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सोमवार, 23 दिसंबर 2013

पुनर्जन्म से जुड़ी सच्ची घटनाएं

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जानिए पुनर्जन्म से जुड़ी 10 सच्ची घटनाएं, इन्हें आप नकार नहीं सकते

हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य का केवल शरीर मरता है उसकी आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। कई लोग पुनर्जन्म को कोरी बकवास मानते हैं लेकिन पुनर्जन्म को लेकर कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिससे कि इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। गीताप्रेस गोरखपुर के परलोक और पुनर्जन्मांक में ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जिससे पुनर्जन्म की मान्यता सच प्रतीत होती है। आज हम आपको पुनर्जन्म से जुड़ी कुछ ऐसी ही घटनाओं के बारे में बता रहे हैं।

जानिए पुनर्जन्म से जुड़ी 10 सच्ची घटनाएं, इन्हें आप नकार नहीं सकते

घटना- 1
 
यह घटना सन 1950 अप्रैल की है। कोसीकलां गांव के निवासी भोलानाथ जैन के पुत्र निर्मल की मृत्यु चेचक के कारण हो गई थी। इस घटना के अगले साल यानी सन 1951 में छत्ता गांव के निवासी बी. एल. वाष्र्णेय के घर पुत्र का जन्म हुआ। उस बालक का नाम प्रकाश रखा गया। प्रकाश जब साढ़े चार साल का हुआ तो एक दिन वह अचानक बोलने लगा- मैं कोसीकलां में रहता हूं। मेरा नाम निर्मल है। मैं अपने पुराने घर जाना चाहता हूं। ऐसा वह कई दिनों तक कहता रहा। 
प्रकाश को समझाने के लिए एक दिन उसके चाचा उसे कोसीकलां ले गए। यह सन 1956 की बात है। कोसीकलां जाकर प्रकाश को पुरानी बातें याद आने लगी। संयोगवश उस दिन प्रकाशकी मुलाकात अपने पूर्व जन्म के पिता भोलानाथ जैन से नहीं हो गई। प्रकाश के इस जन्म के परिजन नहीं चाहते थे कि वह पुरानी बातें भूल जाए। बहुत समझाने पर प्रकाश पुरानी बातें भूलने लगा लेकिन उसकी पूर्व जन्म की स्मृति पूरी तरह से नष्ट नहीं हो पाई।
सन 1961 में भोलनाथ जैन का छत्ता गांव जाना हुआ। वहां उन्हें पता चला कि यहां प्रकाश नामक का कोई लड़का उनके मृत पुत्र निर्मल के बारे में बातें करता है। यह सुनकर वे वाष्र्णेय परिवार में गए। प्रकाश ने फौरन उन्हें अपने पूर्व जन्म के पिता के रूप में पहचान लिया। उसने अपने पिता को कई ऐसी बातें बताई जो सिर्फ उनका बेटा निर्मल ही जानता था

घटना- 2
 
यह घटना आगरा की है। यहां किसी समय पोस्ट मास्टर पी.एन. भार्गव रहा करते थे। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम मंजु था। मंजु ने ढाई साल की उम्र में ही यह कहना शुरु कर दिया कि उसके दो घर हैं। मंजु ने उस घर के बारे में अपने परिवार वालों को भी बताया। पहले तो किसी ने मंजु की उन बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब कभी मंजु धुलियागंज, आगरा के एक विशेष मकान के सामने से निकलती तो कहा करती थी- यही मेरा घर है। 
एक दिन मंजु को उस घर में ले जाया गया। उस मकान के मालिक प्रतापसिंह चतुर्वेदी थे। वहां मंजु ने कई ऐसी बातें बताई जो उस घर में रहने वाले लोग ही जानते थे। बाद में भेद चला कि श्रीचतुर्वेदी की चाची (फिरोजाबाद स्थित चौबे का मुहल्ला निवासी श्रीविश्वेश्वरनाथ चतुर्वेदी की पत्नी) का निधन सन 1952 में हो गया था। अनुमान यह लगाया गया कि उन्हीं का पुनर्जन्म मंजु के रूप में हुआ है।
घटना- 3
 
सन 1960 में प्रवीणचंद्र शाह के यहां पुत्री का जन्म हुआ। इसका नाम राजूल रखा गया। राजूल जब 3 साल की हुई तो वह उसी जिले के जूनागढ़ में अपने पिछले जन्म की बातें बताने लगी। उसने बताया कि पिछले जन्म में मेरा नाम राजूल नहीं गीता था। पहले तो माता-पिता ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब राजूल के दादा वजुभाई शाह को इन बातों का पता चला तो उन्होंने इसकी जांच-पड़ताल की। 
जानकारी मिली कि जूनागढ़ के गोकुलदास ठक्कर की बेटी गीता की मृत्यु अक्टूबर 1559 में हुई थी। उस समय वह ढाई साल की थी। वजुभाई शाह 1965 में अपने कुछ रिश्तेदारों और राजूल को लेकर जूनागढ़ आए। यहां राजून ने अपने पूर्वजन्म के माता-पिता व अन्य रिश्तेदारों को पहचान लिया। राजूल ने अपना घर और वह मंदिर भी पहचान लिया जहां वह अपनी मां के साथ पूजा करने जाती थी।


घटना- 4
 
मध्य प्रदेश के छत्रपुर जिले में एम. एल मिश्र रहते थे। उनकी एक लड़की थी, जिसका नाम स्वर्णलता था। बचपन से ही स्वर्णलता यह बताती थी कि उसका असली घर कटनी में है और उसके दो बेटे हैं। पहले तो घर वालों ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब वह बार-बार यही बात बोलने लगी तो घर वाले स्वर्णलता को कटनी ले गए। कटनी जाकर स्वर्णलता ने पूर्वजन्म के अपने दोनों बेटों को पहचान लिया। उसने दूसरे लोगों, जगहों, चीजों को भी पहचान लिया।
छानबीन से पता चला कि उसी घर में 18 साल पहले बिंदियादेवी नामक महिला की मृत्यु दिल की धड़कने बंद हो जाने से मर गई थीं। स्वर्णलता ने यह तक बता दिया कि उसकी मृत्यु के बाद उस घर में क्या-क्या परिवर्तन किए गए हैं। बिंदियादेवी के घर वालों ने भी स्वर्णलता को अपना लिया और वही मान-सम्मान दिया जो बिंदियादेवी को मिलता था।

