Sakshatkar.com : Sakshatkartv.com

.

Item Post Navigation Display

Home Recent Posts Display

Related Posts Display

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

एलियंस के होने-न होने का पता

1



photo : googale

चंद्रवासी हमारे नाम रेडियो मैसेज भेज रहे हैं- 'हम चांद से बोल रहे हैं। क्या आपको हमारी आवाज सुनाई दे रही है?' हम इंसान इस मैसेज को सुन नहीं पाते, क्योंकि हमें नहीं मालूम कि वे किस फ्रीक्वेंसी पर हैं। यह आप को किसी साइंस फिक्शन का हिस्सा लगता है, तो दिल थाम लीजिए। पिछले दिनों लंदन के एक सम्मेलन में चंद्रवासियों के बारे में चर्चा हुई और कहा गया कि चांद में ऐसी चीजें मौजूद हैं, जो किसी एलियन या एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल (ईटी) सभ्यता की निशानी हैं। कुछ साइंटिस्ट मानते हैं कि चांद का यह हिस्सा, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता, एलियंस का बेस हो सकता है। अब तक सभी चंद्रयान उस हिस्से में उतरे हैं, जो पृथ्वी से दिखाई देता है। बाकी हिस्सा, जो अंधेरे में खोया रहता है, रहस्यमय बना हुआ है। 

चलिए, चांद का किस्सा छोडि़ए। वहां एलियंस की बात करना ज्यादती ही है, लेकिन वहां नहीं तो और कहीं? इंसान का मन यह मानने को कभी तैयार नहीं होगा कि इस अनंत युनिवर्स में वह अकेला है, कि अरबों-खरबों ग्रहों में कहीं जीवन नाम का चमत्कार दोहराया नहीं जा सका। इसलिए एलियंस की खोज हमेशा हमारी साइंस पर हावी रही है। परग्रही प्राणियों की खोज, यानी सेटी प्रोजेक्ट के जरिए अनजान रेडियो संकेतों को पकड़ने के लिए अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। विशाल रेडियो टेलिस्कोप स्पेस की गहराइयों में कान लगाए हुए हैं। उस क्षण का बेसब्री से इंतजार है, जब किसी एलियन का संकेत देती एक अजनबी क्लिक सुनाई देगी और विस्मय की एक कौंध के साथ हमारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी। वह क्षण इस ग्रह के इतिहास को दो हिस्सों में बांट देगा। 
वह क्षण कब आएगा, कोई नहीं जानता। आज अभी या फिर सदियों बाद, लेकिन उसके लिए मुहिम कई मोर्चों पर जारी है। इसी फरवरी में साइंटिस्टों ने हमारी आकाशगंगा में एक तारे की खोज की है, जिसका एक पृथ्वी जैसा ग्रह है, यानी वहां बुद्धिमान परग्रही जीवन की संभावना बनती है। यह तारा २६ प्रकाश वर्ष, यानी १५३ खरब मील दूर है। वॉशिंगटन के कानेर्गी इंस्टीट्यूट की एस्ट्रोनॉमिस्ट मार्ग्रेट टम्बुल इस खोज से इतनी उत्साहित हैं कि परग्रही बुद्धिमान प्राणियों से संपर्क साधने का सिलसिला जारी रखना चाहती हैं। १७,१२९ तारों की लिस्ट में से उन्होंने पांच ऐसे तारे चुने हैं, जहां जीवन की संभावनाएं सबसे अधिक हैं और जहां बुद्धिमान प्राणियों के विकास की सभी भौतिक परिस्थितियां मौजूद हैं। जीवन पनपने के लिए पहली शर्त यह है कि तारा तीन अरब वर्ष पुराना होना चाहिए। इतने ही समय में पृथ्वी पर जीवन का विकास हुआ। अगर मार्ग्रेट की सलाह पर चलें तो बुद्धिमान जीवन का विकास एक नहीं, कई सौर मंडलों पर हुआ होगा। अब यह भी क्या साइंस फिक्शन माना जाएगा कि इन सौर मंडलों के प्राणी चंद्रमा पर किसी तरह आए हों और वहां अपनी निशानियां छोड़ गए हों, जिनकी चर्चा हमने शुरू में की थी। 

परग्रही जीवन की खोज इस साल और भी तेज हो गई दिखती है। अमेरिका में मेसाच्युसेट्स वेधशाला ने एक ऐसा ताकतवर टेलिस्कोप बनाया है, जो एक बड़े इलाके में स्पेस से आ रहे बारीक संकेतों को पकड़ सकेगा। यह मौजूदा टेलिस्कोपों की तुलना में एक लाख गुना बड़े स्पेस को कवर कर लेगा। हालांकि रेडियो संकेत पकड़ने की कोशिश १९६० से जारी है, लेकिन इस नए टेलिस्कोप से भारी उम्मीदें हैं। एक साइंटिस्ट का कहना है कि इस टेलिस्कोप का जन्म होना साइंटिफिक फील्ड में ऐसा दुर्लभ क्षण है, जबकि इंसान एक लंबी छलांग लगा सकता है। जाहिर है, अगर चंद्रवासी हैं और संदेश भेज रहे हैं, तो वे इस बार पकड़ में आ जाएंगे। 

यह सिर्फ संयोग नहीं कि हम बार-बार घूमकर चांद पर आ जाते हैं। चंद्रमा और धरती का साथ बहुत गहरा है, बल्कि चांद धरती का ही टुकड़ा है। तो यह कैसे हुआ कि जीवन सिर्फ धरती पर पैदा हुआ? चंद्रमा के बिना पृथ्वी पर जीवन हो ही नहीं सकता था। चार अरब साल पहले चांद हमसे अब की तुलना में ज्यादा करीब था। इसके कारण कुछ ही घंटों के अंतर से ज्वार आते थे। इन ज्वार से तटों पर लवणता (सेलिनिटी) में नाटकीय उतार-चढ़ाव होता था, जिससे डीनएन जैसे शुरुआती जैव अणुओं का विकास हुआ होगा। सोचिए, क्या चांद को इसी तरह पृथ्वी जीवन नहीं दे सकती थी? 

लगभग ढाई साल पहले अमेरिकी प्रेजिडेंट बुश ने कहा था- 'आदमी की अंतरिक्ष यात्राओं का कहां अंत होगा, हम नहीं कह सकते, लेकिन हम एक बात जानते हैं कि आदमी ब्रह्मांड में जा रहा है।' तब उन्होंने २०१५ तक चंद्रमा पर लौटने का पक्का इरादा जताया था

अपोलो के बाद के ३५ वर्ष में चंद्रमा की काफी पड़ताल हुई है, लेकिन इसके अंधेरे हिस्से पर रोशनी पड़नी अभी बाकी है। यह काम अब होगा और इससे हमें चांद पर एलियंस के होने-न होने का पता चल जाएगा। यकीनन चंद्रमा पर हालात इतने खराब हैं कि वहां आदमी का रहना मुश्किल है। वहां सांस लेने के लिए हवा नहीं है, दिन में तापमान १०० डिग्री और रात में माइनस १५० डिग्री सेल्सियस रहता है। लेकिन ये बातें वहां जीवन होने की संभावना को खत्म नहीं करतीं। हमारे लिए कहना मुश्किल है कि परग्रही जीवन कैसा होगा और यह कतई जरूरी नहीं कि वह हूबहू हमारी तरह हो। दरअसल चांद और मंगल जैसी जगहों पर गहरी पड़ताल के लिए वहां इंसानों का लंबे समय तक रहना जरूरी है, जो अभी मुमकिन नहीं हो पा रहा है। लेकिन अब खबर है कि साइंटिस्टों ने चंद्रमा के वातावरण के मुताबिक ट्रांसहेब नाम के मल्टीस्टोरी आवास बनाने शुरू कर दिए हैं, जो २०१५ तक तैयार हो जाएंगे। 

एक सवाल, जो हमें अंतिम समय तक स्थगित रखना होगा, वह यह है कि क्या एलियंस हमसे दोस्ती करेंगे? फिल्मों की बात अलग है, लेकिन इस सवाल का जवाब हमें तभी मिलेगा, जब हमारी उनसे सचमुच मुलाकात होगी। यह खयाल हमें हैरानी, उत्साह और खौफ जैसे अहसासों से भर देता है, लेकिन यकीन मानिए एलियंस का हाल भी हमारे जैसा ही होगा। 

sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/




photo : googale
अपोलो 11 मिशन हो या चांद पर पहुंचने वाले तीन अंतरिक्ष यात्रियों की तिकड़ी। हर बार उन्हें एलियंस या यूएफओ के दर्शन हुए। लेकिन हर बार ये बात छुपा ली गई। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर एलियंस की बात क्यों छिपाई गई। एलियंस पर खास रिपोर्ट
वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि अगले दो दशकों में दूसरे ग्रहों के निवासी यानी एलियंस से इंसानों का संपर्क हो सकता है। ये एलियंस इंसानों की तरह या उनसे ज्यादा बुद्धिमान हो सकते हैं। हमारे सौरमंडल से बाहर हाल में पृथ्वी जैसे ग्रहों का पता चलने के बाद यह अवधारणा और मजबूत होती है।बीबीसी की एक डॉक्युमेंटरी में जानेमाने अमेरिकी खगोलशास्त्री डॉक्टर फ्रैंक ड्रेक ने कहा- सभी कोशिशों के बाद हमें इस दिशा में कामयाबी मिलने की पूरी उम्मीद है। 76 साल के फ्रैंक ने 1961 में सर्च फॉर एक्स्ट्राटिरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट (एसईटीआई) की स्थापना की थी। उन्होंने कहा कि हमें सचमुच भरोसा है कि अगले करीब 20 साल में पृथ्वी से बाहर जीवन की मौजूदगी के बारे में बहुत बड़ी जानकारी हासिल होने जा रही है। हमें अहसास है कि आकाशगंगा में कहीं और जीवन मौजूद है, जो शायद कहीं ज्यादा इंटेलिजेंट भी है।
करीब 50 साल पहले डॉक्टर ड्रेक ने आकाशगंगा में मौजूद एलियंस सभ्यताओं के बारे में अनुमान लगाने की शुरुआत की थी। इसके लिए सात फैक्टर्स की जांच की। मिल्की वे में तारों के जन्म की दर, उनके ग्रहों की संख्या और वहां जीवन की मौजूदगी के बारे में अनुमान इनमें शामिल हैं।
साथ ही वह इस बात की भी पड़ताल करते रहे कि अगर दूसरे ग्रह पर जीवन मौजूद है तो वह कितना इंटेलिजेंट हो सकता है। डॉक्टर ड्रेक ने कहा कि आकाशगंगा में औसतन तकनीकी रूप से करीब 10,000 अडवांस फॉर्म में जीवन मौजूद होने का अनुमान है। पिछले अप्रैल तक इस थ्योरी को कई एक्सपर्ट्स खारिज करते रहे।
लेकिन जब स्विस टीम ने सौरमंडल से बाहर दो ग्रहों की खोज की तब इस थ्योरी को बल मिला। डॉक्टर ड्रेक ने कहा कि इससे जीवन वाले दूसरे ग्रहों की मौजूदगी की संभावना मजबूत होती है। उन्होंने कहा कि करीब 100 अरब दूसरी आकाशगंगाएं और 500 ग्रह हो सकते हैं। अगर हम यह मान कर चलें कि सिर्फ पृथ्वी पर ही जीवन है, तो यह नजरिया ठीक नहीं होगा।
अगले साल नासा के केपलर टेलीस्कोप लॉन्च के बाद दूसरे ग्रहों पर जीवन की मौजूदगी की तलाश में अहम मोड़ आएगा। अपने चार साल के मिशन में वह करीब 1 लाख तारों की जांच करेगा।
अगर आपका सामना एलियंस से हो, तो आप उनसे बात कैसे करेंगे? है ना मौजूं सवाल। अमेरिकी राज्य वायोमिंग के लैरमी शहर में मौजूद वायोमिंग यूनिवर्सिटी में कुछ इसी जवाब की तैयारी चल रही है।
वायोमिंग यूनिवर्सिटी के नैचरल साइंस ऐंड ह्यूमैनिटीज डिपार्टमेंट के प्रोफेसर जेफ्री लॉकवुड ने क्रिएटिव राइटिंग की क्लास में अपने स्टूडेंट्स के सामने यही सवाल रखा, जो हम सभी के लिए भी प्रासंगिक है। क्योंकि, दुनियाभर के खगोलविद अपनी अत्याधुनिक तकनीकों और टेलिस्कोपों के जरिए परग्रही जीवन की तलाश में जुटे हैं।
देर-सबेर अगर एलियंस हमें मिल गए तो हम उनसे क्या बात करेंगे और कैसे? अब बात करते हैं लॉकवुड की क्लास की। आखिर वह इस सवाल का जवाब कैसे तलाश रहे हैं। तो चलिए हम भी उनके शिष्यों की पहली कॉस्मिक डेट पर चलते हैं। उनके 11 स्टूडेंट इसी बात पर डिस्कशन कर रहे हैं कि दूसरे ग्रहों की सभ्यताओं को अपने और अपनी मानवता के बारे में कैसे समझाया जाए। कुछ ने कहा कि उन्हें इलस्ट्रेशन के जरिए परहित के कामों और रोमांटिक लव का पाठ पढ़ाना चाहिए। डर यह भी है कि कहीं वह हमें युद्धों की भाषा तो नहीं समझाने लगेंगे?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। लॉकवुड की स्टूडेंट क्रिश्चियाना कहती हैं कि हम हमेशा अपने टारगेट ऑडियंस को तय करते हैं, लेकिन हम अभी उस भाषा की कल्पना नहीं कर सकते, जिससे कि उन्हें समझाया जा सके।
सच कहें तो हम अभी इस बारे में कुछ नहीं सोच सकते। खुद लॉकवुड भी इस परेशानी को समझते हैं। इससे पहले की एक क्लास में उन्होंने 250 शब्दों में इंसान की उस स्थिति की कल्पना करने को कहा जब उसका सामना एलियंस से होता है। इसके बाद उन्होंने इसी स्थिति का बखान 50 शब्दों में फिर 10 शब्दों में करने को कहा।
कुछ छात्रों के जवाब काफी काव्यात्मक रहे। इन्गोग्लिया लिखती हैं - हम किशोर प्रजाति के हैं और अपनी पहचान तलाश रहे हैं। एक ने लिखा - दो बांह, दो टांग, सिर और सुडौल धड़। इसके बाद उन्होंने ज्यादा सुरक्षित रेडियो संदेश भेजने की सोची।
लॉकवुड कहते हैं कि हम इस बारे में काफी सोच सकते हैं कि दूसरे शब्दों में कैसे कम्यूनिकेट किया जाए, पर शायद हम इस बारे में ज्यादा नहीं सोचते कि हमने असल में कहा क्या? खैर, कैलिफॉर्निया के माउंटेन व्यू इंस्टिट्यूट के डगलस वेकॉक्स कहते हैं कि आज नहीं तो कल हमें एलियंस से बात करने की जरूरत पड़ेगी ही और हमें क्या बात करनी है इसके लिए तैयार होना होगा। sabhar :http://khabar.ibnlive.in.com/

यह माना जाता है कि यूएफओ उड़ान का उद्गम मूल प्राचीन भारत और अटलांटिस है | यूएफओ पहेली में कई शोधकर्ता इस बहुत महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज करते हैं | 


क्या हम प्राचीन भारतीय उड़ान वाहनों के बारे में पता है ???

|प्राचीन भारतीय स्रोतों ग्रंथो के माध्यम से हमको इन सभी ( जैसे आकाश मार्ग गमन ) की वास्तविकता पर विश्वास है | संभवत: पुष्पक विमान तो सबने सुना ही होगा | रावण ने सीता जी को ले जाने के लिये कौन-सा मार्ग चुना था , आप सभी जानते ही है | प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय महाकाव्य स्वयं इसका उल्लेख कर रहे हैं , इसमें कोई शक नहीं है कि ये ग्रंथों सबसे ज्यादा प्रामाणिक
महान भारतीय वैज्ञानिकों की सूची में भारतीय सम्राट अशोकभी आते थे | उन्होंने नौ अज्ञात पुरुष की गुप्त सोसायटी शुरू की | अशोक अपने काम गुप्त रखा क्योंकि उनको डर था कि प्राचीन भारतीय स्रोतों द्वारा प्राप्त सूचीबद्ध विज्ञान , युद्ध में बुराई उद्देश्यसे युद्ध में प्रयोग न हो | 

