मंगलवार, 24 सितंबर 2013
मुंबई में गणेश विसर्जन के दौरान भीड़ में लड़की के साथ सरेआम होती रही छेड़छाड़
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मुंबई। मायानगरी में आस्था का सैलाब उमड़ रहा था। इस माहौल से अभिभूत होकर अमिताभ बच्चन ने बप्पा की कुछ तस्वीरें फेसबुक पर अपलोड कर दी, लेकिन उन्हें क्या पता था कि जिस जनसैलाब में वे अपनों को खुशियों से झूमता हूआ देख रहे हैं, उसी भीड़ में छुपे हुए हैं कुछ हैवान। ये मौका देख कर दे रहे थे एक घिनौनी हरकतों को अंजाम।
मुंबई के सबसे बड़े गणपति लाल बाग के राजा की विदाई हो रही थी। हज़ारों का हुजूम था और इस हुजूम में एक लड़की चीख-चिल्ला रही थी।
आखिर क्यों नहीं सुनी किसी ने कोई आवाज, जब हो रही थी इतनी बड़ी घिनौनी हरकत। देखिए, उस वक्त का साक्ष्य बनीं ये तस्वीरें...
आगे की स्लाइड्स पर देखें उस घटना की तस्वीरें। साथ में देखें, अमिताभ बच्चन द्वारा फेसबुक वॉल पर शेयर की गई लालबाग के महाराज की तस्वीरें...
बात उस समय की जब गणेश पूजा के आखिरी दिन मूर्ति विसर्जन के लिए हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे थे। एक भारी भीड़ इस उत्सव में शामिल थी। उस भीड़ में पुरुष, महिलाएं, बच्चे, लड़कियों और युवाओं का हुजूम था।
उसी वक्त एक घटना यहां भीड़ में घट रही थी। उससे पूरी भीड़ अनजान थी। किसी को भी नहीं पता था कि आखिर उस भीड़ में क्या हो रहा है। मायानगरी में आस्था के इस केंद्र पर हो रही थी एक लड़की के साथ छेड़छाड़। एक-एक मनचला घूम-घूम कर लड़की के पास जा रहा था और उसे छेड़ रहा था। मनचलों का झुंड अपनी करतूत पर उतारू था।
पूरा मामला कुछ इस तरह था
दरअसल, गणेश विसर्जन में मदमस्त इस भीड़ में घूम रहा था कुछ मनचलों का समूह, जो बार-बार भारी भीड़ का फायदा उठाकर एक लड़की से छेड़छाड़ कर रहा था। मनचलों के गिरोह ने चारो तरफ से लड़की को घेर लिया था।
लड़की बुरी तरह से घिर चुकी थी। एक के बाद एक मनचले भीड़ में दिनदहाड़े लड़की को छेड़ते रहे। धक्का-मुक्की के बीच जहां-तहां लड़की को हाथ लगाते रहे। आप तस्वीरें देखकर इस बात का अंदाज लगा सकते हैं।
चाक-चौबंद व्यवस्था का दावा करने वाली पुलिस की पोल खोलने के लिए यह घटना काफी है। अब सवाल यह उठता है कि कैसे ऐसे मनचले दिनदहाड़े इस तरह की घटना को अंजाम दे देते हैं और किसी को कानों-कान भनक तक नहीं लग पाती है।
आगे की स्लाइड्स पर देखें अमिताभ बच्चन की फेसबुक वॉल पर पोस्ट गणेश विसर्जन की खास तस्वीरें...
मुंबई में लालबाग के महाराज की विसर्जन यात्रा पर बॉलीवुड के महानायक अमिताभ महानायक ने भी अपनी प्रतिक्रिया फेसबुक पर जाहिर की।
गणपति विसर्जन की कुछ खास तस्वीरें अमिताभ बच्चन ने अपने फेसबुक वॉल पर शेयर की। आज हम आपके साथ इन्हें साझा कर रहे हैं। इन्हें लगभग लाखों की संख्या में अमिताभ के फैंस ने इसे लाइक किया।
sabhar : bhaskar.com
मर्दों की सभी प्रकार की कमजोरी दूर कर सकता है एक चमत्कारी पौधा
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सितंबर 24, 2013 in मर्दों की सभी प्रकार की कमजोरी दूर कर सकता है एक चमत्कारी पौधा

जयपुर। हिंदुस्तान का थार रेगिस्तान सिर्फ अपने उजड़ेपन और सूनेपन के लिए ही पूरी दुनिया में नहीं जाना जाता है, बल्कि यहां की रेतों में कई ऐसे रहस्यमयी पौधे उगते हैं, जिनके उपयोग से कई खतरनाक बीमारियों को जड़ से खत्म किया जा सकता है। एक ऐसा ही पौधा है छुईमई। राजस्थान के कुछ हिस्सों में छुईमुई को अलाय नाम से जाना जाता है। आज हम बात करेंगे इसी चमत्कारी पौधे की। कई स्टडी में यह साबित हो चुका है कि छुईमुई के बीजों से खोई हुए मर्दाना ताकत फिर से पाई जा सकती है। इसकी जड़ों से लेकर बीज तक का उपयोग सभी प्रकार की बीमारियों को दूर करने में किया जाता है।

