सोमवार, 23 सितंबर 2013
डायनासोर की रहस्यमयी दुनिया, जानें वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं...
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हॉलीवुड के मशहूर स्टूडियो यूनिवर्सल पिक्चर्स ने हिट फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ के चौथे संस्करण की घोषणा कर दी है। यह फिल्म ‘जुरासिक वर्ल्ड’ के नाम से 2015 में रिलीज होगी। ‘जुरासिक पार्क’ एक ऐसी फिल्म थी, जिसने पूरी दुनिया को डायनासोर नाम के दैत्याकार जीव से परिचित कराया था। आइए आज की बिग स्टोरी में एक नजर डालें डायनासोर की अद्भुत दुनिया पर...।
हॉलीवुड के मशहूर निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग द्वारा निर्देशित फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ जब 1993 में रिलीज हुई थी तो इस फिल्म ने पूरी दुनिया को एक अद्भुत जीव डायनासोर से बेहद शानदार ढंग से रूबरू करवाया था। इसके दूसरे और तीसरे संस्करण को भी लोगों ने खूब सराहा। डायनासोर बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए हमेशा कौतुहल का विषय रहे हैं। दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली कुछ किताबें डायनासोर पर आधारित हैं। फिल्मों में भी लोगों ने इन्हें खूब पसंद किया। आज डायनासोर पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं। मगर यह कहां रहते थे, क्या खाते थे और ये आखिर कैसे खत्म हो गए, यह सब आम जन से लेकर वैज्ञानिकों के लिए भी चर्चा का विषय बना रहता है।
आगे की स्लाइड पर क्लिक करके पढ़ें, डायनासोर कहां रहते थे, क्या खाते थे और ये आखिर कैसे खत्म हो गए। साथ ही जानें, डायनासोर पर क्या है वैज्ञानिकों का सच...
16 करोड़ साल तक रहा राज
डायनासोर ऐसे रेप्टाइल्स हैं, जिनकी उत्पत्ति धरती पर तकरीबन 20 से 25 करोड़ साल पहले हुई थी। डायनासोर शब्द ग्रीक भाषा का है, जिसका अर्थ बड़ी खतरनाक और भयंकर छिपकली होता है। हालांकि, ये विशालकाय प्राणी छिपकली से हजारों गुना बड़े होते थे। यह ट्रिएसिक काल के अंत (लगभग 23 करोड़ वर्ष पहले) से लेकर क्रीटेशियस काल (लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पहले) के अंत तक अस्तित्व में रहे। डायनासोर के अवशेष पृथ्वी के हर महाद्वीप पर पाए गए हैं। मेसोज्यॉइक काल में डायनासोर होते थे। इस काल को तीन भाग में बांटा गया है। इसमें ट्रिएसिक काल, जुरैसिक काल और क्रीटेशियस काल शामिल हैं। 16.5 करोड़ सालों तक डायनासोर का पृथ्वी पर राज रहा है।
कैसे थे ये प्राणी?
अब तक हॉलीवुड फिल्मों में दिखाए गए डायनासोर की ही तरह वास्तव में कई प्रकार के डायनासोर होते थे। कुछ डायनासोर दो पैरों पर चलते थे तो कुछ चार पैरों के सहारे ही चल पाते थे। कई डायनासोर ऐसे थे, जो आवश्यकता पड़ने पर दो पैरों पर चलते थे तो कभी चार पैरों पर चलते थे। कुछ प्रजातियों के डायनासोर उड़ते भी थे। अधिकांश डायनासोर शाकाहारी थे, जबकि कुछ प्रजातियां ऐसी थीं, जो मांसाहारी थीं। इन प्रजातियों के डायनासोर अन्य छोटे डायनासोर को ही अपना भोजन बना लेते थे। डायनसोर को आमतौर पर अपने विशाल आकार के लिए जाना जाता है, लेकिन डायनासोर की कुछ प्रजातियां मानव के जितनी बड़ी तो कुछ मुर्गे के बराबर भी हुई हैं। कई डायनासोर ऐसे थे, जिनके सींग भी थे, जबकि इनका रंग कैसा था इस बात पर वैज्ञानिक एक मत नहीं हो पाए हैं।
कब से हुए अध्ययन शुरू?
