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सोमवार, 21 अप्रैल 2014

लैब में बनेंगे सुपरमैन

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ब्रिटिश वैज्ञानिकों का दावा-नई तकनीक से वापस मिल सकेंगे खोए अंग
विज्ञान लगातार तरक्की कर रहा है। इतनी कि इंसान भी अब लैब में बनाए जा सकेंगे। यहां स्टेम सेल थैरेपी या क्लोनिंग की बात नहीं हो रही है, बल्कि पूरी तरह मशीनी मानव की बात हो रही है, जो न सिर्फ आम इंसानों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होगा। ब्रिटिश वैज्ञानिकों का दावा है कि ऐसा सुपरमैन अब लैब में तैयार किया जा सकता है और वह भी मात्र डेढ़ लाख पाउंड यानी एक करोड़ २१ लाख रुपए में। इतना ही नहीं युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं और दुर्घटनाओं में खोए अंगों को फिर से किसी इंसान के शरीर पर लगाया जा सकेगा। फर्क इतना होगा कि यह सब मशीनी होगा। यह सुपरमैन कार्टून कैरेक्टर सुपरमैन जैसा नहीं होगा, इसमें अलौकिक शक्तियां नहीं होंगी लेकिन फिर भी आम इंसानों की तुलना में ये विशेष होंगे। युद्ध में अपंग लोगों को मशीनी ताकत की बदौलत फिर से चलने-फिरने की आजादी मिल पाएगी। इनके कृत्रिम हाथ-पैर पूरी तरह ऑटोमैटिक होंगे, जिनकी पकड़ आम हाथ से कहीं ज्यादा ताकतवर होगी।


कहां से आएगी सुपर पावर
आई-लिंब : ये कृत्रिम उंगलियां पूरी तरह तारों के जरिए नियंत्रित होंगी, ये हाथ से मिलने वाले मसल सिगनल की सहायता से काम करेंगी। इन्हे टच बायोनिक्स द्वारा तैयार इन उंगलियों को नाम दिया गया है आई-लिंब।
ऑसर पावर नी : आइसलैंड की कंपनी द्वारा तैयार यह नकली घुटना दुनिया का पहला बिजली से चलने वाला घुटना होगा, जो आवाज की ताकत पर काम करेगा।
सुपर आई्ज : लंदन स्थित मूरफील्ड्स आई हॉस्पिटल सैनिकों की आंखों की ताकत बढ़ाने पर काम कर रहा है। मिनी कैमरों की मदद से युद्ध के समय रात को भी इससे सैनिकों को खासी मदद मिलेगी। इनकी आंखों द्वारा देखने की क्षमता कहीं अधिक होगी।

फोटो में
कुछ ऐसा होगा सुपरमैन
बायोनिक स्टें्रथ : बायोनिक्स एक्सोस्केलेटान से बढ़ेगी कमजोर हड्डियों की ताकत
कीमत : १२,००० पाउंड
बायोनिक लैग (ऑसर पावर नी) : नकली पांव होगा असली पांव से ज्यादा दमदार। फुली फंक्शनल होने से बढ़ेगी रफ्तार।
कीमत : ७६,००० पाउंड
अमेरिका की प्रसिद्ध सिक्स मिलियन डॉलर मैन सीरिज में ऐसे ही सुपरमैन की भूमिका निभाई थी ली मेजर नामक एक अभिनेता ने।
बायोनिक आई : युद्ध के समय सैनिकों के देखने की क्षमता बढ़ाने के अलावा यह जन्मजात नेत्रहीनों के भी काम आएगी। नेत्रहीनों की इससे देखने की क्षमता काफी हद तक लौट आएगी।
कीमत : १८,००० पाउंड
आई-लिंब : मशीनी उंगलियों की मजबूत पकड़ से जिंदगी फिर लौटेगी पटरी पर। यह तारों के जरिए दिमाग से नियंत्रित होंगी। इन पर नकली चमड़ी चढ़ाए जाने के बाद हट जाएगा असली-नकली का फर्क।
कीमत : ४४,००० पाउंड sabhar :http://nimesh-heyimhere.blogspot.in/

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रसोई में बना दुनिया का सबसे मजबूत पदार्थ

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वैज्ञानिकों ने दुनिया का सबसे पतला और सबसे मजबूत पदार्थ 'ग्रेफीन' बनाने का एक आसान तरीका ढूंढ निकाला है. उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में यह कंप्यूटरों, टच स्क्रींस और बैटरियों में सेमीकंडक्टरों की जगह ले सकता है.