घटना- 5
 
सन 1956 की बात है। दिल्ली में रहने वाले गुप्ताजी के घर पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम गोपाल रखा गया। गोपाल जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने बताया कि पूर्व जन्म में उसका नाम शक्तिपाल था और वह मथुरा में रहता था, मेरे तीन भाई थे उनमें से एक ने मुझे गोली मार दी थी। मथुरा में सुख संचारक कंपनी के नाम से मेरी एक दवाओं की दुकान भी थी।
गोपाल के माता-पिता ने पहले तो उसकी बातों को कोरी बकवास समझा लेकिन बार-बार एक ही बात दोहराने पर गुप्ताजी ने अपने कुछ मित्रों से पूछताछ की। जानकारी निकालने पर पता कि मथुरा में सुख संचारक कंपनी के मालिक शक्तिपाल शर्मा की हत्या उनके भाई ने गोली मारकर कर दी थी। जब शक्तिपाल के परिवार को यह पता चला कि दिल्ली में एक लड़का पिछले जन्म में शक्तिपाल होने का दावा कर रहा है तो शक्तिपाल की पत्नी और भाभी दिल्ली आईं। 
गोपाल ने दोनों को पहचान लिया। इसके बाद गोपाल को मथुरा लाया गया। यहां उसने अपना घर, दुकान सभी को ठीक से पहचान लिया साथ ही अपने अपने बेटे और बेटी को भी पहचान लिया। शक्तिपाल के बेटे ने गोपाल के बयानों की तस्दीक की।
घटना- 6
 
न्यूयार्क में रहने वाली क्यूबा निवासी 26 वर्षीया राचाले ग्राण्ड को यह अलौकिक अनुभूति हुआ करती थी कि वह अपने पूर्व जन्म में एक डांसर थीं और यूरोप में रहती थी। उसे अपने पहले जन्म के नाम की स्मृति थी। खोज करने पर पता चला कि यूरोप में आज से 60 वर्ष पूर्व स्पेन में उसके विवरण की एक डांसर रहती थी। 
राचाले की कहानी में सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि जिसमें उसने कहा था कि उसके वर्तमान जन्म में भी वह जन्मजात नर्तकी की है और उसने बिना किसी के मार्गदर्शन अथवा अभ्यास के हाव-भावयुक्त डांस सीख लिया था।

घटना- 7
 
पुनर्जन्म की एक और घटना अमेरिका की है। यहां एक अमेरिकी महिला रोजनबर्ग बार-बार एक शब्द जैन बोला करती थी, जिसका अर्थ न तो वह स्वयं जानती थी और न उसके आस-पास के लोग। साथ ही वह आग से बहुत डरती थी। जन्म से ही उसकी अंगुलियों को देखकर यह लगता था कि जैसे वे कभी जली हों।
एक बार जैन धर्म संबंधी एक गोष्ठी में, जहां वह उपस्थित थी, अचानक रोजनबर्ग को अपने पूर्व जन्म की बातें याद आने लगी। जिसके अनुसार वह भारत के एक जैन मंदिर में रहा करती थी और आग लग जाने की आकस्मिक घटना में उसकी मृत्यु हो गई थी।

घटना- 8
 
जापान जैसे बौद्ध धर्म को मानने वाले देशों में पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है। 10 अक्टूबर 1815 को जापान के नकावो मूरा नाम के गांव के गेंजो किसान के यहां पुत्र हुआ। उसका नाम कटसूगोरो था। जब वह सात साल का हुआ तो उसने बताया कि पूर्वजन्म में उसका नाम टोजो था और उसके पिता का नाम क्यूबी, बहन का नाम फूसा था तथा मां का नाम शिड्जू था। 
6 साल की उम्र में उसकी मृत्यु चेचक से हो गई थी। उसने कई बार कहा कि वह अपने पूर्वजन्म के पिता की कब्र देखने होडोकूबो जाना चाहता है। उसकी दादी (ट्सूया) उसे होडोकूबो ले गई। वहां जाते समय उसने एक घर की ओर इशारा किया और बताया कि यही पूर्वजन्म में उसका घर था। 
पूछताछ करने पर यह बात सही निकली। कटसूगोरो ने यह भी बताया कि उस घर के आस-पास पहले तंबाकू की दुकानें नहीं थी। उसकी यह बात भी सही निकली। इस बात ये सिद्ध होता है कि कटसूगोरो ही पिछले जन्म में टोजो था।

घटना- 9
 
थाईलैंड में स्याम नाम के स्थान पर रहने वाली एक लड़की को अपने पूर्वजन्म के बारे में ज्ञात होने का वर्णन मिलता है। एक दिन उस लड़की ने अपने परिवार वालों को बताया कि उसके पिछले जन्म के मां-बाप चीन में रहते हैं और वह उनके पास जाना चाहती है। 
उस लड़की को चीनी भाषा का अच्छा ज्ञान भी था। जब उस लड़की की पूर्वजन्म की मां को यह पता चला तो वह उस लड़की से मिलने के लिए स्याम आ गई। लड़की ने अपनी पूर्वजन्म की मां को देखते ही पहचान लिया। बाद में उस लड़की को उस जगह ले जाया गया, जहां वह पिछले जन्म में रहती थी। 
उससे पूर्वजन्म से जुड़े कई ऐसे सवाल पूछे गए। हर बार उस लड़की ने सही जवाब दिया। लड़की ने अपने पूर्व जन्म के पिता को भी पहचान लिया। पुनर्जन्म लेने वाले दूसरे व्यक्तियों की तरह इस लड़की को भी मृत्यु और पुनर्जन्म की अवस्थाओं के बीच की स्थिति की स्मृति थी।