वैज्ञानिकों ने डायनासोर पर अध्ययन 1820 के दशक से प्रारंभ किया। दरअसल, उस समय इंग्लंड में एक बड़े लैंड रेह्रश्वटाइल की हड्डियां मिली थीं। इसके बाद ही दुनियाभर के कई देशों में ऐसी हड्डियां खोजी गईं और डायनासोर के बारे में वैज्ञानिकों ने साक्ष्य जुटाना शुरू कर दिए। उस समय वैज्ञानिकों ने हड्डियों को देखने के बाद उस जीव को मेगालोसॉरस नाम दिया था। डायनासोर शब्द का इस्तेमाल 1842 में इंग्लैंड के वैज्ञानिक सर रिचर्ड ओवेन ने पहली बार किया था। डिनोस का अर्थ है, भयानक और शक्तिशाली, जबकि सॉरस का अर्थ है छिपकली।
कैसे हुआ अंत
डायनासोर का अंत धरती पर कैसे हुआ, यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। दुनियाभर के वैज्ञानिकों का इस बात पर अलग-अलग मत है। हालांकि, इस बारे में सबसे अधिक यह कहा जाता है कि कोई उल्कापिंड धरती से टकराया था और उसके प्रभाव ने डायनासोर का अस्तित्व दुनिया से खत्म कर दिया था। अधिकांश पैलिओनटोलॉजिस्ट का कहना है कि लगभग 65.5 मिलियन साल पहले पृथ्वी पर कोई उल्कापिंड या धूमकेतु गिरा था, जिसके कारण पूरी धरती पर राख फैल गई थी और डायनासोर का अंत हो गया था।
भारत में डायनासोर
भारत में भी डायनासोर के अवशेष मिल चुके हैं। 2003 में वैज्ञानिकों ने भारत में डायनासोर की नई प्रजाति की खोज की थी। यह नर्मदा घाटी में लगभग 7 करोड़ वर्ष पहले पाया जाता था। भारत में पाए गए डायनासोर की प्रजाति का नाम रोजासॉरस नर्मेदेसिस रखा गया है। वैज्ञानिकों की टीम ने गुजरात के नर्मदा नदी के इलाके में खोज अभियान चलाया था, जहां पर इस दौरान उन्हें डायनासोर के जीवश्म प्राप्त हुए थे।
ब्रिटेन रहा है हॉटस्पॉट
ब्रिटेन को डायनासोर का हॉटस्पॉट कहा जाता था। यहां पर डायनासोर की अब तक 100 से ज्यादा प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। दरअसल, मेसोज्यॉइक काल (एज ऑफ रेह्रश्वटाइल्स भी कहा जाता है) में ब्रिटेन नॉर्थ अमेरिका और यूरेशिया के बीच लैंड ब्रिज के रूप में था। यही कारण है कि उस काल में यह डायनासोर के इवोल्यूशन और माइग्रेशन के लिए हॉट स्पॉट बन गया था। यहां के वैज्ञानिकों की भी डायनासोर में काफी रुचि रही है।
शाकाहारी ज्यादा, मांसाहारी कम
वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया भर में शाकाहारी डायनासोर ज्यादा हुए हैं, जबकि इनकी तुलना में मांसाहारी डायनासोर कम होते थे। दरअसल, शाकाहारी डायनासोर काफी संख्या में अंडे देते थे, लेकिन इनके बच्चे बेहद कम संया में वयस्क हो पाते थे, जबकि मांसाहारी डायनासोर की उम्र लंबी होती थी। मांसाहारी डायनासोर खुद शाकाहारी डायनासोर के बच्चों को खा लेते थे। इसी कारण वयस्क शाकाहारी डायनासोर कम हुए हैं।
कुछ खास बातें...
सबसे पहला नामः
दुनिया में पहले डायनासोर का नाम मेगालोसॉरस पड़ा था। यह 1842 में वैज्ञानिक रेवेरेंड विलियम बकलैंड ने दिया था। मेगालोसॉरस का मतलब गेट्र लिजार्ड होता है। यह डायनासोर तकरीबन 9 मीटर लंबा और तीन मीटर ऊंचा था।
सबसे लंबा डायनासोरः
सीसमोसॉरस अब तक दुनिया का सबसे लंबा डायनासोर है। वैज्ञानिकों के अनुसार सीसमोसॉरस की लंबाई 40 मीटर से भी ज्यादा थी। इसके अवशेषों के अनुसार इसकी लंबाई पांच डबल डेकर बस से भी ज्यादा थी। यह चार पैरों पर धीमी गति से चलता था।
सबसे वजनी डायनासोरः
वैज्ञानिकों के मिले साक्ष्यों के आधार पर ब्रैचियोसॉरस अब तक सबसे वजनी डायनासोर है। इसका वजन 80 टन था। 16 मीटर ऊंचे और 26 मीटर लंबे ब्रैचियोसॉरस की कद-काठी पांच अफ्रीकी हाथियों के बराबर थी। ब्रैचियोसॉरस का मतलब आर्म लिजार्ड होता है। ब्रैचियोसॉरस की गर्दन जिराफ की तरह लंबी थी।
सबसे छोटा डायनासोरः
वैसे तो डायनासोर के बच्चों के जीवश्म और हड्डियों से वैज्ञानिकों को कई छोटे डायनासोर होने का अनुमान हुआ है, लेकिन पूरी तरह विकसित अब तक का सबसे छोटा डायनासोर लेसोथोसॉरस है। पूरी तरह विकसित होने के बाद इसकी लंबाई मात्र 1 मीटर थी। पूरी तरह शाकाहारी लेसोथोसॉरस बहुत तेज गति से भाग सकता था।
जानें कुछ और फैक्ट...