 Diamant Pink Star
अपने गुणों के कारण चमत्कारी माना जाने वाला 'ग्रेफीन' दुनिया का ऐसा सबसे पतला पदार्थ है, जो दिखने में पारदर्शी और स्टील से भी अधिक मजबूत होता है. यह कार्बन के सिर्फ एक परमाणु जितना मोटा और बिजली का तेज संवाहक होता है. ग्रेफीन को बड़े स्तर पर बनाना हमेशा से ही काफी कठिन रहा है. जो भी तरीके अभी तक प्रचलित हैं उनसे बढ़िया क्वालिटी की ग्रैफीन काफी कम मात्रा में ही बनाई जा सकती है.
जब भी ज्यादा मात्रा में ग्रेफीन बनाने की कोशिशें होतीं, तो हमेशा इस पदार्थ में कुछ दोष रह जाते. अब इंग्लैंड और आयरलैंड के वैज्ञानिकों की एक टीम ने इसे बेदह आसान कर दिया है. उन्होंने किचन में इस्तेमाल होने वाले ब्लेंडर से बिना किसी दोष वाले ग्रेफीन की एक बहुत पतली परत तैयार कर दिखाई है.
वैज्ञानिकों ने पेंसिल की नोंक में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ ग्रेफाइट को पीसकर पाउडर में बदला. फिर इस पाउडर को एक बर्तन में 'एक्सफोलिएटिंग लिक्विड' के साथ मिलाया और इसके बाद ब्लेंडर में बहुत तेजी से चला दिया. इस तरह उन्हें ग्रेफीन की एक माइक्रोस्कोपिक परत मिली जिसमें करीब एक नैनोमीटर मोटाई और 100 नैनोमीटर लंबाई वाले कण लिक्विड के अंदर झूल रहे थे. वैज्ञानिकों ने बताया कि तेज गति से ब्लेंडर के ब्लेड्स के साथ घुमाने से ग्रेफाइट पर इतना बल लगा कि वह टूट कर ग्रेफीन की एक परत में बदल गया. सबसे अच्छी बात यह हुई कि इस टूटने की प्रक्रिया में भी पदार्थ की द्विआयामी संरचना नष्ट नहीं हुई, जिसके कारण इसके सारे गुण बरकरार रहे.
'नेचर मैटीरियल्स' नाम के जर्नल में प्रकाशित हुई इस स्टडी के लेखकों में से एक जोनाथन कोलमैन ने कहा, "हमने ग्रेफीन शीट बनाने का एक नया तरीका विकसित किया है. इस तरीके से बिना किसी दोष वाला बहुत सारा ग्रेफीन बन सकता है." डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज में केमिकल फिजिक्स के प्रोफेसर कोलमैन ने बताया कि टीम ने ग्रेफाइट के मिश्रण को हिलाने के लिए उद्योग धंधों में इस्तेमाल होने वाले शीयर मिक्सर नाम के एक उपकरण का इस्तेमाल किया. इसके बाद उन्होंने इस प्रयोग को किचन के साधारण ब्लेंडर के साथ भी दोहराया और वैसा ही नतीजा पाया.
कोलमैन बताते हैं, "प्रयोगशाला में तो हमने केवल कुछ ग्राम बनाए लेकिन बड़े स्तर पर इससे कई टन पदार्थ तैयार किया जा सकेगा." इस तरह से बनाई गए ग्रेफीन वाले लिक्विड को ऐसी कई सारी सतहों पर पेंट की एक परत के रूप में लगाया जा सकता है जिसे मजबूत बनाना हो. इसके अलावा प्लास्टिक के साथ मिला कर और भी ज्यादा मजबूत मिश्रित पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं. कोलमैन ने बताया कि जिस कंपनी ने इस स्टडी को प्रायोजित किया था वह ग्रेफीन की परत बनाने के इस तरीके को पेटेंट कराने के लिए आवेदन भी दे चुकी है.
सबसे पहले 1947 में ग्रेफीन जैसे गुणों वाले एक काल्पनिक पदार्थ की बात हुई थी. तब भौतिकशास्त्रियों को लगा था कि ऐसी किसी पतली परत को असल में बनाना असंभव होगा. उन्हें लगा कि अगर कार्बन क्रिस्टल जितनी मोटी एक परत बन भी गई तो वह स्थाई नहीं होगी. अब साबित हो गया कि कोरी कल्पना में भी सच्चाई की कुछ संभावना हमेशा होती है.sabhar :http://www.dw.de/

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अंतरजातीय विवाह करने वालों को खाप से मिली खुशखबरी

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लेकिन सगोत्र विवाह को 'ना'


खाप बोली, अब कर लो इंटरकास्ट मैरिज


सामाजिक तौर पर एक बड़े ऐतिहासिक फैसले के तहत हरियाणा की सबसे बड़ी खाप पंचायत ने गैर बिरादरी विवाह को स्वीकार कर लिया है। हिसार की सतरोल खाप (करीब 42 गांवों की पंचायत) ने कहा है कि अब गैर बिरादरी विवाह हो सकेंगे बशर्ते उसमें माता पिता की मंजूरी शामिल हो।

खाप ने कहा है कि अब राज्य के लोग इंटरकास्ट मैरिज कर सकेंगे। यही नहीं इंटर विलेज (पहले अपने गांव के आस पास के 42 गांवों में भी शादी की अनुमति नहीं थी) भी हो सकेगी बर्शते ये घरवालों की मंजूरी से हो। अभी

