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सोमवार, 25 नवंबर 2013

पोर्न,आखिर लोग क्यों देखते हैं

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आखिर लोग क्यों देखते हैं पोर्न, जानें कामुकता से जुड़ी बेहद खास बातें


ऐसी बात नहीं कि पोर्न कोई आज सामने आया है। इसका अस्तित्व लंबे समय से समाज में है। प्रिंटिंग प्रेस की इजाद के बाद अश्लील कहानियां पूरी दुनिया में छापी जाने लगीं। इनका एक बड़ा बाज़ार सामने आया। कलर फोटोग्राफी और कलर प्रिंटिंग की शुरुआत के बाद तो पोर्न मैगज़ीनों की बाढ़-सी आ गई। दुनिया के सभी देशों में ऐसी मैगज़ीन्स का प्रकाशन शुरू हो गया। साथ ही, पोर्न फ़िल्मों का भी बड़े पैमाने पर कारोबार शुरू हुआ। ऐसी फिल्में और लिटरेचर ज्यादातर देशों में प्रतिबंधित है, पर चोरी-छुपे इनका प्रसार बड़े पैमाने पर जारी है।पोर्न में प्राय: सबकी रुचि होती है। पुरुष हो या महिलाएं, किशोर हों या जवान, अधेड़ हों या बूढ़े, सभी पोर्न देखते हैं। कहा जाता है कि इंटरनेट पर सबसे ज्यादा पोर्न साइट्स सर्च की जाती है। हालत तो ये है कि अब बच्चे भी इंटरनेट पर पोर्न देखने लगे हैं। पिछले दिनों ख़बर आई थी कि ब्रिटेन के लेंडयूडनो में एक 10 साल के बच्चे ने पोर्न फिल्में देखने के बाद 7 साल की एक लड़की का रेप कर दिया था। यह कोई पहली घटना नहीं है। पोर्न देखने के बाद काफी लोग सेक्शुअल क्राइम करते पकड़े गए हैं। पूरी दुनिया में पोर्न एडिक्शन एक समस्या बनती जा रही है।इंटरनेट के आने के बाद तो इस क्षेत्र में तहलका ही मच गया है। आज ये कंटेंट मुफ्त में ऑनलाइन उपलब्ध है। इसके दुष्प्रभावों को लेकर मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और चिकित्सक गंभीर चर्चाओं में लगे हैं। पोर्न एडिक्शन की समस्या कई देशों में इतनी गंभीर हो चुकी है कि इससे मुक्ति के लिए कई देशों में रिहैब तक चलाए जा रहे हैं। यहां यह जानना जरूरी है कि लोग आख़िर पोर्न क्यों देखते हैं।यह जानने के पहले कि लोग पोर्न क्यों देखते हैं, यह जानना जरूरी होगा कि पोर्न है क्या। इसकी परिभाषा के संबंध में विद्वानों में एक राय नहीं है। उनका मानना है कि इरॉटिका और पोर्नोग्राफी में फ़र्क किया जाना चाहिए। वहीं, कुछ किताबें सेक्स और यौन संबंधों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देती हैं, जैसे महान प्राचीन भारतीय ग्रंथ कामसूत्र। इसे किसी भी रूप में पोर्न की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।पोर्नोग्राफी का शाब्दिक अर्थ है - वेश्या के संबंध में लेखन। लेकिन समय के साथ इसका अर्थ बदल गया। वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार पोर्नोग्राफी का मतलब है, "यौन व्यवहार का ऐसा चित्रण जो उत्तेजना पैदा करे।" 'कामसूत्र' में यौन व्यवहार के बारे में विस्तार से लिखा गया है, पर मुख्यत: इसका प्रयोग शिक्षा संबंधी उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा। वहीं, पोम्पेई के वेश्यालयों की दीवारों पर विविध मुद्राओं में मैथुनरत जोड़ों की पेंटिंग लगाई जाती थी, ताकि शर्मीले ग्राहकों को उत्तेजित किया जा सके। प्राचीन यूनान में सेक्शुअल इंटरकोर्स की छवि बच्चों के खाने की प्लेटों के तल पर चित्रित की जाती थी। यही नहीं, वहां गलियों के नुक्कड़ों पर फैलिक मूर्तियां लगाई जाती थीं, जहां औरतों घुटनों के बल बैठकर गर्भधारण के लिए प्रार्थनाएं करती थीं। इसे धार्मिक मान्यता प्राप्त थी।यह माना जाता है कि पोर्न का इस्तेमाल मुख्य तौर पर पुरुष करते हैं। यह सच है। कई शोधों में पाया गया है कि औरतों की तुलना में पुरुष सेक्स में अधिक रुचि रखते हैं। पुरुष महिलाओं के मुकाबले अधिक हस्तमैथुन करते हैं और पोर्न जैसी 'प्लेज़र टेक्नोलॉजी' को काफी पसंद करते हैं। पर बहुत से मनोवैज्ञानिक इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। विकासवादी मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चों को जन्म देने और उनके लालन-पालन में लगे होने के कारण औरतों को वक़्त कम मिलता है, लेकिन अगर उन्हें पोर्न देखने का समय मिले तो वो भी इसमें पर्याप्त रुचि लेती हैं।
 आखिर लोग क्यों देखते हैं पोर्न, जानें कामुकता से जुड़ी बेहद खास बातें
940 और 50 के दशक में अल्फ्रेड किन्से और उनके सहयोगियों ने पोर्न और सेक्स व्यवहार को लेकर गंभीर शोध कार्य किया। उन्होंने इस अध्ययन के लिए 17000 पुरुषों और महिलाओं के साक्षात्कार लिए। किन्से और उनके सहयोगियों ने पाया कि 54 फीसदी पुरुष जहां न्यूड तस्वीरों, रेखाचित्रों और पेंटिंग्स को देखने के बाद उत्तेजित हुए, वहीं सिर्फ़ 12 फीसदी महिलाओं में यौन उत्तेजना पाई गई। किन्से ने यह भी पाया कि हस्तमैथुन के दौरान पुरुषों की फैंटेसी में स्त्रियों की छवि होती है, जबकि स्त्रियों के साथ ऐसा प्राय: नहीं होता। वहीं, समलैंगिक पुरुष इस क्रम में समलैंगिक फैंटेसी में डूब जाते हैं।


