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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

धरती बचाने के लिए ऊंट मारो प्रस्ताव

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Thema: Das Sultanat Oman setzt für die Zeit nach dem Öl auf Tourismus

BU: Tausenundein Kamel: Ob dieses Kamel schont ahnt, dass es bald Touristen wird tragen müssen?


Foto: Sven Töniges
ऑस्ट्रेलिया में प्रदूषण कम करने के लिए ऊंटों को मारने का फैसला लिया जा रहा है. ऊंटों के कारण पर्यावरण में मीथेन गैस बढ़ जाती है जो धरती के तापमान को बढाती है. ऊंटों की मौत के बदले कंपनियों को मिलेगा कार्बन क्रेडिट.
ऑस्ट्रेलिया की संसद में अगले हफ्ते एक अजीबोगरीब कानून को मंजूरी मिल सकती है. संसद में प्रस्ताव दिया जा रहा है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊंटों की हत्या करनी जरूरी है. इस प्रस्ताव के अनुसार हर ऊंट के बदले 75 डॉलर का कार्बन क्रेडिट दिया जाएगा.
कार्बन क्रेडिट उस अनुमति को कहते हैं जिस के तहत कंपनियों या देशों को कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन के लिए एक सीमा तय की जाती है और इसके लिए सर्टिफिकेट दिया जाता है. एक कार्बन क्रेडिट का मतलब है एक टन कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन की अनुमति. यानी एक ऊंट को मारने के बदले कंपनियों को एक टन अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जान करने की अनुमति मिल सकेगी
धरती का तापमान बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कार्बन डाई ऑक्साइड को ही बताया जाता है. कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) के अलावा मीथेन (CH4) भी एक ऐसी गैस है जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ता है. इसलिए इन गैसों को ग्रीन हाउस गैसों के नाम से जाना जाता है. ग्लोबल वॉर्मिंग में मीथेन का असर कार्बन डाय ऑक्साइड के मुकाबले 23 प्रतिशत अधिक होता है. जहां कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कारखानों से उठे धुंए से होता है, वहां दूसरी ओर वातारवरण में मीथेन का उत्सर्जन अधिकतर चारा खाने वाले जानवरों के कारण होता है.
ऑस्ट्रेलिया में करीब 12 लाख ऊंट हैं और हर सात साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाती है. गाय, भैंस और भेड़ बकरियों की ही तरह ऊंट भी चारा खाते हैं. इंसानों से अलग इन जानवरों का पेट कई भागों में बंटा होता है, जिस कारण वह एक ही बार में खूब सारा खाना खा सकते हैं और बाद में जुगाली कर सकते हैं. जुगाली करने के कारण ही मीथेन पैदा होती है
ARCHIV - Ein Windrad dreht sich vor den Kühltürmen des Kraftwerkes der Vattenfall-Kraftwerke Europe AG im brandenburgischen Jänschwalde (Archivfoto vom 08.12.2006). So eindringlich wie nie zuvor warnt der UN- Klimarat IPCC in seinem jüngsten Bericht vor der Erderwärmung. Die Erderwärmung ist nicht mehr aufzuhalten, selbst im günstigsten Fall steigt sie weiterhin an. Die Durchschnittstemperatur der Jahre 2090 bis 2099 wird je nach Szenario und politischer Entwicklung beim Klimaschutz um 1,1 bis 6,4 Grad Celsius höher liegen als im Durchschnitt der Jahre 1980 bis 1999. Foto: Patrick Pleul (zu dpa-Themenpaket zur UN-Klimakonferenz in Posen vom 20.11.2008) +++(c) dpa - Bildfunk+++.
जानकार मानते हैं कि 20 फीसदी मीथेन जानवरों की जुगाली के कारण बनती है और इनमें सबसे ज्यादा ऊंटों के कारण बनती है. एक ऊंट एक साल में एक कार्बन क्रेडिट के बराबर मीथेन पैदा करता है. इसीलिए ऑस्ट्रेलिया सरकार चाहती है कि ऊंटों से छुटकारा पा लिया जाए.
अजीब बात यह है सरकार ऊंटों को मार कर धरती के तापमान को कम करने के बारे में नहीं सोच रही, बल्कि इस से औद्योगिक फायदा कैसे हो सकता है इस पर चर्चा हो रही है. ऊंटों को मारने के बदले कारखानों को अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन की अनुमति मिलेगी. इन क्रेडिट्स को केवल ऑस्ट्रेलिया में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. सरकार की दलील है कि इस से संतुलन बना रहेगा. यानी जानवर कारखानों की भेंट चढ़ जाएंगे
Sounth Algeria, the  camel couple in Janet. Copyright: Marion Beckhäuser..
मरे हुए ऊंटों के मांस से कुत्तों का खाना बनाया जाएगा. मतलब यहां भी कारोबारी मुनाफा. विकसित देश ग्रीन हाउस गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने के लिए हर तरह के पैंतरे अपनाने को तैयार हैं. जाहिर है बेकसूर जानवरों की जान लेना औद्योगीकरण के कारण होने वाले प्रदूषण पर काबू पाने की तुलना में एक सरल उपाय माना जा रहा है. इस बारे में कोई चर्चा नहीं की जा रही कि ऊंटों से पैदा होने वाली मीथेन को इकट्ठा करके ऊर्जा बनाने के बारे में विचार किया जा सकता है. अर्जेंटीना में गायों की पीठ पर प्लास्टिक बांध कर मीथेन गैस इकट्ठा करने का प्रयोग हो रहा है.
sabhar : dw.de

