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गुरुवार, 20 जुलाई 2023

सरोगेसी से पिता बनने वाले एक व्यक्ति की कहानी

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 प्रीतेश दवे की किस्मत में सरकारी नौकरी नहीं थी. इसी वजह से उनकी शादी नहीं हो पाई.


लेकिन उन्हें बच्चे बहुत पसंद हैं और वो बिना शादी किए भी परिवार बढ़ाना चाहते थे. ऐसे में उन्होंने सरोगेसी का सहारा लेने का निर्णय किया.


वो संभवत: बिना शादी के जुड़वां बच्चों के सिंगल फ़ादर (एकल पिता) बनने वाले चंद आख़िरी लोगों में से एक हैं.


आज वो एक बेटे और एक बेटी की परवरिश कर रहे हैं. दोनों बच्चे एक साल के होने वाले हैं. प्रीतेश दवे ख़ुशकिस्मत रहे कि नया सरोगेसी क़ानून लागू होने से कुछ दिन पहले ही वो सरोगेट फ़ादर बने, वरना अब ऐसा करना उनके लिए मुमकिन नहीं होता.

प्रीतेश की मां दादी बनकर खुश हैं

प्रीतेश 37 साल के हैं और सिंगल हैं. वह कहते हैं कि उनके पास कई लड़कियों के रिश्ते आते थे, लेकिन जब उन्हें पता लगता कि उनके पास सरकारी नौकरी नहीं है तो लड़कियां मना कर देती थीं

आर्थिक रूप से अच्छे होने के बावजूद उनकी शादी नहीं हो पा रही थी. वो ज़्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं. उन्होंने सिर्फ 12वीं तक ही पढ़ाई की है. वो कहते हैं कि एक ये वजह भी थी उन्हें शादी के लिए लड़की ना मिलने की.

बीबीसी गुजराती से बात करते हुए प्रीतेश दवे कहते हैं, ''मेरे समाज में ऐसे कई पुरुष हैं, जिन्हें शादी के लिए लड़कियां नहीं मिलीं, क्योंकि माता-पिता अपनी बेटियों की शादी सरकारी नौकरी वाले युवाओं से करना पसंद करते हैं. हमारे पास ज़मीन और संपत्ति है, लेकिन यह उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है. उनके लिए केवल सरकारी नौकरी अहम है”

प्रीतेश के पिता भानुशंकर दवे के मुताबिक़, “हमारी जाति में ‘साटा’ प्रथा है. इसका मतलब है एक बेटी देना और दूसरी लेना. काफ़ी तलाश करने पर भी प्रीतेश के लिए लडकी नहीं मिल पाई.”

प्रीतेश, भावनगर में एक राष्ट्रीयकृत बैंक के लिए ग्राहक सेवा केंद्र चलाते हैं. उनके माता-पिता सूरत में रहते हैं.

वो सूरत और भावनगर के बीच आते-जाते रहते थे. इस बीच उन्हें अकेलापन महसूस होता था और वह शादीशुदा न होते हुए भी पिता बनना चाहते थे, इसलिए उन्हें कुछ लोगों ने सरोगेसी का सुझाव दिया.

प्रीतेश दवे कहते हैं, "मैं सरोगेसी के ज़रिए पिता बनने पर गौरवान्वित हूं और अपने आपको भाग्यशाली भी मानता हूं क्योंकि अब नए क़ानून के मुताबिक़, मेरे जैसा अविवाहित पुरुष सरोगेसी के ज़रिए पिता नहीं बन सकता. "

अहमदाबाद के बांझपन विशेषज्ञ और प्रीतेश के सरोगेसी सलाहकार डॉक्टर पार्थ बाविसी कहते हैं, ''उन्हें शादी न कर पाने का अफ़सोस है. वो एक भरा-पूरा परिवार चाहते थे. इसलिए वो अपनी ये इच्छा लेकर मेरे पास आए.”

जुड़वां बच्चों के पिता बने

प्रीतेश के लिए पिता बनने का क्षण महत्वपूर्ण था. प्रीतेश कहते हैं, “जब वो दोनों बच्चे मेरी दुनिया में आए तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं हंसू या रोऊं. शुरुआत में वो कमज़ोर थे तो उन्हें इनक्यूबेटर में रखा गया. जब पहली बार मैंने उन्हें गोद में उठाया तो वो मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा पल था. मैं उसे बयां नहीं कर सकता.”

डॉक्टर पार्थ बाविसी बताते हैं, ''तब प्रीतेश को देखकर ऐसा लगा जैसे उन्हें दुनिया की सारी ख़ुशियां मिल गईं. ऐसा लग रहा था मानो वो यक़ीन ही नहीं कर पा रहे थे कि वो पिता बन चुके हैं.”

प्रीतेश के पिता भानुशंकर दवे और मां दिव्यानी दवे दादा-दादी बनने की ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे हैं.

भानुशंकर कहते हैं, ''बच्चों के बिना घर बड़ा सूना सा लगता था. अब मानो ये पूरा घर ख़ुशी की रोशनी से जगमगा उठा है. कुदरत की कृपा से घर में बेटी और बेटा दोनों ही आ गए.”

प्रीतेश की मां दिव्यानी दवे भी कहती हैं, ''इन दोनों के आने से हमें एक अनमोल ख़ज़ाना मिल गया है. मेरी दादी बनने की तमन्ना भी पूरी हो गई. और भाई को बहन और बहन को भाई मिल गया. ''

परिवार ने बेटे का नाम धैर्य और बेटी का नाम दिव्या रखा है.