घटना- 10

सन 1963 में श्रीलंका के बाटापोला गांवमें रूबी कुसुमा पैदा हुई। उसके पिता का नाम सीमन सिल्वा था। रूबी जब बोलने लगी तो वह अपने पूवर्जन्म की बातें करने लगी। उसने बताया कि पूर्वजन्म में वह एक लड़का थी। उसका पुराना घर वहां से चार मील दूर अलूथवाला गांव में है। वह घर बहुत बड़ा है। उसने यह भी बताया कि पूर्वजन्म में उसकी मृत्यु कुएं में डुबने से हुई थी।
रुबी के पुराने माता-पिता पुंचीनोना को ढूंढ निकालना मुश्किल नहीं था। उन्होंने बताया कि उनका बेटा करुणासेना 1956 में मरा था। उन्होंने उसके कुएं में डूब जाने की घटना और दूसरी बातें भी सच बताई और कहा कि लड़की की सारी बातें बिलकुल सच है। 
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मौजूद है लंका में रामायण में लिखी सभी बातें

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रामायण में लिखी सभी बातें मौजूद है लंका में, यकीन नहीं तो देखिए तस्वीरें

राजदरबार में रखा रावण का सिंहासन
श्रीलंका की 10 दिनी सांस्कृतिक यात्रा से लौटकर ललित निबंधकार डॉ. श्रीराम परिहार ने अपने संस्मरण सुनाए। बकौल डॉ. परिहार वहां रामकालीन इतने अवशेष और प्राच्य सामग्री है जो इसे धार्मिक मान्यता और आस्था तक सीमित नहीं करती, बल्कि इसके ऐतिहासिक होना भी प्रमाणित करती है। यह सांस्कृतिक यात्रा अखिल भारतीय साहित्य परिषद ने कराई। यात्रा का उद्देश्य श्रीलंका में फैले राम कालीन अवशेष को दिखाना और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना था। सांस्कृतिक दल में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र गुजरात, उड़ीसा प्रदेशों के 10 विद्वान गए थे।रावण का खंडित हो चुका महल। उसका राज सिंहासन। अशोक वाटिका। वहां बहता प्राकृतिक झरना। झरने के पानी के पास ही पत्थरों पर विशालकाय पैरों के निशान जो हनुमानजी के बताए जाते हैं। जली हुई लंका के अवशेष। मैं यह अवशेष देखता तो रामचरितमानस की चौपाइयां जेहन में गूंजने लगती। लगा जैसे राम-रावण युग में पहुंच गया। सीता यहीं रही। हनुमानजी यहां संजीवनी लेकर आए थे और वहां लक्ष्मण ने विभीषण का राजतिलक किया था। सब कुछ तो है जो रामायण और मानस में लिखा है

रामायण में लिखी सभी बातें मौजूद है लंका में, यकीन नहीं तो देखिए तस्वीरें

टीलेनुमा रावण के महल के अवशेष के पास डॉ.परिहार


रामसेतु से शुरू हुई यात्रा : रामसेतु को दूरबीन से दिखाया। यह बारीक रेखा की तरह नजर आता है। अशोकवाटिका नारवाएलिया में है। यह शिमला की तरह ठंडे घनघोर जंगल के बीच 10 किमी में फैली है। चट्टान पर हनुमानजी के पैरों के निशान हैं।
रामायण में लिखी सभी बातें मौजूद है लंका में, यकीन नहीं तो देखिए तस्वीरें
चट्टान पर हनुमानजी के पैरों के निशान


लंका के बीचोंबीच रावण का महल : रावण का महल लंका के बीचोंबीच चट्टान पर है। यह चट्टान 500 फीट से अधिक ऊंची है। चारों ओर पानी से भरी गहरी खाई है। ऊपर रावण का महल, सिंहासन आज भी मौजूद है। चारों ओर महल के अवशेष हैं।


जमीन के जले होने के निशान : समुद्र किनारे वह स्थान हैं जहां लंका जलाने के बाद हुनमानजी ने पूंछ बुझाई थी। यहां 10 किलोमीटर क्षेत्र में जलने के निशान है। कोई पेड़ नहीं। जमीन व चट्टानें जली हैं।

गायत्री शक्तिपीठ में नर्मदा के शिवलिंग : नारवाएलिया में स्थिति गायत्री शक्तिपीठ में नर्मदा नदी से ले जाए शिवलिंग है। विधिविधान से हर रोज पूजा-अर्चना होती है। श्रीलंका में तमिल भाषी हिंदू 18 प्रतिशत हैं। यह शिव व राम के उपासक है। प्रत्येक हिंदू मंदिर के आसपास बौद्ध मंदिर हैं।
रामायण में लिखी सभी बातें मौजूद है लंका में, यकीन नहीं तो देखिए तस्वीरें

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रविवार, 22 दिसंबर 2013

पुरुष मरीज जब पेट की सूजन का इलाज कराने अस्पताल पहुंचा तो उसे पता चला कि वह महिला है

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बीजिंग । हांगकांग में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। यहां पर 66 वर्षीय एक पुरुष मरीज जब पेट की सूजन का इलाज कराने अस्पताल पहुंचा तो उसे पता चला कि वह महिला है।
दरअसल, जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया उसके पेट में अंडाशय है और सूजन वास्तव में उसके अंडाशय में सिस्ट के कारण थी। यानी वह महिला था क्योंकि अंडाशय महिलाओं में पाया जाता है। हांगकांग के 




