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गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

पॉर्न मैगजीन पर बनेगी फिल्म

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photo : googale


1980 का दशक वह दौर था जब पीली पन्नी साहित्य अपने जोरों पर था और रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर जमकर बिका करता था. मॉर्निंग शो में लगने वाली फिल्मों का अच्छा-खासा दर्शक वर्ग हुआ करता था, और स्कूल से गोल होने वाले बच्चे अकसर इन फिल्मों को देखने के लिए कतार में लगे नजर आते थे. अकसर सिनेमा सबकी पहुंच में नहीं था, ऐसे में पीली पन्नी की किताबें ही मसाले का असली औजार हुआ करती थीं. इसी दुनिया में एक नाम मस्तराम का भी था.
हीरो मस्तराम
शायद दो दशक पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि फॉरबिडन संसार में ले जाने वाला मस्तराम कभी सिल्वर स्क्रीन पर भी आ सकेगा. यह वह लेखक है जिसे न कभी लाइब्रेरी, न स्कूल, न घर के स्टडी रूम में पढ़ा गया, लेकिन फिर भी वह बंद कमरों, बाथरूम, बेडरूम और यारो-दोस्तों की टोलियों का हिट नाम बन गया. फिल्म की कहानी को भी काफी दिलचस्प अंदाज में पेश किया गया है. यह छोटे से कस्बे के बैंक क्लर्क राजाराम की कहानी है जो दिल्ली आकर बड़ा लेखक बनने का ख्वाब देखता है. उसे साहित्य में कामयाबी नहीं मिलती है. पब्लिशर उससे गर्म और मसालेदार कहानियां चाहता है, साहित्य टाइप नहीं. एक दिन गली में उसकी नजर सी ग्रेड फिल्म के पोस्टर पर पड़ती है तो उसे सारी बात समझ में आ जाती है, बस उसके बाद से पड़ोसन, दूध वाली और अपनी बीवी तक उसे अपनी बोल्ड कहानियों की पात्र लगने लगती हैं. इस तरह मस्त साहित्य लिखने वाले का नाम ही मस्तराम पड़ जाता है. फिल्म के ट्रेलर में बोल्डनेस का जमकर इजहार हो रहा है.

मस्तराम का फॉरबिडन संसार
मस्तराम की दुनिया में कोई भी कुछ भी कर सकता है. यहां पड़ोस की चालू आंटियां, हॉट भाभियां, बेवफा पत्नी, सेक्सी कामवालियां, परफेक्ट दूधवाली और न जाने-जाने क्या-क्या नहीं है. यह वह संसार है, जहां कुछ भी वर्जित नहीं और सब चलता है. अखिलेश जायसवाल की मस्तराम उसी अनजान शख्स की काल्पनिक कहानी है, जिसे कभी किसी ने देखा नहीं,जाना नहीं लेकिन उसके फॉरबिडन संसार की भाभियों, आंटियों, काम वालियों ने न जाने कितनों की नींदें उड़ाई हैं.

बोल्ड सिनेमा का दौर
यह भारतीय सिनेमा में बदलाव का दौर है. यहां हर तरह की कहानियां लिखी जा रही हैं. चाहे सिल्क स्मिता की डर्टी पिक्चर हो या फिर अजय बहल की बी.ए.पास जो साल 2013 की चर्चित फिल्मों में रही. हाल ही में रिलीज हुई मिस लवली भी हमें ऐसे संसार में ले गई थीः सी ग्रेड फिल्मों का संसार. सनी लियोन की रागिनी एमएमएस-2 पहले ही अपनी बोल्डनेस की वजह से सुर्खियों में है, अब बारी मस्तराम की है. मस्तराम पिछले तीस साल से इसी नाम से छप रही है. फिल्म में राहुल बग्गा मस्तराम बने हैं जबकि ताशा बेरी उनके साथ लीड में हैं. देखें पटरी का यह बादशाह फिल्म में कहां तक जाता है.
sabhar :
http://aajtak.intoday.in/


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कैमरे में कैद हुआ सिर कटा भूत

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पब में भूत


पब में भूत

एक ओर जहां पब मस्ती-मजा करने की जगह होती है वहीं ब्रिटेन के एक पब में भूतों का बसेरा है। ये पब, ब्रिटेन के सबसे पुराने पब में से एक है। करीब 750 साल पुराने इस पब के लोगों का कहना है कि उन्होंने पब के भूत को कैमरे में कैद किया है।

'ये ओल्ड मैन एंड स्काइथ पब' के सीसीटीवी कैमरे में भूत की तस्‍वीरें कैद करने का दावा किया गया है। हालांकि इस वीडियो के आने से पहले ही ये पब, भुतहा पब के नाम से जाना जाता है।

कब हुई भूत की रिकॉर्डिंग?

ये रिकॉर्डिंग वैलेंटाइन डे के रात की है। सुबह करीब 6:18 बजे के वीडियो में एक आकृति दिखाई देती है और फिर गायब हो जाती है। जिसके बाद से सीसीटीवी कैमरा भी काम करना बंद कर देता है।

पब के मैनेजर टोनी डूले ने अगले दिन जब फ्लोर पर टूटे गिलास के टुकड़े देखे तो सीसीटीवी फुटेज निकलवाई। उन्होंने ही इस पूरे मामले की जानकारी दी।


किसकी आत्मा?


किसकी आत्मा?

दरअसल, इस पब के बारे में माना जाता है कि यहां सातवें अर्ल ऑफ डर्बी जेम्स स्टेनले की आत्मा भटकती है। जिन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम दिन यहीं बिताए थे।

डेली मेल के अनुसार, इस वीडियो के पीछे कई तरह के विचार है, कुछ इसे इलेक्ट्रिसिटी समस्या से जोड़कर देख रहे हैं।

sabhar :http://www.amarujala.com/


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सेक्स चिप का जमाना

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सेक्स चिप का जमाना

वायग्रा बीते दिनों की बात हो चुकी है, अब जमाना बढ़ रहा है सेक्स चिप की ओर। सेक्स चिप के बारे में आ रहीं रिपोर्ट्स की मानें तो वैज्ञानिक इन दिनों एक ऐसे डिवाइस पर काम कर रहे हैं जिसे दिमाग में फिट किया जा सकेगा और इससे सेक्स का आनंद कई गुना बढ़ जाएगा।
(Getty) 




वायग्रा को भूल जाइए, क्योंकि अब साइंटिस्ट ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सेक्स चिपपर काम कर रहे हैं जो आपको उत्तेजित करेगा। दरअसल, यह चिप ब्रेन के उस हिस्से को उत्तेजित करेगा, जो सेक्स स्टिम्युलेशन में मदद करता है। 

इस चिप के तैयार होने में करीब दस साल या इससे भी ज्यादा लग सकते हैं। इस चिप के जरिए सेक्स के मामले में ब्रेन को डीप स्टीम्युलेट करने में मदद मिलेगी। इसके तहत इम्प्लांटिड इलेक्ट्रोड से ब्रेन को हल्का सा शॉक दिया जाएगा, जिससे ब्रेन के प्लेज़र सेंटर को स्टीम्युलेट किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल इससे पहले भी पार्किसन्स डिज़ीज़ के ट्रीटमंट के लिए किया जाता रहा है। 

पिछले दिनों साइंटिस्ट ने ब्रेन के उस हिस्से पर ध्यान दिया है, जो आंखों के ठीक पीछे का हिस्सा है और इसे ऑरबिटोफ्रॉन्टल कॉरटेक्स कहते हैं। ब्रेन का यह हिस्सा सेक्स संबंधी फीलिंग से जुड़ा होता है, जो खान-पान या सेक्स आदि से उत्तेजित होता है। 

यह रिसर्च ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डिपार्टमंट ऑफ साइकायट्री के मॉर्टन क्रिंगलबैक द्वारा किया गया। उन्होंने पाया कि ऑर्बिटोफ्रन्टल कॉर्टेक्स इस नए स्टीम्युलेशन टार्गिट का भी हिस्सा बन सकता है, जो एन्हेडोनिया जैसे डिप्रेशन डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों की मदद कर सकता है। मॉर्टन के कॉलीग और ऑक्सफोर्ड के जॉन रेडिक्लिफ के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रफेसर टीपू अज़ीज़ ने कहा है कि इस सेक्स चिप की अहमियत अगले दस साल तक खुलकर सामने आएगी। उन्होंने पिछले सप्ताह कहा था कि यह चिप बखूबी काम करता है और इसका सबूत भी है। 

उन्होंने बताया, 'कुछ साल पहले एक साइंटिस्ट ने एक ऐसी महिला के ब्रेन में इस तरह का डिवाइस इम्प्लांट किया था, जिनमें लो सेक्स ड्राइव की समस्या थी। इस डिवाइस की मदद से वह महिला काफी अधिक सेक्सुअली ऐक्टिव हो गईं। उन्हें खुद में अचानक आया यह बदलाव पसंद नहीं आया, इसलिए उनके सिर से उस वायरिंग को निकाल दिया गया। 

अज़ीज़ का कहना है कि दरअसल इस वायरिंग से एक और बाधा है कि कुछ पेशंट में इस वजह से ब्लीडिंग आदि की समस्या भी पैदा हो सकती है। पर, नए टेक्नॉलजी से ऐसी कोई समस्या नहीं होगी, जिसमें सर्जरी के जरिए हार्ट पेसमेकर से लेकर ब्रेन तक वायर को कनेक्ट किया जाएगा। 

उन्हें उम्मीद है कि वर्ष 2015 तक जब टेक्नॉलजी और भी बेहतरीन होंगी तो इस तरह का डिवाइस खुद अपने हाथ से कंट्रोल किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि हम इस डीप ब्रेन स्टीम्युलेशन का इस्तेमाल शरीर के और भी अन्य हिस्सों पर कर सकेंगे। तब यह और भी छोटा होगा, जिसके पावर को आप अपनी इच्छा के अनुसार कंट्रोल कर सकते हैं और इसे ऑन या ऑफ कर सकते हैं। 

वैसे हम एक बात आपको ज़रूर बताना चाहेंगे कि इस तरह की डिवाइस 1968 में बनी जेन फॉन्डा की फिल्म 'बारबरेला' में भी दिखाई जा चुकी है।







SABHAR  :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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जादू - टोना क्या सच में होता है ?

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जादू - टोना क्या सच में होता है ?! अगर नहीं होता तो यह शब्द प्रयोग कैसे हुआ,क्यूँ हुआ ! प्राचीन काल में यह अधिक प्रयुक्त हुआ,आज भी इसके अंश विराजमान हैं।

जादू-टोना और नज़र लग जाने में फर्क है,नज़र तो अपनों की भी लग जाती है  …. परन्तु जादू-टोना एक अलग क्रिया है  . अनेक किताबें इस उद्देश्य से मिलती हैं,कई लोगों का खर्चा पानी इस जादू को करने और उतारने से बंधा होता है  .

पूजा के मन्त्रों का उच्चारण हम निरंतर करते हैं ताकि ऊपरवाले का वरद हस्त रहे  … ठीक उसी प्रकार बुरी चाह को निरंतरता में चाहना,उसके लिए विशेष पूजा करना एक खलल अवश्य उत्पन्न करता है,अनर्थ नहीं कर सकता  .

ऐसा सम्भव होता तो सब अमीर होते,सबके पति,सबकी पत्नियाँ वशीकरण मंत्र के जादू से वश में होते ! न बेरोजगारी होती ! यह सब मानसिक कमजोरी का प्रतीक है - कितनी सिद्धियाँ हासिल करके कोई अमर हुआ है भला !

कभी भी जीवन में एक पक्ष नहीं होता,एकपक्षीये व्यवहार उद्विग्न करता है,एकपक्षीये सामाजिक न्याय बीमार करता है और ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति उलजलूल हरकतें करता है - या तो लम्बी ख़ामोशी या तो प्रलाप या फिर सर पटकना  …देखनेवाले घटना की तह में नहीं जाते - आसानी से कह देते हैं कि किसी ने कुछ कर दिया है  .

