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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

घटती आबादी का जवाब रोबोट

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बाल धोने से लेकर पैर दबाने तक, घर का काम से लेकर अंतरिक्ष को मापने तक, जापान में रोबोट अब आम जिंदगी का हिस्सा बनने लगे हैं. अब जल्द ही वहां की बूढ़ी होती जनसंख्या की देखभाल रोबोट करेंगे.
बोलने वाला रोबोट किरोबो
एक नए शोध में जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि नर्सिंग सेक्टर में करीब दो करोड़ लोगों की जरूरत होगी क्योंकि जापान के लोग बूढ़े हो रहे हैं. 2012 में इस सेक्टर में काम कर रहे लोगों की संख्या करीब 1.5 करोड़ थी.
देखभाल और नर्सिंग जैसे कामों को कम लोग पसंद करते हैं क्योंकि यह मेहनत का काम है. अकसर कर्मचारी इस तरह के कामों को छोड़ देते हैं क्योंकि बड़े बूढ़ों को उठाने और उनकी मदद करने में वे खुद बीमार हो जाते हैं. साथ ही जापान में कम बच्चे पैदा हो रहे हैं और बेहतर स्वास्थ्य की वजह से लोगों की उम्र बढ़ रही है. इस संकट को टालने के लिए जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक स्कीम तैयार की है जिसमें बड़े बूढ़ों की मदद के लिए रोबोट लगाए जाएंगे.
केयर होम में मदद
नवंबर में 15 कंपनियों के इंजीनियरों और एक्सपर्टों ने 10 नर्सिंग होम में प्रयोग किए. इनके मालिकों से रोबोट में निवेश करने को कहा गया. होकाईडो बुंकयो विश्वविद्यालय के माकोतो वातानाबे ने कहा, "यह बात साफ है कि आने वाले सालों में कर्मचारियों की कमी होगी और यह एक अच्छा जवाब है, खास कर ऐसे वक्त में जब जापान को आर्थिक परेशानियां हो रही हैं."
अस्पताल के लिए

लेकिन वातानाबे कहते हैं कि यह बहुत हैरानी वाली बात नहीं कि रोबोट अब नर्सिंग में भी आ गए हैं क्योंकि जापानी 1970 की दशक में कार बनाने में रोबोट का इस्तेमाल कर चुके हैं, "अब जापान इस सेक्टर में भी रोबोट को लगाने में पहले नंबर पर है." जापान में खास बूढ़े लोगों को ध्यान में रख कर रोबोट बनाए जा रहे हैं.
कम्यूनिकेशंस एंड्रॉयड
मिसाल के तौर पर होस्पी रीमो जिसे इस वक्त बनाया जा रहा है. यह उन लोगों के लिए है जो बिस्तर से हिल नहीं सकते. इनमें और डॉक्टरों के बीच संपर्क में होस्पी रीमो मदद कर सकता है. एंड्रॉयड रोबोट के चेहरे का भाव खुश करने वाला होता है. वह खुद चल फिर सकता है और वह हाई डेफनिशन तस्वीरों के जरिए संपर्क करता है.
पैनासोनिक ने इस बीच एक ऐसे रोबोट का आविष्कार किया है जो लोगों के बाल धोता है. हेडकेयर रोबोट के हाथों में 24 अंगुलियां हैं और वह बिलकुल मनुष्य की तरह बालों को धो सकता है. शैंपू लगाने से पहले रोबोट के दो हाथ मनुष्यों के सर को नापते हैं और तय करते हैं कि सर के कौन से हिस्से में कितना दबाव डालना है.
जापानी डॉक्टरों ने ऐसा सूट भी बनाया है जिससे कमजोर से कमजोर मरीज भी चल फिर सकता है. इस रोबोट को कपड़े की तरह पहना जा सकता है. वैसे तो इस रोबोट सूट का आविष्कार जापान के किसानों के लिए किया गया लेकिन अब बूढ़े और कमजोर लोग भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. इस सूट में जोड़ों की जगह खास मोटर लगे हैं. पीठ, घुटनों और कंधों पर लगे मोटरों से मरीज को ताकत मिलती है. रोबोट सूट का वजन करीब 25 किलो है जो एक कमजोर मरीज के लिए काफी भारी हो सकता है लेकिन वैज्ञानिक इसका वजन कम करके दो साल में इसे बाजार में लाना चाहते हैं. इस वक्त एक सूट का दाम करीब 7,000 डॉलर है लेकिन वैज्ञानिक इसे कम करके 2,000 डॉलर तक लाना चाहते हैं.
बेबी रोबोट नोबी से वैज्ञानिक बच्चों पर और शोध कर सकेंगे

हर काम के लिए रोबोट
सेहत ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में भी रोबोट काम आते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन आईएसएस में 13 इंच का रोबोट जापानी एस्ट्रोनॉट कोइची वाकाता का साथ देते हैं. फुकुशिमा दाइची परमाणु प्लांट में रोबोट रेडियोधर्मी इलाकों में जाकर वहां की तस्वीरें वैज्ञानिकों को भेजते हैं. जापान में कला में भी रोबोट दिख रहे हैं. जापानी नाटककार ओरीजा हिराता ने आंटोन चेकोव के नाटक "तीन बहनें" में एक रोबोट से एक्टिंग कराई थी. एनईसी कॉर्प ने कहा है कि वह जल्द ही घर में इस्तेमाल किया जाने वाला रोबोट ला रहा है जिसमें कैमरा, माइक और सेंसर होगा और जो लोगों से बात कर सकेगा.
बूढ़े लोगों के लिए शायद आराम हो लेकिन टोकिया के मेइजी गाक्विन विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे टॉम गिल कहते हैं कि उन्हें यह बात परेशान करती है कि आदमी की जगह रोबोट बुढ़ापे में उनका ख्याल रखेंगे, "मुझे यह दुखी और अकेला सा कर देता है."
रिपोर्टः जूलियन रायल/एमजी
संपादनः ए जमाल

sabhar :DW.DE

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योगी के साथ योग जारी रहेगा

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अच्छे खेल के साथ योग ने भी विश्व कप जीतने में जर्मन टीम की मदद की. टीम हर दिन समुद्र के किनारे योगाभ्यास करती थी. योगी के नाम से मशहूर कोच योआखिम लोएव की टीम आगे भी ऐसा करती रहेगी.
 
"मैं इस वक्त किसी ऐसे काम के बारे में नहीं सोच सकता जो मेरे अभी के काम से अच्छा हो." लोएव टीम को 2016 के यूरोकप के लिए भी ट्रेन करेंगे और टीम और खिलाड़ियों पर काम करते रहेंगे.
लोएव ने पिछले साल ही जर्मन फुटबॉल संघ डीएफबी के साथ अपना करार 2016 तक बढ़ाया था. लेकिन मीडिया में इस तरह की अफवाहें उड़ रही थीं कि लोएव टीम को छोड़ना चाहते हैं. लेकिन कोच ने खुद इन अफवाहों को गलत बताया, "मैंने तो इसके बारे में एक पल भी नहीं सोचा. मैं तो सिर्फ वही कर रहा हूं जिसको लेकर विश्व कप से पहले बात हुई थी, कि हम मैच के बाद टूर्नामेंट का विश्लेषण करेंगे."
वर्ल्ड कप विजेता टीम का सफर बर्लिन के मशहूर ब्रांडेनबुर्ग गेट पर आकर थमा. विशाल मंच पर कोच समेत पूरी टीम आई. खिलाड़ियों ने एक एक ट्रॉफी उठाई और मुग्ध दर्शकों के साथ झूमने लगे.

