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बुधवार, 30 जुलाई 2014

तीर्थों में अद्भुत शक्ति आखिर कहां से और कैसे आती है

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eternal power of tirth

ज्योतिर्मय

पृथ्वी पर कुछ स्थान ऐसे हैं जो व्यक्ति की ऊर्जा को ऊपर की ओर खींचते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नीचे की ओर ले जाते है। चेतना को अनायास ही ऊपर ले जाने वाले स्थान तीर्थ कहे जाते हैं। योग को विज्ञान की कसौटी पर कसने वाले विज्ञानियों का मानना है कि पृथ्वी पर कुछ स्थान तो स्वयंसिद्ध हैं।कुछ प्रयोगों और व्यवस्थाओं के जरिए संस्कारित किए जाते हैं। प्रसिद्ध थियोसोफिस्ट बेंजामिन जूइस के अनुसार भारत में इस तरह की जागृत जगहों की भरमार है। हिमालय को इस तरह के स्थानों का ध्रुव प्रदेश बताते हुए उन्होंने दावा किया कि हजार साल बाद मैडम ब्लैवटस्की, लेडबीटर, एनीबिसेंट आदि सिद्ध आत्माओं ने हिमालय के इन सिद्धकेंद्रों की खोज की।

वहां से आध्यात्मिक ऊर्जा की तरंगे भी फैलाई। कोयंबटूर के ईशा योग फाउंडेशन के अऩुसंधान कर्ताओं का कहना है कि पृथ्वी पर उस तरह के नैसर्गिक केंद्रों की भरमार है। अगर आप ऐसे स्वयंसिद्ध केंद्र पर हों तो ऊर्जा अपने आप ऊपर की तरफ जाएगी। और इस केंद्र या स्थान से दूर जाने पर चेतना के उत्थान की विशेषता कम होती जाती है।ईशा फाउंडेशन के अनुसार भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में 33 डिग्री तक का क्षेत्र पवित्र होता है। इस केंद्र के दक्षिण में ज्यादा भूमि नहीं है, इसलिए मुख्य रूप से हम उत्तरी गोलार्ध पर ध्यान केंद्रित करते हैं। भूमध्य रेखा से 11 डिग्री का स्थान सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

फाउंडेशन के विज्ञानियों के अनुसार यह शक्ति इसलिए है क्योंकि पृथ्वी घड़ी की उलटी दिशा में घूमती है। इस तरह वह अपकेन्द्री बल या फिर सेंट्रीफ्यूगल फोर्स उत्पन्न करती है। जो व्यक्ति अपनी ऊर्जा को उसकी अधिकतम सीमा तक ऊपर उठाना चाहता है, वह इस स्थिति से बहुत लाभ उठा सकता है।तीर्थों में जिस तरह की दिव्य ऊर्जा होती है उसे जगाए और जिलाए रखना पड़ता है। इन स्थानो में होने वाले पूजा पाठ, जप तप और योगध्यान तीर्थों या इऩ स्थानों को संस्कारित रखने की ही व्यवस्था है।

यह बात अलग है कि उस व्यवस्था की अस्सी प्रतिशत से ज्यादा कड़ियां लुप्त हो गई हैं।
sabhar :http://www.amarujala.com/

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आत्महत्या के लिए बदनाम है मेट्रो स्टेशन पर है भूतों का साया

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भूत कभी भी और कहीं भी हो सकते हैं। चाहे वह विराना हो या भीड़ भार वाला मेट्रो स्टेशन। यहां हम जिस मेट्रो स्टेशन की बात कर रहे हैं वह किसी दूसरे देश का नहीं बल्कि भारत का ही एक मेट्रो स्टेशन है।

इस स्टेशन पर भूतों का ऐसा साया है कि कई लोग ट्रैक पर कूद कर जान दे चुके हैं।

haunted metro station of kolkata ravinder sarovar2


यह मेट्रो स्टेशन कोलकाता में स्थित है। इस स्टेशन का नाम है रवीन्द्र सरोवर। इस मेट्रो स्टेशन के बारे में कहा जाता है कि यहां पर भूतों का साया है। रात 10:30 बजे यहां से आखिर मेट्रो गुजरती है।

उस समय कई मुसाफिर और मेट्रो के ड्राइवरों ने भी इस चीज का अनुभव किया है कि मेट्रो ट्रैक के बीच अचानक कोई धुंधला साया प्रकट होता है और पल में ही गायब हो जाता है।
कोलकाता का यह मेट्रो स्टेशन यहां का सुसाइड प्वांट माना जाता है। कारण यह है कि यहां पर कई लोगों ने ट्रैक पर कूद कर आत्माहत्या की है।

वैसे भूत प्रेतों में विश्वास नहीं करने वाले लोग यह मानते हैं कि यह मेट्रो स्टेशन टॉलीगंज टर्मिनल के बाद पड़ता है जहां अधिकांश मुसाफिर उतर जाते हैं। इसलिए यहां अधिक भीड़ नहीं रहती है। यही कारण हो सकता है कि इस मेट्रो को सुसाइड प्वांट और भूतहा कहा जाता है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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शनिवार, 26 जुलाई 2014