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इंसानों से मिल जुल कर काम करेगा रोबोट

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रजनीकांत का चिटी भले ही बॉलीवुड का रोबोट हो लेकिन दुनिया में ऐसे रोबोटों की भी कल्पना की जा रही है, जो इंसानों के करीब हों. भले ही वे दिखने में इंसानों जैसे न हों लेकिन उनके काम का तरीका हमारे जैसा ही हो.
हाथी की सूंड़ की बात करते हैं. कैसा लचीला होता है. देख कर कभी कभी हंसी आ जाती है लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो यह सूंड़ कितने काम की होती है. लकड़ी के मोटे गट्ठर उठाने हों या बड़ा पूरा तरबूज. हाथी बड़े आराम से ये काम कर सकता है. सोचिए अगर हाथी की सूंड़ की तरह कोई रोबोट बन जाए तो कितना आसान होगा.
जर्मनी की मशीनरी टूल्स बनाने वाली मशहूर कंपनी फेस्टो ने हाथी को ध्यान में रख कर रोबोट तैयार किया है, जो अभी परीक्षण के स्तर पर है और कंपनी का कहना है कि इसके शानदार नतीजे आ रहे हैं. कंपनी के प्रोसेस ऑटोमेशन मैनेजमेंट प्रमुख डॉक्टर एकहार्ड रूस का कहना है, "हमारा लक्ष्य ऐसे उपकरण तैयार करना है, जो किसी भी जगह पर इंसानों के साथ मिल कर काम कर सकें. आम तौर पर रोबोट बेहद भारी भरकम और खतरनाक सा दिखने वाला होता है. लेकिन हम इस अवधारणा को बदलना चाहते हैं." कंपनी बायोनिक्स को आधार बना कर काम करने में विश्वास करती है.
बायोलॉजी और तकनीक के मेल को बायोनिक्स कहते हैं. 1950 के दशक में यह शब्द गढ़ा गया. नए उपकरणों को डिजाइन करते वक्त बायोलॉजिकल तरीकों को ध्यान में रखा जाता है और उनके तंत्र को कुछ इस तरह सेट किया जाता है कि वे प्रकृति पर थोपी हुई मशीन न होकर उनका हिस्सा बनने की कोशिश करें. हाथी की सूंड़ भी बायोनिक्स की ही बायोलॉजी और तकनीक के मेल को बायोनिक्स कहते हैं. 1950 के दशक में यह शब्द गढ़ा गया. नए उपकरणों को डिजाइन करते वक्त बायोलॉजिकल तरीकों को ध्यान में रखा जाता है और उनके तंत्र को कुछ इस तरह सेट किया जाता है कि वे प्रकृति पर थोपी हुई मशीन न होकर उनका हिस्सा बनने की कोशिश करें. हाथी की सूंड़ भी बायोनिक्स की ही सोच है
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लेकिन ऐसे प्रोडक्ट तैयार करना मामूली बात नहीं होती. भारी रिसर्च और इंजीनियरिंग की जरूरत होती है और ऐसे किसी प्रोडक्ट को तैयार करने में कई बार तीन साल तक लग जाते हैं. ऐसे में मुनाफा कैसे आएगा. रूस बताते हैं कि ग्राहकों के साथ लगातार रिश्ते बेहतर बनाने की जरूरत होती है. कई बार तो उनकी ग्राहक कंपनियां ही उन्हें नए प्रोडक्ट के बारे में कहती हैं, "एक तरफ आपको ध्यान रखना होता है कि बाजार की क्या जरूरत है और दूसरी तरफ आपको लीक से हट के सोचने की जरूरत होती है. दोनों का सही मिश्रण होना चाहिए. समस्या यह है कि मिश्रण कैसा हो 90:10 या 10:90."
मेडिकल साइंस में हाल के दिनों में बायोनिक्स उत्पादों का चलन तेजी से बढ़ा है. किसी जमाने में लकड़ी की नकली टांग लग जाना ही बड़ी बात मानी जाती थी लेकिन हाल के दिनों में ऐसी कृत्रिम टांगों का भी विकास होने लगा है, जिन्हें प्राकृतिक टांगों की तरह ही डिजाइन किया गया है. यूरोप में हाल ही में ऐसा ऑपरेशन हुआ है, जिसमें दुर्घटना में हाथ गंवा चुके एक शख्स के शरीर में तमाम धमनी तंत्रिकाओं के साथ कृत्रिम हाथ लगाए गए हैं. वह इस हाथ का इस्तेमाल आम लोगों की तरह कर पा रहा है
भारत में भी बायोनिक्स उपकरणों की मांग तेजी से बढ़ी है. फेस्टो का खुद भी भारत में बड़ा कारोबार है. वहां कई यूनिवर्सिटियों में बायोनिक्स की पढ़ाई हो रही है. फेस्टो का कहना है कि उनके प्रोडक्ट में इस बात का ध्यान रखा जा रहा है कि ग्रीन तकनीक का इस्तेमाल हो. कंपनी के इन्नोवेशन मैनेजर नीको पात्सेव्स्की का कहना है, "शुरू में हो सकता है कि काफी पैसे लगें लेकिन आखिर में बचत ही होती है. और चूंकि ग्रीन तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है, इस वजह से आपकी छवि भी बेहतर बनती है
यह भी रोबोट है.


