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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

पूर्वजन्म का बदला लेने के लिए स्त्री बनकर लिया दूसरा जन्म

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story of bhakt sadan prebirth story

यह कहानी उस स्त्री की है जो पूर्वजन्म में एक गाय थी। इस गाय का मालिक कसाई था। एक दिन यह गाय अपना बंधन तोड़कर भाग चली। कसाई गाय का पीछा करता दौर रहा था।

रास्ते में एक व्यक्ति ने उसे पकड़ लिया और गाय को कसाई के हवाले कर दिया। समय बीता और गाय ने दूसरा जन्म लिया।गाय एक स्त्री बनी और कसाई उसका पति। गाय को पकड़ने वाले का भी पुनर्जन्म हुआ और वह कसाई बना। इस कसाई का नाम था सदन।

सदन कसाई होने पर भी पूर्वजन्म के कर्मों के कारण ईश्वर में बड़ी आस्था रखता था। एक बार यह तीर्थयात्रा पर निकला।रास्ते में इसने एक घर में आश्रय मांगा। उस घर में सिर्फ पति-पत्नी रहते थे। सदन ने देखकर वह स्त्री मोहित हो गई। रात में जब उसका पति सो गया तब वह सदन के पास आई और प्रेम की प्रार्थना करने लगी।

लेकिन सदन ने उसकी बात नहीं मानी। स्त्री को लगा कि सदन उसके पति के भय से उसके प्रेम को स्वीकार नहीं कर रहा है। स्त्री घर के अंदर गई और तेज हथियार से अपने पति की हत्या कर दी।इसके बाद वह स्त्री वापस सदन के पास आई और बोली तुम्हें मेरे पति से डरने की जरूरत नहीं है मैंने उसका वध कर दिया है। इसके बाद भी सदन ने उस स्त्री के प्रेम को अस्वीकार कर दिया। अब तो स्त्री को क्रोध आ गया और उसने शोर मचाना शुरू कर दिया। स्त्री ने अपने पति की हत्या का आरोप सदन के ऊपर लगा दिया।

राजा ने दंड स्वरूप सदन के दोनों हाथ कटवा दिए। सदन अपने कटे हुए हाथों के साथ जगन्नाथ पुरी पहुंचा। यहां पहुंचने पर एक रात उसे सपने में आकर जगन्नाथ जी ने बताया कि तुमने पूर्वजन्म में गाय को पकड़कर कसाई को सौंप दिया था।

गाय ने तुम्हें माफ नहीं किया और स्त्री के रूप में जन्म लेकर तुम्हें यह दंड दिया है। कहते हैं इसके बाद जगन्नाथ जी ने एक चमत्कार किया और सदन के दोनों हाथ वापस लौट आए। इस कथा का उल्लेख गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के भक्तमाल अंक में किया किया गया है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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इस जीवन के ज्ञान और अनुभव के साथ होता है दूसरा जन्म

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experience memory of last birth

अगर आप यह सोचते हैं कि इस जीवन में जो कुछ किया वह इसी जन्म तक आपके साथ रहेगा, ऐसा नहीं है। आप इस जन्म में जो भी ज्ञान और अनुभव प्राप्त करते हैं वह अगले जन्म में भी आपके साथ होता है और इसका लाभ आपको अगले जन्म में भी मिलता है। इसलिए इस जन्म में ही कर लें दूसरे जीवन को कामयाब बनाने की तैयारी।भगवान श्री कृष्ण ने गीता में इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि जब मनुष्य एक शरीर का त्याग करने लगता है तब शरीर द्वारा अर्जित ज्ञान और अनुभव सिमट कर आत्मा के केन्द्र में स्थित हो जाते हैं।

इसके बाद जब आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है तब उन ज्ञान और अनुभव को उस नए शरीर में भी पहुंचा देती है। इसलिए श्री कृष्ण कहते हैं- लभते पौर्वदेहिकम्।

श्री कृष्ण ने खुद बचपन में मिट्टी खाकर इस बात को प्रमाणित किया है क्योंकि इससे पूर्व श्री कृष्ण ने वराह अवतार लिया था। वराह मिट्टी कुरेदता है और खाता है। कहते हैं श्री कृष्ण के मिट्टी खाने की घटना के बाद से ही छोटे बच्चों में मिट्टी खाने लगे।अपने सुना या देखा होगा कि कुछ बालक ऐसे होते हैं जो अल्पायु में ही अपने ज्ञान और कार्यकलाप से बड़े-बड़े कारनामे करने लगते हैं। दरअसल यह पूर्वजन्मों के संचित ज्ञान और अनुभव का परिणाम होता है।