- 200 साल तक जीवित रहे हैं, कुछ डायनासोर। हालांकि, वैज्ञानिकों के पास डायनासोर की लाइफ स्पैम के बारे में कोई ठोस जानकारियां नहीं हैं।
- 500 विभिन्न वंशों और 1000 से अधिक प्रजातियों के डायनासोरों की अब तक वैज्ञानिक पहचान कर चुके हैं।
- 23 करोड़ वर्ष पहले मेडागॉस्कर में दुनिया के पहले डायनासोर होने की बात वैज्ञानिक कहते हैं। हालांकि, इस डायनासोर का वैज्ञानिकों ने कोई नाम नहीं दिया था। sabhar : bhaskar.com
दुनिया के विचित्र पेड़, किसी से बहता है 'खून' तो किसी के अंदर चल रहा पब
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सितंबर 23, 2013 in किसी से बहता है 'खून' तो किसी के अंदर चल रहा पब, दुनिया के विचित्र पेड़

- टी पॉट बेओबैब ट्रीज (गोरक्षी वृक्ष): अफ्रीका में इन पेड़ों को जीवन का वृक्ष कहा जाता है। यह किसी आध्यामिक थ्योरीज के आधार पर नहीं कहा जाता है, बल्कि उपयोगिता को देखते हुए ऐसा माना जाता है। यह मानव जीवन के लिए बेहद लाभकारी हैं, क्योंकि यह लोगों को खाना (इसमें एक प्रकार का फल जिसे मंकी बेड कहा जाता है)उपलब्ध कराता है। यह विटामिन सी का बड़ा स्रोत है। यह पेड़ विश्व की स्वास्थ्य समस्या के हल करने के लिए बहुत उपयोगी है।

- बेओबैब ट्रीज (गोरक्षी वृक्ष) का तना लोगों के लिए छाया भी प्रदान करता है। यह चित्र एक बेओबैब पेड़ के तने के अंदर बने पब का है। इसका मूल स्थान ऑस्ट्रेलिया माना जाता है। यहां बेओबैब पेड़ों के तने को 1890 के आसपास जेल के रूप में भी उपयोग किया जाता था।

- ड्रैगन ट्री : अफ्रीका के उत्तरी पश्चिम तट पर कैनरी आयलैंड स्थित है, जहां यह विश्व प्रसिद्ध ड्रैगन ट्री है। इस पेड़ का आधार चौड़ा, मध्य भाग संकरा और ऊपर का भाग किसी छतरी की तरह तना है। यह भाग ऐसा लगता है कि सैकड़ों पेड़ उगकर एकसाथ बंध गए हैं। इसे जीवित जीवाश्म माना जाता है, क्योंकि जब इसे काटा जाता है तो इसे खून की तरह लाल रंग का रस निकलता है।

- पिरांगी काशेव ट्री : उत्तरी ब्राजील में दुनिया का सबसे बड़ा पिरांगी काशेव (काजू) वृक्ष है। यह पेड़ 78,00 से 90,000 वर्ग फीट (लगभग 2 एकड़) में फैला है। इसे ब्राजील के एक मछुवारे लुई इनेसिओ डि ओलिविएओ ने 1888 में लगाया था। उसकी मौत भी 93 साल की उम्र में इसी पेड़ की एक डाली के नीचे हुई थी। यह पेड़ जेनेटिक रूप से से असामान्य है। अधिकांश काशेव के पेड़ ऊपर की ओर बढ़ते हैं, लेकिन पिरांगी काशेव बगल या बाहर की ओर बढ़ रहा है। फसल के मौके पर इसमें 80,000 काजू पैदा होते हैं। पार्क में आने वाले पर्यटक इसकी डालियों से काजू की फली तोड़कर खाते हैं।

द क्रुक्ड फॉरेस्ट (मुड़ा हुआ जंगल): पोलैंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र के ग्रेफिनो फॉरेस्ट में ऐसे मुड़े हुए 400 पाइन ट्री (देवदार के वृक्ष) लगे हैं। आमतौर पर देवदार के वृक्ष सीधे उगते हैं, लेकिन ग्रेफिना में एक विशेष आकार में ये पेड़ उगे हैं और 90 डिग्री का मोड़ लिए हुए हैं। ऐसी असामान्यता धरती के किसी भी जंगल में देखने को नहीं मिलती है। यहां के इन सभी पेड़ों के तने नार्थ की तरफ बढ़े हुए हैं।
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पेड़ों की दुनिया भी बेहद अजीब है। अगर हम इसे देखे तो ये हमें हैरत में डाल देती है। इस धरती पर पेड़ों की हजारों प्रजातियां हैं, लेकिन कुछ पेड़ ऐसे हैं, जो विश्व में अपनी अजीब पहचान के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं।
पृथ्वी पर कुछ वृक्ष हजारों साल पुराने हैं और आज भी पूरी मजबूती के साथ खड़े हैं। इन पेड़ों की जातियों में से कोई जेल की कोठरी रह चुके हैं किसी से खून निकलता है।
एक पेड़ ऐसा भी है जिसके तने के अंदर पब है, जहां लोग म्युजिक की धुनों पर थिरकते हैं। कुछ ऐसे ही विचित्र पेड़ों की दुनिया से हम आपको यहां परिचित करवाने जा रहे हैं।
चार पैरों वाला दानव : यह पेड़ तो देखने में चार पैरों वाला दानव दिखता है। अमेरिका के एक किसान एक्सेल एर्ललैंडसन ने 1920 में पेड़ों के आकार में बदलाव करने की शुरुआत की थी। उसने गूलर के कई वृक्षों के आकार में बदलाव किए थे। एक्सेल ने गूलर के पेड़ों के आकार में परिवर्तन कर हार्ट, आकाशीय बिजली गिरने, रिंग जैसी आकृति तैयार कर दी थी। उन्होंने करीब 40 साल में 70 से अधिक पेड़ों की कलाकृतियां तैयार की। ये सभी कैलीफोर्निया के गिलरोरी गार्डन में आज मौजूद हैं।