 तक गैर बिरादरी विवाह करने वाले लड़के-लड़कियां घर से भाग कर दूसरे राज्यों में जाकर शादी किया करते थे

लेकिन सगोत्र विवाह को 'ना'

साथ ही खाप पंचायत ने सगोत्र विवाह को अभी तक निषेध रखा है। इसके अलावा अपने ही गांव या गांव से लगे गांव में अभी भी कोई लड़का या लड़की शादी नहीं कर सकेगा। साथ ही 42 गांवों के बीच परिवार के बीच विवाह पर भी खाप ने सकारात्मक रुख दिखाया है।

खत्म होगी ऑनर किलिंग 
‌गैर बिरादरी विवाह पर खाप की पाबंदी के चलते हरियाणा और आस पास पास के राज्यों में ऑनर किलिंग के नाम पर जमकर हुए खून खराबे के बाद सतरौल खाप का ये फैसला काबिलेतारीफ है। पिछले एक दशक से खाप पंचायत और परंपरा के नाम पर गैर बिरादरी विवाह करने वाले सैंकड़ों जोड़े ऑनर किलिंग की बलि दे दिए गए हैं।

पंचायत का बड़ा फैसला

पंचायत का बड़ा फैसला

हिसार की सतरोल खाप 42 गावों और 36 बिरादरियों का प्रतिनिधित्व करती है। मालूम हो हिसार में 60 फीसदी आबादी जाट समुदाय की है और इस समुदाय में सतरोल खाप के फैसले माने जाते हैं।

खाप के अध्यक्ष इंदर सिंह सूबेदार ने कहा कि परंपरा में ये बदलाव इसलिए किए गए हैं क्योंकि हम इस परंपरा को लंबे समय तक जीवित रखना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि समाज में ये फैसला बहुत क्रांतिकारी होगा और उन्हें उम्मीद है कि इसका सकारात्मक असर होगा। sabhar :
http://www.amarujala.com/

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45 की उम्र में भी यूं जवां रहती है ये हसीना

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I eat well and exercise daily: Kelly Bensimon

मॉडल और टीवी एक्ट्रेस केली बेन्सीमोन ने हाल ही में अपने जवां रहने का राज बताया। जानिए, कैसे अपने आपको फिट रखती है केली। फोटोः डेली मेल

I eat well and exercise daily: Kelly Bensimon


45 वर्षीय केली ने बताया ‌कि हेल्दी फूड खाती हैं और रोजाना एक्सरसाइज करती हैं।



I eat well and exercise daily: Kelly Bensimon



हाल ही में केली फ्लोरिडा बीच पर बिकनी फिगर दिखाती हुई नजर आई


I eat well and exercise daily: Kelly Bensimon


दो बच्‍चों की मां केली कई किताबें लिख चुकी है। केली की मानें तो उनकी फिटनेस का कोई सीक्रेट नहीं हैआपको बता दें केली ने अपनी फिटनेस का राज ट्विटर के जरिए बताया।


दो बच्‍चों की मां केली कई किताबें लिI eat well and exercise daily: Kelly Bensimon


दरअसल, केली के एक फॉलोअर ने उनसे उनकी फिटनेस का राज ट्विटर पर पूछा था


sabhar :http://www.amarujala.com/


ख चुकी है। केली की मानें तो उनकी फिटनेस का कोई सीक्रेट नहीं है
हाल ही में केली फ्लोरिडा बीच पर बिकनी फिगर दिखाती हुई नजर आई

मॉडल और टीवी एक्ट्रेस केली बेन्सीमोन ने हाल ही में अपने जवां रहने का राज बताया। जानिए, कैसे अपने आपको फिट रखती है केली। फोटोः डेली मेल
मॉडल और टीवी एक्ट्रेस केली बेन्सीमोन ने हाल ही में अपने जवां रहने का राज बताया। जानिए, कैसे अपने आपको फिट रखती है केली। फोटोः डेली मेल










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मरने से कुछ समय पहले और बाद का यह वैज्ञानिक रहस्य चौंका देगा

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ऐसे लोगों की मृत्यु कम कष्टकारी हुई


मृत्यु कैसे होगी कष्ट या आराम से


मरने के बाद फिर से जन्म लेना पड़ता है, इस बात में सभी धर्म भले ही यकीन नहीं करते हैं पर जीवन का अस्तित्व मरने के बाद भी रहता है, इस मान्यता को लेकर कोई विवाद नहीं है।

इस पर भी पदार्थवादियों की अलग राय हो सकती है पर किसकी मृत्यु कैसे होगी या कैसे कष्ट या आराम के साथ कोई मरेगा इस बारे में विज्ञान भी गहराई से छानबीन कर रहा है।