स्वामी रामसुखदासजी का कहना है कि पूर्वजन्म की साधन सामग्री मिलना ठीक उसी प्रकार है, जैसे किसी को रास्ते पर चलते-चलते नींद आने लगे और वह वहीं किनारे पर सो जाए। जब वह सोकर उठेगा, तो उतना रास्ता तो उसका तय किया हुआ रहेगी ही- बस वह आगे की यात्रा आरंभ कर देगा।
experience memory of last birth4

र्वजन्म की साधना वस्तुतः जीवात्मा पर संस्कारों की छाप छोड़ देती है। जितने अच्छे संस्कार पड़ चुके हैं, वे सभी इस नए जन्म में जागृत हो जाते हैं।

मनोवैज्ञानिक चिकित्सक डॉ० ब्रायन वायस ने अपनी पुस्तक मेनीलाइव्स मेनीमास्टर्स एवं मेसेजेस फ्राम मास्टर्स में लिखा है कि मनुष्य पूर्वजन्म की यादों को- बुद्धि को संग्रहीत करता चलता है।

इन्होंने इसके माध्यम से कई रोगियों को पूर्वजन्म की यादों में ले जाकर चिकित्सा करने की कोशिश की है और उन्हें इस काम में नब्बे प्रतिशत सफलता मिली है।
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बुधवार, 16 जुलाई 2014

सेब और कामुकता का रिश्ता

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पुरानी कहावत है कि रोज एक सेब खाइए और डॉक्टर को दूर रखिए. ताजा शोध से पता चला है कि सेब इससे भी अधिक काम करता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि रोजाना सेब खाने से महिलाओं का यौनजीवन बेहतर होता है.
ऐसे सबूत हैं कि फल या सब्जी से मिलने वाले एस्ट्रोजन, पोलीफेनोल्स और एंटीऑक्सिडेंट्स के नियमित सेवन और महिलाओं के यौन स्वास्थ्य के बीच गहरा संबंध है. लेकिन रोजाना सेब खाने और महिलाओं के यौनजीवन के संबंधों पर पहले कोई शोध नहीं हुआ था. अमेरिका की नेशनल सेंटर ऑफ बायोटेक्नॉलॉजी इंफॉर्मेशन के अनुसार शोधकर्ताओं ने रोजाना सेब खाने और महिलाओं की यौन सक्रियता के बीच संबंधों पर शोध किया है.
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 731 यौन सक्रिय इताल्वी महिलाओं का विश्लेषण किया. ये महिलाएं 18 से 43 वर्ष के बीच की थीं और उनका यौन विकार का कोई इतिहास नहीं था. शोध में अवसाद की शिकार और दवा का इस्तेमाल कर रही महिलाओं को शामिल नहीं किया गया. शोध के नतीजे आर्काइव्स ऑफ गाइनोकॉलोजी एंड आब्सटेट्रिक्स में छपे हैं. इस शोध के लिए महिलाओं को दो अलग अलग ग्रुप में बांटा गया. एक ग्रुप में वे महिलाएं थीं जो प्रतिदिन नियमित रूप से एक से दो सेब खा रही थीं. दूसरे ग्रुप में वे महिलाएं थीं जो सेब का (0-0.5 प्रतिदिन) सेवन नहीं कर रही थीं.
इन महिलाओं ने स्त्री यौन कार्य सूचकांक (एफएसएफआई) वाली प्रश्नावली का जवाब दिया. जिसमें 19 सवाल शामिल थे. महिलाओं से सेक्सुअल फंक्शन, यौन आवृति, चरम आनंद, उपस्नेहन और कुल मिलाकर यौन संतुष्टि के बारे में पूछा गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि, "सेब का रोजाना सेवन यौन सक्रिय महिलाओं में उच्च एफएसएफआई स्कोर से जुड़ा है. इस प्रकार से उनमें उपस्नेहन और समग्र यौन संतुष्टि बढ़ी."
शोधकर्ताओं का कहना है कि सेब का यौन संतुष्टि पर इसलिए बेहतर असर होता है क्योंकि रेडवाइन और चॉकलेट की तरह उनमें पॉलोफेनोल्स होते हैं और एंटीऑक्सिडेंट्स जननांग और योनि तक रक्त प्रवाह को प्रोत्साहित करने में मदद करते हैं, जिस कारण उत्तेजना में मदद मिलती है. सेब में फ्लोरीजिन भी पाए जाते हैं. फल और सब्जियों में पाया जाने वाला यह आम एस्ट्रोजन है और जो संरचनात्मक दृष्टि से एस्ट्राडियोल के समान है. यह महिला हार्मोन है और महिला कामुकता में बड़ी भूमिका निभाता है. बेशक अध्ययन की एक सीमा है. साथ ही शोध में अपेक्षाकृत छोटा सैंपल लिया गया था. हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि नतीजे दिलचस्प है.
रिपोर्ट: ए अंसारी (एनसीबीआई)
संपादन: महेश झा sabhar ;http://www.dw.de/