वांग वाह हास्पिटल और क्वीन एलिजाबेथ अस्पताल के डॉक्टरों ने इस मामले की जानकारी दी।
हांगकांग मेडिकल जर्नल में इस मामले की जानकारी सोमवार को प्रकाशित हुई। साउथ चाइना मार्निग ने बाल चिकित्सा प्रोफेसर एलिस हान कैमलून के हवाले से कहा, मरीज वास्तव में महिला है, जो गर्भवती नहीं हो सकती, लेकिन उसमें जन्मजात कांजेनिटल एड्रिनल हाइपरप्लैसिया (सीएएच) है, जिससे वह पुरुष नजर आता है। इसके कारण उसके शरीर में पुरुष हॉरमोन पर्याप्त मात्रा में बनते हैं। उन्होंने कहा यह काफी दिलचस्प और दुर्लभ मामला है, जिसमें पुरुष और स्त्री दोनों का ही मिश्रण है। ऐसा मामला भविष्य में शायद ही देखने को मिले।
रिपोर्ट के मुताबिक उसकी लंबाई मात्र 1.37 मीटर है। उसने पुरुष के तौर पर ही रहने का फैसला किया है। चिकित्सा के इतिहास में स्त्री और पुरुष के मिश्रित लक्षण के छह मामले सामने आए हैं। इस मरीज की पहचान अन्य की तुलना में काफी देर में हुई। यह स्थिति दो आनुवांशिक विकारों के आपस में मिलने से होती है। दरअसल, टर्नर सिंड्रोम केकारण महिलाओं में गर्भवती न हो पाने समेत महिला होने के कुछ लक्षणों की कमी रह जाती है। इससे पीडि़त लोग आम तौर पर महिलाओं की तरह दिखते हैं लेकिन वे पूर्ण महिला नहीं होते। मगर इस मामले में मरीज में सीएएच की स्थिति भी है, जिसके कारण उसमें पुरुषों के हॉरमोन भी काफी हैं और इसी कारण वह पुरुष की तरह दिखता है। एक अनुमान के अनुसार 2500 से तीन हजार में एक महिला टर्नर सिंड्रोम से पीडि़त होती है। सामान्य महिलाओं में एक्स क्रोमोसोम का जोड़ा होता है जबकि पुरुष में एक एक्स और एक वाई क्रोमोसोम होता है। टर्नर सिंड्रोम के मरीज में सिर्फ एक एक्स क्रोमोसोम होता है। वह लड़कियों की तरह दिखते तो हैं, लेकिन पूर्ण स्त्री न होने का पता किशोरावस्था में पहुंचने पर लगता है जब समय पर उनको मासिक धर्म नहीं होता। sabhar : http://www.jagran.com

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नासा से आई तस्वीरों में नटखट चूहे

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चूहा


मंगल ग्रह से आई तस्वीरों में पत्थरों के साथ नटखट चूहा दिखाई दिया है.
आपने आज तक घरों में देखे होंगे चूहे, खेतों में देखे होंगे चूहे, जंगलो में देखे होंगे चूहो के बिल.
पृथ्वी के साथ दूसरे ग्रह पर भी पहुंच गया है ये जीव. जी हां, मंगल पर चूहा दिखाई दिया गया हैं.
पहले कुछ लोग इसे भी पत्थर मान रहे थे लेकिन जब तस्वीरों का बारीकियो से अध्ययन किया गया तो लगा ये कोई जीव ही हैं. वैज्ञानिक भी हैरान है आखिर मंगल पर कैसे आया चूहा.
हाल ही में नासा ने क्यूरीओसीटी से आई कुछ तस्वीरें जारी की. इन तस्वीरो में से कुछ तस्वीरों में चूहा भी था.
वैज्ञानिकों का कहना है कि दो पत्थरों के बीच एक जीव दिख रहा है जिसके पूंछ है, आंखे है और पंजे है और वही पूरा धड़ हैं.
इसे देख वैज्ञानिक भी आश्चर्य चकित है. उनका मानना है कि ये जीव चूहा ही है. पर अभी तक ये समझ नहीं आ रहा की अगर ये चूहा है तो ये मंगल पर पहुंचा कैसे ? sabhar :http://www.samaylive.com

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पति को बचाने के लिए नंगे पैर दौड़ी 66 साल की महिला, जीतने पर मिले पांच हजार

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पति को बचाने के लिए नंगे पैर दौड़ी 66 साल की महिला, जीतने पर मिले पांच हजार

बारामती. केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार का जन्मदिन था। उनके गृह जिले बारामती में इस मौके पर दौड़ आयोजित की गई। तीन किमी की रेस। बड़ी संख्या में युवा और गांव के लोग शामिल हुए। हरी झंडी दिखाई गई। लोग दौड़ पड़े। जूते और ट्रैक सूट पहनी भीड़ को पार करते हुए एक महिला तेजी से आगे निकली। और जीत दर्ज करके ही मानी।
विजेता के नाम का ऐलान हुआ। लताबाई करे। उम्र 66 साल। साड़ी पहनकर नंगे पैर दौडऩे वाली। दौड़ शुरू होते ही लताबाई की चप्पल टूट गई थी। पर वह रुकीं नहीं। नंगे पैर दौड़ती रहीं। फिनिश लाइन पर पहुंचते-पहुंचते उनकी सांसें फूल चुकी थीं। पर यह जीत बेहद जरूरी थी।

दिल की बीमारी है लताबाई के पति को
ये दौड़ लता की नहीं उनके पति की जिंदगी की थी। जो अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें दिल की बीमारी है। इलाज के लिए 15 हजार रुपए की जरूरत है। दौड़ जीतकर 5 हजार रुपए मिले। बाकी 10 हजार का इंतजाम करना बाकी है। लताबाई बुलढाणा जिले के मेहकर गांव की रहने वाली हैं। पैसे के लिए सबके पास गई थीं पर कोई क्यों सुनता। तीन बेटियों की शादी में जमापूंजी पहले ही खर्च हो चुकी थी। इकलौता बेटा सुनील मजदूरी करता है। तभी इस दौड़ का पता चला तो जी-जान लगा के दौड़ गईं।
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शनिवार, 21 दिसंबर 2013

वे न कुछ खाते हैं और न पीते हैं. सात दशकों से केवल हवा पर जीते हैं

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. गुजरात में मेहसाणा ज़िले के प्रहलाद जानी एक ऐसा चमत्कार बन गये हैं, जिसने विज्ञान को चौतरफ़ा चक्कर में डाल दिया है. 