जब आपका कपड़ा हर सेकेंड बदलेगा अपना रंग

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वाशिंगटन : कल्पना कीजिए कि रंग बदलने वाले आपके कपड़े आपको गिरगिट की तरह रंग बदलने जैसा बना दें तो आपको कैसा लगेगा। बुडापेस्ट के एक कपड़ा डिजायनर ने एक ऐसा कपड़ा बनाने का दावा किया है जो सेकेंडों में रंग बदल सकता है। ज्यूडिट एस्टर कारपैटी की अध्यक्षता वाली इस परियोजना के तहत, कपड़े में आवाज और सेंसर लगाया गया है।
‘गिजमोडो’ ने खबर दी कि इस परियोजना में 12 वोल्ट आपूर्ति के साथ एक आर्डूइनो और चार इंडस्ट्रीयल 24 वोल्ट डीसी बिजली आपूर्ति नियंत्रित करने वाले 20 कस्टम पिंट्रिड सर्किट बोर्ड शामिल हैं जो निक्रोम तार वाले दो टेक्सटाइल वूवन को गर्म करे। कारपैटी ने कहा, मेरा इरादा यह खोजने का था कि मैं डिजिटल मीडिया की दुनिया को वस्त्र कला में कैसे लेकर आउं।
(एजेंसी)
sabhar :http://zeenews.india.com/

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एक स्थूल शरीर का उपयोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती है

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एक स्थूल शरीर का उपयोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती है. पूर्व जन्म याद आने को जाति स्मरण कहा जाता है.

शरीरों को परिभाषित करने का अपना-अपना ढंग हैं. जैन आगम के अनुसार संसारिक जीव के पाँच शरीर हो सकते हैं, ये शरीर हैं: 1. औदारिक़ 2. वैक्रियक 3. आहरक 4. तैजस और 5. कार्मणा . औदारिक़ को छोड़कर शेष सभी चार शरीर संपूर्ण ब्रह्मांड मे बे रोक-टोक गमन कर सकते हैं. वैदिक धर्मानुसार शरीर दो हैं, एक सूक्षम शरीर और दूसरा स्थूल शरीर. जैन धर्म द्वारा परिभाषित औदरिक शरीर तो स्थूल शरीर हुआ, और शेष चार शरीर सूक्ष्म शरीर के भेद हैं. इस प्रकार दोनों धर्मों में लगभग समानता कहीं जा सकती है.

प्रत्येक संसारिक के कम से कम दो शरीर तैजस और कार्मणा अवश्य होते हैं और अधिक से अधिक चार शरीर एक साथ हो सकते हैं. जो हमे दिखाई देता है वह औदारिक़ शरीर है. चौथा शरीर वैक्रियक और आहरक में से हो सकता है. औदरिक शरीर ही स्थूल शरीर है. किसी भी वस्तु को हम पहिले पॉलिथीन की पन्नि में रखते हैं और फिर डब्बे में. जिस शरीर को लिए हम आम लोगो को नज़र आते हैं वह स्थूल शरीर ही तो है. सामान्यत: हम स्थूल शरीर को ही देख सकते हैं, शेष शरीर आम प्राणी को सामान्य अवस्था में दिखाई नहीं देते हैं.

मृत्यु के समय जीव का इस स्थूल शरीर से सम्बंध टूट जाता है. जिसे मृत्यु कहते हैं. इस मृत्यु के बाद जब जीव पुन: नवजात शिशु शरीर धारण करता है तो उसे पुनर्जन्म, अंग्रेजी में Reincarnation or Rebirth कहते हैं. और यदि किसी दूसरी जन्मी देह में प्रवेश कर जाती है तो उसे परकाया प्रवेश कहते हैं.

गर्भ धारण करते ही स्थूल शरीर की नीव रखी जाती है, और जीव उसमें आ जाता है. गर्भ धारण करने के बाद मनुष्य जन्म में सामान्यत: नो माह का समय लगता है. यदि कोई मनुष्य आज मरे और आज ही पैदा हो जाए, तो इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ कि जो जीव गर्भ धारण करने से अब तक गर्भ के शिशु शरीर में विद्यमान था, वह चला गया और आज ही मरने वाले मनुष्य की आत्मा उस गर्भ के शिशु शरीर में प्रवेश कर गयी है. कभी-कभी आत्मा पूर्व के किसी शरीर को भी धारण कर लेती है जैसे कोई पॅकिंग बदल दी गयी हो, और इससे संबंधित सच्च घटनाओं का ब्यौरा प्रस्तुत है:

एक- भारत की घटना:
आगरा के सुरेश वर्मा 28 अगस्त, 1983 को दुकान से कार से घर लौट रहे थे और दरवाजा खुलवाने के लिए हॉर्न बजाया. इसी बीच पहिले से ही घात लगाकर बैठे दो आदमी बंदूक ताने उनकी ओर लपके और गोली दाग दी. एक गोली उनके पैर में लगी और दूसरी सिर में. और सुरेश वर्मा की मृत्यु हो गयी.