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शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा

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शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा

नई दिल्ली. देश के युवाओं को आजाद भारत का सपना दिखाने वाले महापुरुष विवेकानन्द का 4 जुलाई 1902 को निधन हुआ था। विवेकानंद के जीवन से जुड़ी तमाम कहानियां आज भी देशभर के कई विद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। 12 जनवरी, 1863 को एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लेने वाले विवेकानंद का पूरा जीवन देश सेवा और भारतीय संस्कृति के प्रसार में समर्पित था। वेदांत के विख्यात और एक प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु विवेकानंद ने वर्ष1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व कर पूरी दुनिया में भारत का डंका बजा दिया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक वेश्या ने नरेंद्र नाथ दत्त को उनके संन्यासी होने का अर्थ समझाया था। जानिए, पूरी दुनिया को अपनी तरफ आकर्षित करने वाले विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में।विवेकानंद का लोकप्रिय भाषण- 
1 सितंबर 1893 शिकागो (अमेरिका)

अमेरिका के बहनों और भाइयों

आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।
मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयों, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है: जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।

वर्तमान सम्मेलन जोकि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है: जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं।
 
सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।

साल 1898 में अल्मोडा में दिया व्याख्यान-  

स्वामी जी ने हिन्दी में अपना पहला भाषण राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में दिया था।

विवेकानंद के इस भाषण की मुख्य बात यह थी-  
ईश्वर एक है, सर्वव्यापी है
साल 1898 में अल्मोड़ा में अपना व्याख्यान देते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति के रास्ते या विचार अलग हो सकते है, लेकिन विभिन्न धर्मो को मानने वाले लोगों का लक्ष्य एक ही होता है। सर्वव्यापी ईश्वर से एकाकार। इसलिए दो समुदायों या समूहों में आपस की लड़ाई व्यर्थ है। स्वामी जी ने देशवासियों से धर्म-संप्रदाय संबंधी मतभेदों को भुलाकर देश हित के लिए अपने प्राण न्योछावर करने का उपदेश दिया। स्वामी जी के भाषणों का संग्रह कोलम्बो से अल्मोड़ा तक नाम से प्रकाशित हुआ है।
शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा

विवेकानंद ने शून्य से क्यों शुरू किया था अपना भाषण

दरअसल जब विवेकानंद साल 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करने के लिए वहां पहुंचे थे तो आयोजकों ने उनके नाम के आगे शून्य लिख दिया था। दरअसल आयोजक ऐसा करके उन्हें परेशान करना चाहते थे। भाषण देने की जगह पर विवेकानंद ने दो पेड़ों के बीच में एक सफेद कपड़ा बंधा हुआ पाया जिसके बीच में एक ब्लैक डॉट था। विवेकानंद इस बात को अच्छी तरह से समझ चुके थे। लिहाजा उन्होंने अपने भाषण की शुरूआत शून्य से की। 
शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा


शारदा मां के साथ घटी घटना-

स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था। इसलिए अमेरिका यात्रा पर जाने से पहले वो अपनी गुरु मां शारदा (स्वामी रामकृष्ण परमहंस की धर्मपत्नी) से आशीर्वाद लेना चाहते थे। वे गुरु माँ के पास गए, उनके चरण स्पर्श किए और उनसे कहा, मां, मुझे भारतीय संस्कृति पर बोलने के लिए अमेरिका से आमंत्रण मिला है। मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए। इस पर मां शारदा ने कहा कि तुम आशीर्वाद लेने कल आना पहले मैं देखूंगी कि तुम आशीर्वाद लेने के पात्र भी हो या नहीं। विवेकानंद असमंजस में पड़ गए, लेकिन उन्होंने गुरु मां की आज्ञा का पालन किया और अगले दिन तय समय पर उनके घर पहुंच गए। मां उस वक्त रसोई में थीं। विवेकानंद ने वहां पहुंचकर कहा मां मैं आशीर्वाद लेने आया हूं। इस पर मां ने कहा कि ठीक है आशीर्वाद तो तुझे मैं सोच-समझकर दूंगी। पहले तुम मुझे वह चाकू उठाकर दो मुझे सब्जी काटनी है। विवेकानंद ने चाकू उठाया और मां की तरफ बढ़ा दिया। चाकू लेते हुए ही मां शारदा ने अपने आशीर्वचनों से स्वामी विवेकानंद को नहला दिया। वे बोलीं, 'जाओ नरेंद्र मेरे समस्त आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं।' नरेंद्र को समझ नहीं आया कि आखिर इस चाकू का इस आशीर्वाद से क्या नाता है। जब विवेकानंद का मन शांत नहीं हुआ तो उन्होंने मां से ही पूछ लिया कि मां आपने मुझसे चाकू क्यों उठवाया। इस पर उन्होंने बताया कि जब भी कोई दूसरे को चाकू पकड़ाता है तो धार वाला सिरा पकड़ाता है पर तुमने ऐसा नहीं किया।  

शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा

वेश्या ने कराया नरेंद्र को संन्यासी होने का अहसास 

विवेकानंद अमेरिका जाने से पहले जयपुर के एक महाराजा के महल में रुके थे। वह महाराजा विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस का भक्त था। विवेकानंद के आगमन पर उन्होंने एक भव्य आयोजन रख दिया। इस आयोजन में वेश्याओं को भी बुलवाया गया। राजा यह भूल गया कि वेश्याओं के जरिए एक सन्यासी का स्वागत करना उचित नहीं है। विवेकानंद अभी अपरिपक्‍व थे। वे अभी पूरे संन्‍यासी नहीं बने थे। वो अपनी कामवासना और हर चीज दबा रहे थे। जब उन्‍होंने वेश्‍याओं को देखा तो उन्‍होंने अपना कमरा बंद कर लिया और बाहर नहीं आए। जब महाराजा को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने विवेकानंद से क्षमा मांगी। महाराजा ने कहा कि उन्होंने वेश्या को इसका रुपया दे दिया है, लेकिन यह जैसा कि देश की सबसे बड़ी वेश्या है तो अगर इसको ऐसे चले जाने को कहेंगे इसका अपमान होता। आप कृपा करके बाहर आएं। विवेकानंद बाहर आने में डर रहे थे। इतने में वेश्या ने गाना गाना शुरू किया, फिर उसने एक सन्यासी गीत गाया। गीत बहुत सुंदर था। गीत का अर्थ था: मुझे मालूम है कि मैं तुम्‍हारे योग्‍य नहीं, तो भी तुम तो जरा ज्‍यादा करूणामय हो सकते थे। मैं राह की धूल सही, यह मालूम मुझे। लेकिन तुम्‍हें तो मेरे प्रति इतना विरोधात्‍मक नहीं होना चाहिए। मैं कुछ नहीं हूं। मैं कुछ नहीं हूं। मैं अज्ञानी हूं। एक पापी हूं। पर तुम तो पवित्र आत्‍मा हो। तो क्‍यों मुझसे भयभीत हो तुम? बताया जाता है कि विवेकानंद ने अपने कमरे में सुना। वह वेश्‍या रो रही थी। और गा रही थी। उन्होंने उस पूरी स्थिति का अनुभव किया और सोचा कि वो क्या कर रहे हैं। यह बचकानी बात थी। विवेकानंद से रहा नहीं गया और उन्होंने दरवाजे खोज दिए। विवेकानंद एक वेश्या से पराजित हो गए। वो बाहर आए और बैठ गए। फिर उन्होंने डायरी में लिखा, ,ईश्‍वर द्वारा एक नया प्रकाश दिया गया है मुझे। भयभीत था मैं। जरूर कोई लालसा रही होगी। मेरे भीतर। इसीलिए भयभीत हुआ मैं। किंतु उस स्‍त्री ने मुझे पूरी तरह से पराजित कर दिया था। मैंने कभी नहीं देखी ऐसी विशुद्ध आत्‍मा। उस रात उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा, अब मैं उस स्‍त्री के साथ बिस्‍तर में सो भी सकता था और कोई भय न होता। इस घटना ने विवेकानंद को तटस्थ होने की सीख दी और यह बतलाया कि मन दुर्बल है और निस्‍सहाय है। इसलिए कोई दृष्‍टि कोण तय मत कर लेना।