स्थिति से तंग इंसान वही करने लगता है जो सामनेवाला देखना चाहता है  ! खैर, इसके बावजूद =
जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
कहाँ थे कंकड़, पत्थर?
कहाँ थी काई ?
वर्तमान में जीवंत हो जाते हैं॥
नज़रिये का पुनर्आंकलन
मासूम ज़िन्दगी से जुड़ जाते हैं...
जो हिदायतें अभिभावकों ने दी थी
वो अपनी जुबान पर मुखरित हो जाते हैं!
हमने नहीं मान कर क्या खोया
समझने लगते हैं
नज़र, टोने-टोटके पर विश्वास न होकर भी
विश्वास पनपने लगते हैं!
"उस वृक्ष पर डायन रहती है...."
पर ठहाके लगाते हम
अपनी मासूम ज़िन्दगी का हाथ पकड़ लेते हैं
"ज़रूरत क्या है वहाँ जाने की?"
माँ की सीख, पिता का झल्लाना
समय की नाजुकता समय की पाबंदी
सब सही नज़र आने लगते हैं!
पूरी ज़िन्दगी के मायने
पूरी तरह बदल जाते हैं

ये तो हुई मेरी सोच - अब लेते हैं औरों के विचार सम्भावना और घटना के आधार पर =

Anamika Ji मैं नहीं मानती, क्यूंकि कभी विश्वास करने के लिए आत्मा ने गवाही नहीं दी और कहते हैं न की घायल की गति घायल जाने। …तो (भगवान् न करें) जब तक हम ऐसे अनुभवों से न गुजरे हों तब तक ऐसी डरावनी और दन्त-कथाओं पर विश्वास नहीं होता।

Ashish Rai जादू टोना , काला जादू , बचपन में सुनी किम्वदंतियां , कुछ आँखों देखी घटनाएँ , मेरे इस विश्वास को पुष्ट कर गई की ये मानव की अवचेतन में उसकी विफलता के बाद पैदा हुई कुंठा या निराशा को पहली सीढ़ी बना लेती है , अगर मनुष्य अन्धविश्वास को पास भी फटकने देता हो तो . समाज के निचले तबके में अभी भी घटनाएँ सुनने को मिलती है जो केवल अन्धविश्वास और अशिक्षा की परिचायक है .


Vibha Shrivastava महालया के दिन से पूरा दसो दिन दशहरा तक ,माँ ,सब भाई बहन को तलुआ और नाभि में काजल का टीका कर देती थीं .....हर साल …. पूछने पर बताती थीं कि कल से दशई शुरू हो रहा है …. ये जादू टोना से रक्षा करेगा …. दशई में डायन ,जादू टोना करती है और नई डायन बनने का अवसर भी होता है ..... मेरे गांव के दुर्गा जी के मंदिर में मंगलवार और रविवार की रात को {अझौती उझौती} झाड़-फूंक होता है …. भुत-पिचास को भगाने के लिए ….
बिहार के न्यूज -पेपर में रोज एक खबर रहती है कि डायन बता कर ,नंगा कर पुरे गांव में घुमाया गया …. मैला पिलाया गया। …
मेरी सासु जी को जादू टोना पर पूरा विश्वास था। …। वे बताती थीं की डायन होती है जो जादू टोना करती है। …. वो ही बताई थीं कि मेरे ससुराल में एक और ससुर जी के नौकरी के दौरान एक ,दो डायन से उनकी मुलाक़ात हुई है ,जिसका अनुभव वे बताती थीं। …।
उनका ही बताया किस्सा है। …।
उनके पड़ोस में डायन रहती थी जो जादू-टोना करती थी। …डायन का जादू टोना करने तरीका था ,खाने के चीजो का इस्तेमाल करना जो बच्चो को प्रभावित करता था . जब मेरे छोटे वाले देवर ४-६ महीने के रहे होंगे। …. एक दिन वो रोना शुरू किये। …। रोते गए ,रोते गए। …. कोई उपाय काम नहीं कर रहा था। …. रोने के कारण लग रहा था कि अब उनकी साँस टूटी। … आज वे नहीं जिन्दा रह सकेंगे। …. दोपहर से शाम ,शाम से रात हो गई। …. देवर जी चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। …. ना कुछ खाना। …. ना कुछ पीना। …। बच्चे की रोने की आवाज सुन आस पास के लोग जुट गए। …. भीड़ में से ही कोई बोला कि हम सब आ गए। …. आपकी पड़ोसन नहीं आई है जो इतनी पास है। …. तब मेरी सासु जी को याद आया कि दो पहर में पड़ोसन के घर से कुछ खाने की चीज आई थी जो आदतन वे खाई थी {वे सबसे पहले खा लेती थी कि जादू का असर बच्चो पर ना हो। …. कही से कुछ भी आता। … ये आदत उनकी अंत तक रही} उस समय देवर जी उनका दूध पी रहे थे। … सासु जी का माथा ठनका। … वे अपने आँगन से ही पड़ोसन को पुकारी और बोली कि आप मेरे घर आइये। …
पड़ोसन :- इतनी रात को मैं आपके घर क्यूँ आऊं । ….
सासू जी :- मेरा बेटा को देखिये ना। …. रोये जा रहा है। …
पड़ोसन :- तो उसमें मैं क्या कर सकती हूँ। …. अब तो मैं सोने जा रही हूँ। ।
सासू जी :- आप कुछ देर के लिए आइये। …
सासू जी बुलाती रही। …. पड़ोसन इनकार कराती रही। ….
सासु जी का धैर्य कमजोर हो चूका था ,टूट गया। …. वे चिल्ला पड़ी। … आज आपके घर से खाने का सामान आया था ,जिसके कारण मेरे बेटे की ये हालत हुई है। …. वो तो नहीं बचेगा। … अगर आप अपना जादू नहीं वापस कराती हैं तो। …. मैं तो बेटा खो दूंगी। …. लेकिन कल आप को भी मैं जिन्दा नहीं रहने दूंगी। …. पुरे समाज के सामने ये बहस हो रही थी। …. उस पड़ोसन को बे मन से आना पडा। …. आते ही वे बोली मेरे सासू जी से कि हाँथ में तेल लगा कर पीठ ससार दो। …। पीठ पर सासू जी का तेल लगा हथेली लगते ही देवर जी एक दम से चुप हो गए और सबके सांस में सांस आई। ....
abhi aur baaki hai ..... milate hain ..... pet pujaa ka sawaal hai ........


Sadhana Vaid जादू टोने में तो मेरा विश्वास नहीं है ! ऐसा कुछ मेरे सामने घटित भी नहीं हुआ जो जादू टोने पर विश्वास करने के लिये मुझे कायल कर सके लेकिन हिप्नोटिज्म पर मेरा विश्वास है और हिप्नोटाइज़होने के बाद अपनी बुद्धि, विवेक, तर्कशक्ति सब कुछ भुला कर हिप्नोटाईज़ करने वाले के इशारों पर चलते हुए मैंने समझदार एवँ वयस्क लोगों को भी देखा है ! शायद यह जादू टोने का ही परिमार्जित रूप हो !


Saras Darbari  रश्मि जी गाँव,कस्बों में आज भी लोग जादू-टोना करते हैं। … और अफ्रीकन 'वूडू' तो बहुत मशहूर है, जहाँ पुतले बनाकर उन्हें टॉर्चर किया जाता है . जिस भी व्यक्ति पर काला जादू करना होता है ,उसकी शक्ल की एक गुड़िया बना दी जाती है और उसे जैसे जैसे टॉर्चर करते हैं - वही पीड़ा वह इंसान महसूस करता है - यह तो जग विदित है ! वैसे हम उस पर विश्वास करते हैं,क्यूंकि हमारी आँखों देखि घटना है . कैसे होता है - ये तो मैं नहीं जानती,क्योंकि मैं स्वयं अवाक रह गई थी देखकर ! कोई तर्क,कोई जवाब नहीं था मेरे पास उसे समझने का - पर ये सच था। क्योंकि मैंने देखा तो मेरा मानना है कि जादू-टोना होता है !


Jyoti Khare जीवन में कब क्या हो जाऐ कहा नहीं जा सकता, जो लोग जादू टोना झाड़ फूंक
को नहीं मानते थे पर जब मुसीबत आयी तो झड़वाते मिले,और जो मानते थे,वे
नहीं मानते मिले-
अम्मा बताती हैं ,दादाजी के पिताजी को रायपुर से मूठ (एक खप्पर पर दिया जलता हुआ आकाश मार्ग से आता है ) भेजी गयी थी मारने के लिए,
कादंबनी के बहुत पुराने अंकों में जादू टोना भूत चुडैल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी
उपलब्ध है.
बच्चों की नजर उतारना,सूखा रोग में झड़वाना एक तरह का जादू टोना ही है,
आधुनिक सोच वाले इसे किवदंती कथा मानते हैं ,हो सकता है यह सही हो
पर आज भी इसे नाकारा नहीं जा सकता-


Gunjan Shrivastava हाँ मैं जादू टोने को मानती हूँ ...इससे मानसिक रोगों का इलाज होता है .. और सफल भी रहता है .... लेकिन शारीरिक तकलीफ या रोगों इलाज सिर्फ़ दवा ही कर सकती है ...यहाँ जादू टोना बेअसर होगा .


Sangita Puri 'जादूटोना' शब्‍द की उत्‍पत्ति ही जादू से हुई है , भले ही प्राचीनकाल में आम जनता के भरपूर मनोरंजन के ध्‍येय से 'जादू' के नियमों को उनसे छुपाया जाता था .. पर आज स्‍पष्‍ट है कि 'जादू' के सारे खेल हाथ की सफाई और विज्ञान के नियमेां के ही खेल हैं .. पर इसके नियमों को न समझने से लोगों को जादूगर असीम शक्ति के मालिक दिखने लगे जो कोई अनहोनी कर सकते हैं ... इसलिए उससे भय खाना स्‍वाभाविक था ... पर हिप्‍नोटाइज या कुछ अन्‍य तरह की तंत्र शक्तियां नहीं होती हैं .. कोई सिद्धि नहीं हो सकती ..ऐसा कहना भी सटीक नहीं ... क्‍योंकि इस विषय में बहुत सारे लोगों के तरह तरह के अनुभव हैं ... और सबको एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता ... पर मेरा मानना है कि किसी भी प्रकार की शक्ति का प्रभाव आपपर तब ही पडता है जब आप मन से कमजोर होते हो ... ठीक उसी तरह जैसे किसी भी बीमारी का प्रभाव तब आपपर पडता है जब आप शरीर से अस्‍वस्‍थ होते हैं ... ठीक उसी तरह जैसे किसी भी असामाजिक तत्‍वों का प्रभाव आपपर तब ही पडता है जब आपके ग्रहों का ऋणात्‍मक प्रभाव आरंभ होता है ... इसलिए तन मन को हमेशा मजबूत बनाए रखें और बाकी चीजों को ईश्‍वर पर छोड दें ... ग्रहों का धनात्‍मक प्रभाव शुरू होते ही कोई भी ऋणात्‍मकता आपपर हावी नहीं हो सकती ...


Anulata Raj Nair आज तक कोई जादू हुआ नहीं......कभी किसी और के साथ होते देखा नहीं...तब कैसे मान लूँ?? टोन टोटके करते देखा ज़रूर है मगर उसके परिणाम बेतरतीब थे...याने जो होना था वो हुआ बस टोने को बेवजह ही क्रेडिट मिला......हाँ मगर लगता है कि काश कोई जादू होता कभी मेरे साथ भी


Shikha Varshney कहानियां तो बहुत सुनी हैं। पर खुद कभी देखा नहीं। यहाँ तक कि मुझे तो ये मेजिक खेल/ शो भी नहीं पसंद। हाँ लोगों को टोटके करते जरूर देखा है। पर वो भी कभी अपने गले से नीचे तो उतरे नहीं। हालाँकि आज भी काला जादू जैसी चीजें खुलेआम सुनने में आती हैं और इन्हें झाड़ने, उतारने वालों के बिंदास विज्ञापन भी दिए जाते हैं। पर मैं तब तक किसी भी चीज पर विश्वास नहीं कर सकती जब तक खुद उसकी प्रत्यक्ष गवाह न बन जाऊं।


Kavi Kishor Kumar Khorendra जादू टोना अपने मन की भड़ास निकालने का एक तरिका हैं
जब हम किसी के द्वारा किये जा रहे अत्याचार का विरोध नहीं कर पाते हैं
तो उससे उत्पन्न क्रोध को ,विरोध को , जाहिर करने के लिए
प्रगट रूप से ऐसा व्यवहार करते हैं जो खुद के लिए हानिकारक तो होता हैं
परन्तु उससे अप्रत्यक्ष रूप से अन्याय करने वाले के ह्रदय को भी चोट पहुंचती हैं
या उसके मन को पीड़ा होती हैं /