भूख-प्यास से पूरी तरह मुक्त अपनी चमत्कारिक जैव ऊर्जा के बारे में प्रहलाद जानी स्वयं कहते हैं कि यह तो दुर्गा माता का वरदान हैः "मैं जब 12 साल का था, तब कुछ साधू मेरे पास आये. कहा, हमारे साथ चलो. लेकिन मैंने मना कर दिया. क़रीब छह महीने बाद देवी जैसी तीन कन्याएं मेरे पास आयीं और मेरी जीभ पर उंगली रखी. तब से ले कर आज तक मुझे न तो प्यास लगती है और न भूख."

उसी समय से प्रहलाद जानी दुर्गा देवी के भक्त हैं. उन के अपने भक्त उन्हें माताजी कहते हैं. लंबी सफ़ेद दाढ़ी वाला पुरुष होते हुए भी वे किसी देवी के समान लाल रंग के कपड़े पहनते और महिलाओं जैसा श्रृंगार करते हैं. 

कई बार जांच-परख

भारत के डॉक्टर 2003 और 2005 में भी प्रहलाद जानी की अच्छी तरह जांच-परख कर चुके हैं. पर, अंत में दातों तले उंगली दबाने के सिवाय कोई विज्ञान सम्मत व्याख्या नहीं दे पाये. इन जाचों के अगुआ रहे अहमदाबाद के न्यूरॉलॉजिस्ट (तंत्रिकारोग विशेषज्ञ) डॉ. सुधीर शाह ने कहाः "उनका कोई शारीरिक ट्रांसफॉर्मेशन (कायाकल्प) हुआ है. वे जाने-अनजाने में बाहर से शक्ति प्राप्त करते हैं. उन्हें कैलरी (यानी भोजन) की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. हमने तो कई दिन तक उनका अवलोकन किया, एक-एक सेकंड का वीडियो लिया. उन्होंने न तो कुछ खाया, न पिया, न पेशाब किया और न शौचालय गये." 

भारतीय सेना की भी दिलचस्पी

गत 22 अप्रैल से नौ मई तक प्रहलाद जानी डॉक्टरी जाँच-परख के लिए एक बार फिर अहमदाबाद के एक अस्पातल में 15 दिनों तक भर्ती थे. इस बार भारतीय सेना के रक्षा शोध और विकास संगठन का शरीरक्रिया विज्ञान संस्थान DIPAS जानना चाहता था कि प्रहलाद जानी के शरीर में ऐसी कौन सी क्रियाएं चलती हैं कि उन्हें खाने-पीने की कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

तीस डॉक्टरों की एक टीम ने तरह तरह की डॉक्टरी परीक्षाएं कीं. मैग्नेटिक रिजोनैंस इमेजींग मशीन से उन के शरीर को स्कैन किया. हृदय और मस्तिष्क क्रियाओं को तरह तरह से मापा. रक्त परीक्षा की. दो वीडियो कैमरों के द्वारा चौबीसो घंटे प्रहलाद जानी पर नज़र रखी. जब भी वे अपना बिस्तर छोड़ते, एक वीडियो कैमरा साथ साथ चलता.

परिणाम आने की प्रतीक्षा 
इस बार डीएनए विश्लेषण के लिए आवश्यक नमूने भी लिये गये. शरीर के हार्मोनों, एंज़ाइमों और ऊर्जादायी चयापचय (मेटाबॉलिज़्म) क्रिया संबंधी ठेर सारे आंकड़े जुटाये गये. उनका अध्ययन करने और उन्हें समझने-बूझने में दो महीने तक का समय लग सकता है.

डॉक्टरों का कहना है कि इन सारे परीक्षणों और आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर प्रहलाद जानी के जीवित रहने का रहस्य या तो मिल जायेगा या उनके दावे का पर्दाफ़ाश हो जायेगा. पिछली परीक्षाओं और अवलोकनों से न तो कोई रहस्य खुला और न कोई पर्दाफ़ाश हो पाया. बल्कि, जैसा कि डॉ. सुधीर शाह ने बताया, डॉक्टरों की उलझन और भी बढ़ गयीः "(कहने पर) वे अपने आप अपने ब्लैडर (मूत्राशय) में यूरीन (पेशाब) लाते हैं. यदि वह (पेशाब) 120 मिलीलीटर था और हमने कहा कि हमें आज शाम को 100 मिलीलीटर चाहिये, तो वे 100 मिलीलीटर कर देंगे. यदि हम कहेंगे कि कल सुबह ज़ीरो (शून्य) होना चाहिये, तो ज़ीरो कर देंगे. कहने पर शाम को 50 मिलीलीटर कर देंगे. यानी हम जो भी कहें, वे हर बार वैसा ही कर पाये हैं. यह अपने आप में ही एक चमत्कार है."

दैवीय आशीर्वाद या छल-प्रपंच?

प्रहलाद जानी अपनी आयु के आठवें दशक में भी नियमित रूप से योगाभ्यास करते हैं और ध्यान लगाते हैं. योगी-ध्यानी व्यक्तियों में चमत्कारिक गुणों की कहानियों पर भारत में लोगों को आश्चर्य नहीं होता, पर विज्ञान उन्हें स्वीकार नहीं करता.