ऐसे लोगों की मृत्यु कम कष्टकारी हुई

अर्जेंटीना की यूनिवर्सिटी आफ ब्यूनस आयरस के शोध छात्रों ने मृत्यु के करीब पहुंचे सत्तर व्यक्तियों के अनुभवों, तकलीफों और पिछले जीवन का अध्ययन किया।

पाया कि अंतकाल में उन्हें वही बातें याद आ रही थी, जिन्हें वे कार्यकारी जीवन के दौरान जेहन में बसाए हुए थे। न केवल बसाए हुए थे बल्कि वैसे काम ही कर रहे थे। कुछ व्यक्ति ऐसे भी थे जो पिछले जीवन में जैसे भी रहे हों, आयु के संध्याकाल में अच्छे काम कर जिंदगी को संवराना चाहते थे।

उन्होंने अपने जीवन की दिशाधारा तो बदल ली पर मृत्यु के समय पिछले कर्मों की यादों का दंश उन्हें परेशान करता रहा था। यद्यपि उन्हें बाद के जीवन में कर लिए सुधारों का फायदा भी मिला। उनकी अंतिम विदाई कम कष्टकारी रही।

वह मृत्यु के समय बहुत ही कष्ट उठाते हैं

अंतर्राष्ट्रीय श्रीकृष्णभावनामृत संघ की अर्जेटीना शाखा के स्वामी गोकुलनंदन दासानुदास (पूर्व नाम प्रो. जेन पावेल) के अनुसार इस अध्ययन से निकल कर आया कि सच्चाई और ईमानदारी का जीवन जीते रहे लोगों का आखिरी समय भी अत्यंत सुखद और विश्राम से भरा होता है।

जो लोग द्वेष और स्वार्थ का जीवन जीते हैं, लोभ की भावना फैलाते हैं, वे मृत्यु के समय बहुत ही कष्ट उठाते हैं।

इस तरह मृत्यु के बाद की यात्रा शुरु होती है

अध्ययन के मुताबिक झूठ बोलने, झूठी गवाही देने, भरोसा तोडऩे और शास्त्र व वेदों की बुराई करने वालों की दुर्गति सबसे ज्यादा होती है। उनकी बेहोशी में मृत्यु हो जाती है।

स्वामीजी के अनुसार शोझ अध्ययन में लगे विद्वानों और विद्यार्थियों ने भगवद्गीता का कभी नाम भी नहीं सुना था पर उन्होंने पाया कि उस ग्रंथे में लिखे उपदेश मृत्यु के समय होने वाले अनुभवों से पूरी तरह मेल खाते हैं।

लिखा है कि अंतकाल में� वही भाव चित्त में घनीभूत होता है जो पूरे जीवन मन में छाया हुआ था। और उसी भाव के अनुसार आगे की यात्रा शुरु होती है।

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मंगल के रहस्यों का पता लगाने की आशा

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मंगल के रहस्यों का पता लगाने की आशा

पृथ्वी वासी बड़े ध्यान से उन फोटोओं का अध्ययन कर रहे हैं जो मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक उतरे अमरीकी