शादी ना होने का अफ़सोस नहीं’

प्रीतेश का कहना है कि उन्हें बच्चे होने के बाद शादी ना करने का कोई अफ़सोस नहीं है.

क्या पसंद की लड़की मिलने पर वो शादी करना चाहेंगे? ये पूछने पर प्रीतीश कहते हैं, “धैर्य और दिव्या के आने के बाद, मैं अब शादी नहीं करना चाहता. मुझे नहीं पता कि मेरी भावी पत्नी बच्चों की देखभाल ठीक से करेगी या नहीं तो मैं अकेला ही उनकी देखभाल करके ख़ुश हूं. अब मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य है- अपने बच्चों का अच्छे से पालन-पोषण करना."

भानुशंकर दवे कहते हैं, “हमारा पोते-पोतियों के साथ खेलने का सपना पूरा हो रहा है.”

दिव्यानी दवे कहती हैं, ''इन दोनों को पालने में हमारा समय कहां निकल जाता है, पता ही नहीं चलता. दोनों लड़के-लड़की में हमें फ़र्क नहीं पड़ता. दोनों मेरे प्रिय हैं.”

सरोगेसी के प्रकार

सरोगेसी दो प्रकार की होती है. पारंपरिक सरोगेसी और गर्भकालीन सरोगेसी.

पारंपरिक सरोगेसी- जिसमें पिता या दाता के शुक्राणु का मिलन सरोगेट मां के अंडों से किया जाता है.

फिर डॉक्टर कृत्रिम रूप से शुक्राणु को सीधे सरोगेट महिला के गर्भाशय ग्रीवा, फैलोपियन ट्यूब या गर्भाशय में इंजेक्ट करता है. सरोगेट मां के गर्भ में भ्रूण का निर्माण होता है और फिर सरोगेट मां उस भ्रूण को नौ महीने तक अपने गर्भ में रखती है. इस मामले में सरोगेट मां ही बच्चे की जैविक मां होती है.

यदि इस मामले में पिता के शुक्राणु का उपयोग नहीं किया गया है, तो पुरुष दाता के शुक्राणु का उपयोग किया जा सकता है. यदि दाता के शुक्राणु का उपयोग किया गया था, तो पिता आनुवंशिक रूप से बच्चे से संबंधित नहीं होता है.

गर्भकालीन सरोगेसी- इस सरोगेसी में, सरोगेट मां आनुवंशिक रूप से बच्चे से संबंधित नहीं होती है.

यानी जेस्टेशनल सरोगेसी में सरोगेट मां के अंडों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. वह सिर्फ़ बच्चे को जन्म देती है. इस मामले में सरोगेट मां बच्चे की जैविक मां नहीं है. जेस्टेशनल सरोगेसी में पिता के शुक्राणु और मां के अंडे को मिलाकर सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है.

इसमें आईवीएफ विधि से भ्रूण का निर्माण किया जाता है और सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है.

इस प्रकार, आईवीएफ का उपयोग पारंपरिक सरोगेसी में भी किया जाता है.

सरोगेसी के प्रकार

सरोगेसी दो प्रकार की होती है. पारंपरिक सरोगेसी और गर्भकालीन सरोगेसी.

पारंपरिक सरोगेसी- जिसमें पिता या दाता के शुक्राणु का मिलन सरोगेट मां के अंडों से किया जाता है.

फिर डॉक्टर कृत्रिम रूप से शुक्राणु को सीधे सरोगेट महिला के गर्भाशय ग्रीवा, फैलोपियन ट्यूब या गर्भाशय में इंजेक्ट करता है. सरोगेट मां के गर्भ में भ्रूण का निर्माण होता है और फिर सरोगेट मां उस भ्रूण को नौ महीने तक अपने गर्भ में रखती है. इस मामले में सरोगेट मां ही बच्चे की जैविक मां होती है.सरोगेसी से पिता बनने वाले एक व्यक्ति की कहानी

यदि इस मामले में पिता के शुक्राणु का उपयोग नहीं किया गया है, तो पुरुष दाता के शुक्राणु का उपयोग किया जा सकता है. यदि दाता के शुक्राणु का उपयोग किया गया था, तो पिता आनुवंशिक रूप से बच्चे से संबंधित नहीं होता है.

गर्भकालीन सरोगेसी- इस सरोगेसी में, सरोगेट मां आनुवंशिक रूप से बच्चे से संबंधित नहीं होती है.

यानी जेस्टेशनल सरोगेसी में सरोगेट मां के अंडों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. वह सिर्फ़ बच्चे को जन्म देती है. इस मामले में सरोगेट मां बच्चे की जैविक मां नहीं है. जेस्टेशनल सरोगेसी में पिता के शुक्राणु और मां के अंडे को मिलाकर सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है.

इसमें आईवीएफ विधि से भ्रूण का निर्माण किया जाता है और सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है.

इस प्रकार, आईवीएफ का उपयोग पारंपरिक सरोगेसी में भी किया जाता है. Sabhar BBC.COM 

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बुधवार, 19 जुलाई 2023

मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करने का मामला क्या है?

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 मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच बीते ढाई महीनों से जारी हिंसक संघर्ष के बीच बीते बुधवार मणिपुर की दो महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न का एक भयावह वीडियो सामने आया है.

मणिपुर पुलिस ने इस वीडियो की पुष्टि करते हुए बताया है कि ये महिलाएं बीती चार मई को मणिपुर के थोबल ज़िले में यौन उत्पीड़न का शिकार हुई थीं.