28 अगस्त, 1983 को ही आगरा से 13 किलोमीटर दूर बढ़ ग्राम में सुरेश वर्मा की आत्मा ने पुन: जन्म ले लिया. उसका नाम टीटू रखा गया. आश्चर्य की बात यह थी कि सुरेश वर्मा के सिर व कान के पास जहाँ गोली लगी थी उस जगह उनके इस जन्म में भी निशान थे.

प्रश्न यह उठता है कि सुरेश वर्मा 28 अगस्त, 1983 को मारे गये और उस ही दिन उनकी आत्मा ने जन्म ले लिया. इसका मतलब यह हुआ कि उस गर्भस्थ शिशु के शरीर में पहिले से विद्यमान आत्मा चली गयी और उसके स्थान पर सुरेश वर्मा की आत्मा उस शिशु के शरीर में आ गयी थी.

यानि कि टीटू के शरीर में पहिले कोई दूसरी आत्मा रही, और जन्म के समय उस शिशु के शरीर में सुरेश वर्मा की आत्मा आ गयी. शिशु टीटू ने सुरेश वर्मा के पुनर्जन्म के रूप में जन्म लिया.

दो- भारत की घटना:
सन 1958 की बात है, मुज़फ़्फ़रनगर जिले के ग्राम रसुलपुर जाटान के एक लगभग तीन साल चार माह के बच्चे जसवीर पुत्र गिरधारी सिंह, जाट को चेचक निकली और उसकी मृत्यु हो गयी. रात अधिक हो गयी थी. अत: शरीर को रख दिया गया ताकि सुबह क्रियाक्रम के लिए शमसान ले जाया जा सके.

सुबह जब क्रियाक्रम के लिए ले जाने की तैयारी करने लगे तो सब यह देखकर दंग रह गये कि बालक के शरीर में धीरे-धीरे प्राणों का संचार हो रहा है. बालक जीवित हो गया, और कुछ दिनों में स्वस्थ हो गया. उसके व्यवहार में भारी परिवर्तन हो गया था. वह उस घर के किसी भी सदस्य के हाथ का कुछ भी खाने को तैयार न था, कहता था कि वह तो ब्राह्मण है. अत: इस घर का कुछ न खाएगा. बच्चे ने बताया की वह तो शोभाराम त्यागी है.

पता चला कि उस ही दिन रात के 11 बजे शोभाराम त्यागी पुत्र शंकर लाल त्यागी नामक एक 22-23 वर्ष के युवा की मृत्यु बारात में जाते वक़्त तांगे से गिरकर हो गयी थी. उस शोभा राम त्यागी की आत्मा जसवीर के शरीर में प्रवेश कर गयी थी.

जिस शरीर को अभी तक जसवीर की आत्मा भोग रही थी, मरने के बाद जसवीर की आत्मा तो प्रस्थान कर गई. उसके स्थान पर शोभाराम त्यागी की आत्मा उस शरीर में आ गई, और अब उस शरीर का उपभोग शोभाराम त्यागी की आत्मा करेगी और किया.

तीन- इंग्लैंड की घटना:
लिवरपूल, इंग्लैंड में एक ऐसा केस सामने आया कि एक बच्चा पैदा हुआ और उसके हाथ पर उसके स्वर्गीय पिता का गोदने का निशान था. प्रिसीला और टेडी फ्रेंटम पति और पत्नी थे. टेडी वक्कुम क्लीनर के पार्ट्स बनाने वाली कंपनी में काम करता था. टेडी की उम्र जब 16 साल की थी तब उसने अपने हाथ पर गोदना गुदवाया था. जब टेडी 35 वर्ष का था तब उसकी पत्नी गर्भवती हुई. टेडी अपने बच्चे का मुँह देख पाता कि इससे एक महीने पहिले ही उसकी मृत्यु हो गयी.

डॉक्टर और मनोवैज्ञानिकों दोनों ने टेडी के नवजात बच्चे के हाथ के गोदने का परीक्षण किया. प्रिसीला का मानना था की उसका पति अपने बच्चे के रूप में पुन: आ गया है. यानि कि बच्चे के शरीर में पहिले कोई आत्मा थी, और टेडी की मृत्यु के बाद टेडी की आत्मा ने उस अजन्मे बच्चे के शरीर में प्रवेश कर लिया.