एक प्रतिद्वंद्वी सेना को हराने के बाद उन्होंने अपना धर्म बौद्ध धर्म में परिवर्तित कर लिया | ( धर्म परिवर्तन का कारण : अशोका फिल्म देखी ही होगी | )
'नौ अज्ञात पुरुष' ने कुल नौ पुस्तकों को लिखा है | गुरुत्व का राज ! यह पुस्तक , इतिहासकारों के लिए भी खोज का विषय है | 
गुरुत्वाकर्षण नियंत्रण पुस्तक का प्रमुख केन्द्र है | यह संभाव्यतः अभी भी कहीं आस-पास है | भारत, तिब्बत में या कहीं और (शायद यह भी उत्तरी अमेरिका में कहीं) के पुस्तकालय में रखी है | निश्चित रूप से इस तरह के ज्ञान को गुप्त रखने के लिए मै क्या आप सभी भी अशोक के तर्क को समझ सकते है |

अशोक को विनाशकारी युद्ध के समय ऐसे उन्नत वाहनों और अन्य 'भविष्य हथियार' का उपयोग के बारे में पता था जो कि प्राचीन भारतीय 'राम' साम्राज्य में कई हजार साल पहले नष्ट कर दिये गए थे |

कुछ साल पहले चीन , तिब्बत में , कुछ संस्कृत दस्तावेजों की खोज की और उन्हें चंडीगढ़ के विश्वविद्यालय में अनुवाद किया जा करने के लिए भेजा |विश्वविद्यालय के डॉ. रूथ ने हाल ही में कहा है कि दस्तावेजों के आधार पर तारों के बीच से ग्रहों के निर्माण के लिए निर्देश होते हैं | उनके प्रणोदन की विधि भी दी हुई है | 

'विरोधी गुरुत्वाकर्षण' आदमी की शारीरिक अज्ञात आकाश शक्ति प्रणाली पर आधारित था | एक केन्द्रापसारक बल सभी गुरुत्वाकर्षण प्रतिक्रिया के विरोध में पर्याप्त है | हिंदू योगियों के अनुसार, यह आसान उत्थान और आकाश गमन है जो व्यक्ति उड़ने के लिए सक्षम बनाता है | (यदि अधिक जानना चाहते है या स्वयं पढ़ना चाहते है तो मेरे को बताये | मै इस विषय के लिये पुस्तक बता सकता हूँ | )


उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय पाठ के द्वारा किसी भी ग्रह पर पुरुषों की एक टुकड़ी भेजी सकते थे | दस्तावेज़, जो हजारों साल पुराने माना जाता है उनके अनुसार पांडुलिपियों में भी रहस्य को प्रकट किया गया | स्वाभाविक रूप से, भारतीय वैज्ञानिकों ने ग्रंथों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया , लेकिन वे तब उन के मूल्य के बारे में अधिक सकारात्मक हो गये जब चीन ने घोषणा की , कि वे अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में अध्ययन के लिए डेटा के कुछ भागों रहे है | यह एक सरकार का विरोधी गुरुत्व शोध स्वीकारने का पहला उदाहरण था |

उड़न तश्तरी आकाश में उड़ती किसी अज्ञात उड़ती वस्तु (यूएफओ ) को कहा जाता है। इन अज्ञात उड़ती वस्तुओं का आकार किसी डिस्क या तश्तरी के समान होता है या ऐसा दिखाई देता है, जिस कारण इन्हें उड़न तश्तरीयों का नाम मिला। कई चश्मदीद गवाहों के अनुसार इन अज्ञात उड़ती वस्तुओं के बाहरी आवरण पर तेज़ प्रकाश होता है और ये या तो अकेले घुमते हैं या एक प्रकार से लयबद्ध होकर और इनमें बहुत गतिशीलता होती है। ये उड़न तश्तरीयाँ बहुत छोटे से लेकर बहुत विशाल आकार तक हो सकतीं हैं।"
उड़न तश्तरी शब्द १९४० के दशक में निर्मित किया गया था और ऐसी वस्तुओं को दर्शाने या बताने के लिए प्रयुक्त किया गया था जिनके उस दशक में बहुतायत में देखे जानें के मामले प्रकाश में आए। तब से लिकर अब तक इन अज्ञात वस्तुओं के रंग-रूप में बहुत परिवर्तन आया है लेकिन उड़न तश्तरी शब्द अभी भी प्रयोग में है और ऐसी उड़ती वस्तुओं के लिए प्रयुक्त होता है जो दिखनें में किसी तश्तरी जैसी दिखाई देती हैं और जिन्हें धरती की आवश्यकता नहीं होती।उड़न तश्तरीयों के अस्तित्व को आधिकारिक तौर पर दुनिया भर की अधिकांश सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन कुछ गवाह उड़न तश्तरीयों के देखे जाने का दावा करते हैं। इनके देखे जाने के बहुतेरे रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं। ऐसा माना जाता है की इन उड़ती वस्तुओं का संबंध परग्रही दुनिया से है क्योंकि इनके संचालन की असाधारण और प्रभावशाली क्षमता मनुष्यों द्वारा प्रयुक्त किसी भी उपकरण से बिल्कुल मेल नहीं खाती, चाहे वह सैन्य उपकरण हों या नागरिक।यू॰एफ॰ओ उड़न तश्तरीयों को अन्य यू॰एफ॰ओ समझ लेना एक आम बात है। जैसे इरिडियम नक्षत्र की निचली घुमावदार कक्षाओं में घूमते कृत्रिम उपग्रह और पृथ्वी के चारों ओर तेज़ गती से चक्कर लगाते जीपीएस के उच्च घुमावदार परिसंचारी, जो अपने पैनलों द्वारा सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करते हैं जो विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में प्रयोग किया जाता है, लेकिन इस उत्सुकता के पीछे एक छोटा चमकदार बिन्दु है जो शाम से लेकर लगभग रात ८ से ९ बजे तक किसी के द्वारा भी देखा जा सकता है।१ जुलाई, १९३१ को न्यू जर्सी, अमेरिका में एक अभिकथित उड़न तश्तरी का खींचा गया छायाचित्र।
मानव इतिहास के प्राचीन काल से ही उड़न तश्तरीयों के देखे जाने के प्रतिवेदन हैं, लेकिन ये पिछले ५०-६० वर्षों में अधिक प्रकाश में आई हैं। इनके अध्ययन को यूफ़ोलॉजी कहा जाता है। ये वे लोग होते हैं जो इस प्रकार के घटनावृत की खोज करते हैं। अन्य वस्तुएं जिन्हें उड़न तश्तरी समझ लिया जाता है, वे हैं: आपातकालीन झंडे, मौसमी गुब्बारे, उल्काएं, चमकदार बादल इत्यादि।
अमेरिका के पेंसिलवेनिया राज्य में पीट्सबर्ग से ६४ किमी दूर दक्षिण पूर्व में केक्सबर्ग के जंगलों के उपर एक अज्ञात वस्तु बहुत देर तक मंडराती रही। जिसने इसे देखा वो देखता ही रह गया। लेकिन देखते देखते ये अज्ञात वस्तु आग की लपटों से घिर गई। फिर इसमें एक भयंकर विस्फोट हुआ। आसपास का क्षेत्र हिल उठा। इस घटना के तुरंत बाद इस क्षेत्र को घेर लिया गया। और किसी को भी वहीं जाने नहीं दिया गया। बाद में उड़न तश्तरी की बात सामने आई। हालांकि नासा ने इसे उल्का पिंड का नाम दिया।१९९१ में एलिटालिया विमान सेवा के एक यात्री विमान ने उड़न तश्तरी का दर्शन काफी समिप से किया था।बीबीसी के मुताबिक इटली के राष्ट्रीय अभिलेखागार की ओर से जारी रक्षा मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेजों में इस बात का वर्णन दिया गया है।
रूस में तिकोने आकार की दूसरे ग्रह से आई एक उड़नतश्तरी के कारण रूसवासी हैरत में पड़ गए थे। डेली मेल के अनुसार, यह उड़नतश्तरी कथित तौर पर ९ दिसंबर, २००९ को दिखाई दी। इसी दिन नार्वे के आसमान में नीले रंग का वृत्ताकार प्रकाश देखा गया था लेकिन बाद में बताया गया कि यह रूस से प्रक्षेपित एक असफल रॉकेट था।
रूस के इतिहास में 1989 का साल काफी दिलचस्प रहा है। इस साल यहां कई बार यूएफओ देखे जाने की खबर मिली थी। सबसे पहले 14 अप्रैल के दिन चेरेपोवेस्क के इवान वेसेलोवा ने बहुत बड़ा यूएफओ देखने का दावा किया। फिर 6 जून के दिन कोनेंटसेवो में बहुत से बच्चों ने ऐसा दावा किया। 11 जून के दिन वोलागडा की एक महिला ने 17 मिनट तक उड़न तश्तरी देखने की बात कही। एक और मामले में करीब 500 लोगों ने ऐसा दावा किया। सबसे ज्यादा रोमांचक किस्सा 17 सितंबर 1989 का है। इस दिन वोरोनेज़ के एक पार्क में बच्चे खेल रहे थे। ऐसे में बहुत बड़ा लाल रंग का अंडाकार यान उतरा था। देखते ही देखते वहां बहुत से लोग जमा हो गए। कुछ देर बाद यान में से दो एलियन निकले। एक करीब 12 से 14 फीट लंबा था और उसकी तीन आंखें थीं। दूसरा रोबोट जैसा लग रहा था। बच्चे उसे देखकर चीखने लगे तो उसने एक बच्चे पर लाइट की बीम छोड़ी और बच्च लकवे जैसी स्थिति में पहुंच गया। उस जगह की रिसर्च करने पर वहां मिट्टी में रेडिएशन के निशान मिले। वहां फॉस्फोरस की मात्रा ज्यादा पाई गई। वैज्ञानिकों के अनुसार यूएफओ का वजन कई टन था।
तकरीबन 42 साल पहले अमेरिका के आकाश में एक ऐसी ही घटना घटी थी। अमेरिका का पेंसिलवेनिया राज्य पीट्सबर्ग से 40 मील दूर दक्षिण पूर्व में केक्सबर्ग के जंगलों के उपर एक अनजानी चीज काफी देर तक मंडराती रही। जिसने इसे देखा वो देखता ही रह गया। लेकिन देखते देखते ये अनजानी चीज आग की लपटों से घिर गई
फिर इसमें एक भयंकर विस्फोट हुआ। आसपास का इलाका हिल उठा। इस घटना के तुरंत बाद इस इलाके को घेर लिया गया। और किसी को भी वहीं जाने नहीं दिया गया।
किसी की कुछ समझ में नहीं आया कि वो चीज क्या थी। बाद में उड़न तश्तरी की थ्योरी सामने आई। लेकिन अमेरिकी सरकार इस पर चुप्पी साधे रही। बेशक अमेरिकी एयर फोर्स ने इसे उल्का पिंड करार दिया लेकिन लोगों को अमेरिकी एयर पोर्स की इस बात पर भरोसा नहीं हुआ।
क्योंकि जो लोग इस घटना के चश्मदीद थे उनका कहना था कि विस्फोट के बाद एक ट्रक से किसी बड़ी चीज को ढो कर ले जाया गया। जाहिर ये अल्का पिंड नहीं हो सकता। जरुर कुछ ऐसा था जिसे सरकार और नासा के वैज्ञानिक छिपाना चाहते थे।
जब सरकार इस पर लंबे वक्त तक चुप्पी साधी रही तो न्यूयार्क की एक पत्रकार लेजली केयन ने इस बारे में लोगों को और बताने के लिए चार साल पहले नासा पर मुकदमा कर दिया।
वैसे तो नासा ने कई दलीलें दी। लेकिन जज भी नासा की दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने नासा की उस अपील को ठुकरा दिया जिसमें नासा ने इस केस को खत्म करने की गुहार की थी।
जबकि कहीं से कोई चारा नजर नहीं आया तो अब नासा ने मान लिया है कि वो इस मुद्दे पर और खोजबीन करेगा और सच्चाई को सबके सामने जाहिर कर दिया जाएगा। यानी अब उड़न तश्तरी की सच्चाई से पर्दा उठने ही वाला है।

इसके साथ ही हम आपको ये भी बता दें कि हाल ही में रुस ने प्राब्दा एजेंसी के हवाले से कहा था कि अमेरिका जब चांद पर पहुंचा तो उसका सामना वहां एलिएंस से हुआ था। प्राब्दा के हवाले से ये भी कहा गया था कि अमेरिका एलियंस और उड़नतश्तरी जैसे मामलों पर लगातार पर्दा डालता रहा है।एलिटालिया के एक यात्री विमान ने वर्ष 1991 में उड़न तश्तरी का दीदार काफी करीब से किया था।
बीबीसी के मुताबिक इटली के राष्ट्रीय अभिलेखागार की ओर से जारी रक्षा मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेजों में इस बात का खुलासा किया गया है |
इसके मुताबिक केंट के समीप लिड में एलिटालिया के एक यात्री विमान के चालक ने जब आसमान में काफी करीब मिसाइल के आकार की कोई वस्तु बड़ी तेजी के साथ उड़ते देखी तो वह अपने सहचालक की ओर मुड़कर आश्चर्य से चिल्लाया-वह देखो कैसी अजीब-सी वस्तु आसमान में तैर रही है। उसे ऐसा लगा कि संभवतः यह कोई मिसाइल ही है, जो विमान से टकराने जा रही है।
विमान के पायलट की इस बात की उस समय रक्षा मंत्रालय और नागरिक विमान मंत्रालय की ओर से कोई जाँच नहीं की गई। सबसे हैरानी वाली बात यह है कि विमान और हेलिकॉप्टर के चालकों को उस समय ऐसी किसी वस्तु की तस्वीर उतारने की सख्त मनाही थी।
शायद ऐसा इसलिए था कि सरकार और सेना इस मामले में गोपनीयता बनाए रख सके और उनसे यह न पूछा जाए कि आखिर ऐसे मामलों की जाँच क्यों नहीं की गई।
शेफ्लि हल्लाम विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ और पत्रकारिता के प्रोफेसर डेविड क्लार्क के मुताबिक अभिलेखागार की ओर से जो दस्तावेज जारी किए जा रहे हैं, उनसे उड़न तश्तरियों के बारे में काफी अहम जानकारी मिलेगी।

रूस में तिकोने आकार की दूसरे ग्रह से आई एक उड़नतश्तरी के कारण रूसवासी हैरत में पड़ गए और यू-ट्यूब पर सनसनी के तौर पर छाई हुई है।


एक कार से रात में बनाई गई और एक अन्य वीडियो की हालाँकि फिलहाल पुष्टि नहीं हो पाई है लेकिन इंटरनेट फोरम इस अनूठी घटना से पटे हुए हैं।


रूसी खबरों में इसके उड़नतश्तरी होने से इनकार किया गया है। पुलिस ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है।


डेली मेल के अनुसार, यह उड़नतश्तरी कथित तौर पर नौ दिसंबर को दिखाई दी। इसी दिन नार्वे के आसमान में नीले रंग का वृत्ताकार प्रकाश देखा गया था लेकिन बाद में बताया गया कि यह रूस से प्रक्षेपित एक असफल रॉकेट था।


इस बीच विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रूस की राजधानी में रेड स्क्वायर के उपर उड़ रही इस उड़नतश्तरी का वास्तव में अस्तित्व था, तो इसका आकार एक मील रहा होगा।
बीजिग.चीन में एक हवाई अड्डे पर उड़न तश्तरी (यूएफओ) दिखने के कारण हवाई यातायात करीब एक घंटे तक बाधित रहा। यह बात गुरुवार को मीडिया की खबरों में कही गई। समाचार पत्र 'शंघाई डेली' के अनुसार उड़नतश्तरी चोंगकिंग नगरपालिका क्षेत्र स्थित जियांगबेई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के ऊपर दिखाई दी।