आखिर लोग क्यों देखते हैं पोर्न, जानें कामुकता से जुड़ी बेहद खास बातें


किन्से कहते हैं कि इसका ये मतलब नहीं कि पोर्न महिलाओं में यौन उत्तेजना नहीं पैदा करता। लेबोरेट्री स्टडीज से किन्से को यह पता चला कि पोर्न मूवी देखने के दौरान महिलाएं सेक्शुअली एक्साइटेड हुईं। इस दौरान उनके यौनांगों में रक्त का प्रवाह बढ़ गया। खास बात ये है कि ऐसा उन महिलाओं के साथ हुआ जो पोर्न को लेकर हिकारत का भाव रखती थीं और ऐसी तस्वीरें या फ़िल्में देखना नैतिक मूल्यों के विरुद्ध मानती थीं। दूसरे अध्ययनों से भी यह जाहिर हुआ कि इरॉटिक तस्वीरों अथवा साहित्य के मुकाबले पोर्न देखने पर महिलाओं में तत्काल एराउजल हुआ। कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं पर काफी बंदिशें हैं और यही कारण है कि वो पोर्न को लेकर काफी झिझक महसूस करती हैं। समाज में महिलाओं की यौनिकता को हर स्तर पर दबाया जाता है।
आखिर लोग क्यों देखते हैं पोर्न, जानें कामुकता से जुड़ी बेहद खास बातें

किन्से का कहना है कि इस संबंध में सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। कुछ महिलाएं पोर्न में ज्यादा रुचि लेती हैं, वहीं कुछ इसका नाम लेना भी लज्जास्पद समझती हैं। वो कहते हैं कि स्त्रियां पोर्न उतना ही पसंद करती हैं, जितना पुरुष, लेकिन वो खुलकर इस संबंध में बात नहीं करतीं। ज्यादा पोर्न देखने वाले लोग भले इससे यौन उत्तेजना या यौन परितृप्ति महसूस करें या नहीं, वो इसका इस्तेमाल आनंद के एक साधन के रूप में करते हैं। वो कहते हैं कि इसमें एक 'फील गुड' फैक्टर है। कई बार स्ट्रेस, एंग्जाइटी और डिप्रेशन की स्थिति में पोर्न देखना शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि इससे उन्हें कुछ आनंद मिलेगा और वो अच्छी तरह सेक्स भी कर सकेंगे। प्राय: ऐसा होता भी है, पर हार्डकोर पोर्न देखना तब घातक हो जाता है, जब लोगों को इसकी आदत पड़ जाती है। तब यह प्लेज़र भारी पड़ जाता है, क्योंकि लगातार पोर्न देखने से सेक्शुअल परफॉर्मेंस पर नकारात्मक असर पड़ता है।पोर्न का बढ़ता प्रसार पूरी दुनिया में मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाशास्त्रियों और बच्चों के अभिभावकों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। बच्चों के लिए यह घातक है। इंटरनेट तक पहुंच आसान होने के कारण बच्चों और किशोरों के लिए पोर्न देखना बहुत ही आसान हो गया है। पोर्न एडिक्शन दूसरे एडिक्शन की तरह ख़तरनाक है। इसकी लत छुड़ाने के लिए दुनिया की बड़ी यूनिवर्सिटियों में शोध-कार्य हो रहे हैं और रिहैब सेंटर भी बनाए जा रहे हैं।  sabhar ; bhaskar.com