Vibha Shrivastava जब मैं गर्भवती हुई और जब तक राहुल{मेरा बेटा} छ महीने का नहीं हो गया ,मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। …। उन दौरान मैं सोचती ,कि। ……
कैसे
किसी को उलटी होता होगा। ….
खाने की इच्छा नहीं होती होगी। ….
किसी चीज का गंध परेशान करता होगा
उपर्युक्त बाते मेरे साथ होती तो। ….
रईसी जिंदगी गुजराती ना (*_*)
नाज़ नखरे लोग उठाते
डॉ से दिखलाया जाता
अल्ट्रा साउंड होता सी डी बनता
गोल्डन मेमोरी होता ना (*_*)
खैर
ऐसा कुछ नहीं होना था न हुआ
समय गुजरा बिना लेबर पेन का नार्मल डिलीवरी से बेटा भी पैदा हो गया
वो भी ऐसा कि ना जागता और ना रोता
उसे सोये में तेल लगाना ,नहलाना हो जाता था …. कान मल मल कर दूध पिलाना होता था ,क्यूँ कि कान दर्द से मुंह खोल देता था। ....
दिन भी चैन से गुजरता और रात भी सुकून से गुजर जाता

रोता जागता तो घर के कामों से भी मुक्ति मिलती और लोगों से सहानुभूति कि बच्चा से बहुत परेशान है बेचारी ,कुछ रहम किया जाए। …
या
बच्चे को सुलाने के बहाने जच्चा भी सो जाए। ….
सोये को क्या सुलाना
लेकिन। …. लेकिन। …। लेकिन। ….
एक दिन मेरे घर कोई आया और बोल दिया कि। ….
बहुत प्यारा बच्चा है
ये तो सोता ही रहता है
कोई परेशानी नहीं होगी आप लोगो को। ….
राहुल उस समय छ महीने का था। …
उस बात को कुछ घंटे बीते हुआ होगा कि
राहुल जगा और रोना शुरू किया। …. रोता गया। । रोता गया। …
सात दिन -रात रोता रहा। …. पूरा घर परेशान। ….
मेरी सासू जी को जो समझ में आता उपाय कराती रहीं। …।
कभी किसी पंडित को बुला पूजा पाठ
कोई बता देता तो मौला से ताबीज
कोई बता देता तो मजार से भभूत
सरसों मिर्चा से नज़र उतार कर गोयठे के आग पर जला कर उसका धुया
उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़
उपाय होता रहा आखिर सातवें दिन राहुल को नींद और सबको चैन मिला। ….
फिर वही रफ्तार से जिंदगी चलने लगी। ....
लेकिन जिस आदमी का टोक लगा था , उस आदमी पर शक करना , तौबा , सब के लिए पाप गुनाह होता। ….
जब राहुल १० महीने का हुआ फिर बीमार रहने लगा जो करीब १६-१७ साल तक झेलाता रहा। ….
उन दौरान भी ओझा पंडित का चक्कर लगा। …. श्मशान से पका लिट्टी। …. होलिका पर से पका लिट्टी। …. झाड़ -फूंक। ….
मुझे बस यही समझ में आया कि बीमारी बस बिमारी। …
भोजपुरी में एक शब्द है छारियाना। ….


Shikha Gupta ये कोई छुपी हुई बात नहीं कि गाँव में किस प्रकार विधवा या अकेली औरत की ज़मीन हडपने के लिये/ परिवार द्वारा विधवा से छुटकारा पाने के लिये / उसे अनैतिक संबंधों के लिये राज़ी न कर पाने की सूरत में मिली-भगत करके डायन घोषित कर दिया जाता है और फिर गाँव से बाहर धकेल दिया जाता है। तलाक का प्रचलन नहीं था मगर ये बहुत ही पुराना तरीका रहा है पत्नी से छुटकारा पाने का .....चूँकि डायन को जला कर मारने का भी खूब प्रचलन रहा है।
डायन हो या सती .....दोनों का उद्देश्य कमोबेश एक ही होता रहा है ....छुटकारा पाना
लोगों की तकलीफ,अज्ञानता और मुर्खता का फायदा उठाने के तरीके से ज्यादा मैं इसे कुछ और नहीं मानती। कितने ही परिवार जादू-टोने के फेर में पड़ कर घर की सुख-शान्ति खो बैठते हैं .....जो इसका शिकार बनाए जाते हैं उनकी पीड़ा का अंदाज़ा शायद हम लगा भी न पायें।
मेरे ख्याल में इसके प्रति जागरूकता फैलाने और जन-मानस को तर्क-पूर्ण विचार कर तथ्यों को परखने के लिये प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।


Shikha Gupta मैं जब अपने चार माह के बच्चे को लेकर माँ के पास गयी हुई थी ...माँ ने एक पंडित को बुलवाया जिसने बच्चे के कपडे मंगवाए और देखकर ऐलान कर दिया कि बच्चे पर जादू करवाया गया है अगर झाड-फूँक नहीं करवायी तो एक महीने से ज्यादा जीवित नहीं रहेगा .....कायदे से मुझे ड़र जाना चाहिए था मगर इन सब पर विशवास न होने के कारण मैंने कुछ भी करवाने से इनकार कर दिया ...माँ बहुत ही ज्यादा नाराज़ हुई पर अच्छी बात ये थी कि भाई और पापा भी मेरे निर्णय में साथ थे तो मेरा वो प्रवास शान्ति से गुजर गया और ज़ाहिर सी बात है कोई अनहोनी नहीं हुई ....हाँ वो पंडित फिर कभी हमारे घर नहीं आये ...माँ के कई बार बुलाने के बावजूद

Kavi Kishor Kumar Khorendra अभी हाल की ही घटना हैं
१-वह २७ साल की ग्रामीण युवती हैं
२- उसके तीन लडके हो चुके हैं ७ साल ,५ साल ,३ साल के
३-उसके घर में सास ससुर पति और दो जवान देवर हैं
४-गरीब परिवार हैं
५-सिलाई का काम करते हैं दोनों देवर
६-उस युवती के पति को दो चार लोगो ने कह दिया की
"तुम्हारी पत्नी का तुम्हारे भाईयों के साथ अवैध सम्बन्ध हैं "
७-जबकि ऐसा बिलकुल नहीं हैं ,वह युवती काज या बटन के काम में
अपने देवरों का सहयोग करती आई हैं
८-आरोप की भनक पिछले साल की हैं
९-इस साल से उस पर देवी चढ़ ने लगी हैं
१०-वह बहुत गुस्से से भर जाती है गलियाँ देने लगाती हैं ,आदि आदि
सब कहते हैं की किसी ने टोना किया हैं।


Sudha Raje जादू टोना ।।।वैसा है जैसे मानसिक शक्ति से कुछ भी कर दिखाना ।।।जब एक गिलास साफ पानी माँ बच्चे को मंत्र पढ़कर पीने को देती है सोचकर कि वह निरोग होगा ।।तब पूरी मानसिक ताक़त से ऐसा करती है और आम तौर पर काफी संख्या की छोटी छोटी समस्यायें कम होती हैं।।।।बुरा चाहना कोसना और दंड देना भी ऐसा ही है ।।जिसकी मानसिक ताक़त कम होगी वही नुकसान उठायेगा।।।।किंतु जिस तरह से अंधविश्वास फल फूल रहा है सिवा बकवास के कुछ है तो लोगों को उल्लू बनाकर धन ऐंठना


Shivam Misra मैं न तो पूरी तरह से इन पर यकीन करता हूँ न ही पूरी तरह इन के वजूद से इंकार करता हूँ ... बचपन से देखता आया हूँ कि कभी बुरी तरह से सर दर्द से तड़प रहा होता हूँ तो कैसे दवा कारगर नहीं होती और वहीं माँ द्वारा 'नज़र' का उतारा जाना असर कर जाता है | दूसरी ओर जब आस पड़ोस मे किसी बच्चे के बुखार मे होने पर उस के परिवार द्वारा डाक्टर को छोड़ किसी ओझा की शरण मे जाना मुझ पूरी तरह मूर्खता लगती है !


Vandana Gupta मन का वहम है , अगर कुछ करने से कुछ अच्छा हो गया तो मान लिया ऐसे करने से ही हुआ मगर हमेशा वैसा करने पर अच्छा ही हुआ हो सबके साथ शायद ही किसी ने बताया हो ……किसी समय विशेष मे किसी खास परिस्थिति में किसी के साथ होने वाली घटनाओं को किस तरह देखा गया और उनका निवारण किया गया ये जानना जरूरी है मगर हम ये सब नही देखते बस किसी के कुछ करने से हमारा अच्छा या बुरा हो जायेगा ये सोच बैठते हैं और यही सोच हमें विश्वास और अंधविश्वास की ओर प्रेरित करती है और उसे ही जादू टोना मान लिया जाता है जरूरत है तो उस परिस्थिति विशेष के सही आकलन की


Vandana Singh व्यक्तिगत और निजी स्तर पर मैं इसके अनुभव से बिलकुल अनभिज्ञ और अपरिचित हु किन्तु सामाज और समुदाय में प्रचलित ऐसी मान्यताओं को सिरे से नकार भी नहीं पाती हु ।
इस विषय की गंभीरता और रोचकता से शायद ही कोई अछूता हो... सो मैं भी नहीं । जादू शब्द में छुपा हुआ आकर्षण और प्रभाव हर समाज और समुदाय का अभिन्न अंग रहा है और दी ... बहुत से ऐसे लाचार और बेबस... विसंगतियों , मानसिक ,प्राक्रतिक , शारीरिक आपदाओं से त्रस्त लोगों को जादू टोने ने आशा की अनोखी ज्योत से जीवंत रखा हुआ है जो संभवतः सब तरफ से निराश हो चुके होते हैं । सो कहीं न कहीं सकारात्मक प्रभाव भी है जादू टोने का । हाँ , सिर्फ यही जीवन की सफलता और कार्यक्षेत्र का आधार कतई नहीं माना जा सकता ये मेरा प्रबल और दृढ विश्वास है ।


Imran Ansari - Main jaadu tone ko to nahi maanta......par haan buri nazar aur upari asar (aatma ka any sharir me pravesh, jinnat ) ko main apni aankho se dekh chuka hoon......mere bahut hi aatmiy ke sath ye sab ghatit hua .......


Sada ज़ादू-टोना होता है, ऐसा सुना है, कई बार किसी को बुरी नज़र के साये में देख पूरी तरह से इसे नकारा नहीं जा सकता, कुछ लोग छोटी-छोटी बातों पर इसके होने की शंका करते हैं वह जरूर गलत और वहम लगता है, लेकिन जादू-टोना नहीं होता इस बात को मात्र वहम कहकर टाला नहीं जा सकता, मेरा ऐसा मानना है।


राजेंद्र अवस्थी  - दिन है और रात भी है, भगवान हैं तो शैतान भी हैं, सिक्के के दो पहलू होते हैं सदैव....ये प्राकृतिक भी है....अत: ये कहना कि तंत्र मंत्र मात्र कल्पना है..उचित ना होगा...
जितने भी लोग ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास करते हैं उनको तंत्र,मंत्र तथा यंत्र पर भी विश्सास करना होगा....
ये और बात है कि, खुले मन से कुछ बातों को स्वीकारना कठिन होता है।


Maheshwari Kaneri नहीं मैं जादू टोना नहीं मानती..जाब जर्रे-जरे में ईश्वर विढ्मान है तो जादू में भी ईश्वर जरूर होगें इस लिएजादू टोने से हमारा बुरा कैसे होसकता है..


Mukesh Kumar Sinha दिमाग कहता है जादू टोना नाम का कुछ नहीं होता, पर दिल कभी कभी इस बात से मना भी नहीं कर पाता
शायद एक आम भारतीय जैसा सोचता हूँ.... लगता है हम 21 वीं सदी मे हैं, पर अंदर सब कुछ वहीं पीछे छिपा बैठा है ......


Neelima Sharrma जादू टोना पर खुद से तो विश्वास नही किया परन्तु ऐसे लोगो से डरती जरुर हूँ जो इन पर विश्वास रखते हैं मेरे ख्याल से जादू और टोन को किसी को मनोवैज्ञानिक रूप से अपने अपने वश में करने के लिय प्रयोग किया जाता होगा और भय वश लोग उसी बात को करने लगते होंगे जिनके निमित्त इन सबको किया होगा इश्वर अवश्य हैं और हरेक करम का फल जरुर मिलता हैं .हाँ माँ को देखा हैं बचपन में नमक से नजर उतारते हुए बच्चो की पर इसे जादू या टोना नही कहा जा सकता न ......