लोएव कहते हैं कि विश्व कप के दौरान कई चीजें बदल जाती हैं और इसके बाद उन्हें थोड़ा वक्त चाहिए था ताकि वह अपनी भावनाओं को काबू में कर सकें और आगे के बारे में सोचें. 54 साल के योआखिम लोएव को जर्मन प्यार से योगी लोएव कहते हैं. 2006 में उन्होंने अपने बॉस यूर्गेन क्लिन्समान के जाने के बाद टीम की कमान संभाली. उनके आने के बाद टीम 2010 में सेमी फाइनल तक पहुंची और इस बार कप ही अपने नाम कर गई.
1990 के बाद पहली बार जर्मन टीम ने इस साल विश्व कप जीता है. लेकिन योगी के साथ योग ने भी टीम को सबसे ऊपर पहुंचाने में मदद की है. योगा कोच पैट्रिक ब्रूमे हर दिन टीम को ब्राजील के समुद्री तट पर योग कराते थे. ब्रूमे के मुताबिक, "खास तौर से कमर, पैरों और जांघ के लिए योग कराया जाता था." और तो और फाइनल से पहले एक ऐसा खिलाड़ी था जो योग करके अपने शरीर को स्ट्रेच करना चाहता था. ब्रूमे एक मनौवैज्ञानिक हैं जो जीवमुक्ति नाम का योग कराते हैं. इससे शरीर लचीला रहता है और इसमें कई मॉडर्न व्यायाम भी मिलाए गए हैं. इस बार टीम में योग की सफलता को देखते हुए लग रहा है कि यह आने वाले दिनों में भी योग टीम की ट्रेनिंग का हिस्सा रहेगा.
ब्रूमे कहते हैं कि योग ऐसे कई व्यायामों और कार्यक्रमों का हिस्सा है जो फुटबॉल खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग के दौरान करते हैं. जर्मनी की टीम में मुख्य कोच लोएव के अलावा उनका एक सहायक होता है जो इस वक्त हंस डीटर फ्लिक हैं. टीम के मैनेजर हैं ऑलिवर बीयरहोफ और खास गोलकीपर के ट्रेनर हैं आंद्रेआस कोएपके. इसके अलावा कई लोग हैं जो आयोजन और टीम की देख रेख के लिए टीम के साथ जाते हैं.
एमजी/ओएसजे(डीपीए) sabhar :http://www.dw.de/

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एचआईवी के इलाज में एक नया कदम

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एचआईवी वायरस

वैज्ञानिकों ने एचआईवी संक्रमण के इलाज में एक ''रोमांचक'' कदम बढ़ाने की बात कही है.
एचआईवी वायरस, संक्रमित व्यक्ति के डीएनए का हिस्सा बनकर दशकों तक निष्क्रिय रह सकता है जिससे बीमारी का इलाज नामुमकिन हो जाता है.

नया शोध क्या कहता है आगे पढ़ें
लेकिन अब वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वायरस को फिर से सक्रिय किया जा सकता है.
ये अध्ययन एड्स 2014 कॉन्फ़्रेंस में पेश किया गया.
छह संक्रमित व्यक्तियों पर किए गए शुरुआती अध्ययन में पाया गया है कि कीमोथेरेपी में दवा की कम मात्रा इस्तेमाल करने से वायरस को सक्रिय किया जा सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि ये एक आशाजनक शुरुआत है लेकिन सिर्फ़ दवा से ही एचआईवी का इलाज मुमकिन नहीं होगा.
एंटी-वायरल दवाओं से एचआईवी वायरस, रक्त प्रवाह में उस स्तर तक पहुंच सकता है जहां इसकी जांच नहीं हो पाती. इसका मतलब ये है कि एचआईवी पॉज़िटिव लोग लगभग सामान्य जीवनकाल जी सकते हैं.
लेकिन इसमें एक मुश्किल होती है. एचआईवी वायरस अपना डीएनए हमारे डीएनए में मिला सकता है जहां ये प्रतिरक्षी तंत्र और दवाओं की पहुंच से बाहर हो जाता है. इस प्रक्रिया को एचआईवी रिज़र्वायर कहते हैं.
इसलिए जब एचआईवी का इलाज बंद हो जाता है, ये वायरस रिज़र्वायर से बाहर आकर फिर से काम करना शुरु कर देता है.
एचआईवी के इलाज पर हो रहे अंतरराष्ट्रीय अध्ययन का मक़सद इसके वायरस को इन छिपी हुई जगहों से बाहर निकालना है.
डेनमार्क के आरहाउस विश्वविद्यालय की एक टीम ने कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली रोमिडेपसिन नाम की दवा का इस्तेमाल किया. ये अध्ययन छह ऐसे लोगों पर किया गया जिनमें एचआईवी वायरस उस स्तर पर पहुंच गया था, जहां उसकी पहचान या जांच नहीं हो सकती थी.
इन सभी को तीन हफ़्तों तक सप्ताह में एक बार रोमिडेपसिन की कम मात्रा दी गई.
छह में से पांच मरीज़ों के ख़ून में वायरस के स्तर में काफ़ी उछाल देखा गया.
अध्ययन में शामिल एक वैज्ञानिक, डॉक्टर ओले सोगार्ड ने बीबीसी को बताया, "(एचआईवी के इलाज) की दिशा में लिया गया हर नया कदम हमेशा ही रोमांचक होता है और ये एक बहुत अहम कदम है."
डॉक्टर सोगार्ड ने कहा कि इस बारे में काफ़ी संशय है कि ये दवा कितनी कारगर होगी. उन्होंने कहा, "हमने ये दिखा दिया है कि वायरस को कोशिका से बाहर निकाला जा सकता है. अब अगला कदम इन कोशिकाओं को मारना होगा.''
उन्होंने कहा, "इस दवा का परीक्षण अब अगले चरण में जा रहा है जिसमें रोमिडेपसिन को किसी ऐसी चीज़ या दवा के साथ दिया जाएगा जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत बनाएगा और हमारे मामले में ये एचआईवी का टीका है."

चुनौतियां

हालांकि इस अध्ययन में अभी कई चुनौतियां हैं.
अध्ययन टीम ये नहीं बता सकी कि रोमिडेपसिन के इस्तेमाल से किस अनुपात में एचआईवी छिपाने वाली कोशिकाएं सक्रिय होती हैं.
एक और मुश्किल ये भी है कि ये नहीं बताया जा सकता कि इस दवा से एचआईवी के किस रिज़र्वायर पर असर पड़ रहा है. एचआईवी वायरस ख़ून में प्रतिरक्षी तंत्र की कोशिकाओं में छिप सकता है लेकिन उसके इससे भी बड़े रिज़र्वायर पेट और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में होते हैं. अभी ये साफ़ नहीं है कि ख़ून पर आधारित इस कीमोथेरेपी से इनमें मौजूद वायरस सक्रिय होते हैं या नहीं.

रोमिडेपसिन दवा के इस्तेमाल से डीएनए के कसे हुए गुच्छे ''ढीले'' पड़ जाते हैं. इससे छिपे हुए एचआईवी का जेनेटिक कोड सामने आ जाता है और नए वायरस बनते हैं. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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इस सत्य तक जाना हो, तो निर्वस्त्र जाना होगा

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osho pravachan on knowledge

यह मजे की बात है। जिस दिन तुमने जो-जो जाना है, यदि उसे बिल्कुल विस्मरण कर दोगे, उस दिन तुम्हें आत्म स्मरण आएगा कि गुरु देता है ध्यान। इसका अर्थ है कि गुरु छीन लेता है ज्ञान। और जहां तुम्हें ऐसा गुरु मिले, जो तुमसे ज्ञान छीनता हो, वहां हिम्मत करके रुक जाना।

क्योंकि वहां से भागने का मन होगा। सोचेंगे, यहां हम तो कुछ लेने आए थे, उल्टा और गंवाने लगे। आदमी लेने के लिए घूम रहा है। कहीं से कुछ मिल जाए तो थोड़ा और अपनी संपत्ति बढ़ा ले। अपनी तिजोरी में थोड़ी जानकारी और रख लें, थोड़ा और पंडित हो जाएं।एक जर्मन खोजी रमण के पास आया और उसने कहा कि मैं आपके चरणों में आया हूं कुछ सीखने। आप मुझे सिखाएं। रमण ने कहा, तुम गलत जगह आ गए। अगर सीखना है, तो कहीं और जाओ। अगर भूलना है, तो हम राजी हैं। रमण के वचन हैं--‘इफ यू हैव कम टू लर्न देन यू हैव कम टु दि रांग परसन।