पृथ्वी वासी बड़े ध्यान से उन फोटोओं का अध्ययन कर रहे हैं जो मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक उतरे अमरीकी यान क्युरियोसिटी रोवर द्वारा खींचे गये। इन फोटोओं में सचमुच अपूर्व दिलचस्पी पैदा हुई। इंटरनेट में उनकी व्यापक चर्चा हो रही है। मंगल ग्रह के दृश्यों में पृथ्वी वासियों की इतनी बड़ी दिलचस्पी स्वाभाविक ही है। रूसी विशेषज्ञों का मानना है कि अमरीकी रोवर द्वारा खींचे गये फोटो मंगल ग्रह के कुछ रहस्यों का पता लगाने में सहायक साबित हो सकते हैं।
दरअसल मंगल के एक रहस्य का पता चल चुका है। मंगल से भेजे गये पहले फोटो में विशाल आकार का एक दाग दिखता था। इंटरनेट यूज़रों ने शीघ्र ही अनुमान लगाने शुरू किये कि यह क्या हो सकता है जैसे कि कैमरा लैंस में चमक या भागते हुए मंगल निवासी। क्युरियोसिटी अभियान के विशेषज्ञों ने समझाया कि इस फोटो में धुल का बादल दिखता है जो रोवर की उतराई के समय उठा था। इस प्रकार मंगल पर जीवन की चर्चा करने का वक्त अभी नहीं आया है। लेकिन किसी भी हालत में इस ग्रह को पृथ्वी वासियों की ज़रूरतों के अनुकूल बनाना संभव होगा। यह रूस की अंतरिक्ष नाविकी संबंधी त्सियोल्कोव्स्की अकादमी के कर्मी यूरी कराश की राय है।
यूरी कराश ने कहा – सौर मंडल के सभी ग्रहों में से मंगल अपनी परिस्थितियों की दृष्टि से पृथ्वी से सबसे ज़्यादा मिलता-जुलता है। और मंगल के अध्ययन से इस सवाल का जवाब देने में सहायता मिल सकती है कि पृथ्वी की सभ्यता का विकास कैसे हुआ। इस के अलावा मंगल एक ऐसा ग्रह है जिस का हम उपयोग कर सकते हैं। उसे पृथ्वी का उपनिवेश बनाया जा सकता है। क्युरियोसिटी रोवर अधुनिकतम यंत्रों सं लैस है जिनका उद्देश्य इस सवाल का जवाब देना है कि क्या मंगल ग्रह पर जीवन की उत्पत्ति संभव है और कभी अतीत में वहाँ जीवन था भी या नहीं।
क्युरियोसिटी को मंगल की सतह पर उतारने के लिये एक नयी तकनोलाजी तैयार की गयी जिस के अनुसार रोवर को राकेट इंजनों वाले यान से वायर रोप के ज़रिये ज़मीन पर उतारा गया था। अंतरिक्ष नाविक सेर्गेई झुकोव के मतानुसार भविष्य में मंगल पर लोगों की उतराई के लिये इसी तकनोलाजी का उपयोग किया जा सकता है।
सेर्गेई झुकोव ने कहा – मुझे विश्वास है कि यह रोवर इस उद्देश्य से भी इस्तेमाल किया जा सकता है। उतराई की उसकी तकनोलाजी मानव की उतराई के लिये उपयोगी हो सकती है। याद रहे कि पहले तीन रोवर यानी पाथफाइंडर, स्पिरिट और आपर्ट्युनिटी हवा से भरे बोरों के अंदर रखकर मंगल की सतह पर उतारे गये थे। बेशक अंतरिक्ष नाविकों को इस प्रकार बोरे में डालकर मंगल पर नहीं उतारा जायेगा। लेकिन वर्तमान तकनोलाजी भविष्य में मानव की उतराई के लिये इस्तेमाल की जा सकती है। फिर भी मेरे विचार से जब तक मानव मंगल की धर्ती पर पाँव रखेगा तब तक मंगल पर अनेक नये रोवर भेजने होंगे।
लेकिन अभी तो मंगल की सिर्फ वर्चुअल यात्रा की जा सकती है। रोवर के औपचारिक इंटरनेट ब्लोग में लगभग 9 लाख लोग जमा हो चुके हैं जिनको ऐसी यात्रा करने की इच्छा है। क्युरियोसिटी रोवेर के ट्विटर में (जिसका पता है https://twitter.com/MarsCuriosity) कुछ ही घंटों के बाद इस अभियान के बारे में नये नये समाचार दिये जाते हैं और मंगल के नये नये फोटो और वीडियो जारी किये जाते हैं। रोवर ने कुछ सेल्फ पोर्ट्रिट भी बनाये। इस उद्देश्य से रोवर के ऊपरी भाग में स्थित वनिगेशन कैमरे का उपयोग किया गया। इस प्रकार रोवर अपने फोटो और वीडियो उपकरणों को आज़मा रहा है जो आनेवाले महीनों में मंगल की उसकी यात्रा के समय इस्तेमाल किये जायेंगे। और हो सकता है कि इंटरनेट यूज़र ही मंगल वासियों और उनके नगरों के पहले फोटो देख सकेंगे।
और sabhar: http://hindi.ruvr.ru

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येरुशलम में प्रकट हुई दिव्य अग्नि

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शनिवार को येरुशलम में हज़ारों भक्तों ने अपनी आंखों यह देखा कि किस प्रकार यहां यीशु समाधि गिरजे में ईसा मसीह के पुनरुत्थान उत्सव – ईस्टर – की पूर्ववेला में हर साल होने वाला दैवी चमत्कार फिर से हुआ: यहां दिव्य अग्नि प्रकट हुई|

इस वर्ष येरुशलम के धर्माध्यक्ष थेओफिल द्वारा गिरजे में की जा रही प्रार्थना के समय वेदी पर दिव्य अग्नि की ज्वाला प्रकट हुई| धर्माध्यक्ष ने यह ज्वाला भक्तों को सौंपी जिन्होंने यीशु की आयु के अनुरूप 33 मोमबत्तियों का गट्ठर इससे जलाया| इनसे फिर भक्त अपने-अपने लैम्प जलाकर यह दिव्य अग्नि अपने-अपने घर ले गए|
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येरुशलम में प्रकट हुई दिव्य अग्नि