खेतड़ी का प्रसंग-
खेतड़ी में ही स्वामी विवेकानंद ने राजपण्डित नारायणदास शास्त्री के सहयोग से पाणिनी का और पतंजलि का का अध्ययन किया था। स्वामीजी ने व्याकरणाचार्य और पाण्डित्य के लिए विख्यात नारायणदास शास्त्री को लिखे पत्रों में मेरे गुरु कहकर सम्बोधित किया है। अमेरिका जाने से पहले अजीत सिंह के निमंत्रण पर 21 अप्रैल 1893 को स्वामी जी दूसरी बार खेतड़ी गए। उन्होंने 10 मई 1893 तक खेतड़ी में प्रवास किया। इसी दौरान एक दिन अजीत सिंह स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे शास्त्र चर्चा कर रहे थे। तभी नर्तकियों ने वहां आकर गायन वादन का अनुरोध किया। इस पर संन्यासी होने के नाते स्वामीजी उसमें भाग नहीं लेना चाहते थे और वह उठकर जाने लगे तो नर्तकियों की दल नायिका मैनाबाई ने आग्रह किया कि स्वामीजी आप भी विराजें, मैं यहां भजन सुनाऊंगी इस पर स्वामी जी बैठ गए। नर्तकी मैनाबाई ने महाकवि सूरदास रचित प्रसिद्ध भजन प्रभू मोरे अवगुण चित न धरो। समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो, सुनाया तो स्वामी जी की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने उस पतिता नारी को ज्ञानदायिनी मां कहकर सम्बोधित किया और तथा कहा कि तुमने आज मेरी आंखे खोल दी हैं। इस भजन को सुनकर ही स्वामीजी सन्यासोन्मुखी हुए और जीवन पर्यन्त सद्भाव से जुड़े रहने का व्रत धारण किया।
शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा
जब डॉयसन ने माना विवेकानंद का लोहा- 

एक बार जर्मनी के संस्कृत विद्वान पॉल डॉयसन और स्वामी विवेकानंद किसी विषय पर बात कर रहे थे। इसी बीच में डॉयसन को जरूरी काम से उठ कर बाहर जाना पड़ा। उनके जाने के बाद स्वामी जी अकेले कमरे में इधर-उधर देखते रहे। अचानक उनकी नजर एक किताब पर पड़ी और वो उसे पढ़ने लगे। जब उनकी नजर पुस्तक से हटी तो डॉयसन उनके सामने बैठे थे। विवेकानंद ने उनसे कहा क्षमा कीजिए मुझे अंदाजा नहीं हो पाया कि आप आ चुके हैं। दरअसल मैं यह किताब पढ़ने में तल्लीन हो गया था। इसके बाद फिर से दोनों पुराने मुद्दे पर चर्चा करने लगे। इसी दौरान विवेकानंद ने हाल ही में पढ़ी किताब की लाइनों का जिक्र किया। इस पर डॉयसन ने कहा कि आपने इस किताब को कई दफे पढ़ा होगा। इसके जवाब में विवेकानंद ने कहा कि नहीं उन्होंने इस किताब को पहले कभी नहीं पढ़ा है बल्कि अभी पढ़ा है। इस पर डॉयसन को विश्वास नहीं हुआ उन्होंने कहा कि इतने कम समय में कोई पूरी किताब कैसे पढ़ सकता है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि अगर आप अपने चित्त को एकाग्र रखकर कुछ करते हैं तो कुछ भी संभव है।
 बदला विवेकानंद का नजरिया- 

अमेरिका प्रवास के दौरान विवेकानंद के सोचने का नजरिया बदल गया। विवेकानंद ने बताया कि भारत में धर्म चूल्हों और चौकों तक ही सीमित है और जात धर्म से ऊपर नहीं उठ पाया है। 

शिकागो में शून्य पर बोलने वाले नरेंद्र को जब एक वेश्या के सामने झुकना पड़ा

अरविंदों घोष से जुड़ा जीवन संयोग- 

अरविंदो घोष के भाई बरींद्र घोष (बरींद्रनाथ घोष) या बरीन घोष और नरेंद्र नाथ दत्त (विवेकानंद) के भाई भूपेंद्र नाथ दत्त क्रांतिकारी थे।
बरीन घोष और भूपेंद्र नाथ दत्त दोनों ही पत्रकार थे। बरीन घोष बंगाल के क्रांतिकारी पत्रिका जुगांतर के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और भूपेंद्र नाथ दत्त भी जुगांतर पत्रिका से जुड़े रहे sabhar :http://www.bhaskar.com/





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उदयपुर में पहली बार दिखा सूरजमुखी सांप, वन अधिकारी भी हुए हैरान

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उदयपुर में पहली बार दिखा सूरजमुखी सांप, वन अधिकारी भी हुए हैरान


(मधुबन स्थित गर्ल्स हॉस्टल परिसर में मिला सूरजमुखी सांप)
 