"
कंपनी को इस बात की खुशी है कि उसे भविष्य की तकनीक का महत्वपूर्ण जर्मन पुरस्कार मिल चुका है. अब उसका सारा ध्यान एक स्मार्टबर्ड की तैयारी में है. बिलकुल असली पंछी की तरह दिखने वाला यह उपकरण परिंदे की तरह पंख भी फड़फड़ा सकता है. शुरुआती मॉडल बन कर तैयार है और अब इसे बेहतर करने की तैयारी चल रही है.
sabhar : dw.de


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जीपीएस तकनीक से इंसान का ऑपरेशन

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बहुत जल्द सर्जन भी रास्ता बताने वाली तकनीक का ऑपरेशन में उपयोग करेंगे. थ्री डी तस्वीरों का इस्तेमाल कर ऑपरेशन सटीक और सुरक्षित बन पाएंगे. इंफ्रारेड कैमरों ने डॉक्टरों को रास्ता दिखा दिया है.
एक मिनट के लिए सोच कर देखिए आप ऑपरेशन थिएटर में हैं और सर्जन, प्रोफेसर गेरे स्ट्राउस साइनस का ऑपरेशन करने वाले हैं. पांच मॉनिटर अर्धगोलाकार स्थिति में ऑपरेशन टेबल पर रखे हुए हैं. ऊपर एक बड़ा मॉनिटर टंगा हुआ है और बीच में दो इन्फ्रारेड कैमरे लगे हैं. गेरो स्ट्राउस कहते है जिस तरह से ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम जीपीएस कारों में इस्तेमाल किए जाते हैं ठीक उसी तरह यहां भी होगा. स्ट्राउस के मुताबिक, "कार में आपके पास सेटेलाइट होता है और यह सेटेलाइट मैप के हिसाब से कार की स्थिति बताता है."
ऑपरेशन में इंफ्रारेड कैमरे यही काम करते हैं, वो लगातार ऑपरेशन की तस्वीरें भेजते रहते हैं. एक छोटा रिसीवर उस मरीज से जुड़ा होता है जिसकी तस्वीर कैमरे से उतारी जाती है. जीपीएस सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले मैप की जगह डॉक्टरों के पास सीटी स्कैन या फिर एमआरई की तस्वीर होती है जो उन्हें बताती है कि वो ठीक जा रहे हैं
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हाई रिजोल्यूशन वाले सिटी स्कैन और एमआरआई की तस्वीरें सर्जनों को हड्डियों, नाड़ियों और तंत्रिकाओं की अलग अलग और सूक्ष्म तस्वीरें दिखा सकती हैं. मरीज की ऑपरेशन से पहले जांच के दौरान ली गई तस्वीरों को ऑपरेशन के दौरान ही ली गई तस्वीरों से उसी वक्त तुलना की जा सकती है. इसका मतलब यह है कि सर्जन मरीज का ऑपरेशन करते वक्त ही देख समझ कर यह जान सकते हैं कि कहां क्या है और किससे बचना है. इसका असर यह होगा कि सर्जन उस हिस्से को ज्यादा बेहतर तरीके से पहचान कर निशान लगा सकेंगे. साइनस के ऑपरेशन में ऑपरेशन वाला हिस्सा चेहरे की तंत्रिकाओं के आस पास होगा. इस हिस्से पर निशान लगाने के लिए प्रोफेसर स्ट्राउस कंप्यूटर माउस का इस्तेमाल कर तस्वीर पर छोटे छोटे बिंदु से निशान लगा देते हैं और फिर सारे आंकड़े सॉफ्टवेयर की मदद से जुटा लिए जाते हैं.