मणिपुर पुलिस ने बताया, ''ये घटना चार मई की है. मामले में अपहरण, गैंगरेप और हत्या का मामला अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया है. मामले में जांच शुरू हो गई है. पुलिस दोषियों को पकड़ने की पूरी कोशिश कर रही है.''

ये वीडियो सामने आने के बाद से केंद्र से लेकर विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं की ओर से इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रियाएं देखी जा रही हैं.

कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों ने इस मामले में सत्तारूढ़ दल बीजेपी को घेरने की कोशिश की है.


वहीं, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति इरानी ने ट्विटर पर लिखा है कि उन्होंने इस मुद्दे पर राज्य के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह से बात की है और दोषियों को पकड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी.

अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के मुताबिक़, कुकी-ज़ोमी समुदाय से जुड़ी इन महिलाओं के साथ चार मई को मैतेई बहुल थोबल ज़िले में यौन उत्पीड़न हुआ था.


हालांकि, इनके साथ हुए यौन उत्पीड़न की एफ़आईआर 18 मई को कांगपोकपी ज़िले में दर्ज की गई. इसके बाद इस केस को संबंधित पुलिस थाने में भेज दिया गया.


मणिपुर पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी एसपी के मेघचंद्र सिंह ने इस घटना पर जारी प्रेस नोट में कहा है कि मणिपुर पुलिस दोषियों को पकड़ने की पूरी कोशिश कर रही है. लेकिन अब तक इस मामले में किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया है.


वीडियो में दिख रही एक महिला की उम्र लगभग 20 वर्ष और दूसरी महिला की उम्र 40 वर्ष बताई जा रही है.


इन महिलाओं ने अपनी शिकायत में बताया है कि वीडियो में सिर्फ़ दो महिलाएं नज़र आ रही हैं लेकिन भीड़ ने एक 50 वर्षीय महिला को भी कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया था.


एफ़आईर में कहा गया है कि एक युवा महिला के साथ दिन दहाड़े सामुहिक बलात्कार भी किया गया.


पीड़िताओं ने बताया है कि तीन मई को आधुनिक हथियारों से लैस 800 से लेकर 1000 लोगों ने थोबल ज़िले में स्थित उनके गांव पर हमला बोला. और इन लोगों ने गांव में लूटपाट करने के साथ ही आग लगाना शुरू कर दिया.

मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करने का मामला क्या है?

ऐसी स्थिति में दो महिलाओं और युवा महिला अपने पिता और भाई के साथ जंगलों की ओर भागे.


शिकायत के मुताबिक़, पुलिस इन महिलाओं को बचाने में कामयाब भी हुई. पुलिस इन लोगों को थाने लेकर जा रही थी लेकिन थाने से दो किलोमीटर पहले ही भीड़ ने उन्हें रोक लिया.


इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने इन महिलाओं को पुलिस से छीन लिया जिसके बाद युवा महिला के पिता को मौके़ पर ही मार दिया गया.


एफ़आईआर के मुताबिक़ तीनों महिलाओं को भीड़ के सामने निर्वस्त्र होकर चलने के लिए विवश किया गया और युवा महिला के साथ सरेआम गैंगरेप करने का आरोप है. एफ़आईआर के मुताबिक़ जब इस महिला के 19 वर्षीय भाई ने उसे बचाने की कोशिश की तो उसे भी मार दिया गया. Sabhar BBC.COM 

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कुमाऊं का पहला आध्यात्मिक गांव बनेगा कटारमल, कत्यूरी वंश के शासक की है धरोहर

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 कत्यूरी वंश के शासक राजा कटारमल की ओर से इसे बनवाया गया था। उत्तर भारत की कत्यूर वास्तुकृतियों में विशिष्ट स्थान रखने वाली धरोहर अब को अध्यात्मिक गंतव्य के रूप में विकसित किया जाएगा। स्वदेश दर्शन योजना के तहत क्षेत्र में कैफे योग व ध्यान केंद्र की सुविधा होगी

कुमाऊं के एकमात्र सूर्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध कटारमल पहले अध्यात्मिक गांव के रूप में विकसित होगा। स्वदेश दर्शन योजना के तहत 13 करोड़ रुपयों की लागत से गांव आध्यात्मिक गंतव्य (स्प्रिचुवल डेस्टिनेशन) के रूप में विकसित किया जाएगा। जिससे जिले की देश और विदेश में अलग पहचान बनने के साथ पर्यटन विकास में भी पंख लगेंगे।

पहाड़ों में अनुकूल मौसम व शांत वातावरण हमेशा से ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में न सिर्फ पर्यटक बल्कि भारी संख्या में श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। नगर से करीब 13 किमी दूर कटारमल स्थित कुमाऊं के एकमात्र सूर्य मंदिर में भी सीजन में काफी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचते हैं। कोणार्क के बाद भगवान सूर्य के धाम के रूप में सबसे पहले कटारमल स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर का नाम लिया जाता है। सैकड़ों वर्ष पूर्व कत्यूरी वंश के शासक राजा कटारमल की ओर से इसे बनवाया गया था। उत्तर भारत की कत्यूर वास्तुकृतियों में विशिष्ट स्थान रखने वाली धरोहर अब को अध्यात्मिक गंतव्य के रूप में विकसित किया जाएगा। स्वदेश दर्शन योजना के तहत क्षेत्र में कैफे, योग केंद्र और ध्यान केंद्र जैसी सुविधाएं शुरू होंगी। जिसके लिए पर्यटन विभाग की ओर से प्रस्ताव बनाया जा रहा है। 13 करोड़ की लागत से गांव में तमाम कार्य किए जाएंगे sabhar Jagran.com