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शनिवार, 19 अप्रैल 2014

अब खाना भी छपा करेगा

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3डी प्रिंटर जब पहली बार मेलों में दिखाई दिए, तो लोग हैरान रह गए. कि किस तरह से घर पर ही लोग खिलौने, मूर्तियां घर ही प्रिंट हो सकेंगी. अब आया है डिजाइनर खाना बनाने वाला प्रिंटर.स्पेन की कंपनी ने एक ऐसी मशीन बनाई है, जिससे खाना भी खिलौने की तरह प्रिंट होगा. चाहे पिज्जा हो, बर्गर हो या फिर बिस्किट. कच्चा माल सूखने के बाद बस आप चाहें तो उसे बेक कर लें या फिर खाने को तरह तरह से डिजाइन दे दें.स्पेन की फूडिनी कंपनी के प्रिंटर को आने वाले दिनों में चीन में बनाया जाएगा. अमेरिका और यूरोप के कई देश इस प्रिंटर की 400 यूनिट पहले ऑर्डर कर चुके हैं.
3डी क्रांति
त्रिआयामी प्रिंटिंग में क्रांति तब आई जब घर में इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्रिंटर को पहली बार पेश किया गया. साथ ही रंग बिरंगी मूर्तियों, बर्तनों की छपाई शुरू हुई.खिलौने, और अपनी इमेज छापने की मासूम कोशिशों के बाद जब अमेरिका में एक व्यक्ति ने 3डी प्रिंटर से बंदूक छाप ली तब दुनिया के कान खड़े हुए. इसके बाद समझ में आया कि इस तकनीकी प्रगति के नुकसान भी हो सकते हैं.इस प्रिंटर से तीन तरीके से 3डी वस्तुएं छप सकेंगी. या तो सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर में 3डी मॉडल बना कर, 3डी कैमरे से या फिर 3डी स्कैनर से स्कैन कर तस्वीरें सीधे प्रिंट करना.महंगे हैं
फिलहाल 3डी प्रिंटर की कीमत 70 हजार रुपये से सवा लाख रुपये की बीच है. लेकिन इससे जुड़े सपोर्ट सिस्टम में एक मुश्किल बनी हुई है. 3डी कैमरे और स्कैनर बहुत महंगे हैं. सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करना हर किसी के बस की बात नहीं
3D-Kugelschreiber von David Paskevic

पेन भी 3डी
पेन का आकार और वजन किसी छोटे हाथ के पंखे जितना है. 3डी सिमो पेन में इस्तेमाल किया जाने वाला पदार्थ तरल स्याही में तब्दील हो जाता है, जैसे ही यह हवा के संपर्क में आता है, सूख जाता है. इससे प्लास्टिक मॉडल तैयार किए जा सकते हैं.


एक से एक डिजाइन
दुनिया भर में तीन 3डी पेन अस्तित्व में हैं. दुनिया का पहला 3डी पेन 3डूडलर है, जिसे बोस्टन में विकसित किया गया है. चीन में एक स्पिनऑफ बनाया गया था और अब 3डी सिमो. sabhar :http://www.dw.de/


René Bohne 3D Drucker Fab Lab in Aachen Porträt
Universität Würzburg CEDIFA 3D-Drucker Vase

3D-Drucker Foodini

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ध्यान से बड़े फायदे

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Symbolbild Meditation


ध्यान करने से उत्तेजना पैदा करने वाले जीन्स की क्रियाशीलता दबाई जा सकती है. एक ताजा रिसर्च में सामने आया है कि इससे तनाव पर काबू पाया जा सकता है. कैंसर से निपटने में भी ध्यान से मदद मिलने की उम्मीद की जा रही है.
 Symbolbild Meditation
स्पेन, फ्रांस और अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में सामने आया है कि ध्यान की मदद से इंसान के शरीर में उन जीन्स को दबाया जा सकता है जो उत्तेजना पैदा करते हैं. ये जीन्स हैं RIPK2 और COX2 हैं. इनके अलावा हिस्टोन डीएक्टिलेज जीन्स भी हैं जिनकी सक्रियता पर ध्यान करने से असर पड़ता है.
इस शोध में पता चलता है कि लोग ध्यान की मदद से अपने शरीर में जेनेटिक गतिविधियों को नियंत्रित कर सकते हैं, जिसमें गुस्से को काबू करना, सोच, आदतें या सेहत को सुधारना भी शामिल है. इस शोध का मोलिक्यूलर बायोलॉजी के क्षेत्र 'एपिजेनेटिक्स' से भी सीधा संबंध है, जिसके अनुसार आसपास के माहौल का जीन के मॉलिक्यूलर स्तर पर स्थायी प्रभाव पड़ सकता है.
1990 में जब 'एपिजेनेटिक्स' मोलिक्यूलर बायोलॉजी के एक क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आई तो इसने उन मान्यताओं को हिला दिया जिनके अनुसार मनुष्य के जीन्स उनका भाग्य निर्धारित करते हैं. कोशिका नाभिक में मौजूद अणुओं की जांच कर एपिजेनेटिक्स में यह समझा जा सका कि डीएनए सीक्वेंस में परिवर्तन किए बगैर भी जीन्स को दबाया या उत्तेजित किया जा सकता है.
 ध्यान की मदद से जेनेटिक गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है
ध्यान की मदद से जेनेटिक गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है