उदयपुर. शहर के मधुबन स्थित जनजाति बालिका छात्रावास परिसर में रविवार रात दुर्लभ एल्बाइनो सांप मिला। यह सूरजमुखी है, जो पूरा सफेद है। वन्यजीव विशेषज्ञों का दावा है कि राजस्थान में इसे पहली बार देखा गया है। ऐसे में इसे देखे जाने का रिकॉर्ड उदयपुर के नाम रहेगा। बीती शाम हॉस्टल परिसर में सांप दिखने की सूचना मिली थी। इस पर स्नेक कैचर पदम सिंह राठौड़ पहुंचे। राठौड़ ने बताया कि सांप को देखा तो काफी अचंभा हुआ, क्योंकि यह एक बच्चा था जो शहर और जिले में अब तक मिले सांपों में से सबसे अलग था। इसकी आंखें लाल थीं और आकार में भी बहुत छोटा था।
 
राठौड़ ने वन्यजीव विशेषज्ञ और एसीएफ डाॅ. सतीश शर्मा को फोन पर इसकी जानकारी दी। सुबह डॉ. शर्मा ने बताया कि यह एल्बाइनो सांप है, जो कॉमन ट्रिक्रेट्स (वैज्ञानिक नाम : एलीफास हेलेना) है और यह कोलूब्रिडी फैमिली का है। सांप को बड़ी रोड के पास वन क्षेत्र में सुरक्षित छोड़ा गया है।
 
वन अधिकारियों ने बताया कि एल्बाइनो सफेद रंग का होता है, जिसकी आंखें लाल होती हैं। आंखों में पिग्मेंटेशन नहीं होने से इन्हें रोशनी में डर लगता है। इसलिए ये अंधेरे स्थानों पर झाड़ियों में छिपकर रहते हैं और रात को ही निकलते हैं। यह सांप सवा मीटर तक बढ़ता है। इस सांप के अगले हिस्से में चकत्ते होते हैं और पिछले हिस्से में धारियां होती हैं।
 
आनुवांशिक गड़बड़ी से पैदा होने वाले एल्बाइनो में नहीं होता जहर
 
एसीएफ डॉ. शर्मा ने बताया कि एल्बाइनो सांप को स्थानीय भाषा में सर्प सुंदरी भी कहा जाता है। यह सरिसृपों की आनुवांशिक गड़बड़ी है, जिसके कारण इस सांप में रंग उत्पन्न नहीं होता है। इसकी स्किन सफेद हो जाती है और आंखें लाल होती हैं। ऐसे जीव दुर्लभ होते हैं। राजस्थान में एल्बाइनो सांप पहली बार देखा गया है। प्रदेश में इंडिया रोबिन, ग्रे पार्ट्रिज, गिलहरी, नेवला, बिज, लार्ज ग्रे वेटलर प्रजाति के जीवों के एल्बाइनो केस पाए जाने का रिकॉर्ड भी राजस्थान में उदयपुर के नाम है।

उदयपुर में पहली बार दिखा सूरजमुखी सांप, वन अधिकारी भी हुए हैरान

(इन सांपों को रोशनी में डर लगता है। इसलिए ये अंधेरे स्थानों पर झाड़ियों में छिपकर रहते हैं और रात को ही निकलते हैं।)

उदयपुर में पहली बार दिखा सूरजमुखी सांप, वन अधिकारी भी हुए हैरान

(यह सांप सवा मीटर तक बढ़ता है। इस सांप के अगले हिस्से में चकत्ते होते हैं और पिछले हिस्से में धारियां होती हैं।)
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मंगलवार, 15 जुलाई 2014

वो अपनी दुनिया में इंसानों को आने नहीं देते, जानिए उन स्थानों के बारे में जहां इंसानों को जाने की मनाही है

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इस दुनिया में बहुत सी ऐसी जगह हैं, जहां इंसानों के जाने की मनाही है. ऐसा माना जाता है कि यहां मृत लोगों की आत्माओं का वास है, इसलिए यहां जीवित मनुष्यों के आने से उनकी शांति में खलल पैदा हो सकता है. जाहिर तौर पर अपनी दुनिया में किसी और का दखल उन्हें बर्दाश्त नहीं होता और वे हर संभव कोशिश कर उन घुसपैठियों को भगाने की जुगत में जुट जाते हैं. आज हम आपको कुछ ऐसे ही स्थानों का पता बता रहे हैं, जहां इंसानों का जाना निषेध है या फिर किसी ना किसी भय के कारण स्वयं मनुष्य ने ही वहां जाना प्रतिबंधित किया हुआ है.