पहाड़ों में अनुकूल मौसम व शांत वातावरण हमेशा से ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में न सिर्फ पर्यटक बल्कि भारी संख्या में श्रद्धालु भी पहुंचते हैं। नगर से करीब 13 किमी दूर कटारमल स्थित कुमाऊं के एकमात्र सूर्य मंदिर 

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एयरकंडीशनर अब बीते दिनों की बात होगी

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 एयरकंडीशनर अब बीते दिनों की बात होगी क्योंकि वैज्ञानिकों ने शीशे की ऐसी खिड़कियां तैयार कर ली हैं जो गर्मी में ठंडक और जाड़े में गर्मी का अहसास दिलाएगी। खास रसायन की परत वाले ये शीशे कम आय वाले लोगों के लिए एक अच्छी खबर है। भारत जैसे विकासशील देशों में तो खास किस्म की परत वाले शीशों से बनी खिड़कियां धूम मचा सकती हैं। 'क्वींसलैंड यूनीवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी' के शोधकर्ताओं ने कहा कि बड़ी मात्रा में ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार एयरकंडीशनर का यह 'इको फ्रेंडली' विकल्प होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार विभिन्न प्रकार के चमकदार परत वाले शीशों से घरों में बेतहाशा ऊर्जा की खपत कम कर 45 फीसदी तक बिजली की बचत हो सकेगी। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आयेगी। शोधकर्ता 'डॉ. बेल' के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों के उत्सर्जन में एयरकंडीशनरों का बहुत बड़ा हाथ है। उनके मुताबिक वातानुकूलित घरों और आफिसों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है । बेल ने कहा कि बाजार में उपलब्ध ये शीशे एयरकंडीशनर के मुकाबले तो कूलिंग नहीं करेंगे पर चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाने के लिए ये काफी हैं। ऐसे शीशे वाली खिड़कियों में टिंटेड ग्लास, फिर एयरगैप और उसके बाद खास किस्म की ऊष्मारोधी परत वाले लो-ई ग्लास का इस्तेमाल किया गया है। बेल के अनुसार अच्छी खिड़कियां घरों को ऊष्मारोधी बनाने में मदद करती हैं। इससे जाड़ों में घर गर्म रहता है और गर्मी में ठंडा । शोधकर्ता ने कहा कि शीशे पर रासायनिक परत वाले और खास किस्म की खिड़कियों के ढांचे जल्द ही हर घर की शोभा बढ़ाएंगे। sabhar dipak kohali vigyan pragati

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कोरोना के बाद भारत ने दुनिया में किया कमाल,

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 भारत की ग्रोथ स्टोरी को लेकर दुनिया में किसी को शक-ओ-शुब्हा नहीं है. दुनिया में चाहे आर्थिक सुस्ती का जितना असर हो लेकिन भारत की विकास दर लगातार कुलांचे भर रही है. अब एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के एशियन डेवलपमेंट आउटलुक अपडेट में 2023-24 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.4% पर बरकरार रखा गया है. ADB ने 2024-25 के लिए भी पहले की तरह 6.7% के विकास दर अनुमान को बनाए रखा है.

ADB के मुताबिक भारत की विकास दर में तेजी की वजह मजबूत डिमांड है. इसके पहले 2022-23 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.2% रही थी. देश की इकोनॉमी में ये इजाफा उस वक्त दर्ज किया गया जब अमेरिका और यूरोप समेत पश्चिमी देशों की अर्थव्यस्थाएं महंगाई के दबाव के सामने घुटने टेक चुकी थीं. लेकिन ये संकट अभी खत्म नहीं हुआ है क्योंकि IMF की MD क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने कहा है कि मिड टर्म में वैश्विक अर्थव्यवस्था में कमजोरी बने रहने की आशंका है. ऐसे में भारत की विकास दर को लेकर आया ADB का अनुमान देश की बढ़ती आर्थिक ताकत का सबूत है. यही नहीं, जॉर्जीवा ने भारत को आर्थिक सुस्ती की धुंध के बीच चमकता सितारा करार दिया है.  Sabhar aajtak.in

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शुगर फ़्री से कैंसर होने के सुबूत पर अब भी क्यों उठ रहे हैं सवाल

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  • जेम्स गैलेगर
  • पदनाम,स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता
  • कृत्रिम स्वीटनर (खाद्य पदार्थों को मीठा करने वाला पदार्थ) एस्पार्टेम को ‘कैंसर के कारकों’ में वर्गीकृत किए जाने के बावजूद इसके सेवन को लेकर सलाह में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन में विशेषज्ञों के दो समूह, हज़ारों वैज्ञानिक शोधों का अध्ययन कर रहे हैं.

  • ‘संभवतः कैंसर का कारण’ बताकर उसका वर्गीकरण करना आमतौर पर डर और असमंजस पैदा करता है, लेकिन इसका मतलब सिर्फ़ ये होता है कि मौजूदा सुबूत यक़ीन दिलाने के लिए नाकाफ़ी हैं.

  • अधिकतर लोग एस्पार्टेम की जो सुरक्षित उच्च सीमा है उससे कम ही खपत करते हैं, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह है कि जो लोग अधिक खपत करते हैं वो कम करें.

