गुरुवार, 30 सितंबर 2021
आइये पत्तल की परंपरा को पुनर्जिवित करें
1रविवार, 12 सितंबर 2021
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रविवार, 29 अगस्त 2021
बंगाल का पाल वंश
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ह पूर्व-मध्यकालीन राजवंश था। जब हर्षवर्धन काल के बाद समस्त उत्तरी भारत में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक गहरा संकट उत्पनन्न हो गया, तब बिहार, बंगाल और उड़ीसा के सम्पूर्ण क्षेत्र में पूरी तरह अराजकत फैली थी। इसी समय गोपाल ने बंगाल में एक स्वतन्त्र राज्य घोषित किया। जनता द्वारा गोपाल को सिंहासन पर आसीन किया गया जो कि एक गडरिया था। वह योग्य और कुशल शासक था, जिसने ७५० ई. से ७७० ई. तक शासन किया। इस दौरान उसने औदंतपुरी (बिहार शरीफ) में एक मठ तथा विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया।
गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल ७७० ई. में सिंहासन पर बैठा। धर्मपाल ने ४० वर्षों तक शासन किया। धर्मपाल ने कन्नौज के लिए त्रिदलीय संघर्ष में उलझा रहा। उसने कन्नौज की गद्दी से इंद्रायूध को हराकर चक्रायुध को आसीन किया। चक्रायुध को गद्दी पर बैठाने के बाद उसने एक भव्य दरबार का आयोजन किया तथा उत्तरापथ स्वामिन की उपाधि धारण की। धर्मपाल बौद्ध धर्मावलम्बी था। उसने काफी मठ व बौद्ध विहार बनवाये। धर्मपाल एक उत्साही बौद्ध समर्थक था उसके लेखों में उसे परम सौगात कहा गया है। उसने विक्रमशिला व सोमपुरी प्रसिद्ध बिहारों की स्थापना की। भागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया था। उसके देखभाल के लिए सौ गाँव दान में दिये थे। उल्लेखनीय है कि प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय एवं राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने धर्मपाल को पराजित किया थ (2000-2050 ई.)
धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल गद्दी पर बैठा। इसने अपने पिता के अनुसार विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। इसी के शासनकाल में अरब यात्री सुलेमान आया था। उसने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाई। उसने पूर्वोत्तर में प्राज्योतिषपुर, उत्तर में नेपाल, पूर्वी तट पर उड़ीसा तक विस्तार किया। कन्नौज के संघर्ष में देवपाल ने भाग लिया था। उसके शासनकाल में दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रहे। उसने जावा के शासक शैलेंद्र के आग्रह पर नालन्दा में एक विहार की देखरेख के लिए ५ गाँव अनुदान में दिए।
देवपाल ने ८५० ई. तक शासन किया था। देवपाल के बाद पाल वंश की अवनति प्रारम्भ हो गयी। मिहिरभोज और महेन्द्रपाल के शासनकाल में प्रतिहारों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया।
बुधवार, 11 अगस्त 2021
घोड़ों की एंटीबॉडी से बनाई गई दवा
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सोमवार, 9 अगस्त 2021
प्रोस्टेट कैंसर का 100 फीसदी इलाज संभव
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वफादार और खूंखार कुत्तों की यहां बसी है शानदार दुनिया
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कनाडा में एक निजी कंपनी के साथ जुड़े अमनिंदर साल के छह महीने अपनी इस खतरनाक फौज के साथ लुधियाना में बिताते हैं। रॉट वेलर प्रजाति के 28 कुत्तों की ग्रेवाल से मोहब्बत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कैनन लॉन में घुसते ही उन्हें गले लगाने को यह फौज यूं टूट पड़ती है कि कोई अंजान देखे तो सहम जाए।
फिरोजपुर रोड पर शमशेर एवेन्यू में रह रहे इन डॉग्स के ठाठ भी निराले हैं। इनके पालन-पोषण का मासिक खर्च एक लाख रुपये से भी ऊपर है।ग्रेवाल देश में हो या विदेश में,पैट्स की शान ओ शौकत में कोई फर्क नहीं पड़ता। देखभाल और प्रशिक्षण के लिए चार मास्टर हैं। लुधियाना में कनाडा जैसी मौज तो नहीं है, लेकिन अपने इन वफादारों से मिलने की खुशी उससे कहीं ज्यादा है। रॉट वेलर नस्ल का 10 वर्षीय टाइटन तो उनके प्यार में काफी बिगड़ा हुआ है। टाइटन जिद कर बैठे तो ग्रेवाल को उसे अपने साथ बेड पर सुलाना ही पड़ता है।
यह है खानपान का हिसाब
600 ग्राम फीड प्रतिदिन एक कुत्ते को (कीमत 140 रुपये प्रति किलोग्राम) 250 ग्राम दही दिन में (कीमत 25 रुपये) छह अंडे रोज (30 रुपये) फूड सप्लीमेंट रोजाना सुबह (15 रुपये एक गोली) प्रत्येक मास्टर पर खर्च 8 से 20 हजार
इन नस्ल के डॉग्स हैं ग्रेवाल के पास
रॉट वेलर : 28 शारपेई : 3 डेशन्ड हाउंड : 1 लैब्राडोर : 1
मुझे इनसे उतना ही प्यार है, जितना अपने बच्चों से। यह मेरा परिवार है। इनका सौदा करने का सवाल ही नहीं उठता। रॉट वेलर खतरनाक नहीं बदनाम ज्यादा हैं।
sabhar : bhaskar.com
मंगलवार, 3 अगस्त 2021
समर ओलंपिक में भारत
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सोमवार, 26 जुलाई 2021
उन्नति की आकाँक्षा
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सोमवार, 12 जुलाई 2021
सेमल के फूल
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रविवार, 11 जुलाई 2021
जामुन के फायदे
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शुक्रवार, 21 मई 2021
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