समाचार पत्र के अनुसार 12.30 बजे दोपहर से एक घंटे लिए हवाई यातायात ठप्प रहा।चोंगकिंग के अधिकारियों ने इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।


हवाई अड्डा के अधिकारियों के अनुसार यह 'आकाशीय लालटेन' या 'बड़ा गुब्बारा' हो सकता है। चीन में खुशकिस्मती के लिए पूजा में 'आकाशीय लालटेन' का प्रयोग किया जाता है |
एविएशन जर्नल डेली रिकॉर्ड के एडीटर और पायलट जॉन एच जेनसीन ने 10 जुलाई 1947 को न्यूजर्सी के मरिस्टोन एयरपोर्ट से उड़ान के दौरान 6 चमकदार गोलाकार क्राफ्ट को उड़ते हुए देखा।उन्होंने अपने कैमरे से इसे कैद किया। पिक्चर की गुणवत्ता सही न होने के कारण बाद में ये सवाल उठाए गए कि वे छह क्राफ्ट थे या एक ही क्राफ्ट था, जिसमें छह लाइट जल रहीं थीं। दूसरी बार उन्होंने यूएफओ को 23 जुलाई को देखा, जो उनके जहाज के ठीक ऊपर था। इस दौरान उनके प्लेन का स्पीडोमीटर क् स्पीड दिखा रहा था।इसके अलावा सेवानिवृत्त अमेरिकी सैन्य अधिकारी कर्नल फिलिप जे कार्सो ने दावा किया कि उन्होंने 1947 में रूसवेल मलबे से मृत एलियन को बरामद किया। उन्होंने प्रसिद्ध न्यू मैक्सिको क्रैश की पूरी जानकारी दी। उन्होंने दावा किया कि न्यू मैक्सिको में मिला मलबा किसी गुब्बारे का नहीं है।यह एक अंतरिक्षयान है। कार्सो के दावे के बारे में जानकारी उनकी किताब ‘द डे ऑफ्टर रूसवेल’ से मिलती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस घटना को इसलिए दबा दिया गया क्योंकि वे इसे छुपाना चाहते थे।
इंग्लैंड के वेस्ट ससेक्स के जंगलों को क्लैपहैम वुड कहा जाता है। इस इलाके के साथ कई रहस्यमयी घटनाएं जुड़ी हुई हैं। यहां कई बार विचित्र चीजें देखी गईं, कई लोगों को अजीब-सा अहसास हुआ, कई बार जानवर गायब हो गए या फिर अनोखी बीमारी के शिकार हुए। इसी तरह बहुत से लोगों की मौत का कारण भी समझा नहीं जा सका।1960 के बाद से यहां कई बार यूएफओ देखे जाने की बात भी कही गई। कई लोगों का कहना था कि किसी अनदेखी ताकत ने उन्हें धक्का दिया। जंगलों से गुजरने वाले इन रास्तों पर अचानक ग्रे रंग की धुंध छा जाती थी। कई लोगों ने महसूस किया कि कोई अनदेखी ताकत उनका पीछा कर रही है।इस इलाके में जंगल काफी घना है इसलिए रिसर्च करना भी आसान नहीं था। रिसर्च से पता चला कि यहां एक तरह का रेडिएशन है। ये आश्चर्य की बात थी क्योंकि ये इलाका खड़िया मिट्टी वाला है। ऐसे इलाकों में पोटैशियम 40 का लेवल कम होता है, इसलिए रेडिएशन नहीं होना चाहिए।इस इलाके में चार लोगों की मौत होने के बाद यह विवादों में घिर गया था। पहला मामला जून 1972 का है। एक पुलिस अफसर पीटर गोल्डस्मिथ यहां से गायब हो गया था। उसका शरीर छह महीने बाद जंगलों में मिला था। दूसरे केस में लियॉन फॉस्टर का शरीर अगस्त 1975 में मिला। तीसरे में हैरी नील की जान गई और चौथे केस में क्लैपहैम के पूर्व वाइसर का शव तीन साल बाद मिला। बहुत से जानवर भी यहां से गायब हो गए थे।कुछ जानवर काफी समय बाद वापस मिले तो उनमें अजीब-सी बीमारी देखी गई। 1987 में इस पर द डेमोनिक कनेक्शन किताब लिखी गई थी। इसी साल यहां भयानक तूफान आया था। इस सब के पीछे क्या था, यह आज तक कोई नहीं समझ सका।राज है गहराइंग्लैंड के क्लैपहैम वुड जंगलों में अब तक कई लोगों की जानें गईं, कई जानवर गायब हुए, लोगों को कई रहस्यमयी अनुभव हुए और यूएफओ देखे जाने के दावे भी किए गए। फिर भी वहां क्या होता है, यह आज तक राज ही है।

वैज्ञानिक सोलर सिस्टम में एककोशकीय जीवों के सबूतों की खोज के लिए मंगल और चंद्रमा की सतह का अध्ययन कर रहे हैं। बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा में भी जीवन की खोज के लिए एक अभियान शुरु करने का प्रस्ताव है। यहां सतह के नीचे जल के होने की संभावना है, जहां जीवन हो सकता है। इस बात के भी थोड़े सबूत हैं कि मंगल ग्रह पर सूक्ष्म जीव हैं। हालांकि, फरवरी २क्क्५ में नासा के दो वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि उन्होंने मंगल ग्रह पर जीवन के मजबूत सबूत पाए हैं।

इंग्लैंड के वेस्ट ससेक्स के जंगलों को क्लैपहैम वुड कहा जाता है। इस इलाके के साथ कई रहस्यमयी घटनाएं जुड़ी हुई हैं। यहां कई बार विचित्र चीजें देखी गईं, कई लोगों को अजीब-सा अहसास हुआ, कई बार जानवर गायब हो गए या फिर अनोखी बीमारी के शिकार हुए। इसी तरह बहुत से लोगों की मौत का कारण भी समझा नहीं जा सका।1960 के बाद से यहां कई बार यूएफओ देखे जाने की बात भी कही गई। कई लोगों का कहना था कि किसी अनदेखी ताकत ने उन्हें धक्का दिया। जंगलों से गुजरने वाले इन रास्तों पर अचानक ग्रे रंग की धुंध छा जाती थी। कई लोगों ने महसूस किया कि कोई अनदेखी ताकत उनका पीछा कर रही है।इस इलाके में जंगल काफी घना है इसलिए रिसर्च करना भी आसान नहीं था। रिसर्च से पता चला कि यहां एक तरह का रेडिएशन है। ये आश्चर्य की बात थी क्योंकि ये इलाका खड़िया मिट्टी वाला है। ऐसे इलाकों में पोटैशियम 40 का लेवल कम होता है, इसलिए रेडिएशन नहीं होना चाहिए।इस इलाके में चार लोगों की मौत होने के बाद यह विवादों में घिर गया था। पहला मामला जून 1972 का है। एक पुलिस अफसर पीटर गोल्डस्मिथ यहां से गायब हो गया था। उसका शरीर छह महीने बाद जंगलों में मिला था। दूसरे केस में लियॉन फॉस्टर का शरीर अगस्त 1975 में मिला। तीसरे में हैरी नील की जान गई और चौथे केस में क्लैपहैम के पूर्व वाइसर का शव तीन साल बाद मिला। बहुत से जानवर भी यहां से गायब हो गए थे।कुछ जानवर काफी समय बाद वापस मिले तो उनमें अजीब-सी बीमारी देखी गई। 1987 में इस पर द डेमोनिक कनेक्शन किताब लिखी गई थी। इसी साल यहां भयानक तूफान आया था। इस सब के पीछे क्या था, यह आज तक कोई नहीं समझ सका।राज है गहराइंग्लैंड के क्लैपहैम वुड जंगलों में अब तक कई लोगों की जानें गईं, कई जानवर गायब हुए, लोगों को कई रहस्यमयी अनुभव हुए और यूएफओ देखे जाने के दावे भी किए गए। फिर भी वहां क्या होता है, यह आज तक राज ही है।

कहते हैं मनुष्य की जिज्ञासा का कोई अंत नहीं है | इसे जितना दबाओ यह उतना ही अपने पंख फैलाने लगती है | यही वजह है कि पृथ्वी से बहुत दूर और अलग-थलग रहने वाला मंगल ग्रह हमेशा से ही पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के लिए जिज्ञासा और रोमांच का केंद्र रहा है | एलियन से जुड़ी अफवाहें हों या मंगल पर जीवन होने जैसा मुद्दा, वैज्ञानिकों से लेकर आम जन तक लगभग सभी के लिए लाल रंग का यह ग्रह एक रोमांचक पहेली बन गया है जिसे सुलझाने के लिए पिछले काफी समय से कोशिशें की जा रही हैं | आम जनता के लिए भले ही यह दिलचस्प मसला हो लेकिन वैज्ञानिकों के लिए मंगल ग्रह और इससे जुड़े रहस्य अब चुनौती बन गए हैं, जिसका सामना उन्हें यदा-कदा करना ही होता आखिर मंगल ग्रह की सच्चाई है क्या? क्या वाकई यहां जीवन मुमकिन है? जिस प्रकार पृथ्वी पर इंसान रहते हैं क्या उसी प्रकार मंगल ग्रह पर भी एलियन वास करते हैं, जो समय-समय पर धरती का चक्कर लगाते रहते हैं? ऐसे ही कई सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढ़ना मानव के लिए चुनौती बन गया है | यूं तो थोड़े अंतराल के बीच देशी और अंतरराष्ट्रीय स्पेस संस्थाओं द्वारा मंगल पर उपग्रह भेजे जाते रहे हैं लेकिन हाल ही में अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अपना अत्याधिक हाइटेक मार्स रोवर क्यूरियोसिटी मंगल की सतह पर सफलतापूर्वक पर उतारा है जिसके बाद यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि अब शायद मंगल की हकीकत ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रह सकती भूवैज्ञानिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मंगल ग्रह को विभिन्न अवधियों में विभाजित किया जा सकता है | आज से 4.5 अरब वर्ष पूर्व से लेकर 3.5 अरब वर्ष पूर्व तक की एक अवधि है जिसेनोएचियन काल के नाम से जाना जाता है, इनमें सबसे अधिक प्रमुख है | वैज्ञानिकों के अनुसार इस दौरान मंगल की सबसे पुरानी सतह का गठन हुआ था | दूसरा है हेस्पेरियन काल, जो 3.5 अरब वर्ष पूर्व से लेकर 2.9-3.3 अरब वर्ष पूर्व तक की अवधि है | इस काल में व्यापक तौर पर लावा मैदानों का गठन हुआ था | तीसरे स्थान पर है अमेजोनियन युग, जो 2.9-3.3 अरब वर्ष पूर्व से वर्तमान तक की अवधि को कहा जाता है | सौरमंडल का सबसे बड़ा पर्वत ओलंपस मोन्स इसी दौरान बना था | sabhar : http://hariyanainfo.com/


ब्लैक होल में रहते हैं एलियन

हालाँकि यह दूर की कौड़ी लगती है लेकिन इस बात की संभावना है कि एलियन कुछेक ब्लैक होल के भीतर मौजूद ग्रहों में रह रहे हों।

डेली मेल के अनुसार, रशियन अकादमी साइंसेंज के प्रोफेसर व्याचेस्लाव दोकुचाएव के अनुसार, कुछ ब्लैक होल की जटिल आंतरिक संरचना होती है जिसके कारण फोटोन, कण और ग्रह एक ‘केन्द्रीय एकलता’ में घूमने लगते हैं। यह ब्लैक होल का वह क्षेत्र है जहाँ समय और काल अनंत हो जाता है।

प्रो. दोकुचाएव ने कहा, हालाँकि कुछेक ब्लैक होल के केन्द्र पर और उपयुक्त परिस्थितियों के तहत एक ऐसा क्षेत्र भी होता है जहाँ समय और काल का तंतु मौजूद होता है।

उन्होंने दावा किया कि यदि कोई आवेशित और घूर्णन करता ब्लैक होल काफी बड़ा है तो तो यह उन ताकतों को कमजोर कर सकती है जो उस बिन्दु के परे हैं जहाँ ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण से कुछ भी, यहाँ तक कि प्रकाश भी, बाहर नहीं निकल सकता। (भाषा)

sabhar :http://hindi.webdunia.com/




Read more

बिना इनरवेयर पहने देखी गईं ये अभिनेत्रियां

0

कई बार बॉलीवुड एक्ट्रेस बिना अंतर्वस्‍त्र पहने ही फिल्मी पार्टियों में नजर आ जाती हैं। वह जान भी तब पाती हैँ जब कैमरे उन्हें दिखाते हैं।
bollywood actress without innerwear




bollywood actress without innerwear


एक कार्यक्रम में सेलिना जेटली भी बिना इनरवियेर के ही आ गईं

bollywood actress without innerwear

शिल्पा शेट्टी ने ऐसा किया और लोगों को दिखाया भी।

sabhar :http://www.amarujala.com/



Read more

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

पॉर्न मैगजीन पर बनेगी फिल्म

0



photo : googale


1980 का दशक वह दौर था जब पीली पन्नी साहित्य अपने जोरों पर था और रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर जमकर बिका करता था. मॉर्निंग शो में लगने वाली फिल्मों का अच्छा-खासा दर्शक वर्ग हुआ करता था, और स्कूल से गोल होने वाले बच्चे अकसर इन फिल्मों को देखने के लिए कतार में लगे नजर आते थे. अकसर सिनेमा सबकी पहुंच में नहीं था, ऐसे में पीली पन्नी की किताबें ही मसाले का असली औजार हुआ करती थीं. इसी दुनिया में एक नाम मस्तराम का भी था.
हीरो मस्तराम
शायद दो दशक पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि फॉरबिडन संसार में ले जाने वाला मस्तराम कभी सिल्वर स्क्रीन पर भी आ सकेगा. यह वह लेखक है जिसे न कभी लाइब्रेरी, न स्कूल, न घर के स्टडी रूम में पढ़ा गया, लेकिन फिर भी वह बंद कमरों, बाथरूम, बेडरूम और यारो-दोस्तों की टोलियों का हिट नाम बन गया. फिल्म की कहानी को भी काफी दिलचस्प अंदाज में पेश किया गया है. यह छोटे से कस्बे के बैंक क्लर्क राजाराम की कहानी है जो दिल्ली आकर बड़ा लेखक बनने का ख्वाब देखता है. उसे साहित्य में कामयाबी नहीं मिलती है. पब्लिशर उससे गर्म और मसालेदार कहानियां चाहता है, साहित्य टाइप नहीं. एक दिन गली में उसकी नजर सी ग्रेड फिल्म के पोस्टर पर पड़ती है तो उसे सारी बात समझ में आ जाती है, बस उसके बाद से पड़ोसन, दूध वाली और अपनी बीवी तक उसे अपनी बोल्ड कहानियों की पात्र लगने लगती हैं. इस तरह मस्त साहित्य लिखने वाले का नाम ही मस्तराम पड़ जाता है. फिल्म के ट्रेलर में बोल्डनेस का जमकर इजहार हो रहा है.

मस्तराम का फॉरबिडन संसार
मस्तराम की दुनिया में कोई भी कुछ भी कर सकता है. यहां पड़ोस की चालू आंटियां, हॉट भाभियां, बेवफा पत्नी, सेक्सी कामवालियां, परफेक्ट दूधवाली और न जाने-जाने क्या-क्या नहीं है. यह वह संसार है, जहां कुछ भी वर्जित नहीं और सब चलता है. अखिलेश जायसवाल की मस्तराम उसी अनजान शख्स की काल्पनिक कहानी है, जिसे कभी किसी ने देखा नहीं,जाना नहीं लेकिन उसके फॉरबिडन संसार की भाभियों, आंटियों, काम वालियों ने न जाने कितनों की नींदें उड़ाई हैं.