क्राइस्ट ऑफ द एबीज, इटली: 17 मीटर गहराई में 22 अगस्त,1954 को क्राइस्ट की विशालकाय पीतल की मूर्ति को पानी के अंदर रखा गया है. इस तरह की कई मूर्तियां अलग-अलग स्थानों पर मौजूद हैं लेकिन यहां आने-जाने वाला कोई नहीं है.
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कोलमैंस्कॉप, नामिब रेगिस्तान: दक्षिणी नामीबिया के नामिब रेगिस्तान में स्थित है घोस्ट टाउन या भूतहा शहर. बहुत पहले की बात है इस रेगिस्तान में बहुत भयंकर रेतीला तूफान आया था. इस तूफान से बचने के लिए डिलिवरी ब्वॉय जॉन कोलमैन अपनी बैलगाड़ी को वहीं छोड़कर भाग गया था. तूफान शांत होने के बाद ना तो उसकी बैलगाड़ी मिली और ना ही वो खुद. कभी बहुत छोटा सा रेगिस्तान जो खनन के लिए प्रसिद्ध था आज एक टूरिस्ट स्थल है लेकिन दहशत भरी दास्तां ज्यादा लोगों को यहां आने नहीं देती.
kolmanskop
डोम हाउस, दक्षिण-पश्चिमी फ्लोरिडा: नैपल्स में वर्ष 1981 में बनाए गए इगलू के डिजाइन के ये घर, भविष्य को ध्यान में रखकर निर्मित किए गए हैं. लेकिन अफसोस सरकारी मसलों में उलझने के बाद अभी तक इन्हें पूरा नहीं करवाया जा सका इसलिए अभी तक यहां लोगों की पहुंच नहीं बन पाई है.
dome houses

वंडरलैंड एम्यूजमेंट पार्क, बीजिंग: बीजिंग (चीन) से करीब 20 मील दूरी पर स्थित इस एम्यूजमेंट पार्क के निर्माण का काम कई बार शुरू हुआ पर किसी ना किसी वजह से वह अधूरा ही रहा. वर्ष 1998 में इसलिए रुका क्योंकि इसे बनाने के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी तो वर्ष 2008 में किसी अन्य कारण ने इस एम्यूजमेंट पार्क का निर्माण नहीं होने दिया. स्थानीय लोग इस स्थान को श्रापित मानते हैं और यहां आना-जाना पसंद नहीं करते.

प्रिप्यात, यूक्रेन: उत्तरी यूक्रेन स्थित प्रिप्यात एक घोस्ट टाउन के तौर पर जाना जाता है. इस स्थान पर ज्यादा लोग आना-जाना पसंद नहीं करते.
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अंगकोर वाट, कम्बोडिया: हिंदू धर्म से संबंधित दुनिया का सबसे बड़ा कॉम्प्लेक्स और विशाल समाधि वाला मंदिर है. खमेर के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने 12वीं शताब्दी की शुरुआत में यशोधरापुर (खमेर की राजधानी) में इस मंदिर का निर्माण करवाया था. उस दौर के सभी राजा शैव धर्म से संबंधित मंदिरों का निर्माण करवा रहे थे लेकिन ये मंदिर संपूर्ण रूप से विष्णु को समर्पित है. पहले ये मंदिर हिन्दुओं के लिए धार्मिक स्थल था, आज बौद्ध धर्म के अनुयायी इस मंदिर में आते हैं.

एल होटल डेल सेल्टो, कम्बोडिया: कम्बोडिया की राजधानी बगोटा से करीब 30 मील दूरी पर स्थित ये होटल पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है. वर्ष 1928 में इस होटल का निर्माण अमीर पर्यटकों के लिए विशेषतौर पर किया गया था. लेकिन जैसे-जैसे बगोटा नदी दूषित होने लगी उसके किनारे बना यह होटल भी पर्यटकों की दिलचस्पी से हाथ धोता रहा. इस होटल में कई लोगों ने आत्महत्या भी की है और लोगों का मानना है कि यहां उनकी आत्माएं भटकती हैं. इस कारण यहां अब लोगों का आना-जाना बंद है.



नारा ड्रीमलैंड, जापान: वर्ष 1961 में कोलंबिया के डिज्नीलैंड से प्रेरित होकर बनाया गया जापान का यह पार्क, जुलाई 2006 में स्थायी तौर पर बंद कर दिया गया क्योंकि यहां पर्यटकों की जान को हमेशा खतरा रहता था.sabhar :http://infotainment.jagranjunction.com/

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इस एक शरीर में दो लोग रहते हैं, पढ़िए उस बहन की कहानी जिसका अस्तित्व मर कर भी नहीं मिटा

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अकसर लोग जब अपने बारे में किसी को बताते हैं तो वो अपने जन्म की तारीख, शादी की तारीख या फिर अपने जीवन से जुड़ी ऐसी ही कुछ बातों को सामने रखते हैं. लेकिन क्या आपने कभी कहीं पढ़ा है कि एक शख़्स अपने परिचय में शरीर के अंगों का भी विवरण दे रहा हो? जैसे; ‘मेरे दो हाथ, एक आंख और दो कान है’. ये सरासर बेवकूफी है लेकिन कोई है जिसे ऐसा भी करने की जरूरत पड़ती है. वो दुनिया से अलग है और अपने परिचय में उसे यह कहना पड़ता है कि ‘मेरे दो नहीं बल्कि चार पैर है’.