चार- भारत की घटना:
कैरल सन 1937 में एक उच्च सैनिक अधिकारी के रूप में ब्रिटन से भारत आए थे. उन्होनें अपनी पुस्तक में ज़िक्र किया है कि लगभग सन 1939 कि बात है वें असम-बर्मा सीमा पर कैंप में थे. उनका कैंप एक नदी के किनारे लगा था. ''एक दिन मैने टेलिस्कोप से देखा कि एक युवक की बही जा रही पहिले को, एक दुर्बल और बूढ़ा दाढ़ी वाला नदी से बाहर खींचने का प्रयास कर रहा है. मैंने इस घटना की ओर और साथी अधिकारिओं का ध्यान भी आकृष्ट किया. हम सबने अपनी-अपनी टेलिस्कोप से देखा कि वह बूढ़ा उस लाश को निकालकर एक पेड़ के पीछे ले गया. हम सब उत्सुकता से यह दृश्य देख रहे थे. कुछ क्षणों बाद हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब हमने पेड़ के पास जवान आदमी को चलते देखा.

हमने सिपाहियों को बुलाया और उस आदमी को पकड़ कर लाने को कहा. सिपाही उस युवक को पकड़ कर ले आए. मैने उस युवक से कहा, `सच-सच बताओ, तुम कौन हो? मैने अच्छी तरह देखा था कि तुम बहे जा रहे थे और दाढ़ी वाला बूढ़ा तुम्हारी लाश निकालने कि कौशिश कर रहा था. अब तुम जिंदा हो.’ इस पर उस युवक ने कहा कि वह वही बूढ़ा व्यक्ति है किंतु शरीर उस मृत्य युवक का है. उसने बताया कि वह योग साधना से शरीर परिवर्तन में निपुण है. जब भी उसका शरीर बूढ़ा हो जाता है तो वह ऐसा कर लेता है. कैरल ने उसकी बात पर यकीन नहीं किया. तो उसने कैरल से पेड़ के पास पड़े बूढ़े आदमी का शरीर मॅंगाकर देखने के लिए कहा. कैरल के कहने पर सैनिक पेड़ के पास से बूढ़े का मृत्य शरीर उठा लाए, जिसे देखकर सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा.

उस युवक की मृत्यु से पहिले युवक के उस शरीर को कोई दूसरी आत्मा भोग रही थी अब उसे इस बूढ़े की आत्मा इस्तेमाल करेगी.

पाँच- भारत की घटना:
32 वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तक पूर्व जन्म की स्मृति में कैकई नन्दन सहाय की एक दिलचस्प घटना छपी थी और बताया कि उनके चचेरे भाई श्री नंदन सहाय को हैजा हो गया था. उस समय उनकी आयु 19 वर्ष की थी. उनकी मृत्यु हो गयी थी. मृत्यु के समय श्री नन्दन सहाय की पत्नी को दो मास का गर्भ था. पति की मृत्यु के बाद से ही पत्नी को ख़राब-ख़राब सपने आने शुरू हो गये. एक दिन सपने में पत्नी ने अपने मृत्य पति को देखा. वह कह रहे थे, `मैं तुम्हारे पास ही रहूँगा. तुम्हारे पेट से जन्म लूँगा. लेकिन तुम्हारा दूध नहीं पिऊंगा. मेरे लिये दूध का अलग से प्रबंध रखना. मेरी बात की सत्यता यह होगी कि जन्म से ही मेरे सिर पर चोट का निशान होगा.’

समय पर पुत्र ने जन्म लिया. बच्चे के सिर पर चोट का निशान था. बच्चा अपनी माँ का दूध नहीं पीता था. उसके लिये अलग से धाय रखी गई. धाय ही उसे दूध पिलाती थी.

बच्चा किसी और स्त्री का दूध तो पी लेता था किंतु अपनी पूर्व जन्म की पत्नी और इस जन्म की माँ का दूध न पिता था. माँ का दूध निकालकर चम्मच से पिलाने पर बच्चा वह दूध उलट देता था.

यानि कि दो माह तक गर्भस्थ शिशु में कोई अन्य आत्मा रही और श्री नंदन सहाय की मृत्यु के बाद वह आत्मा उस गर्भस्थ शिशु में आ गयी. अपनी पत्नी के प्रति अथाह प्रेम के कारण श्री नंदन सहाय ने अपनी पत्नी के गर्भ से अपने ही बालक के रूप में जन्म लिया.

छ: - भारत की घटना:
वेदांत के महान ज्ञाता अदिगुरु शंकराचार्य से महान मीमांसक मंडन मिश्र की धर्म पत्नी भारती ने शास्त्रार्थ किया और हारने लगी. भारती विदुषी थी. भारती ने सोचा की सन्यासी को कामकला का कुछ भी ज्ञान नहीं होता है. फिर अदिगुरु शंकराचार्य तो बालकपन में ही सन्यासी हो गये थे. अत: अदिगुरु शंकराचार्य को कामकला का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होना चाहिए. झट से भारती ने कामकला पर शास्त्रार्थ प्रारंभ कर दिया. तब अदिगुरु शंकराचार्य ने इसके लिए समय मांगा. भारती ने समय दे दिया. अदिगुरु शंकराचार्य ने एक मृत्य राजा की देह में प्रवेश करके कामकला का ज्ञान प्राप्त किया था और भारती को शास्त्रार्थ में पराजित किया था.

