरपी भी कहते हैं। चूंकि यह अपना ही ब्लड है , इसलिए कोई एलर्जी भी नहीं होती। हां , इसे कराने के बाद एक हफ्ते तक आप सोशलाइज न करें , तो बेहतर रहता है। 

हिट है दिल्ली में 
दिल्ली में 35 से लेकर 50 की एज ग्रुप की महिलाएं इस थेरपी को पिछले कुछ महीनों से आजमा रही हैं। वैसे , कॉस्मेटिक डर्मेटॉलजिस्ट डॉ . दीप्ति ढिल्लन की मानें , तो दिल्ली में फिलहाल इसे सेलिब्रिटीज ज्यादा करा रहे हैं। हां , इंटरनेट से दिल्ली वालों को इस बारे में जानकारी मिल रही है। वैसे , इस थेरपी के लिए स्किन पर बहुत ज्यादा रिंकल्स आने का इंतजार न करें , बल्कि हल्के रिंकल्स में ही आजमाएं। आपको बेहतर रिजल्ट मिलेंगे। इस बात का खास ध्यान रखें कि आप इसे किसी एक्सपर्ट से ही कराएं। - ट्रेंड कॉस्मेटॉलजिस्ट से ही करवाएं यह थेरपी। - चूंकि थेरपी के बाद स्किन थोड़ी सेंसिटिव हो जाती है , इसलिए हमेशा घर से निकलने से पहले सनस्क्रीन का यूज जरूर करें। - आप चाहें , तो दो साल बाद इस थेरपी को रिपीट भी कर सकती हैं।

कितना है खर्च 
हालांकि यह टेक्नीक हमारे यहां अभी नई है, लेकिन बहुत तेजी से पॉपुलर हो रही है। इस थेरपी के हर सेशन में आपका 25,000 से लेकर 30,000 रुपये तक का खर्च आ सकता है। 


चूंकि यह आपका अपना ही ब्लड है , इसलिए कोई एलर्जी भी नहीं होती-डॉ.रोहित बतरा। (प्रीतंभरा प्रकाश,नवभारत टाइम्स,दिल्ली,

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एंटीग्रेविटेशनल इंजन

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एंटीग्रेविटेशनल इंजन


बहुत मुमकिन है कि रूस में ही पहला एंटीग्रेविटेशनल इंजन बनेगा| उराल-अंचल के दक्षिण में स्थित नगर त्रोइत्स्क के निवासी अन्वेषक-इंजीनियर गार्री गिल्मानोव का कहना है कि उन्होंने एंटीग्रेविटी का रहस्य बूझ लिया है| वह पत्रकारों को अपनी “एंटीग्रेविटेशनल कुर्सी” दिखाते हैं|