जयपुर। हिंदुस्तान का थार रेगिस्तान सिर्फ अपने उजड़ेपन और सूनेपन के लिए ही पूरी दुनिया में नहीं जाना जाता है, बल्कि यहां की रेतों में कई ऐसे रहस्यमयी पौधे उगते हैं, जिनके उपयोग से कई खतरनाक बीमारियों को जड़ से खत्म किया जा सकता है। एक ऐसा ही पौधा है छुईमई। राजस्थान के कुछ हिस्सों में छुईमुई को अलाय नाम से जाना जाता है। आज हम बात करेंगे इसी चमत्कारी पौधे की। कई स्टडी में यह साबित हो चुका है कि छुईमुई के बीजों से खोई हुए मर्दाना ताकत फिर से पाई जा सकती है। इसकी जड़ों से लेकर बीज तक का उपयोग सभी प्रकार की बीमारियों को दूर करने में किया जाता है।
पांच ग्राम अलाय के बीजों का पाउडर भैंस के दूध में डालकर पीने से शारीरिक कमजोरियों से छुटकारा तो पाया ही जा सकता है, साथ सेक्सुअल पावर भी पाया जा सकता है। कमजोर मर्द यदि इसकी जड़ों और बीजों का चूर्ण लें तो वीर्य की कमी की शिकायत में काफी हद तक फायदा होता है।
छुईमुई एक प्रकार का पौधा है, जिसकी पत्तियां मानव स्पर्श पाने पर अपनेआप सिकुड़ कर बंद हो जातीं हैं। कुछ देर बाद अपने आप ही खुल भी जातीं हैं| इसे अंग्रेजी में मिमोसा प्यूडिका कहते हैं|
छुईमुई अपने आप में चमत्कारी पौधा है। आज भी देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा राजस्थान के देहाती इलाकों में यह बड़ी संख्या में पाया जाता है। कई जगह इस पौधे को लाजवंती और शर्मीली जैसे नामों से भी पुकारा जाता है।
देहातों से लेकर जंगलों तक में रहने वाले लोगों को यह पौधा आज भी जीवनदान दे रहा है। अनेक रोगों को दूर करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
यदि किसी को घाव हो गया तो छुईमुई की जड़ों का दो ग्राम चूर्ण दिन में तीन बार गुनगुने पानी के साथ लिया जाए तो घाव जल्दी सूखने लगता है।
इसी तरह यदि छुईमुई की जड़ और पत्तों का चूर्ण दूध में मिलाकर दो बार लिया जाए तो बवासीर और भंगदर से राहत मिलती है। इसी तरह इसकी पत्तियों के रस को बवासीर के घाव पर भी लगाया जा सकता है। sabhar : bhaskar.com
आसमान में दिखाई दी अद्भुत खगोलीय घटना, सूरज के बदले रूप से हुआ ऐसा
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सितंबर 24, 2013 in आसमान में दिखाई दी अद्भुत खगोलीय घटना, सूरज के बदले रूप से हुआ ऐसा

जयपुर। सूर्य की अद्भुत खगोलीय घटना का नजारा सोमवार को दिखा। साल में दो बार दिन-रात बराबर होते हैं। सायन सूर्य चूंकि तुला राशि में था। दिन और रात की अवधि बराबर वाली इस खगोलीय घटना यानि शरद संपात और विषुवत दिन में सूर्य ने उत्तर से दक्षिण गोल में जाना शुरू किया।
जंतर-मंतर के पूर्व अधीक्षक ओमप्रकाश शर्मा के मुताबिक सूर्य के दक्षिण गोल (गोलाद्र्ध) में प्रवेश से अब दिनों की अवधि कम और और रातों की अवधि बढऩा शुरू हो जाएंगी। दोपहर 12.19 बजे शुरू हुआ ये घटनाक्रम 1:10 तक चला। षष्टांश यंत्र व जयप्रकाश यंत्र पर अनूठा नजारा देखने को मिला। सूर्य पूरे दिन विषुवत रेखा पर रहा।
पूरे दिन में कवर होती हैं 12 राशियां
ज्योतिषीय ज्ञान में पूरे दिन में 12 राशियां कवर होती हैं। ज्योतिषाचार्य दामोदर प्रसाद शर्मा के अनुसार इनमें छह राशियां दिन में और छह राशियां रात में बदलती हैं। वहीं हर डेढ़ से सवा दो घंटे में लग्न राशि में परिवर्तन होता है।
यूं चलता है पूरे वर्ष में खगोलीय घटनाक्रम
