फिर कहां से आएगा गंगा में जल
उसके बाद यह पूरी तरह लुप्त हो जाएगा। आशय यह है कि गंगोत्री ही सूख जाएगी तो गंगा में वह पानी कहां से आएगा जिसे बड़े आदर के साथ नीर और जल कहा जाता है।
गंगा जल में अब वह बात नहीं
गंगा के पवित्र होने की बात शुरु से प्रचलित है। इसका वैज्ञानिक आधार सिद्ध हुए वर्षों बीत गए। उसके अनुसार नदी के जल में मौजूद बैक्टीरियोफेज नामक जीवाणु गंगाजल में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों को जीवित नहीं रहने देते।
गंगाजल में प्राणवायु की प्रचुरता बनाए रखने की अदभुत क्षमता है। इस कारण पानी से हैजा और पेचिश जैसी बीमारियों का खतरा बहुत ही कम हो जाता है। लेकिन अब वह बात नहीं रही।
गंगा आखिर कैसे बन गई गंदाजल
लेकिन जो विशेषताएं गंगा स्नान कर या उसके किनारे रह चुके लोगों को या वहां के वातावरण को जिस ऊर्जा से भर देती हैं, उन्हें लौटा लाने को कोई उपाय नहीं है।
गंगा किनारे तीर्थ और स्नान के नियम
अंपायर आफ द मुगल पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक अलक्स रदरफोर्ड ने लिखा है कि करीब छह सौ साल के सल्तनत और मुगल काल के शासन में भी इन तीर्थों की आंतरिक संरचना और व्यवस्था में कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई।
लेकिन पिछले साठ वर्ष में बाजारवाद और आधुनिकता अभिमानी तंत्र ने तीर्थों की उस व्यवस्था को तहस नहस कर दिया। अब उस व्यवस्था का न जानकार हैं और न ही उसे ढूंढा व खोज सकने वाला तंत्र। ऐसे में उस व्यवस्थित करने वाली ऊर्जा और ज्ञान का भी अंनुसंधान किया जाना sabhar :http://www.amarujala.com/