यानि की राजा के शरीर का उपभोग पहिले राजा ने किया और उनके मरने के बाद कुछ समय तक अदिगुरु शंकराचार्य ने किया.

सूक्ष्म शरीर जब स्थूल शरीर को छोड़कर गमन करता है तों उसके साथ अन्य सूक्ष्म परमाणु कहिए या कर्म भी गमन करते हैं जो उनके परिमाप के अनुसार अगले जन्म में रिफ्लेक्ट होते हैं, जैसे तिल, मस्सा, गोली का निशान, चाकू का निशान, आचार-विचार, संस्कार आदि.

मनुष्य की जिस वस्तु, जीव के प्रति आशक्ति होती है, उसके विछोह पर करूण रुदन करता है. सामान्य मनुष्य की सबसे अधिक प्रीति अपने शरीर के प्रति होती है. इसीलिए मृत्यु जैसी वेदना और किसी घटना में नहीं है. किंतु यह भी सत्य है कि स्थूल शरीर पॅकिंग है और उसमें विद्यमान सूक्षम शरीर उस पॅकिंग में वेष्ठित बहुमूल्य निधि.

इन घटनाओं से यह पता चलता है की एक शरीर का उपभोग एक से अधिक आत्माएँ कर सकती हैं. स्थूल शरीर को आत्माएँ किसी वस्त्र बदलने की तरह बदल देती हैं. इस स्थूल शरीर बदलने की क्रिया को ही जन्म-मरण या परकाया में प्रवेश कहा जाता है. संसारिक भाषा में हम आत्मा को सूक्ष्म शरीर कह सकते हैं.

सात - हॉलैंड की घटना:
एम्सटरडम के एक स्कूल में वहां के प्रिंसिपल की लड़की मितगोल के साथ हाला नाम की एक ग्रामीण लड़की की बड़ी मित्रता थी. हाला देखने में बड़ी सुंदर और मितगोल विद्वान् थी. वें प्राय: पिकनिक और पार्टियाँ साथ मनाया करती थी. एक बार दोनों सहेली एक साथ कार से जा रही थी. गंभीर दुर्घटना घट गयी. उनकी कार एक विशालकाय वृक्ष से जा टकराई. मितगोल को गंभीर चोटें आयी, उसका सम्पूर्ण शरीर क्षत-विक्षत हो गया और उसका प्राणांत हो गया. हाला को बाहर से तो कोई घाव नहीं थे किंतु अन्दर कहीं ऐसी चोट लगी की उसका भी प्राणांत हो गया. दोनों के शव कार से बाहर निकालकर रखे गए.

तभी एकाएक ऐसी घटना हुई कि जैसे किसी शक्ति ने मितगोल के प्राण हाला के शरीर में प्रविष्ट करा दिए हों. वह एकाएक उठ बैठी और प्रिंसिपल को पिता जी कहकर लिपटकर रोने लगी. सब आश्चर्यचकित थे कि हाला प्रिंसिपल साहब को अपना पिता कैसे कह रही है? उनकी पुत्री मितगोल का शरीर तो क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा हुआ है.

प्रिंसिपल साहब ने उसे जब हाला कहकर संबोधित किया तो उसने बताया कि पिता जी मैं हाला नहीं आपकी बेटी मितगोल हूँ. मैं अभी तक इस क्षत-विक्षत हो गए शरीर में थी. अभी-अभी किसी अज्ञात शक्ति ने मुझे हाला के शरीर में डाल दिया है.

हर तरह से परीक्षण किए गए और पाया गया कि सच में ही मितगोल के प्राण हाला के शरीर में आ गए हैं. इस प्रकार शरीर परिवर्तन की यह अनोखी घटना घटी.

आठ - भारत की घटना:
लोग समझते हैं कि चंद्रगुप्त मौर्य ने सम्राट महापद्म यानि कि घनान्द को जीता था. जी नहीं ऐसा नहीं हुआ था. सम्राट घनान्द तो एक नैतिक और बहुत बलशाली सम्राट था. सम्राट घनान्द के भय से तो सिकन्दर सिंधु नदी को पार करने का भी साहस न जुटा सका था और वापिस लौट गया था. महापद्म नन्द की मृत्यु के बाद उस शरीर में दूसरी आत्मा ने प्रवेश कर लिया था. कौन थी वह आत्मा? पढ़े इसका ब्यौरा `किस्से जगदीश के' में...?

निष्कर्ष:
इन घटनाओं से पता चलता है कि स्थूल और सूक्षम शरीर अलग-अलग हैं. स्थूल शरीर की भूमिका पॅकिंग भर की है. और सूक्षम शरीर की भूमिका शक्ति की है. एक स्थूल शरीर को दो भिन्न-भिन्न प्राण या कि आत्मा इस्तेमाल कर सकती हैं. किंतु उसे रहना वहीं होगा जहाँ का पॅकिंग है. जैसे शोभाराम त्यागी की आत्मा और शरीर जसवीर के शरीर का, त्यागी को जसवीर की जिंदगी जीनी पड़ी.