ऐसी खगोलीय घटना एक साल में दो बार होती है, जब दिन और रात बराबर होते हैं। 21 मार्च और 23 सितंबर ऐसा दिन है। 21 जून को दक्षिणी ध्रुव सूर्य से सर्वाधिक दूर रहता है, इसलिए इस दिन सबसे बड़ा दिन होता है। इसके बाद 22 दिसंबर को सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रवेश करता है। इसलिए 22 दिसंबर को सबसे छोटा दिन और सबसे बड़ी रात होती है। खगोलविदों के मुताबिक 22 दिसंबर से दिन की अवधि बढऩे लगती है। सूर्य दक्षिण को ओर अग्रसर होता है, तो दक्षिण गोल सूर्य कहलाता है। सूर्य उत्तर की ओर जाता है, तो उत्तर गोल कहलाता है। दोनों स्थिति की अवधि ६ माह होती है।
51 मिनट की अवधि में जंतर मंतर में दिखे सूर्य के कई आकार
12.19 बजे सूर्य की सीधी किरण षष्टांश यंत्र पर पड़ी। ये विषुवत रेखा से दूरी बताती है। सोमवार को सूर्य विषुवत रेखा पर था।
12:29 बजे षष्टांश यंत्र पर दक्षिण गोल की ओर सूर्य की रोशनी आरंभ में प्रकाश पुंज की भांति दिखी। फिर सूर्य रॉकेट नुमा से अंडाकार व गोलाकार रहा।
12:36 बजे कई बार सूर्य का बादलों की ओट में आना भी रोमांच का विषय रहा। जयप्रकाश - यंत्र पर सूर्य पूरे दिन विषुवत रेखा पर ही रहा। ये दृश्य पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा।
12:51 बजे सूर्य 0 डिग्री से ऊपर उत्तराक्रांति से दक्षिणाक्रांति की ओर चलता दिखाई दिया। इसे शरदसंपात कहते हैं।
1:10 बजे चांदनी रात सा प्रकाश बिखेरता हुआ सूर्य दक्षिणा क्रांति की ओर चला गया।
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राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य
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सितंबर 24, 2013 in राजकुमारी के इश्क में पगलाए तांत्रिक के शाप से बर्बाद हो गया एक राज्य

जयपुर. भानगढ़ किले के रातों रात खंडहर में तब्दील हो जाने के बारे में कई कहानियां मशहूर हैं। इन किस्सों को सुनकर लोग मायावी और रहस्यों से भरे इस किले की ओर खिंचे चले आते हैं। सूर्यास्त से पहले इस खंडहर में लोग घूमते टहलते मिल जाएंगे। लेकिन 6 बजे के बाद यहां आने वालों का हाथ पकड़कर किले के बाहर कर दिया जाता हैं। किले की एक दीवार पर भारतीय पुरातत्व विभाग का बोर्ड लगा हैं। इस पर साफ साफ शब्दों में लिखा है सूर्यास्त के बाद प्रवेश वर्जित हैं।
राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का नेशनल पार्क के एक छोर पर खड़ा है खंडहरनुमा भानगढ़। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया।
भानगढ़ का किला चारों ओर से घिरा है जिसके अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। सामने बाजार है, कहते है ये भानगढ़ का जौहरी बाजार था।जिसमें सड़क के दोनों तरफ कतार में बनी दो मंजिला दुकानों के खंडहर हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा तीन मंजिला महल है। लेकिन तीनों मंजिल लगभग पूरी तरह ढेर हो चुकी है।
चहारदीवारी के अंदर कई दूसरी इमारतों के खंडहर बिखरे पड़े हैं। इनमें से एक में तवायफें रहा करती थीं और इसे रंडियों के महल के नाम से जाना जाता है। किले के अंदर बने मंदिरों में गोपीनाथ, सोमेश्वर, मंगलादेवी और केशव मंदिर मिल जाएंगे। सोमेश्वर मंदिर के बगल में एक बावली है। जिसे अब भी लोग अपने मुताबिक इस्तेमाल करते हैं। चाहे नहाना हो या कपड़े धोना..
खंडहर बना भानगढ़ एक शानदार अतीत के बर्बादी की दुखद दास्तान है। किले के अंदर की इमारतों में से किसी की भी छत नहीं बची है। लेकिन हैरानी की बात है कि इसके मंदिर पूरी तरह महफूज है। इन मंदिरों की दीवारों और खंभों पर की गई नक्काशी इत्तला करती है कि यह समूचा किला कितना खूबसूरत और भव्य रहा होगा?