  • क्या है एस्पार्टेम
  • एस्पार्टेम l फ्री और डाइट खाद्य पदार्थों में पाया जाता है. ये पदार्थ प्राकृतिक चीनी से दो सौ गुणा अधिक मीठा होता है और इससे कैलोरी में खपत बेहद कम होती है.
  • कृत्रिम स्वीटनर (खाद्य पदार्थों को मीठा करने वाला पदार्थ) एस्पार्टेम को ‘कैंसर के कारकों’ में वर्गीकृत किए जाने के बावजूद इसके सेवन को लेकर सलाह में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

  •  प्रसिद्ध ब्रांड के खाद्य पदार्थों में ये होता है वो हैं- डाइट कोक, कोक ज़ीरो, पेप्सी मैक्स, सेवन अप फ्री. लेकिन ये स्वीटनर सिर्फ़ पेयजलों तक ही सीमित नहीं है बल्कि क़रीब छह हज़ार खाद्य पदार्थों में ये मिलता है. इनमें टूथपेस्ट से लेकर च्यूइंग गम तक शामिल हैं.

  • इस रसायन को 1980 के दशक में लाया गया था और व्यापक रूप से उपलब्ध होने के बावजूद, बाज़ार में आने के बाद से ही ये विवादों में रहा है.

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के पोषण और खाद्य सुरक्षा विभाग के निदेशक डॉ. फ्रांसेस्को ब्रांका से हमने यही सवाल किया कि स्वास्थ्य के लिए क्या बेहतर है- शुगर या स्वीटनर?

  • उन्होंने बताया, “अगर किसी के पास स्वीटनर के साथ कोला और शुगर के साथ कोला चुनने का विकल्प हो तो मुझे लगता है कि उसके सामने तीसरा विकल्प भी होना चाहिए, जो है सिर्फ पानी और मीठे खाद्य पदार्थों की खपत को पूरी तरह सीमित करना.”
  • Sabhar BBC.COM शुगर फ़्री से कैंसर होने के सुबूत पर अब भी क्यों उठ रहे हैं सवाल


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क्वांटम टेलीपोर्टेशन

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टेलीपोर्टेशन एक आदर्श प्रतिरूप कहीं और दिखाई देता है , जबकि एक वस्तु या व्यक्ति एक ही स्थान पर बिखर बनाने के करतब करने के लिए विज्ञान कथा लेखकों द्वारा दिया गया नाम है . कैसे यह आमतौर पर विस्तार से समझाया नहीं है पूरा किया , लेकिन सामान्य विचार मूल उद्देश्य से सभी जानकारी निकालने के लिए इस तरह के रूप में स्कैन किया जाता है कि प्रतीत हो रहा है , तो यह जानकारी प्राप्त स्थान के लिए प्रेषित किया और निर्माण करने के लिए प्रयोग किया जाता है प्रतिकृति , जरूरी नहीं कि मूल के वास्तविक सामग्री है, लेकिन शायद मूल रूप में बिल्कुल एक ही पैटर्न में व्यवस्था की एक ही प्रकार के परमाणुओं से से . एक टेलीपोर्टेशन मशीन यह 3 आयामी वस्तुओं के साथ ही दस्तावेजों पर काम करेगा , सिवाय इसके कि यह एक सटीक प्रतिलिपि बजाय एक अनुमानित प्रतिकृति का उत्पादन होगा , और यह कि यह स्कैनिंग की प्रक्रिया में मूल को नष्ट करेगा , एक फैक्स मशीन की तरह होगा . कुछ विज्ञान कथा लेखकों के मूल को संरक्षित कि teleporters पर विचार , और साजिश जटिल हो जाता है जब एक ही व्यक्ति से मिलने का मूल और teleported संस्करणों ; लेकिन teleporter के अधिक आम प्रकार नहीं आत्मा और शरीर के लिए एक आदर्श प्रतिलिपिकार के रूप में , एक सुपर परिवहन उपकरण के रूप में कार्य कर रहा है, मूल नष्ट कर देता है



1993 में आईबीएम बंदे चार्ल्स एच. बेनेट सहित छह वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय समूह , उत्तम टेलीपोर्टेशन सिद्धांत रूप में वास्तव में संभव है कि दिखाकर विज्ञान कथा लेखकों के बहुमत के intuitions की पुष्टि की , लेकिन मूल नष्ट हो जाता है तभी. बाद के वर्षों में , अन्य वैज्ञानिकों फोटॉनों , सुसंगत प्रकाश क्षेत्रों , परमाणु spins, और फंस आयनों सहित प्रणालियों की एक किस्म में प्रयोगात्मक टेलीपोर्टेशन का प्रदर्शन किया है . टेलीपोर्टेशन ( शायद unltimately एक "मात्रा इंटरनेट " के प्रमुख) लंबी दूरी क्वांटम संचार की सुविधा है, और यह बहुत आसान काम कर रहे एक क्वांटम कंप्यूटर का निर्माण कर रही है, आदिम संसाधित करने में कोई जानकारी के रूप में काफी उपयोगी हो वादा किया है . लेकिन विज्ञान कथा प्रशंसकों कोई इसे ऐसा करने के लिए किसी भी मौलिक कानून का उल्लंघन नहीं होता है, भले ही इंजीनियरिंग के कारणों की एक किस्म के लिए , निकट भविष्य में लोगों को या अन्य macroscopic वस्तुओं teleport करने में सक्षम होने की उम्मीद है कि जानने के लिए निराश हो जाएगा .