Kailash Sharma बहुत कठिन है कुछ कहना. मन और दिमाग इस पर विश्वास नहीं करता. लेकिन विश्व में अभी भी बहुत से रहस्य हैं जिनका खुलासा होना बाकी हैं, और शायद यह भी उनमें से एक है....


कौशलेन्द्रम कुक्कू ·
मेरे सामने कई दृष्य उभरते हैं जब कोई जादू-टोने की बात करता है। कुछ दृष्य आपके लिये भी ...
1- केवल एक नज़र की बौछार ..जैसे कि कोई बादल फट गया हो, ज़िंदगी ढलान पर है मगर आज तक भीगता जा रहा हूँ । सोचता हूँ ..क्या था उन आँखों में । पता नहीं था आँखों का जादू इतना गहरा होता है । 2- मुझे पता है ...ख़्वाब है यह सब लेकिन तुम्हारे जादू ने जिस सृष्टि की रचना की है उसे कैसे नकार दूँ ? 3- ...ज़रूर उस चुड़ैल ने ही कोई जादू किया होगा तुम पर वरना रखा ही क्या है उसमें ..न शक्ल की न सूरत की ...कुलच्छनी कहीं की । 4- बहू ! जरा सा काजल लगा दे इसके माथे पर मुआ कित्ता ख़ूबसूरत लग रहा है आज । जलने वालों की कमी नहीं है ....कहीं कोई टोटका न कर दे मेरे पोते पर । 5- इत्ते-इत्ते बैद गुनिया सब को दिखाया पर जब से नीबू और मिरच उतारा तब से कुछ ठीक है ..बुख़ार भी कुछ कम हुआ है और अभी तो आराम से सो भी रहा है । 6- हाँ ! मैं मारा इसको ...टोनही थी साब तब्बी तो मारा । पूरा पारा में सबको जादू टोना करती फिरती थी ....। 7- कुछ नहीं सिर्फ़ एक भ्रम । जादू टोना कुछ होता तो सारी दुनिया जादूगरों और टोना-टोटका वालों के कब्ज़े में होती। 8- जब शून्य से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हो सकती है तो जादू से कुछ क्यों नहीं उत्पन्न हो सकता ? 9- वास्तव में जादू-टोना सब कुछ सापेक्ष प्रभावी हैं। जो मानता है उसके लिये इसका अस्तित्व है और जो नहीं मानता उसके लिये यह मात्र एक अन्धविश्वास। इसका अर्थ यह हुआ कि जादू-टोने का अस्तित्व यदि कहीं है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे मन में है ।


बेचैन आत्मा - जादू हाथ की सफाई, टोना मन का आशावादी होना है। इस सत्य से इंकार नहीं कर सकता कि बचपन में जब बीमार पड़ता था और माँ झाड़-फूँक करती थीं, नज़र उतारती थीं तो पक्का यकीन हो जाता था कि अब मैं ठीक हो जाऊँगा। डाक्टर की दवाई तन को, माँ की झाड़-फूँक मन को अच्छा करती थी। सबसे बड़ी बात है विश्वास। अब सावधान रहने की बात यह है कि हम जिस पर विश्वास कर रहे हैं वह है कौन ? माँ जैसा भला चाहने वाला या फिर किसी ढोंगी संत जैसा जो भोले विश्वास का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर रहा है। इस अंधविश्वास का दायरा बच्चों के मन में अपनी माँ तक ही सीमित रहे तभी कल्याण है।


Darshan Kaur Dhanoe मैं जादू -टोने में बिलकुल भी विश्वास नहीं करती थी ..पर जब मेरे साथ एक दुखद वाकिया हुआ तो मुझे महसूस हुआ कि ये सब सत्य है ...बात 1 9 97 कि है ---" मेरा झगड़ा मेरी पड़ोसन से हुआ ...वो मेरे बगल वाले फलैट में रहती थी ..वो मुझे बहुत परेशां करती थी ..आये दिन कुछ न कुछ करती ही रहती थी ..हम सब चुप रहते थे ,एक दिन गुस्से में मैंने उसको पिट दिया ..उसने मेरे खिलाफ झूठी रिपोर्ट कर दी ..खेर, पति कि अच्छी साख होने के कारन कुछ हुआ नहीं ..बात आई गई हो गई ...

4 महीने बाद अचानक वो बात करने लगी ..मैंने भी सोचा कि रोज़ झगड़ा करने से अच्छा है बातचीत कि जाये ..वो हमारे घर आने - जाने लगी,वो मेरी बड़ी बेटी से ज्यादा धुलने मिलने लगी ..रोज़ उसे घर में बुलाती ,मेरे मिस्टर मना करते थे ..पर मैंने ध्यान ही नहीं दिया ...एक महीने के अंदर मेरी बेटी काली पड़ने लगी जबकि उसका रंग बहुत ही साफ था ,उसे बुखार रहने लगा ,उसने खाना -पीना तक छोड़ दिया . हम डॉ के पास लेकर जाते तो कुछ भी नहीं निकलता ..काफी टेस्ट करवाये पर नतीजा कुछ नहीं निकला ..उस समय वो 8 th कि पढाई कर रही थी उम्र 1 5 - 1 6 साल ..
एक दिन हमारी दुकान का कर्मचारी मिश्रा जी ने कहा कि इसको कुछ हुआ है साहेब .....तब तक हम उसको 'बॉम्बे हास्पिटल' (मुम्बई ) एडमिड कर चुके थे पर कोई फायदा नहीं हुआ ..मेरे mr. उसके लिए दुआए मानते थे ..हम 8 दिन हास्पिटल में रहे पर कोई फायदा नहीं .. उसका बुखार कम होता ही नहीं था ..
किसी के कहने पर mr. 'हाजीअली ' कि प्रसिद्धी दरगाह पर गए वह के मोलवी ने उनको एक काला धागा दिया और साबूत गेहू दिए और कहा कि ये बच्ची को चबाकर खाने को कहो जो भी गन्दा खिलाया है वो उलटी कर देगी सब ठीक हो जायेगा ..यह बात सुबह 9 बजे कि है जब mr ने वो गेहूं मुझे हास्पिटल में लाकर दिए ..बेटी बात कर रही थी,मैंने गेहूं उसके हाथ में दिए खाने के लिए , लेकिन अचानक वो गेहूं हाथ में लेकर चीख पड़ी और बेहोश हो गई ...वो कोमा में चली गई थी ..पूरा दिन पूरी रात हम उसे i c u में लेकर बैठे रहे सुबह 7 .3 0 (6 जनवरी 1 9 98) को उसके जीवन कि लीला ख़त्म हो गई ..ख़तम तो वो रात को ही हो गई थी सिर्फ मशीनो ने उसे जिन्दा रखा था ...डॉ कहते है इसे वो बीमारी थी जो लाखो में एक को होती है जिसमे शारीर के 'सेल' मरते है और वापस बनते नहीं पर मुझे यकीं है ये उस बंगालन के जादू का ही असर था जिसने मेरी तंदरुस्त बेटी को निगल लिया ...
कुछ दिनों बाद हमने वो फलेट ही छोड़ दिया ...

* कहते है किसी का दिया हुआ खाने का सामान यदि सुंध लिया जाये तो किसी भी प्रकार के जादू -टोने का असर नहीं होता ..sabhar :http://www.parikalpnaa.com/

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भोग से योग का मार्ग दिखाता खजुराहो