इफ यू आर रेडी टु अनलर्न देन आई एक रेडी टू हेल्प यू।’ वह जो तुमने जाना है, उसी के कारण तुम्हें अपना पता नहीं चल पा रहा है। तुम्हारे और तुम्हारे जानने के बीच में तुम्हारी जानकारी की दीवार खड़ी हो गई है।अगर तुम्हें स्वयं को जानना है तो और सब जानने के वस्त्र उतारकर रख दो। स्वयं का जानना तभी घटता है, जब भीतर और कुछ जानने का उपद्रव नहीं रह जाता। जब सब जानना शून्य हो जाता है, तब आती है आत्म-स्मृति; कबीर उसको ‘सुरति’ कहते हैं। तब होता है आत्म-स्मरण। तब आदमी स्व-विवेक से भर जाता है, आत्मज्ञान से।

आत्मज्ञान कोई जानकारी नहीं है। क्योंकि वह तो तुम हो ही। तुम्हारी जानकारियों के पर्दे जरा हट जाएं, थोड़ा तुम घूंघट के पट खालो, तुम्हें अपनी छवि दिखाई पड़नी शुरू हो जाएगी। यह सारा अस्तित्व दर्पण है। जिस दिन तुम्हारी आंख पर घूंघट नहीं होता, उस दिन तुम्हें अपनी छवि सब जगह दिखाई पड़ने लगती है।

चांद-तारे तुम्हीं को गुंजाते हैं। पक्षी तुम्हारा ही गीत गाते हैं। झरने तुम्हारा ही कल-कल नाद करते हैं। फूल तुम्हीं को खिलाते हैं। तुम ही इस अस्तित्व में फूले-फले समाए होते हो। लेकिन एक शर्त अनिवार्य है; कि सब जानकारी हटा कर रख दी जाए। सत्य तक जाना हो, तो निर्वस्त्र जाना होगा। सत्य तक जाना हो, तो जानने के सारे वस्त्र छोड़े देने होंगे। सत्य तक कोई नग्न होकर, शून्य होकर ही पहुंचता है। शून्यता यानी ध्यान।
ओशो

sabhar :http://www.amarujala.com/

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बुधवार, 23 जुलाई 2014

विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार नहीं कर सकता

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god के लिए चित्र परिणाम

photo : gogale


संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई निर्माता होता है तभी वह बनती है। इतने बड़े विश्व का भी कोई न कोई निर्माता होना चाहिए। सृष्टि की विभिन्न वस्तुओं में से प्रत्येक में अपने-अपने नियम क्रम पाये जाते हैं। उन्हीं के आधार पर उनकी गतिविधियां संचालित होती हैं। यह नियम न होते तो सर्वत्र अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था दृष्टिगोचर होती। इन नियमों का निर्धारणकर्ता कोई न कोई होना चाहिए। जो भी शक्ति इस निर्माण एवं नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी है वही ईश्वर है। वस्तुओं का उगना, बढ़ना जीर्ण होना, मरना और फिर उनका नवीन रूप धारण करना, यह परिवर्तन क्रम भी बड़ा विचित्र किन्तु विवेकपूर्ण है। इस प्रगति चक्र को घुमाने वाली कोई शक्ति होनी चाहिए। यह जड़ता का स्वसंचालित नियम नहीं हो सकता।

विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि संसार का मूल तत्व एक है। एक ही ऊर्जा अपनी विभिन्न चिनगारियों के रूप में, विभिन्न दिशाओं में, विभिन्न रंग-रूप में उछल-कूद कर रही है। यहां आतिशबाजी का तमाशा हो रहा है। कुशल शिल्पी बारूद को कई उपकरणों के साथ बनाकर कई प्रकार के बारूदी खिलौने बना देते हैं, उनमें से कोई आवाज करता है, कोई चिनगारियां उड़ाता है, कोई रंग-बिरंगी रोशनी करता है, कोई उड़ता-उछलता है। इन हलचलों की इस भिन्नता और विचित्रता के रहते इस संसार में दृश्यमान भिन्न-भिन्न आकृति-प्रकृति के पदार्थों के बारे में लागू होती है। उनके स्वरूप में और गुण, धर्म अलग हैं तो भी वे जिस सत्ता से उत्पन्न होते हैं वह व्यापक और एक है।

विज्ञान ने कभी यह नहीं कहा है कि- ‘ईश्वर नहीं है।’ उसने केवल इतना ही कहा- उसकी अनुसन्धान प्रक्रिया की पकड़ में ईश्वर जैसी कोई सत्ता नहीं आती। इन्द्रिय बोध के आधार पर सूक्ष्मदर्शी उपकरणों की सहायता से प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अनुसन्धान चलते हैं। इस परिधि में जो कुछ आता है वही विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय है। उसकी अपनी छोटी सीमा और मर्यादा है। उससे जितना कुछ ज्ञान पकड़ा पाया जाता है उसे ही प्रस्तुत करना उसका विषय है। इस मर्यादा में यदि ईश्वर नहीं आया है तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसकी सत्ता है ही नहीं।

विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। उसे अभी तो आज की गलती कल सुधारने से ही फुरसत नहीं। बाल-बुद्धि आज जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन करती है उसके आगे के तथ्य सामने आने पर पूर्व मान्यताएं बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। यह स्थिति संभव है आगे न रहे जब विज्ञान अपनी किशोरावस्था पार करेगा और यौवन की प्रौढ़ता में प्रवेश करेगा तो उसे ऐसे आधार भी हाथ लग जायेंगे जो आज के भौंड़े उपकरणों की अपेक्षा प्रकृति की अधिक सूक्ष्मता की थाह ला सकें। तब सम्भवतः उन्हें पदार्थ की भौतिक शक्ति के अन्तराल में छिपी हुई चेतना की परतें भी दृष्टिगोचर होने लगेंगी। आज भी इसकी संभावना स्वीकार की जा रही है। इसलिए ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि न होने पर भी विज्ञान अन्यान्य अनेकों सम्भावनाओं की तरह ईश्वर की सम्भावना का भी खण्डन नहीं करता, वह केवल नम्र शब्दों में इतना ही कहता है अभी प्रयोगशालाओं ने अपनी पकड़ में ईश्वर को नहीं जकड़ पाया है। उसका खण्डन इसी सीमा तक है। विज्ञानी नास्तिकता दुराग्रही नहीं हैं। वह अपनी वर्तमान स्थिति का विवरण मात्र प्रस्तुत करती है।

ईश्वर की सत्ता को प्रामाणित करने के लिए यह आधार ही काफी है कि सृष्टि के प्रत्येक घटक को नियम और क्रम के बन्धन में बँधकर रहना पड़ रहा है। कभी−कभी भूकम्प, तूफान, उल्कापात, जैसी घटनाएँ− प्राणियों के पेट के विचित्र आकृति−प्रकृति की सन्तानों का होना जैसे व्यतिक्रम दीख पड़ते हैं, पर गहराई से विचार करने पर वे भी ऐसे नियम कानूनों के आधार पर होते हैं जिन्हें आमतौर से नहीं जानते वे अपन काम करते हैं और जब अवसर पाते हैं तो विलक्षण स्थिति उत्पन्न करते हैं।

महामना मालवीय किसी बहुत जरूरी काम से जा रहे थे। सड़क के किनारे उन्हें एक बीमार बुढ़िया कराहती हुई पड़ी दिखाई दी।

गाड़ी रुकवाई और बुढ़िया को अपनी गाड़ी में लादकर अस्पताल पहुँचाया।

साथी वकील ने पूछा− ऐसे छोटे काम के लिए आपको अपना बहुमूल्य समय क्यों नष्ट करना चाहिए था? मालवीय जी ने गम्भीरतापूर्वक कहा− पीड़ितों की सहायता से बढ़कर और क्या महत्त्वपूर्ण या आवश्यक कार्य हो सकता है?