स्ट्राउस बताते हैं, "कैमरा मरीज और उपरकण की स्थिति पहचान लेता है और एक दूसरे के अनुसार उनकी जानकारी दे देता है." दूरी नियंत्रक बहुत कुछ कार में लगे पार्किंग सेंसर की तरह काम करता है, लेकिन यह उसकी तुलना में बहुत ज्यादा सटीक और बारीक है. इंफ्रारेड कैमरे मरीज की स्थिति चौथाई मिलीमीटर तक बता देते हैं. यह करीब दो तीन बालों की मोटाई के बराबर होती है. अगर सर्जन किसी बेहद संवेदनशील हिस्से के जरूरत से ज्यादा करीब पहुंच जाता है तो फिर अलार्म बज जाता है और उपकरण
अपने आप ही बंद हो जाता है. रास्ता बताने वाली सारी जानकारियां एक मॉनीटर में होती हैं जबकि दूसरा मॉनीटर मरीज के शरीर के भीतरी अंगों की तस्वीर दिखाता रहता है जो इंडोस्कोप की मदद से ली जाती हैं
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ऐसी उम्मीद की जा रही है कि रास्ता बताने वाली तकनीक ऑपरेशन को सुरक्षित बना देगी. जर्मन शहर लाइपजिग के इंटरनेशनल रेफरेंस एंड डेवलपमेंट सेंटर फॉर सर्जिकल टेक्नोलॉजी(आईआरडीसी) में भविष्य के ऑपरेशन थिएटर बन रहे हैं. यहां तक कि थ्रीडी तस्वीरों के साथ काम करना भी बहुत जल्द ही मुमकिन हो जाएगा.
sabhar : dw.de

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रविवार, 15 अप्रैल 2012

क्लासरूम में दिखा रहा था छात्रा को पोर्न फिल्म और...

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कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से जुड़े हुए फ्रैंस्को कॉलेज के पब्लिक हेल्थ प्रोफेसर पैगी गिश पर एक छात्रा ने क्लासरूम में पोर्न फिल्म दिखाने का आरोप लगाया है। बकौल कैंपसरीफोर्म.ओआरजी साइट छात्रा ने आरोप लगाया है कि पैगी ने उसे 20 मिनट की पोर्न फिल्म क्लासरूम में दिखाई।

'एडवांस्ड सेक्सुअल टेक्नीक्स, वाल्यूम वन' नामक इस वीडियो में सेक्सुअल एक्सप्लिक्ट ऑडियो और ग्राफिक्स कंटेट था। छात्रा की शिकायत के बाद प्रशासन का ध्यान इस ओर गया। ह्यूमेन सेक्सुअलटी कोर्स के नाम पर इस वीडियो को दिखाया गया था।

पैगी का बचाव करते हुए फ्रैंस्को स्टेट कॉलेज के डीन एंड्र्यू हॉफ ने बताया कि 20 मिनट का यह वीडियो ह्यूमैन सेक्सुअलटी जनरल एजुकेशन कोर्स के तहत दिखाया गया था और इसका पोर्न फिल्म से कोई संबंध नहीं था।

स्कूल प्रशासन द्वारा शिक्षा कार्यक्रम के तहत दिखाई गई इस वीडियो के कारण प्रोफेसर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है और मामले को दबा दिया गया है। SABHAR : BHASKAR.COM

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ये है 'बाबाओं' के रहस्यमयी शक्तियों और चमत्कारों का राज!

