सोमवार, 3 मार्च 2014
जोसेफ स्टालिन का रहस्यवादी युद्ध
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जर्मन फ्यूरेर एडॉल्फ हिटलर के रहस्यवादी जूनून के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है| जर्मन संगठन "Ahnenerbe" (पूर्वजों की विरासत ) गूढ़ अनुसंधान और रहस्यमय शक्तियों से जुडी कलाकृतियों को खोजने में व्यस्त था और उस की गतिविधियों के बारे में भी विशेषज्ञ अच्छी तरह से जानते हैं| लेकिन इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन के लिए भी रहस्यवाद वास्तव में अनजाना विषय नहीं था, हालांकि सोवियत संघ का सरकारी रवैया नास्तिकता के प्रचार का था| हमारी आज की कहानी स्टालिन और उनके रहस्यवाद के बारे में है|
जोसेफ स्टालिन को पता था कि नाजी जर्मनी के साथ युद्ध अपरिहार्य था, लेकिन उन्होंने सोचा था कि यह युद्ध1941 में नहीं लेकिन दो या तीन साल बाद शुरू होगा| हिटलर द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण स्टालिन के लिए एक अप्रिय आश्चर्य के रूप में प्रकट हुआ| 22 जून 1941 के दिन बख्तरबंद जर्मन सेना ने सोवियत संघ की सीमा को पार कर लिया| हिटलर की सेना, जिसने उस समय तक आधे से अधिक यूरोप पर कब्जा कर लिया था, अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली थी| हिटलर की योजना एक आकस्मिक हमले के माध्यम से मास्को पर कब्जा करने की थी| प्रारंभ में जर्मन सैनिकों को उनके हमले में सफलता मिली और सोवियत सेना को हार के बाद हार का सामना करना पड़ा| शत्रु तेजी से मास्को की ओर बढ़ रहा था| शरद ऋतु तक सोवियत राजधानी में आतंक छा गया| स्टालिन के मास्को से प्रस्थान के बारे में अफवाहें चारों ओर फैल गई थीं| सरकार को स्थानांतरित करने के लिए तैयारी वास्तव में जारी थी| इस प्रयोजन के लिए एक विशेष ट्रेन को पूरी गोपनीयता में एक गुप्त स्थान पर तैयार रखा गया था|
मास्को के बाहरी इलाके में धन्य मात्रोना रहती थी जो रूसी ईसाइयों द्वारा अत्यधिक सम्मानित की जाती थी| वह जन्म से अंधी थी, लेकिन उसमें आध्यात्मिक आंखों के माध्यम से आम लोगों की तुलना में अधिक देखने की क्षमता थी| वह बीमार लोगों की चिकित्सा करती थी और उसे भविष्यवाणी करने की ईश्वरीय देन प्राप्त थी| मास्को छोड़ने के बारे में अंतिम निर्णय लेने से एक दिन पहले स्टालिन उसे मिलने के लिए गया| कहा जाता है कि जब स्टालिन ने कमरे में प्रवेश किया तो मात्रोना की पीठ दरवाजे की ओर थी और वह खिड़की के पास बैठीथी| कहते हैं कि स्टालिन कमरे में आया और उसने सहायक को बर्खास्त करने के लिए इशारा किया. मात्रोना चुपचाप बैठी थी| स्टालिन ने खांस कर अपनी उपस्थिति जताने की कोशिश की|
" जोसेफ क्या तुम्हें ठण्ड लग गई है ? तुम खाँस रहे हो," मात्रोना ने मुड़े बिना पूछा|
" नमस्ते", स्टालिन ने धीरे से जवाब दिया, "मैं ठीक हूँ "|
"यह अच्छी बात है| तुम्हें अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत है| यह कठिन समय है और जल्द खत्म होने वाला नहीं है| हालांकि बचने के लिए एक विशेष ट्रेन तैयार करने कीकोई ज़रूरत नहीं थी | आपको इसकी आवश्यकता नहीं है| "
" आपको कैसे पता चला? " स्टालिन हैरान था |
" भगवान से", मात्रोना ने शांति से उत्तर दिया, “मत जाओ, जर्मन आक्रामक मास्को नहीं ले पाएगा|”
"और यह मेरी जीत होगी ? "
मात्रोना ने सिर हिलाकर जवाब दिया :
"तुम्हारी नहीं,हमारी| सभी लोगों की जीत| भगवान हमारे साथ है| खैर, तुम्हारी भी| तो तुमने नहीं जाने का फैसला किया है ? "
अपने चरमराते जूतों में स्टालिन ने एक पैर से दूसरे पैर पर भार बदलते हुए कहा, "इस के बारे में सोचना होगा|"
स्टालिन ने मास्को नहीं छोड़ा| हिटलर ने 7 नवम्बर 1941 के दिन रूसी राजधानी पर जीत के लिए योजना बनाई थी, लेकिन इस दिन लाल सेना द्वारा क्रेमलिन की दीवार के नीचे परेड का आयोजन किया गया| परेड का निरीक्षण स्वयं जोसेफ स्टालिन ने किया| नए टैंक परेड के मैदान में उतारे गए, साइबेरिया और सुदूर पूर्व से सैनिकों के दस्ते और नौसैनिक दल भी सेनानियों में शामिल हो गए| परेड से वे सीधे युद्धक्षेत्र की ओर रवाना हो गए| दुनिया में इस परेड के बारे में संदेश से अधिक कोई महत्वपूर्ण खबर नहीं थी| मास्को के निकट लाल सेना के जवाबी हमले ने नाजियों को आश्चर्यचकित कर दिया| सोवियत कैमरामैनों द्वारा निर्मित फिल्म "मास्को के पास जर्मन सैनिकों की हार" कई देशों में स्क्रीन पर दिखाई गई| भारत में यह फिल्म खास तौर पर लोकप्रिय हुई, क्योंकि भारत लड़ाई में हिटलर विरोधी गठबंधन में शामिल होने वाले पहले देशों में से एक था और यूरोप और अफ्रीका के मोर्चों पर नाजियों के विरुद्ध लड़ा| 1943 में, मास्को की लड़ाई के बारे में बनाए गए वृत्तचित्र ने सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र फीचर फिल्म के लिए "ऑस्कर" जीता|
दिव्यदृष्टा लोगों की एक विशेष क्षमता यह थी कि अच्छाई और बुराई के बीच सबसे बड़ी लड़ाई के परिणाम का चित्र उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाता था| वास्तविक घटनाओं से पता चला कि उनकी भविष्यवाणी कभी कभी बहुत सटीक रहती थी|
प्रसिद्ध मोहनिद्राप्रेरक और भेदक जादूगर वुल्फ मेस्सिंग ने कई देशों में दौरा किया| उन्होंने एक बार कहा था कि यदि जर्मनी सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध छेड़ेगा तो जर्मन फ्यूरर खुद मर जाएगा| जब हिटलर को इसके बारे में पता चला तो उसे बहुत क्रोध आया और उसने मेस्सिंग के सिर के लिए दो लाख जर्मन मार्क के पुरस्कार की घोषणा की| नाजी गुप्त सेवाओं को वुल्फ मेस्सिंग को वारसा में गिरफ्तार करने में कामयाबी मिली| परन्तु मेस्सिंग गेस्टापो को सौंपे जाने के बाद गार्ड को सम्मोहित करने में कामयाब रहे और हिरासत से भाग निकले| फिर वह सोवियत संघ पहुँच गए|
सोवियत शहरों में मेस्सिंग के दौरों को भारी लोकप्रियता मिली| वह सम्मोहन द्वारा लोगों का वशीकरण करते थे, और दर्शकों के विचारों को पढ़ लेते थे| सोवियत संघ पर जर्मन हमले से कुछ ही महीने पहले 1940 की सर्दियों में मेस्सिंग ने लाल सेना की जीत की भविष्यवाणी की| मेस्सिंग ने बताया कि उन्होंने अंतर्दृष्टि से वास्तविकता के रूप में बर्लिन की सड़कों पर सोवियत टैंक देखे थे| 1943 में एक प्रदर्शन के दौरान उन्होंने विजय का निर्दिष्ट दिनांक भी बताया-- मई 9| इस भविष्यवाणी के बारे में स्टालिन को भी पता चला| और जब 9 मई 1945 के दिन जर्मनी ने आत्मसमर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर किए तो स्टालिन ने मेस्सिंग को बधाई का तार भेजा|
युद्ध के बाद स्टालिन ने मेस्सिंग को क्रेमलिन बुलाया| कलाकार ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया परन्तु सोवियत नेता ने इसमें ज्यादा उत्साह व्यक्त नहीं किया| केवल अपने पाइप से धुआं उड़ाते हुए उन्होंने मेस्सिंग से पूछा:
अगर मैं आपको बाहर न निकलने देने के आदेश दूँ तो क्या आप क्रेमलिन के बाहर निकल सकते हैं?”
“मैं कोशिश कर सकता हूँ, कॉमरेड स्टालिन|” .