‘दि मिस्टीरियस यूनीवर्स’ ग्रन्थ के लेखक सर जेम्स जीन्स ने अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि− “इस ब्रह्मांड का सृष्टा कोई विशुद्ध गणितज्ञ रहा होगा। उसने न केवल मानव प्राणी की वरन् अन्य सभी जड़ चेतन कहे जाने वाले प्राणियों और पदार्थों की संरचना में गणित की उच्चस्तरीय विद्या का पूरी तरह प्रयोग किया है। यदि इसमें कहीं कोई भूल रह जाती तो हर चीज बनने से पूर्व ही बिखर जाती। प्राणी जीवन धारण करने से पूर्व ही मर जाते और ग्रह−पिण्ड अपना पूर्ण रूप बनाने से पूर्व ही एक−दूसरे के साथ टकरा कर चूर−चूर हो जाते हैं। यह सृष्टा के गणित ज्ञान का चमत्कार ही है कि न केवल पृथ्वी वरन् समस्त ब्रह्मांड एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के साथ गतिशील है।”

न्यूटन की खोजें किसी समय अत्यन्त सत्य मानी गई थीं, पर अब परिपुष्ट विज्ञान ने उन्हें क्षुद्र, असामयिक एवं व्यर्थ सिद्ध कर दिया है। गुरुत्वाकर्षण की खोज किसी समय एक अद्भुत उपलब्धि थी अब आइंस्टीन का नवीनतम सिद्धान्त प्रामाणिक माना गया है और गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को बाल−विनोद ठहराया गया है। ‘आइंस्टीन के अनुसार देश, काल और एकीकरण की− स्पेश टाइम और काजेशन− के एकीकरण सिद्धान्त की एक वक्राकृति मात्र है जिसे हम पृथ्वी का घुमाव मानते हैं। यह इस वक्रता के दो उपाँशों का आनुपातिक सम्बन्ध भर है। इसी से पृथ्वी घूमती दीखती है और उसकी गतिशीलता को अनुभूति में एक कड़ी गुरुत्वाकर्षण की भी जुड़ जाती है। यह आकर्षण तथ्य नहीं वरन् हलचलों की एक भोंड़ी सी अनुभूति मात्र है।”

कोई चित्रकार यदि अन्य किसी ग्रह पर बैठकर पृथ्वी का रंगीन चित्र बनाये तो वह रंग बिरंगे दृश्यों का एक समतल दृश्य ही होगा। गोला भी बनाया तो वह केवल एक पक्षीय होगा। पूरा गोला इस तरह बनाया जाना असंभव है जो दोनों ओर की स्थिति को एक साथ दिखा सके। कल तक लम्बाई−चौड़ाई बताने वाले चित्र ही तैयार होते थे। − हराई का आभास उनसे यत्किंचित् ही होता था। अब ‘थ्री डाईमेंशनल’ स्थिति देखने की भी सुविधा बन चली है और गहराई को देख सकना भी सम्भव हो गया है। आगे चित्रकला के विकास में कई और डाईमेंशनल जुड़ेंगे, पर अभी तो वे सम्भव नहीं। इसलिए जो भी चित्र बने वे अधूरी दृश्य प्रक्रिया पर निर्भर है। अन्य ग्रह पर बैठकर बनाया गया पृथ्वी का चित्र यहाँ की हलचलों की सही जानकारी दे सके यह सम्भव नहीं। भले ही उस ग्रह के निवासी उस चित्र को कितना ही सर्वांगपूर्ण क्यों न मानें।

हमारे पूर्वज धरती को समतल मानते थे। पीछे पता चला कि वह गोल है। इसके बाद यह जाना गया कि वह घूमती भी है और परिक्रमा भी करती है। इसके उपराँत यह जाना गया कि वह अपने अधिष्ठाता के साथ अन्य भाइयों के साथ किसी महासूर्य की प्रक्रिया के लिए भी दौड़ी जा रही है और वह महासूर्य किसी अतिसूर्य की परिक्रमा में निरत है। अपने सौरमण्डल जैसे अन्य कितने ही सौरमंडल उस महासूर्य सहित अतिसूर्य की प्रदिक्षणा में निरत है। मालूम नहीं यह महा− अति और अत्यन्त अति का सिलसिला कहा जाकर समाप्त हो रहा होगा और पृथ्वी के भ्रमण की कितनी हलचलों का भाग्य उन अचिन्त्य− परिक्रमाओं के साथ जुड़ा होगा। कुछ दिन पूर्व यह भी पता लगा कि पृथ्वी लहकती और थिरकती भी है। सीधे−साधे ढंग से अपनी धुरी पर घूमती भर नहीं है वरन् वह कई प्रकार की कलाबाजियां भी दिखाती है। साँस लेती हुई फूलती और पिचकती भी है इससे उसकी भ्रमणशीलता में अन्तर आता है तदनुसार गुरुत्वाकर्षण भी घटता−बढ़ता है।

अपनी आकाश गंगा में हमारे सौरमण्डल जैसे लाखों सौरमण्डल हैं। इन सौरमण्डलों के अपने ग्रह−उपग्रह हैं। समूचे ब्रह्मांड में कितनी गंगाएं हैं? इन प्रश्न का उत्तर वैज्ञानिक अरबों में गिनते हैं। प्रत्येक आकाश गंगा कितने सौरमण्डल अपनी कमर के साथ रस्सी में बाँधे हैं और वे सौरमण्डल कितने ग्रहों को जकड़े बाँधे बैठे है और उन ग्रहों के साथ कितने उपग्रह चिपके हैं इस सारे पिण्ड परिवार की गणना की जाय तो हमारा अंक गणित झक मारेगा और उस गिनती की पूरी कल्पना तक कर सकना मनुष्य के क्षुद्र मस्तिष्क के लिए सम्भव न हो सकेगा। समस्त ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी जैसे क्षुद्र ग्रह कितने होंगे? और उनमें से कितनी ही- कितने चित्र विचित्र आकृति−प्रकृति के प्राणियों को अपनी गोदी में खिला रही होगी। वहाँ की आणविक− रासायनिक जैवीय परिस्थितियाँ एक दूसरे से कितनी अधिक भिन्न विपरीत होंगी यह सब कल्पना करना ही हमारे लिए अशक्य है। अभी तो अपनी पृथ्वी के वातावरण में जो हलचलें चल रही हैं उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही हैं और उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही है और उन्हीं उलझनों से हम हतप्रभ रह रहे हैं जब अन्य ग्रह तारकों में पृथ्वी से सर्वथा भिन्न प्रकार के वातावरण को ध्यान में रखते हुए हमारे विज्ञान में सर्वथा विचित्र अपरिचित विज्ञान का ककहरा पढ़ेंगे तो लगेगा कि इतने असीम ज्ञान−विज्ञान का क्षुद्र मानव मस्तिष्क द्वारा खोज पाया जाना तो दूर उसकी समूची कल्पना करना तथा अशक्य है।

विज्ञान अभी अपना बचपन भी पार नहीं कर पाया कि उसे अपने विषय की गहराई दिन−दिन अधिक दुरूह प्रतीत होती जा रही है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई इलेक्ट्रॉन घोषित तो कर दी गई है पर उसका किसी भी यन्त्र से अब तक प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सका। न उसे आंखें से देखो गया है न चित्र से उतारा गया है। वह मात्र एक परिकल्पना है जिसे ‘रूप हीन’ कहकर पिण्ड छुड़ाया गया है। इस इकाई की गतिविधियाँ तो नोट करली गई हैं, पर वे क्यों होती हैं इन हलचलों के लिए उन्हें प्रेरणा एवं क्षमता कहाँ से मिलती हैं। खर्च होने वाली शक्ति की वे पूर्ति कहाँ से करती हैं इसका कोई उत्तर प्राप्त नहीं किया जा सका। अणु विज्ञान के मूर्धन्य मनीषी आइन्स्टीन और मैक्स प्लेक तक इस सम्बन्ध में चुप है और यह सोचते हैं कि भौतिक सत्ता के ऊपर कोई अभौतिक सत्ता छाई हुई है। यह अभौतिक सत्ता क्या हो सकती है और उसका उद्देश्य एवं क्रिया−कलाप क्या होना चाहिए यह खोज पाना अभी विज्ञान के लिए बहुत आगे की बात है।