माधो सिंह के बाद उसका बेटा छतर सिंह भानगढ़ का राजा बना। छतरसिंह 1630 में लड़ाई के मैदान में मारा गया। उसकी मौत के साथ ही भानगढ़ की रौनक घटने लगी। छतर सिंह के बेटे अजब सिंह ने नजदीक में ही अजबगढ़ (अजबगढ़ की कहानी अगले भाग में )का किला बनवाया और वहीं रहने लगा। आमेर के राजा जयसिंह ने 1720 में भानगढ़ को जबरन अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस समूचे इलाके में पानी की कमी तो थी ही। लेकिन 1783 के अकाल में यह किला पूरी तरह उजड़ गया।
भानगढ़ के बारे में जो अफवाहें और किस्से हवा में उड़ते हैं। उनके मुताबिक इस इलाके में सिंघिया नाम का एक तांत्रिक रहता था। उसका दिल भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती पर आ गया। जिसकी सुंदरता समूचे राजपुताना में बेजोड़ थी।
एक दिन तांत्रिक ने राजकुमारी की एक दासी को बाजार में खुशबूदार तेल खरीदते देखा। सिंघिया ने तेल पर टोटका कर दिया ताकि राजकुमारी उसे लगाते ही तांत्रिक की ओर खिंची चली आए। लेकिन शीशी रत्नावती के हाथ से फिसल गई और सारा तेल एक बड़ी चट्टान पर गिर गया। टोटके की वजह से चट्टान को ही तांत्रिक से प्रेम हो गया और वह सिंघिया की ओर लुढ़कने लगा।
चट्टान के नीचे कुचल कर मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि मंदिरों को छोड़ कर समूचा किला जमींदोज हो जाएगा और राजकुमारी समेत भानगढ़ के निवासी मारे जाएंगे। आसपास के गांवों के लोग मानते हैं कि सिंघिया के शाप की वजह से ही किले के अंदर की सभी इमारतें रातों रात ध्वस्त हो गई। यहां रहने वालों को यकीन है कि रत्नावती और भानगढ़ के बाकी निवासियों की रूहें अब भी किले में भटकती हैं। इसके अलावा रात के वक्त इन खंडहरों में जाने वाला कभी वापस नहीं आता।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सूरज ढलने के बाद और उसके उगने से पहले किले के अंदर घुसने पर पाबंदी लगा रखी है। दिन में भी इसके अंदर खामोशी पसरी रहती है। कई सैलानियों का कहना है कि खंडहरों के बीच से गुजरते हुए उन्हें अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। किले के एक छोर पर केवड़े की झाडिय़ां हैं। हवा जब तेज चलती है तो केवड़े की खुशबू चारों तरफ फैल जाती हैं और किले का रहस्य और भी गाढ़ा हो जाता हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने किले के अंदर मरम्मत का कुछ काम किया है। लेकिन निगरानी की व्यवस्था ठीक नहीं होने के कारण इसके बरबाद होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। किले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का कोई दफ्तर नहीं है। दिन में कोई चौकीदार भी नहीं होता। पूरा किला बाबाओं और तांत्रिकों के हवाले रहता है।
किले में बेपरवाह तांत्रिक बेरोकटोक अपने अनुष्ठान करते हैं। आग की वजह से काली पड़ी दीवारें और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के टूटे फूटे बोर्ड किले में उनकी अवैध कारगुजारियों के सबूत हैं। दिलचस्प बात यह है कि भानगढ़ के किले के अंदर मंदिरों में पूजा नहीं की जाती।
किले में स्थित गोपीनाथ मंदिर में तो कोई मूर्ति भी नहीं है। तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए अक्सर उन अंधेरे कोनों और तंग कोठरियों का इस्तेमाल करते है। जहां तक आम तौर पर सैलानियों की पहुंच नहीं होती। किले के बाहर पहाड़ पर बनी एक छतरी तांत्रिकों की साधना का प्रमुख अड्डा बताई जाती है। इस छतरी के बारे में कहा जाता है कि तांत्रिक सिंघिया वहीं रहा करता था।
किले के खंडहरों में टंगी सिंदूर से रंगी अजीबोगरीब शक्लों वाली मूर्तियां कमजोर दिलवाले को भूतों के होने का अहसास करा देती हैं।किले में कई जगह राख के ढेर, पूजा के सामान, चिमटों और त्रिशूलों के अलावा लोहे की मोटी जंजीरें भी मिलती हैं। ऐसा लगता है कि इन जंजीरों का इस्तेमाल उन्मादग्रस्त लोगों को बांधने के लिए किया जाता है। ऐसे ही तमाम राजो रहस्यों को समेटे यह किला अपने सुंदर अतीत पर खंडहर की शक्ल में रोता तांत्रिकों का अड्डा बन बैठा हैं sabhar : bhaskar.com
सोमवार, 23 सितंबर 2013
डायनासोर की रहस्यमयी दुनिया, जानें वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं...
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सितंबर 23, 2013 in जानें वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं..., डायनासोर की रहस्यमयी दुनिया

हॉलीवुड के मशहूर स्टूडियो यूनिवर्सल पिक्चर्स ने हिट फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ के चौथे संस्करण की घोषणा कर दी है। यह फिल्म ‘जुरासिक वर्ल्ड’ के नाम से 2015 में रिलीज होगी। ‘जुरासिक पार्क’ एक ऐसी फिल्म थी, जिसने पूरी दुनिया को डायनासोर नाम के दैत्याकार जीव से परिचित कराया था। आइए आज की बिग स्टोरी में एक नजर डालें डायनासोर की अद्भुत दुनिया पर...।
हॉलीवुड के मशहूर निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग द्वारा निर्देशित फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ जब 1993 में रिलीज हुई थी तो इस फिल्म ने पूरी दुनिया को एक अद्भुत जीव डायनासोर से बेहद शानदार ढंग से रूबरू करवाया था। इसके दूसरे और तीसरे संस्करण को भी लोगों ने खूब सराहा। डायनासोर बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए हमेशा कौतुहल का विषय रहे हैं। दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली कुछ किताबें डायनासोर पर आधारित हैं। फिल्मों में भी लोगों ने इन्हें खूब पसंद किया। आज डायनासोर पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं। मगर यह कहां रहते थे, क्या खाते थे और ये आखिर कैसे खत्म हो गए, यह सब आम जन से लेकर वैज्ञानिकों के लिए भी चर्चा का विषय बना रहता है।
आगे की स्लाइड पर क्लिक करके पढ़ें, डायनासोर कहां रहते थे, क्या खाते थे और ये आखिर कैसे खत्म हो गए। साथ ही जानें, डायनासोर पर क्या है वैज्ञानिकों का सच...