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मध्यकालीन भारत के चंदेल राजाओं के पराक्रम और वैभव की गाथाएं आज भी बुंदेलखंड में सुनी जाती हैं। कला और संस्कृति के प्रति उनके लगाव के प्रमाण खजुराहो में अत्यंत जीवंत रूप में मौजूद हैं। भव्य मंदिरों के रूप में खड़े ये साक्ष्य उस दौर के धर्म, कला और जीवन के तमाम भावों को अपने में समेटे हुए हैं।
खजुराहो के गगनचुंबी देवालयों की भित्तियों में जड़ी असंख्य मूर्तियां जीवन के हर आयाम को विभिन्न कोणों से प्रदर्शित करती हैं। मंदिरों की ये भित्तियां पाषाण पर उकेरे किसी महान ग्रंथ के पन्नों सी प्रतीत होती हैं। जिसे पढ़ने पर हर वर्ष लाखों सैलानी खजुराहो चले आते हैं। वास्तव में खजुराहो के ये मंदिर संसार भर के पर्यटकों के लिए भारत का अद्वितीय उपहार हैं। इसी कारण खजुराहो आज विश्व पर्यटन मानचित्र पर एक सुनहरे बिंदु की तरह दीप्तिमान है। यूं तो खजुराहो की ख्याति मंदिरों की दीवारों पर स्थित कामक्रीड़ामग्न मूर्तियों के कारण अधिक है, किंतु इसका कला वैभव केवल यहीं तक सीमित नहीं है। यहां कई अन्य मूर्तियां भी अपने शिल्प कौशल के कारण पर्यटकों को बेहद प्रभावित करती हैं। खजुराहो की यही विशेषता देश-विदेश के तमाम पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।
बदलता रहा नाम
झांसी रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही हमें खजुराहो के लिए बस तैयार मिली। करीब पांच घंटे के थका देने वाले सफर के बाद हम खजुराहो पहुंच गए। वहां उतरते ही हमें होटल के एजेंटों के साथ साइकिल रिक्शा व ऑटोरिक्शा वालों ने आ घेरा। छोटे शहर की छोटी-छोटी सड़कों पर साइकिल रिक्शे से ही हम होटल की ओर चल दिए। सफर की थकान के कारण हमें पहले आराम की जरूरत थी। विश्राम के बाद जब हम होटल से बाहर निकले तो दोपहर बीत चुकी थी। भीड़-भाड़ से परे छोटे से शहर में घूमते हुए सब कुछ आसपास नजर आ रहा था। मुख्य मार्ग पर बढ़ते हुए, बाजार के सामने हमें आलीशान मंदिरों का समूह नजर आया। यही तो था चंदेलों का स्थापत्य संसार। इसे देख कुछ पल के लिए तो हम ठिठक गए। किंतु हमें पता था कि किसी गाइड की सहायता के बिना उन मंदिरों पर लिखे आलेखों को पढ़ना हमारे लिए कठिन था। इसलिए हमने पर्यटन कार्यालय जाकर अगले दिन के लिए एक गाइड की व्यवस्था की तथा अन्य जानकारियां प्राप्त कीं। वहां से हम वापस बाजार आए और एक रूफटॉप रेस्टोरेंट में आ बैठे। वहां से मंदिर परिसर स्पष्ट नजर आ रहा था। कॉफी के सिप लेते हुए हम मंदिरों पर उतरती सांवली शाम का नजारा देख रहे थे।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो का इतिहास काफी पुराना है।इब्नबतूता ने इस स्थान को कजारा कहा है, तो चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी भाषा में इसे ‘चि: चि: तौ’ लिखा है। अलबरूनी ने इसे ‘जेजाहुति’ बताया है, जबकि संस्कृत में यह ‘जेजाक भुक्ति’ बोला जाता रहा है। चंदबरदाई की कविताओं में इसे ‘खजूरपुर’ कहा गया तथा एक समय इसे ‘खजूरवाहक’ नाम से भी जाना गया।लोगों का मानना था कि इस समय नगर द्वार पर लगे दो खजूर वृक्षों के कारण यह नाम पड़ा होगा। जो कालांतर में खजुराहो कहलाने लगा।
ताकि समझ सके समाज
चंदेलवंशीय राजाओं का शासनकाल इस क्षेत्र का स्वर्णिम दौर था। उन्होंने 9वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान यहां राज किया था। खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण उन्होंने ही करवाया था। इन मंदिरों की भित्तियों पर मानव जीवन के हर पहलू को अत्यंत स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। बुंदेलखंड में इस संबंध में एक जनश्रुति है। कहते हैं एक बार राजपुरोहित हेमराज की पुत्री हेमवती संध्या की बेला में सरोवर में स्नान करने पहंुची। आकाश में विचरते चंद्रदेव ने जब स्नान करती नवयौवना की भीगी हुई रूपराशि को देखा तो वह उस पर आसक्त हो गए। उसी पल वह रूपसी हेमवती के समक्ष प्रकट हुए और उससे प्रणय निवेदन किया। कहते हैं कि उनके मधुर संयोग से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसने ही बड़े होकर चंदेलवंश की स्थापना की। समाज के भय से हेमवती ने उस बालक को वन में करणावती नदी के तट पर पाला और उसका नाम चंद्रवर्मन रखा। बड़ा होकर चंद्रवर्मन एक प्रभावशाली राजा बना। एक बार उसकी माता हेमवती ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर, ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए प्रेरित किया जो समाज को ऐसा संदेश दें जिससेसमाज यह समझ सके कि जीवन के अन्य पहलुओं के समान कामेच्छा भी एक अनिवार्य अंग है। ताकि इस इच्छा को पूर्ण करने वाला इंसान कभी पापबोध से ग्रस्त न हो। ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए चंद्रवर्मन ने खजुराहो को चुना। इसे अपनी राजधानी बनाकर उसने यहां 85 वेदियों का एक विशाल यज्ञ किया। बाद में इन्हीं वेदियों के स्थान पर 85 मंदिर बनवाए गए थे। जिनका निर्माण चंदेलवंश के आगे के राजाओं द्वारा जारी रखा गया। यद्यपि 85 में से आज यहां केवल 22 मंदिर शेष हैं। लेकिन उन सब पर जीवन के अनंत उत्सव का गौरवशाली प्रदर्शन उसी तरह विरचित है।
शिल्पकारों ने आस्था से आसक्ति तक जीवन के तमाम संवेगों को इन मंदिरों की भित्तियों पर उतार डाला था। तभी तो यहां सौंदर्यबोध, कलात्मकता और देवत्व का अनन्य संगम देखने को मिलता है। 14वीं शताब्दी में चंदेलों के खजुराहो से प्रस्थान के साथ ही सृजन का वह दौर खत्म हो गया। करीब एक सदी बाद मंदिरों का महत्व भी घटने लगा और धीरे-धीरे ये अतीत की परतों में छिप गए। समय की आंधी ने खजुराहो के दो-तिहाई मंदिरों को तो निगल ही लिया। बाद में बीसवीं सदी के आरंभ में एक अंग्रेज इंजीनियर टी.एस. बर्ट ने नये सिरे से खजुराहो की खोज की। उन दिनों यहां एक छोटा सा गांव और केवल 22 मंदिर शेष थे। खजुराहो गांव से इनकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार ये मंदिर अब पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मंदिर समूह के रूप में विभाजित हैं। खजुराहो के अधिकतर महत्वपूर्ण मंदिर पश्चिमी समूह में ही हैं। आधुनिक खजुराहो इसी मंदिर समूह के सामने बसा है। ज्यादातर होटल, रेस्टोरेंट तथा बाजार यहीं हैं।
मंदिरों के चार समूह
सुबह जल्दी ही हम मंदिरों के दर्शन के लिए चल पड़े। गाइड के साथ हम पहले मंदिर परिसर से बाहर स्थित मतंगेश्वर मंदिर पहुंचे। यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है। जिसे राजा हर्षवर्मन ने 920 ई. में बनवाया था। इस मंदिर में आज भी पूजा-अर्चना होती है। पिरामिड शैली में बने एक ही शिखर वाले इस मंदिर की शिल्प रचना एकदम साधारण है। गर्भगृह में करीब ढाई मीटर ऊंचा और एक मीटर व्यास का एक शिवलिंग है। मंदिर में पहुंचकर हमने भी शिवलिंग के दर्शन कर पुष्प अर्पित किए। वहां से हम मंदिरों के मुख्य परिसर के द्वार पर आए और टिकट लेकर प्रवेश किया। वहां एक विशाल उद्यान में ऊंचे शिखर वाले कई मंदिर हैं। ये सभी ऊंचे चबूतरों पर बने हुए हैं।
परिसर में हमने सबसे पहले लक्ष्मण मंदिर देखा। यह मंदिर 930 ई. में राजा यशोवर्मन द्वारा बनवाया गया था। उन्हें लक्ष्मण के नाम से भी जाना जाता था। पंचायतन शैली में बने इस मंदिर के चारों कोनों पर एक-एक उप मंदिर बना है। मुख्य मंदिर के द्वार पर रथ पर सवार सूर्यदेव की सुंदर प्रतिमा है। आगे बढ़कर मंदिर की वाह्य दीवारों पर जब हमने दृष्टि डाली तो हतप्रभ रह गए। दीवारों पर सैकड़ों मूर्तियां जड़ी थीं। जिन्हें एक ही दृष्टि में देख पाना कठिन था। मूर्तियों के संबंध में जब गाइड ने हमें सिलसिलेवार बताना शुरू किया तो हमारे लिए मूर्तियों की सुंदरता, उनकी भाव-भंगिमा और प्रसंग को समझना आसान हो गया। मूर्तियों की श्रृंखला में तीन कतारों में प्रमुख मूर्तियां थीं। उनके अतिरिक्त कुछ कतारें छोटी मूर्तियों की थीं। मध्य में बने आलों में देव प्रतिमाएं हैं। अधिकतर मूर्तियां उस काल के जीवन और परंपराओं को दर्शाती हैं। इनमें नृत्य, संगीत, युद्ध, शिकार आदि जैसे दृश्य हैं। प्रमुख मूर्तियों में विष्णु, शिव, अग्निदेव आदि के साथ गंधर्व, सुरसुंदरी, देवदासी, तांत्रिक, पुरोहित और मिथुन मूर्तियां हैं। कालीदास के अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका भी इन दीवारों पर उपस्थित है। स्नान के बाद सरोवर से बाहर आती शकंुतला के भीगे सौंदर्य को शिल्पकार ने बड़ी निपुणता से पत्थर पर उकेरा है। केलिक्रीडा के दृश्यों की उन्मुक्त उपस्थिति ने हमें एकबारगी चौंका दिया। हम सोचने लगे कि कामोद्दीपक भावों की प्रस्तुति इतनी बेबाक भी हो सकती है। वह भी एक मंदिर की दीवार पर। एक मूर्ति में तो नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को उत्तेजित करने के लिए नख-दंत का प्रयोग कामसूत्र के किसी सिद्धांत को दर्शा रहा है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की त्रिमुखी प्रतिमा के दर्शन होते हैं। अंदर की दीवारों पर भी मूर्तियां विद्यमान हैं। लेकिन प्रकाश के अभाव में वे स्पष्ट नजर नहीं आतीं। लक्ष्मण मंदिर के चबूतरे पर छोटी-छोटी मूर्तियां हैं। इनमें धर्मोपदेश, नृत्य-संगीत शिक्षा, युद्ध के लिए प्रस्थान के दृश्यों के साथ ही कुछ दृश्य सामूहिक मैथुन के भी हैं। लक्ष्मण मंदिर के सामने दो छोटे मंदिर हैं। इनमें एक लक्ष्मी मंदिर व दूसरा वराह मंदिर है।
उत्सव के दृश्य
वहां से हम विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ गए। उससे पूर्व पार्वती मंदिर भी है। यह नवनिर्मित मंदिर है। दरअसल यहां स्थित मंदिर खंडित हो चुका था। 1880 के आसपास छतरपुर के महाराजा ने यह वर्तमान मंदिर बनवाकर उसमें पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर दी। यह मंदिर अन्य मंदिरों से भिन्न है। आगे स्थित है विश्वनाथ मंदिर जो शिव को समर्पित है। 90 फुट ऊंचे और 45 फुट चौड़े इस मंदिर का निर्माण 1002 ई. में राजा धंगदेव द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर भी पंचायतन शैली में बना है। किंतु इसके चार उप मंदिरों में से दो ही शेष हैं। मंदिर की सीढि़यों के आगे दो शेर और हाथी बने हैं। इस मंदिर की दीवारों पर भी तीन पंक्तियां प्रमुख प्रतिमाओं की हैं। गाइड ने बताया कि प्राय: हर मंदिर में इस तरह की तीन पंक्तियां बनी हैं। यहां इनमें देव प्रतिमा, अष्टदिग्पाल, नागकन्याएं व अप्सरा आदि हैं। अन्य कतारों में उस काल की समृद्धि का चित्रण राजसभा, रासलीला, विवाह और उत्सव के दृश्यों के रूप में है। इनमें वीणावादन करती नायिका तथा पैर से कांटा निकालती अप्सरा पर्यटकों का ध्यान जरूर आकर्षित करती हैं। मुख्य आलों में चामुंडा, वराही, वैष्णवी, कौमारी, महेश्वरी व ब्रह्माणी आदि के बाद अंत के आले में नटेश्वर की प्रतिमा है। गर्भगृह की दीवारों पर शिव अनेक रूपों में चित्रित हैं तथा गर्भगृह में शिवलिंग के दर्शन होते हैं। प्रमुख मंदिर के सामने बड़ा सा नंदी मंडप है। बारह खंबों पर टिके चौकोर मंडप में शिव के वाहन नंदी की छह फुट ऊंची प्रतिमा है।
विश्वनाथ मंदिर देखने के बाद हम हरे-भरे उद्यान के मध्य बने साफ-सुथरे मार्ग से अन्य मंदिरों की ओर चल दिए। अभी तक देवी मूर्तियों के विचारों में मग्न हम चित्रगुप्त मंदिर पहुंचे तो मूर्तिकला का एक और कैनवास हमारे सामने था। यह मंदिर सूर्यदेव को समर्पित है। इसका निर्माण राजा गंडदेव द्वारा 1025 ई. के लगभग करवाया गया था। मंदिर की दीवारों पर अन्य मूर्तियों के मध्य उमा महेश्वर, लक्ष्मी नारायण और विष्णु के विराट रूप में मूर्तियां भी हैं। जन जीवन की मूर्तियों में पाषाण ले जाते श्रमिकों की मूर्तियां मंदिर निर्माण के दौर को दर्शाती हैं। मुख्य प्रतिमाओं के मध्य यहां भी एक पशु की आकृति अधिक संख्या में देख हमने गाइड से पूछा तो उसने बताया कि ये व्याल व शार्दूल की प्रतिमाएं हैं और हर मंदिर पर बनी हैं।
यम की प्रतिमा
चित्रगुप्त मंदिर की दीवारों पर नायक-नायिका को आलिंगन के विभिन्न रूपों में चित्रित किया गया है। गर्भगृह में सात घोड़ों के रथ पर सवार भगवान सूर्य की प्रतिमा विराजमान है। निकट ही हाथ में लेखनी लिए चित्रगुप्त बैठे हैं। इन मंदिरों में विदेशी पर्यटक भी बहुतायत में आते हैं। हमने देखा जापान से आए पर्यटकों के एक समूह को एक गाइड उन्हीं की भाषा में मंदिर व मूर्तियों के विषय में बता रहा था। तब हमें पता चला कि खजुराहो और आसपास के पढ़े-लिखे युवकों ने अलग-अलग देशों की भाषाएं सीख कर गाइड के रूप में एक अच्छा रोजगार अपना लिया है। इनकी योग्यता के अनुसार पर्यटन विभाग द्वारा इन्हें अधिकृत किया जाता है। विदेशी पर्यटकों के लिए भी खजुराहो में बिखरी कला संपदा के भी यहां पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। क्योंकि प्राचीन मूर्तियों के अंतरराष्ट्रीय माफिया की नजर हमेशा यहां की मूर्तियों पर रहती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां एक गार्ड एवं एक अटेंडेंट को हर समय तैनात रखा जाता है। ये लोग पर्यटकों को मूर्तियों से छेड़-छाड़ करने से भी रोकते हैं। शायद इसीलिए यहां की दीवारें कुछ भारतीय पर्यटकों की पर्यटन स्थलों पर अपना नाम लिखने की आदत का शिकार नहीं हुई।
चित्रगुप्त मंदिर से कुछ आगे जगदंबी मंदिर है। इसे लोग जगदंबा मंदिर भी कहते हैं। मूलत: यह मंदिर विष्णु को समर्पित था। लेकिन मंदिर में कोई प्रतिमा न थी। छतरपुर के महाराजा ने जब इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तब यहां जगदंबा की प्रतिमा स्थापित कर दी गई। इस मंदिर में अन्य देव प्रतिमाओं के साथ यम की प्रतिमा भी विद्यमान है। यहां भी दीवारों पर कुछ अच्छे मैथुन दृश्य प्रभावित करते हैं। प्रवेश द्वार के सरदल पर चतुर्भुजी विष्णु गरुड़ पर आसीन नजर आते हैं। मंदिर की आलियों में सरस्वती एवं लक्ष्मी की प्रतिमाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जगदंबी मंदिर के निकट ही महादेव मंदिर है। इस छोटे मंदिर का मूलभाग खंडित अवस्था में है तथा वेदी भी नष्ट हो चुकी है। प्रवेश द्वार पर एक मूर्ति में राजा चंद्रवर्मन को सिंह से लड़ते दर्शाया गया है। यह दृश्य चंदेलों का राजकीय चिह्न बन गया था।
कामसूत्र के सिद्धांत