मेस्सिंग ने स्टालिन को अलविदा कहा और दरवाजा खोलकर बाहर चला गया| समूची सुरक्षा व्यवस्था को पार करने के बाद घर लौट आया| शाम को स्टालिन ने फोन किया:
“आप ऐसा कैसे कर पाए, मुझे बताओ? सभी चौकिओं पर आप को नहीं निकलने देने की चेतावनी दी गई थी|”
“यह बहुत आसान है। आप ने मेस्सिंग को रोकने का आदेश दिया था| मैं रक्षकों के मन में यह विश्वास पैदा कर पाया कि मैं मार्शल वराशीलोव हूँ|”
महान युद्ध के प्रकोप के साथ भी एक रहस्यमय इतिहास जुड़ा हुआ है| नाजी जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर हमले से कुछ ही समय पहले 1941 की गर्मियों में स्टालिन ने व्यक्तिगत रूप से तैमूर राजवंश की कब्र की खुदाई की शुरुआत के निर्देश पर हस्ताक्षर किए थे| अक्सर कहा जाता है कि तैमूर लंग या तैमूर इतिहास में सबसे बड़े विजेताओं में से एक था जिसने 14वीं सदी में मध्य एशिया में एक विशाल राज्य बनाया और रूस, भारत, ईरान और चीन के विरुद्ध कई लम्बे सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया| तैमूर का मकबरा समरकंद में सोवियत संघ के क्षेत्र पर था| बड़ी संख्या में पुरातत्वविदों और खुफिया कर्मियों का दल वहाँ भेजा गया| खुदाई का काम तेजी से किया गया| सबसे पहले तैमूर लंग के बेटे और पोते के अवशेष पाए गए| उन्के नीचे हरिताश्म पत्थर की तीन टन की एक स्लैब पर तैमूर लंग के अनेक नाम और ताबूत खोलने की चष्ट करने वालों के नाम एक चेतावनी दिखाई दी| शिलालेख पर लिखा था: "यदि कोई भी व्यक्ति तैमूर की कब्र खोलने की कोशिश करेगा तो वह सजा का भागी होगा और दुनिया भर में भयंकर युद्ध छिड़ जाएगा| " खतरनाक शब्दों ने शोधकर्ताओं का जोश ठंडा कर दिया लेकिन फिर भी स्लैब उठाने का फैसला किया गया| तैमूर लंग के अवशेष 21 जून 1941 को निकाले गए और अगले दिन 22 जून को पुरातत्वविदों ने रेडियो पर सुना कि नाजी जर्मनी ने आक्रमण न करने की संधि का उल्लंघन करते हुए सोवियत संघ की सीमा को पर कर लिया|
पुरातत्वविदों का दल मॉस्को लौट आया| स्टालिन को खुदाई और कड़ी चेतावनी के बारे में कुछ महीनों के बाद ही बताया गया| उन्होंने तुरंत महान
विजेता और उसके रिश्तेदारों के अवशेष फिर से दफनाने के लिए आदेश दिया| महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सम्बन्ध में तीन रोचक तथ्य
सामने आये: पहला तथ्य यह है कि तैमूर वंश के अवशेषों के
विधिपूर्ण शवाधान के लिए उस समय के लिए एक बड़ी राशि का
आवंटन किया गया- इस राशि से 16 टैंकों का निर्माण किया जा सकता था| दूसरा तथ्य: दफन से से पहले तैमूर लंग के अवशेष एक महीने के लिए पुरातत्वविदों की दृष्टि से ओझल हो गए|
लाल सेना में भर्ती मुस्लिम सैनिकों के मुताबिक, जिनकी संख्या काफी बड़ी थी, तैमूर लंग के अवशेष इस समय में युद्ध मोर्चों पर दिखाई
दिए| वे ईसाई धार्मिक स्मृति चिन्हों की तरह प्रतिष्ठित किए गए ताकि योद्धाओं को प्रेरित कर सकें|. स्टालिन ने उन्हें हवाई जहाज पर
युद्धक्षेत्र की लाइन पर ले जाने का आदेश दिया| तीसरा और अंतिम तथ्य: तैमूर लंग और उसके परिवार के अवशेषों को पूर्ण सम्मान के साथ 20 दिसम्बर 1942 को दफनाया गया| और इन दिनों सोवियत सेना ने स्टालिनग्राद की लड़ाई में घिरी फ़ील्डमार्शल Paulus की सेना को छुड़ाने की कोशिश कर रहे जर्मन सैनिकों को पछाड़ दिया| इस सफलता ने जर्मन सेना की स्थिति को बिलकुल निराशाजनक बना दिया| और छह हफ्ते बाद फील्ड मार्शल Paulus ने अपनी सेना के अवशेष के साथ आत्मसमर्पण कर दिया| स्टालिनग्राद में सोवियत सेना की जीत द्वितीय विश्व युद्ध में एक महत्वपूर्ण मोड़ था|
अमेरिकी पत्रिका "टाइम" ने 1942 में स्टालिन को Man of the Year के रूप में मान्यता दी| इस साप्ताहिक पत्रिका की रेटिंग में स्टालिन ने पहले भी खुद को पाया था लेकिन एक तानाशाह और एक दुष्ट
प्रतिभाशाली आदमी के रूप में| इस बार स्टालिन को बुराई के खिलाफ लड़ाई में एक नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया| इंग्लैंड के किंग जॉर्ज VI ने उन्हें एक प्रतीकात्मक तलवार निम्नलिखित उत्कीर्ण शब्दों के साथ भेजी: "स्टालिनग्राद के फौलादी लोगों को समर्पित"
1943 में तेहरान में आयोजित एक सम्मेलन में हिटलर विरोधी गठबंधन के तीन नेता जोसेफ स्टालिन, फ्रेंकलिन रूजवेल्ट और विंस्टन चर्चिल पहली बार मिले| सम्मेलन के परिणाम स्टालिन के लिए काफी अनुकूल निकले| सबसे पहले, मित्र राष्ट्रों ने मई 1944 से पहले ब्रिटिश चैनल के इस पार दूसरे मोर्चे को खोलने का वादा किया| और दूसरी बात, जीत के बाद प्रतिभागियों के बीच जर्मनी के विभाजन पर एक प्रारंभिक समझौते पर भी सहमति बन गई|
विद्वान् विंस्टन चर्चिल के अनुसार स्टालिन में कुछ रहस्यमय शक्ति थी: “जब स्टालिन हॉल में आया तो मैं, एक रईस, कूद कर, और दोनों हाथ सिपाही की तरह सीधे रख कर खड़ा हो गया," विंस्टन चर्चिल ने अपने संस्मरण में इस भेंट की चर्चा करते हुए बाद में लिखा|
उसी वर्ष 1943 में राज्य द्वारा प्रोत्साहित नास्तिकता के समर्थक देश सोवियत संघ में आर्थोडक्स चर्च का उत्पीड़न बंद कर दिया गया| ईसाई चर्चों, मठों, धार्मिक अकादमी को फिर से खोल दिया गया और रूसी चर्च के पैट्रिआर्क को चुना गया| यह एक और रहस्यमय कहानी का परिणाम था|
लेबनान के पहाड़ों पर बसे Antiochian आर्थोडक्स ईसाई चर्च के मेट्रोपोलिटन एलिजा शत्रुओं के आक्रमण से रूस की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने वालों में अग्रणी थे| उन्होंने एकांत में प्रार्थना करने के लिए एक गहरे पथरीले तहखाने को चुना जहाँ बाहर की दुनिया से कोई आवाज नहीं आ सकती थी| भोजन, पानी और नींद का परिष्कार करते हुए उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया| तीन दिन बाद उन्होंने एक आवाज सुनी जिसने उन्हें बताया कि रूस में क्या किया जाना जरूरी है| कहा जाता है कि एलिजा ने लिखा: मंदिरों, मठों, धार्मिक अकादमियों और मदरसों को खोल दिया जाए| पुजारियों को युद्ध के मोर्चे से तुरंत वापिस बुलाया जाए ताकि वे ईश्वर की सेवा कर सकें| गुफा से बाहर निकलने के बाद मेट्रोपोलिटन एलिजा ने रूसी आर्थोडक्स चर्च के प्रतिनिधियों और सोवियत सरकार से संपर्क किया| भूतपूर्व सोवियत संघ की राज्य सुरक्षा समिति के अभिलेखागार में आजतक उनका टेलीग्राम और पत्र सुरक्षित हैं| स्टालिन ने उनकी शर्तें पूरी तरह से स्वीकार कर लीं|
युद्ध में जीत के बाद अक्टूबर 1947 में स्टालिन ने मेट्रोपोलिटन एलिजा को रूस आमंत्रित किया| इस बैठक पर खींची गई फिल्म की फुटेज आज भी संरक्षित है| मेट्रोपोलिटन एलिजा को रत्नों से सजाया पवित्र आइकॉन और क्रॉस उपहार में दिये गये| परन्तु मेट्रोपोलिटन एलिजा ने दो लाख डॉलर के स्टालिन पुरस्कार से इंकार कर दिया और इस राशि को उन अनाथ बच्चों के रखरखाव पर खर्च करने का आदेश दिया जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में अपने पिता को खो दिया था| sabhar :http://hindi.ruvr.ru/
जब देवी के सामने सबको 'सेक्स' करने की आज्ञा मिली'
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मार्च 03, 2014 in जब देवी के सामने सबको 'सेक्स' करने की आज्ञा मिली'

ये अंश दीवान जरमनी द्वारा रचित उपन्यास 'महाराजा' से लिया गया है। 'महाराजा' उपन्यास हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं की निजी जीवनचर्या, प्रेम-प्रसंग और षड्यंत्र पर आधारित है।
मोती बाग पैलैस के उत्तर-पूर्व कोने में, एकांत में, एक बहुत बड़ा हाल था। उसी में सप्ताह में दो बार तांत्रिक सभाएं होने लगीं। इनमें सिर्फ वहीं लोग शरीक हो सकते थे जो नियमानुसार दीक्षा ले चुके हों और जिनकी अच्छी तरह परीक्षा ली जा चुकी हो।अनेक युवतियां, जिनमें कुछ कुंवारी भी थीं, इस नए मत में शामिल हो गईं। महाराजा के कुछ खास मुसाहिब और नातेदार भी दीक्षा लेकर सदस्य बन गए। परंतु महाराजा एक मामले में सावधान रहे कि उनकी सीनियर महारानियों या पुराने बुद्धिमान अफसर लोगों में से कोई इस मत में शामिल ना होने पाए जो उनके असली इरादे की जानकारी हासिल कर सके।