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फ्रांस की टीम ने विश्व कप फुटबॉल में जगह बनाने में कामयाब हुई एंकर ने न्यूड होकर दी मौसम की जानकारी

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French weathergirl, stuns viewers, nude report

भारत के जीतने पे पूनम पांडे कह के भी न्यूड ना हुयी हो पर फ्रांस मे ऐसा ही हुआ
जब फ्रांस की टीम ने विश्व कप फुटबॉल में जगह बनाने में कामयाब हुई तो उस वादे के अनुसार केवल बूट पहनकर मौसम की जानकारी दी। मौसम पढ़ते हुए टिलर पूर्वी फ्रांस के एक गांव पोईल के एक मैदान में दौड़ते हुए मौसम की जानकारी दे रही थी और कैमरा लांग शॉट में उसे कैप्चर कर रहा था।मॉडल से मौसम की एंकर बनी डोरिया टिलर ने अपने वादे को पूरा कर दिया जो उसने अपने दर्शकों से किया था। टिलर ने कहा था कि अगर फ्रांस फुटबॉल वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कर जाता है तो वह मौसम का समाचार न्यूड होकर पढ़ेंगी। और उन्होंने ऐसा कर दिखाया।टिलर ने इस गांव को इसलिए चुना क्योंकि फ्रेंच में पो‌ईल का मतलब होता है नग्नता। कैनल+ चैनल पर दिखाया जाने वाले एक टॉक शो, लॉ ग्रांड जर्नल में इस वी‌डियो को दिखाया गया। इस टॉक शो के एंकर एंटनियो कॉनेस ने कहा कि आप में से कुछ लोग इसे देशप्रेम कहेंगे तो कई इसे मूर्खता लेकिन मैं अपने बारे में कहूं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है---मुझे तो बस ये पता है कि फ्रांस ने वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई कर लिया है। sabhar : amarujala.com

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जापानी कंपनी जापान डिस्प्लेय ने बनाई "कागज़" की स्क्रीन

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जापानियों ने बनाई "कागज़" की स्क्रीन


जापानी कंपनी "जापान डिस्प्लेय"(सोनी, तोशिबा और हिताची का एक संयुक्त उद्यम)ने कम बिजली की खपत करने वाली एक उन्नत एल.सी.डी. स्क्रीन का निर्माण किया है।नए डिस्प्लेय की विशेष बात यह है कि इस पर प्रकाश पड़ने से वह कागज़ जैसी दिखाई देती है। शुरू में इस पर केवल मोनोक्रोम छवि ही दिखाई देती है। इसका रंग बदलने के लिए इस पर एक विशेष फिल्टर लगाया गया है इस स्क्रीन की आधुनिक स्क्रीनों से अलग बात यह है कि इस में कोई पार्श्वप्रकाश नहीं है जिससे आँखों को कोई असुविधा नहीं रहेगी इस डिस्प्लेय के निर्माताओं का कहना है कि नई स्क्रीन आजकल प्रचलित इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकों की स्क्रीन और डिज़िटल फ़ोटो फ्रेम का स्थान ले सकती है। इस स्क्रीन पर अचल तस्वीरें दिखाते समय बैटरी लगभग खर्च नहीं होती है।sabhar: http://hindi.ruvr.ru


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यूरोपीय आयोग ने पहली बार जीन थेरेपी के वाणिज्यिक इस्तेमाल की अनुमति दी