बोल्ड सिनेमा का दौर
यह भारतीय सिनेमा में बदलाव का दौर है. यहां हर तरह की कहानियां लिखी जा रही हैं. चाहे सिल्क स्मिता की डर्टी पिक्चर हो या फिर अजय बहल की बी.ए.पास जो साल 2013 की चर्चित फिल्मों में रही. हाल ही में रिलीज हुई मिस लवली भी हमें ऐसे संसार में ले गई थीः सी ग्रेड फिल्मों का संसार. सनी लियोन की रागिनी एमएमएस-2 पहले ही अपनी बोल्डनेस की वजह से सुर्खियों में है, अब बारी मस्तराम की है. मस्तराम पिछले तीस साल से इसी नाम से छप रही है. फिल्म में राहुल बग्गा मस्तराम बने हैं जबकि ताशा बेरी उनके साथ लीड में हैं. देखें पटरी का यह बादशाह फिल्म में कहां तक जाता है.
sabhar :
http://aajtak.intoday.in/


Read more

कैमरे में कैद हुआ सिर कटा भूत

0

पब में भूत


पब में भूत

एक ओर जहां पब मस्ती-मजा करने की जगह होती है वहीं ब्रिटेन के एक पब में भूतों का बसेरा है। ये पब, ब्रिटेन के सबसे पुराने पब में से एक है। करीब 750 साल पुराने इस पब के लोगों का कहना है कि उन्होंने पब के भूत को कैमरे में कैद किया है।

'ये ओल्ड मैन एंड स्काइथ पब' के सीसीटीवी कैमरे में भूत की तस्‍वीरें कैद करने का दावा किया गया है। हालांकि इस वीडियो के आने से पहले ही ये पब, भुतहा पब के नाम से जाना जाता है।

कब हुई भूत की रिकॉर्डिंग?

ये रिकॉर्डिंग वैलेंटाइन डे के रात की है। सुबह करीब 6:18 बजे के वीडियो में एक आकृति दिखाई देती है और फिर गायब हो जाती है। जिसके बाद से सीसीटीवी कैमरा भी काम करना बंद कर देता है।

पब के मैनेजर टोनी डूले ने अगले दिन जब फ्लोर पर टूटे गिलास के टुकड़े देखे तो सीसीटीवी फुटेज निकलवाई। उन्होंने ही इस पूरे मामले की जानकारी दी।


किसकी आत्मा?


किसकी आत्मा?

दरअसल, इस पब के बारे में माना जाता है कि यहां सातवें अर्ल ऑफ डर्बी जेम्स स्टेनले की आत्मा भटकती है। जिन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम दिन यहीं बिताए थे।

डेली मेल के अनुसार, इस वीडियो के पीछे कई तरह के विचार है, कुछ इसे इलेक्ट्रिसिटी समस्या से जोड़कर देख रहे हैं।

sabhar :http://www.amarujala.com/


Read more

सेक्स चिप का जमाना

0

सेक्स चिप का जमाना

वायग्रा बीते दिनों की बात हो चुकी है, अब जमाना बढ़ रहा है सेक्स चिप की ओर। सेक्स चिप के बारे में आ रहीं रिपोर्ट्स की मानें तो वैज्ञानिक इन दिनों एक ऐसे डिवाइस पर काम कर रहे हैं जिसे दिमाग में फिट किया जा सकेगा और इससे सेक्स का आनंद कई गुना बढ़ जाएगा।
(Getty) 




वायग्रा को भूल जाइए, क्योंकि अब साइंटिस्ट ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सेक्स चिपपर काम कर रहे हैं जो आपको उत्तेजित करेगा। दरअसल, यह चिप ब्रेन के उस हिस्से को उत्तेजित करेगा, जो सेक्स स्टिम्युलेशन में मदद करता है। 

इस चिप के तैयार होने में करीब दस साल या इससे भी ज्यादा लग सकते हैं। इस चिप के जरिए सेक्स के मामले में ब्रेन को डीप स्टीम्युलेट करने में मदद मिलेगी। इसके तहत इम्प्लांटिड इलेक्ट्रोड से ब्रेन को हल्का सा शॉक दिया जाएगा, जिससे ब्रेन के प्लेज़र सेंटर को स्टीम्युलेट किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल इससे पहले भी पार्किसन्स डिज़ीज़ के ट्रीटमंट के लिए किया जाता रहा है। 

पिछले दिनों साइंटिस्ट ने ब्रेन के उस हिस्से पर ध्यान दिया है, जो आंखों के ठीक पीछे का हिस्सा है और इसे ऑरबिटोफ्रॉन्टल कॉरटेक्स कहते हैं। ब्रेन का यह हिस्सा सेक्स संबंधी फीलिंग से जुड़ा होता है, जो खान-पान या सेक्स आदि से उत्तेजित होता है। 

यह रिसर्च ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डिपार्टमंट ऑफ साइकायट्री के मॉर्टन क्रिंगलबैक द्वारा किया गया। उन्होंने पाया कि ऑर्बिटोफ्रन्टल कॉर्टेक्स इस नए स्टीम्युलेशन टार्गिट का भी हिस्सा बन सकता है, जो एन्हेडोनिया जैसे डिप्रेशन डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों की मदद कर सकता है। मॉर्टन के कॉलीग और ऑक्सफोर्ड के जॉन रेडिक्लिफ के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रफेसर टीपू अज़ीज़ ने कहा है कि इस सेक्स चिप की अहमियत अगले दस साल तक खुलकर सामने आएगी। उन्होंने पिछले सप्ताह कहा था कि यह चिप बखूबी काम करता है और इसका सबूत भी है। 

उन्होंने बताया, 'कुछ साल पहले एक साइंटिस्ट ने एक ऐसी महिला के ब्रेन में इस तरह का डिवाइस इम्प्लांट किया था, जिनमें लो सेक्स ड्राइव की समस्या थी। इस डिवाइस की मदद से वह महिला काफी अधिक सेक्सुअली ऐक्टिव हो गईं। उन्हें खुद में अचानक आया यह बदलाव पसंद नहीं आया, इसलिए उनके सिर से उस वायरिंग को निकाल दिया गया। 

अज़ीज़ का कहना है कि दरअसल इस वायरिंग से एक और बाधा है कि कुछ पेशंट में इस वजह से ब्लीडिंग आदि की समस्या भी पैदा हो सकती है। पर, नए टेक्नॉलजी से ऐसी कोई समस्या नहीं होगी, जिसमें सर्जरी के जरिए हार्ट पेसमेकर से लेकर ब्रेन तक वायर को कनेक्ट किया जाएगा। 

उन्हें उम्मीद है कि वर्ष 2015 तक जब टेक्नॉलजी और भी बेहतरीन होंगी तो इस तरह का डिवाइस खुद अपने हाथ से कंट्रोल किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि हम इस डीप ब्रेन स्टीम्युलेशन का इस्तेमाल शरीर के और भी अन्य हिस्सों पर कर सकेंगे। तब यह और भी छोटा होगा, जिसके पावर को आप अपनी इच्छा के अनुसार कंट्रोल कर सकते हैं और इसे ऑन या ऑफ कर सकते हैं। 

वैसे हम एक बात आपको ज़रूर बताना चाहेंगे कि इस तरह की डिवाइस 1968 में बनी जेन फॉन्डा की फिल्म 'बारबरेला' में भी दिखाई जा चुकी है।







SABHAR  :http://navbharattimes.indiatimes.com/

Read more

जादू - टोना क्या सच में होता है ?

1





जादू - टोना क्या सच में होता है ?! अगर नहीं होता तो यह शब्द प्रयोग कैसे हुआ,क्यूँ हुआ ! प्राचीन काल में यह अधिक प्रयुक्त हुआ,आज भी इसके अंश विराजमान हैं।

जादू-टोना और नज़र लग जाने में फर्क है,नज़र तो अपनों की भी लग जाती है  …. परन्तु जादू-टोना एक अलग क्रिया है  . अनेक किताबें इस उद्देश्य से मिलती हैं,कई लोगों का खर्चा पानी इस जादू को करने और उतारने से बंधा होता है  .

पूजा के मन्त्रों का उच्चारण हम निरंतर करते हैं ताकि ऊपरवाले का वरद हस्त रहे  … ठीक उसी प्रकार बुरी चाह को निरंतरता में चाहना,उसके लिए विशेष पूजा करना एक खलल अवश्य उत्पन्न करता है,अनर्थ नहीं कर सकता  .

ऐसा सम्भव होता तो सब अमीर होते,सबके पति,सबकी पत्नियाँ वशीकरण मंत्र के जादू से वश में होते ! न बेरोजगारी होती ! यह सब मानसिक कमजोरी का प्रतीक है - कितनी सिद्धियाँ हासिल करके कोई अमर हुआ है भला !

कभी भी जीवन में एक पक्ष नहीं होता,एकपक्षीये व्यवहार उद्विग्न करता है,एकपक्षीये सामाजिक न्याय बीमार करता है और ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति उलजलूल हरकतें करता है - या तो लम्बी ख़ामोशी या तो प्रलाप या फिर सर पटकना  …देखनेवाले घटना की तह में नहीं जाते - आसानी से कह देते हैं कि किसी ने कुछ कर दिया है  .

स्थिति से तंग इंसान वही करने लगता है जो सामनेवाला देखना चाहता है  ! खैर, इसके बावजूद =
जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
कहाँ थे कंकड़, पत्थर?
कहाँ थी काई ?
वर्तमान में जीवंत हो जाते हैं॥
नज़रिये का पुनर्आंकलन
मासूम ज़िन्दगी से जुड़ जाते हैं...
जो हिदायतें अभिभावकों ने दी थी
वो अपनी जुबान पर मुखरित हो जाते हैं!
हमने नहीं मान कर क्या खोया
समझने लगते हैं
नज़र, टोने-टोटके पर विश्वास न होकर भी
विश्वास पनपने लगते हैं!
"उस वृक्ष पर डायन रहती है...."
पर ठहाके लगाते हम
अपनी मासूम ज़िन्दगी का हाथ पकड़ लेते हैं
"ज़रूरत क्या है वहाँ जाने की?"
माँ की सीख, पिता का झल्लाना
समय की नाजुकता समय की पाबंदी
सब सही नज़र आने लगते हैं!
पूरी ज़िन्दगी के मायने
पूरी तरह बदल जाते हैं

ये तो हुई मेरी सोच - अब लेते हैं औरों के विचार सम्भावना और घटना के आधार पर =

Anamika Ji मैं नहीं मानती, क्यूंकि कभी विश्वास करने के लिए आत्मा ने गवाही नहीं दी और कहते हैं न की घायल की गति घायल जाने। …तो (भगवान् न करें) जब तक हम ऐसे अनुभवों से न गुजरे हों तब तक ऐसी डरावनी और दन्त-कथाओं पर विश्वास नहीं होता।

Ashish Rai जादू टोना , काला जादू , बचपन में सुनी किम्वदंतियां , कुछ आँखों देखी घटनाएँ , मेरे इस विश्वास को पुष्ट कर गई की ये मानव की अवचेतन में उसकी विफलता के बाद पैदा हुई कुंठा या निराशा को पहली सीढ़ी बना लेती है , अगर मनुष्य अन्धविश्वास को पास भी फटकने देता हो तो . समाज के निचले तबके में अभी भी घटनाएँ सुनने को मिलती है जो केवल अन्धविश्वास और अशिक्षा की परिचायक है .


Vibha Shrivastava महालया के दिन से पूरा दसो दिन दशहरा तक ,माँ ,सब भाई बहन को तलुआ और नाभि में काजल का टीका कर देती थीं .....हर साल …. पूछने पर बताती थीं कि कल से दशई शुरू हो रहा है …. ये जादू टोना से रक्षा करेगा …. दशई में डायन ,जादू टोना करती है और नई डायन बनने का अवसर भी होता है ..... मेरे गांव के दुर्गा जी के मंदिर में मंगलवार और रविवार की रात को {अझौती उझौती} झाड़-फूंक होता है …. भुत-पिचास को भगाने के लिए ….
बिहार के न्यूज -पेपर में रोज एक खबर रहती है कि डायन बता कर ,नंगा कर पुरे गांव में घुमाया गया …. मैला पिलाया गया। …
मेरी सासु जी को जादू टोना पर पूरा विश्वास था। …। वे बताती थीं की डायन होती है जो जादू टोना करती है। …. वो ही बताई थीं कि मेरे ससुराल में एक और ससुर जी के नौकरी के दौरान एक ,दो डायन से उनकी मुलाक़ात हुई है ,जिसका अनुभव वे बताती थीं। …।
उनका ही बताया किस्सा है। …।
उनके पड़ोस में डायन रहती थी जो जादू-टोना करती थी। …डायन का जादू टोना करने तरीका था ,खाने के चीजो का इस्तेमाल करना जो बच्चो को प्रभावित करता था . जब मेरे छोटे वाले देवर ४-६ महीने के रहे होंगे। …. एक दिन वो रोना शुरू किये। …। रोते गए ,रोते गए। …. कोई उपाय काम नहीं कर रहा था। …. रोने के कारण लग रहा था कि अब उनकी साँस टूटी। … आज वे नहीं जिन्दा रह सकेंगे। …. दोपहर से शाम ,शाम से रात हो गई। …. देवर जी चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। …. ना कुछ खाना। …. ना कुछ पीना। …। बच्चे की रोने की आवाज सुन आस पास के लोग जुट गए। …. भीड़ में से ही कोई बोला कि हम सब आ गए। …. आपकी पड़ोसन नहीं आई है जो इतनी पास है। …. तब मेरी सासु जी को याद आया कि दो पहर में पड़ोसन के घर से कुछ खाने की चीज आई थी जो आदतन वे खाई थी {वे सबसे पहले खा लेती थी कि जादू का असर बच्चो पर ना हो। …. कही से कुछ भी आता। … ये आदत उनकी अंत तक रही} उस समय देवर जी उनका दूध पी रहे थे। … सासु जी का माथा ठनका। … वे अपने आँगन से ही पड़ोसन को पुकारी और बोली कि आप मेरे घर आइये। …
पड़ोसन :- इतनी रात को मैं आपके घर क्यूँ आऊं । ….
सासू जी :- मेरा बेटा को देखिये ना। …. रोये जा रहा है। …
पड़ोसन :- तो उसमें मैं क्या कर सकती हूँ। …. अब तो मैं सोने जा रही हूँ। ।
सासू जी :- आप कुछ देर के लिए आइये। …
सासू जी बुलाती रही। …. पड़ोसन इनकार कराती रही। ….
सासु जी का धैर्य कमजोर हो चूका था ,टूट गया। …. वे चिल्ला पड़ी। … आज आपके घर से खाने का सामान आया था ,जिसके कारण मेरे बेटे की ये हालत हुई है। …. वो तो नहीं बचेगा। … अगर आप अपना जादू नहीं वापस कराती हैं तो। …. मैं तो बेटा खो दूंगी। …. लेकिन कल आप को भी मैं जिन्दा नहीं रहने दूंगी। …. पुरे समाज के सामने ये बहस हो रही थी। …. उस पड़ोसन को बे मन से आना पडा। …. आते ही वे बोली मेरे सासू जी से कि हाँथ में तेल लगा कर पीठ ससार दो। …। पीठ पर सासू जी का तेल लगा हथेली लगते ही देवर जी एक दम से चुप हो गए और सबके सांस में सांस आई। ....
abhi aur baaki hai ..... milate hain ..... pet pujaa ka sawaal hai ........


Sadhana Vaid जादू टोने में तो मेरा विश्वास नहीं है ! ऐसा कुछ मेरे सामने घटित भी नहीं हुआ जो जादू टोने पर विश्वास करने के लिये मुझे कायल कर सके लेकिन हिप्नोटिज्म पर मेरा विश्वास है और हिप्नोटाइज़होने के बाद अपनी बुद्धि, विवेक, तर्कशक्ति सब कुछ भुला कर हिप्नोटाईज़ करने वाले के इशारों पर चलते हुए मैंने समझदार एवँ वयस्क लोगों को भी देखा है ! शायद यह जादू टोने का ही परिमार्जित रूप हो !