अदिगुरु शंकराचार्य ने राजा के शरीर में प्रवेश करके राजा की जिंदगी जी.

प्रत्येक घटना में शेष जीवन शरीर के अनुसार स्थान पर जीना पड़ा. किंतु यदि कोई आत्मा लावारिस लाश में प्रवेश करती है तो उसे कौनसी जिंदगी ज़ीनी होगी यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.

इससे यह सिद्ध होता है कि एक स्थूल शरीर का उपभोग दो प्राण यानि कि आत्माएँ कर सकती हैं. परकाया प्रवेश एक विद्या है. सिद्ध योगी अपनी इच्छा के अनुसार अपना शरीर बदल सकते हैं. कई बार परकाया प्रवेश अनायास ही हो जाता है. इसके कौन कारण हैं, यह अभी तक अज्ञात है.......?

sabhar :http://samoseyindia.com/

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जेनेटिक मैपिंग से इलाज

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वैज्ञानिकों ने इंसानी डीएनए में ऐसे 100 जगह ढूंढ निकाले हैं जिनके कारण व्यक्ति में शिजोफ्रेनिया जैसी बीमारी पैदा हो सकती है. इससे बीमारी के कारणों से पर्दा उठा.इस तरह की जेनेटिक मैपिंग से नए इलाज की संभावनाएं पैदा होती हैं. हालांकि उनमें भी अभी कई साल लग जाएंगे. लेकिन नए नतीजों से ठोस आनुवंशिक सबूत मिले हैं जो इस थ्योरी को पक्का करते हैं कि प्रतिरोधक प्रणाली और इस बीमारी के बीच कैसा जुड़ाव है.
शिजोफ्रेनिककी जेनेटिक मैपिंग में दुनिया भर से 100 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया. इस सबसे बड़े शोध से पहले वैज्ञानिकों को सिर्फ कुछ हिस्से पता थे, जो जेनेटिक कारणों की ओर इशारा करते थे.
जेनेटिक मैपिंग से मदद की उम्मीद
शोध में डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के आनुवंशिक कोड देखे गए और इनमें से 37,000 को ये बीमारी होने की आशंका थी. शोधकर्ताओं ने डीएनए में 180 मार्कर ढूंढ निकाले, जिनमें से 83 ताजा शोध में पता लगे हैं. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि और मार्कर पता चल सकते हैं.
शोध के सह लेखक स्टीव मैककैरल हार्वर्ड और एमआईटी में जेनेटिक संस्थान के निदेशक हैं, "यह आनुवंशिक पर्दाफाश है, शिजोफ्रेनिया एक तरह का रहस्य ही था. इस तरह के नतीजे आपको काम देते हैं. इनसे वो जीन सामने आते हैं तो बीमारी का कारण हैं. " नेचर नाम की पत्रिका में ये शोध छापा गया है. इसे एक अहम शोध बताया जा रहा है.
शिजोफ्रेनिया ऐसी मानसिक बीमारी है जिससे सच और कल्पना में अंतर मुश्किल हो जाता है. एक फीसदी आबादी को यह बीमारी है. वैज्ञानिक वैसे तो लंबे समय से ये जानते थे कि जीन्स में गड़बड़ी ही इस बीमारी का कारण है लेकिन उन्हें बड़ा और अहम ठोस सबूत अब मिला है.
शोध के लेखक डॉक्टर माइकल ओ'डोनोवैन ने इस शोध को बीमारी का इलाज ढूंढने में बड़ा कदम बताया है. हालांकि डोनोवैन यह भी कहते हैं कि ये मैप आपको ये तो बताता है कि कहां शुरू करना है लेकिन ये नहीं कि शोध खत्म कहां किया जाए.
इस शोध से यह भी साफ हुआ है कि प्रतिरोधक प्रणाली में शुरू होने वाली गड़बड़ी के कारण ये बीमारी होती है. ओ'डोनोवैन का यह ही कहना था कि अधिकतर व्यक्तियों में कम से कम 20 से 30 जीन ऐसे होते हैं जिनके कारण शिजोफ्रेनिया हो सकता है. भले ही इस जीन्स वाला व्यक्ति खुद इस बीमारी से पीड़ित नहीं हो.
एएम/एजेए (एपी) sabhar :http://www.dw.de/

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ALIENS के अस्तित्व को लेकर वैज्ञानिक कर रहे माथापच्ची

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ALIENS के अस्तित्व को लेकर वैज्ञानिक कर रहे माथापच्ची, जानने के लिए पढ़ें

एलियन यानी ऐसे जीव जो पृथ्वी के बाहर किसी दूसरे ग्रह पर रहते हों। पर एलियन होते भी हैं या नहीं, यह एक बड़ा सवाल है। एलियंस की मौजूदगी पर दशकों से रिसर्च होती रही हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि एलियंस हैं भी या नहीं। यदि हैं तो वे कहां रहते हैं? वे तकनीकी रूप से कितने सक्षम हैं?
ऐसे सवालों के जवाब पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए चुनौती है। किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश पिछले छह दशकों से तो बेहद तेज हो गई है। इस बारे में कई ठोस सबूत तो मिले हैं, लेकिन अब तक कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया है। 