दीक्षा लेने वालें की तादात 300 से 400 तक पहुंच गई। धर्म सभा की हर बैठक में कम से कम 150 से 200 तक व्यक्ति शरीक होते थे, जिनमें दो तिहाई तादात औरतों की और एक तिहाई मर्दों की होती थी।कौलाचार्य व्याध्रचर्म पहने, घुटे सिर, संबी शिखा और सिंदूर से चेहरे को रंगे हुए आधायात्मिक गुरु की हैसियत से धर्म सभा का संचालन करता था। देखने में वह भयानक लेकिन गंभीर और तपस्वी लगता था। उसने अपने हाथ से देवी की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई थी जिसे भांति-भांति के रंगों से रंग कर महाराजा के खजाने से लाए गए हीरे, मोतियों और कीमती रत्नों से जड़े हुए हार, बाजूबंद और बालियां वगैरह जेवरात पहनाए गए थे।शुरू में कोलाचार्य की आज्ञा पाकर सभा में एकत्र साधक भक्त देवी की पार्थना के भजन गाते। इसके बाद हर एक को देवी के प्रसाद की तरह-तरह की तेज मदिराओं को एक में मिलाकर तैयार की हुई शराब पीने को दी जाती। मद्यपान का यह दौर जब एक-दो घंटे चल चुकता और भक्तों को नशा चढ़ता तब कौलाचार्य कुंवारी युवतियों को बुलाता कि वे आगे आकर देवी के सामने एकदम नंगी हो जाएं और प्रार्थना के गीत गाएं। सभा में हर एक समारोह के मौके पर कौलाचार्य वहां मौजूद भक्तों में से किसी को - खास तौर पर महाराजा को ही- धार्मिक कृत्यों का संचालक नियुक्त करता है। कुंड में आग जलती रहती जिसमें भांति-भांति के मसाले, घी, अनाज, धूप आदि की आहुतियों देकर हवन होता रहता।ज्यो-ज्यों रात बीतती, साधक भक्तों को नशा चढ़ता जाता और वे अपनी सुध-बुध खो बैठते। तब कौलाचार्य पुरूषों और महिलाओं को आज्ञा देता था कि वे एकदम नंगे होकर देवी के सामने मैथुन (सेक्स) करें। रनिवास के घाय घर से बुलाई हुई 12 से 16 साल तक उम्र की कुंवारी लड़कियां नशे में चूर देवी के सामने नंगी करके लाईं जातीं।ये कुंवारी लड़कियां पहाड़ी इलाकों तथारियासत के गांवों से लाकर महल के घायघर में पाली जाती थी। जब वे सयानी हो जाती तब महाराजा की खिदमत में पेश होती और धर्म सभाओं में भी उनको शरीक होना पड़ता। उनकी गर्दन पर से शराब उड़ेली जाती जो उनके स्तनों पर से बहती हुई नीचे के अंगों तक पहुंचती। महाराजा तथा दूसरे पुरूष भक्त अपने होंठ लगाकर उस बहते हुए द्रव की कुछ बूंदे पीते, क्योंकि उसे बड़ा पवित्र और आत्मा को शुद्ध करने वाला प्रसाद माना जाता था। उसी समय देवी के आगे पशुओं की बलि दी जाती थी। उस हाल में जहां देवी की पूजा होती थी, चारो तरफ लहू बहने लगता।बधिक के सधे हुए हाथ के एक ही वार से बलि होने वाले पशुओं के खून से दरबार के हट्ठे-कठ्ठे सरदारों द्वारा पूरी ताकत से बलात्कार की शिकार कुंवारी लड़कियों की योनियों से निकला खून उनके बदन के निचले अंगों पर बहता हुआ आकर मिल जाता। sabhar :http://www.amarujala.com/
ये अंश दीवान जरमनी द्वारा रचित उपन्यास 'महाराजा' से लिया गया है। 'महाराजा' उपन्यास हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं की निजी जीवनचर्या, प्रेम-प्रसंग और षड्यंत्र पर आधारित है।
मोती बाग पैलैस के उत्तर-पूर्व कोने में, एकांत में, एक बहुत बड़ा हाल था। उसी में सप्ताह में दो बार तांत्रिक सभाएं होने लगीं। इनमें सिर्फ वहीं लोग शरीक हो सकते थे जो नियमानुसार दीक्षा ले चुके हों और जिनकी अच्छी तरह परीक्षा ली जा चुकी हो।अनेक युवतियां, जिनमें कुछ कुंवारी भी थीं, इस नए मत में शामिल हो गईं। महाराजा के कुछ खास मुसाहिब और नातेदार भी दीक्षा लेकर सदस्य बन गए। परंतु महाराजा एक मामले में सावधान रहे कि उनकी सीनियर महारानियों या पुराने बुद्धिमान अफसर लोगों में से कोई इस मत में शामिल ना होने पाए जो उनके असली इरादे की जानकारी हासिल कर सके।
दीक्षा लेने वालें की तादात 300 से 400 तक पहुंच गई। धर्म सभा की हर बैठक में कम से कम 150 से 200 तक व्यक्ति शरीक होते थे, जिनमें दो तिहाई तादात औरतों की और एक तिहाई मर्दों की होती थी।कौलाचार्य व्याध्रचर्म पहने, घुटे सिर, संबी शिखा और सिंदूर से चेहरे को रंगे हुए आधायात्मिक गुरु की हैसियत से धर्म सभा का संचालन करता था। देखने में वह भयानक लेकिन गंभीर और तपस्वी लगता था। उसने अपने हाथ से देवी की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई थी जिसे भांति-भांति के रंगों से रंग कर महाराजा के खजाने से लाए गए हीरे, मोतियों और कीमती रत्नों से जड़े हुए हार, बाजूबंद और बालियां वगैरह जेवरात पहनाए गए थे।शुरू में कोलाचार्य की आज्ञा पाकर सभा में एकत्र साधक भक्त देवी की पार्थना के भजन गाते। इसके बाद हर एक को देवी के प्रसाद की तरह-तरह की तेज मदिराओं को एक में मिलाकर तैयार की हुई शराब पीने को दी जाती। मद्यपान का यह दौर जब एक-दो घंटे चल चुकता और भक्तों को नशा चढ़ता तब कौलाचार्य कुंवारी युवतियों को बुलाता कि वे आगे आकर देवी के सामने एकदम नंगी हो जाएं और प्रार्थना के गीत गाएं। सभा में हर एक समारोह के मौके पर कौलाचार्य वहां मौजूद भक्तों में से किसी को - खास तौर पर महाराजा को ही- धार्मिक कृत्यों का संचालक नियुक्त करता है। कुंड में आग जलती रहती जिसमें भांति-भांति के मसाले, घी, अनाज, धूप आदि की आहुतियों देकर हवन होता रहता।ज्यो-ज्यों रात बीतती, साधक भक्तों को नशा चढ़ता जाता और वे अपनी सुध-बुध खो बैठते। तब कौलाचार्य पुरूषों और महिलाओं को आज्ञा देता था कि वे एकदम नंगे होकर देवी के सामने मैथुन (सेक्स) करें। रनिवास के घाय घर से बुलाई हुई 12 से 16 साल तक उम्र की कुंवारी लड़कियां नशे में चूर देवी के सामने नंगी करके लाईं जातीं।ये कुंवारी लड़कियां पहाड़ी इलाकों तथारियासत के गांवों से लाकर महल के घायघर में पाली जाती थी। जब वे सयानी हो जाती तब महाराजा की खिदमत में पेश होती और धर्म सभाओं में भी उनको शरीक होना पड़ता। उनकी गर्दन पर से शराब उड़ेली जाती जो उनके स्तनों पर से बहती हुई नीचे के अंगों तक पहुंचती। महाराजा तथा दूसरे पुरूष भक्त अपने होंठ लगाकर उस बहते हुए द्रव की कुछ बूंदे पीते, क्योंकि उसे बड़ा पवित्र और आत्मा को शुद्ध करने वाला प्रसाद माना जाता था। उसी समय देवी के आगे पशुओं की बलि दी जाती थी। उस हाल में जहां देवी की पूजा होती थी, चारो तरफ लहू बहने लगता।बधिक के सधे हुए हाथ के एक ही वार से बलि होने वाले पशुओं के खून से दरबार के हट्ठे-कठ्ठे सरदारों द्वारा पूरी ताकत से बलात्कार की शिकार कुंवारी लड़कियों की योनियों से निकला खून उनके बदन के निचले अंगों पर बहता हुआ आकर मिल जाता। sabhar :http://www.amarujala.com/
रविवार, 2 मार्च 2014
सनी लियोनी शरमा रहीं हैं इन दृश्यों से
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मार्च 02, 2014 in सनी लियोनी शरमा रहीं हैं इन दृश्यों से


शरमा क्यों रही हैं सनी
सनी लियोनी चाहती हैं कि उनकी इमेज ठेठ पोर्न एक्ट्रेस के रूप में अब न हो। लेकिन रागिनी एमएमएस 2 के कई ऐसी सीन हैं जिन्हें करने में सनी लियोनी को आपत्ति थी। लेकिन बाद में वह दृश्य फिल्माए गए।
नहीं दिखाना चाहती थीं क्लीवेज
फिल्म की शूटिंग के दौरान ही सनी लियोनी चाहती थीं कि उनके क्लीवेज न दिखाएं जाएं। एक सीन में जब सनी की टॉप उतरनी थी तो सनी ने बॉडी डबल की मांग की थी। हालांकि उनकी यह मांग खारिज हो गई थी।
नहीं चाहतीं कि सेक्सी फिल्म कही जाए
असल में यह फिल्म ‘रागिनी एमएमएस’ का सीक्वल है। अब एकता और उनकी टीम सीक्वल को हॉरर के साथ सेक्सी बता कर इसकी मार्केटिंग कर रहे हैं। जबकि सनी चाहती हैं कि फिल्म को सिर्फ हॉरर के रूप में प्रमोट किया जाए। सनी नहीं चाहती कि फिल्म को दो रूपों में पेश किया जाए।
जिस्म की नुमाइश नहीं