वैसे यह कुर्सी ज़मीन से ऊपर तो नहीं उठती| किंतु इंजीनियर का कहना है कि पीठ के रोगों से पीड़ित लोगों को इससे बहुत मदद मिलती है| बात यह है कि इस कुर्सी में बैठने पर व्यक्ति अपना भार महसूस नहीं करता| गार्री गिल्मानोव बताते हैं:
“मैं गुरुत्वाकर्षण बल पर असर डाल सकता हूं, इसे घटा-बढ़ा सकता हूं| इसकी दिशा भी बदल सकता हूं| किसी एक पिंड के लिए कुछ समय के लिए गुरुत्वाकर्षण बल बिलकुल ही समाप्त कर सकता हूं”|
इस इंजीनियर के जितने भी मित्रों और परिचितों ने “एंटीग्रेविटेशनल कुर्सी” आजमाई है उन सबका यह कहना है कि यह युक्ति सौ फ़ी सदी काम करती है| बहत से लोगों को इसकी मदद से पीठ के दर्द से निजात मिली है|
गार्री गिल्मानोव अब सत्तर वर्ष के हो चले हैं| उन्होंने दो हज़ार से अधिक युक्तियां खोजी और बनाई हैं| उनका सबसे बड़ा सपना यह है कि लोगों को गुरुत्वाकर्षण बल की सहायता से एक स्थान से दूसरे पर जाना सिखा दें| उदाहरण के लिए, एक छोटी सी डिब्बी में हो उनकी युक्ति, उसे कमर पर लगाओ, बटन दबाओ और जिधर चाहो उड़ चलो| या फिर साइकिल पर बैठो, पैडल घुमाओ और उड़ने लगो|
“ज़रा सोचिए हवाई साइकिल क्या है? बैठे, पैदल घुमाए और उड़ चले, कोई इंजन नहीं, कुछ नहीं| है न ज़बरदस्त बात! बेशक, स्पीड तो हल्की सी ही होगी|”
यह सब कल्पनातीत लगता है| पर तब तक ही जब तक हम यह नहीं जान लेते कि यह बात कौन कह रहा है| गार्री गिल्मानोव ने अपनी सारी उम्र गोपनीय सैनिक कारखाने में गोपनीय अनुसंधानों और विकास-कार्यों पर ही काम किया| अभी तक वह उन दिनों के अपने काम के बारे में कुछ नहीं बताते हैं – गोपनीयता की शपथ जो ले रखी है| सोवियत काल में ही उन्हें “सोवियत संघ का सम्मानित अन्वेषक” उपाधि से विभूषित किया गया था| उन दिनों भी पूरे देश भर में ऐसी उपाधि पाने वाले गिने-चुने लोग ही थे|
गिल्मानोव के परिचितों का कहना है कि उनका जो नो-हाऊ है उसे देखते हुए उन्हें नोबल पुरस्कार आसानी से मिल सकता है| परंतु अब पेशनर गिल्मानोव अकेले में अपने विचारों को मूर्तित नहीं कर सकते| इसके लिए इंजीनियरों का पूरा दल होना चाहिए, जो सभी सटीक गणनाएं करें और टेक्नोलॉजिकल परीक्षण करें| यह सब कोई सस्ता काम नहीं है| इतनी बड़ी पूंजी कहां से लाई जाए, गिल्मानोव उदास मन से कहते हैं, लेकिन अपने को एक सच्चा देशभक्त मानते हुए वह वह अपनी खोज को विदेशियों को बेचने का कोई इरादा नहीं रखते हैं|
बस, यही उम्मीद है कि देश की सरकार गिल्मानोव की खोज की ओर ध्यान देगी| यदि वास्तव में गिल्मानोव की खोज में कोई विवेकसंगत बात है तो यह सारी मानवजाति के लिए नितांत महत्वपूर्ण है|

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और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2014_04_29/antigravitation-ingine/

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तृतीय विश्व युद्ध शुरू करना चाहता है रूस