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यूरोप में वाणिज्यिक जीन थेरेपी की अनुमति मिली

यूरोपीय अधिकारियों ने पहली बार जीन थेरेपी के वाणिज्यिक इस्तेमाल की अनुमति दी हैजीन थेरेपी- उपचार की एक ऐसी विधि है जिसकी सहायता से मानव के आनुवंशिक कोड में किसी ग़लती को सुधारा जा सकता है चीन दुनिया का पहला ऐसा देश है जहाँ जीन थेरेपी का वाणिज्यिक दृष्टि से उपयोग करने की आधिकारिक तौर पर अनुमति दी गई है। यूरोप और अमरीका में इस विधि से इलाज अबी तक केवल अनुसंधान प्रयोगशालाओं में ही किया जा सकता है।यूरोपीय आयोग ने एक छोटी-सी डच कंपनी को इस दुर्लभ बीमारी का इलाज करने की मंज़ूरी दी है। इस बीमारी का संबंध मानव शरीर में अतिरिक्त चर्बी होने से है जिससे छुटकारा पाना लगभग असंभव है। इस बीमारी का उपचार करने के लिए जो नई दवाई बनी है उसका नाम Glybera है। इस दवाई में एक ऐसा वायरस डाला जाता है जो मानव की मांसपेशियों की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं के स्थान पर नई स्वस्थ
कोशिकाएँ बनाने में मददगार होता है।  sabhar :http://hindi.ruvr.ru


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शराब की पेटी बिकी 4 लाख 76 हज़ार डालर में

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शराब की पेटी बिकी पौने पांच लाख डालर में

रोमाने-कोंटी” नाम की लाल मदिरा की बारह बोतलों की एक पेटी हांगकांग में हुई नीलामी में 4 लाख 76 हज़ार डालर में बिकी है|फ्रांस के बुर्गुन्दी इलाके में उगे अंगूर से बनी 1978 की फसल की “रोमाने-कोंटी” नाम की लाल मदिरा क्रिस्टीज़ नीलामीघर के अनुसार यह आज के दिन में संसार की सबसे महंगी मदिरा है
नीलामी के दौरान इस पेटी के दाम अनुमानित मूल्य से तीन गुना अधिक हो गए| यह मदिरा एक चीनी संग्रहकर्ता ने खरीदी है जिसने अपना नाम अज्ञात ही रखा है| इससे पहले शराब की पेटी की सबसे बड़ी बोली 2006 में लगी थी| तब 1945 की फसल की “शतो मुतों-रोत्शिल्ड” मदिरा की डेढ़ लीटर वाली छह “मैग्नम” बोतलों की पेटी 3 लाख 45 हज़ार डालर में बिकी थी|
sabhar: http://hindi.ruvr.ru

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100 साल पुरानी अमेरिका के वैध वेश्यालयों की ये तस्वीरें

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अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

सन् 1912 में मशहूर अमेरिकी फोटोग्राफर जॉन अर्नेस्ट जोसेफ बेलॉक ने भी रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट की कुछ तस्वीरें खींची।

न्यू ऑर्लिएंस स्थित स्टोरीविले के वैध वेश्यालयों की ये तस्वीरें तकरीबन 100 साल पुरानी हैं। गौरतलब है कि 1917 में यहां के वेश्यालय बंद हो चुके हैं। जोसेफ नहीं चाहते थे कि ये तस्वीरें प्रकाशित की जाएं। उनकी मौत के कई सालों बाद इन तस्वीरें के बारे में मालूम चला। फोटोग्राफर ली फ्रीडलेंडर ने इन पोट्रेट्स को ढूंढ निकाल और ई.जे. बेलॉक स्टोरीविले पोट्रेट्स के नाम से प्रकाशित किया।

बैलॉक द्वारा खींची गई तस्वीरें उस दौर की हैं जब समाज काफी छोटी सोच रखता था। यह उकसाने वाला और जोखिमभरा समय था। आज करीब 101 साल बाद देखा जा सकता है कि समय के साथ हमारे संस्कारों और विचारों में कितना परिवर्तन आया है। आज उकसावे को साहस के तौर पर देखा जाता है। वेश्यावृत्ति कई शहरों में कानूनी रूप से वैध है। यह अब न्यू ऑर्लियंस की संकरी और अंधेरी गलियों तक सीमित नहीं हैं।
अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें
अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें




अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें


अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

अमेरिका के लीगल वेश्यालय की 100 साल पुरानी दुर्लभ तस्वीरें

sabhar : bhaskar.com


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शनिवार, 23 नवंबर 2013

बादाम और लंबी उम्र

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एक शोध के मुताबिक़ बादाम खाने वाले लोग लंबी उम्र जीते हैं

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित शोध के अनुसार उन लोगों को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होता है जो रोज़ाना चबाकर-चबाकर बादाम खाते हैं.
अमरीकी टीम ने इस शोध में एक लाख 20 हज़ार लोगों पर 30 साल तक नज़र रखी गई.हालांकि ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन का कहना है कि बादाम और लंबी उम्र के बीच के रिश्ते को साबित करने के लिए अभी और ज़्यादा शोध की ज़रूरत होगी.
बादाम का सेवन कोलेस्ट्रॉल और सूजन को कम करता है.डाना-फैबर कैंसर इंस्टीट्यूट और ब्रीगम एंड वीमंस हॉस्पिटल के मुख्य शोधकर्ता डॉ. चार्ल्स फक्स ने कहा, "बादाम खाने से हृद्य रोगों से होने वाली मौतों में 28 प्रतिशत की कमी देखी गई है. इसके अतिरिक्त कैंसर से होने वाली मौतों में 11 प्रतिशत तक की कमी देखी गई."
ब्रिटिश हृद्य संस्थान में वरिष्ठ आहार विशेषज्ञ विक्टोरिया टेलर कहती हैं, "यह अध्ययन नियमित रूप से बादाम के सेवन और हृद्य रोगों से संभावित मौतों के बीच कमी में एक संबंध स्थापित करता है." sabhar  :http://www.bbc.co.uk

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भव्य रॉयल हवेली संत के लिए बनी है

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यह ट्राईसिटी की जानी मानी आर्किटेक्ट रेणु खन्ना का घर है जोकि किसी हवेली के मॉडिफाइड रूप से कम नहीं।



ये रॉयल हवेली बनी है संत के लिए, देखिए इस हवेली की भव्यता




ये रॉयल हवेली बनी है संत के लिए, देखिए इस हवेली की भव्यता
घर की डिजाइनिंग करते हुए लाइटनिंग के खर्च के बारे में सोचा। इसलिए सोलर पॉवर, रेन वॉटर हॉर्वेस्टिंग सिस्टम और वॉटर हीटर को यूज किया। ताकि शाम 6 बजे तक घर में कोई लाइट न जलानी पड़े। घर के सामने पहाड़ साफ नजर आता है। यह नजारा घर के हर कोने से दिख सके चाहे वो गेस्ट का कमरा हो, किचन हो या फिर बेडरूम। इसलिए खिड़कियों को बड़ा बनाया। सब कुछ बहते हुए पानी की तरह बनाया। नेचुरल लाइट पर फोकस करते हुए छतों की डिजाइनिंग की।’

रेणु श्री रविशंकर की फॉलोअर है। उन्होंने अपने गुरू जी के लिए घर में एक खास रूम बनाया है। उसे नीले रंग का इफैक्ट दिया है। यह इसलिए क्योंकि नीला रंग भगवान शिव का प्रतीक है। दीवार पर मोर और उस पर ब्लू लाइटनिंग इस्तेमाल की है।

घर में वास्तु के मुताबिक भी कुछ डिजाइनिंग की गई है। इस पर रेणु बताती हैं, ‘ यहां वास्तु के हर आस्पेक्ट को जोड़ा है। रंगों से लेकर पंच तत्वों को। हर इंसान पंच तत्व से बना है। जल, अग्नि, वायु, धरती और आकाश। घर के कमरों को मैंने इन पांचों तत्वों से जोड़ा है। किसी कमरे ही छत को लाल रंग का इफैक्ट दिया तो किसी को नीला। हर दो कमरों के बाहर एक लॉबी बनाई, जिससे किसी को मिलने में दिक्कत न हो। बेडरूम के बाहर लॉबी में ही फ्रेंड व अन्य 

लोगों से मिल सकें। ड्राइंग रूम से लेकर कोर्टयार्ड और लिविंग एरिया सात रंगों से सजाया।’

ये रॉयल हवेली बनी है संत के लिए, देखिए इस हवेली की भव्यता


sabhar : bhaskar.com

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कहीं स्मार्ट टीवी आपकी ‘जासूसी’ तो नहीं कर रहा?