परमाणु परिवार से लेकर सौरमण्डल और ब्रह्मांड संव्याप्त ग्रहपिण्ड परिकर के बारे में हम अभी इतना भी नहीं जानते जितना कि सारे शरीर की तुलना में एक बात। हम केवल पंचतत्वों से बने हुए स्थूल पदार्थों के बारे में ही थोड़ी बहुत जानकारी प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्राप्त कर सके हैं। जीव सत्ता− मस्तिष्कीय सम्भावना, अचेतन मन की अतीन्द्रिय शक्ति के अगणित प्रमाण होते हुए भी अभी वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती है। असंख्य क्षेत्रों की जानकारियां अभी प्रारंभिक अवस्था को भी पार नहीं कर सकी हैं। ऐसी दशा में यदि ईश्वर जैसा अति सूक्ष्म तत्व प्रयोगशालाओं की पकड़ में नहीं आया तो यह नहीं कहा जाना चाहिए कि वह नहीं हैं। तत्वदर्शी दृष्टि से हम उसकी सत्ता महत्ता और व्यवस्था सहज ही सर्वत्र बिखरी देख सकते हैं और उस पर श्रद्धा भरा विश्वास कर सकते हैं।
sabhar :http://hindi.speakingtree.in/

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संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई निर्माता होता है तभी वह बनती है। इतने बड़े विश्व का भी कोई न कोई निर्माता होना चाहिए। सृष्टि की विभिन्न वस्तुओं में से प्रत्येक में अपने-अपने नियम क्रम पाये जाते हैं। उन्हीं के आधार पर उनकी गतिविधियां संचालित होती हैं। यह नियम न होते तो सर्वत्र अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था दृष्टिगोचर होती। इन नियमों का निर्धारणकर्ता कोई न कोई होना चाहिए। जो भी शक्ति इस निर्माण एवं नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी है वही ईश्वर है। वस्तुओं का उगना, बढ़ना जीर्ण होना, मरना और फिर उनका नवीन रूप धारण करना, यह परिवर्तन क्रम भी बड़ा विचित्र किन्तु विवेकपूर्ण है। इस प्रगति चक्र को घुमाने वाली कोई शक्ति होनी चाहिए। यह जड़ता का स्वसंचालित नियम नहीं हो सकता।
विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि संसार का मूल तत्व एक है। एक ही ऊर्जा अपनी विभिन्न चिनगारियों के रूप में, विभिन्न दिशाओं में, विभिन्न रंग-रूप में उछल-कूद कर रही है। यहां आतिशबाजी का तमाशा हो रहा है। कुशल शिल्पी बारूद को कई उपकरणों के साथ बनाकर कई प्रकार के बारूदी खिलौने बना देते हैं, उनमें से कोई आवाज करता है, कोई चिनगारियां उड़ाता है, कोई रंग-बिरंगी रोशनी करता है, कोई उड़ता-उछलता है। इन हलचलों की इस भिन्नता और विचित्रता के रहते इस संसार में दृश्यमान भिन्न-भिन्न आकृति-प्रकृति के पदार्थों के बारे में लागू होती है। उनके स्वरूप में और गुण, धर्म अलग हैं तो भी वे जिस सत्ता से उत्पन्न होते हैं वह व्यापक और एक है।
विज्ञान ने कभी यह नहीं कहा है कि- ‘ईश्वर नहीं है।’ उसने केवल इतना ही कहा- उसकी अनुसन्धान प्रक्रिया की पकड़ में ईश्वर जैसी कोई सत्ता नहीं आती। इन्द्रिय बोध के आधार पर सूक्ष्मदर्शी उपकरणों की सहायता से प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अनुसन्धान चलते हैं। इस परिधि में जो कुछ आता है वही विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय है। उसकी अपनी छोटी सीमा और मर्यादा है। उससे जितना कुछ ज्ञान पकड़ा पाया जाता है उसे ही प्रस्तुत करना उसका विषय है। इस मर्यादा में यदि ईश्वर नहीं आया है तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसकी सत्ता है ही नहीं।
विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। उसे अभी तो आज की गलती कल सुधारने से ही फुरसत नहीं। बाल-बुद्धि आज जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन करती है उसके आगे के तथ्य सामने आने पर पूर्व मान्यताएं बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। यह स्थिति संभव है आगे न रहे जब विज्ञान अपनी किशोरावस्था पार करेगा और यौवन की प्रौढ़ता में प्रवेश करेगा तो उसे ऐसे आधार भी हाथ लग जायेंगे जो आज के भौंड़े उपकरणों की अपेक्षा प्रकृति की अधिक सूक्ष्मता की थाह ला सकें। तब सम्भवतः उन्हें पदार्थ की भौतिक शक्ति के अन्तराल में छिपी हुई चेतना की परतें भी दृष्टिगोचर होने लगेंगी। आज भी इसकी संभावना स्वीकार की जा रही है। इसलिए ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि न होने पर भी विज्ञान अन्यान्य अनेकों सम्भावनाओं की तरह ईश्वर की सम्भावना का भी खण्डन नहीं करता, वह केवल नम्र शब्दों में इतना ही कहता है अभी प्रयोगशालाओं ने अपनी पकड़ में ईश्वर को नहीं जकड़ पाया है। उसका खण्डन इसी सीमा तक है। विज्ञानी नास्तिकता दुराग्रही नहीं हैं। वह अपनी वर्तमान स्थिति का विवरण मात्र प्रस्तुत करती है।
ईश्वर की सत्ता को प्रामाणित करने के लिए यह आधार ही काफी है कि सृष्टि के प्रत्येक घटक को नियम और क्रम के बन्धन में बँधकर रहना पड़ रहा है। कभी−कभी भूकम्प, तूफान, उल्कापात, जैसी घटनाएँ− प्राणियों के पेट के विचित्र आकृति−प्रकृति की सन्तानों का होना जैसे व्यतिक्रम दीख पड़ते हैं, पर गहराई से विचार करने पर वे भी ऐसे नियम कानूनों के आधार पर होते हैं जिन्हें आमतौर से नहीं जानते वे अपन काम करते हैं और जब अवसर पाते हैं तो विलक्षण स्थिति उत्पन्न करते हैं।
महामना मालवीय किसी बहुत जरूरी काम से जा रहे थे। सड़क के किनारे उन्हें एक बीमार बुढ़िया कराहती हुई पड़ी दिखाई दी।
गाड़ी रुकवाई और बुढ़िया को अपनी गाड़ी में लादकर अस्पताल पहुँचाया।
साथी वकील ने पूछा− ऐसे छोटे काम के लिए आपको अपना बहुमूल्य समय क्यों नष्ट करना चाहिए था? मालवीय जी ने गम्भीरतापूर्वक कहा− पीड़ितों की सहायता से बढ़कर और क्या महत्त्वपूर्ण या आवश्यक कार्य हो सकता है?
‘दि मिस्टीरियस यूनीवर्स’ ग्रन्थ के लेखक सर जेम्स जीन्स ने अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि− “इस ब्रह्मांड का सृष्टा कोई विशुद्ध गणितज्ञ रहा होगा। उसने न केवल मानव प्राणी की वरन् अन्य सभी जड़ चेतन कहे जाने वाले प्राणियों और पदार्थों की संरचना में गणित की उच्चस्तरीय विद्या का पूरी तरह प्रयोग किया है। यदि इसमें कहीं कोई भूल रह जाती तो हर चीज बनने से पूर्व ही बिखर जाती। प्राणी जीवन धारण करने से पूर्व ही मर जाते और ग्रह−पिण्ड अपना पूर्ण रूप बनाने से पूर्व ही एक−दूसरे के साथ टकरा कर चूर−चूर हो जाते हैं। यह सृष्टा के गणित ज्ञान का चमत्कार ही है कि न केवल पृथ्वी वरन् समस्त ब्रह्मांड एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के साथ गतिशील है।”