कई जगह है मौजूदगी की उम्मीद

केवल मंगल ग्रह ही ऐसा नहीं है, जहां एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ (यानी दूसरे ग्रह पर जीवन) की संभावना हो। हमारे सौरमंडल में कई ऐसे स्थल हैं, जो रहने योग्य हो सकते हैं। इनमें जूपिटर और शनि के बर्फीले चंद्रमा, यूरोपा आदि शामिल हैं, जहां पर जीवन का समर्थन करने में सक्षम सर्फेस ओशियन्स मौजूद हो सकते हैं। वैसे वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे सौरमंडल में शनि ग्रह का चंद्रमा टाइटन और सोलर सिस्टम से बाहर का ग्रह ‘ग्लीज 581जी’ में जीवन होने की सबसे अधिक संभावना है। ये दोनों पृथ्वी से 20.5 प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं। एक प्रकाश वर्ष में करीब 10 खरब किलोमीटर होते हैं। 
पृथ्वी जैसी तलाश
एलियन्स की खोज के लिए वैज्ञानिकों ने अपनी प्राथमिकता एक ऐसा ग्रह खोजने की रखी है, जहां पृथ्वी जैसी परिस्थितियां हों। वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने पृथ्वी जैसे ग्रह की तलाश के लिए दो तरह की सूची भी तैयार की है।
इनमें एक का नाम अर्थ सिमिलरटी इंडेक्स और दूसरी सूची का नाम प्लैनेटरी हैबिटैबिलिटी इंडेक्स है। इसमें उन ग्रहों या चंद्रमाओं का नाम है, जिनकी परिस्थितियां पृथ्वी जैसी होने की संभावना है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले करीब पांच-सात वर्ष में ऐसे ग्रहों की तलाश में तेजी आई है, जहां पर जीवन होने की संभावना अधिक हो सकती है। नासा ने वर्ष 2009 में केप्लर स्पेस टेलिस्कोप अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया था। इस टेलिस्कोप ने हजारों ऐसे ग्रहों या चंद्रमाओं का पता लगाया है, जहां जीवन पनपने की संभावना है। 
पिछले वर्ष 4 नवंबर को नासा ने बताया कि केप्लर स्पेस क्राफ्ट ने 104 ऐसे ग्रह खोजे हैं, जहां लाइफ सपोर्ट करने की परिस्थितियां हैं। 
 होंगे तो कैसे होंगे?

कई हॉलीवुड और बॉलीवुड मूवीज में एलियन को करीब-करीब इंसान के जैसा ही दिखाया गया है, जबकि वैज्ञानिकों का एक धड़ा ऐसा भी है जो यह कहता है कि एलियन्स यदि हैं तो वे बॉयोलॉजिकल नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल होंगे। यानी उनके हाथ-पैर और सिर हों, ये जरूरी नहीं है। 

क्या है उनका धर्म?

क्या एलियन मनुष्य की तरह भगवान में विश्वास करते होंगे? इस सवाल पर ब्रिटेन के जाने-माने एथोलॉजिस्ट और इवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट रिचर्ड डॉवकिन्स कहते हैं कि एलियन्स की सिविलाइजेशन हमसे बेहद एडवांस होगी और वे किसी भी धर्म को नहीं मानने वाले होंगे। 

कैसे हो पाएगी खोज?
वैज्ञानिकों का कहना है कि तकनीक बेहतर होने से यह उम्मीद है कि 20 से 25 वर्ष में इस दिशा में कुछ बेहतर परिणाम मिल सके। अब ऐसे टेलिस्कोप भी बन रहे हैं, जिनमें ऐसी क्षमता है कि वह किसी ग्रह में जैविक पदार्थो से निकलने वाली रोशनी को पहचान सके। उदाहरण के तौर पर क्लोरोफिल की उपस्थिति, जो किसी भी पेड़-पौधे में मौजूद अहम तत्व होता है।
20वीं शताब्दी के मध्य से एलियंस और दूसरे ग्रहों पर जीवन को लेकर रिसर्च किया जा रहा है। इसमें रेडियो से एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ के सिग्नल खोजने से लेकर टेलिस्कोप की मदद से एक्स्ट्रासोलर प्लैनेट खोजने तक की मुहिम शामिल है। फिर भी कुछ स्पष्ट पता नहीं चल पाया है। 

80 के करीब प्रजातियां हो सकती हैं एलियंस की। कैनेडा के पूर्व रक्षा मंत्री पॉल हेलेयर ने पिछले वर्ष एक इंटरव्यू में कई रिपोर्ट के हवाले से यह दावा किया था। एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ के जानकार पॉल ने कहा कि वे दिखने में हमारे जैसे ही हो सकते हैं। 