- फ्रांस का चैपल ट्री : यह उत्तरी फ्रांस के एक छोटे से कस्बे में स्थित है। इसे चैपल-ओक ऑफ एलोउविले- बेलेफोउस भी कहा जाता है। यह वृक्ष 1000 साल से अधिक पुराना है और इसे दुनिया के सबसे पुराने पेड़ों में से एक माना जाता है। इसकी ऊंचाई 50 फीट से अधिक है। वर्ष 1669 में जब यह 500 साल वर्ष पुराना था, तब एब्बोट डु डेट्रोइट और फादर डु सेरसेआउ ने इसे चैपल (छोटा गिरजाघर) बनाना तय किया था। इस पेड़ पर एक बार बिजली गिरी और ठीक इसके अंदर घुस गई और इसमें आग लग गई थी फिर भी आज यह सुरक्षित खड़ा है। यह स्थान वर्जिन मेरी की आत्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए एक तीर्थस्थल बन गया है। हजारों लोग यहां प्रतिवर्ष 15 अगस्त को आते हैं।
-ता फ्रोम ट्री ऑफ कंबोडिया : कंबोडिया के अंगारकोट का यह क्षेत्र पवित्र मंदिरों के क्षेत्र के लिए ख्यात है। यह जंगली इलाका सिल्क कॉटन के पेड़ों के लिए भी जाना जाता है। यहां का टा फ्रोम बौद्ध मंदिर12 वीं शताब्दी में बनाया गया था हालांकि आज यह खंडहर हो चुका है। सैकड़ों साल पुराने मंदिर की दीवारों पर पेड़ बड़े हो गए हैं। मंदिर के ढांचे को उगे हुए पेड़ों ने लपेट लिया है। यूनेस्को ने मंदिर और इन पेड़ों को विश्व धरोहर घोषित किया है। यहां हजारों पर्यटक आते हैं। इसे फिल्मों की शूटिंग के लिए भी अच्छी लोकेशन माना जाता है। यहां टॉम्ब राइडर की भी शूटिंग की गई थी।
- बेओबैब ट्रीज (गोरक्षी वृक्ष) का तना लोगों के लिए छाया भी प्रदान करता है। यह चित्र एक बेओबैब पेड़ के तने के अंदर बने पब का है। इसका मूल स्थान ऑस्ट्रेलिया माना जाता है। यहां बेओबैब पेड़ों के तने को 1890 के आसपास जेल के रूप में भी उपयोग किया जाता था।
- ड्रैगन ट्री : अफ्रीका के उत्तरी पश्चिम तट पर कैनरी आयलैंड स्थित है, जहां यह विश्व प्रसिद्ध ड्रैगन ट्री है। इस पेड़ का आधार चौड़ा, मध्य भाग संकरा और ऊपर का भाग किसी छतरी की तरह तना है। यह भाग ऐसा लगता है कि सैकड़ों पेड़ उगकर एकसाथ बंध गए हैं। इसे जीवित जीवाश्म माना जाता है, क्योंकि जब इसे काटा जाता है तो इसे खून की तरह लाल रंग का रस निकलता है।
द जनरल शेरमैन : कैलीफोर्निया का यह सेक्यूओइया (शंकुधारी) नेशनल पार्क का सबसे लंबा पेड़ है। भले ही यह दुनिया का सबसे पुराना, लंबा और चौड़ा पेड़ न हो, लेकिन इसका घनफल (वॉल्यूम) विश्व के वृक्षों में सबसे अधिक है। जनरल शेरमैन 52,500 क्यूबिक फीट(1,448.6 क्यूबिक मीटर) है, इस घनफल में इसकी डालियों का माप शामिल नहीं किया गया।
- एल एरबो डि ला सबीना : एल एरबो डि ला सबीना एक सुप्रसिद्ध प्राचीन जूनिपेर (जंगली झाड़ी) वृक्ष है। स्पेनिश में सबीना का अर्थ जंगली झाड़ी होता है। ड्रैगन ट्री की तरह यह भी स्पेन के कैनरी द्वीप के एल हिएरो में पाया जाता है। ये पेड़ अक्सर हवाओं के कारण गिर जाते हैं। इनका तना भले ही सीधा खड़ा रहे, लेकिन ये डालियों के पास से मुड़ जाते हैं और डालियां जमीन में जा टिकती हैं। यह वृक्ष 1950 से संरक्षित है, क्योंकि इसका अस्तित्व खतरे में है।
द क्रुक्ड फॉरेस्ट (मुड़ा हुआ जंगल): पोलैंड के उत्तर पश्चिम क्षेत्र के ग्रेफिनो फॉरेस्ट में ऐसे मुड़े हुए 400 पाइन ट्री (देवदार के वृक्ष) लगे हैं। आमतौर पर देवदार के वृक्ष सीधे उगते हैं, लेकिन ग्रेफिना में एक विशेष आकार में ये पेड़ उगे हैं और 90 डिग्री का मोड़ लिए हुए हैं। ऐसी असामान्यता धरती के किसी भी जंगल में देखने को नहीं मिलती है। यहां के इन सभी पेड़ों के तने नार्थ की तरफ बढ़े हुए हैं।
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साइंस भी नहीं सुलझा सका धरती के इन 7 रहस्यमयी स्थानों की गुत्थी
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सितंबर 23, 2013 in साइंस भी नहीं सुलझा सका धरती के इन 7 रहस्यमयी स्थानों की गुत्थी

साइंस आज हमें बहुत सी बातों को समझने और समस्याओं को सुलझाने में मदद करता है। लेकिन आज भी कई ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में इसके पास कोई जवाब नहीं है।
हम इन घटनाओं को सुपरनेचुरल का दर्जा दे देते हैं और यहीं से इनके रहस्य के जवाब को खोजने का रास्ता भी बंद हो जाता है।
धरती के 7 रहस्मय इन स्थानों के बारे में तरह-तरह की किवदंतियां प्रचलित हैं। फिलहाल इन रहस्य को सुलझाने में मानव मस्तिष्क आज भी कमजोर नजर आता है।