ध्यान से उत्तेजना में कमी
जर्मनी के माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर इम्यूनोबायोलॉजी एण्ड एपिजेनेटिक्स में रिसर्च कर रहे समूह के प्रमुख रित्विक सावरकर ने समझाया कि क्रोमैटिन के स्तर पर होने वाले परिवर्तन कैसे स्थायी और वंशानुगत बन जाते हैं. फिर वे मां से बच्चे में या एक ही शरीर के अंदर एक सेल से दूसरे सेल में भी स्थानांतरित हो सकते हैं.
फरवरी में इस शोध पर आधारित रिपोर्ट 'साइकोन्यूरोएंडोक्राइनोलॉजी' पत्रिका में छपने जा रही है. परीक्षण करने पर आठ घंटे ध्यान करने के बाद उत्तेजना पैदा करने वाले जीन्स की क्रियाशीलता के स्तर में कमी पाई गई. इसके अलावा जीन रेग्यूलेटरी मशीनरी में और भी कई परिवर्तन देखे गए. इससे तनावपूर्ण स्थिति से जल्दी उबरने में मदद मिलती है.
सावरकर को इस रिसर्च से काफी उम्मीदें हैं. उन्होंने कहा, "इंसान के बर्ताव और उसकी कोशिका के अंदर क्या हो रहा है, इन दोनों के बीच पहली बार कोई रिसर्च संबंध स्थापित करती है." उन्होंने आगे कहा कि इस बारे में और रिसर्च की जरूरत है. उन्होंने कहा उनकी रिसर्च अभी सिर्फ तीसरे स्तर पर हो रहे परिवर्तनों पर प्रकाश डालती है जिसमें इंसान किसी चीज को महसूस करता है, सिग्नल भेजता है और उसका फिर एक परिणाम होता है जिससे कि परिवर्तन होते हैं. सावरकर ने बताया कि ध्यान से होने वाले परिवर्तन एपिजेनेटिक यानि स्थायी हैं या नहीं इसका पता उनकी रिसर्च में नहीं लग पाया है, जबकि इस बात की संभावना है. उन्होंने कहा, "यह एक अच्छा प्रयोग होगा अगर लोगों के एक समूह को लंबे समय तक ध्यान कराया जाए और फिर उन्हें तनाव दिया जाए और फिर उनकी कंट्रोल ग्रुप (सामान्य लोगों से) तुलना की जाए."
कैंसर पर प्रभाव
हाइडलबर्ग में एसोसिएशन फॉर बायोलॉजिकल रेसिस्टेंस टू कैंसर की निदेशक यॉर्गी इर्मी ने डॉयचे वेले को बताया, "कैंसर की बीमारी कई बार उत्तेजना से जुड़ी होती है." उन्होंने बताया कि वह अपने मरीजों को ध्यान की सलाह देती हैं. उन्होंने कहा, "ठीक होने की प्रक्रिया में मरीज का रवैया बहुत महत्व रखता है."
सावरकर ने कहा कि इस दिशा में अभी आगे और भी रिसर्च की जरूरत है. उन्हें उम्मीद है कि इस तरह के शोध की मदद से हम बीमारियों से निपटने के बेहतर तरीके ढूंढ सकते हैं.
एपिजेनेटिक्स के मशहूर वैज्ञानिक ब्रूस लिप्टन भी मानते हैं कि हम अपने आपको विश्वास और अपने रवैये से ठीक कर सकते हैं. उन्होंने 2008 में हुई उस रिसर्च की याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि पोषण और जीवनशैली में परिवर्तन से कैंसर के लिए जिम्मेदार जीन्स को दबाया जा सकता है.
लिप्टन कहते हैं, "दिमाग कुछ देखता है और उसे रसायनशास्त्र में परिवर्तित कर देता है, रसायन शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचते हैं और एपिजेनेटिक्स के लिए जिम्मेदार होते हैं." उन्होंने अंत में कहा कि लोगों को इस बारे में और जानकारी हासिल करने की जरूरत है. सेहत का ख्याल रखना सीधे तौर पर जीवनशैली से जुड़ा है, और जीवनशैली बदलना हमारे हाथ में है.
रिपोर्ट: एस डीन/एसएफ
संपादन: महेश झा
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भारत को वैज्ञानिक शक्ति बनने से रोक रहा है भ्रष्टाचार: नोबेल विजेता

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वंदना
 
हाल ही में लंदन में हुए एशियाई पुरस्कार कार्यक्रम में जाना हुआ. समारोह देर तक चला, रात के करीब 11 बज चुके थे और मैंने निकलने के लिए अपना सामान बाँध लिया था. लेकिन तभी मेरी नज़र कोने में गेरुए रंग का कुर्ता पहने चश्मे वाले एक व्यक्ति पर गई. उनके चेहरे पर धीमी सी मुस्कान थी. भीड़ में होते हुए भी वे अकेले से ही थे.
अचानक अख़बारों में देखी उनकी तस्वीर दिमाग़ में कौंधी और सामान वहीं गिरा मैं जा पहुँची उनसे बात करने. मेरे सामने नोबेल पुरस्कार विजेता वेंटकरमन रामाकृष्णन खड़े थे.