अभी तक इस फिल्म के जो भी पोस्टर, ट्रेलर या गाने सामने आए हैं, उनसे साफ है कि पूरा जोर सनी के जिस्म की नुमाइश पर दिया जा रहा है। सनी को यह बात अखर रही है क्योंकि वह नहीं चाहतीं कि दर्शक उन्हें उनके अतीत के लिए याद करें। वह अपनी पोर्न स्टार वाली इमेज छोड़ कर बॉलीवुड में आगे बढ़ना चाहती हैं।
नाम पर भी आपत्ति
रागिनी एमएमएस 2 के नाम के आगे इस बाद दोगुना मजा शब्द जोड़ दिया गया है। इस नाम से भी सनी लियोनी को आपत्ति हो रही है। सनी को लगता है कि लोगों को लगेगा कि यह पूरी तरह से मसाला फिल्म है।
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शनिवार, 1 मार्च 2014
अजब चमत्कार कही दूसरे ग्रह से आई बताने वाली बाबी डाल माडल कही सेक्सी महिला रोबोट
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मार्च 01, 2014 in अजब चमत्कार बाबी डाल माडल कही सेक्सी महिला रोबेट
बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली लड़की

वह दिखती है बार्बी डॉल की तरह। उसकी आंखें, उसका शरीर, उसकी स्टाइल आपको चौंका देगी कि इतनी बड़ी, असली लड़की दिखने वाली, सांस लेने वाली बार्बी डॉल कब बन गई? लेकिन सच यह है कि यह बच्चों के खेलने वाली बार्बी डॉल गुडि़या की तरह दिखती जरूर है पर है एक जीती-जागती असली लड़की। जी हां, एक शक्ल वाले दो इंसानों को देखकर आप भगवान के करिश्मे की बात करते हैं। पर दुनिया की सबसे मशहूर गुडि़या बार्बी डॉल की तरह दिखने वाली इस लड़की को देखकर आप शायद कह उठें, भगवान तू भी इंसानों का मॉडल चुराने लगा । इससे भी ज्यादा रोमांचक इस लड़की की बातें हैं जो खुद को समय में घूमने वाली आध्यात्मिक गुरु बताती है और यहां आने का मकसद संसार में पनप रही नकारात्मक सोच को खत्म करना बताती है।
यूक्रेन की मॉडल वलेरिया लुक्यानोवा को पहली बार देखकर शायद आप चकमा खा जाएं कि आपके सामने कोई आदमकद बार्बी डॉल खड़ी है। वलेरिया लुक्यानोवा हूबहू बार्बी डॉल की तरह दिखती हैं। शारीरिक बनावट, कद काठी, चेहरे के भावों से आपको कहीं भी उनके बार्बी डॉल न होने का शक नहीं होता है। पर आप सोचते हैं कि सांस लेने वाली, आदमकद बार्बी डॉल कब बन गई! बार्बी डॉल की तरह दिखने वाले अपने चेहरे और कद-काठी के कारण 21 वर्षीय यह यूक्रेननियन मॉडल आजकल हर तरफ चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि इससे भी अधिक दिलचस्प वलेरिया की बातें हैं। उनके अनुसार वह समय से यात्रा करने वाली आध्यात्मिक गुरु हैं और दुनिया में बढ़ रही नकारात्मकता को कम करने के लिए ही वह आई हैं। sabhar :http://www.jagran.com/
महिलाओं की तरह सेक्स रोबोट

सेक्स रोबोट की मांग को देखते हुए अमेरिका की एक कंपनी ने सेक्स रोबोट बनाया है। इस रोबोट का हर हिस्सा स्त्री शरीर की तरह हैं। स्कॉट मैकलीन का कहना है कि 2004 से रोबोट पर कार्य चल रहा था अब यह पूरा हो पाया है। सेक्स रोबोट की मांग इतनी है कि दुनिया के कई देशों के लोग रोबोट के निर्माता कंपनी से एडवांस बुकिंग करवा रहे हैं। यूके, रूस और कोरिया के कंज्यूमर एडवांस बुकिंग करवा चुके हैं। वे आगे कहते हैं कि लोग मुझसे ऐसे रोबोट बनाने की मांग करते हैं जो हॉलीवुड सेलीब्रिटी एंजेलिना जोली, पामेला एंडसन और माइकल जैक्सन से मिलते जुलते हो। लेकिन उनकी हम शक्ल रोबोट बनाने के लिए मुझे उनसे इजाजत लेनी पड़ेगी।
48 वर्षीय डगलस हिंस ने रॉकी नाम की यह रोबोट तैयार किया है। यह 5 फीट 6 इंज लंबा है। इसे सिलीकोन से बनाया गया है तथा महिलाओं की तरह बाल लगाए गए हैं। यह बातें भी करती है। साथ ही यह मानव अंगों को उत्तेजित करने में भी समर्थ है। इस रोबोट की खासियत यह है कि अगर गर्ल फ्रेंड छोड़कर चली गई हो तो इससे दिल बहलाया जा सकता है। यह कभी आपका दिल नहीं तोड़ेगी। न ही यह कुछ डिमांड करेगी। sabhar :http://dainiktejkhabar.blogspot.in/
48 वर्षीय डगलस हिंस ने रॉकी नाम की यह रोबोट तैयार किया है। यह 5 फीट 6 इंज लंबा है। इसे सिलीकोन से बनाया गया है तथा महिलाओं की तरह बाल लगाए गए हैं। यह बातें भी करती है। साथ ही यह मानव अंगों को उत्तेजित करने में भी समर्थ है। इस रोबोट की खासियत यह है कि अगर गर्ल फ्रेंड छोड़कर चली गई हो तो इससे दिल बहलाया जा सकता है। यह कभी आपका दिल नहीं तोड़ेगी। न ही यह कुछ डिमांड करेगी। sabhar :http://dainiktejkhabar.blogspot.in/
अब ब्रेनटॉप
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मार्च 01, 2014 in अब ब्रेनटॉप
प्रीतंभरा प्रकाश
सुनने में भयावह लग सकता है कि आपका हाथ किसी और की इच्छा के हिल-डुल रहा है और उस 'किसी और' को आप देख भी नहीं पा रहे। लेकिन अब यह संभव हो गया है। पिछले दिनों वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में ह्यूमन टु ह्यूमन ब्रेन इंटरफेस को पहली बार दफे सफल पाया गया।
यहां के वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम डिवेलप किया है, जिसमें एक व्यक्ति एक खास इंटरफेस का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति की सोच को कंट्रोल कर सकता है। यह इंटरफेस इंटरनेट के जरिए दोनों के दिमागों को कनेक्ट करता है। एक और खास बात यह कि इसे डिवेलप करने वाली रिसर्च टीम में एक भारतीय भी शामिल है।
वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रफेसर राजेश राव ने इलेक्ट्रिकल ब्रेन रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके अपना दिमागी सिग्नल अपने साथी को भेजा। इस सिग्नल की वजह से उनके साथी की कीबोर्ड पर टिकी उंगली में हरकत हुई। राव के असिस्टेंट स्टोको का कहना है कि कंप्यूटरों की तरह ही इंटरनेट दो दिमागों को भी कनेक्ट कर सकता है, और हम दिमाग में बसे ज्ञान को एक इंसान से दूसरे के दिमाग में ट्रांसफर करना चाहते हैं।
इससे पहले ड्यूक यूनिवसिर्टी के रिसर्चरों ने दो चूहों के बीच और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इंसान और चूहे के बीच ब्रेन टु ब्रेन कम्युनिकेशन का प्रयोग किया था। राव का मानना है कि उनका प्रयोग इंसानों के बीच ब्रेन कम्युनिकेशन का पहला साइंटिफिक प्रयोग है।
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस पर वैज्ञानिक लंबे समय से काम करते रहे हैं। जल्दी ही हम अपने स्मार्टफोन या कंप्यूटर को केवल अपने दिमाग से निर्देशित कर सकेंगे। कुछ सालों में नौबत यहां तक आ सकती है कि आपका रोबोट असिस्टेंट आपके पास नींबू पानी का ग्लास लेकर खड़ा हो, क्योंकि आपके बताए बगैर ही उसे पता चल चुका है कि आपको प्यास लगी है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जर्नल में छपे रिव्यू के मुताबिक, एक जानी-मानी टेक्नोलॉजी कंपनी ऐसे टैबलेट का परीक्षण कर रही है, जिसे दिमाग से ही नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके लिए एक हैट पहनने की जरूरत पड़ेगी, जिसमें मॉनिटरिंग इलेक्ट्रोड्स लगे होंगे।
कैलिफोर्निया की कंपनी न्यूरोस्काई ने हाल ही में एक ब्लूटूथ वाला हेडसेट रिलीज किया है, जो ब्रेन वेव्स के हलके-फुलके बदलाव भी मॉनिटर कर सकता है। इससे लोगों को कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर कंसंट्रेशन बनाकर रखने वाले गेम्स खेल पाने की सुविधा मिल रही है। इसके सहारे जो गेम्स खेले जा रहे हैं, उनमें दिमाग का रोल जॉयस्टिक वाला है। एक और कंपनी इमोटिव ऐसा हेडसेट बेच रही है, जो एक बड़े से एलियन हाथ की तरह दिखती है।
यह ब्रेन वेव्स को पढ़ सकती है और इसका इस्तेमाल फ्लिकर फोटोज तलाशने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए कीवर्ड्स नहीं चाहिए। खुशी या उत्साह जैसे आपके मनोभाव को समझकर उसी के मुताबिक तस्वीरें यह तलाशेगा। एक और लाइटवेट वायरलेस हेडबैंड म्यूज में एक ऐसा ऐप है जो ब्रेन को एक्सरसाइज करने के लिए उकसाता है।