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इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनी एलजी पर इंग्लैंड के एक आईटी कंसल्टेंट ने जासूसी करने का आरोप लगाया है।

उनका कहना है कि प्राइवेसी सेटिंग को एक्टिवेट करने के बावजूद एलजी के स्मार्ट टीवी लोगों की टीवी देखने की आदत के बारे में कंपनी को विस्तृत जानकारी भेजते हैं। एलजी इन आरोपों की जांच कर रही है।

हल के आईटी कंसल्टेंट जैसन हंटले ने एक ब्लॉग में लिखा है कि आप कौन से चैनल देख रहे हैं, इसकी जानकारी स्मार्ट टीवी एलजी को भेजता है।
उनकी जांच में यह भी सामने आया कि स्मार्ट टीवी उससे जुड़े अन्य उपकरणों की जानकारी भी कंपनी को देता है।

इसका मतलब यह हो सकता है कि एलजी ने नियमों का उल्लंघन किया है। इस बारे में ब्रिटेन के सूचना आयुक्त कार्यालय ने कहा है कि वो मामले को देख रहे हैं।

एक प्रवक्ता ने कहा, ''हमें हाल ही में जानकारी मिली है कि गोपनीयता का उल्लंघन किया गया, इसमें 
क्लिक करें एलजी का स्मार्ट टीवी भी शामिल हो सकता है।''

ब्रिटेन के सूचना आयुक्त के कार्यालय ने कहा है कि वह आरोपों की जांच कर रहा है। उसके बाद ही कार्रवाई के बारे में 

फैसला किया जाएगा। जैसन हंटले ने कहा कि जब उन्होंने दक्षिण कोरियाई कंपनी एलजी से संपर्क किया तो उनसे 

कहा गया कि वे एलजी टीवी का इस्तेमाल करने से पहले कंपनी के नियमों को स्वीकार कर चुके हैं। अब कोई 

शिकायत है तो उस दुकानदार से संपर्क करें जिससे टीवी खरीदा है। बीबीसी ने लिखा है कि उसे कंपनी ने कहा कि वह 

शिकायत पर कार्रवाई कर रही है। हंटले ने दावा किया कि उसके पास प्राईवेट सेटिंग बदलने के बावजूद जानकारी

भेजे जाने के सबूत हैं। sabhar : http://www.amarujala.com : http://www.bhaskar.com

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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

खजाने की खोजः जेसीबी मशीन लेकर खुदाई करने पहुंचे ओम बाबा

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खजाने की खोजः सरकार हारी तो जेसीबी लेकर खुद खुदाई करने पहुंचे शोभन सरकार के चेले

 डोंडिया खेड़ा में खजाने की खोज में गुरुवार को नया मोड़ आ गया। एएसआई की टीम के खुदाई बंद करने के बाद संत शोभन सरकार के शिष्य ओम बाबा ने खुद मोर्चा संभाल लिया। ओम बाबा खुद जेसीबी मशीन लेकर खुदाई करने पहुंच गए। गौरतलब है कि पिछले दिनों एएसआई की टीम किले में खजाने की खोज के लिए खुदाई बंद कर वापस लौट चुकी है।बृहस्पतिवार सुबह संत शोभन सरकार ने बक्सर आश्रम में विशेष पूजा कर जेसीबी मशीन के साथ किले में खजाने की खुदाई के लिए ओम बाबा को भेज दिया। खुदाई शुरू कराए जाने की खबर से भीड़ के साथ पुलिस भी पहुंच गई। पुलिस जेसीबी को अपने साथ लेकर जाने लगी तो भीड़ आक्रोशित हो उठी। भीड़ के तेवर बिगड़ते देख बैकफुट पर आई पुलिस ने जेसीबी को किला परिसर में खड़ा करा दिया। एसडीएम विजय शंकर दुबे भी मौके पर पहुंचे और हालात को संभालने की कोशिश की। जिसके बाद ओम बाबा बक्सर आश्रम वापस चले गए। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि फोन पर प्रशासन से सहमति मिलने के बाद वे लोग आए थे, लेकिन बाद में प्रशासन मुकर गया।

daundiya kheda


sabhar : jagaran.com  : bhaskar.com

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गुरुवार, 21 नवंबर 2013

परामनोविज्ञान द्वारा आत्मा को जाने

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what is parapsychology history