न्यूटन की खोजें किसी समय अत्यन्त सत्य मानी गई थीं, पर अब परिपुष्ट विज्ञान ने उन्हें क्षुद्र, असामयिक एवं व्यर्थ सिद्ध कर दिया है। गुरुत्वाकर्षण की खोज किसी समय एक अद्भुत उपलब्धि थी अब आइंस्टीन का नवीनतम सिद्धान्त प्रामाणिक माना गया है और गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को बाल−विनोद ठहराया गया है। ‘आइंस्टीन के अनुसार देश, काल और एकीकरण की− स्पेश टाइम और काजेशन− के एकीकरण सिद्धान्त की एक वक्राकृति मात्र है जिसे हम पृथ्वी का घुमाव मानते हैं। यह इस वक्रता के दो उपाँशों का आनुपातिक सम्बन्ध भर है। इसी से पृथ्वी घूमती दीखती है और उसकी गतिशीलता को अनुभूति में एक कड़ी गुरुत्वाकर्षण की भी जुड़ जाती है। यह आकर्षण तथ्य नहीं वरन् हलचलों की एक भोंड़ी सी अनुभूति मात्र है।”
कोई चित्रकार यदि अन्य किसी ग्रह पर बैठकर पृथ्वी का रंगीन चित्र बनाये तो वह रंग बिरंगे दृश्यों का एक समतल दृश्य ही होगा। गोला भी बनाया तो वह केवल एक पक्षीय होगा। पूरा गोला इस तरह बनाया जाना असंभव है जो दोनों ओर की स्थिति को एक साथ दिखा सके। कल तक लम्बाई−चौड़ाई बताने वाले चित्र ही तैयार होते थे। − हराई का आभास उनसे यत्किंचित् ही होता था। अब ‘थ्री डाईमेंशनल’ स्थिति देखने की भी सुविधा बन चली है और गहराई को देख सकना भी सम्भव हो गया है। आगे चित्रकला के विकास में कई और डाईमेंशनल जुड़ेंगे, पर अभी तो वे सम्भव नहीं। इसलिए जो भी चित्र बने वे अधूरी दृश्य प्रक्रिया पर निर्भर है। अन्य ग्रह पर बैठकर बनाया गया पृथ्वी का चित्र यहाँ की हलचलों की सही जानकारी दे सके यह सम्भव नहीं। भले ही उस ग्रह के निवासी उस चित्र को कितना ही सर्वांगपूर्ण क्यों न मानें।
हमारे पूर्वज धरती को समतल मानते थे। पीछे पता चला कि वह गोल है। इसके बाद यह जाना गया कि वह घूमती भी है और परिक्रमा भी करती है। इसके उपराँत यह जाना गया कि वह अपने अधिष्ठाता के साथ अन्य भाइयों के साथ किसी महासूर्य की प्रक्रिया के लिए भी दौड़ी जा रही है और वह महासूर्य किसी अतिसूर्य की परिक्रमा में निरत है। अपने सौरमण्डल जैसे अन्य कितने ही सौरमंडल उस महासूर्य सहित अतिसूर्य की प्रदिक्षणा में निरत है। मालूम नहीं यह महा− अति और अत्यन्त अति का सिलसिला कहा जाकर समाप्त हो रहा होगा और पृथ्वी के भ्रमण की कितनी हलचलों का भाग्य उन अचिन्त्य− परिक्रमाओं के साथ जुड़ा होगा। कुछ दिन पूर्व यह भी पता लगा कि पृथ्वी लहकती और थिरकती भी है। सीधे−साधे ढंग से अपनी धुरी पर घूमती भर नहीं है वरन् वह कई प्रकार की कलाबाजियां भी दिखाती है। साँस लेती हुई फूलती और पिचकती भी है इससे उसकी भ्रमणशीलता में अन्तर आता है तदनुसार गुरुत्वाकर्षण भी घटता−बढ़ता है।
अपनी आकाश गंगा में हमारे सौरमण्डल जैसे लाखों सौरमण्डल हैं। इन सौरमण्डलों के अपने ग्रह−उपग्रह हैं। समूचे ब्रह्मांड में कितनी गंगाएं हैं? इन प्रश्न का उत्तर वैज्ञानिक अरबों में गिनते हैं। प्रत्येक आकाश गंगा कितने सौरमण्डल अपनी कमर के साथ रस्सी में बाँधे हैं और वे सौरमण्डल कितने ग्रहों को जकड़े बाँधे बैठे है और उन ग्रहों के साथ कितने उपग्रह चिपके हैं इस सारे पिण्ड परिवार की गणना की जाय तो हमारा अंक गणित झक मारेगा और उस गिनती की पूरी कल्पना तक कर सकना मनुष्य के क्षुद्र मस्तिष्क के लिए सम्भव न हो सकेगा। समस्त ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी जैसे क्षुद्र ग्रह कितने होंगे? और उनमें से कितनी ही- कितने चित्र विचित्र आकृति−प्रकृति के प्राणियों को अपनी गोदी में खिला रही होगी। वहाँ की आणविक− रासायनिक जैवीय परिस्थितियाँ एक दूसरे से कितनी अधिक भिन्न विपरीत होंगी यह सब कल्पना करना ही हमारे लिए अशक्य है। अभी तो अपनी पृथ्वी के वातावरण में जो हलचलें चल रही हैं उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही हैं और उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही है और उन्हीं उलझनों से हम हतप्रभ रह रहे हैं जब अन्य ग्रह तारकों में पृथ्वी से सर्वथा भिन्न प्रकार के वातावरण को ध्यान में रखते हुए हमारे विज्ञान में सर्वथा विचित्र अपरिचित विज्ञान का ककहरा पढ़ेंगे तो लगेगा कि इतने असीम ज्ञान−विज्ञान का क्षुद्र मानव मस्तिष्क द्वारा खोज पाया जाना तो दूर उसकी समूची कल्पना करना तथा अशक्य है।
विज्ञान अभी अपना बचपन भी पार नहीं कर पाया कि उसे अपने विषय की गहराई दिन−दिन अधिक दुरूह प्रतीत होती जा रही है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई इलेक्ट्रॉन घोषित तो कर दी गई है पर उसका किसी भी यन्त्र से अब तक प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सका। न उसे आंखें से देखो गया है न चित्र से उतारा गया है। वह मात्र एक परिकल्पना है जिसे ‘रूप हीन’ कहकर पिण्ड छुड़ाया गया है। इस इकाई की गतिविधियाँ तो नोट करली गई हैं, पर वे क्यों होती हैं इन हलचलों के लिए उन्हें प्रेरणा एवं क्षमता कहाँ से मिलती हैं। खर्च होने वाली शक्ति की वे पूर्ति कहाँ से करती हैं इसका कोई उत्तर प्राप्त नहीं किया जा सका। अणु विज्ञान के मूर्धन्य मनीषी आइन्स्टीन और मैक्स प्लेक तक इस सम्बन्ध में चुप है और यह सोचते हैं कि भौतिक सत्ता के ऊपर कोई अभौतिक सत्ता छाई हुई है। यह अभौतिक सत्ता क्या हो सकती है और उसका उद्देश्य एवं क्रिया−कलाप क्या होना चाहिए यह खोज पाना अभी विज्ञान के लिए बहुत आगे की बात है।
परमाणु परिवार से लेकर सौरमण्डल और ब्रह्मांड संव्याप्त ग्रहपिण्ड परिकर के बारे में हम अभी इतना भी नहीं जानते जितना कि सारे शरीर की तुलना में एक बात। हम केवल पंचतत्वों से बने हुए स्थूल पदार्थों के बारे में ही थोड़ी बहुत जानकारी प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्राप्त कर सके हैं। जीव सत्ता− मस्तिष्कीय सम्भावना, अचेतन मन की अतीन्द्रिय शक्ति के अगणित प्रमाण होते हुए भी अभी वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती है। असंख्य क्षेत्रों की जानकारियां अभी प्रारंभिक अवस्था को भी पार नहीं कर सकी हैं। ऐसी दशा में यदि ईश्वर जैसा अति सूक्ष्म तत्व प्रयोगशालाओं की पकड़ में नहीं आया तो यह नहीं कहा जाना चाहिए कि वह नहीं हैं। तत्वदर्शी दृष्टि से हम उसकी सत्ता महत्ता और व्यवस्था सहज ही सर्वत्र बिखरी देख सकते हैं और उस पर श्रद्धा भरा विश्वास कर सकते हैं।

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विज्ञान की नज़र से क्या पुनर्जन्म होता है