सहसंबद्ध है कि व्यक्तिगत रूप से यादृच्छिक व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं कि पता चला है . फोटॉनों और अन्य कणों पर प्रयोग बार बार इस तरह बड़े करीने से उन्हें जो बताते हैं कि क्वांटम यांत्रिकी , की वैधता के लिए पुख्ता सबूत उपलब्ध कराने , इन सहसंबंध की पुष्टि की है . EPR सहसंबंध के बारे में एक और अच्छी तरह से ज्ञात तथ्य यह है कि वे खुद के द्वारा एक सार्थक और चलाया संदेश उद्धार नहीं हो सकता है . यह उनकी ही उपयोगिता क्वांटम यांत्रिकी की वैधता साबित करने में लगा था. लेकिन अब यह क्वांटम टेलीपोर्टेशन का घटना के माध्यम से , वे बाहर स्कैन और परंपरागत तरीके से वितरित किया जाना बहुत नाजुक है जो एक वस्तु में जानकारी की है कि वास्तव में हिस्सा वितरित कर सकते हैं , कि जाना जाता है.



 क्वांटम टेलीपोर्टेशन  के साथ पारंपरिक प्रतिकृति संचरण तुलना . पारंपरिक प्रतिकृति संचरण में मूल इसके बारे में आंशिक जानकारी निकालने , स्कैन , लेकिन कम या ज्यादा अक्षुण्ण स्कैनिंग प्रक्रिया के बाद बनी हुई है . स्कैन किए गए जानकारी यह मूल की एक अनुमानित नकल का उत्पादन करने के लिए कुछ कच्चे माल (जैसे पेपर) पर अंकित है जहां प्राप्त स्टेशन , के लिए भेजा है . इसके विपरीत, क्वांटम टेलीपोर्टेशन में , दो वस्तुओं बी और सी के पहले से संपर्क में लाया जाता है और फिर अलग हो रहे हैं . वस्तु सी प्राप्त स्टेशन पर ले जाया गया है, जबकि वस्तु बी , भेजने के स्टेशन पर ले जाया जाता है . भेजने स्टेशन वस्तु बी पर एक जानकारी यह किसी एक का चयन करने के लिए प्रयोग किया जाता है जहां प्राप्त स्टेशन के लिए भेजा जाता है स्कैन किया पूरी तरह से एक और बीके राज्य में खलल न डालें कुछ जानकारी और उपज , teleport करना चाहती है जो एक मूल वस्तु के साथ एक साथ स्कैन किया जाता है जिससे ए के पूर्व राज्य के एक सटीक प्रतिकृति में सी डाल , सी वस्तु को लागू करने के लिए कई उपचार की


sabhar :http://researcher.watson.ibm.com

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कामसूत्र : रिश्तों की माला जोड़ने वाले 64 सूत्र

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 आचार्य वात्स्यायन रचित कामसूत्र भारतीय ज्ञान संपदा की एक ऐसी अनमोल और अनूठी विरासत है, जिसकी प्रासंगिकता और उपयोगिता इसके सृजन के शताब्दियों बाद भी बनी हुई है। इसकी रचना कब हुई, इस बारे में अनेक विद्वानों ने अलग-अलग राय व्यक्त की है। इसे लेकर जो मत प्रचलित हैं, उनके अनुसार यह ग्रंथ डेढ़ से ढाई हजार साल पहले रचा गया हो सकता है। रोचक बात यह है कि कामसूत्र स्वयं में कोई मूल ग्रंथ नहीं है, बल्कि ब्रह्मा जी द्वारा धर्म, अर्थ और काम के नियमन और व्यवस्था के लिए तैयार किए गए संविधान के काम वाले हिस्से का संक्षिप्त रूप है। इस संविधान में एक लाख अध्याय थे।


संविधान के धर्म विषय पर आधारित हिस्से को लेकर मनु ने मानवधर्मशास्त्र की रचना की और अर्थ विषय को लेकर आचार्य बृहस्पति ने बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र की। इसके बाद बचा काम विषयक अंश। भगवान शिव के सेवक नंदी ने इसका संपादन कर एक हजार अध्यायों में कामशास्त्र की रचना की। नंदी के बाद उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने इसे और संक्षिप्त कर पांच सौ अध्यायों वाला ग्रंथ बना दिया। इसे और भी संक्षिप्त किया पांचाल देश के विद्वान वाभ्रव्य ने, जिन्होंने इसे डेढ़ सौ अध्यायों में समेट दिया

वाभ्रव्य का यह ग्रंथ अनेक अधिकरणों और प्रकरणों में बंटा हुआ था,जिन्हें लेकर आचार्य दत्तक, आचार्य चारायण, आचार्य घोटकमुख जैसे विद्वानों ने अलग-अलग ग्रंथ तैयार किए। अब यह दो प्रकार से लोगों के लिए उपलब्ध था। एक तो डेढ़ सौ अध्यायों वाले वाभ्रव्य के विशाल ग्रंथ के रूप में। दूसरा, अलग-अलग विद्वानों द्वारा प्रस्तुत अधिकरण या खंड विशेष पर एकाग्र अलग-अलग ग्रंथों के रूप में। दोनों ही रूपों में आम लोगों के लिए इसका समग्र अध्ययन काफी कठिन और श्रमसाध्य था। वात्स्यायन मुनि ने इसके सर्वांगीण और सुगम अध्ययन की आवश्यकता को अनुभव किया और इसका संक्षिप्तीकरण कर कामसू्त्र नाम के नए ग्रंथ की रचना की।