वेनचेस्टर मिस्ट्री हाउस : सारा विनचेस्टर ने यह विशाल हवेली 18 वीं सदी में बनवाई थी। इसके पीछे यह मान्यता प्रचलित है कि वह अपने पति और बच्चे की मौत के बाद विचलित थीं। वह बहुत ही अधिक परेशान थीं और इसके चलते उन्होंने आत्माओं और भूतों की शांति उन्होंने यह विशाल हवेली बनवाई थी। एक आत्मा ने उसे बताया कि उनका परिवार श्रापित है और उसने इस स्थान पर एक विशाल हवेली बनवाने की सलाह दी और कहा कि अगर ऐसा नहीं किया तो तुम्हारी भी जल्द मौत हो जाएगी। सारा ने इस सलाह के बाद यह बिल्डिंग बनवाई। इस बिल्डिंग की डिजाइन बेहद विचित्र है। इसमें बेल टॉवर हैं और सारा हर रात आत्माओं को बुलाने के लिए इन्हें बजाती थी। बिल्डिंग में एक विशेष रूम है, जहां सारा आत्माओं से बात करती थी। यहां आने वाले कई लोगों ने बताया कि बिल्डिंग में विचित्र रोशन दिखाई देती हैं और आवाजें आती रहती हैं।
- बरमूडा का त्रिभुज : आपने बरमूडा के बारे में जरूर सुना होगा। यह स्थान उत्तरी अटलांटिक सागर में स्थित है। कई प्लेन और शिप यहां से गुजरते हुए रहस्यमय ढंग से गायब हो चुके हैं। इसके बाद इनका पता तक नहीं चला। वैज्ञानिक यहां के खराब मौसम को दुर्घटना का कारण बताते हैं, लेकिन बहुत से लोग इन घटनाओं के पीछे कोई सुपरनेचुरल कारण मानते हैं
- मैकमर्डो ड्राइ वैली : यह अंटार्टिका में स्थित है जहां बर्फ नहीं है। यह इलाका एक रेगिस्तान है, जहां यह झरना बहते हुए लाल रंग का दिखाई देता है। जब आप इसे देखेंगे तो लगेगा कि घाटी से खून बह रहा है। इस झरने को लोग ब्लड फॉल्स कहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वैली का पर्यावरण मंगल ग्रह से मिलता जुलता है।
- रोजवेल यूएफओ क्रैश साइट : न्यू मैक्सिको में रोजवेल वह जगह है, जिसके बारे में लोगों का मानना है कि यहां जरूर किसी दूसरे ग्रह के निवासी आए होंगे। यह इस आधार पर माना जाता है कि रोजवेल में जुलाई 1947 में एक यूएफओ दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। स्थानीय लोगों का मानना है कि मिलिट्री ने यूएफओ पर सवार यात्रियों को पकड़ लिया और उन्हें किसी गुप्त स्थान पर ले गई। संभव है कि वे अभी भी जीवित हों।
स्टोनहेंग:-ब्रिट्रेन के विल्टशायर काउंटी में स्थित स्टोनहेंग एक प्राचीन स्मारक स्थल है। यहां बड़ी विशाल चट्टानों को विशेष ढंग से रखा गया है। वैज्ञानिक इन्हें 2000 ईसा पूर्व मानता है। लेकिन आज यह पता नहीं किया जा सका कि इसे किसने और क्यों बनाया। यहां मानव शरीर की हड्डियां भी मिल चुकी हैं। यहां के स्थानीय लोगों के बीच इस स्थान को लेकर कई तरह की विचित्र कहानियां प्रचलित हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह स्थान बलि देने या शव दफनाने की जगह रही होगी।
- पेरू की नाज्का लाइंस : पेरू के नाज्का रेगिस्तान के मध्य में मानव, चिडिय़ा, बंदर, छिपकली, मकड़ी, शार्क आदि की कई विशाल आकृतियां पत्थरों में बनी हुई हैं। इन्हें ईसा पूर्व 500 वर्ष से पुराना बताया जा रहा है। लेकिन आज तक पता नहीं किया जा सका कि इनके पीछे क्या राज है। कुछ लोगों का मानना है कि ये आकृतियां ज्योतिष या कास्मॉलॉजी के लिए बनाई गईं होंगी।
-नेवेडा में यह एक गर्म जल का स्रोत्र है। यह पांच फीट ऊंचाई से बहता है। यहां के पानी में कई मिनरल्स होने के कारण यह कुछ इस तरह से दृश्य बनाता है। यहां 30-40 छोटे पूल्स में इसका पानी जाता है। यह गीजर एक बिजनेस टाइकून टोड जैक सिक की निजी संपत्ति है। यह जलस्रोत्र आज भी रहस्य बना हुआ है sabhar : bhaskar.com
रविवार, 22 सितंबर 2013
सोने की कार से चलता ये सबसे शाही इंसान, ओबामा भी ठोकते हैं सलाम!
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सितंबर 22, 2013 in ओबामा भी ठोकते हैं सलाम!, सोने की कार से चलता ये सबसे शाही इंसान

हम दुनियाभर के रईसों, अरबपति कारोबारियों और उनसे जुड़े रोचक तथ्यों से आपको रूबरू कराते रहते हैं। हम समय-समय पर आपको उनके जीवन में होने वाली रोचक घटनाएं भी बताते रहते हैं। इसी कड़ी में हम आपको आज बताएंगे कि दुनियाभर के शाही लोग किस ठाठ से करते हैं सवारी।
आपने टाटा, बिड़ला, अंबानी जैसे दिग्गज कारोबारियों के बारे में तो काफी पढ़ा और सुना है। आपने इनके कारों के जखीरे के बारे में भी सुना है। लेकिन आज हम आपको भारत सहित दुनियाभर के 10 शाही परिवारों की कारों के बारे में बताएंगे। इन्हें देखकर आप बस यही कहेंगे कि ‘काश ये होती मेरी कार..।’ बता दें कि ये कारें बाहर से दिखने में जितनी आकर्षक हैं, अंदर से ये उतनी ही खूबसूरत हैं। इनके सिक्योरिटी फीचर्स भी लाजवाब हैं।
आगे की स्लाइड पर क्लिक कीजिए और जानिए ब्रिटिश राजकुमार किस कार में घूमते हैं और किस भारतीय राजघराने के लिए खासतौर पर तैयार की गई थी रोल्स रॉयस...