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ये हैं मायरटल कॉर्बिन

मायरटल कॉर्बिन का जन्म यूनाइटेड स्टेट के टेनेसी में हुआ. उसके जन्म ने हर किसी को हैरान कर दिया. बेहद मासूम व प्यारी मायरटल बाकी लोगों की तुलना में केवल एक अंतर लेकर इस दुनिया में आई थी और वो है उसके चार पैर. जी हां, मायरटल के दो नहीं बल्कि चार पैर हैं, दो सामान्य उसी स्थान पर और बाकी दो टांगें उनके ठीक बीचोबीच एक अलग अंग से जुड़ी है जो मायरटल की कमर के बीच से आती हैं.

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डॉक्टरों की मानें तो मायरटल के साथ जुड़े दो अलग पांव कमजोर हैं और मायरटल पूर्ण रूप से उनपर काबू भी नहीं पा सकती. ये पैर उनके दूसरे पैरों के मुकाबले में छोटे व नाजुक हैं.ये पैर मायरटल के नहीं किसी और के हैं

डॉक्टरों के मुताबिक बीच की दो टांगें उसकी खुद की नहीं बल्कि उसकी डायपिजस जुड़वा बहन की हैं. अब आप शायद इस बात को समझ ना पा रहे हों और यह आपको कुछ अटपटा लग रहा हो, लेकिन यह सच है.

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मायरटल के साथ जुड़ी वो दो अलग टांगें उसके जुड़वा बहन की है जो इस दुनिया में आ नहीं आई. डॉक्टरों का कहना है कि कई बार जो जुड़े हुए जुड़वा बच्चे होते हैं उनमें से एक के शरीर का तो पूरा आकार बन जाता है लेकिन दूसरे के शरीर के कुछ हिस्से पहले वाले बच्चे के साथ जुड़ जाते हैं. इसका मतलब है कि मायरटल की एक जुड़वा बहन थी जो कि उसके पैदा होने से पहले उनकी मां के गर्भ में थी. लेकिन जन्म केवल मायरटल का हुआ जो जन्म के साथ अकेली नहीं आई बल्कि अपनी जुड़वा बहन के पैर साथ लेकर आई.

अजब-गजब है ये दुनिया

यह अजीब और विचित्र ही तो है कि आप अपने जन्म के साथ किसी दूसरे के शरीर के अंगों को साथ लेकर आए हो. डॉक्टरों के अनुसार मायरटल अपने अजन्मी बहन के अंग पर काबू तो पा सकती थी, लेकिन चलते समय उनका उपयोग करना उसके लिए काफी चुनौतीपूर्वक था. यह भी कहा गया कि उन दो टांगों से जुड़े उन दो पैरों में केवल 3-3 उंगलियां ही थी.  मायरटल की इस विचित्र बात ने उसे दुनिया भर में मशहूर भी बनाया. जब वो केवल 13 साल की थी तब उसके जीवन पर एक जीवनी लिखी गई, ‘बायोग्राफी ऑफ मायरटल कॉर्बिन’.

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मायरटल ने भी की शादी

मायरटल की एक बहन भी थी जिसका नाम विल्ले एन था. उसकी शादी लॉक बिकनैल नाम के लड़के से वर्ष 1885 में हुई थी. लॉक का एक भाई था डॉक्टर जेम्स क्लिंटन बिकनैल जिसने अपने भाई की शादी के कुछ समय बाद ही मायरटल के आगे शादी का प्रस्ताव रख दिया.

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मायरटल और जेम्स की शादी एक सच्चे प्यार को बयां करती है. यहां एक और बात काफी अहम है और वो यह कि ना केवल मायरटल बल्कि उसकी अजन्मी बहन भी यौन संबंध बना सकती है. यानि कि मायरटल के शरीर में एक नहीं बल्कि दो योनि मौजूद थी.

कहा जाता है कि मायरटल ने आठ बच्चों को जन्म दिया था जिनमें से तीन का बचपन में ही निधन हो गया था. मायरटल के बच्चों के संदर्भ में यह भी कहा गया है कि उसके तीन में से दो बच्चे उसकी योनि से पैदा हुए थे और बाकी दो दूसरी योनि से. अब यह तथ्य सच है या नहीं लेकिन चिकित्सकीय रूप से देखा जाए तो ऐसा होना संभव माना गया है. sabhar :http://infotainment.jagranjunction.com/

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