16 करोड़ साल तक रहा राज
डायनासोर ऐसे रेप्टाइल्स हैं, जिनकी उत्पत्ति धरती पर तकरीबन 20 से 25 करोड़ साल पहले हुई थी। डायनासोर शब्द ग्रीक भाषा का है, जिसका अर्थ बड़ी खतरनाक और भयंकर छिपकली होता है। हालांकि, ये विशालकाय प्राणी छिपकली से हजारों गुना बड़े होते थे। यह ट्रिएसिक काल के अंत (लगभग 23 करोड़ वर्ष पहले) से लेकर क्रीटेशियस काल (लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पहले) के अंत तक अस्तित्व में रहे। डायनासोर के अवशेष पृथ्वी के हर महाद्वीप पर पाए गए हैं। मेसोज्यॉइक काल में डायनासोर होते थे। इस काल को तीन भाग में बांटा गया है। इसमें ट्रिएसिक काल, जुरैसिक काल और क्रीटेशियस काल शामिल हैं। 16.5 करोड़ सालों तक डायनासोर का पृथ्वी पर राज रहा है।
कैसे थे ये प्राणी?
अब तक हॉलीवुड फिल्मों में दिखाए गए डायनासोर की ही तरह वास्तव में कई प्रकार के डायनासोर होते थे। कुछ डायनासोर दो पैरों पर चलते थे तो कुछ चार पैरों के सहारे ही चल पाते थे। कई डायनासोर ऐसे थे, जो आवश्यकता पड़ने पर दो पैरों पर चलते थे तो कभी चार पैरों पर चलते थे। कुछ प्रजातियों के डायनासोर उड़ते भी थे। अधिकांश डायनासोर शाकाहारी थे, जबकि कुछ प्रजातियां ऐसी थीं, जो मांसाहारी थीं। इन प्रजातियों के डायनासोर अन्य छोटे डायनासोर को ही अपना भोजन बना लेते थे। डायनसोर को आमतौर पर अपने विशाल आकार के लिए जाना जाता है, लेकिन डायनासोर की कुछ प्रजातियां मानव के जितनी बड़ी तो कुछ मुर्गे के बराबर भी हुई हैं। कई डायनासोर ऐसे थे, जिनके सींग भी थे, जबकि इनका रंग कैसा था इस बात पर वैज्ञानिक एक मत नहीं हो पाए हैं।
कब से हुए अध्ययन शुरू?
वैज्ञानिकों ने डायनासोर पर अध्ययन 1820 के दशक से प्रारंभ किया। दरअसल, उस समय इंग्लंड में एक बड़े लैंड रेह्रश्वटाइल की हड्डियां मिली थीं। इसके बाद ही दुनियाभर के कई देशों में ऐसी हड्डियां खोजी गईं और डायनासोर के बारे में वैज्ञानिकों ने साक्ष्य जुटाना शुरू कर दिए। उस समय वैज्ञानिकों ने हड्डियों को देखने के बाद उस जीव को मेगालोसॉरस नाम दिया था। डायनासोर शब्द का इस्तेमाल 1842 में इंग्लैंड के वैज्ञानिक सर रिचर्ड ओवेन ने पहली बार किया था। डिनोस का अर्थ है, भयानक और शक्तिशाली, जबकि सॉरस का अर्थ है छिपकली।
कैसे हुआ अंत
डायनासोर का अंत धरती पर कैसे हुआ, यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। दुनियाभर के वैज्ञानिकों का इस बात पर अलग-अलग मत है। हालांकि, इस बारे में सबसे अधिक यह कहा जाता है कि कोई उल्कापिंड धरती से टकराया था और उसके प्रभाव ने डायनासोर का अस्तित्व दुनिया से खत्म कर दिया था। अधिकांश पैलिओनटोलॉजिस्ट का कहना है कि लगभग 65.5 मिलियन साल पहले पृथ्वी पर कोई उल्कापिंड या धूमकेतु गिरा था, जिसके कारण पूरी धरती पर राख फैल गई थी और डायनासोर का अंत हो गया था।