कार बनानेवाली कंपनियां भी ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैँ, जिनसे ड्राइविंग के दौरान झपकी आने पर सीट को ही इसका आभास हो जाए और वह आपको सचेत कर दे। आंख लग जाने पर स्टीयरिंग व्हील खड़खड़ाने लगे तो ड्राइव करने वाले की नींद अपने आप खुल जाए। हालांकि इस बारे में ब्राउन इंस्टीट्यूट के न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन डी़ का कहना है कि ऐसी तमाम तकनीकें दिमागी बातचीत को बाहर से सुनने की कोशिश भर हैं, जबकि दिमाग की उथल-पुथल को सही मायनों में जानने के लिए हमें ब्रेन में सेंसर्स इंप्लांट करने की जरूरत पड़ेगी। ये सेंसर चिप के रूप में भी हो सकते हैं।

photo ; googale
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस नामक तकनीक की कल्पना वैज्ञानिकों ने इसलिए की थी, ताकि पैरालिसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग कंप्यूटर से संवाद बनाकर रोबोट को कंट्रोल कर सकें और तरह अपने छोटे-मोटे काम खुद ही संपन्न करके अपनी असमर्थता पर काबू पा सकें। पिछले दिनों ब्रेनगेट नाम के एक प्रोजेक्ट में टोटल पैरालिसिस से ग्रस्त दो लोगों ने केवल अपने दिमाग के इस्तेमाल से मनचाहे काम किए।
इनमें से एक महिला 15 सालों से अपने हाथ हिलाने में भी असमर्थ थी, लेकिन रोबोटिक आर्म और अपनी ब्रेन एक्टिविटी को रेस्पांड करने वाले कंप्यूटर के सहारे उसने कॉफी की बोतल पकड़ी, अपने लिए कॉफी सर्व की और बोतल को वापस टेबल पर रख दिया। यह सब रोबोटिक आर्म के मूवमेंट्स के बारे में सोचने भर से संभव हो गया।
हालांकि दिमाग के भीतर लगे चिप के लंबे समय तक काम कर सकने के बारे में वैज्ञानिक अभी कुछ खास नहीं कर सके हैं। फिलहाल अमेरिका में जारी ब्रेन एक्टिविटी मैप प्रोजेक्ट में इस समस्या पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट के बाद स्मार्टफोन और टैबलेट्स की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव होंगे।
केवल सोचने भर से टीवी चैनल बदल लेने की संभावना भी जताई जा रही है। कुछ फ्यूचरिस्ट वैज्ञानिकों का दावा है कि सन 2045 तक इंसान अपने दिमाग को ही कंप्यूटर पर अपलोड करने में कामयाब हो जाएगा।
sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/
सुनने में भयावह लग सकता है कि आपका हाथ किसी और की इच्छा के हिल-डुल रहा है और उस 'किसी और' को आप देख भी नहीं पा रहे। लेकिन अब यह संभव हो गया है। पिछले दिनों वाशिंगटन यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में ह्यूमन टु ह्यूमन ब्रेन इंटरफेस को पहली बार दफे सफल पाया गया।
यहां के वैज्ञानिकों ने ऐसा सिस्टम डिवेलप किया है, जिसमें एक व्यक्ति एक खास इंटरफेस का इस्तेमाल करके दूसरे व्यक्ति की सोच को कंट्रोल कर सकता है। यह इंटरफेस इंटरनेट के जरिए दोनों के दिमागों को कनेक्ट करता है। एक और खास बात यह कि इसे डिवेलप करने वाली रिसर्च टीम में एक भारतीय भी शामिल है।
वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में प्रफेसर राजेश राव ने इलेक्ट्रिकल ब्रेन रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके अपना दिमागी सिग्नल अपने साथी को भेजा। इस सिग्नल की वजह से उनके साथी की कीबोर्ड पर टिकी उंगली में हरकत हुई। राव के असिस्टेंट स्टोको का कहना है कि कंप्यूटरों की तरह ही इंटरनेट दो दिमागों को भी कनेक्ट कर सकता है, और हम दिमाग में बसे ज्ञान को एक इंसान से दूसरे के दिमाग में ट्रांसफर करना चाहते हैं।
इससे पहले ड्यूक यूनिवसिर्टी के रिसर्चरों ने दो चूहों के बीच और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इंसान और चूहे के बीच ब्रेन टु ब्रेन कम्युनिकेशन का प्रयोग किया था। राव का मानना है कि उनका प्रयोग इंसानों के बीच ब्रेन कम्युनिकेशन का पहला साइंटिफिक प्रयोग है।
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस पर वैज्ञानिक लंबे समय से काम करते रहे हैं। जल्दी ही हम अपने स्मार्टफोन या कंप्यूटर को केवल अपने दिमाग से निर्देशित कर सकेंगे। कुछ सालों में नौबत यहां तक आ सकती है कि आपका रोबोट असिस्टेंट आपके पास नींबू पानी का ग्लास लेकर खड़ा हो, क्योंकि आपके बताए बगैर ही उसे पता चल चुका है कि आपको प्यास लगी है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के जर्नल में छपे रिव्यू के मुताबिक, एक जानी-मानी टेक्नोलॉजी कंपनी ऐसे टैबलेट का परीक्षण कर रही है, जिसे दिमाग से ही नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके लिए एक हैट पहनने की जरूरत पड़ेगी, जिसमें मॉनिटरिंग इलेक्ट्रोड्स लगे होंगे।
कैलिफोर्निया की कंपनी न्यूरोस्काई ने हाल ही में एक ब्लूटूथ वाला हेडसेट रिलीज किया है, जो ब्रेन वेव्स के हलके-फुलके बदलाव भी मॉनिटर कर सकता है। इससे लोगों को कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर कंसंट्रेशन बनाकर रखने वाले गेम्स खेल पाने की सुविधा मिल रही है। इसके सहारे जो गेम्स खेले जा रहे हैं, उनमें दिमाग का रोल जॉयस्टिक वाला है। एक और कंपनी इमोटिव ऐसा हेडसेट बेच रही है, जो एक बड़े से एलियन हाथ की तरह दिखती है।
यह ब्रेन वेव्स को पढ़ सकती है और इसका इस्तेमाल फ्लिकर फोटोज तलाशने के लिए किया जा सकता है। इसके लिए कीवर्ड्स नहीं चाहिए। खुशी या उत्साह जैसे आपके मनोभाव को समझकर उसी के मुताबिक तस्वीरें यह तलाशेगा। एक और लाइटवेट वायरलेस हेडबैंड म्यूज में एक ऐसा ऐप है जो ब्रेन को एक्सरसाइज करने के लिए उकसाता है।
कार बनानेवाली कंपनियां भी ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैँ, जिनसे ड्राइविंग के दौरान झपकी आने पर सीट को ही इसका आभास हो जाए और वह आपको सचेत कर दे। आंख लग जाने पर स्टीयरिंग व्हील खड़खड़ाने लगे तो ड्राइव करने वाले की नींद अपने आप खुल जाए। हालांकि इस बारे में ब्राउन इंस्टीट्यूट के न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन डी़ का कहना है कि ऐसी तमाम तकनीकें दिमागी बातचीत को बाहर से सुनने की कोशिश भर हैं, जबकि दिमाग की उथल-पुथल को सही मायनों में जानने के लिए हमें ब्रेन में सेंसर्स इंप्लांट करने की जरूरत पड़ेगी। ये सेंसर चिप के रूप में भी हो सकते हैं।
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ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस नामक तकनीक की कल्पना वैज्ञानिकों ने इसलिए की थी, ताकि पैरालिसिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त लोग कंप्यूटर से संवाद बनाकर रोबोट को कंट्रोल कर सकें और तरह अपने छोटे-मोटे काम खुद ही संपन्न करके अपनी असमर्थता पर काबू पा सकें। पिछले दिनों ब्रेनगेट नाम के एक प्रोजेक्ट में टोटल पैरालिसिस से ग्रस्त दो लोगों ने केवल अपने दिमाग के इस्तेमाल से मनचाहे काम किए।
इनमें से एक महिला 15 सालों से अपने हाथ हिलाने में भी असमर्थ थी, लेकिन रोबोटिक आर्म और अपनी ब्रेन एक्टिविटी को रेस्पांड करने वाले कंप्यूटर के सहारे उसने कॉफी की बोतल पकड़ी, अपने लिए कॉफी सर्व की और बोतल को वापस टेबल पर रख दिया। यह सब रोबोटिक आर्म के मूवमेंट्स के बारे में सोचने भर से संभव हो गया।
हालांकि दिमाग के भीतर लगे चिप के लंबे समय तक काम कर सकने के बारे में वैज्ञानिक अभी कुछ खास नहीं कर सके हैं। फिलहाल अमेरिका में जारी ब्रेन एक्टिविटी मैप प्रोजेक्ट में इस समस्या पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस प्रोजेक्ट के बाद स्मार्टफोन और टैबलेट्स की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव होंगे।
केवल सोचने भर से टीवी चैनल बदल लेने की संभावना भी जताई जा रही है। कुछ फ्यूचरिस्ट वैज्ञानिकों का दावा है कि सन 2045 तक इंसान अपने दिमाग को ही कंप्यूटर पर अपलोड करने में कामयाब हो जाएगा।
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इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे रोबॉट, पैदा करेंगे बच्चे!