विज्ञान केवल उन्हीं चीज़ों को स्वीकार करता है, जो स्थूल हैं या नापी-तौली जा सकती हैं. प्रहलाद जानी इस सांचे में फ़िट नहीं बैठते. तब भी, विज्ञान उनके अद्भुत चमत्कार का व्यावहारिक लाभ उठाने में कोई बुराई भी नहीं देखता. डॉ. सुधीर शाहः "कैलरी या भोजन के बदले वे किसी दूसरे प्रकार की ऊर्जा से अपने शरीर को बल देते हैं. अगर हम उस ऊर्जा को पकड़ सके, उसे माप सके, तो हो सकता है कि हम दूसरे आदमियों में भी उसे प्रस्थापित कर सकें और तब पूरी मानवजाति का और चिकित्सा विज्ञान का भविष्य बदल जायेगा."

अंतरिक्ष यात्राओं के लिए विशेष उपयोगी

भारतीय सेना का रक्षा शोध संस्थान भी यही समझता है कि यदि यह रहस्य मालूम पड़ जाये, तो लोगों को न केवल लड़ाई के मैदान में और प्राकृतिक आपदाओं के समय बिना अन्न-पानी के लंबे समय तक जीवित रहना सिखाया जा सकता है, बल्कि चंद्रमा और मंगल ग्रह पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों के राशन-पानी की समस्या भी हल हो सकती है. 

लेकिन, प्रश्न यह है कि क्या किसी तपस्वी की तपस्या का फल उन लोगों को भी बांटा जा सकता है, जो तप-तपस्या का न तो अर्थ जानते हैं और न उसमें विश्वास करते हैं? क्या यह हो सकता है कि सिगरेट से परहेज़ तो आप करें, पर कैंसर से छुटकारा मिले धूम्रपान करने वालों को?
By ---
Susheel Dwivedi
Village -Pawai 
Post- Jariya
District-Hamirpur
U P       sabhar :http://bioguruindia.blogspot.in

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4 साल का बच्चा आईक्यू भौतिक वैज्ञानिक अलबर्ट आईंस्टीन के बराबर

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लंदन : ब्रिटेन में चार साल के बच्चे के बारे में कहा जा रहा है कि उसका आईक्यू भौतिक वैज्ञानिक अलबर्ट आईंस्टीन के बराबर है। दक्षिणी यार्कशायर के रहने वाले शेरविन साराबी ने वेश्लर पैमाने पर 160 अंक हासिल करके मनौवैज्ञानिकों को हैरान कर दिया।

समाचार पत्र ‘डेली एक्सप्रेस’ के अनुसार शेरविन के आईक्यू को आईंस्टीन, बिल गेट्स और स्टीफन हॉकिंगस के आईक्यू के बराबर माना गया है। वैसे, आईंस्टीन के आईक्यू की कभी जांच नहीं हुई थी क्योंकि उनके दौर में यह आधुनिक तकनीक नहीं थी। विशेषज्ञों का मानना है कि उनका आईक्यू 160 रहा होगा।

शेरविन ने 10 महीने की उम्र में पहला शब्द बोला था और 20 महीने की उम्र तक बातचीत करने लगा। उसकी मां आमंडा का कहना है कि शेरविन 190 से अधिक पुस्तकें पढ़ चुका है। उसे नयी चीजों के बारे में जानने की उत्सुकता रहती है। (एजेंसी)  sabhar :http://zeenews.india.com

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बच्चेदानी के बदले पेट में पल रही थी बच्ची

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RARE : डॉक्टर हुए हैरान, बच्चेदानी के बदले नौ माह से पेट में पल रही थी बच्ची

रांची। रिम्स के लेबर रूम में शुक्रवार को डॉक्टरों को हैरान कर देनेवाली घटना घटी। नौ माह तक जिस बच्ची को मां की बच्चेदानी में होना चाहिए था, वह मां के पेट से निकली। गायनी विभाग के डॉ प्रीती बाला सहाय यूनिट के डॉक्टरों की टीम यह देख भौचक्क रह गयी और सबके मुंह से एक ही शब्द निकले अरे... यह क्या? बच्ची तो पेट में पल रही थी। बच्चेदानी तो एकदम अलग है।
सबने इसे कुदरत का करिश्मा कहा और बताया कि यह घटना रेयर है। हालांकि, बच्ची को जन्म देनेवाली मां अनि देवी(30) और उसकी बेटी दोनों स्वस्थ है। बच्ची का वजन भी 2.5 किलोग्राम है। अनि रांची के बेड़ो स्थित खत्री गांवकी रहनेवाली है। डॉ सहाय ने इसकी सूचना रिम्स अधीक्षक डॉ वसुंधरा को दी। ऑपरेशन टीम में डॉ सहाय, डॉ मधुलिका और पीजी छात्रा डॉ अंशु व नीतू और एनेस्थिसिया के डॉ सपन व डॉ सुनीत शामिल थे।ऑपरेशन टीम में शामिल डॉ अर्चना ने बताया कि अनि देवी कल शाम को बेड़ो पीएचसी से गर्भ में पल रहे शिशु के धड़कन कम होने की शिकायत पर भेजा गया। रिम्स में जांच किया गया। अनि के अनुसार वह नौ माह की गर्भवती थी। लेकिन, जांच के क्रम में सबकुछ सही नहीं मिला। अल्ट्रासाउंड जांच में पता नहीं चला। आज जब ऑपरेशन से पहले क्लीनिकली चेक किया गया तो पता चला कि बच्ची बच्चेदानी में नहीं बल्कि पेट में है। बच्चेदानी खाली था। इसे एब्डोमिनल प्रेगनेंसी कहा जाता है। जिसे सिजेरियन नहीं बल्कि लेप्रोटॉमी करके निकाला गया। दोनों की हालत ठीक है। पेट में पलने के कारण अंदरूनी अंगों पर दवाब था।
सहिया ने दिया अनि देवी को खून
अनि देवी के ऑपरेशन के वक्त डॉक्टरों ने एक यूनिट खून की जरूरत बतायी। साथ में पति नहीं था। मरीज को लेकर अस्पताल पहुंची सहिया संगीता देवी पशोपेश में पड़ गयी। अंत में उसने ही खून दी तब ऑपरेशन हुआ।
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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मरने के 20 मिनट बाद ही उसने ले लिया दूसरा जन्म