अमर उजाला डाट com मे प्रकाशित खबर के मुताबिक  परामनोविज्ञान  और आत्मा से सम्बन्धित खबर के अनुसार  परामनोविज्ञान का संबंध मनुष्य की उन असामान्य शक्तियों से है, जिनकी व्याख्या अब तक के प्रचलित सामान्य मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों से नहीं हो पाती। इन तथाकथित प्राकृति से परे तथा विलक्षण प्रतीत होने वाली घटनाओं या प्रक्रियाओं की व्याख्या में ज्ञात भौतिक तत्वों से भी सहायता नहीं मिलती। 

परिचित ज्ञान, विचार संक्रमण, दूरानुभूति, पूर्वाभास, अतींद्रिय ज्ञान, मनोजनित गति या साइकोकाइनेसिस आदि कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं, जो एक भिन्न कोटि की मानवीय शक्ति तथा अनुभूति की ओर संकेत करती हैं। इन घटनाओं की वैज्ञानिक स्तर पर घोर उपेक्षा की गई है और इन्हें बहुधा जादू-टोने से जोड़कर, गुह्यविद्या का नाम देकर विज्ञान से अलग समझा गया है।

किंतु ये विलक्षण प्रतीत होने वाली घटनाएं घटित होती हैं। वैज्ञानिक उनकी उपेक्षा कर सकते हैं, पर घटनाओं को घटित होने से नहीं रोक सकते। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आज भी परामनोविज्ञान को वैज्ञानिक संदेह तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखता है। किंतु वास्तव में परामनोविज्ञान न जादू टोना है, न वह गुह्यविद्या, प्रेतविद्या या तंत्रमंत्र जैसा कोई विषय। इन तथाकथित प्राकृतेतर, पराभौतिक एवं परामानसकीय, विलक्षण प्रतीत होने वाली अधिसामान्य घटनाओं या प्रक्रियाओं का विधिवत् तथा क्रमबद्ध अध्ययन ही परामनोविज्ञान का मुख्य उद्देश्य है।

इन्हें प्रयोगात्मक पद्धति की परिधि में बांधने का प्रयत्न, इसकी मुख्य समस्या है। परामानसकीय अनुसंधान या साइकिकल रिसर्च इन्हीं पराभौतिक विलक्षण घटनाओं के अध्ययन का अपेक्षाकृत प्राचीन नाम है, जिसके अंतर्गत विविध प्रकार की उपांत घटनाएं भी सम्मिलित हैं, मानव का अदृश्य जगत से इंद्रियेतर संपर्क में विश्वास बहुत पुराना है। लोककथाएं, प्राचीन साहित्य, दर्शन तथा धर्मग्रंथ पराभौतिक घटनाओं तथा अद्भुत मानवीय शक्तियों के उदाहरणों से भरे पड़े हैं। परामनोविद्या का इतिहास बहुत पुराना है - विशेष रूप से भारत में।

किंतु वैज्ञानिक स्तर पर इन तथाकथित पराभौतिक विलक्षण घटनाओं का अध्ययन उन्नीसवीं शताब्दी की देन है। इससे पूर्व इन तथाकथित रहस्यमय क्रिया व्यापारों को समझने की दिशा में कोई संगठित वैज्ञानिक प्रयत्न नहीं हुआ। आधुनिक परामनोविज्ञान का प्रारंभ सन् 1882 से ही मानना चाहिए, जिस वर्ष लंदन में परामानसकीय अनुसंधान के लिए सोसाइटी फॉर साइकिकल रिसर्च (एसपीआर) की स्थापना हुई।

यद्यपि इससे पहले भी कैंब्रिज में घोस्ट सोसाइटी, तथा ऑक्सफोर्ड में फैस्मेटोलाजिकल सोसाइटी जैसे संस्थान रह चुके थे, तथापि एक संगठित वैज्ञानिक प्रयत्न का आरंभ एसपीआर की स्थापना से ही हुआ, जिसकी पहली बैठक 17 जुलाई, 1882 ई. में प्रसिद्ध दार्शनिक हेनरी सिजविक की अध्यक्षता में हुई। इसके संस्थापकों में हेनरी सिजविक उनकी पत्नी ईएम सिजविक, आर्थर तथा गेराल्ड बाल्फोर, लार्ड रेले, एफडब्ल्यूएच मायर्स तथा भौतिक शास्त्री सर विलियम बैरेट थे।

भूत होते हैं 

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