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पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है।
पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता है, मात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसे ही चेतना का नाश नहीं हो सकता।चेतना को वैज्ञानिक शब्दावली में ऊर्जा की शुद्धतम अवस्था कह सकते हैं। चेतना सत्ता का मात्र एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है।
पुनर्जन्म का दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वजन्म की स्मुति युक्त बालकों का जन्म लेना है। बालकों के पूर्वजन्म की स्मृति की परीक्षा आजकल दार्शनिक और परामनोवैज्ञानिक करते हैं। पूर्वभव के संस्कारों के बिना मोर्जाट चार वर्ष की अवस्थ्सा में संगीत नहीं कम्पोज कर सकता था। लार्ड मेकाले और विचारक मील चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक जान गाॅस तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्वभव में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारत हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे।
प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना ओर अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। शिशु बतख स्वतः तैरना सीख जाती है। इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है?
डाॅ. स्टीवेन्सन ने अपने अनुसंधान के दौरान कुछ ऐसे मामले भी देखे हैं जिसमें व्यक्ति के शरीर पर उसके पूर्वजन्म के चिन्ह मौजूद हैं। यद्यपि आत्मा का रुपान्तरण तो समझ में आता है लेकिन दैहिक चिन्हों का पुनःप्रकटन आज भी एक पहेली है।
डाॅ. हेमेन्द्र नाथ बनर्जी का कथन है कि कभी-कभी वर्तमान की बीमारी का कारण पिछले जन्म में भी हो सकता है। श्रीमती रोजन वर्ग की चिकित्सा इसी तरह हुई। आग को देखते ही थर-थर कांप जाने वाली उक्त महिला का जब कोई भी डाॅक्टर इलाज नहीं कर सका। तब थककर वे मनोचिकित्सक के पास गई। वहां जब उन्हें सम्मोहित कर पूर्वभव की याद कराई  कई, तो रोजन वर्ग ने बताया कि वे पिछले जन्म में जल कर मर गई थीं। अतः उन्हें उसका अनुभव करा कर समझा दिया गया, तो वे बिल्कुल स्वस्थ हो गई। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने विल्सन कलाउड चेम्बर परीक्षण में चूहे की आत्मा की तस्वीर तक खींची है। क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि मृत्यु पर चेतना का शरीर से निर्गमन हो जाता है?
सम्पूर्ण विश्व के सभी धर्मो, वर्गों, जातियों एवं समाजों में पुनर्जन्म के सिद्धांतों किसी न किसी रुप में मान्यता प्राप्त है।
अंततः इस कम्प्युटर युग में भी यह स्पष्ट है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत विज्ञान सम्मत है। आधुनिक तकनीकी शब्दावली में पुनर्जन्म के सिद्धांत को इस तरह समझ सकते हैं। आत्मा का अदृश्य कम्प्युटर है और शरीर एक रोबोट है। हम कर्मों के माध्यम से कम्प्युटर में जैसा प्रोग्राम फीड करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। कम्प्युटर पुराना रोबोट खराब को जाने पर अपने कर्मों के हिसाब से नया रोबोट बना लेता है।
पुनर्जन्म के विपक्ष में भी अनेक तर्क एवं प्रक्ष खड़े हैं। यह पहेली शब्दों द्वारा नहीं सुलझाई जा सकती है। जीवन के प्रति समग्र सजगता एवं अवधान ही इसका उत्तर दे सकते हैं। संस्कारों की नदी में बढ़ने वाला मन इसे नहीं समझ सकता है।
पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है।
पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता है, मात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसे ही चेतना का नाश नहीं हो सकता।चेतना को वैज्ञानिक शब्दावली में ऊर्जा की शुद्धतम अवस्था कह सकते हैं। चेतना सत्ता का मात्र एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है।
पुनर्जन्म का दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वजन्म की स्मुति युक्त बालकों का जन्म लेना है। बालकों के पूर्वजन्म की स्मृति की परीक्षा आजकल दार्शनिक और परामनोवैज्ञानिक करते हैं। पूर्वभव के संस्कारों के बिना मोर्जाट चार वर्ष की अवस्थ्सा में संगीत नहीं कम्पोज कर सकता था। लार्ड मेकाले और विचारक मील चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक जान गाॅस तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्वभव में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारत हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे।
प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना ओर अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। शिशु बतख स्वतः तैरना सीख जाती है। इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है?
डाॅ. स्टीवेन्सन ने अपने अनुसंधान के दौरान कुछ ऐसे मामले भी देखे हैं जिसमें व्यक्ति के शरीर पर उसके पूर्वजन्म के चिन्ह मौजूद हैं। यद्यपि आत्मा का रुपान्तरण तो समझ में आता है लेकिन दैहिक चिन्हों का पुनःप्रकटन आज भी एक पहेली है।
डाॅ. हेमेन्द्र नाथ बनर्जी का कथन है कि कभी-कभी वर्तमान की बीमारी का कारण पिछले जन्म में भी हो सकता है। श्रीमती रोजन वर्ग की चिकित्सा इसी तरह हुई। आग को देखते ही थर-थर कांप जाने वाली उक्त महिला का जब कोई भी डाॅक्टर इलाज नहीं कर सका। तब थककर वे मनोचिकित्सक के पास गई। वहां जब उन्हें सम्मोहित कर पूर्वभव की याद कराई  कई, तो रोजन वर्ग ने बताया कि वे पिछले जन्म में जल कर मर गई थीं। अतः उन्हें उसका अनुभव करा कर समझा दिया गया, तो वे बिल्कुल स्वस्थ हो गई। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने विल्सन कलाउड चेम्बर परीक्षण में चूहे की आत्मा की तस्वीर तक खींची है। क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि मृत्यु पर चेतना का शरीर से निर्गमन हो जाता है?
सम्पूर्ण विश्व के सभी धर्मो, वर्गों, जातियों एवं समाजों में पुनर्जन्म के सिद्धांतों किसी न किसी रुप में मान्यता प्राप्त है।
अंततः इस कम्प्युटर युग में भी यह स्पष्ट है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत विज्ञान सम्मत है। आधुनिक तकनीकी शब्दावली में पुनर्जन्म के सिद्धांत को इस तरह समझ सकते हैं। आत्मा का अदृश्य कम्प्युटर है और शरीर एक रोबोट है। हम कर्मों के माध्यम से कम्प्युटर में जैसा प्रोग्राम फीड करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। कम्प्युटर पुराना रोबोट खराब को जाने पर अपने कर्मों के हिसाब से नया रोबोट बना लेता है।
पुनर्जन्म के विपक्ष में भी अनेक तर्क एवं प्रक्ष खड़े हैं। यह पहेली शब्दों द्वारा नहीं सुलझाई जा सकती है। जीवन के प्रति समग्र सजगता एवं अवधान ही इसका उत्तर दे सकते हैं। संस्कारों की नदी में बढ़ने वाला मन इसे नहीं समझ सकता है
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इस तरह आत्माएं हमसे संपर्क बना लेती हैं

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parapsycholoy how atma contect with human

मुण्डकोपनिषद् के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है। इनका केन्द्र हिमालय की वादियों में उत्तराखंड में स्थित है। इसे देवात्मा हिमालय कहा जाता है। इन दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल-शरीरधारी व्यक्ति सामान्यतया नहीं पहुंच पाते हैं।

अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माएं यहां प्रवेश कर जाती हैं। जब भी पृथ्वी पर संकट आता है, नेक और श्रेष्ठ व्यक्तियों की सहायता करने के लिए पृथ्वी पर भी आते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का इस मामले में कुछ और ही कहना है।
प्रसिद्घ भौतिक विज्ञानी मार्टिन गार्डनर ने लिखा है कि- इस संसार में हर दिन हजारों व्यक्तियों के साथ ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं घटती रहती है जिसे महज संयोग या अपवाद मानकर खारिज कर दिया जाता है।

इन घटनाओं में से कुछ को भले ही संयोग मान लिया जाए लेकिन ऐसी विलक्षण घटनाएं होती हैं उन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।