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नई दिल्ली. अपनी रहस्यमयी शक्तियों के जरिए लोगों के कल्याण का दावा करने वाला बाबाओं का 'सच' धीरे-धीरे सामने आ रहा है। उनके चमत्कार के कायल लोगों के आंखों पर से अंधविश्वास की पट्टी धीरे-धीरे हट रही है। कहीं बिना गए वहां के बारे में बता देना। किसी से बिना मिले उस तक अपनी बात पहुंचा देना। यह जादू या चमत्कार नहीं बल्कि टेलीपैथी है।

टेलीपैथी परामनोविज्ञान की एक शाखा है। इसका मतलब है दूर रहकर आपसी सूचनाओं का बगैर किसी भौतिक साधनों के आदान-प्रदान करना। यह एक ऐसी मानसिक तकनीक है जो दूरियों के बावजूद हमारी बातों को इच्छित लक्ष्य तक पहुंचा देती है। हालांकि इसे अभी विज्ञान की कसौटी पर कसा जा रहा है। इस पर शोध हो रहे हैं। अब तक हुए शोधों में शोधकर्ताओं को सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता। यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं होता है।

टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्तिमें यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। इंसानों को तो इस विद्या को सीखना पड़ता है किन्तु जीव-जन्तुओं में टेलीपैथी की विद्या जन्मजात पाई जाती है। ऐसा ही एक प्राणी है कछुआ जिसे इस विद्या में महारत हासिल है।

टेलीपैथी के उदाहरण हमें अत्यंत प्राचीन काल से ही देखने को मिलते हैं। वैदिक काल के ऋषि-मुनियों में इस विद्या का प्रयोग होना एक सामान्य बात थी। ऐसा ही उदाहरण रामायण में भी देखने को मिलता है। सीता की खोज करने का वचन देकर जब सुग्रीव नहीं निभाता है तो यह विचार राम के मन में खेद उत्पन्न करता है। ठीक उसी समय हनुमान के मन भी संप्रेषित हो जाता है। हनुमान तत्काल राम का विचार सुग्रीव तक पहुंचा देते हैं।

इंग्लैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मानव के स्त्रायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े। उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा। sabhar : bhaskar.com

 
 

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रात के अंधेरे में भी दिखता है इस अद्भुत बच्चे को

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उसकी आंखें जन्म के समय आम इंसान की तरह काली या भूरे रंग की नहीं थीं। उसकी आंखें नीले रंग की थीं। विलक्षण आंखों वाला ये बच्चा अपने माता-पिता के साथ चीन के एक सुदूर गांव ग्वांज़ी में रहता है। उसका नाम नॉग यूहुई (nong youhui) है।



उसकी आंखों की एक और विशेषता ये है कि आंखों पर जब रोशनी पड़ती है, तो वो हल्की नीली होकर और भी चमकने लगती हैं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी जानवर या बिल्ली की आंखों पर रोशनी पड़ते ही वो चमकने लगती हैं। जब पहली बार उसके माता-पिता को इस बारे में पता चला तो वे चिंतिंत हो गए।



ऐसा होना लाजिमी था। इसलिए उन्होंने नॉग यूहुई को स्थानीय डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कहा कि बढ़ती उम्र के साथ ही इसकी आंखों का रंग भी अपने-आप ठीक हो जाएगा। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। ऐसे ही दिन बीतने लगे।



यह घटना 2009 की है। एक दिन उसे स्कूल में दिन के वक्त ही सूरज के उजाले में देखने पर परेशानी हुई तो उसके एक सहपाठी ने मज़ाक में कहा कि उसकी आंखें बिल्ली की आंखों की तरह दिख रही हैं। नॉग यूहुई के शिक्षक को जब इस बारे में पता चला, तो उन्होंने कंफर्म करने के लिए उसकी आंखों को टॉर्च की रोशनी में देखा। वह चौंक गईं। रोशनी पड़ते ही यूहुई की आंखें सचमुच चमक उठीं।



इसके बाद शिक्षक ने रात के अंधेरे में भी उसकी आंखें चैक की तो वह हैरान रह गए। रात के अंधेरे में उसे सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था। नॉग यूहुई ने बताया कि वह अंधेरे में दिन की अपेक्षा ज्य़ादा स्पष्ट देख सकता है। वह अंधेरे में झींगुर को भी आसानी से पकड़ लेता है। इस घटना के बाद से ही इस अनोखी आंखों वाले लड़के की जैसे जिंदगी ही बदल गई हो।