एस्टन मार्टिन की शानदार कार को तो आप पहचान ही गए होंगे। इसकी कीमत 1.2 करोड़ रुपए से लेकर 20 करोड़ रुपए तक होती है। अब इसमें बैठे जोड़े को भी पहचान लीजिए। ये हैं लंदन के प्रिस विलियम और उनकी पत्नी केट मिडिलटन। वैसे तो शाही जोड़े के पास कारों की कोई कमी नहीं है लेकिन ये कार उनकी सबसे पसंदीदा कारों में से एक है। यह तस्वीर इन दोनों की शादी के समय की है।
यह हैं भारत के राजकोट के राजा की शाही सवारी। यह सन 1934 की बनी हुई रोल्स रॉयस है, जिसे नारंगी रंग से रंगा गया है, सबसे खास बात यह है कि रोल्स रॉयस का यह रंग अब देखने को बहुत ही कम मिलता है। इसे खास तौर पर राजकोट के महाराजा के लिए तैयार किया गया था। आज इसकी कीमत करीब 5 करोड़ रुपए है।
यह सवारी है, लंदन की महारानी एलिजाबेथ की। बेंटले की यह बेहतरीन लेमोजिन कार कई मायनों में खास है। कंपनी ने इस कार को लंदन के शाही परिवार के लिए बनाया है। इसके दरवाजे पूरी तरह से 90 डिग्री तक खुलते हैं, जिससे कार के भीतर बैठी महारानी आसानी से बाहर देख सकती हैं। इस कार की कीमत ज्ञात नहीं है।
आबू धाबी के प्रिंस शेख सुल्तान बिन रशद अल नाहयान, एसयूवी वाहनों के बड़े शौकीन है। जर्मन कार निर्माता कंपनी मर्सडीज बेंज ने खास प्रिंस के लिए बेहतरीन जी55 एएमजी को तैयार किया है। इसकी कीमत 1.70 लाख के करीब है।
मोनक्को के प्रिंस अल्बर्ट की शाही सवारी, लेक्सस एलएस 600 एच लैंड्यूलेट है। इस कार को अल्बर्ट के शादी के उपलक्ष में तैयार किया गया था। इस कार पर खास तौर का वॉटर पेंट प्रयोग किया गया है, जो कि कंपनी के बेहतरीन पेंटर्स ने अपने हाथो से लगाया है। इसकी कीमत ज्ञात नहीं है।
यह कतार के शाही घराने की सवारी, पगानी जोंडा है। बेहद ही आकर्षक और दमदार स्पोर्ट कार। इस कार में 7.3 लीटर की क्षमता का वी8 इंजन प्रयोग किया गया है। जो कि कार को 690 हार्स पॉवर की शक्ति प्रदान करता है। पगानी जोंडा दुनिया की टॉप सबसे फास्ट कारों में से एक है। इसकी कीमत करीब 17 करोड़ रुपए है।
सउदी अरब के प्रिंस अलवलिद बिन तलाल अल सउद, रोल्स रॉयस की बेहतरीन लग्जरी कार फैंटम में सफर करते हैं। कंपनी ने इस कार में 6.75 लीटर की क्षमता का वी12 इंजन का प्रयोग किया है। जो कि कार को 453 बीएचपी की शक्ति प्रदान करता है। इसकी कीमत 3 करोड़ से ज्यादा है।
बुरनई के सुल्तान, हसन अल बोल्कीया, कस्टमाईज रोल्स रॉयस कार में सफर करते हैं। इस कार को खास कर सुल्तान के लिए बनाया गया है। इसकी कीमत ज्ञात नहीं है।
थाईलैंड के राजघराने की शाही सवारी, कैडिलैक लिमोजिन है। वैसे तो थाईलैंड के राजघराने में कई बेहतरीन कारों का एक बड़ा काफिला है। लेकिन आधिकारिक रूप से थाईलैंड के राजा इसी कार में सफर करते हैं। बेहतरीन कैडिलैक लिमोजिन का ही प्रयोग अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी करते हैं। इसकी कीमत करीब 1.8 करोड़ है
बेल्जियम के राजघराने की शाही सवारी, मर्सडीज बेंज पूलमैन 600 है। इसी कार का प्रयोग भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी किया जाता है। इसकी कीमत ज्ञात नहीं है। sabhar : bhaskar.com
अब मानव-अंगों की होगी छपाई
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सितंबर 22, 2013 in अब मानव-अंगों की होगी छपाई

शीघ्र ही रूसी वैज्ञानिक मानव शरीर के अंगों की पुनर्रचना करने लगेंगे| मास्को में अंगों और ऊतकों की त्री-आयामी छपाई यानी बायोप्रिंटिंग की पहली प्रयोगशाला खुल गई है|
अब ट्रांसप्लांटेशन का काम कहीं अधिक आसानी से, तेज़ी से और निरापद ढंग से किया जा सकेगा| डोनर-अंगों का स्थान रोगी के अपने स्टेम सेलों (मेरू कोशिकाओं) से “उगाए गए” अंग ले लेंगे| मानव-शरीर उन्हें आसानी से अपना लेता है, उन्हें अस्वीकार नहीं करता|
मास्को के वैज्ञानिकों ने अंगों की बायोप्रिंटिंग की परियोजना शुरू की है| अब तक वे तीन प्रकार की कोशिकाएं “छाप” चुके हैं| मास्को की “3D बायोप्रिंटिंग सोल्यूशंस” प्रयोगशाला के प्रधान प्रोफ़ेसर व्लादीमिर मिरोनोव ने इसके बारे में बताया|
बायोप्रिंटिंग के लिए मनुष्य की स्टेम सेलों के गोलाभ पुंज इस्तेमाल किए जाते हैं| इनसे बायोजेल पर भावी ऊतक या अंग छापे जाते हैं| रोगी की अपनी कोशिकाओं से बने ऐसे अंग जैविक दृष्टि से उसके शरीर से पूरी तरह संयोजनशील होंगे, जबकि डोनरों के अंगों को कई बार मानव शरीर अस्वीकार कर देता है| इसीलिए यह कहा जा रहा है कि भविष्य बायोप्रिंटिंग का ही है|