आज जहाँ भारत को उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति माना जाता है वहीं विज्ञान में भारत का नाम ज़्यादा नहीं लिया जाता.
करीब पाँच साले पहले भारतीय मूल के अमरीकी नागरिक वेंटकरमन रामाकृष्णन को संयुक्त रूप से 'मॉलिक्यूलर बायोलॉजी' में काम के लिए नोबेल पुरस्कार पुरस्कार मिला था. प्यार से लोग उन्हें वेंकी बुलाते हैं. उन्होंने बीबीसी से विशेष बात की.
विज्ञान और शोध के क्षेत्र में आप तभी तरक्की कर सकते हैं जब आर्थिक आधार बहुत मज़बूत हो. आप सोचिए कि अमरीका भी आर्थिक महाशक्ति बनने के बाद ही वैज्ञानिक शक्ति बना. अगर पैसा न हो, आधारभूत ढाँचा न हो तो वैज्ञानिक शोध पीछे छूट जाता है. साथ ही इसके लिए वैज्ञानिक उद्यमशीलता की परपंरा की ज़रूरत होती है जो ब्रिटेन जैसे देशों में हैं. इस सबमें वक्त लगता है. भारत को भी लगेगा. हाँ मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि भारत में पिछले 20 सालों में पहले के मुकाबले वैज्ञानिक तरक्की हुई है. मैं काफ़ी आशावान हूँ.
लेकिन वजह क्या है भारत के पीछे छूटने की.
भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार. लोगों को भर्ती करने तक में भ्रष्टाचार है. चंद उच्च वैज्ञानिक संस्थानों में ऐसा नहीं होता है लेकिन नीचे की ओर जाएँ तो ये समस्या दिखती है. इसे सुलझाना होगा. दूसरी बड़ी समस्या है आधारभूत ढाँचा. अगर रहने को घर नहीं है, बच्चों के लिए अच्छे स्कूल नहीं है तो अच्छे हुनरमंद लोगों को देश में रख पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे कई भारतीय होंगे जो विदेशों से वापस भारत आना चाहेंगे और विज्ञान के क्षेत्र में काम करना चाहेंगे. लेकिन अगर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतनी दिक्कते होंगी तो वे शायद भारत नहीं आएँगे.
चीन कहाँ खड़ा दिखता है भारत के मुकाबले ?
चीन भारत से मीलों आगे निकल चुका है. मैं एक ही बार चीन गया हूँ लेकिन वहाँ की सुविधाओं, प्लानिंग को देखकर मैं हैरान रहा गया. लेकिन भारत के पक्ष में एक बात ज़रूर जाती है और वो है यहाँ की ओपन सोसाइटी. यहाँ सबको अपनी बात रखने का हक़ है, बहस करने का हक़ है और लोगों को इसके नकारात्मक नतीजे नहीं भुगतने पड़ते. ऐसे खुले माहौल में आप सृजनात्मक होकर काम कर सकते हैं. अगर भारत अपनी कुछ समस्याओं को सुलझा ले तो बहुत आगे तक जा सकता है.
नोबेल पुरस्कार के बाद आपकी ज़िंदगी कैसे बदली है ?
आप चाहें तो शोहरत और अवॉर्ड आपकी ज़िंदगी बदल सकते हैं. लेकिन मैं तो वैसा ही हूँ. मैं आज भी अपनी प्रयोगशाला चलाता हूँ. मेरे पास आज भी गाड़ी नहीं है. हम पहले की तरह आज भी अच्छे शोधपत्र छापते रहते हैं. ज़िंदगी पहले जैसी ही है.
(रामाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के चिदंबरम में हुआ था. उन्होंने बड़ौदा विश्वविद्यालय और फ़िर ओहायो, कैलिफ़ोर्निया और सैन डियागो के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की. उन्हें 2010 में पद्म विभूषण की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था)

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गजब, शादी शुदा औरत का आशिक बन बैठा काला नाग

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पुराने प्यार को निभाना चाहते हैं

पुराने प्यार को निभाना चाहते हैं

इंसान का सांपों से पुराना नाता रहा है। इंसानों ने इन्हें विष के डर से भगवान बना दिया और पूजा करने लगे।

लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा है सांपों को इंसानों में अपने पूर्व जन्म के साथी नजर आ रहे हैं और इस जन्म में भी पुराने प्यार को निभाना चाहते हैं।

बेशर्म नाग, परवाह ही नहीं महिला शादी शुदा है


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इसलिए सांप महिला को बिना कोई नुकसान पहुंचाए हर समय साथ-साथ रहता है। लेकिन इसे गुस्सा तब आता है जब महिला अपने कमरे में सोने जाती है। इस समय यह महिला के पति और बच्चों को भी उसके पास आने नहीं देता है। इस समस्या का हल यह निकाला गया है कि, शयन कक्ष में एक स्थान बना दिया गया है जहां यह सांप आराम करता है। sabhar :http://www.amarujala.com/

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