इस बात की भनक जब कुछ देशों के डॉक्टर और वैज्ञानिकों को लगी, तो वे इसकी आंखें टैस्ट करने के लिए इसके पास आने लगे। देखते ही देखते वह पूरी दुनिया में मशहूर हो गया। उसे लोग बिल्ली जैसी आंखों वाला कहकर पुकारने लगे।



हो सकता है बहुत ही जल्द उसका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में एक ऐसे लड़के के रूप में दर्ज़ हो जाए, जो आसानी से रात के अंधेरे में देख सकता है। कई दफा वह बार-बार के टैस्ट को लेकर और मिलने वालों से परेशान भी हो जाता है sabhar : bhaskar.com

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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

मैं निर्मल बाबा के साथ हूं

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मैं निर्मल बाबा के साथ हूं. कम से कम अब तो साथ हूं. दिल खोल के साथ हु निर्मल बाबा अकेले नहीं है संसार में अनेको ढोगी बाबा है जो ढोग का लिवास पहन कर लोगो को मुर्ख बना रहे है  । आखिर निर्मल बाबा का क्यों विरोध हो रहा है , अगर ढंग से बाबाओ की छवि सामने आये तो बड़े बड़े मठाधीश नंगे हो जायेगे ।  ये बाबा लोग  टीवी चेंनेल पर प्रवचन देते सुबह शाम देखे जाते है और बाबाओ के पैसे  से ही टीवी चेंनेल चल रहे है ।

फिर निर्मल बाबा के खिलाफ क्यों अभियान छेड़ा जा रहा है । अगर ढंग से बाबाओ  की कुंडली खंगाली जाये तो उनके  अतीत का काल सच बहुत खतरनाक होगा । आज निर्मल बाबा के विज्ञापन ३५ चेनल पर नजर आते है । हर तरफ निर्मल कृपा बरस रही है । लोग जमकर निर्मल बाबा की विरोध में लिख  रहे है मै पूछता हु  आखिर क्यों ?क्या आप  लोगो में हिम्मत  है जो  अन्य  बाबा   टीवी चेनल पर आते है और  जो बाबा टीवी चेनल  पर  नहीं दिखाई   देते है  कल तक साइकिल से रपटने वाले बाबा रामदेव जी के  पास  अपार धन कहा से आ गया ।  क्या वह पैसा नहीं लेते है । सच यह है १०० में १ बाबा पाक साफ़ है ।बाकि सब ढोगी है ।  मै सब ढोगी पाखंडी बाबाओ के खिलाफ हु जो धर्म के नाम पर झूट बेच कर अपनी तिजोरी भर रहे  है । ,

एडिटर
सुशील गंगवार 
साक्षात्कार डाट .कॉम 
मीडिया दलाल डाट .कॉम 

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दवा पहुंचेगी अब माइक्रोचिप से

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कुछ समय पहले वैज्ञानिक कह रहे थे कि वे एक ऎसे माइक्रोचिप बनाना चाहते हैं जिसे मरीजों की त्वचा के नीचे लगा दिया जाए और वह समय-समय पर दवा की संतुलित मात्रा मरीज को देता रहे। तब लगता था कि वे कोई खयाली पुलाव पका रहे हैं, लेकिन अब यह परिकल्पना सच के एक कदम और करीब पहुंच गई है। 