लगभग दो हजार साल पहले रचित सात अधिकरणों, 36 अध्यायों, 64 प्रकरणों और 1250 सूत्रों (श्लोकों) में विभक्त आचार्य वात्स्यायन का यह ग्रंथ हमें पंचेंद्रियों से प्राप्त होने वाले सेक्स-सुख को ग्रैविटी से उठाकर मन और चेतना के गूढ़ जीरो ग्रैविटी क्षेत्र में पहुंचा देता है। कामशास्त्र का यही उद्देश्य है कि वह स्त्री और पुरुष को परस्पर मिलाकर मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बना सके। लगभग दो सौ वर्ष पूर्व ब्रिटिश भाषाविद सर रिचर्ड एफ. बर्टन ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिसने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया। कहा जाता है कि आज दुनिया की लगभग हर भाषा में इसका अनुवाद हो चुका कामसूत्र : रिश्तों की माला जोड़ने वाले 64 सूत्र


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1 लाख साल बाद कैसा दिखेगा इंसान, छोड़नी पड़ेगी धरती, नहीं मिलेगी सूर्य की रोशनी

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1 लाख साल बाद कैसा दिखेगा इंसान, छोड़नी पड़ेगी धरती, नहीं मिलेगी सूर्य की रोशनी

पृथ्वी पर तब जीवन ख़त्म हो जाएगा..


लंदन. मानव आदिकाल में क्‍या खाता था, कैसे चलता था, उसके शरीर की बनावट कैसी थी, इस बारे में तो वैज्ञानिकों के पास कई अहम जानकारियां हैं, लेकिन क्‍या आपने कभी सोचा है कि आज से 1 लाख वर्ष बाद मानव का चेहरा कैसा होगा? उसकी आंखें छोटी हो जाएंगी या बड़ी। उसका माथा कैसा होगा और कैसी होगी नाक? मानव आज जैसा दिखता है, क्‍या 20,000 साल बाद भी ऐसा ही दिखेगा? इन सवालों के ठोस जवाब आज दुनिया में किसी के पास नहीं है, लेकिन दो शख्‍स ऐसे हैं, जिन्‍होंने इस पहेली का हल निकालने की कोशिश है। इनके के नाम हैं डिजाइनर-रिसर्चर निकोलस लैम और वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में कम्‍प्‍यूटेश्‍नल जीनोमिक्‍स विशेषज्ञ डॉक्‍टर एलन क्‍वान।

 

'ऑब्‍जर्वर टैक मंथली' में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, इन दोनों ने रिसर्च और शानदार आर्टवर्क के जरिये ये बताया है कि मानव आज से 20,000, 60,000 या 1 लाख वर्ष बाद कैसा दिखेगा? शायद हालीवुड फिल्‍म 'क्‍लोज एनकाउंटर ऑफ द थर्ड काइंड' में दिखाए गये एलियन के जैसा या फिर...? जानें आगे...




हवा-प्रकाश के असर से बदलेगा चेहरा

 

वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में कम्‍प्‍यूटेश्‍नल जीनोमिक्‍स विशेषज्ञ डॉक्‍टर क्‍वान की रिसर्च के मुताबिक, 1 लाख वर्ष बाद इंसान के चेहरे की उनकी परिकल्‍पना में दो बातें बेहद अहम हैं। एक, हमारा पर्यावरण तेजी बदलेगा और दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिक ह्यूमन बायलॉजी पर और ज्‍यादा पकड़ बना लेंगे। इंसान के चेहरे में बदलाव के लिए हवा और प्रकाश में बदलाव बेहद अहम होंगे। ये दोनों कारण तय करेंगे कि इंसान का चेहरा 1 लाख वर्ष बाद कैसा आकार लेगा। साथ ही इंसान जिस चेहरे के साथ जन्‍म लेगा, वैज्ञानिक उसे बदलने में भी सक्षम होंगे। डॉक्‍टर क्‍वान कहते हैं कि आज से 60,000 वर्ष बाद इंसानी चेहरे में बदलाव या यूं कहें कि क्रमिक विकास चर्चा का केंद्र रहेगा। ह्यूमन जीनोम कंट्रोल करने की वैज्ञानिको की क्षमता भी बहुत विकसित हो जाएगी। 

1 लाख साल बाद कैसा दिखेगा इंसान, छोड़नी पड़ेगी धरती, नहीं मिलेगी सूर्य की रोशनी

सिर का साइज बढ़ेगा, छोड़नी पड़ेगी धरती

 

बदलाव के इस क्रम में सबसे रोचक तथ्‍य यह है कि इंसान का सिर बहुत बड़ा होगा। आंखें कुछ ऐसी दिखेंगी जैसे बाहर निकल आई हों। इसके अलावा, माथा और नाक के नथुने भी बड़े होंगे, जिससे दूसरे ग्रहों पर सांस लेने में दिक्‍कत नहीं होगी। ऐसा भी कह सकते हैं कि मानव खुद अपने चेहरे को ऐसा आकार भी दे सकेगा, जिससे वह अन्‍य ग्रहों पर रहने में सक्षम हो सके, क्‍योंकि आने वाले वर्षों में इंसान को धरती छोड़कर अन्‍य ग्रहों पर रहने के लिये मजबूर होना पड़ सकता है। शायद ऐसी जगहों पर जहां प्रकाश कम होगा। ये स्‍थान सूर्य की पहुंच से काफी दूर हो सकते हैं। जब बड़ी संख्‍या में लोग ओजोन परत के बाहर रहने लगेंगे, तब उन्‍हें अल्‍ट्रावायलेट किरणों यानी यूवी रेडिएशन से रोगों का खतरा रहेगा और इंसान की स्किन प्रभावित होगी। 