40 फीसदी से ज्यादा लोग भारत और चीन में मानते हैं कि एलियंस पृथ्वी पर मनुष्य के भेष में घूमते हैं और वे हमारे ही बीच हैं। यह बात रायटर्स के एक सर्वे में सामने आई थी। वैश्विक स्तर पर 20 फीसदी लोग मानते हैं कि एलियंस हमारे ही बीच हैं।

2010 में जाने-माने वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग ने भी एलियंस और दूसरे ग्रहों पर जीवन होने की बात खुले रूप से स्वीकारी। उन्होंने कहा कि ब्रह्मांड के दूसरे ग्रहों पर प्राणी हैं। संभव है कि वे संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करें और हमसे आगे बढ़ जाएं।

दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश में अब तक कई मिशन चलाए जा चुके हैं। कुछ प्रमुख के बारे में जानें। 

वाइजर 1-2: नासा ने इस प्रोग्राम की शुरुआत 1970 के दशक में की थी। इसके तहत नासा ने वाइजर-1 और वाइजर-2 स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किए थे। इनका उद्देश्य आउटर सोलर सिस्टम का पता लगाना था। 

हबल स्पेस टेलिस्कोप: हबल स्पेस टेलिस्कोप को वर्ष 1990 में स्पेस शटल की मदद से धरती की कक्षा में स्थापित किया गया था। यह अभी ऑपरेशन में है। यह गहन अंतरिक्ष से तस्वीरें भेज रहा है, जिसमें कोई बैकग्राउंड लाइट नहीं है।

कैसिनी: 16 यूरोपियन यूनियन देशों और अमेरिका ने शनि पर खोज करने के लिए कैसिनी-ह्यूजेन्स नाम के स्पेसक्राफ्ट को वर्ष 1997 में लॉन्च किया। इसमें ऑर्बिटर और एटमॉस्फेरिक प्रॉब भी है।

कोरोट मिशन: यह मिशन वर्ष 2006 में फ्रेंच और यूरोपियन स्पेस एजेंसियों के साथ विश्व के कई देशों ने चलाया था। इसका उद्देश्य सोलर सिस्टम के बाहर ग्रहों और तारों का पता लगाना था। यह मिशन 2015 तक चलेगा।

द केप्लर मिशन: वर्ष 2009 में नासा ने एक स्पेस ऑब्जरवेटरी लॉन्च की। इससे कई ग्रहों की खोज हो सकी। इसके बाद मार्स मिशन भी दूसरे ग्रह पर जीवन खोजने का ही एक हिस्सा है, जिससे काफी कुछ पता चला है। 
कंटेंट- शादाब समी sabhar :http://www.bhaskar.com/

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

सड़कों पर तेज दौड़ने वाली यह है भविष्य की ट्राम, देखिए तस्वीरें

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सड़कों पर तेज दौड़ने वाली यह है भविष्य की ट्राम, देखिए तस्वीरें

इंटरनेशनल डेस्क। रूस का ये नया ट्राम किसी साइंस फिक्शन मूवी से कम नहीं है। इस अति आकर्षक ट्राम को रूसी कंपनी यूवीजेड ने डिजाइन किया है। एलेक्सी मास्लोव Alexei Maslov इसके डिजाइनर हैं। इसे रशिया वन या आर1 नाम दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, यूवीजेड ने इस खूबसूरत ट्राम को अगले 20-50 साल को ध्यान में रख कर डिजाइन किया है। 
 
एडवांस तकनीक और कम्पोजिट मैटीरियल के इस्तेमाल के चलते आर 1 के हर पैनल बड़ी आसानी से बदला जा सकेगा। वहीं, ट्राम की नुकीली नाक ड्राइवर को बेहतर व्यू देगी, जिससे पदयात्रियों से भिड़ने की संभावना न के बराबर रहेगी।
 
बैटमोबाइल (कॉमिक सुपरहीरो बैटमैन द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला कार) सरीखा दिखने वाला ये ट्राम जितना एडवांस्ड बाहर से दिखता है, उतना ही हाईटेक अंदर से भी है। वाई-फाई, जीपीएस और कमाल की एलईडी लाइटिंग इसके इंटीरियर को ​चार-चांद लगाती हैं। एलईडी लाइटिंग की खासियत है कि ये मौसम के हिसाब से रोशनी देती है।
 
ये भी खास

डायनैमिक एलईडी लाइटिंग के अलावा एयर कंडीशन, एंटी बैक्टीरियल हैंड रेलिंग के अलावा मोबाइल चार्ज करने के लिए यूएसबी 3.0 पोर्ट सरीखी सुविधा भी है। वैसे, आर 1 महज एक कॉन्सेप्ट है। हालांकि, कंपनी ने इसे 2015 तक रूसी पटरियों पर उतारने की योजना बनाई है।

सड़कों पर तेज दौड़ने वाली यह है भविष्य की ट्राम, देखिए तस्वीरें

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