Saras Darbari  रश्मि जी गाँव,कस्बों में आज भी लोग जादू-टोना करते हैं। … और अफ्रीकन 'वूडू' तो बहुत मशहूर है, जहाँ पुतले बनाकर उन्हें टॉर्चर किया जाता है . जिस भी व्यक्ति पर काला जादू करना होता है ,उसकी शक्ल की एक गुड़िया बना दी जाती है और उसे जैसे जैसे टॉर्चर करते हैं - वही पीड़ा वह इंसान महसूस करता है - यह तो जग विदित है ! वैसे हम उस पर विश्वास करते हैं,क्यूंकि हमारी आँखों देखि घटना है . कैसे होता है - ये तो मैं नहीं जानती,क्योंकि मैं स्वयं अवाक रह गई थी देखकर ! कोई तर्क,कोई जवाब नहीं था मेरे पास उसे समझने का - पर ये सच था। क्योंकि मैंने देखा तो मेरा मानना है कि जादू-टोना होता है !


Jyoti Khare जीवन में कब क्या हो जाऐ कहा नहीं जा सकता, जो लोग जादू टोना झाड़ फूंक
को नहीं मानते थे पर जब मुसीबत आयी तो झड़वाते मिले,और जो मानते थे,वे
नहीं मानते मिले-
अम्मा बताती हैं ,दादाजी के पिताजी को रायपुर से मूठ (एक खप्पर पर दिया जलता हुआ आकाश मार्ग से आता है ) भेजी गयी थी मारने के लिए,
कादंबनी के बहुत पुराने अंकों में जादू टोना भूत चुडैल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी
उपलब्ध है.
बच्चों की नजर उतारना,सूखा रोग में झड़वाना एक तरह का जादू टोना ही है,
आधुनिक सोच वाले इसे किवदंती कथा मानते हैं ,हो सकता है यह सही हो
पर आज भी इसे नाकारा नहीं जा सकता-


Gunjan Shrivastava हाँ मैं जादू टोने को मानती हूँ ...इससे मानसिक रोगों का इलाज होता है .. और सफल भी रहता है .... लेकिन शारीरिक तकलीफ या रोगों इलाज सिर्फ़ दवा ही कर सकती है ...यहाँ जादू टोना बेअसर होगा .


Sangita Puri 'जादूटोना' शब्‍द की उत्‍पत्ति ही जादू से हुई है , भले ही प्राचीनकाल में आम जनता के भरपूर मनोरंजन के ध्‍येय से 'जादू' के नियमों को उनसे छुपाया जाता था .. पर आज स्‍पष्‍ट है कि 'जादू' के सारे खेल हाथ की सफाई और विज्ञान के नियमेां के ही खेल हैं .. पर इसके नियमों को न समझने से लोगों को जादूगर असीम शक्ति के मालिक दिखने लगे जो कोई अनहोनी कर सकते हैं ... इसलिए उससे भय खाना स्‍वाभाविक था ... पर हिप्‍नोटाइज या कुछ अन्‍य तरह की तंत्र शक्तियां नहीं होती हैं .. कोई सिद्धि नहीं हो सकती ..ऐसा कहना भी सटीक नहीं ... क्‍योंकि इस विषय में बहुत सारे लोगों के तरह तरह के अनुभव हैं ... और सबको एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता ... पर मेरा मानना है कि किसी भी प्रकार की शक्ति का प्रभाव आपपर तब ही पडता है जब आप मन से कमजोर होते हो ... ठीक उसी तरह जैसे किसी भी बीमारी का प्रभाव तब आपपर पडता है जब आप शरीर से अस्‍वस्‍थ होते हैं ... ठीक उसी तरह जैसे किसी भी असामाजिक तत्‍वों का प्रभाव आपपर तब ही पडता है जब आपके ग्रहों का ऋणात्‍मक प्रभाव आरंभ होता है ... इसलिए तन मन को हमेशा मजबूत बनाए रखें और बाकी चीजों को ईश्‍वर पर छोड दें ... ग्रहों का धनात्‍मक प्रभाव शुरू होते ही कोई भी ऋणात्‍मकता आपपर हावी नहीं हो सकती ...


Anulata Raj Nair आज तक कोई जादू हुआ नहीं......कभी किसी और के साथ होते देखा नहीं...तब कैसे मान लूँ?? टोन टोटके करते देखा ज़रूर है मगर उसके परिणाम बेतरतीब थे...याने जो होना था वो हुआ बस टोने को बेवजह ही क्रेडिट मिला......हाँ मगर लगता है कि काश कोई जादू होता कभी मेरे साथ भी


Shikha Varshney कहानियां तो बहुत सुनी हैं। पर खुद कभी देखा नहीं। यहाँ तक कि मुझे तो ये मेजिक खेल/ शो भी नहीं पसंद। हाँ लोगों को टोटके करते जरूर देखा है। पर वो भी कभी अपने गले से नीचे तो उतरे नहीं। हालाँकि आज भी काला जादू जैसी चीजें खुलेआम सुनने में आती हैं और इन्हें झाड़ने, उतारने वालों के बिंदास विज्ञापन भी दिए जाते हैं। पर मैं तब तक किसी भी चीज पर विश्वास नहीं कर सकती जब तक खुद उसकी प्रत्यक्ष गवाह न बन जाऊं।


Kavi Kishor Kumar Khorendra जादू टोना अपने मन की भड़ास निकालने का एक तरिका हैं
जब हम किसी के द्वारा किये जा रहे अत्याचार का विरोध नहीं कर पाते हैं
तो उससे उत्पन्न क्रोध को ,विरोध को , जाहिर करने के लिए
प्रगट रूप से ऐसा व्यवहार करते हैं जो खुद के लिए हानिकारक तो होता हैं
परन्तु उससे अप्रत्यक्ष रूप से अन्याय करने वाले के ह्रदय को भी चोट पहुंचती हैं
या उसके मन को पीड़ा होती हैं /


Vibha Shrivastava जब मैं गर्भवती हुई और जब तक राहुल{मेरा बेटा} छ महीने का नहीं हो गया ,मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। …। उन दौरान मैं सोचती ,कि। ……
कैसे
किसी को उलटी होता होगा। ….
खाने की इच्छा नहीं होती होगी। ….
किसी चीज का गंध परेशान करता होगा
उपर्युक्त बाते मेरे साथ होती तो। ….
रईसी जिंदगी गुजराती ना (*_*)
नाज़ नखरे लोग उठाते
डॉ से दिखलाया जाता
अल्ट्रा साउंड होता सी डी बनता
गोल्डन मेमोरी होता ना (*_*)
खैर
ऐसा कुछ नहीं होना था न हुआ
समय गुजरा बिना लेबर पेन का नार्मल डिलीवरी से बेटा भी पैदा हो गया
वो भी ऐसा कि ना जागता और ना रोता
उसे सोये में तेल लगाना ,नहलाना हो जाता था …. कान मल मल कर दूध पिलाना होता था ,क्यूँ कि कान दर्द से मुंह खोल देता था। ....
दिन भी चैन से गुजरता और रात भी सुकून से गुजर जाता

रोता जागता तो घर के कामों से भी मुक्ति मिलती और लोगों से सहानुभूति कि बच्चा से बहुत परेशान है बेचारी ,कुछ रहम किया जाए। …
या
बच्चे को सुलाने के बहाने जच्चा भी सो जाए। ….
सोये को क्या सुलाना
लेकिन। …. लेकिन। …। लेकिन। ….
एक दिन मेरे घर कोई आया और बोल दिया कि। ….
बहुत प्यारा बच्चा है
ये तो सोता ही रहता है
कोई परेशानी नहीं होगी आप लोगो को। ….
राहुल उस समय छ महीने का था। …
उस बात को कुछ घंटे बीते हुआ होगा कि
राहुल जगा और रोना शुरू किया। …. रोता गया। । रोता गया। …
सात दिन -रात रोता रहा। …. पूरा घर परेशान। ….
मेरी सासू जी को जो समझ में आता उपाय कराती रहीं। …।
कभी किसी पंडित को बुला पूजा पाठ
कोई बता देता तो मौला से ताबीज
कोई बता देता तो मजार से भभूत
सरसों मिर्चा से नज़र उतार कर गोयठे के आग पर जला कर उसका धुया
उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़
उपाय होता रहा आखिर सातवें दिन राहुल को नींद और सबको चैन मिला। ….
फिर वही रफ्तार से जिंदगी चलने लगी। ....
लेकिन जिस आदमी का टोक लगा था , उस आदमी पर शक करना , तौबा , सब के लिए पाप गुनाह होता। ….
जब राहुल १० महीने का हुआ फिर बीमार रहने लगा जो करीब १६-१७ साल तक झेलाता रहा। ….
उन दौरान भी ओझा पंडित का चक्कर लगा। …. श्मशान से पका लिट्टी। …. होलिका पर से पका लिट्टी। …. झाड़ -फूंक। ….
मुझे बस यही समझ में आया कि बीमारी बस बिमारी। …
भोजपुरी में एक शब्द है छारियाना। ….


Shikha Gupta ये कोई छुपी हुई बात नहीं कि गाँव में किस प्रकार विधवा या अकेली औरत की ज़मीन हडपने के लिये/ परिवार द्वारा विधवा से छुटकारा पाने के लिये / उसे अनैतिक संबंधों के लिये राज़ी न कर पाने की सूरत में मिली-भगत करके डायन घोषित कर दिया जाता है और फिर गाँव से बाहर धकेल दिया जाता है। तलाक का प्रचलन नहीं था मगर ये बहुत ही पुराना तरीका रहा है पत्नी से छुटकारा पाने का .....चूँकि डायन को जला कर मारने का भी खूब प्रचलन रहा है।
डायन हो या सती .....दोनों का उद्देश्य कमोबेश एक ही होता रहा है ....छुटकारा पाना
लोगों की तकलीफ,अज्ञानता और मुर्खता का फायदा उठाने के तरीके से ज्यादा मैं इसे कुछ और नहीं मानती। कितने ही परिवार जादू-टोने के फेर में पड़ कर घर की सुख-शान्ति खो बैठते हैं .....जो इसका शिकार बनाए जाते हैं उनकी पीड़ा का अंदाज़ा शायद हम लगा भी न पायें।
मेरे ख्याल में इसके प्रति जागरूकता फैलाने और जन-मानस को तर्क-पूर्ण विचार कर तथ्यों को परखने के लिये प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।


Shikha Gupta मैं जब अपने चार माह के बच्चे को लेकर माँ के पास गयी हुई थी ...माँ ने एक पंडित को बुलवाया जिसने बच्चे के कपडे मंगवाए और देखकर ऐलान कर दिया कि बच्चे पर जादू करवाया गया है अगर झाड-फूँक नहीं करवायी तो एक महीने से ज्यादा जीवित नहीं रहेगा .....कायदे से मुझे ड़र जाना चाहिए था मगर इन सब पर विशवास न होने के कारण मैंने कुछ भी करवाने से इनकार कर दिया ...माँ बहुत ही ज्यादा नाराज़ हुई पर अच्छी बात ये थी कि भाई और पापा भी मेरे निर्णय में साथ थे तो मेरा वो प्रवास शान्ति से गुजर गया और ज़ाहिर सी बात है कोई अनहोनी नहीं हुई ....हाँ वो पंडित फिर कभी हमारे घर नहीं आये ...माँ के कई बार बुलाने के बावजूद

Kavi Kishor Kumar Khorendra अभी हाल की ही घटना हैं
१-वह २७ साल की ग्रामीण युवती हैं
२- उसके तीन लडके हो चुके हैं ७ साल ,५ साल ,३ साल के
३-उसके घर में सास ससुर पति और दो जवान देवर हैं
४-गरीब परिवार हैं
५-सिलाई का काम करते हैं दोनों देवर
६-उस युवती के पति को दो चार लोगो ने कह दिया की
"तुम्हारी पत्नी का तुम्हारे भाईयों के साथ अवैध सम्बन्ध हैं "
७-जबकि ऐसा बिलकुल नहीं हैं ,वह युवती काज या बटन के काम में
अपने देवरों का सहयोग करती आई हैं
८-आरोप की भनक पिछले साल की हैं
९-इस साल से उस पर देवी चढ़ ने लगी हैं
१०-वह बहुत गुस्से से भर जाती है गलियाँ देने लगाती हैं ,आदि आदि
सब कहते हैं की किसी ने टोना किया हैं।


Sudha Raje जादू टोना ।।।वैसा है जैसे मानसिक शक्ति से कुछ भी कर दिखाना ।।।जब एक गिलास साफ पानी माँ बच्चे को मंत्र पढ़कर पीने को देती है सोचकर कि वह निरोग होगा ।।तब पूरी मानसिक ताक़त से ऐसा करती है और आम तौर पर काफी संख्या की छोटी छोटी समस्यायें कम होती हैं।।।।बुरा चाहना कोसना और दंड देना भी ऐसा ही है ।।जिसकी मानसिक ताक़त कम होगी वही नुकसान उठायेगा।।।।किंतु जिस तरह से अंधविश्वास फल फूल रहा है सिवा बकवास के कुछ है तो लोगों को उल्लू बनाकर धन ऐंठना


Shivam Misra मैं न तो पूरी तरह से इन पर यकीन करता हूँ न ही पूरी तरह इन के वजूद से इंकार करता हूँ ... बचपन से देखता आया हूँ कि कभी बुरी तरह से सर दर्द से तड़प रहा होता हूँ तो कैसे दवा कारगर नहीं होती और वहीं माँ द्वारा 'नज़र' का उतारा जाना असर कर जाता है | दूसरी ओर जब आस पड़ोस मे किसी बच्चे के बुखार मे होने पर उस के परिवार द्वारा डाक्टर को छोड़ किसी ओझा की शरण मे जाना मुझ पूरी तरह मूर्खता लगती है !


Vandana Gupta मन का वहम है , अगर कुछ करने से कुछ अच्छा हो गया तो मान लिया ऐसे करने से ही हुआ मगर हमेशा वैसा करने पर अच्छा ही हुआ हो सबके साथ शायद ही किसी ने बताया हो ……किसी समय विशेष मे किसी खास परिस्थिति में किसी के साथ होने वाली घटनाओं को किस तरह देखा गया और उनका निवारण किया गया ये जानना जरूरी है मगर हम ये सब नही देखते बस किसी के कुछ करने से हमारा अच्छा या बुरा हो जायेगा ये सोच बैठते हैं और यही सोच हमें विश्वास और अंधविश्वास की ओर प्रेरित करती है और उसे ही जादू टोना मान लिया जाता है जरूरत है तो उस परिस्थिति विशेष के सही आकलन की


Vandana Singh व्यक्तिगत और निजी स्तर पर मैं इसके अनुभव से बिलकुल अनभिज्ञ और अपरिचित हु किन्तु सामाज और समुदाय में प्रचलित ऐसी मान्यताओं को सिरे से नकार भी नहीं पाती हु ।
इस विषय की गंभीरता और रोचकता से शायद ही कोई अछूता हो... सो मैं भी नहीं । जादू शब्द में छुपा हुआ आकर्षण और प्रभाव हर समाज और समुदाय का अभिन्न अंग रहा है और दी ... बहुत से ऐसे लाचार और बेबस... विसंगतियों , मानसिक ,प्राक्रतिक , शारीरिक आपदाओं से त्रस्त लोगों को जादू टोने ने आशा की अनोखी ज्योत से जीवंत रखा हुआ है जो संभवतः सब तरफ से निराश हो चुके होते हैं । सो कहीं न कहीं सकारात्मक प्रभाव भी है जादू टोने का । हाँ , सिर्फ यही जीवन की सफलता और कार्यक्षेत्र का आधार कतई नहीं माना जा सकता ये मेरा प्रबल और दृढ विश्वास है ।


Imran Ansari - Main jaadu tone ko to nahi maanta......par haan buri nazar aur upari asar (aatma ka any sharir me pravesh, jinnat ) ko main apni aankho se dekh chuka hoon......mere bahut hi aatmiy ke sath ye sab ghatit hua .......