 

60,000 साल बाद मानव मॉर्फोलॉजी जेनेटिक्‍स में मास्‍टर हो जाएगा और तब हम बच्‍चों का DNA बदल पाने में भी सक्षम होंगे। ऐसे में संभव है कि उनकी नाक सीधी हो और चेहरे को परफेक्‍ट आकार दिया जा सकेगा। लैम को उम्‍मीद है कि उनका यह आर्टवर्क वैज्ञानिकों को 1 वर्ष बाद इंसानी चेहरे की परिकल्‍पना के बारे में और ठोस तथ्‍य तालाशने में मदद देगा। 


1 लाख साल बाद कैसा दिखेगा इंसान, छोड़नी पड़ेगी धरती, नहीं मिलेगी सूर्य की रोशनी

(फोटो कैप्‍शन: लैम और क्‍वान की रिसर्च के अनुसार 60,000 साल बाद इंसान का चेहरा इस प्रकार से बदलेगा। रिसर्च के मुताबिक, बदलाव का सबसे ज्‍यादा प्रभाव मानव के माथे और आंखों पर पड़ेगा। आंखों का आकार बहुत बड़ा जाएगा। इतना ही नहीं, उस समय तक वैज्ञानिकों के पास इतनी क्षमता होगी कि चेहरे में आमूलचूल बदलाव कर सकें। sabhar : bhaskar.com

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विपक्ष के गठबंधन का नाम 'INDIA' रखने का मामला पहुंचा थाने, 26 पार्टियों के खिलाफ शिकायत दर्ज

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 विपक्ष के गठबंधन का नाम 'INDIA' रखने का मामला पहुंचा थाने, 26 पार्टियों के खिलाफ शिकायत दर्ज

नेशनल डेस्क: विपक्षी गठबंधन का नाम I.N.D.I.A. रखने को लेकर दिल्ली के बाराखंबा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई है। 26 राजनीतिक दलों के खिलाफ ये शिकायत अवनीश मिश्रा ने दी है जोकि दिल्ली के ही रहने वाले हैं। शिकायत में कहा गया है कि I.N.D.I.A. नाम रखना Emblems Act का उल्लंघन है। इस एक्ट के तहत कोई भी अपने निजी फायदे के लिए नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। 


इंडिया नाम का इस्तेमाल करना वर्जित

अवनीश मिश्रा ने अपनी शिकायत में लिखा है कि Emblems and Names Act के सेक्शन 3 के तहत कुछ नामों का इस्तेमाल वर्जित है। शिकायत में प्वाइंट छह का भी जिक्र है। इसके मुताबिक, किशी भी शख्स द्धारा यूनियन ऑफ इंडिया और इंडिया नाम का इस्तेमाल करना वर्जित है। गठबंधन का नाम I.N.D.I.A. रखकर 26 पार्टियों ने Emblems and Names Act के सेक्शन 3 का उल्लंघन किया है। इसलिए उनको एक्ट के सेक्शन 5 के तहत सजा होनी चाहिए। इसमें दोषी पाए जाने पर 500 रुपये का जुर्मना लग सकता है।


विपक्षी दलों के गठबंधन का नाम होगा ‘इंडिया’ : खरगे

बेंगलुरु में विपक्षी दलों की बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘‘हमारे गठबंधन का नाम ‘इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव एलायंस (इंडिया)’ होगा। सभी ने एक स्वर में इस प्रस्ताव का समर्थन किया।’’ उन्होंने कहा कि विपक्षी गठबंधन में 11 सदस्यों की एक समन्वय समिति बनाई जाएगी और महाराष्ट्र के मुंबई में होने वाली अगली बैठक में इसके सदस्यों के नामों की घोषणा की जाएगी। खरगे ने कहा कि आगामी लोकसभा चुनाव प्रचार के प्रबंधन के लिए दिल्ली में एक साझा सचिवालय बनाया जाएगा। sabhar :punjabkesari.in Opposition Alliance: विपक्ष के गठबंधन का नाम 'INDIA' रखने का मामला पहुंचा थाने, 26 पार्टियों के खिलाफ शिकायत

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विदेशी मुद्रा मामले में जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल की संपत्ति की तलाशी

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 कथित विदेशी मुद्रा कानून उल्लंघन से जुड़े एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल और उनके सहयोगियों की संपत्तियों की तलाशी ली थी।

2019 की शुरुआत में शुरू की गई एक प्रारंभिक जांच में विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के कथित प्रावधानों का उल्लंघन किया गया था, जब अबू धाबी के एतिहाद एयरवेज ने 2012 में सहायक कंपनी के रूप में गठित एक वफादारी और पुरस्कार प्रबंधन कंपनी जेट में हिस्सेदारी के लिए 150 मिलियन डॉलर का निवेश किया था।


माना जाता है कि सौदे में श्री गोयल की भूमिका ईडी की जांच का मुख्य केंद्र बिंदु थी।

हालाँकि, धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के विपरीत, फेमा अपराध प्रकृति में आपराधिक नहीं हैं।


यह पहली बार नहीं है जब अधिकारियों ने श्री गोयल की संपत्तियों पर छापा मारा है।

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विदेशी मुद्रा मामले में जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल की संपत्ति की तलाशी

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