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parapsychology rebirth story

कहते हैं कि मरने के बाद आत्मा यमलोक जाती है फिर अपने कर्मों के अनुसार लौट कर पृथ्वी पर लौटती है। लेकिन कुदरत कब कौन सा चमत्कार कर दिखाए कहा नहीं जा सकता।

ऐसी ही एक चमत्कारी घटना उत्तर प्रदेश, मैनपुरी के तिलयानी गांव की है। साल 2010 में सत्यभान सिंह यादव के पुत्र मनोज को एक बिच्छू ने काट लिया। इस समय मनोज महज 8 साल का था।

मनोज को मिनी पीजीआई सैफई में भर्ती कराया गया। इसी दिन तिलियानी के ही राजू की पत्नी को प्रसव पीड़ा होने पर मिनी पीजीआई में भर्ती कराया गया। यह अजब संयोग था कि रात के 10:40 बजे मनोज की मौत हो गई और लगभग 11 बजे राजू की पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम छोटू रखा गया।

परिवार वालों का कहना है कि छोटू जब ढाई साल का हुआ तो वह मनोज के पिता सत्यभान को पापा कहकर बुलाने लगा। छोटू को अपने पूर्व जन्म के रिश्तेदार और उनसे जुड़ी बातें याद है।

सत्यभान का दावा है कि छोटू ने ऐसी कई बातें बताई हैं जो मनोज या उसके घर वाले ही जानते थे। अब पुनर्जन्म को मानते हुए छोटू को सत्यभान और उसका परिवार मनोज की तरह प्यार करते हैं। छोटू के मां-बाप को इससे कोई ऐतराज नहीं हैं। उनका कहना है कि छोटू को दो-दो मां-बाप का प्यार मिल रहा है।

एसएन मेडिकल कालेज के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा का कहना है कि साइंस और मनोविज्ञान पिछले जन्म में विश्वास नहीं करता। sabhar :http://www.amarujala.com

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पैरों से जुड़ा रहा हाथ

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दुनिया में आज भी स्वस्थ शरीर को सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं। जाहिर है आज की टेक्नोलॉजी में केवल एक बटन दबाकर आप बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन कोई भी टेक्नोलॉजी मरे को जिंदा नहीं कर सकती। दो हाथ, दो पैर, दिल, शरीर का हर अंग आपके लिए बहुत कीमती है क्योंकि टेक्नोलॉजी यह सब आपको नहीं दे सकती। लेकिन जब हम बात विज्ञान के करिश्मे की कर रहे हैं, इस बायॉलोजी की टेक्नोलॉजी ने बहुत हद तक आज इसे संभव बना दिया है और अब विज्ञान आपको प्राकृतिक हाथ-पैर भी दे सकता है। इस खबर को पढ़कर आप भी समझ जाएंगे, कुदरत का करिश्मा और बात होती है लेकिन आज विज्ञान के करिश्मे भी कम नहीं हैं। कुदरत किसी को जीवन दे सकती है, मौत दे सकती है, मौत से बदतर अपाहिज जिंदगी भी..मतलब जो मिला आपको उसी से संतोष करना पड़ता है। इंसान के पास उसमें अपनी पसंद शामिल करना संभव नहीं है। लेकिन विज्ञान ने हमें इसमें छूट दिलाई है। बायलॉजी का कमाल देखिए कि अब कुदरती अंग भी विज्ञान के करिश्मे से पाए जा सकते हैं।इसी वर्ष नवंबर की बात है। चांगशा(चीन) के जिआओ वेई को लगा कि अब पूरी उम्र उसे अपाहिज बनकर जीना पड़ेगा। फैक्टरी में काम करते हुए दुर्घटना में मशीन से उसका दाहिना हाथ ही कट गया। उसका साथी कर्मचारी कटे हुए हाथ के साथ तुरंत उसे अस्पताल लेकर गया लेकिन दुर्घटना बहुत बड़ी थी। हाथ के साथ वी की बांहें भी कट गई थीं। स्थानीय डॉक्टरों ने उसके हाथ को दुबारा जोड़ पाने में असमर्थता जता दी। लेकिन चांगशा के ही किसी दूसरे अस्पताल में डॉक्टरों ने कहा कि वे वी का हाथ दुबारा जोड़ सकते थे लेकिन क्योंकि बांह भी कटी हुई थी इसलिए तुरंत ऑपरेशन कर ऐसा कर पाना संभव नहीं था। हाथ जोड़ने से पहले बांहों का इलाज करना था और इसमें कम से कम एक महीने का समय लगता और तब तक हाथ का जिंदा रहना जरूरी था।
क्योंकि शरीर से कटकर हाथ इतने दिनों तक जिंदा नहीं रह सकता था इसलिए डॉक्टरों ने उसका हाथ पैरों से जोड़ दिया। वी इसी तरह एक माह तक रहा और एक महीने बाद डॉक्टरों ने वापस उसका हाथ उसकी सही जगह से जोड़ा।
विज्ञान की दुनिया में यह एक अजूबे से कम नहीं। पैरों से जुड़े हाथ के साथ रहना पड़ा लेकिन वी को उसका दाहिना हाथ वापस मिल गया। इससे पहले चीन में ही डॉक्टरों ने एक आदमी की क्षतिग्रस्त नाक को दुबारा उसके माथे पर उगाकर उसकी जान बचाई थी। तो अब कह सकते हैं कि अब आप कुदरत के करिश्मे में कुछ अपनी पसंद जोड़ सकते हैं। sabhar : jagran.com

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वाकई में भूत-प्रेत होते हैं ?