इसके लिए मानव शरीर में जो अंग बदलना होता है उसका कम्प्यूटर मॉडल पहले तैयार किया जाता है जिसमें उसकी शरीररचना यानी एनाटोमी और कोशिकाओं संबंधी सभी विशेषताओं को ध्यान में रखा जाता है| इसके बाद रोगी के शरीर के वसा ऊतकों से स्टेम सेल निकाले जाते हैं| इससे अगला चरण है भावी अंग की निर्माण सामग्री – कोशिकाओं के गोलाभ – पाना|
प्रो. मिरोनोव की प्रयोगशाला की नो-हाऊ है – विशेष बायोजेल| इसकी बदौलत गोलाभ समय से पहले एक दूसरे से जुड़ नहीं पाते – न तो प्रिंटर के कार्टरिज में और न ही उसके इजेक्टरों में, जिनसे ये कम्प्यूटर मॉडल के अनुसार “बायोपेपर” पर टपकते हुए भावी अंग का निर्माण करते हैं| कोशिका गोलाभों को तभी एक साथ एक संस्तर में जुड़ना चाहिए जब “बायोपेपर” की बुनियाद पर पूरा संस्तर बन गया हो| इस प्रकार एक-एक संस्तर करके त्रिआयामी अंग बनता है|
“गोलाभ किसी प्रकार की जैविक प्रक्रिया के बिना, सतही तनाव के बल की बदौलत एक दूसरे से जुडते हैं,” प्रो. मिरोनोव ने समझाया|
बायोप्रिंटर पर बनी ऊतक-संरचना को बयोरिएक्टर में रखा जाता है| यहां ऊतकों को द्रुत विकास करवाने वाले तत्व काम करते हैं|
प्रो. मिरोनोव ने यह भी बताया कि अंग की छपाई करते समय उसमें आवश्यक रक्त-वाहिकाओं का भी ध्यान रखा जाता है – उनकी भी छपाई अंग के साथ-साथ होती है| इसके लिए प्रिंटर के कार्टरिज में ऐसे गोलाभ भी भरे जाते हैं जिनसे रक्त-वाहिकाएं बनती हैं|
“3D बायोप्रिंटिंग सोल्यूशंस” प्रयोगशाला रूसी विज्ञान अकादमी के ववीलोव जेनेटिक्स इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर काम करेगी| वैज्ञानिक ऐसी रोबोटी प्रणाली बनाना चाहते हैं जिससे प्रिंटर की क्षमता दस हज़ार गोलाभ बूंदें प्रति सेकण्ड तक बढ़ाई जा सके| प्रो. मिरोनोव के शब्दों में इतनी उत्पादनशीलता होने पर ही बायोप्रिंटिंग का काम बड़े पैमाने पर किया जा सकता है
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शनिवार, 21 सितंबर 2013
कैसे चुनें मनपसंद लड़की, इन मामलों में आसाराम से भी चार कदम आगे था गद्दाफी
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सितंबर 21, 2013 in इन मामलों में आसाराम से भी चार कदम आगे था गद्दाफी, कैसे चुनें मनपसंद लड़की

नाबालिग लड़की से दुष्कर्म करने के आरोप में गिरफ्तार संत आसाराम के हर दिन नया खुलासा सामने आ रहा है। उनके निजी सचिव ने आरोप लगाया है कि आसाराम सत्संग के दौरान टॉर्च की रोशनी मारकर और या फल फेंक कर लड़कियों और महिलाओं का चुनाव करते थे। वह हमेशा 15 से 35 साल उम्र की लड़कियों और महिलाओं को शिकार बनाते थे। भारत के आसाराम की तरह ही लीबिया का तानाशाह भी लड़कियों को ऐसे ही चुनता था।
यह दावा फ्रेंच पत्रकार एनिक कोजिन ने अपनी किताब 'प्रे: इन गद्दाफीज हरम' में किया है। इस किताब में गद्दाफी की सेक्स लाइफ से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं को उजागर किया गया है। अपनी ही जनता द्वारा मारा गया लीबिया का तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी सेक्स का भूखा भेड़िया था। वह नाबालिग लड़कियों के अलावा 13 साल से कम उम्र के लड़कों को भी अपनी हवस शिकार का बनाता था।
एक लड़की के हवाले से कोजिन लिखती हैं कि कैसे 15 वर्षीय लड़की सोराया (काल्पनिक नाम) को स्कूल से उठाकर गद्दाफी के बिस्तर तक पहुंचा दिया गया। सोराया ने बताया कि साल 2004 में गद्दाफी किसी कार्यक्रम में शिरकत करने उसके स्कूल आया था।
उसके स्वागत के लिए लड़की ने फूलों का गुलदस्ता भेंट किया। उसके गुलदस्ता देने से पहले ही पूर्व तानाशाह ने उसके सिर पर हाथ रख दिया, मानो वह किसी को इशारा कर रहा हो कि 'मुझे यह लड़की चाहिए।'
लड़की ने बताया कि उसके अगले दिन यूनीफॉर्म पहने एक महिला उसकी मां के हेयर सैलून में आई और गद्दाफी के आदेश पर मुझे किसी रेगिस्तान की ओर ले गई। वहां महिला ने जांच के लिए उसके खून का नमूना और स्तन का माप लिया।इसके कुछ देर बाद लड़की नग्न अवस्था में लीबियाई तानाशाह कर्नल गद्दाफी के बेडरूम में थी। गद्दाफी ने उसका हाथ पकड़ा और उसे बगल में बैठने को कहा।
