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रविवार, 15 अप्रैल 2012

ये है 'बाबाओं' के रहस्यमयी शक्तियों और चमत्कारों का राज!

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नई दिल्ली. अपनी रहस्यमयी शक्तियों के जरिए लोगों के कल्याण का दावा करने वाला बाबाओं का 'सच' धीरे-धीरे सामने आ रहा है। उनके चमत्कार के कायल लोगों के आंखों पर से अंधविश्वास की पट्टी धीरे-धीरे हट रही है। कहीं बिना गए वहां के बारे में बता देना। किसी से बिना मिले उस तक अपनी बात पहुंचा देना। यह जादू या चमत्कार नहीं बल्कि टेलीपैथी है।

टेलीपैथी परामनोविज्ञान की एक शाखा है। इसका मतलब है दूर रहकर आपसी सूचनाओं का बगैर किसी भौतिक साधनों के आदान-प्रदान करना। यह एक ऐसी मानसिक तकनीक है जो दूरियों के बावजूद हमारी बातों को इच्छित लक्ष्य तक पहुंचा देती है। हालांकि इसे अभी विज्ञान की कसौटी पर कसा जा रहा है। इस पर शोध हो रहे हैं। अब तक हुए शोधों में शोधकर्ताओं को सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता। यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं होता है।

टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्तिमें यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। इंसानों को तो इस विद्या को सीखना पड़ता है किन्तु जीव-जन्तुओं में टेलीपैथी की विद्या जन्मजात पाई जाती है। ऐसा ही एक प्राणी है कछुआ जिसे इस विद्या में महारत हासिल है।

टेलीपैथी के उदाहरण हमें अत्यंत प्राचीन काल से ही देखने को मिलते हैं। वैदिक काल के ऋषि-मुनियों में इस विद्या का प्रयोग होना एक सामान्य बात थी। ऐसा ही उदाहरण रामायण में भी देखने को मिलता है। सीता की खोज करने का वचन देकर जब सुग्रीव नहीं निभाता है तो यह विचार राम के मन में खेद उत्पन्न करता है। ठीक उसी समय हनुमान के मन भी संप्रेषित हो जाता है। हनुमान तत्काल राम का विचार सुग्रीव तक पहुंचा देते हैं।

इंग्लैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मानव के स्त्रायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े। उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा। sabhar : bhaskar.com

 
 

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