Sada ज़ादू-टोना होता है, ऐसा सुना है, कई बार किसी को बुरी नज़र के साये में देख पूरी तरह से इसे नकारा नहीं जा सकता, कुछ लोग छोटी-छोटी बातों पर इसके होने की शंका करते हैं वह जरूर गलत और वहम लगता है, लेकिन जादू-टोना नहीं होता इस बात को मात्र वहम कहकर टाला नहीं जा सकता, मेरा ऐसा मानना है।


राजेंद्र अवस्थी  - दिन है और रात भी है, भगवान हैं तो शैतान भी हैं, सिक्के के दो पहलू होते हैं सदैव....ये प्राकृतिक भी है....अत: ये कहना कि तंत्र मंत्र मात्र कल्पना है..उचित ना होगा...
जितने भी लोग ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास करते हैं उनको तंत्र,मंत्र तथा यंत्र पर भी विश्सास करना होगा....
ये और बात है कि, खुले मन से कुछ बातों को स्वीकारना कठिन होता है।


Maheshwari Kaneri नहीं मैं जादू टोना नहीं मानती..जाब जर्रे-जरे में ईश्वर विढ्मान है तो जादू में भी ईश्वर जरूर होगें इस लिएजादू टोने से हमारा बुरा कैसे होसकता है..


Mukesh Kumar Sinha दिमाग कहता है जादू टोना नाम का कुछ नहीं होता, पर दिल कभी कभी इस बात से मना भी नहीं कर पाता
शायद एक आम भारतीय जैसा सोचता हूँ.... लगता है हम 21 वीं सदी मे हैं, पर अंदर सब कुछ वहीं पीछे छिपा बैठा है ......


Neelima Sharrma जादू टोना पर खुद से तो विश्वास नही किया परन्तु ऐसे लोगो से डरती जरुर हूँ जो इन पर विश्वास रखते हैं मेरे ख्याल से जादू और टोन को किसी को मनोवैज्ञानिक रूप से अपने अपने वश में करने के लिय प्रयोग किया जाता होगा और भय वश लोग उसी बात को करने लगते होंगे जिनके निमित्त इन सबको किया होगा इश्वर अवश्य हैं और हरेक करम का फल जरुर मिलता हैं .हाँ माँ को देखा हैं बचपन में नमक से नजर उतारते हुए बच्चो की पर इसे जादू या टोना नही कहा जा सकता न ......


Kailash Sharma बहुत कठिन है कुछ कहना. मन और दिमाग इस पर विश्वास नहीं करता. लेकिन विश्व में अभी भी बहुत से रहस्य हैं जिनका खुलासा होना बाकी हैं, और शायद यह भी उनमें से एक है....


कौशलेन्द्रम कुक्कू ·
मेरे सामने कई दृष्य उभरते हैं जब कोई जादू-टोने की बात करता है। कुछ दृष्य आपके लिये भी ...
1- केवल एक नज़र की बौछार ..जैसे कि कोई बादल फट गया हो, ज़िंदगी ढलान पर है मगर आज तक भीगता जा रहा हूँ । सोचता हूँ ..क्या था उन आँखों में । पता नहीं था आँखों का जादू इतना गहरा होता है । 2- मुझे पता है ...ख़्वाब है यह सब लेकिन तुम्हारे जादू ने जिस सृष्टि की रचना की है उसे कैसे नकार दूँ ? 3- ...ज़रूर उस चुड़ैल ने ही कोई जादू किया होगा तुम पर वरना रखा ही क्या है उसमें ..न शक्ल की न सूरत की ...कुलच्छनी कहीं की । 4- बहू ! जरा सा काजल लगा दे इसके माथे पर मुआ कित्ता ख़ूबसूरत लग रहा है आज । जलने वालों की कमी नहीं है ....कहीं कोई टोटका न कर दे मेरे पोते पर । 5- इत्ते-इत्ते बैद गुनिया सब को दिखाया पर जब से नीबू और मिरच उतारा तब से कुछ ठीक है ..बुख़ार भी कुछ कम हुआ है और अभी तो आराम से सो भी रहा है । 6- हाँ ! मैं मारा इसको ...टोनही थी साब तब्बी तो मारा । पूरा पारा में सबको जादू टोना करती फिरती थी ....। 7- कुछ नहीं सिर्फ़ एक भ्रम । जादू टोना कुछ होता तो सारी दुनिया जादूगरों और टोना-टोटका वालों के कब्ज़े में होती। 8- जब शून्य से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हो सकती है तो जादू से कुछ क्यों नहीं उत्पन्न हो सकता ? 9- वास्तव में जादू-टोना सब कुछ सापेक्ष प्रभावी हैं। जो मानता है उसके लिये इसका अस्तित्व है और जो नहीं मानता उसके लिये यह मात्र एक अन्धविश्वास। इसका अर्थ यह हुआ कि जादू-टोने का अस्तित्व यदि कहीं है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे मन में है ।


बेचैन आत्मा - जादू हाथ की सफाई, टोना मन का आशावादी होना है। इस सत्य से इंकार नहीं कर सकता कि बचपन में जब बीमार पड़ता था और माँ झाड़-फूँक करती थीं, नज़र उतारती थीं तो पक्का यकीन हो जाता था कि अब मैं ठीक हो जाऊँगा। डाक्टर की दवाई तन को, माँ की झाड़-फूँक मन को अच्छा करती थी। सबसे बड़ी बात है विश्वास। अब सावधान रहने की बात यह है कि हम जिस पर विश्वास कर रहे हैं वह है कौन ? माँ जैसा भला चाहने वाला या फिर किसी ढोंगी संत जैसा जो भोले विश्वास का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रहा है। इस अंधविश्वास का दायरा बच्चों के मन में अपनी माँ तक ही सीमित रहे तभी कल्याण है।


Darshan Kaur Dhanoe मैं जादू -टोने में बिलकुल भी विश्वास नहीं करती थी ..पर जब मेरे साथ एक दुखद वाकिया हुआ तो मुझे महसूस हुआ कि ये सब सत्य है ...बात 1 9 97 कि है ---" मेरा झगड़ा मेरी पड़ोसन से हुआ ...वो मेरे बगल वाले फलैट में रहती थी ..वो मुझे बहुत परेशां करती थी ..आये दिन कुछ न कुछ करती ही रहती थी ..हम सब चुप रहते थे ,एक दिन गुस्से में मैंने उसको पिट दिया ..उसने मेरे खिलाफ झूठी रिपोर्ट कर दी ..खेर, पति कि अच्छी साख होने के कारन कुछ हुआ नहीं ..बात आई गई हो गई ...

4 महीने बाद अचानक वो बात करने लगी ..मैंने भी सोचा कि रोज़ झगड़ा करने से अच्छा है बातचीत कि जाये ..वो हमारे घर आने - जाने लगी,वो मेरी बड़ी बेटी से ज्यादा धुलने मिलने लगी ..रोज़ उसे घर में बुलाती ,मेरे मिस्टर मना करते थे ..पर मैंने ध्यान ही नहीं दिया ...एक महीने के अंदर मेरी बेटी काली पड़ने लगी जबकि उसका रंग बहुत ही साफ था ,उसे बुखार रहने लगा ,उसने खाना -पीना तक छोड़ दिया . हम डॉ के पास लेकर जाते तो कुछ भी नहीं निकलता ..काफी टेस्ट करवाये पर नतीजा कुछ नहीं निकला ..उस समय वो 8 th कि पढाई कर रही थी उम्र 1 5 - 1 6 साल ..
एक दिन हमारी दुकान का कर्मचारी मिश्रा जी ने कहा कि इसको कुछ हुआ है साहेब .....तब तक हम उसको 'बॉम्बे हास्पिटल' (मुम्बई ) एडमिड कर चुके थे पर कोई फायदा नहीं हुआ ..मेरे mr. उसके लिए दुआए मानते थे ..हम 8 दिन हास्पिटल में रहे पर कोई फायदा नहीं .. उसका बुखार कम होता ही नहीं था ..
किसी के कहने पर mr. 'हाजीअली ' कि प्रसिद्धी दरगाह पर गए वह के मोलवी ने उनको एक काला धागा दिया और साबूत गेहू दिए और कहा कि ये बच्ची को चबाकर खाने को कहो जो भी गन्दा खिलाया है वो उलटी कर देगी सब ठीक हो जायेगा ..यह बात सुबह 9 बजे कि है जब mr ने वो गेहूं मुझे हास्पिटल में लाकर दिए ..बेटी बात कर रही थी,मैंने गेहूं उसके हाथ में दिए खाने के लिए , लेकिन अचानक वो गेहूं हाथ में लेकर चीख पड़ी और बेहोश हो गई ...वो कोमा में चली गई थी ..पूरा दिन पूरी रात हम उसे i c u में लेकर बैठे रहे सुबह 7 .3 0 (6 जनवरी 1 9 98) को उसके जीवन कि लीला ख़त्म हो गई ..ख़तम तो वो रात को ही हो गई थी सिर्फ मशीनो ने उसे जिन्दा रखा था ...डॉ कहते है इसे वो बीमारी थी जो लाखो में एक को होती है जिसमे शारीर के 'सेल' मरते है और वापस बनते नहीं पर मुझे यकीं है ये उस बंगालन के जादू का ही असर था जिसने मेरी तंदरुस्त बेटी को निगल लिया ...
कुछ दिनों बाद हमने वो फलेट ही छोड़ दिया ...

* कहते है किसी का दिया हुआ खाने का सामान यदि सुंध लिया जाये तो किसी भी प्रकार के जादू -टोने का असर नहीं होता ..sabhar :http://www.parikalpnaa.com/