सोराया ने बताया कि उस समय मुझे उसकी ओर देखने में भी डर लग रहा था। गद्दाफी ने लड़की से कहा कि वह उससे बिल्कुल न डरे, वह उसके पापा जैसा ही है। अगर वह चाहे तो वह उसका भाई या प्रेमी भी बन सकता है, क्योंकि अब उसे जिंदगीभर यहीं रहना है।
शुरू में जब लड़की ने गद्दाफी की बातें नहीं मानी तो उसने एक महिला को उसे सुपुर्द करते हुए कहा कि पहले इसे कुछ सिखाओ, तब मेरे पास लेकर आना।
सोराया ने बताया कि वह पांच साल तक उसके यहां एक बलि के मेमने की तरह तड़पती थी। वह बार-बार उसका रेप करता,उसे मारता और कभी उस पर पेशाब तक कर देता था।
कभी दूसरी लड़कियां भी वहां आ जाती थीं और गद्दाफी के साथ ओरल सेक्स में भागीदारी निभाती थी। इस बात पर वह सोराया को दूसरी लड़कियों से ये सब बातें सीखने की हिदायत देता था। उस पर पोर्न फिल्में देखने का दबाव भी बनाया जाता था।एक फ्रेंच न्यूजपेपर को दिए इंटरव्यू में कोजिन ने कहा कि इस किताब के लिए जानकारियां एकत्रित करना उनके लिए बड़ा कष्टदायक रहा है। उन्होंने कहा कि गद्दाफी बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करता था। इससे वह महिलाओं पर आसानी से शासन कर सके और उन मर्दों पर भी, जिनके संरक्षण में महिलाएं रहती हैं।
गौरतलब है कि लीबिया का तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी 11 महीने पहले विद्रोहियों के हाथों मारा गया था।
एक तरफ जहां दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोग अपनी सुरक्षा के लिए खतरनाक सुरक्षा गार्डों को तैनात करते थे, लीबिया का तानाशाह गद्दाफी अपनी सुरक्षा के लिए महिला बॉडीगार्ड्स पर भरोसा करता था। इन्हें अमेजोनियन गर्ल्स तो कभी रिवोल्यूशनरी नन कह कर भी बुलाया जाता था। यह सभी महिला बॉडी गार्ड्स वर्जिन होती थीं। इन्हें ओहदा देने से पहले इनका कौमार्य परीक्षण किया जाता था।
महिलाओं के हाथ में अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी देना वाला गद्दाफी हमेशा कहता था कि ऐसा करके वह महिलाओं पर सशक्त बना रहा है। बकौल गद्दाफी, सभी लड़कियों को लड़ाई की ट्रेनिंग लेनी चाहिए। इससे दुश्मन उन्हें कमजोर समझने की भूल नहीं करेगा।
सभी महिला गार्ड्स को पेशेवर हत्या करने की ट्रेनिंग दी जाती थी। सभी का चुनाव तानाशाह खुद करता था। ड्यूटी के दौरान सभी को लिपस्टिक, नेल पॉलिश, ज्वैलरी और हाई हील सैंडल पहनना अनिवार्य था।
सभी लड़कियों को भगवान की कसम खिलाई जाती थी कि वे गद्दाफी के लिए जान दे देंगी। चाहे दिन हो रात, वे तानाशाह का साथ कभी नहीं छोड़ेंगी।
1998 में गद्दाफी के काफिले पर इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा घात लगाकर किए गए एक हमले में एक महिला अंगरक्षक की मौत हो गई और सात बुरी तरह घायल हो गई। कहा जाता है कि मरी हुई बॉडीगार्ड को तानाशाह सबसे ज्यादा चाहते थे, क्योंकि उसने गद्दाफी को पीछे धकेलते हुए सारी गोलियां अपने शरीर पर झेल ली थी।
42 साल के गद्दाफी के शासनकाल में न जाने कितनी बॉडीगार्ड्स आईं और गई। सभी को एक ही कसम दिलाई जाती थी कि उन्हें गद्दाफी के लिए मरना है। आप इसे महिलाओं के लिए दुनिया की सबसे खतरनाक नौकरी मान सकते हैं, जिसमें खूबसूरती के लिए बॉडीगार्ड्स का चुनाव नहीं किया जाता था।
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अमेरिका की चकाचौंध का नंगा सच, गंदे नालों में कुछ यूं बिता रहे हैं जिंदगी
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सितंबर 21, 2013 in अमेरिका की चकाचौंध का नंगा सच

लास वेगास अपनी रोशनी के लिए दुनिया में मशहूर है। मगर इस चकाचौंध के पीछे कुछ लोग अंधेरे में जीवन बिता रहे हैं। यहां की 200 मील लंबी अंडरग्राउंड फ्लड टनल्स, अब करीब एक हजार लोगों का घर बन चुकी है। इनमें रहने वाले लोग वे हैं जो अपना सब कुछ जुआं खेलते हुए गंवा चुके हैं। इनके पास न छत बची है न पैसे।
इनमें से कुछ लोग दिन के वक्त काम भी करते हैं। ये लोगों द्वारा डंप किये हुए डबल बेड और सोफा लगाकर इस अंधेरी सुरंग को रहने लायक बना चुके हैं। किसी ने कारपेट लगाया तो किसी ने दीवार पर ग्राफिटी बना ली है। यहां साधारण जिंदगी बसर कर रहे इन लोगों पर फिल्म भी बन चुकी है। इस पर ओ ब्रायन ने ‘बीनीथ द नियोन’ नामक एक किताब भी लिखी है।
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