अमरीका में वैज्ञानिक ऎसे एक माइRोचिप का एक महिला पर परीक्षण कर रहे हैं जिसे ऑस्टियोपोरोसिस है, ये एक ऎसा रोग है जिसमें हçaयां कैल्शियम की कमी से कमजोर हो जाती हैं। एक माईक्रोचिप  को उनकी कमर में लगाया गया है और उसे रिमोट कंट्रोल के जरिए शुरू कर दिया गया है। साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित विवरण के अनुसार इस माइक्रोचिप के क्लिनिकल ट्रायल से पता चला है कि चिप सही मात्रा में शरीर को दवा दे रहा है और उसके कोई साइड इफेक्ट भी नहीं हैं। इस प्रयोग के बारे में अमरीकन एसोसिएशन ऑफ एडवांसमेंट ऑफ साइंस में भी चर्चा की गई है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माईक्रोचिप   है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।    मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माइRोचिप है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माइRोचिप है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।  वे बताते हैं कि इस उपकरण में ऎसी सामग्री का प्रयोग किया गया है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते और इस उपकरण के भीतर इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हुए है। जिसमें दवा और दवा के पैकेट दोनों होते हैं। इसके काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि हर दवा के छोटे पैकेट को प्लेटिनम और टिटेनियम की पतली झिçल्लयों से ढक कर रखा गया है। 
वे बताते हैं कि इस उपकरण में ऎसी सामग्री का प्रयोग किया गया है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते और इस उपकरण के भीतर इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हुए है। जिसमें दवा और दवा के पैकेट दोनों होते हैं। इसके काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि हर दवा के छोटे पैकेट को प्लेटिनम और टिटेनियम की पतली झिçल्लयों से ढक कर रखा गया है। इस माइRोचिप को विकसित करने का काम भी साथ में चल रहा है। इस उपकरण का प्रयोग डेनमार्क में सात महिलाओं पर किया जा रहा है, जिनकी उम्र 65 से 70 वर्ष के बीच है। वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र में बताया है कि इस उपकरण के जरिए दवा दिया जाना ठीक उसी तरह से प्रभावशाली साबित हो रहा है जैसा पेन-इंजेक्शन के जरिए दवा देने पर होता है और इससे हçaयों में सुधार हो रहा है। उनका कहना है कि अब तक कोई साइड इफैक्ट देखने में नहीं आया है। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया है कि किसी दवा का प्रभावशाली होना न होना इस प्रयोग का हिस्सा नहीं है और ये प्रयोग सिर्फ इस उपकरण के लिए किया जा रहा है। हालांकि इस प्रयोग की शुरूआत मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हुई थी लेकिन अब इसका विकास माइRोचिप इंक नाम की एक कंपनी कर रही है।  अब ये कंपनी इस उपकरण को और विकसित करने की कोशिश कर रही है जिससे कि इसमें दवा की और खुराकें डाली जा सकें। अभी जो प्रयोग किया जा रहा है उसमें उपकरण में दवा की सिर्फ 20 खुराकें ही हैं लेकिन कंपनी मानती है कि इस उपकरण में सैंकड़ों खुराक डालना संभव है। हालांकि इस उपररण को बाजार में आने में अभी भी पाँच साल का समय लगेगा।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डियागो में बायोइंजीनियरिंग के प्रोफेसर जॉन वाटसन ने इस शोध पर टिप्पणी करते इस उपकरण में सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा, "शोध के दौरान एक मरीज पर ये उपकरण कारगर नहीं रहा। वह आठवीं महिला थी जिसका जिक्र शोध पत्र में नहीं किया गया है।यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डियागो में बायोइंजीनियरिंग के प्रोफेसर जॉन वाटसन ने इस शोध पर टिप्पणी करते इस उपकरण में सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा, "शोध के दौरान एक मरीज पर ये उपकरण कारगर नहीं रहा। वह आठवीं महिला थी जिसका जिक्र शोध पत्र में नहीं किया गया है।
उनका कहना है कि इंजेक्शन लगाने के इंझट से मुक्त होने के लिए लोग इसे अपना लेंगे, खासकर ऑस्टियोपोरोसिस के मामले में जिसमें महिलाओं को पैराथॉयराइड का इंजेक्शन खुद लेना होता है। वे कहती हैं, "हालांकि ये प्रयोग अभी बहुत छोटा है लेकिन इसके नतीजे उत्साहित करने वाले हैं।" मैसाच्युसेट्स के शोधकर्ता कहते हैं कि अब इस पर विचार किया जा सकता है कि चिप्स अलग-अलग तरह की दवाओं पर नियंत्रण करे और मरीज के शरीर की स्थिति के अनरूप दवा की मात्रा तय कर सके।



    

sabhar : patrika.com

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दूध के दांत बचा सकते हैं जिंदगी