Read more

भोग से योग का मार्ग दिखाता खजुराहो

0

मध्यकालीन भारत के चंदेल राजाओं के पराक्रम और वैभव की गाथाएं आज भी बुंदेलखंड में सुनी जाती हैं। कला और संस्कृति के प्रति उनके लगाव के प्रमाण खजुराहो में अत्यंत जीवंत रूप में मौजूद हैं। भव्य मंदिरों के रूप में खड़े ये साक्ष्य उस दौर के धर्म, कला और जीवन के तमाम भावों को अपने में समेटे हुए हैं।
खजुराहो के गगनचुंबी देवालयों की भित्तियों में जड़ी असंख्य मूर्तियां जीवन के हर आयाम को विभिन्न कोणों से प्रदर्शित करती हैं। मंदिरों की ये भित्तियां पाषाण पर उकेरे किसी महान ग्रंथ के पन्नों सी प्रतीत होती हैं। जिसे पढ़ने पर हर वर्ष लाखों सैलानी खजुराहो चले आते हैं। वास्तव में खजुराहो के ये मंदिर संसार भर के पर्यटकों के लिए भारत का अद्वितीय उपहार हैं। इसी कारण खजुराहो आज विश्व पर्यटन मानचित्र पर एक सुनहरे बिंदु की तरह दीप्तिमान है। यूं तो खजुराहो की ख्याति मंदिरों की दीवारों पर स्थित कामक्रीड़ामग्न मूर्तियों के कारण अधिक है, किंतु इसका कला वैभव केवल यहीं तक सीमित नहीं है। यहां कई अन्य मूर्तियां भी अपने शिल्प कौशल के कारण पर्यटकों को बेहद प्रभावित करती हैं। खजुराहो की यही विशेषता देश-विदेश के तमाम पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।
बदलता रहा नाम
झांसी रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही हमें खजुराहो के लिए बस तैयार मिली। करीब पांच घंटे के थका देने वाले सफर के बाद हम खजुराहो पहुंच गए। वहां उतरते ही हमें होटल के एजेंटों के साथ साइकिल रिक्शा व ऑटोरिक्शा वालों ने आ घेरा। छोटे शहर की छोटी-छोटी सड़कों पर साइकिल रिक्शे से ही हम होटल की ओर चल दिए। सफर की थकान के कारण हमें पहले आराम की जरूरत थी। विश्राम के बाद जब हम होटल से बाहर निकले तो दोपहर बीत चुकी थी। भीड़-भाड़ से परे छोटे से शहर में घूमते हुए सब कुछ आसपास नजर आ रहा था। मुख्य मार्ग पर बढ़ते हुए, बाजार के सामने हमें आलीशान मंदिरों का समूह नजर आया। यही तो था चंदेलों का स्थापत्य संसार। इसे देख कुछ पल के लिए तो हम ठिठक गए। किंतु हमें पता था कि किसी गाइड की सहायता के बिना उन मंदिरों पर लिखे आलेखों को पढ़ना हमारे लिए कठिन था। इसलिए हमने पर्यटन कार्यालय जाकर अगले दिन के लिए एक गाइड की व्यवस्था की तथा अन्य जानकारियां प्राप्त कीं। वहां से हम वापस बाजार आए और एक रूफटॉप रेस्टोरेंट में आ बैठे। वहां से मंदिर परिसर स्पष्ट नजर आ रहा था। कॉफी के सिप लेते हुए हम मंदिरों पर उतरती सांवली शाम का नजारा देख रहे थे।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो का इतिहास काफी पुराना है।इब्नबतूता ने इस स्थान को कजारा कहा है, तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भाषा में इसे ‘चि: चि: तौ’ लिखा है। अलबरूनी ने इसे ‘जेजाहुति’ बताया है, जबकि संस्कृत में यह ‘जेजाक भुक्ति’ बोला जाता रहा है। चंदबरदाई की कविताओं में इसे ‘खजूरपुर’ कहा गया तथा एक समय इसे ‘खजूरवाहक’ नाम से भी जाना गया।लोगों का मानना था कि इस समय नगर द्वार पर लगे दो खजूर वृक्षों के कारण यह नाम पड़ा होगा। जो कालांतर में खजुराहो कहलाने लगा।
ताकि समझ सके समाज
चंदेलवंशीय राजाओं का शासनकाल इस क्षेत्र का स्वर्णिम दौर था। उन्होंने 9वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान यहां राज किया था। खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण उन्होंने ही करवाया था। इन मंदिरों की भित्तियों पर मानव जीवन के हर पहलू को अत्यंत स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। बुंदेलखंड में इस संबंध में एक जनश्रुति है। कहते हैं एक बार राजपुरोहित हेमराज की पुत्री हेमवती संध्या की बेला में सरोवर में स्नान करने पहंुची। आकाश में विचरते चंद्रदेव ने जब स्नान करती नवयौवना की भीगी हुई रूपराशि को देखा तो वह उस पर आसक्त हो गए। उसी पल वह रूपसी हेमवती के समक्ष प्रकट हुए और उससे प्रणय निवेदन किया। कहते हैं कि उनके मधुर संयोग से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसने ही बड़े होकर चंदेलवंश की स्थापना की। समाज के भय से हेमवती ने उस बालक को वन में करणावती नदी के तट पर पाला और उसका नाम चंद्रवर्मन रखा। बड़ा होकर चंद्रवर्मन एक प्रभावशाली राजा बना। एक बार उसकी माता हेमवती ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर, ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए प्रेरित किया जो समाज को ऐसा संदेश दें जिससेसमाज यह समझ सके कि जीवन के अन्य पहलुओं के समान कामेच्छा भी एक अनिवार्य अंग है। ताकि इस इच्छा को पूर्ण करने वाला इंसान कभी पापबोध से ग्रस्त न हो। ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए चंद्रवर्मन ने खजुराहो को चुना। इसे अपनी राजधानी बनाकर उसने यहां 85 वेदियों का एक विशाल यज्ञ किया। बाद में इन्हीं वेदियों के स्थान पर 85 मंदिर बनवाए गए थे। जिनका निर्माण चंदेलवंश के आगे के राजाओं द्वारा जारी रखा गया। यद्यपि 85 में से आज यहां केवल 22 मंदिर शेष हैं। लेकिन उन सब पर जीवन के अनंत उत्सव का गौरवशाली प्रदर्शन उसी तरह विरचित है।
शिल्पकारों ने आस्था से आसक्ति तक जीवन के तमाम संवेगों को इन मंदिरों की भित्तियों पर उतार डाला था। तभी तो यहां सौंदर्यबोध, कलात्मकता और देवत्व का अनन्य संगम देखने को मिलता है। 14वीं शताब्दी में चंदेलों के खजुराहो से प्रस्थान के साथ ही सृजन का वह दौर खत्म हो गया। करीब एक सदी बाद मंदिरों का महत्व भी घटने लगा और धीरे-धीरे ये अतीत की परतों में छिप गए। समय की आंधी ने खजुराहो के दो-तिहाई मंदिरों को तो निगल ही लिया। बाद में बीसवीं सदी के आरंभ में एक अंग्रेज इंजीनियर टी.एस. बर्ट ने नये सिरे से खजुराहो की खोज की। उन दिनों यहां एक छोटा सा गांव और केवल 22 मंदिर शेष थे। खजुराहो गांव से इनकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार ये मंदिर अब पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मंदिर समूह के रूप में विभाजित हैं। खजुराहो के अधिकतर महत्वपूर्ण मंदिर पश्चिमी समूह में ही हैं। आधुनिक खजुराहो इसी मंदिर समूह के सामने बसा है। ज्यादातर होटल, रेस्टोरेंट तथा बाजार यहीं हैं।
मंदिरों के चार समूह
सुबह जल्दी ही हम मंदिरों के दर्शन के लिए चल पड़े। गाइड के साथ हम पहले मंदिर परिसर से बाहर स्थित मतंगेश्वर मंदिर पहुंचे। यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है। जिसे राजा हर्षवर्मन ने 920 ई. में बनवाया था। इस मंदिर में आज भी पूजा-अर्चना होती है। पिरामिड शैली में बने एक ही शिखर वाले इस मंदिर की शिल्प रचना एकदम साधारण है। गर्भगृह में करीब ढाई मीटर ऊंचा और एक मीटर व्यास का एक शिवलिंग है। मंदिर में पहुंचकर हमने भी शिवलिंग के दर्शन कर पुष्प अर्पित किए। वहां से हम मंदिरों के मुख्य परिसर के द्वार पर आए और टिकट लेकर प्रवेश किया। वहां एक विशाल उद्यान में ऊंचे शिखर वाले कई मंदिर हैं। ये सभी ऊंचे चबूतरों पर बने हुए हैं।
परिसर में हमने सबसे पहले लक्ष्मण मंदिर देखा। यह मंदिर 930 ई. में राजा यशोवर्मन द्वारा बनवाया गया था। उन्हें लक्ष्मण के नाम से भी जाना जाता था। पंचायतन शैली में बने इस मंदिर के चारों कोनों पर एक-एक उप मंदिर बना है। मुख्य मंदिर के द्वार पर रथ पर सवार सूर्यदेव की सुंदर प्रतिमा है। आगे बढ़कर मंदिर की वाह्य दीवारों पर जब हमने दृष्टि डाली तो हतप्रभ रह गए। दीवारों पर सैकड़ों मूर्तियां जड़ी थीं। जिन्हें एक ही दृष्टि में देख पाना कठिन था। मूर्तियों के संबंध में जब गाइड ने हमें सिलसिलेवार बताना शुरू किया तो हमारे लिए मूर्तियों की सुंदरता, उनकी भाव-भंगिमा और प्रसंग को समझना आसान हो गया। मूर्तियों की श्रृंखला में तीन कतारों में प्रमुख मूर्तियां थीं। उनके अतिरिक्त कुछ कतारें छोटी मूर्तियों की थीं। मध्य में बने आलों में देव प्रतिमाएं हैं। अधिकतर मूर्तियां उस काल के जीवन और परंपराओं को दर्शाती हैं। इनमें नृत्य, संगीत, युद्ध, शिकार आदि जैसे दृश्य हैं। प्रमुख मूर्तियों में विष्णु, शिव, अग्निदेव आदि के साथ गंधर्व, सुरसुंदरी, देवदासी, तांत्रिक, पुरोहित और मिथुन मूर्तियां हैं। कालीदास के अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका भी इन दीवारों पर उपस्थित है। स्नान के बाद सरोवर से बाहर आती शकंुतला के भीगे सौंदर्य को शिल्पकार ने बड़ी निपुणता से पत्थर पर उकेरा है। केलिक्रीडा के दृश्यों की उन्मुक्त उपस्थिति ने हमें एकबारगी चौंका दिया। हम सोचने लगे कि कामोद्दीपक भावों की प्रस्तुति इतनी बेबाक भी हो सकती है। वह भी एक मंदिर की दीवार पर। एक मूर्ति में तो नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को उत्तेजित करने के लिए नख-दंत का प्रयोग कामसूत्र के किसी सिद्धांत को दर्शा रहा है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की त्रिमुखी प्रतिमा के दर्शन होते हैं। अंदर की दीवारों पर भी मूर्तियां विद्यमान हैं। लेकिन प्रकाश के अभाव में वे स्पष्ट नजर नहीं आतीं। लक्ष्मण मंदिर के चबूतरे पर छोटी-छोटी मूर्तियां हैं। इनमें धर्मोपदेश, नृत्य-संगीत शिक्षा, युद्ध के लिए प्रस्थान के दृश्यों के साथ ही कुछ दृश्य सामूहिक मैथुन के भी हैं। लक्ष्मण मंदिर के सामने दो छोटे मंदिर हैं। इनमें एक लक्ष्मी मंदिर व दूसरा वराह मंदिर है।
उत्सव के दृश्य
वहां से हम विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ गए। उससे पूर्व पार्वती मंदिर भी है। यह नवनिर्मित मंदिर है। दरअसल यहां स्थित मंदिर खंडित हो चुका था। 1880 के आसपास छतरपुर के महाराजा ने यह वर्तमान मंदिर बनवाकर उसमें पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर दी। यह मंदिर अन्य मंदिरों से भिन्न है। आगे स्थित है विश्वनाथ मंदिर जो शिव को समर्पित है। 90 फुट ऊंचे और 45 फुट चौड़े इस मंदिर का निर्माण 1002 ई. में राजा धंगदेव द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर भी पंचायतन शैली में बना है। किंतु इसके चार उप मंदिरों में से दो ही शेष हैं। मंदिर की सीढि़यों के आगे दो शेर और हाथी बने हैं। इस मंदिर की दीवारों पर भी तीन पंक्तियां प्रमुख प्रतिमाओं की हैं। गाइड ने बताया कि प्राय: हर मंदिर में इस तरह की तीन पंक्तियां बनी हैं। यहां इनमें देव प्रतिमा, अष्टदिग्पाल, नागकन्याएं व अप्सरा आदि हैं। अन्य कतारों में उस काल की समृद्धि का चित्रण राजसभा, रासलीला, विवाह और उत्सव के दृश्यों के रूप में है। इनमें वीणावादन करती नायिका तथा पैर से कांटा निकालती अप्सरा पर्यटकों का ध्यान जरूर आकर्षित करती हैं। मुख्य आलों में चामुंडा, वराही, वैष्णवी, कौमारी, महेश्वरी व ब्रह्माणी आदि के बाद अंत के आले में नटेश्वर की प्रतिमा है। गर्भगृह की दीवारों पर शिव अनेक रूपों में चित्रित हैं तथा गर्भगृह में शिवलिंग के दर्शन होते हैं। प्रमुख मंदिर के सामने बड़ा सा नंदी मंडप है। बारह खंबों पर टिके चौकोर मंडप में शिव के वाहन नंदी की छह फुट ऊंची प्रतिमा है।
विश्वनाथ मंदिर देखने के बाद हम हरे-भरे उद्यान के मध्य बने साफ-सुथरे मार्ग से अन्य मंदिरों की ओर चल दिए। अभी तक देवी मूर्तियों के विचारों में मग्न हम चित्रगुप्त मंदिर पहुंचे तो मूर्तिकला का एक और कैनवास हमारे सामने था। यह मंदिर सूर्यदेव को समर्पित है। इसका निर्माण राजा गंडदेव द्वारा 1025 ई. के लगभग करवाया गया था। मंदिर की दीवारों पर अन्य मूर्तियों के मध्य उमा महेश्वर, लक्ष्मी नारायण और विष्णु के विराट रूप में मूर्तियां भी हैं। जन जीवन की मूर्तियों में पाषाण ले जाते श्रमिकों की मूर्तियां मंदिर निर्माण के दौर को दर्शाती हैं। मुख्य प्रतिमाओं के मध्य यहां भी एक पशु की आकृति अधिक संख्या में देख हमने गाइड से पूछा तो उसने बताया कि ये व्याल व शार्दूल की प्रतिमाएं हैं और हर मंदिर पर बनी हैं।
यम की प्रतिमा
चित्रगुप्त मंदिर की दीवारों पर नायक-नायिका को आलिंगन के विभिन्न रूपों में चित्रित किया गया है। गर्भगृह में सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा विराजमान है। निकट ही हाथ में लेखनी लिए चित्रगुप्त बैठे हैं। इन मंदिरों में विदेशी पर्यटक भी बहुतायत में आते हैं। हमने देखा जापान से आए पर्यटकों के एक समूह को एक गाइड उन्हीं की भाषा में मंदिर व मूर्तियों के विषय में बता रहा था। तब हमें पता चला कि खजुराहो और आसपास के पढ़े-लिखे युवकों ने अलग-अलग देशों की भाषाएं सीख कर गाइड के रूप में एक अच्छा रोजगार अपना लिया है। इनकी योग्यता के अनुसार पर्यटन विभाग द्वारा इन्हें अधिकृत किया जाता है। विदेशी पर्यटकों के लिए भी खजुराहो में बिखरी कला संपदा के भी यहां पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। क्योंकि प्राचीन मूर्तियों के अंतरराष्ट्रीय माफिया की नजर हमेशा यहां की मूर्तियों पर रहती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां एक गार्ड एवं एक अटेंडेंट को हर समय तैनात रखा जाता है। ये लोग पर्यटकों को मूर्तियों से छेड़-छाड़ करने से भी रोकते हैं। शायद इसीलिए यहां की दीवारें कुछ भारतीय पर्यटकों की पर्यटन स्थलों पर अपना नाम लिखने की आदत का शिकार नहीं हुई।
चित्रगुप्त मंदिर से कुछ आगे जगदंबी मंदिर है। इसे लोग जगदंबा मंदिर भी कहते हैं। मूलत: यह मंदिर विष्णु को समर्पित था। लेकिन मंदिर में कोई प्रतिमा न थी। छतरपुर के महाराजा ने जब इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तब यहां जगदंबा की प्रतिमा स्थापित कर दी गई। इस मंदिर में अन्य देव प्रतिमाओं के साथ यम की प्रतिमा भी विद्यमान है। यहां भी दीवारों पर कुछ अच्छे मैथुन दृश्य प्रभावित करते हैं। प्रवेश द्वार के सरदल पर चतुर्भुजी विष्णु गरुड़ पर आसीन नजर आते हैं। मंदिर की आलियों में सरस्वती एवं लक्ष्मी की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जगदंबी मंदिर के निकट ही महादेव मंदिर है। इस छोटे मंदिर का मूलभाग खंडित अवस्था में है तथा वेदी भी नष्ट हो चुकी है। प्रवेश द्वार पर एक मूर्ति में राजा चंद्रवर्मन को सिंह से लड़ते दर्शाया गया है। यह दृश्य चंदेलों का राजकीय चिह्न बन गया था।
कामसूत्र के सिद्धांत
इन मंदिरों की कतार में आगे स्थित है कंदारिया महादेव मंदिर। यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। 117 फुट ऊंचा, लगभग इतना ही लंबा तथा 66 फुट चौड़ा यह मंदिर सप्तरथ शैली में बना है। इसके चारों उप मंदिर सदियों पूर्व अपना अस्तित्व खो चुके थे। लेकिन फिर भी इसकी भव्यता में कोई कमी नजर नहीं आती। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसका निर्माण राजा विद्याधर ने मोहम्मद गजनी को दूसरी बार परास्त करने के बाद 1065 ई. के आसपास करवाया था। संभवत: कंदरा के समान प्रतीत होते इसके प्रवेश द्वार के कारण इसका नाम कंदारिया महादेव पड़ा होगा। वाह्य दीवारों पर सुर-सुंदरी, नर-किन्नर, देवी-देवता व प्रेमी युगल आदि सुंदर रूपों में उपस्थित हैं। मध्य की दीवारों पर कुछ अनोखे मैथुन दृश्य चित्रित हैं। एक स्थान पर ऊपर से नीचे की ओर एक क्रम में बनी तीन मूर्तियां काम सूत्र में वर्णित एक सिद्धांत की अनुकृति कही जाती हैं। इसमें मैथुनक्रिया के आरंभ में आलिंगन व चुंबन के जरिये पूर्ण उत्तेजना प्राप्त करने का महत्व दर्शाया है। एक अन्य दृश्य में एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में तीन स्ति्रयों के साथ रतिरत नजर आता है। विशालतम मंदिर की वाह्य दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां हैं तो अंदर भी 226 मूर्तियां स्थित हैं। इतनी मूर्तियां शायद अन्य किसी मंदिर में नहीं है। मंदिर की बनावट और अलंकरण भी अत्यंत वैभवशाली है। कंदारिया महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार नौ शाखाओं से युक्त है। जिन पर कमल पुष्प, नृत्यमग्न अप्सराएं तथा व्याल आदि बने हैं। सरदल पर शिव की चारमुखी प्रतिमा बनी है। इसके पास ही ब्रह्मा एवं विष्णु भी विराजमान हैं। गर्भगृह में संगमरमर का विशाल शिवलिंग स्थापित है। मंडप की छतों पर भी पाषाण कला के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं।
वैसे तो हमने परिसर के सभी मंदिर देख लिए थे किंतु मन अभी भी खजुराहो के शिल्पकानन में ही भटक रहा था। वास्तव में मूर्तिशिल्प के इस विपुल वैभव को एक बार में अपनी स्मृतियों में समेटना असंभव था। एक बार फिर इन मंदिरों को देखने का निर्णय कर हम बाहर आ गए।
भोजन तरह-तरह के
शाम के समय खजुराहो के बाजार में टहलने निकले तो वहां हमें फूड फेस्टिवल का सा नजारा देखने को मिला। सड़क के किनारों पर चाट की दुकानें तो थी हीं, शाकाहारी मारवाड़ी भोजन के रेस्टोरेंट भी नजर आ रहे थे। लेकिन इन सब से बढ़कर उन रेस्टोरेंट के बोर्ड थे जो यह दर्शा रहे थे कि यहां चाइनीज, कांटिनेंटल, जापानी, कोरियन, इजरायली या इटालियन फूड भी उपलब्ध हैं। दरअसल खजुराहो के कई रेस्तराओं में विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए उनके देश का भोजन उपलब्ध कराना आरंभ कर दिया है। इसके लिए उन्होंने पहले उस तरह का भोजन बनाना सीखा है। इसी तरह यहां के दुकानदारों ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए विदेशी भाषाओं के बोर्ड भी लगवा रखे हैं। यहां ज्यादातर दुकानें, हस्तशिल्प, एंटीक वस्तुएं, पारंपरिक परिधान, पिक्टोरियल बुक्स तथा पिक्चर पोस्टकार्ड आदि की हैं। दिन में हमने कई विदेशी पर्यटकों को साइकिल पर घूमते देखा था। पता चला कि घूमने के लिए यहां साइकिल किराये पर मिल जाती है। रिक्शा या ऑटो की तुलना में यह साधन हमें अच्छा लगा। साइकिल पर स्वतंत्र रूप से घूमते हुए स्थानीय जीवन को भी निकट से देखा जा सकता है। हमने भी अगले दिन साइकिल से घूमने का मन बना लिया।
यहां मंदिर सैलानियों के लिए सुबह से शाम तक खुले रहते हैं। सूर्यास्त के बाद पश्चिमी मंदिर परिसर एक बार फिर जीवंत हो उठता है। यहां ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम होता है। कार्यक्रम शुरू होते ही अंधकार में डूबे मंदिर रंग-बिरंगे प्रकाश में नहा उठते हैं। प्रकाश के खूबसूरत संयोजन के साथ खजुराहो के स्वर्णिम दौर की दास्तां भी सुनने को मिलती है। पर्यटकों के लिए यह एक अनोखा अनुभव होता है।
सैर साइकिल पर
अगले दिन हम साइकिल से पूर्वी मंदिरों की ओर चल दिए। ये मंदिर खजुराहो के प्राचीन गांव के निकट थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्थित हैं। इनमें चार जैन तथा तीन हिंदू मंदिर हैं। सबसे पहले हम ब्रह्मा मंदिर पहुंचे। पिरामिड शैली में बना यह छोटा सा मंदिर है। ब्रह्मा की प्रतिमा के साथ यहां भगवान विष्णु और शिव भी उपस्थित हैं। मंदिर में एक शिवलिंग भी है। ब्रह्मा मंदिर से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर वामन मंदिर है। भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित यह मंदिर स्थापत्य शैली तथा प्रतिमाओं के आधार पर 11वीं सदी के उत्तरा‌र्द्ध में बना माना जाता है। इस मंदिर की दीवारों पर प्रेमी युगलों के कुछ आलिंगन दृश्यों को छोड़ ज्यादातर एकल प्रतिमाएं हैं। यहीं शिव विवाह का खूबसूरत अंकन भी देखने को मिलता है।  सप्तशाखाओं से अलंकृत प्रवेश द्वार के बाद गर्भ में वामन की चतुर्भुज प्रतिमा विद्यमान है। जबकि बाहरी आलियों में नृ¨सह एवं वराह अवतार की प्रतिमाएं भी हैं। वामन मंदिर से जरा सा आगे चले जाएं तो जवारी मंदिर है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उनके बैकुंठ रूप में दर्शन होते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर काफी संख्या में मूर्तियां है। इनमें अनेक मैथुन दृश्य भी हैं।
जैन तीर्थ था खजुराहो
अपने स्वर्णकाल में खजुराहो जैन तीर्थ के रूप में भी विख्यात था। आज यहां चार जैन मंदिर स्थित हैं। इनमें से घंटाई मंदिर आज खंडहर अवस्था में है। एक मंडप के रूप में दिखने वाले इस मंदिर के स्तंभों पर घंटियों का सुंदर अलंकरण है। प्रवेश द्वार पर शासन देवी-देवताओं की मनोहारी प्रतिमाएं हैं। जबकि गर्भगृह के द्वार पर शासन देवी चक्रेश्वरी की गरुड़ पर आरूढ़ प्रतिमा है। शेष तीनों जैन मंदिर कुछ दूर एक परिसर में स्थित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पा‌र्श्वनाथ मंदिर। जो राजा धंगदेव के काल में एक वैभवशाली नगर श्रेष्ठी द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर का भू-विन्यास कुछ विशिष्ट है। यहां मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीर्थकर प्रतिमाएं बनी हैं। इनके साथ कुबेर, द्वारपाल, गजारूढ़ या अखारूढ़ जैन शासन देवताओं का सुंदर अंकन भी है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर नवग्रहों के साथ जैन तीर्थकरों के दर्शन भी होते हैं। गर्भगृह में पा‌र्श्वनाथ जी की श्यामवर्ण प्रतिमा विराजमान है। यहीं बराबर में आदिनाथ मंदिर है। इसकी शिखर संयोजना एकदम सादी है। यहां मूर्तियों की पंक्तियों में गंधर्व, किन्नर, विद्याधर शासन देवी-देवता, यक्ष मिथुन व अप्सराएं शामिल हैं। इनमें आरसी से काजल लगाती नायिका तथा शिशु पर वात्सल्य छलकाती माता को देख सैलानी मुग्ध हो जाते हैं। मंदिर के तोरण में तीर्थकर माता के सोलह स्वप्नों का सुंदर चित्रण है और गर्भगृह में आदिनाथ जी की प्रतिमा है। परिसर में स्थित शांतिनाथ मंदिर को प्राचीन मंदिर नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह लगभग सौ वर्ष पुराना मंदिर है। यहां आज पूजा-अर्चना का नियम है। मंदिर में मूलनायक सोलहवें तीर्थकर शांतिनाथ की बारह फुट ऊंची प्रतिमा तथा चित्र दर्शनीय हैं। परिसर के साथ ही साहु शांति प्रसाद जैन कला संग्रहालय भी है। जहां खजुराहो क्षेत्र से प्राप्त सौ से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं।
पूर्वी मंदिरों के बाद हम रास्ता पूछते हुए दक्षिणी मंदिरों की ओर चल दिए। इनमें से एक खोकर नदी के तट पर स्थित दूल्हादेव मंदिर है। यह मंदिर शिव को समर्पित है। इस मंदिर के संरक्षण के लिए वहां कुछ कार्य चल रहा था, इसलिए यह लोहे के जाल से घिरा था। ऐसी स्थिति में यहां बाहरी मूर्तियों को देखना संभव न था। मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग पर एक हजार छोटे-छोटे शिवलिंग बने हैं। यह 12वीं शताब्दी में निर्मित चंदेल राजाओं की अंतिम धरोहर है। चतुर्भुज मंदिर जाने के लिए नदी के पुल को पार कर एक गांव और खेतों के बीच से होकर पहुंचे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर साइकिल चलाने का यह पहला अनुभव था। चतुर्भुज मंदिर एक साधारण चबूतरे पर बना है। इस मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों में दिग्पाल, अष्टवसु, अप्सराएं और व्याल प्रमुखता से हैं। इस मंदिर की दीवारों पर मिथुन मूर्तियों का अभाव है। मंदिर के गर्भगृह में शिव की सौम्य प्रतिमा है। कुछ वर्ष पूर्व चतुर्भुज मंदिर से कुछ दूर एक ओर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उस टीले पर उत्खनन कार्य शुरू करवाया तो एक विशाल मंदिर का खंडित हिस्सा सामने आया। उस स्थान को बीजा मंडल कहा जाता है। यहां अभी उत्खनन कार्य जारी है।
बलुआ पत्थर के बने हैं मंदिर
कला पारखी जब खजुराहो के मंदिरों के भू-विन्यास व उर्ध्व विन्यास पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर मंदिर बलुआ पत्थर के बने हैं। इनमें से कुछ मंदिरों के निर्माण में ग्रेनाइट का प्रयोग भी हुआ है। अपने निर्माण के एक हजार वर्ष पूरे कर रहे इन मंदिरों की निर्माण शैली भी विशिष्ट है। पर्वत के समान ऊंचे उठते ये मंदिर बाहरी तौर पर देखें तो रथ शैली में बने कहे जाते हैं। इनमें से चित्रगुप्त मंदिर, जगदंबी मंदिर और चतुर्भुज मंदिर त्रिरथ शैली में बने छोटे मंदिर हैं। लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर और दूल्हादेव मंदिर पंचरथ शैली में बने हैं तथा कंदारिया महादेव सप्तरथ शैली का बेजोड़ नमूना है। आंतरिक तौर पर इनकी शैली सांधार व निरंधार रूप में है। सांधार शैली के मंदिरों का आतंरिक भाग अ‌र्द्धमंडप, महामंडप, अंतराल, गर्भगृह और प्रदक्षिणा पथ के रूप में पांच भागों में विभाजित है। जो मंदिर निरंधार शैली में बने हैं, उनमें प्रदक्षिणा पथ का अभाव है। खजुराहो मंदिरों के बहिरंग व अंतरंग के अलंकरण के रूप में मूर्तियों का प्राचुर्य तो जैसे इनका गौरव है। इष्ट देवताओं की प्रतिमाओं के अलावा नारी सौंदर्य तथा कामकला की मूर्तियां यहां सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। पाषाण पर हथौड़े-छेनी का प्रयोग शिल्पकारों ने इतने सधे ढंग से किया है कि उनकी प्रशंसा किए बिना कोई पर्यटक वापस नहीं जा सकता। प्रत्येक मूर्ति पर नारी शरीर की कोमलता और सौष्ठव का हर पक्ष स्पष्ट झलकता है। आकर्षक ग्रीवा, उन्नत वक्ष, बल खाते कटि प्रदेश और उभरे नितंबों के साथ कमनीय देह की हर लोच और लचक यहां विद्यमान है। नारी जीवन के अनेक प्रसंग यहां मौजूद हैं। कहीं वह वेणी गूंथ रही है तो कहीं दर्पण में अपने सौंदर्य को निहार रही है, कहीं पगतल में आलता लगा रही है तो कहीं प्रेम पाती पढ़ रही है। हर प्रसंग में उनकी भावभंगिमा अर्थपूर्ण नजर आती है। यह तय है कि इतनी उत्कृष्ट मूर्तियों के रचनाकार कलाजीवी नहीं, कलासाधक रहे होंगे।
समझ से परे
मंदिर की भित्तियों पर जब जीवन के हर आयाम को उकेरने का प्रयास किया जा रहा था तो वे महान रचनाकार भला दैनिक रागात्मकता से उभरे आनंद को उकेरने में कैसे चूकते। इसलिए प्राय: हर मंदिर पर प्रेमपूरित प्रस्तर प्रतिमाएं विद्यमान हैं। अन्य मूर्तियों की तुलना में मूर्तियों की संख्या बहुत कम है। किंतु फिर भी काम कला का हर रूप यहां नजर आता है। वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित अनेक आसन भी खजुराहो की मैथुन प्रतिमाओं में अंकित हैं।
इन सबमें सामूहिक मैथुन के दृश्य तो दर्शकों के मन में एक अलग तरह का कौतूहल पैदा करते ही हैं, किंतु पशु मैथुन के गिने-चुने दृश्यों का रहस्य समझ से परे है। यहां स्थित रति दृश्यों में कुछ तो वास्तव में इतने उत्कृष्ट बन पड़े हैं कि उनसे चरम अनुभूति का भाव भी झलकता है। ऐसे रति दृश्य खजुराहो की महानतम कलाकृति कहे जा सकते हैं। मूर्ति शिल्प की उत्कृष्टता यह भी दर्शाती है कि ये मैथुन मूर्तियां किसी तरह के पूर्वाग्रह या कुंठा से उपजी हुई रचनाएं नहीं है। किंतु धार्मिक स्थलों पर इनकी उपस्थिति सामान्य जन के मन में कई तरह के प्रश्नों को भी जन्म देती है। आखिर उपासना के पथ पर भोग-विलास का क्या अर्थ है? भक्ति के साथ भोग का क्या मेल? लेकिन ऐसे दृश्यों का उत्तर न तो मंदिर की दीवारों पर मिल सका और न किसी शिलालेख पर ही।
इस संदर्भ में जो भी मत सामने आते हैं, वे सब अनुमान पर ही आधारित कहे जा सकते हैं। एक मत है कि ये मूर्तियां यहां अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के सिद्धांत का हिस्सा हैं। इस विषय में यह भी कहा जाता है कि ये प्रतिमाएं भक्तों के संयम की परीक्षा का माध्यम हैं। जो इन काममग्न मूर्तियों के प्रभाव से मुक्त रह पाएगा, वही मंदिर में अपने इष्टदेव के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करेगा। ऐसे भी लोग हैं जो हेमवती की कथा को ही सत्य मानते हैं।
एक मत यह भी है कि चंदेल राजाओं के काल में इस क्षेत्र में तांत्रिक समुदाय की वाममार्गी शाखा का वर्चस्व था। जो योग तथा भोग दोनों को मोक्ष का साधन मानते थे। ये मूर्तियां उनके क्रियाकलापों की ही देन हैं। बहरहाल स्थापत्य की इस विधा के मूल में कारण और औचित्य चाहे कुछ भी रहा हो, यह तो निश्चित है कि उस काल की संस्कृति में ऐसी कला का भी महत्वपूर्ण स्थान था।
प्रकृति की संपदा निराली
खजुराहो में पर्यटकों के लिए पुरातत्व महत्व का एक और आकर्षण पुरातत्व संग्रहालय है। जहां प्राचीन मंदिरों तथा प्रतिमाओं के अवशेष संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त चौसठ योगिनी मंदिर, लालगुआन महादेव मंदिर तथा शिवसागर झील भी देखने योग्य जगहें हैं। खजुराहो के आसपास भी कुछ दर्शनीय स्थल हैं। केन नदी के तट पर स्थित एनेह फॉल वहां से 19 किलोमीटर दूर है। काफी ऊंचाई से गिरता यह झरना अनोखा प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर 7 किलोमीटर दूर बेनी सागर झील एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है। पन्ना मार्ग पर 34 किलोमीटर दूर पांडव जल प्रपात भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां से आगे निकल जाएं तो पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में अनेक वन्य प्राणियों को उनके वास्तविक परिवेश में स्वच्छंद विचरण करते देख सकते हैं।
एक शाम खजुराहो में हमें लोकनृत्यों से झूमती सांस्कृतिक संध्या देखने का अवसर मिला। जिसमें मध्यप्रदेश के साथ अन्य राज्यों के नृत्य भी प्रदर्शित किए गए। वैसे खजुराहो में सांस्कृतिक गतिविधियां अधिक नहीं हैं। फिर भी जैन मंदिरों में होने वाला पालकी महोत्सव, होली पर जल विहार वार्षिक मेला तथा शिवरात्रि पर लगने वाला मेला कुछ धार्मिक आयोजन हैं। इनमें स्थानीय पर्यटक अधिक होते हैं। दिसंबर में यहां लोक नृत्यों का राष्ट्रीय समारोह लोकरंजन भी पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। इसके साथ ही उस समय लोक आभूषण एवं लोकवादकों की प्रदर्शनी भी लगती है। लेकिन देश-विदेश के पर्यटकों को यहां सबसे ज्यादा लुभाने वाला कार्यक्रम हर वर्ष मार्च में होने वाला खजुराहो नृत्य समारोह है। इस समारोह में देश के विभिन्न शास्त्रीय नृत्यों की जानी-मानी प्रतिमाएं अपनी प्रतिमा का प्रदर्शन करती है। यूं भी भारत के शास्त्रीय नृत्य मंदिरों से सदा ही जुड़े रहे हैं। इस उत्सव के सहारे हर वर्ष इन नृत्यों की थाप मंदिर प्रांगण में सुनने को मिलती है। पृष्ठभूमि में नजर आते आलीशान मंदिर हर नृत्य को अनोखी भव्यता प्रदान करते हैं।
वास्तव में अद्भुत हैं खजुराहो के ये कला तीर्थ। सर्वोत्तम मूर्तिकला, सुव्यवस्थित शिल्पकला तथा उत्कृष्ट वास्तुकला की यह मुक्ताकाश दीर्घा सदियों तक कलाप्रेमियों और सौंदर्य उपासकों को आकर्षित करती रहेगी। sabhar :http://www.jagranyatra.com/