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न करें इसे झूठ समझने की भूल, असलियत में होते हैं भूत-प्रेत!

न करें इसे झूठ समझने की भूल, असलियत में होते हैं भूत-प्रेत!

विभिन्न धर्म ग्रंथों में भी भूत-प्रेतों के बारे में बताया गया है। सवाल यह उठता है कि अगर वाकई में भूत-प्रेत होते हैं तो दिखाई क्यों नहीं देते या फिर कुछ ही लोगों को क्यों दिखाई देते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार जीवित मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना होता है-पृथ्वी, जल, वायु, आकाश व अग्नि। मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा पृथ्वी तत्व की होती है और यह तत्व ठोस होता है इसलिए मानव शरीर आसानी से दिखाई देता है। 
जबकि भूत-प्रेतों का शरीर में वायु तत्व की अधिकता होती है। वायु तत्व को देखना मनुष्य के लिए संभव नहीं है क्योंकि वह गैस रूप में होता है इसलिए इसे केवल आभास किया जा सकता है देखा नहीं जा सकता। यह तभी संभव है जब किसी व्यक्ति के राक्षण गण हो या फिर उसकी कुंडली में किसी प्रकार का दोष हो। मानसिक रूप से कमजोर लोगों को भी भूत-प्रेत दिखाई देते हैं जबकि अन्य लोग इन्हें नहीं देख पाते।धर्म शास्त्रों के अनुसार भूत का अर्थ है बीता हुआ समय। दूसरे अर्थों में मृत्यु के बाद और नए जन्म होने के पहले के बीच में अमिट वासनाओं के कारण मन के स्तर पर फंसे हुए जीवात्मा को ही भूत कहते हैं। जीवात्मा अपने पंच तत्वों से बने हुए शरीर को छोडऩे के बाद अंतिम संस्कार से लेकर पिंड दान आदि क्रियाएं पूर्ण होने तक जिस अवस्था में रहती है, वह प्रेत योनी कहलाती है।गरूण पुराण के अनुसार व्यक्ति की मृत्यु के बाद पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान देते हैं, इससे भी पापी प्राणी की तृप्ति नहीं होती क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस कारण भूख-प्यास से युक्त होकर प्राणी यमलोक को जाते हैं इसके बाद जो पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे मर के प्रेत रूप होते हैं और निर्जन वन में दु:खी होकर भटकते रहते हैं।प्रत्येक नकारात्मक व्यक्ति की तरह भी भूत भी अंधेरे और सुनसान स्थानों पर निवास करते हैं। खाली पड़े मकान, खंडहर, वृक्ष व कुए, बावड़ी आदि में भी भूत निवास कर सकते हैंहमें कई बार ऐसा सुनने में आता है कि किसी व्यक्ति के ऊपर भूत-प्रेत का असर है। ऐसा सभी लोगों के साथ नहीं होता क्योंकि जिन लोगों पर भूत-प्रेत का प्रभाव होता है उनकी कुंडली में कुछ विशेष योग बनते हैं जिनके कारण उनके साथ यह समस्या होती है। साथ ही यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा नीच का हो या दोषपूर्ण स्थिति में हो तो ऐसे व्यक्ति पर भी भूत-प्रेत का असर सबसे ज्यादा होता है।प्रेत बाधा से ग्रस्त व्यक्ति की आंखें स्थिर, अधमुंदी और लाल रहती है। शरीर का तापमान सामान्य से अधिक होता है। हाथ-पैर के नाखून काले पडऩे के साथ ही ऐसे व्यक्ति की भूख, नींद या तो बहुत कम हो जाती है या बहुत अधिक। स्वभाव में क्रोध, जिद और उग्रता आ जाती है। शरीर से बदबूदार पसीना आता है।हमारे आस-पास कई ऐसी अदृश्य शक्तियां उपस्थित रहती है जिन्हें हम देख नहीं पाते। यह शक्तियां नकारात्मक भी होती है और सकारात्मक भी। सिर्फ  कुछ लोग ही इन्हें देख या महसूस कर पाते हैं। राक्षस गण वाले लोगों को भी इन शक्तियों का अहसास तुरंत हो जाता है। ऐसे लोग भूत-प्रेत व आत्मा आदि शक्तियों को तुरंत ही भांप जाते हैं। राक्षस गण, यह शब्द जीवन में कई बार सुनने में आता है लेकिन कुछ ही लोग इसका मतलब जानते हैं। यह शब्द सुनते ही मन और मस्तिष्क में एक अजीब सा भय भी उत्पन्न होने लगता है और हमारा मन राक्षस गण वाले लोगों के बारे में कई  कल्पनाएं भी करने लगता है। जबकि सच्चाई काफी अलग है। ज्योतिष शास्त्र के आधार पर प्रत्येक मनुष्य को तीन गणों में बांटा गया है। मनुष्य गण, देव गण व राक्षस गण। कौन सा व्यक्ति किस गण का है यह कुंडली के माध्यम से जाना जा सकता है। मनुष्य गण तथा देव गण वाले लोग सामान्य होते हैं। जबकि राक्षस गण वाले जो लोग होते हैं उनमें एक नैसर्गिक गुण होता है कि यदि उनके आस-पास कोई नकरात्मक शक्ति है तो उन्हें तुरंत इसका अहसास हो जाता है। कई बार इन लोगों को यह शक्तियां दिखाई भी देती हैं लेकिन इसी गण के प्रभाव से इनमें इतनी क्षमता भी आ जाती है कि वे इनसे जल्दी ही भयभीत नहीं होते। राक्षस गण वाले लोग साहसी भी होते हैं तथा विपरीत परिस्थिति में भी घबराते नहीं हैं।
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