भारत में डायनासोर
भारत में भी डायनासोर के अवशेष मिल चुके हैं। 2003 में वैज्ञानिकों ने भारत में डायनासोर की नई प्रजाति की खोज की थी। यह नर्मदा घाटी में लगभग 7 करोड़ वर्ष पहले पाया जाता था। भारत में पाए गए डायनासोर की प्रजाति का नाम रोजासॉरस नर्मेदेसिस रखा गया है। वैज्ञानिकों की टीम ने गुजरात के नर्मदा नदी के इलाके में खोज अभियान चलाया था, जहां पर इस दौरान उन्हें डायनासोर के जीवश्म प्राप्त हुए थे।
ब्रिटेन रहा है हॉटस्पॉट
ब्रिटेन को डायनासोर का हॉटस्पॉट कहा जाता था। यहां पर डायनासोर की अब तक 100 से ज्यादा प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। दरअसल, मेसोज्यॉइक काल (एज ऑफ रेह्रश्वटाइल्स भी कहा जाता है) में ब्रिटेन नॉर्थ अमेरिका और यूरेशिया के बीच लैंड ब्रिज के रूप में था। यही कारण है कि उस काल में यह डायनासोर के इवोल्यूशन और माइग्रेशन के लिए हॉट स्पॉट बन गया था। यहां के वैज्ञानिकों की भी डायनासोर में काफी रुचि रही है।
शाकाहारी ज्यादा, मांसाहारी कम
वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया भर में शाकाहारी डायनासोर ज्यादा हुए हैं, जबकि इनकी तुलना में मांसाहारी डायनासोर कम होते थे। दरअसल, शाकाहारी डायनासोर काफी संख्या में अंडे देते थे, लेकिन इनके बच्चे बेहद कम संया में वयस्क हो पाते थे, जबकि मांसाहारी डायनासोर की उम्र लंबी होती थी। मांसाहारी डायनासोर खुद शाकाहारी डायनासोर के बच्चों को खा लेते थे। इसी कारण वयस्क शाकाहारी डायनासोर कम हुए हैं।
कुछ खास बातें...
सबसे पहला नामः
दुनिया में पहले डायनासोर का नाम मेगालोसॉरस पड़ा था। यह 1842 में वैज्ञानिक रेवेरेंड विलियम बकलैंड ने दिया था। मेगालोसॉरस का मतलब गेट्र लिजार्ड होता है। यह डायनासोर तकरीबन 9 मीटर लंबा और तीन मीटर ऊंचा था।
सबसे लंबा डायनासोरः
सीसमोसॉरस अब तक दुनिया का सबसे लंबा डायनासोर है। वैज्ञानिकों के अनुसार सीसमोसॉरस की लंबाई 40 मीटर से भी ज्यादा थी। इसके अवशेषों के अनुसार इसकी लंबाई पांच डबल डेकर बस से भी ज्यादा थी। यह चार पैरों पर धीमी गति से चलता था।
सबसे वजनी डायनासोरः
वैज्ञानिकों के मिले साक्ष्यों के आधार पर ब्रैचियोसॉरस अब तक सबसे वजनी डायनासोर है। इसका वजन 80 टन था। 16 मीटर ऊंचे और 26 मीटर लंबे ब्रैचियोसॉरस की कद-काठी पांच अफ्रीकी हाथियों के बराबर थी। ब्रैचियोसॉरस का मतलब आर्म लिजार्ड होता है। ब्रैचियोसॉरस की गर्दन जिराफ की तरह लंबी थी।
सबसे छोटा डायनासोरः
वैसे तो डायनासोर के बच्चों के जीवश्म और हड्डियों से वैज्ञानिकों को कई छोटे डायनासोर होने का अनुमान हुआ है, लेकिन पूरी तरह विकसित अब तक का सबसे छोटा डायनासोर लेसोथोसॉरस है। पूरी तरह विकसित होने के बाद इसकी लंबाई मात्र 1 मीटर थी। पूरी तरह शाकाहारी लेसोथोसॉरस बहुत तेज गति से भाग सकता था।
जानें कुछ और फैक्ट...