Read more

चमत्कारः पानी छूते ही लड़की से उठती हैं लपटें

0


जल जीवन 'नहीं' है


जल जीवन 'नहीं' है

शायद ही आपने किसी को ऐसा कहते सुना होगा जिसके लिए पानी का मतलब मौत के बराबर हो। जिस पानी को हम जीवन के आधारभूत के तौर पर जानते हैं, रशेल के लिए वही परेशानी का सबब है।उनके लिए पानी का छू जाना भी चिंता का कारण है। जानना चाहेंगे ऐसा क्यों?


क्या बीमारी है ये?

पानी से है एलर्जी

26 साल की रशेल को पानी से एलर्जी है। इसका मतलब ये है कि जब पूरी दुनिया बारिश का मजा लेती है वो कमरे में कैद रहती हैं। इसकी वजह ये हे कि अगर पानी की एक बूंद भी उनके शरीर पर गिरी तो उन्हें एलर्जी हो जाती है और उनके पूरे शरीर पर निशान पड़ जाते हैं।

रशेल को एक्वाजेनिक प्रुरिटिस नाम की बीमारी है। जिसका मतलब ये है कि उन्हें पानी से एलर्जी है। जिसकी वजह से वो बहुत ज्यादा समय तक नहा नहीं सकती न ही ठंडा पानी पी सकती हैं।

ये एक दुर्लभ किस्म की बीमारी है। वो बताती है कि घर से बाहर निकलने से पहले वो सौ बार सोचती हैं। sabhar :
http://www.amarujala.com/

Read more

Ads

 
Design by Sakshatkar.com | Sakshatkartv.com Bollywoodkhabar.com - Adtimes.co.uk | Varta.tv