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मार्च 01, 2014 in इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे रोबॉट, पैदा करेंगे बच्चे

लंदन
आपने रजनीकांत की रोबॉट फिल्म तो देखी होगी। इसमें रोबॉट बने रजनीकांत का उसके साथी मजाक बनाते हैं कि वह सेक्स नहीं कर सकता, इसलिए वह इंसानों जैसा नहीं है। लेकिन जरा सोचिए क्या हो, अगर रोबॉट भी सेक्स करने लगें और बच्चे पैदा करने लगें। हालांकि इंजीनियर और नोवेलिस्ट जॉर्ज जैरकैडाकिस का मानना है कि अगले 20-30 साल में ऐसा संभव है। जॉर्ज के मुताबिक, भविष्य में रोबॉट न सिर्फ दूसरे रोबॉट के साथ सेक्स कर सकेंगे, बल्कि इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इंजीनियर जॉर्ज का मानना है कि ऐसा करने से बेहतर रोबॉट पैदा होंगे। उनके मुताबिक, रोबॉट के इंसानों के साथ संबंध बनाने से हाइब्रिड प्रजाति विकसित होगी। रोबॉट और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञों के अनुसार, यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि वर्तमान में ही ऐसे रिसर्च और तकनीक उपलब्ध हैं, जिससे ऐसा संभव हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों को भी इसके बुरे प्रभाव को लेकर चिंता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रोबॉट इंसानों से ज्यादा पैदा होने लगे, तो वह समय बुरे सपने से कम नहीं होगा।
बच्चे पैदा नहीं, प्रिंट होंगे: रोबॉट के विकास से जुड़े वैज्ञानिकों की अगर मानें तो यह रोबॉट बच्चे पैदा नहीं प्रिंट करेंगे। शेफील्ड यूनिवर्सिटी के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और रोबॉटिक्स के प्रफेसर नोएल शार्की के अनुसार, रोबॉट 3-डी तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चों को जन्म दे सकते हैं। नोएल के अनुसार, रोबॉट अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव लाकर सेक्स के दौरान अपनी खूबियों को बढ़ा या एक्सचेंज कर सकते हैं। उनके बच्चों में इन खूबियों का मिश्रण देखने को मिल सकता है। इन रोबॉट के पास कार्बन और सिलिकन से बना डिजिटल दिमाग होगा।
लंदन
आपने रजनीकांत की रोबॉट फिल्म तो देखी होगी। इसमें रोबॉट बने रजनीकांत का उसके साथी मजाक बनाते हैं कि वह सेक्स नहीं कर सकता, इसलिए वह इंसानों जैसा नहीं है। लेकिन जरा सोचिए क्या हो, अगर रोबॉट भी सेक्स करने लगें और बच्चे पैदा करने लगें। हालांकि इंजीनियर और नोवेलिस्ट जॉर्ज जैरकैडाकिस का मानना है कि अगले 20-30 साल में ऐसा संभव है। जॉर्ज के मुताबिक, भविष्य में रोबॉट न सिर्फ दूसरे रोबॉट के साथ सेक्स कर सकेंगे, बल्कि इंसानों के साथ भी शारीरिक रिश्ते बना सकेंगे।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस इंजीनियर जॉर्ज का मानना है कि ऐसा करने से बेहतर रोबॉट पैदा होंगे। उनके मुताबिक, रोबॉट के इंसानों के साथ संबंध बनाने से हाइब्रिड प्रजाति विकसित होगी। रोबॉट और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के विशेषज्ञों के अनुसार, यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं है बल्कि वर्तमान में ही ऐसे रिसर्च और तकनीक उपलब्ध हैं, जिससे ऐसा संभव हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों को भी इसके बुरे प्रभाव को लेकर चिंता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर रोबॉट इंसानों से ज्यादा पैदा होने लगे, तो वह समय बुरे सपने से कम नहीं होगा।
बच्चे पैदा नहीं, प्रिंट होंगे: रोबॉट के विकास से जुड़े वैज्ञानिकों की अगर मानें तो यह रोबॉट बच्चे पैदा नहीं प्रिंट करेंगे। शेफील्ड यूनिवर्सिटी के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और रोबॉटिक्स के प्रफेसर नोएल शार्की के अनुसार, रोबॉट 3-डी तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चों को जन्म दे सकते हैं। नोएल के अनुसार, रोबॉट अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव लाकर सेक्स के दौरान अपनी खूबियों को बढ़ा या एक्सचेंज कर सकते हैं। उनके बच्चों में इन खूबियों का मिश्रण देखने को मिल सकता है। इन रोबॉट के पास कार्बन और सिलिकन से बना डिजिटल दिमाग होगा।
वायरस से भी होगी सुरक्षा: विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि रोबॉट द्वारा सेक्स करने से उनके सॉफ्टवेयर वायरस से भी बचे रहेंगे। ठीक उसी तरह जैसे सेक्स करने से मनुष्यों को कई संक्रमित बीमारियां नहीं होतीं।
बुढ़ापे का इलाज: वैज्ञानिकों के अनुसार इन रोबॉट-इंसानों के हाइब्रिड की दिशा में हो रही रिसर्च से बुढ़ापे के बारे में भी और जानकारी मिल सकती है। यह रिसर्च इंसानी शरीर को जानने की दिशा में लाभदायक होगी और यह जाना जा सकेगा कि बुढ़ापे के लिए जिम्मेदार अल्टशाइमर्त्स बीमारी का असर इंसानी दिमाग पर किस तरह और कितना होता है। प्रफेसर वार्विक ने कहा कि रोबॉट का एक दूसरे से सेक्स करना और रोबॉट पैदा करना सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करेगा। 20 साल के बाद जब यह पूरी तरह से संभव हो जाएगा तब इस तकनीक को स्वीकार करने मे नैतिक दिक्कते आएंगी। वैसे वैज्ञानिकों की इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं। वैज्ञानिका जॉर्ज डायसन का मानना है कि ऐसे रोबॉट शनि के चांद एनक्लेडस से मंगल ग्रह पर बर्फ लाने में मदद कर सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/
बुढ़ापे का इलाज: वैज्ञानिकों के अनुसार इन रोबॉट-इंसानों के हाइब्रिड की दिशा में हो रही रिसर्च से बुढ़ापे के बारे में भी और जानकारी मिल सकती है। यह रिसर्च इंसानी शरीर को जानने की दिशा में लाभदायक होगी और यह जाना जा सकेगा कि बुढ़ापे के लिए जिम्मेदार अल्टशाइमर्त्स बीमारी का असर इंसानी दिमाग पर किस तरह और कितना होता है। प्रफेसर वार्विक ने कहा कि रोबॉट का एक दूसरे से सेक्स करना और रोबॉट पैदा करना सामाजिक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करेगा। 20 साल के बाद जब यह पूरी तरह से संभव हो जाएगा तब इस तकनीक को स्वीकार करने मे नैतिक दिक्कते आएंगी। वैसे वैज्ञानिकों की इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं। वैज्ञानिका जॉर्ज डायसन का मानना है कि ऐसे रोबॉट शनि के चांद एनक्लेडस से मंगल ग्रह पर बर्फ लाने में मदद कर सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/
स्किन सेल्स से बन सकेंगे नए ऑर्गन्स
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मार्च 01, 2014 in स्किन सेल्स से बन सकेंगे नए ऑर्गन्स

लंदन
वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर की त्वचा की कोशिकाओं (स्किन सेल्स) से स्टेम सेल्स तैयार करने से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन स्टेम स्टेल्स में एंब्रियो या भ्रूण में तब्दील होने की क्षमता है। एक टॉप साइंटिस्ट ने 'द इंडिपेंडेंट' को रविवार को यह जानकारी दी। इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर पूरी तरह से कामयाब रहा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह इंसानों के लिए भी बिलकुल फिट रहेगा। ऐसे में इंसानों में होने वाली असाध्य बीमारियों मसलन पार्किन्सन, हार्ट डिजीज आदि के बेहतर इलाज की संभावनाएं और मजबूत हो चली हैं। दरअसल, इस तकनीक के जरिए बीमारी से ग्रस्त अंगों को मरीज के स्टेम सेल्स के जरिए दोबारा से तैयार किया जा सकता है।
जर्म सेल्स भी किए जा सकते हैं तैयार
हालांकि, स्किन सेल्स से इंसानी भ्रूण तैयार करने की फिलहाल कोई मंशा नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा किया जाना सैद्धांतिक तौर पर मुमकिन है। प्रयोग के दौरान चूहों के भ्रूण तैयार करने में कामयाबी मिलना इस बात का संकेत देते हैं कि इन भ्रूण से किसी खास तरह के टिशू (ऊतक) तैयार किए जा सकते हैं, जो अंग विकसित करने की दिशा में अहम साबित होगा। यहां तक कि इस तकनीक से जर्म सेल्स भी तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे स्पर्म और डिंब (एग्स) बनते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/
लंदन
वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर की त्वचा की कोशिकाओं (स्किन सेल्स) से स्टेम सेल्स तैयार करने से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन स्टेम स्टेल्स में एंब्रियो या भ्रूण में तब्दील होने की क्षमता है। एक टॉप साइंटिस्ट ने 'द इंडिपेंडेंट' को रविवार को यह जानकारी दी। इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर पूरी तरह से कामयाब रहा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह इंसानों के लिए भी बिलकुल फिट रहेगा। ऐसे में इंसानों में होने वाली असाध्य बीमारियों मसलन पार्किन्सन, हार्ट डिजीज आदि के बेहतर इलाज की संभावनाएं और मजबूत हो चली हैं। दरअसल, इस तकनीक के जरिए बीमारी से ग्रस्त अंगों को मरीज के स्टेम सेल्स के जरिए दोबारा से तैयार किया जा सकता है।
जर्म सेल्स भी किए जा सकते हैं तैयार
हालांकि, स्किन सेल्स से इंसानी भ्रूण तैयार करने की फिलहाल कोई मंशा नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा किया जाना सैद्धांतिक तौर पर मुमकिन है। प्रयोग के दौरान चूहों के भ्रूण तैयार करने में कामयाबी मिलना इस बात का संकेत देते हैं कि इन भ्रूण से किसी खास तरह के टिशू (ऊतक) तैयार किए जा सकते हैं, जो अंग विकसित करने की दिशा में अहम साबित होगा। यहां तक कि इस तकनीक से जर्म सेल्स भी तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे स्पर्म और डिंब (एग्स) बनते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/
तब इंसानों से भी बुद्धिमान बन जाएगा रोबोट
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मार्च 01, 2014 in तब इंसानों से भी बुद्धिमान बन जाएगा रोबोट

न्यूयार्क: गूगल के एक विशेषज्ञ का दावा है कि अगले 15 सालों में एक ऐसा रोबोट पेश किया जाएगा जो धरती के सबसे बुद्धिमान मानवों से भी ज्यादा तेज दिमाग वाला होगा। यह न केवल बुद्धिमानी से बात करेगा, सवालों का जवाब देगा बल्कि दिल्लगी भी करेगा। गूगल के आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (एआई) के विशेषज्ञ ने `द ऑब्जवर्र` को बताया कि हम चाहते हैं कि हमारा कंप्यूटर वेब की पूरी दुनिया और हर एक किताब का एक-एक पन्ना पढ़ डाले और उपयोगकर्ताओं से समझदारी से बात करने और उनके हर सवाल का जवाब देने में सक्षम हो।
उन्होंने कहा कि 2029 तक कंप्यूटर मशीन मानवों से ज्यादा समझदार और तेज दिमाग होगी और अपने निर्माण करने वालों को ही मात देगी। इस दिशा में गूगल ने हाल ही में दुनिया की शीर्ष रोबोटिक कंपनियों को खरीद लिया है, जिसमें बोस्टन डायनामिक्स भी शामिल है। (एजेंसी sabhar ;http://zeenews.india.com/
न्यूयार्क: गूगल के एक विशेषज्ञ का दावा है कि अगले 15 सालों में एक ऐसा रोबोट पेश किया जाएगा जो धरती के सबसे बुद्धिमान मानवों से भी ज्यादा तेज दिमाग वाला होगा। यह न केवल बुद्धिमानी से बात करेगा, सवालों का जवाब देगा बल्कि दिल्लगी भी करेगा। गूगल के आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (एआई) के विशेषज्ञ ने `द ऑब्जवर्र` को बताया कि हम चाहते हैं कि हमारा कंप्यूटर वेब की पूरी दुनिया और हर एक किताब का एक-एक पन्ना पढ़ डाले और उपयोगकर्ताओं से समझदारी से बात करने और उनके हर सवाल का जवाब देने में सक्षम हो।
उन्होंने कहा कि 2029 तक कंप्यूटर मशीन मानवों से ज्यादा समझदार और तेज दिमाग होगी और अपने निर्माण करने वालों को ही मात देगी। इस दिशा में गूगल ने हाल ही में दुनिया की शीर्ष रोबोटिक कंपनियों को खरीद लिया है, जिसमें बोस्टन डायनामिक्स भी शामिल है। (एजेंसी sabhar ;http://zeenews.india.com/
सिर हिलाइए और हो गई पेंमेंट गूगल ग्लास से
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मार्च 01, 2014 in सिर हिलाइए और हो गई पेंमेंट गूगल ग्लास से
भविष्य में लोग सिर्फ़ अपने सिर को हिलाकर ख़रीदी गई किसी चीज़ के लिए भुगतान कर सकेंगे. हालांकि ऐसा करने के लिए आपको गूगल ग्लास पहनना होगा.
इस सुविधा का फ़ायदा ईज़, ग्लासशोल, गूगल ग्लास एक्सप्लोरर जैसे ऐप की मदद से उठाया जा सकता है. अगर आपने गूगल ग्लास पहना है तो इन ऐप की मदद से आप सिर्फ़ दो बार सिर हिलाकर भुगतान कर सकते हैं.
इसके लिए दुकानदार के पास भी ऐसा ही आईओएस या एंड्राएड ऐप होना चाहिए.
फिलहाल इस तरह की सुविधा केवल वर्चुअल मुद्रा 'बिटकॉइन' के साथ उपलब्ध है, लेकिन इसके साथ काफी दिक्कतें हैं. बहुत कम कारोबारी ही वर्चुअल करेंसी को स्वीकार करते हैं.
क्लिक करें पढें: नए साल के पाँच हॉट गैजेट
चुनौतियाँ
गूगल ग्लास
हाल में तोक्यो स्थित करेंसी बदलने वाले बाज़ार माउंट गॉक्स के नाकाम होने के कारण और बिटकॉइन का मूल्य गिरने के कारण इस पर भरोसा घटा है.
हालांकि ईज़ को उम्मीद है कि वो अपने "नॉड टू पे" सिस्टम का विस्तार कर उसमें यूरो और डॉलर जैसी परंपरागत मुद्रा प्रणालियों को शामिल कर लेगा.
गूगल अपने ग्लास में लगातार नए संशोशन कर रहा है और ऐप जोड़ रहा है. क्लिक करें तस्वीर खींचने और वीडियो बनाने के लिए वॉयस कमांड के अलावा हाल ही में गूगल ने आंख मारने या पलक झपकाने से भी फ़ोटो खींचने का ऐप गूगल ग्लास में डाला है.
गूगल का कहना है कि यह सुविधा वॉयस कमांड से भी ज़्यादा तेज और सुविधाजनक है.
इस गैजेट की मदद से कोई मैसेज भेजने के लिए उसे टाइप करने की जरूरत नहीं है. बस बोलते जाइए मैसेज टाइप होकर चला जाएगा. गूगल ग्लास आपकी आवाज का किसी दूसरी भाषा में अनुवाद भी कर सकता है.