ब्रिटेन के विख्यात भौतिकशास्त्री और गणितज्ञ एड्रिन डॉब्स ने विभिन्न अनुसंधानों के उपरांत यह निष्कर्ष दिया कि ब्रह्माण्ड में ऐसी सूक्ष्म संदेश वाहक शक्तियां निरंतर प्रवाहित होती रहती है जो मानवी ज्ञानेन्द्रिय से संपर्क स्थापित करती है।
इन तरंगों की वेवलेन्थ तरंग दैर्ध्य लगभग एक समान होती है। द रूट्स ऑफ कोइन्सीडेन्स नामक पुस्तक में आर्थर कोएस्लर ने लिखा है कि- इस माध्यम से ब्रह्माण्ड व्यापी अदृश्य चेतन-शक्तियां शरीरधारी मनुष्यों से संपर्क साधती है, उन्हें पूर्वाभास कराती है, मार्गदर्शन कराती है और संकट के समय मनोबल बढ़ाने वाली चेतना देती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि सूक्ष्म शरीरधारियों में एक्टोप्लाज्म नामक एक सूक्ष्म द्रव्य मौजूद होता है। संभवतः जीवात्मा इन्हीं का उपयोग करके भौतिक आकार ग्रहण करती है।

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यौनकर्म को कानूनी दर्जे से घटेगा एड्स

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मेलबर्न में 20वीं अंतरराष्ट्रीय एड्स कांफ्रेंस में कहा गया है कि यौनकर्म पर कानूनी पाबंदी हटा देने से एड्स की रोकथाम में मदद मिलेगी. रिसर्चरों ने कई देशों से जमा आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट पेश की.
एचआईवी के संक्रमण में सबसे बड़ा हाथ महिला यौनकर्मियों का माना जाता है. नीति निर्माताओं का कहना है कि अगर इन्हें कानूनी दर्जा दिया जाता है तो एचआईवी/एड्स के प्रति जागरुकता फैलाने में आसानी होगी. एड्स के फैलाव, कॉन्डोम, और एचआईवी की दवा के बारे में खुलकर बात हो सकेगी और प्रचार बढ़ेगा.
रिसर्चरों के मुताबिक अपने काम को जब यौनकर्मी कानून के दायरे में रह कर करेंगे तो वे सेक्स सुरक्षा संबंधी मामलों पर सलाह लेने में झिझकेंगे नहीं. कॉन्डोम के इस्तेमाल और दवाओं तक उनकी पहुंच भी आसान हो सकेगी. वे अपने ग्राहक से बिना डरे कह सकेंगे कि वे सुरक्षित सेक्स चाहते हैं. असुरक्षित सेक्स एचआईवी वायरस संक्रमण का सबसे बड़ा कारण है.
AIDS Konferenz Melbourne
साइंस पत्रिका लैंसेंट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक अगले एक दशक में 33 से 46 फीसदी तक एड्स के फैलाव को कम किया जा सकता है. हालांकि रिसर्चरों ने माना कि कई इलाकों में दूसरे तरीके ज्यादा मददगार साबित हो सकते हैं. केन्या में अगर एचआईवी संक्रमित यौनकर्मियों को वायरस दबाने वाली दवा दी जाए तो अगले दस सालों में एचआईवी के मामलों में एक तिहाई कमी आ सकती है.
इस मॉडल को तैयार करने के लिए रिसर्चरों ने प्रमुख साइंस पत्रिकाओं के 204 शोधों का अध्ययन किया. 2012 में 20 गरीब और पिछड़े देशों में हुई एक जांच के मुताबिक 12 फीसदी यौनकर्मियों को एचआईवी संक्रमित पाया गया. दक्षिणी सहारा देशों में 50 फीसदी तक यौनकर्मी एचआईवी संक्रमित हैं. एक ताजा रिसर्च के मुताबिक दुनिया भर में एड्स के कारण मरने वाली 92 फीसदी यौनकर्मी अफ्रीकी देशों के हैं.
एसएफ/एमजी (एएफपी) sabhar :http://www.dw.de/

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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

टीवी पर एंकर की जगह दिखाई देंगे रोबोट

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कैसा होगा वो दिन जब टीवी पर किसी खूबसूरत एंकर को आप खबरें पढ़ते हुए देख रहे हैं और आपकोपता चलेकि वो एंकर कोई इंसान नहीं बल्कि एक रोबोट है. जी हां आने वाला समय अब रोबोटिक होने वाला है.
जापान के एक कंप्यूटर साइंटिस्ट हिरोशी इशीगोरो ने ऐसे रोबोट टीवी प्रेजेंटर बनाए हैं जो दिखने में एकदम इंसान की तरह लगते हैं. ये रोबोट न कि खबरें पढ़ते हैं, बल्कि आंखें, भौंए और होंठ भी हिलाते हैं. ये अनोखे रोबोट बिल्कुल इंसानों की तरह डिस्कस करते हैं.
इसमें चौंकाने वाली यह भी है कि इन रोबोट्स इस तरह से बनाया गया है कि जरूरत पड़ने इन्हें मेल या फिर फीमेल टीवी प्रेजेंटर के रूप में भी काम में लिया जा सकता है.
इन दोनों अनोखे रोबोट्स में एक का नाम कोडोमोरॉयड है जबकि दूसरे का नाम ओटोनोरॉयड. इन्हें हाल ही में टोक्यो म्यूजियम में लोगों के बीच डिस्पले किया गया है sabhar :http://www.palpalindia.com/

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अफगानिस्तान में मिला ५००० साल पुराना महाभारतकालीन विमान

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अभी तक हम धर्मग्रंथों में ही पढ़ते ही रहे हैं कि रामायणकाल और महाभारत काल में विमान होते थे। पुष्पक विमान के बारे में भी हम सबने पढ़ा है।...लेकिन हाल ही में एक सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक अफगानिस्तान में एक ५००० साल पुराना विमान मिला है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह महाभारतकालीन हो सकता है।
 
वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने एक विमान को हाल ही में अफ‍गानिस्तान की एक गुफा में पाया गया है। कहा जाता है कि यह विमान एक 'टाइम वेल' में फंसा हुआ है अथवा इसके कारण सुरक्षित बना हुआ है। यहां इस बात का उल्लेख करना समुचित होगा कि 'टाइम वेल' इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है।
कहा जा रहा है कि यह विमान महाभारत काल का है और इसके आकार-प्रकार का विवरण महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में‍ किया गया है। इस कारण से इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं। रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज (एसवीआर) का कहना है कि यह महाभारत कालीन विमान है और जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। इस एजेंसी ने २१ दिसंबर २०१० को इस आशय की रिपोर्ट अपनी सरकार को पेश की थी।
घातक हथियार भी लगे हैं इस विमान में..
रूसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि यह प्रागेतिहासिक मिसाइलों से संबंधित विवरण है। अमेरिकी सेना के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाशगंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों।
एसवीआर रिपोर्ट का कहना है कि यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप ४० सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। संस्कृत भाषा में विमान केवल उड़ने वाला वाहन ही नहीं होता है वरन इसके कई अर्थ हो सकते हैं, यह किसी मंदिर या महल के आकार में भी हो सकता है।
चीन को भी तलाश है भारत के प्राचीन ज्ञान की
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कुछेक वर्ष पहले ही चीनियों ने ल्हासा, ति‍ब्बत में संस्कृत में लिखे कुछ दस्तावेजों का पता लगाया था और बाद में इन्हें ट्रांसलेशन के लिए चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में भेजा गया था।
यूनिवर्सिटी की डॉ. रूथ रैना ने हाल ही इस बारे में जानकारी दी थी कि ये दस्तावेज ऐसे निर्देश थे जो कि अंतरातारकीय अंतरिक्ष विमानों (इंटरस्टेलर स्पेसशिप्स) को बनाने से संबंधित थे।
हालांकि इन बातों में कुछ बातें अतरंजित भी हो सकती हैं कि अगर यह वास्तविकता के धरातल पर सही ठहरती हैं तो प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के बारे में ऐसी जानकारी सामने आ सकती है जो कि आज के जमाने में कल्पनातीत भी हो सकती है।
स्त्रोत : हिंदी वेबदुनिया SABHAR :http://www.hindujagruti.org/

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