- 200 साल तक जीवित रहे हैं, कुछ डायनासोर। हालांकि, वैज्ञानिकों के पास डायनासोर की लाइफ स्पैम के बारे में कोई ठोस जानकारियां नहीं हैं।
- 500 विभिन्न वंशों और 1000 से अधिक प्रजातियों के डायनासोरों की अब तक वैज्ञानिक पहचान कर चुके हैं।
- 23 करोड़ वर्ष पहले मेडागॉस्कर में दुनिया के पहले डायनासोर होने की बात वैज्ञानिक कहते हैं। हालांकि, इस डायनासोर का वैज्ञानिकों ने कोई नाम नहीं दिया था। sabhar : bhaskar.com
दुनिया के विचित्र पेड़, किसी से बहता है 'खून' तो किसी के अंदर चल रहा पब
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सितंबर 23, 2013 in किसी से बहता है 'खून' तो किसी के अंदर चल रहा पब, दुनिया के विचित्र पेड़

- टी पॉट बेओबैब ट्रीज (गोरक्षी वृक्ष): अफ्रीका में इन पेड़ों को जीवन का वृक्ष कहा जाता है। यह किसी आध्यामिक थ्योरीज के आधार पर नहीं कहा जाता है, बल्कि उपयोगिता को देखते हुए ऐसा माना जाता है। यह मानव जीवन के लिए बेहद लाभकारी हैं, क्योंकि यह लोगों को खाना (इसमें एक प्रकार का फल जिसे मंकी बेड कहा जाता है)उपलब्ध कराता है। यह विटामिन सी का बड़ा स्रोत है। यह पेड़ विश्व की स्वास्थ्य समस्या के हल करने के लिए बहुत उपयोगी है।

- बेओबैब ट्रीज (गोरक्षी वृक्ष) का तना लोगों के लिए छाया भी प्रदान करता है। यह चित्र एक बेओबैब पेड़ के तने के अंदर बने पब का है। इसका मूल स्थान ऑस्ट्रेलिया माना जाता है। यहां बेओबैब पेड़ों के तने को 1890 के आसपास जेल के रूप में भी उपयोग किया जाता था।

- ड्रैगन ट्री : अफ्रीका के उत्तरी पश्चिम तट पर कैनरी आयलैंड स्थित है, जहां यह विश्व प्रसिद्ध ड्रैगन ट्री है। इस पेड़ का आधार चौड़ा, मध्य भाग संकरा और ऊपर का भाग किसी छतरी की तरह तना है। यह भाग ऐसा लगता है कि सैकड़ों पेड़ उगकर एकसाथ बंध गए हैं। इसे जीवित जीवाश्म माना जाता है, क्योंकि जब इसे काटा जाता है तो इसे खून की तरह लाल रंग का रस निकलता है।

- पिरांगी काशेव ट्री : उत्तरी ब्राजील में दुनिया का सबसे बड़ा पिरांगी काशेव (काजू) वृक्ष है। यह पेड़ 78,00 से 90,000 वर्ग फीट (लगभग 2 एकड़) में फैला है। इसे ब्राजील के एक मछुवारे लुई इनेसिओ डि ओलिविएओ ने 1888 में लगाया था। उसकी मौत भी 93 साल की उम्र में इसी पेड़ की एक डाली के नीचे हुई थी। यह पेड़ जेनेटिक रूप से से असामान्य है। अधिकांश काशेव के पेड़ ऊपर की ओर बढ़ते हैं, लेकिन पिरांगी काशेव बगल या बाहर की ओर बढ़ रहा है। फसल के मौके पर इसमें 80,000 काजू पैदा होते हैं। पार्क में आने वाले पर्यटक इसकी डालियों से काजू की फली तोड़कर खाते हैं।

द क्रुक्ड फॉरेस्ट (मुड़ा हुआ जंगल): पोलैंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र के ग्रेफिनो फॉरेस्ट में ऐसे मुड़े हुए 400 पाइन ट्री (देवदार के वृक्ष) लगे हैं। आमतौर पर देवदार के वृक्ष सीधे उगते हैं, लेकिन ग्रेफिना में एक विशेष आकार में ये पेड़ उगे हैं और 90 डिग्री का मोड़ लिए हुए हैं। ऐसी असामान्यता धरती के किसी भी जंगल में देखने को नहीं मिलती है। यहां के इन सभी पेड़ों के तने नार्थ की तरफ बढ़े हुए हैं।
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पेड़ों की दुनिया भी बेहद अजीब है। अगर हम इसे देखे तो ये हमें हैरत में डाल देती है। इस धरती पर पेड़ों की हजारों प्रजातियां हैं, लेकिन कुछ पेड़ ऐसे हैं, जो विश्व में अपनी अजीब पहचान के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं।
पृथ्वी पर कुछ वृक्ष हजारों साल पुराने हैं और आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़े हैं। इन पेड़ों की जातियों में से कोई जेल की कोठरी रह चुके हैं किसी से खून निकलता है।
एक पेड़ ऐसा भी है जिसके तने के अंदर पब है, जहां लोग म्युजिक की धुनों पर थिरकते हैं। कुछ ऐसे ही विचित्र पेड़ों की दुनिया से हम आपको यहां परिचित करवाने जा रहे हैं।