sabhar : http://www.bbc.co.uk/
फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस, लाखों का है टर्नओवर
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मार्च 01, 2014 in फेसबुक से खड़ा कर लिया अपना बिजनेस

पटना. उद्यमी वही नहीं होते हैं जो बड़ी पूंजी के साथ कोई बड़ा व्यवसाय करते हैं। छोटी पूंजी के साथ भी छोटा सार्थक काम किया जा सकता है। पटना की महिला उद्यमियों ने यह सिद्ध किया है। पांच-दस हजार की नौकरी की चाहत रखने वाली ये महिलाएं आज अपना उद्यम चला रही है और समाज की महिलाओं को रोजगार प्रदान कर रही हैं। इनके बेहतर काम ने समाज ने इनको खास पहचान दिया है। बिहार महिला उद्योग संघ की ओर से सिन्हा लाइब्रेरी में शुक्रवार से शुरू महिला उद्योग मेला ऐसे ही उद्यमियों से सजा है।
पटना. उद्यमी वही नहीं होते हैं जो बड़ी पूंजी के साथ कोई बड़ा व्यवसाय करते हैं। छोटी पूंजी के साथ भी छोटा सार्थक काम किया जा सकता है। पटना की महिला उद्यमियों ने यह सिद्ध किया है। पांच-दस हजार की नौकरी की चाहत रखने वाली ये महिलाएं आज अपना उद्यम चला रही है और समाज की महिलाओं को रोजगार प्रदान कर रही हैं। इनके बेहतर काम ने समाज ने इनको खास पहचान दिया है। बिहार महिला उद्योग संघ की ओर से सिन्हा लाइब्रेरी में शुक्रवार से शुरू महिला उद्योग मेला ऐसे ही उद्यमियों से सजा है।
वसुंधरा वर्मा
ऑनर- सुदक्ष, सुदक्ष इंटीरियर डिजाइनिंग, सुदक्ष मेइट्स
प्रोडक्ट- होम डेकोर आइटम, डिजाइनर वार्डरोब, कंसल्टेंसी
शुरुआत- 2012
पूंजी- 15 हजार रुपए, सालाना टर्नओवर-तीन लाख
लड़की और खुद का बिजनेस! घरवालों के आगे ये बड़ा प्रश्न हमेशा घूमता था। पटना से बाहर पढऩे जाने तक नहीं मिला। हमेशा अपनी क्रिएटिविटी निखारना चाहती थी। जैसे-तैसे पटना वीमेंस कॉलेज में फैशन में एक साल का डिप्लोमा किया। बाजार जाकर अपने प्रोडक्ट बेच नहीं सकती थी, घरवालों ने मना कर रखा था। फेसबुक मेरा शॉप बना। यहां अपने प्रोडक्ट के फोटो अपलोड करती। देश और विदेश से कई ऑर्डर मिलने लगें। आज मैं एक साथ तीन वेंचर चला रही हूं।
बच्चे की तरह पाला है व्यापार को
सविता जैन
ऑनर- अक्षत नमकीन
शुरुआत- 1999
पूंजी- 500 रुपए, सालाना टर्नओवर-12 लाख
बच्चे छोटेे थे। बिजनेस भी साथ में शुरु कर दिया। बहुत परेशानी होती थी। क्या करती मेरा बिजनेस भी तो मेरे बच्चे की तरह ही था। उसे बीच में कैसे बंद करती। मैंने उसे बच्चे की तरह बढ़ाया। अपने प्रोड्क्ट की क्वालिटी से कोई समझौता नहीं की। चाहती तो बाजार बढ़ाने के लिए मिलावटी सामान बेच सकती थी। पर मैं सोच चुकी थी कि चाहे जितना भी समय लगे, मेरे प्रोडक्ट की क्वालिटी ही इसे प्रसिद्धि दिलाएगी। आज स्थिति ऐसी है कि शहर के सैकड़ों दुकानों के अलावा मेरा प्रोडक्ट बिग बाजार में बेचा जा रहा है।
क्रिएटिविटी ने दिलाई पहचान पति का मिला पूरा सपोर्ट
आशा वर्मा
ऑनर- आशा क्रिएशन
प्रोडक्ट- फ्यूजन आर्ट (मधुबनी, काथा, पत्ती वर्क खत्वा) साड़ी, सूट, एक्सक्लूसिव कुर्ते आदि
पूंजी- 10 हजार, सालाना टर्नओवर-15 लाख
शुरुआत- 1998
कुछ अलग करने की चाहत हमेशा से रही है। बच्चे जब छोटे थे तो ज्यादा कुछ नहीं कर पाती थी। जब दरभंगा जाती तो मधुबनी आर्ट सीखती। बच्चे बड़े हुए तो अपना काम शुरु करने की चाहत हुई। मधुवनी आर्ट को लेटेस्ट ट्रेंड से जोड़कर फैशन का नया फ्यूजन तैयार किया। दिल्ली उद्योग मेले में प्रदर्शनी लगाई। एक अलग पहचान मिली।
सीएम हाउस तक है मेरे प्रोडक्ट की लोकप्रियता
शोभा श्रीवास्तव
ऑनर- शोभा अचार
शुरुआत-1996
पूंजी- 20 हजार रुपए, सालाना टर्नओवर-18 लाख रुपए
छोटे स्तर से शुरुआत की थी। आज लोकप्रियता ऐसी है कि सीएम हाउस में मेरे प्रोडक्ट की डिमांड है। एक बार जो मेरा अचार खाता है वह सब भूल जाता है। हर तरह के अचार बनाती हूं। शुरुआत में तीन साल घाटे में चली। फिर चार साल नो प्रॉफिट, नो लॉस। आज मेरा बिजनेस सरप्लस में चल रहा है। 66 साल की हो गई हूं, आज भी मार्केटिंग खुद करती हूं।
ससुरजी के सहयोग से बिहार में बन पाई मेरी पहचान
सुनीता प्रकाश
ऑनर- बंदिनी
प्रोडक्ट- क्रिएटिव गारमेंट, डेकोर आइटम, ट्रेडिशनल आइटम
शुरुआत- 1993
पूंजी- 15 हजार रुपए, सालाना टर्नओवर-5 लाख
निफ्ट में पढऩा चाहती थी। डॉक्टर और इंजीनियर की पढ़ाई से दूर भागती थी। मुश्किल से टेक्सटाइल डिजाइन में डिप्लोमा कर अपना काम शुरू किया। पहचान बनाने के क्रम में मेरा साथ मेरे ससुर जी ने दिया। वह चाहते थे कि मैं आगे बढूं। नए कॉन्सेप्ट पर प्रोडक्ट बनाना शुरु किया। बिहार उत्सव मेले ने पहचान दी। sabhar :http://www.bhaskar.com/
शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014
ये बच्चा पूर्वाभास से जान जाता है सबकुछ
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फ़रवरी 28, 2014 in ये बच्चा पूर्वाभास से जान जाता है सबकुछ

इस बात की पुष्टि खुद बच्चे के मां-बाप करते हैं। उनका कहना है कि उनका बच्चा sixth sense मूवी के चरित्र 'कोल' जैसा है।
जब बच्चे के माता-पिता ने मनोचिकित्सक से संपर्क किया तो उसने बताया कि बच्चे के अंदर कुछ सुपरनैचुरल ताकत है।
होवेल ने बताया कि एलिजाह को उनके गर्भपात होने का पता पहले ही चल गया था। इतना ही नहीं उसे इस बात का भ पूर्वाभास हो गया था कि वो इसके बाद जुड़वा बच्चों को जन्म देगी।
वो बताती हैं कि जिस समय वो गर्भवती थी उनका बेटा उनसे कहता था कि, 'मां, आपका बेटा भगवान के पास चला जाएगा।'
महीनेभर बाद उन्हें पता चला कि उनके गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं। इसके बाद एलिजाह के मां-बाप ने मनोचिकित्सक को संपर्क किया और ये जानने की कोशिश की, कहीं वाकई उसे भूत-प्रेत तो नहीं दिखते या फिर वो किसी मानसिक बीमारी से तो पीड़ित नहीं।
इतना ही नहीं एलिजाह अपने मृत दादा जी से भी बात कर सकता है।
मां-बाप अपने बेटे पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और चाहते हैं कि उसकी ये क्षमता सही दिशा में विकसित हो। sabhar :http://www.amarujala.com/
छठी इंद्रिय का कमाल
आपने हॉलीवुड फिल्म sixth sense देखी होगी, जिसमें एक बच्चे की छठी इंद्रिय अति विकसित होती है। लेकिन ये कोई फिल्म नहीं है बल्कि एक चार साल के बच्चे की असलियत है।इस बात की पुष्टि खुद बच्चे के मां-बाप करते हैं। उनका कहना है कि उनका बच्चा sixth sense मूवी के चरित्र 'कोल' जैसा है।
फ्लोरिडा में रहता है ये परिवार
फ्लोरिडा के नैपल्स में रहने वाले ग्रेग और हिदर होवेल का कहना है कि उन्होंने ध्यान दिया कि उनका बेटा एलिजाह औरों से काफी अलग है। महज दस महीने की उम्र में उसने पूरे-पूरे वाक्य बोलना शुरू कर दिया था।जब बच्चे के माता-पिता ने मनोचिकित्सक से संपर्क किया तो उसने बताया कि बच्चे के अंदर कुछ सुपरनैचुरल ताकत है।
क्या कहना है मां का?
एलिजाह की मां होवेल का कहना है कि पहले उन्हें लगता था कि उनका बच्चा यूं ही बातें बनाता है लेकिन वो कई बातें होने से पहले ही जान जाता है।होवेल ने बताया कि एलिजाह को उनके गर्भपात होने का पता पहले ही चल गया था। इतना ही नहीं उसे इस बात का भ पूर्वाभास हो गया था कि वो इसके बाद जुड़वा बच्चों को जन्म देगी।
वो बताती हैं कि जिस समय वो गर्भवती थी उनका बेटा उनसे कहता था कि, 'मां, आपका बेटा भगवान के पास चला जाएगा।'
क्या हुआ उसके बाद?
एलिजाह के ऐसा कहने के दो दिन बाद ही होवेल का गर्भपात हो गया और उनका गर्भ गिर गया। लेकिन उसके बाद एलिजाह ने कहना शुरू कर दिया कि वो जल्दी ही दो बच्चों को जन्म देगी और दोनों ही लड़के होंगे।महीनेभर बाद उन्हें पता चला कि उनके गर्भ में जुड़वा बच्चे हैं। इसके बाद एलिजाह के मां-बाप ने मनोचिकित्सक को संपर्क किया और ये जानने की कोशिश की, कहीं वाकई उसे भूत-प्रेत तो नहीं दिखते या फिर वो किसी मानसिक बीमारी से तो पीड़ित नहीं।
इतना ही नहीं एलिजाह अपने मृत दादा जी से भी बात कर सकता है।
क्या कहना है परिवार का?
डेली मेल के अनुसार, एलिजाह के मां-बाप का कहना है कि उनका बेटा कई पुरानी बातों का जिक्र करता है और उसका कहना है गर्भ्ज्ञपात वाली बात उसे उसकी मृत नानी ने बताई थी।मां-बाप अपने बेटे पर पूरा ध्यान दे रहे हैं और चाहते हैं कि उसकी ये क्षमता सही दिशा में विकसित हो। sabhar :http://www.amarujala.com/
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