इन मंदिरों की कतार में आगे स्थित है कंदारिया महादेव मंदिर। यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। 117 फुट ऊंचा, लगभग इतना ही लंबा तथा 66 फुट चौड़ा यह मंदिर सप्तरथ शैली में बना है। इसके चारों उप मंदिर सदियों पूर्व अपना अस्तित्व खो चुके थे। लेकिन फिर भी इसकी भव्यता में कोई कमी नजर नहीं आती। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसका निर्माण राजा विद्याधर ने मोहम्मद गजनी को दूसरी बार परास्त करने के बाद 1065 ई. के आसपास करवाया था। संभवत: कंदरा के समान प्रतीत होते इसके प्रवेश द्वार के कारण इसका नाम कंदारिया महादेव पड़ा होगा। वाह्य दीवारों पर सुर-सुंदरी, नर-किन्नर, देवी-देवता व प्रेमी युगल आदि सुंदर रूपों में उपस्थित हैं। मध्य की दीवारों पर कुछ अनोखे मैथुन दृश्य चित्रित हैं। एक स्थान पर ऊपर से नीचे की ओर एक क्रम में बनी तीन मूर्तियां काम सूत्र में वर्णित एक सिद्धांत की अनुकृति कही जाती हैं। इसमें मैथुनक्रिया के आरंभ में आलिंगन व चुंबन के जरिये पूर्ण उत्तेजना प्राप्त करने का महत्व दर्शाया है। एक अन्य दृश्य में एक पुरुष शीर्षासन की मुद्रा में तीन स्ति्रयों के साथ रतिरत नजर आता है। विशालतम मंदिर की वाह्य दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां हैं तो अंदर भी 226 मूर्तियां स्थित हैं। इतनी मूर्तियां शायद अन्य किसी मंदिर में नहीं है। मंदिर की बनावट और अलंकरण भी अत्यंत वैभवशाली है। कंदारिया महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार नौ शाखाओं से युक्त है। जिन पर कमल पुष्प, नृत्यमग्न अप्सराएं तथा व्याल आदि बने हैं। सरदल पर शिव की चारमुखी प्रतिमा बनी है। इसके पास ही ब्रह्मा एवं विष्णु भी विराजमान हैं। गर्भगृह में संगमरमर का विशाल शिवलिंग स्थापित है। मंडप की छतों पर भी पाषाण कला के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं।
वैसे तो हमने परिसर के सभी मंदिर देख लिए थे किंतु मन अभी भी खजुराहो के शिल्पकानन में ही भटक रहा था। वास्तव में मूर्तिशिल्प के इस विपुल वैभव को एक बार में अपनी स्मृतियों में समेटना असंभव था। एक बार फिर इन मंदिरों को देखने का निर्णय कर हम बाहर आ गए।
भोजन तरह-तरह के
शाम के समय खजुराहो के बाजार में टहलने निकले तो वहां हमें फूड फेस्टिवल का सा नजारा देखने को मिला। सड़क के किनारों पर चाट की दुकानें तो थी हीं, शाकाहारी मारवाड़ी भोजन के रेस्टोरेंट भी नजर आ रहे थे। लेकिन इन सब से बढ़कर उन रेस्टोरेंट के बोर्ड थे जो यह दर्शा रहे थे कि यहां चाइनीज, कांटिनेंटल, जापानी, कोरियन, इजरायली या इटालियन फूड भी उपलब्ध हैं। दरअसल खजुराहो के कई रेस्तराओं में विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए उनके देश का भोजन उपलब्ध कराना आरंभ कर दिया है। इसके लिए उन्होंने पहले उस तरह का भोजन बनाना सीखा है। इसी तरह यहां के दुकानदारों ने पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए विदेशी भाषाओं के बोर्ड भी लगवा रखे हैं। यहां ज्यादातर दुकानें, हस्तशिल्प, एंटीक वस्तुएं, पारंपरिक परिधान, पिक्टोरियल बुक्स तथा पिक्चर पोस्टकार्ड आदि की हैं। दिन में हमने कई विदेशी पर्यटकों को साइकिल पर घूमते देखा था। पता चला कि घूमने के लिए यहां साइकिल किराये पर मिल जाती है। रिक्शा या ऑटो की तुलना में यह साधन हमें अच्छा लगा। साइकिल पर स्वतंत्र रूप से घूमते हुए स्थानीय जीवन को भी निकट से देखा जा सकता है। हमने भी अगले दिन साइकिल से घूमने का मन बना लिया।
यहां मंदिर सैलानियों के लिए सुबह से शाम तक खुले रहते हैं। सूर्यास्त के बाद पश्चिमी मंदिर परिसर एक बार फिर जीवंत हो उठता है। यहां ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम होता है। कार्यक्रम शुरू होते ही अंधकार में डूबे मंदिर रंग-बिरंगे प्रकाश में नहा उठते हैं। प्रकाश के खूबसूरत संयोजन के साथ खजुराहो के स्वर्णिम दौर की दास्तां भी सुनने को मिलती है। पर्यटकों के लिए यह एक अनोखा अनुभव होता है।
सैर साइकिल पर
अगले दिन हम साइकिल से पूर्वी मंदिरों की ओर चल दिए। ये मंदिर खजुराहो के प्राचीन गांव के निकट थोड़ी-थोड़ी दूरी पर स्थित हैं। इनमें चार जैन तथा तीन हिंदू मंदिर हैं। सबसे पहले हम ब्रह्मा मंदिर पहुंचे। पिरामिड शैली में बना यह छोटा सा मंदिर है। ब्रह्मा की प्रतिमा के साथ यहां भगवान विष्णु और शिव भी उपस्थित हैं। मंदिर में एक शिवलिंग भी है। ब्रह्मा मंदिर से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर वामन मंदिर है। भगवान विष्णु के वामन अवतार को समर्पित यह मंदिर स्थापत्य शैली तथा प्रतिमाओं के आधार पर 11वीं सदी के उत्तरा‌र्द्ध में बना माना जाता है। इस मंदिर की दीवारों पर प्रेमी युगलों के कुछ आलिंगन दृश्यों को छोड़ ज्यादातर एकल प्रतिमाएं हैं। यहीं शिव विवाह का खूबसूरत अंकन भी देखने को मिलता है।  सप्तशाखाओं से अलंकृत प्रवेश द्वार के बाद गर्भ में वामन की चतुर्भुज प्रतिमा विद्यमान है। जबकि बाहरी आलियों में नृ¨सह एवं वराह अवतार की प्रतिमाएं भी हैं। वामन मंदिर से जरा सा आगे चले जाएं तो जवारी मंदिर है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उनके बैकुंठ रूप में दर्शन होते हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर काफी संख्या में मूर्तियां है। इनमें अनेक मैथुन दृश्य भी हैं।
जैन तीर्थ था खजुराहो
अपने स्वर्णकाल में खजुराहो जैन तीर्थ के रूप में भी विख्यात था। आज यहां चार जैन मंदिर स्थित हैं। इनमें से घंटाई मंदिर आज खंडहर अवस्था में है। एक मंडप के रूप में दिखने वाले इस मंदिर के स्तंभों पर घंटियों का सुंदर अलंकरण है। प्रवेश द्वार पर शासन देवी-देवताओं की मनोहारी प्रतिमाएं हैं। जबकि गर्भगृह के द्वार पर शासन देवी चक्रेश्वरी की गरुड़ पर आरूढ़ प्रतिमा है। शेष तीनों जैन मंदिर कुछ दूर एक परिसर में स्थित हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है पा‌र्श्वनाथ मंदिर। जो राजा धंगदेव के काल में एक वैभवशाली नगर श्रेष्ठी द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर का भू-विन्यास कुछ विशिष्ट है। यहां मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीर्थकर प्रतिमाएं बनी हैं। इनके साथ कुबेर, द्वारपाल, गजारूढ़ या अखारूढ़ जैन शासन देवताओं का सुंदर अंकन भी है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर नवग्रहों के साथ जैन तीर्थकरों के दर्शन भी होते हैं। गर्भगृह में पा‌र्श्वनाथ जी की श्यामवर्ण प्रतिमा विराजमान है। यहीं बराबर में आदिनाथ मंदिर है। इसकी शिखर संयोजना एकदम सादी है। यहां मूर्तियों की पंक्तियों में गंधर्व, किन्नर, विद्याधर शासन देवी-देवता, यक्ष मिथुन व अप्सराएं शामिल हैं। इनमें आरसी से काजल लगाती नायिका तथा शिशु पर वात्सल्य छलकाती माता को देख सैलानी मुग्ध हो जाते हैं। मंदिर के तोरण में तीर्थकर माता के सोलह स्वप्नों का सुंदर चित्रण है और गर्भगृह में आदिनाथ जी की प्रतिमा है। परिसर में स्थित शांतिनाथ मंदिर को प्राचीन मंदिर नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह लगभग सौ वर्ष पुराना मंदिर है। यहां आज पूजा-अर्चना का नियम है। मंदिर में मूलनायक सोलहवें तीर्थकर शांतिनाथ की बारह फुट ऊंची प्रतिमा तथा चित्र दर्शनीय हैं। परिसर के साथ ही साहु शांति प्रसाद जैन कला संग्रहालय भी है। जहां खजुराहो क्षेत्र से प्राप्त सौ से अधिक प्राचीन प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं।
पूर्वी मंदिरों के बाद हम रास्ता पूछते हुए दक्षिणी मंदिरों की ओर चल दिए। इनमें से एक खोकर नदी के तट पर स्थित दूल्हादेव मंदिर है। यह मंदिर शिव को समर्पित है। इस मंदिर के संरक्षण के लिए वहां कुछ कार्य चल रहा था, इसलिए यह लोहे के जाल से घिरा था। ऐसी स्थिति में यहां बाहरी मूर्तियों को देखना संभव न था। मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग पर एक हजार छोटे-छोटे शिवलिंग बने हैं। यह 12वीं शताब्दी में निर्मित चंदेल राजाओं की अंतिम धरोहर है। चतुर्भुज मंदिर जाने के लिए नदी के पुल को पार कर एक गांव और खेतों के बीच से होकर पहुंचे। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर साइकिल चलाने का यह पहला अनुभव था। चतुर्भुज मंदिर एक साधारण चबूतरे पर बना है। इस मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों में दिग्पाल, अष्टवसु, अप्सराएं और व्याल प्रमुखता से हैं। इस मंदिर की दीवारों पर मिथुन मूर्तियों का अभाव है। मंदिर के गर्भगृह में शिव की सौम्य प्रतिमा है। कुछ वर्ष पूर्व चतुर्भुज मंदिर से कुछ दूर एक ओर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उस टीले पर उत्खनन कार्य शुरू करवाया तो एक विशाल मंदिर का खंडित हिस्सा सामने आया। उस स्थान को बीजा मंडल कहा जाता है। यहां अभी उत्खनन कार्य जारी है।
बलुआ पत्थर के बने हैं मंदिर
कला पारखी जब खजुराहो के मंदिरों के भू-विन्यास व उर्ध्व विन्यास पर गौर करते हैं तो पता चलता है कि इनमें से ज्यादातर मंदिर बलुआ पत्थर के बने हैं। इनमें से कुछ मंदिरों के निर्माण में ग्रेनाइट का प्रयोग भी हुआ है। अपने निर्माण के एक हजार वर्ष पूरे कर रहे इन मंदिरों की निर्माण शैली भी विशिष्ट है। पर्वत के समान ऊंचे उठते ये मंदिर बाहरी तौर पर देखें तो रथ शैली में बने कहे जाते हैं। इनमें से चित्रगुप्त मंदिर, जगदंबी मंदिर और चतुर्भुज मंदिर त्रिरथ शैली में बने छोटे मंदिर हैं। लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर और दूल्हादेव मंदिर पंचरथ शैली में बने हैं तथा कंदारिया महादेव सप्तरथ शैली का बेजोड़ नमूना है। आंतरिक तौर पर इनकी शैली सांधार व निरंधार रूप में है। सांधार शैली के मंदिरों का आतंरिक भाग अ‌र्द्धमंडप, महामंडप, अंतराल, गर्भगृह और प्रदक्षिणा पथ के रूप में पांच भागों में विभाजित है। जो मंदिर निरंधार शैली में बने हैं, उनमें प्रदक्षिणा पथ का अभाव है। खजुराहो मंदिरों के बहिरंग व अंतरंग के अलंकरण के रूप में मूर्तियों का प्राचुर्य तो जैसे इनका गौरव है। इष्ट देवताओं की प्रतिमाओं के अलावा नारी सौंदर्य तथा कामकला की मूर्तियां यहां सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। पाषाण पर हथौड़े-छेनी का प्रयोग शिल्पकारों ने इतने सधे ढंग से किया है कि उनकी प्रशंसा किए बिना कोई पर्यटक वापस नहीं जा सकता। प्रत्येक मूर्ति पर नारी शरीर की कोमलता और सौष्ठव का हर पक्ष स्पष्ट झलकता है। आकर्षक ग्रीवा, उन्नत वक्ष, बल खाते कटि प्रदेश और उभरे नितंबों के साथ कमनीय देह की हर लोच और लचक यहां विद्यमान है। नारी जीवन के अनेक प्रसंग यहां मौजूद हैं। कहीं वह वेणी गूंथ रही है तो कहीं दर्पण में अपने सौंदर्य को निहार रही है, कहीं पगतल में आलता लगा रही है तो कहीं प्रेम पाती पढ़ रही है। हर प्रसंग में उनकी भावभंगिमा अर्थपूर्ण नजर आती है। यह तय है कि इतनी उत्कृष्ट मूर्तियों के रचनाकार कलाजीवी नहीं, कलासाधक रहे होंगे।
समझ से परे
मंदिर की भित्तियों पर जब जीवन के हर आयाम को उकेरने का प्रयास किया जा रहा था तो वे महान रचनाकार भला दैनिक रागात्मकता से उभरे आनंद को उकेरने में कैसे चूकते। इसलिए प्राय: हर मंदिर पर प्रेमपूरित प्रस्तर प्रतिमाएं विद्यमान हैं। अन्य मूर्तियों की तुलना में मूर्तियों की संख्या बहुत कम है। किंतु फिर भी काम कला का हर रूप यहां नजर आता है। वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित अनेक आसन भी खजुराहो की मैथुन प्रतिमाओं में अंकित हैं।
इन सबमें सामूहिक मैथुन के दृश्य तो दर्शकों के मन में एक अलग तरह का कौतूहल पैदा करते ही हैं, किंतु पशु मैथुन के गिने-चुने दृश्यों का रहस्य समझ से परे है। यहां स्थित रति दृश्यों में कुछ तो वास्तव में इतने उत्कृष्ट बन पड़े हैं कि उनसे चरम अनुभूति का भाव भी झलकता है। ऐसे रति दृश्य खजुराहो की महानतम कलाकृति कहे जा सकते हैं। मूर्ति शिल्प की उत्कृष्टता यह भी दर्शाती है कि ये मैथुन मूर्तियां किसी तरह के पूर्वाग्रह या कुंठा से उपजी हुई रचनाएं नहीं है। किंतु धार्मिक स्थलों पर इनकी उपस्थिति सामान्य जन के मन में कई तरह के प्रश्नों को भी जन्म देती है। आखिर उपासना के पथ पर भोग-विलास का क्या अर्थ है? भक्ति के साथ भोग का क्या मेल? लेकिन ऐसे दृश्यों का उत्तर न तो मंदिर की दीवारों पर मिल सका और न किसी शिलालेख पर ही।
इस संदर्भ में जो भी मत सामने आते हैं, वे सब अनुमान पर ही आधारित कहे जा सकते हैं। एक मत है कि ये मूर्तियां यहां अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के सिद्धांत का हिस्सा हैं। इस विषय में यह भी कहा जाता है कि ये प्रतिमाएं भक्तों के संयम की परीक्षा का माध्यम हैं। जो इन काममग्न मूर्तियों के प्रभाव से मुक्त रह पाएगा, वही मंदिर में अपने इष्टदेव के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करेगा। ऐसे भी लोग हैं जो हेमवती की कथा को ही सत्य मानते हैं।
एक मत यह भी है कि चंदेल राजाओं के काल में इस क्षेत्र में तांत्रिक समुदाय की वाममार्गी शाखा का वर्चस्व था। जो योग तथा भोग दोनों को मोक्ष का साधन मानते थे। ये मूर्तियां उनके क्रियाकलापों की ही देन हैं। बहरहाल स्थापत्य की इस विधा के मूल में कारण और औचित्य चाहे कुछ भी रहा हो, यह तो निश्चित है कि उस काल की संस्कृति में ऐसी कला का भी महत्वपूर्ण स्थान था।
प्रकृति की संपदा निराली
खजुराहो में पर्यटकों के लिए पुरातत्व महत्व का एक और आकर्षण पुरातत्व संग्रहालय है। जहां प्राचीन मंदिरों तथा प्रतिमाओं के अवशेष संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त चौसठ योगिनी मंदिर, लालगुआन महादेव मंदिर तथा शिवसागर झील भी देखने योग्य जगहें हैं। खजुराहो के आसपास भी कुछ दर्शनीय स्थल हैं। केन नदी के तट पर स्थित एनेह फॉल वहां से 19 किलोमीटर दूर है। काफी ऊंचाई से गिरता यह झरना अनोखा प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर 7 किलोमीटर दूर बेनी सागर झील एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है। पन्ना मार्ग पर 34 किलोमीटर दूर पांडव जल प्रपात भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां से आगे निकल जाएं तो पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में अनेक वन्य प्राणियों को उनके वास्तविक परिवेश में स्वच्छंद विचरण करते देख सकते हैं।
एक शाम खजुराहो में हमें लोकनृत्यों से झूमती सांस्कृतिक संध्या देखने का अवसर मिला। जिसमें मध्यप्रदेश के साथ अन्य राज्यों के नृत्य भी प्रदर्शित किए गए। वैसे खजुराहो में सांस्कृतिक गतिविधियां अधिक नहीं हैं। फिर भी जैन मंदिरों में होने वाला पालकी महोत्सव, होली पर जल विहार वार्षिक मेला तथा शिवरात्रि पर लगने वाला मेला कुछ धार्मिक आयोजन हैं। इनमें स्थानीय पर्यटक अधिक होते हैं। दिसंबर में यहां लोक नृत्यों का राष्ट्रीय समारोह लोकरंजन भी पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। इसके साथ ही उस समय लोक आभूषण एवं लोकवादकों की प्रदर्शनी भी लगती है। लेकिन देश-विदेश के पर्यटकों को यहां सबसे ज्यादा लुभाने वाला कार्यक्रम हर वर्ष मार्च में होने वाला खजुराहो नृत्य समारोह है। इस समारोह में देश के विभिन्न शास्त्रीय नृत्यों की जानी-मानी प्रतिमाएं अपनी प्रतिमा का प्रदर्शन करती है। यूं भी भारत के शास्त्रीय नृत्य मंदिरों से सदा ही जुड़े रहे हैं। इस उत्सव के सहारे हर वर्ष इन नृत्यों की थाप मंदिर प्रांगण में सुनने को मिलती है। पृष्ठभूमि में नजर आते आलीशान मंदिर हर नृत्य को अनोखी भव्यता प्रदान करते हैं।
वास्तव में अद्भुत हैं खजुराहो के ये कला तीर्थ। सर्वोत्तम मूर्तिकला, सुव्यवस्थित शिल्पकला तथा उत्कृष्ट वास्तुकला की यह मुक्ताकाश दीर्घा सदियों तक कलाप्रेमियों और सौंदर्य उपासकों को आकर्षित करती रहेगी। sabhar :http://www.jagranyatra.com/