चार पैरों वाला दानव : यह पेड़ तो देखने में चार पैरों वाला दानव दिखता है। अमेरिका के एक किसान एक्सेल एर्ललैंडसन ने 1920 में पेड़ों के आकार में बदलाव करने की शुरुआत की थी। उसने गूलर के कई वृक्षों के आकार में बदलाव किए थे। एक्सेल ने गूलर के पेड़ों के आकार में परिवर्तन कर हार्ट, आकाशीय बिजली गिरने, रिंग जैसी आकृति तैयार कर दी थी। उन्होंने करीब 40 साल में 70 से अधिक पेड़ों की कलाकृतियां तैयार की। ये सभी कैलीफोर्निया के गिलरोरी गार्डन में आज मौजूद हैं।
- फ्रांस का चैपल ट्री : यह उत्तरी फ्रांस के एक छोटे से कस्बे में स्थित है। इसे चैपल-ओक ऑफ एलोउविले- बेलेफोउस भी कहा जाता है। यह वृक्ष 1000 साल से अधिक पुराना है और इसे दुनिया के सबसे पुराने पेड़ों में से एक माना जाता है। इसकी ऊंचाई 50 फीट से अधिक है। वर्ष 1669 में जब यह 500 साल वर्ष पुराना था, तब एब्बोट डु डेट्रोइट और फादर डु सेरसेआउ ने इसे चैपल (छोटा गिरजाघर) बनाना तय किया था। इस पेड़ पर एक बार बिजली गिरी और ठीक इसके अंदर घुस गई और इसमें आग लग गई थी फिर भी आज यह सुरक्षित खड़ा है। यह स्थान वर्जिन मेरी की आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए एक तीर्थस्थल बन गया है। हजारों लोग यहां प्रतिवर्ष 15 अगस्त को आते हैं।
-ता फ्रोम ट्री ऑफ कंबोडिया : कंबोडिया के अंगारकोट का यह क्षेत्र पवित्र मंदिरों के क्षेत्र के लिए ख्यात है। यह जंगली इलाका सिल्क कॉटन के पेड़ों के लिए भी जाना जाता है। यहां का टा फ्रोम बौद्ध मंदिर12 वीं शताब्दी में बनाया गया था हालांकि आज यह खंडहर हो चुका है। सैकड़ों साल पुराने मंदिर की दीवारों पर पेड़ बड़े हो गए हैं। मंदिर के ढांचे को उगे हुए पेड़ों ने लपेट लिया है। यूनेस्को ने मंदिर और इन पेड़ों को विश्व धरोहर घोषित किया है। यहां हजारों पर्यटक आते हैं। इसे फिल्मों की शूटिंग के लिए भी अच्छी लोकेशन माना जाता है। यहां टॉम्ब राइडर की भी शूटिंग की गई थी।
- बेओबैब ट्रीज (गोरक्षी वृक्ष) का तना लोगों के लिए छाया भी प्रदान करता है। यह चित्र एक बेओबैब पेड़ के तने के अंदर बने पब का है। इसका मूल स्थान ऑस्ट्रेलिया माना जाता है। यहां बेओबैब पेड़ों के तने को 1890 के आसपास जेल के रूप में भी उपयोग किया जाता था।
- ड्रैगन ट्री : अफ्रीका के उत्तरी पश्चिम तट पर कैनरी आयलैंड स्थित है, जहां यह विश्व प्रसिद्ध ड्रैगन ट्री है। इस पेड़ का आधार चौड़ा, मध्य भाग संकरा और ऊपर का भाग किसी छतरी की तरह तना है। यह भाग ऐसा लगता है कि सैकड़ों पेड़ उगकर एकसाथ बंध गए हैं। इसे जीवित जीवाश्म माना जाता है, क्योंकि जब इसे काटा जाता है तो इसे खून की तरह लाल रंग का रस निकलता है।
द जनरल शेरमैन : कैलीफोर्निया का यह सेक्यूओइया (शंकुधारी) नेशनल पार्क का सबसे लंबा पेड़ है। भले ही यह दुनिया का सबसे पुराना, लंबा और चौड़ा पेड़ न हो, लेकिन इसका घनफल (वॉल्यूम) विश्व के वृक्षों में सबसे अधिक है। जनरल शेरमैन 52,500 क्यूबिक फीट(1,448.6 क्यूबिक मीटर) है, इस घनफल में इसकी डालियों का माप शामिल नहीं किया गया।
- एल एरबो डि ला सबीना : एल एरबो डि ला सबीना एक सुप्रसिद्ध प्राचीन जूनिपेर (जंगली झाड़ी) वृक्ष है। स्पेनिश में सबीना का अर्थ जंगली झाड़ी होता है। ड्रैगन ट्री की तरह यह भी स्पेन के कैनरी द्वीप के एल हिएरो में पाया जाता है। ये पेड़ अक्सर हवाओं के कारण गिर जाते हैं। इनका तना भले ही सीधा खड़ा रहे, लेकिन ये डालियों के पास से मुड़ जाते हैं और डालियां जमीन में जा टिकती हैं। यह वृक्ष 1950 से संरक्षित है, क्योंकि इसका अस्तित्व खतरे में है।
द क्रुक्ड फॉरेस्ट (मुड़ा हुआ जंगल): पोलैंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र के ग्रेफिनो फॉरेस्ट में ऐसे मुड़े हुए 400 पाइन ट्री (देवदार के वृक्ष) लगे हैं। आमतौर पर देवदार के वृक्ष सीधे उगते हैं, लेकिन ग्रेफिना में एक विशेष आकार में ये पेड़ उगे हैं और 90 डिग्री का मोड़ लिए हुए हैं। ऐसी असामान्यता धरती के किसी भी जंगल में देखने को नहीं मिलती है। यहां के इन सभी पेड़ों के तने नार्थ की तरफ बढ़े हुए हैं।
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