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मास्को। यूक्रेन को लेकर रूस पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इस दबाव का ही नतीजा है कि अब उसके आक्रामक रुख में नरमी दिखने लगी है। शुक्रवार को रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यूक्रेन मसले को सुलझाने और वहां शांति कायम करने के लिए मास्को अमेरिका के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है। जबकि यूक्रेन के प्रधानमंत्री आर्सेनी यात्सेन्युक का आरोप है कि रूस शांति कायम करने की बजाय तृतीय विश्व युद्ध प्रारंभ करना चाहता है।
इंटरफैक्स समाचार एजेंसी ने रूसी रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से कहा है कि बातचीत के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन की ओर से कोई अनुरोध नहीं किया गया है। लेकिन यूक्रेन में स्थिति सामान्य बनाने के लिए रूस का रक्षा मंत्रालय बातचीत को तैयार है। इस बीच यूक्रेन के प्रधानमंत्री आर्सेनी यात्सेन्युक ने उनके देश को लेकर रूस पर तृतीय विश्व युद्ध प्रारंभ करने की आधारशिला रखने का आरोप लगाया है। उन्होंने रूस की आक्रामकता के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की है।
कैबिनेट की बैठक के दौरान यात्सेन्युक ने कहा, 'यूक्रेन की धरती पर रूस की सेना द्वारा आक्रामक कार्रवाई के प्रयास से यूरोप में संघर्ष प्रारंभ हो जाएगा। दुनिया के देश द्वितीय विश्व युद्ध को नहीं भूल पाए हैं और रूस तृतीय विश्व युद्ध प्रारंभ करना चाहता है।' इंटरफैक्स ने यूक्रेन के रक्षा मंत्री मायखैलो कोवाल के हवाले से कहा है कि इस सप्ताह रूसी सेना उनके देश की सीमा से एक किलोमीटर की दूरी पर पहुंच गई है। उनका कहना है कि रूसी सेना यूक्रेन की सीमा के पास युद्धाभ्यास कर रही है और यूक्रेन की सेना किसी भी हमले को रोकने के लिए तैयार है। यूक्रेन के गृह मंत्री आर्सेन अवाकोव ने कहा है कि रूस की चेतावनी के बावजूद उनके देश के पूर्वी हिस्से में रूसी अलगाववादियों के खिलाफ अभियान जारी है। उधर शुक्रवार को यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में स्थित शहर स्लोविआंस्क में एक सैन्य हेलीकॉप्टर पर गोलीबारी की गई, जिससे उसमें आग लग गई। इस घटना में पायलट घायल हो गया। विद्रोहियों के नियंत्रण वाले शहर स्लोविआंस्क में यूक्रेन के विशेष बलों ने शुक्रवार को नाकाबंदी और मजबूत कर दी। जबकि रूस ने यूक्रेन को देश के पूर्वी हिस्से में खूनी अपराध के लिए न्याय के कठघरे में खड़ा करने की चेतावनी दी है। sabhar :http://www.jagran.com/

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महिला जज ऑफिस में न्यूड होकर करती थी एक्सरसाइज

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ये कैसी आदत?


ये कैसी आदत?


हममें से ज्यादातर लोग एक्सरसाइज करने से पहले स्पोर्टी कपड़े पहनकर किसी खुली जगह को एक्सरसाइज करने के लिए चुनते हैं।

लेकिन इस महिला की कहानी हममें से ज्यादातर लोगों की कहानी से बहुत अलग है।

ऐसा इसलिए क्योंकि ये महिला ऑफिस में ही एक्सरसाइज करती थी। एक्सरसाइज भी ऐसी अवस्‍था में जिसे देखकर किसी के भी होश उड़ जाएं।
न्यूड हो जाती वो

न्यूड हो जाती वो

वो एक महिला जज थी। उसे अक्सर ही केस को सुनने और उसपर फैसला करने के लिए वहां जाना होता था।

लेकिन कोर्ट रूम में आने से पहले वो अपने ऑफिस में न्यूड होकर एक्सरसाइज करती थी। इतना ही नहीं, वो अपने ऑफिस डेस्क पर ही न्यूड अवस्‍था में सनबाथ भी लेती थी।

उसकी इस आदत का किसी को पता नहीं था। लेकिन तभी एक दिन किसी अंजान व्यक्ति ने उसको न्‍यूड ही एक्सरसाइज करते हुए तस्वीरें खींच ली।
निकाली गई कोर्ट से

निकाली गई कोर्ट से

जज की ऐसी तस्वीरें सभी हैरान रह गए। उसके ऊपर डिस्पिलिनेरी एक्‍शन कमेटी बैठी। कमेटी ने ये तय किया कि एनिसा बिलाजैक जैसी सीनियर जज से ऐसी हरकतों की उम्मीद नहीं की जाती है।

उसे कोर्ट से निकालने का फैसला ले लिया गया। उसे ऑफिस में आपत्तिजनक काम करने के लिए बाहर से निकाल भी दिया गया।

लेकिन थोड़ी दिनों बाद उसने अपनी हरकत के लिए माफी मांगी और प्रोफेशनल रूप से अच्छा काम करने की बात करते हुए उसे रखने की बात कही। कोर्ट उसकी बात मान गई। मामला यूरोप स्थित बोस्निया के हाई कोर्ट का है। sabhar :http://www.amarujala.com/


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