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चमत्कारः पानी छूते ही लड़की से उठती हैं लपटें

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जल जीवन 'नहीं' है


जल जीवन 'नहीं' है

शायद ही आपने किसी को ऐसा कहते सुना होगा जिसके लिए पानी का मतलब मौत के बराबर हो। जिस पानी को हम जीवन के आधारभूत के तौर पर जानते हैं, रशेल के लिए वही परेशानी का सबब है।उनके लिए पानी का छू जाना भी चिंता का कारण है। जानना चाहेंगे ऐसा क्यों?


क्या बीमारी है ये?

पानी से है एलर्जी

26 साल की रशेल को पानी से एलर्जी है। इसका मतलब ये है कि जब पूरी दुनिया बारिश का मजा लेती है वो कमरे में कैद रहती हैं। इसकी वजह ये हे कि अगर पानी की एक बूंद भी उनके शरीर पर गिरी तो उन्हें एलर्जी हो जाती है और उनके पूरे शरीर पर निशान पड़ जाते हैं।

रशेल को एक्वाजेनिक प्रुरिटिस नाम की बीमारी है। जिसका मतलब ये है कि उन्हें पानी से एलर्जी है। जिसकी वजह से वो बहुत ज्यादा समय तक नहा नहीं सकती न ही ठंडा पानी पी सकती हैं।

ये एक दुर्लभ किस्म की बीमारी है। वो बताती है कि घर से बाहर निकलने से पहले वो सौ बार सोचती हैं। sabhar :
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एक निर्देशक को एक ‌अभिनेत्री ने मारा थप्पड़

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 geetika tyagi slaps Subhash Kapoor for molesting her

जॉली एलएलबी फेम निर्देशक सुभाष कपूर को एक नवोदित अभिनेत्री ने थप्पड़ मारा है। इसका वीडियो खुद उस अभिनेत्री ने जारी किया। 

जॉली एलएलबी जैसे बड़ी फिल्‍म बनाने वाले फिल्म निर्देशक सुभाष कपूर इस बार गलत वजहों से चर्चाओं में हैं। उन पर एक नवोदित अभिनेत्री गीतिक त्यागी ने आरोप लगाया कि उन्होंने उनके साथ अश्‍लील हरकत की है। 

गीतिका ने इस हरकरत से खफा होकर सुभाष कपूर को थप्पड़ भी मारा है। इस पूरे घटनाक्रम का गीतिका ने वीडियो भी बनाया है। वीडियो बनाने के बाद गीतिका ने इसे यूट्यूब पर अपोलड भी कर दिया है। 

इस वीडियो में दिखाया गया है कि गीतिका सुभाष पर कई तरह के आरोप लगा रही हैं। सुभाष अपनी पत्नी के साथ चुपचाप खड़े हैं। सुभाष यह भी कह रहे हैं कि यदि उस लड़की को लगता है कि मैने उसके साथ बुरी हरकत की है। तो वह लड़की उन्हें थप्पड़ मार सकती है। 

सुभाष यह बात कई बार दोहराते हैं। आखिरकार वह लड़की रोती हुई सुभाष को थप्पड़ मार देती है। हालां‌कि इस बात की कोई एफआईआर नहीं दर्ज कराया गया है। और न ही इस मसले पर सुभाष की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आई है।  sabhar :http://www.amarujala.com/

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बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

इस मराठी मॉडल ने न्यूड होकर मचाया तहलका

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मुंबई। पूनम पांडे, शर्लिन चोपड़ा और वीना मलिक जैसी मॉडल्स के बाद अब मराठी मॉडल निकिता गोखले 'प्लेबॉय' मैगजीन के लिए न्यूड हो गईं हैं।एक मराठी वेबसाइट से मिली जानकारी के मुताबिक निकिता ने हाल ही में हॉलीवुड मैगजीन प्लेब्वॉय के लिए अपने कपड़े उतार दिए हैं। खबरों के मुताबिक निकिता ने हाल ही में मैगजीन के लिए न्यूड होकर फोटो शूट कराया है। निकिता की फोटो मैगजीन के मालिक हग हेफनर को भेजी गई है, अगर वे निकिता की फोटो का चयन कर लेते हैं तो निकिता शर्लिन के बाद इस मैगजीन के साथ न्यूड फोटो शूट कराने वाली दूसरी भारतीय मॉडल बन जाएंगी।निकिता नागपुर की रहने वाली हैं और इन्होंने इससे पहले कई मॉडलिंग असाइनमेंट्स किए हैं। इससे पहले शर्लिन ने इस मैगजीन के कवर पेज के लिए फोटो शूट कराया था। sabhar : jagaran.com

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गंगनचुंबी इमारतें बनाएंगे रोबोट

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वाशिंगटन। हारवर्ड में भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने स्वेच्छा से काम करने वाले रोबोट की एक पूरी सेना तैयार कर ली है। ये रोबोट आपसी समायोजन से बिना किसी मानवीय निगरानी के गगनचुंबी इमारतों से लेकर पिरामिड तक बना सकते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि इन्हें ठोस ढांचों को खड़ा करने में सक्षम ये रोबोट सामूहिक बुद्धिमत्ता और समायोजन से कार्य करते हैं। इन्हें किसी निगरानी और दिशा-निर्देश देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रणाली को किसी निगरानी और कैमरे से निगरानी की जरूरत नहीं पड़ती है। उनकी सहूलियत के लिए किसी खास किस्म के वातावरण बनाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। हारवर्ड यूनिवर्सिर्टी के वैानिकों ने ये टर्म्स प्रणाली बनाई है। इसके जरिए रोबोट जटिल और तीन आयामों वाले ढांचों को बिना किसी केंद्रीय कमान या निर्देशित नियमों के बाखूबी बना सकते हैं। टर्म्स प्रणाली की मदद से ऊंची इमारतें, महल, पिरामिड फोम ब्रिक से बनाए जा सकते हैं। इस प्रणाली के जरिए इमारत की सामग्री के जरिए खुद ब खुद ऐसी सीढि़यां बनाई जाती हैं। जिससे गुजरकर ये रोबोट ऊंचे स्थानों तक पहुंचते हैं और उस पर जरूरत के हिसाब से ईंटें जमाते जाते हैं। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में ऐसे रोबोट बाढ़ आने पर पानी रोकने के लिए बालू की बोरियां लगाने से लेकर मंगल ग्रह पर निर्माण कार्य में भी बखूबी भाग ले सकते हैं।
इस प्रणाली की सबसे अच्छी बात ये है कि जटिल से जटिल कार्य को सामूहिक रूप से ये रोबोट बिना किसी देखरेख के अंजाम दे सकते हैं। ऐसे में जहां इंसान की हदें खत्म होती हैं वहां भी इन रोबोट से बेहतरीन काम लिया जा सकता है। इन रोबोट को काम कराने के लिए माहौल या वातावरण को बदलने की भी जरूरत नहीं है। जैसे बाढ़ में बचाने वालों के भी जीवन का ख्याल रखना होता है। मंगल ग्रह पर इंसान को भेजने के लिए वहां के वातावरण के अनुकूल ही माहौल बनाना होगा। पर इन रोबोट के लिए ये सीमाएं नहीं हैं। इस प्रोजेक्ट की मुख्य जांचकर्ता हारवर्ड में इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर राधिका नागपाल और फ्रेड कावली हैं। प्रत्येक रोबोट बिल्डिंग बनाने की इस प्रक्त्रिया में दूसरे रोबोट के समानान्तर काम करता है। लेकिन उसे ये नहीं पता होता कि उसी वक्त यही काम और कौन कर रहा है। ऐसे में अगर कोई एक रोबोट टूट गया या काम से हट गया तो इससे दूसरे रोबोट पर असर नहीं पड़ता और वह अपना काम करता रहता है। यानी इस प्रणाली के जरिए एक निर्देश पांच रोबोट या पांच हजार रोबोट को एक साथ दिया जा सकता है। टर्म्स प्रणाली मापने, वितरण प्रणाली और आर्टीफियल इंटेलिजेंस का बेजोड़ नमूना है। नागपाल के इस स्वनियंत्रित प्रणाली अनुसंधान को एलगारिथम के हिसाब से तैयार किया गया है। जिसमें रोबोट का एक समूह एक कालोनी की तरह काम करता है। सभी रोबोट एक समूह में एक इकाई की तरह उच्च स्तरीय काम करते हैं। sabhar :http://www.jagran.com/

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वैज्ञानिकों ने बनाया 'न सड़ने वाला आलू'

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लाल आलू

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने ऐसा जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) आलू विकसित किया है जिसमें लेट ब्लाइट (फफूंद के कारण होने वाली सड़न) नहीं होगी.
तीन साल तक किए गए परीक्षण में यह जीएम आलू इस बीमारी के प्रभाव में आने के बावजूद विकसित होने में सफल रहा.

यह शोध फिलोसॉफिकल ट्रांजेक्शन ऑफ दि रॉयल सोसाइटी ब्रिटेन जर्नल में प्रकाशित हुआ है.फफूंद के कारण होने वाली सड़न से किसान कई पीढ़ियों से परेशान रहे हैं. आलू में फफूंद से होने वाली सड़न के कारण ही आयरलैंड में साल 1840 के दशक में आलू की खेती का सूखा पड़ा था.

यूरोप में प्रभाव

फफूंद के कारण सड़न का सबसे आसान शिकार आलू ही होता है. आलू जैसी सब्ज़ियों को सड़ाने वाली यह फंफूद नमी और उमस वाले मौसम में विशेष रूप से पनपती है. यूरोप में आलू के उत्पादन के मौसम में आमतौर पर नमी और उमस पाई जाती है.
यह संक्रमण बहुत तेज़ी से फैलता है और इसका असर इतना व्यापक होता है कि ब्रिटेन में पैदा होने वाले कुल आलू में से 60 लाख टन आलू इसकी वजह से सड़ जाता है.
इससे बचने के लिए किसानों को लगातार सावधान रहना पड़ता है. इससे बचाव के लिए उन्हें साल में 15 बार तक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है.
बॉयो-टेक्नॉलॉजी के प्रयोग से फसलों को बचाने की संभावना की जांच के लिए यूरोप-स्तर पर शोध कर रहे जॉन इन्ज़ सेंटर और सेंसबरी प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने साल 2010 से ही जेनेटिक मॉडिफिकेशन की सहायता से ऐसी सड़न रोकने के लिए परीक्षण शुरू कर दिए थे.
आलू की सड़न
शोधकर्ताओं ने लाल आलू की एक प्रजाति में दक्षिणी अमरीका के एक जंगली आलू का एक ऐसा जीन डाला जिसकी वजह से इस आलू में फफूंद से होने वाली सड़न के ख़िलाफ़ प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में मदद मिली.
शोध से जुड़े हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि इस आलू में अतिरिक्त जीन डालना आलू के पौधे की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी है.
इस शोधपत्र के प्रमुख लेखक और सेंसबरी प्रयोगशाला के प्रोफ़ेसर जोनाथन जोंस कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस बीमारी पर रासायनिक रूप से नियंत्रण करना बेहतर विकल्प है."
साल 2012 में परीक्षण के तीसरे साल ग़ैर-जीएम आलुओं में अगस्त तक सड़न होने लगी थी जबकि जीएम आलुओं में सड़न नहीं हुई.
दूसरी सबसे ख़ास बात है कि इन जीएम आलुओं की पैदावार की दर भी सामान्य आलुओं से लगभग दोगुनी रही.

स्वाद का सवाल

हालांकि वैज्ञानिकों ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है कि इस जीएम आलू का स्वाद कैसा है क्योंकि उन्हें जीएम आलू को खाने की मनाही थी. लेकिन वैज्ञानिकों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ऐसी कोई वजह है जिससे नए जीन से आलू का स्वाद बदल जाए.
"इससे किसानों को फायदा ही होगा. उन्हें बीज पर ज़्यादा खर्च करना होगा लेकिन सड़न से बचाव पर होने उनके खर्च में काफ़ी कमी आएगी. "
जोनाथन जोंस, शोधपत्र के प्रमुख लेखक और सैंसबरी प्रयोगशाला के प्रोफ़ेसर
फफूंद के कारण होने वाली सड़न बार-बार सिर उठा लेने वाली बीमारी है इसलिए सेंसबरी प्रयोगशाला के वैज्ञानिक ऐसे जीन की तलाश में हैं जो आलू की प्रतिरोधक क्षमता को और ज़्यादा बढ़ा सके.
इस तकनीक से आलुओं में फफूंद के कारण सड़न की मात्रा में काफ़ी कमी आ सकेगी. हालांकि इससे यह जीएम आलू थोड़ा महंगा हो जाएगा.
प्रोफ़ेसर जोंस कहते हैं, "फिर भी इससे किसानों को फायदा ही होगा. उन्हें बीज पर ज़्यादा खर्च करना होगा लेकिन सड़न से बचाव पर होने उनके खर्च में काफ़ी कमी आएगी."
वैज्ञानिकों का मानना है कि असल चुनौती इस जीएम आलू के उत्पादन की अनुमति प्राप्त करना है.
वैज्ञानिकों ने इस जीएम आलू के उत्पादन का लाइसेंस एक अमरीकी कंपनी सिम्पलोट को दिया है.
यह कंपनी इस आलू को अमरीका में पैदा करना चाहती है.
प्रोफ़ेसर जोंस कहते हैं, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यूरोप के करदाताओं के पैसे का लाभ यूरोप के लोगों से पहले अमरीकी किसानों को मिलेगा."
वे कहते हैं, "इस तरह के उत्पाद अमरीकी बाज़ार में अगले कुछ सालों में और यूरोप में अगले आठ से 10 सालों में आएँगे."

कौन पैदा करेगा, खाएगा और बेचेगा ?

आलू की सड़न
जीएम खाद्य पदार्थों के आलोचकों का कहना है कि चाहे जितना भी बड़ा पर्यावरणीय लाभ हो उन्हें विश्वास है कि ग्राहक इसमें रुचि नहीं दिखाएंगे.
इस तरह के खाद्य पदार्थों का विरोध करने वाली संस्था जीएम फ्रीज़ के निदेशक लिज़ ओ-नील कहते हैं, "क्या सचमुच कोई जीएम आलू पैदा करने, बेचने या ख़रीदने जा रहा है? क़ानून कहता है कि ऐसे पदार्थों पर जीएम लिखना अनिवार्य है. हमारे अनुभव बताते हैं कि ब्रितानी लोग ऐसी चीज़ें नहीं खरीदना चाहते और ब्रितानी ऐसी चीज़ें नहीं पैदा करेंगे जिसे वह बेच नहीं सके."
दूसरे कई शोधकर्ताओं ने इस नए शोध का स्वागत करने के बावजूद इस नए जीएम आलू के ब्रिटेन में उत्पादन को लेकर नकारात्मक प्रतिक्रिया दी है.
एबेरीस्टविथ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस पोलाक कहते हैं, "आलू में होने वाली सड़न एक मुश्किल बीमारी है. दुर्भाग्यवश यूरोप का मौजूदा क़ानून काफ़ी महंगा और धीमा है. इसका मतलब यह है कि ब्रितानी वैज्ञानिकों की उपलब्धि का लाभ पहले दूसरे देशों को मिलेगा."

इस परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों ने आलू के केवल 600 पौधे उगाए थे. हालांकि तीन साल तक चले परीक्षण में आलुओं को बचाए रखने में 40,000 पाउंड (तक़रीबन साढ़े 41 लाख रुपये) खर्च हुए. sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

दाढ़ी-मूंछों में खुद को Sexy समझती है ये लड़की

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जी हां आपने बिल्कुल ठीक सुना ये लड़का नहीं बल्कि दाढ़ी मूंछों वाली लड़की है. जिसका नाम हरनाम कौर है जिसके मर्दों की तरह दाढी-मूंछों के साथ-साथ छाती में भी बाल है. हरमान इन बालों में ही खुद को सेक्सी समझती है हरनाम ने खुद से वादा किया है कि वो कभी बाल नहीं कटवाएगी. हरनाम जहां भी जाती है अपनी दाढ़ी-मूंछो के साथ ही जाती है और साथ में सिर पर पगड़ी भी बांधती है जिसें देखने वाले एकबार तो सरदार जी समझ बैठते हैं, लेकिन हकीकत कुछ ही लोग जानते हैं. दरअसल बात यह है.हरनाम कौर को पॉलीसाइटिक ओवरी सिंड्रोम नाम की बीमारी है. जब वो केवल 11 साल की थीं तभी उनकी दाढ़ी आना शुरू हो गई थी कहती हैं कि उन्होंने फैसला किया है कि वो कभी भी अपने चेहरे के बाल नहीं काटेंगी. उन्हें लगता है कि इस दाढ़ी के साथ वो ज्यादा सेक्सी और सुंदर लगती हैं..वो कहती हैं कि उनके इस फैसले से उनके मां-बाप संतुष्ट नहीं थे. लेकिन उनके भाई ने उनके इस फैसले में उनका पूरा सहयोग किया.एक ओर जहां लड़की के लिए दुख का कारण हो सकता है वहीं हरनाम ने एक बहुत ही बहादुरी वाला फैसला लिया है इतना ही नहीं बल्कि कई अनजान लोगों से उन्हें मारने तक की धमकियां मिली.हरनाम का कहना है कि अपने बालों की वजह से उन्हें स्कूल में ताने तक सुनने पड़े ये बाल न केवल उनके चेहरे पर हैं बल्कि उनके हाथ और छाती पर भी पर्याप्त बाल हैं.
















sabhar : bhaskar.com




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