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कहा जाता है कि सभी बीमारियों में रक्त सम्बंधी बीमारियां केवल चार प्रतिशत ही होती हैं।"
स्टेम सेल थेरेपी में मरीज के शरीर के क्षतिग्रस्त ऊतकों में या घाव में स्वस्थ व नई कोशिकाएं स्थापित की जाती हैं। स्टेमेड बायोटेक के संस्थापक व प्रबंध निदेशक शैलेष गडरे ने आईएएनएनई दिल्ली। क्या आपके बच्चे के दूध के दांत टूटने वाले हैं... तो उन्हें फेंकने की बजाए आप उन्हें डेंटल स्टेम सेल बैंक में भविष्य में इस्तेमाल के लिए सहेज कर रख सकते हैं। बच्चे के आगे के जीवन में गम्भीर बीमारियों की दशा में ये दांत स्टेम कोशिकाओं के निर्माण में प्रयुक्त हो सकते हैं। भारत में डेंटल स्टेम सेल बैंकिंग नई है लेकिन फिर भी इसे अम्बलीकल कॉर्ड ब्लड बैंकिंग की अपेक्षा अधिक कारगर विकल्प माना जा रहा है। स्टेम सेल थेरेपी में मरीज के शरीर के क्षतिग्रस्त ऊतकों में या घाव में स्वस्थ व नई कोशिकाएं स्थापित की जाती हैं। स्टेमेड बायोटेक के संस्थापक व प्रबंध निदेशक शैलेष गडरे ने आईएएनएस से कहा, "अम्बलीकल कॉर्ड रक्त सम्बंधी कोशिकाओं की अच्छी स्त्रोत है। खून सम्बंधी बीमारियों जैसे रक्त कैंसर में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। वैसे 
स से कहा, "अम्बलीकल कॉर्ड रक्त सम्बंधी कोशिकाओं की अच्छी स्त्रोत है। खून सम्बंधी बीमारियों जैसे रक्त कैंसर में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। वैसे कहा जाता है कि सभी बीमारियों में रक्त सम्बंधी बीमारियां केवल चार प्रतिशत ही होती हैं।"बच्चों के दांत सम्बंधी रोगों की विशेषज्ञ सविता मेनन कहती हैं कि पांच से 12 साल उम्र के बच्चों के दूध के दांतों से स्टेम कोशिकाएं आसानी से निकाली जा सकती हैं। इसके लिए जब बच्चे का कोई दांत हिलने लगे तब उसे निकालकर उससे बिना किसी शल्यक्रिया के स्टेम कोशिकाएं इकट्ठी की जा सकती हैं।भारत में डेंटल स्टेम सेल बैंकिंग की सुविधा देने वाली कम्पनियों की संख्या अभी बहुत कम हैं। इनमें स्टेमेड व स्टोर योर सेल्स जैसी कम्पनियां शामिल हैं। स्टेम कोशिकाओं को 21 साल की अवधि तक रखने पर १००००० का खर्च आता है ।
साभार : पत्रिका.कॉम  

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समुद्र के अंदर का वर्चुअली आनंद "अंडरवाटर अर्थ" से

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मेलबर्न। अब तक गूगल अर्थ से पृथ्वी का स्थल भाग ही नजर आता था, पर जल्द ही इस सेवा का विस्तारित रूप देखने को मिलेगा और पृथ्वी के समुद्र के अंदर की हलचल को यूजर्स देख सकेंगे। इतना ही नहीं, वे ग्रेट बैरियर रीफ के आस-पास तैरने का वर्चुअल आनंद भी ले सकेंगे।
प्रोजेक्ट में 50 हजार से अधिक फोटोग्राफ इस प्रोजेक्ट को प्रवाल शैलमाला के स्वास्थ्य और उनकी संरचना पर पहले व्यापक अध्ययन के अंश के रूप में जाना जा रहा है। 
गूगल ने इस प्रोजेक्ट को अंजाम देने के लिए ग्लोब के चारों कोनों पर कैमरे लगाए हैं और इनसे पूरी बारीकी के साथ स्ट्रीट स्तर की फोटोग्राफी जैसा ऑनलाइन संग्रह (आर्काइव) तैयार हो रहा है।इसके लिए विशेषज्ञ गोताखोरों ने कई-कई महीने पानी के अंदर के 360 डिग्री के सुंदर स्थलों की चित्रमाला कैमरे में खींची है। इन्हीं में से 50,000 से अधिक फोटोज को जोड़कर केटलिन सीव्यू सर्वे तैयार किया है। केटलिन सीव्यू, गूगल के स्ट्रीट व्यू का ही उप-जलीय संस्करण है। इन 50,000 से अधिक फोटोज से समुद्र की सतह से 100 मीटर नीचे एक वर्चुअल डाइव (गोताखोरी) के लिए दृश्य/असर निर्माण हो सका है।
 इसके लिए यूजर्स को कहीं और जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वो अपने कंप्यूटर पर ऑनलाइन होते ही 
प्रवाल शैलमाला के विस्तृत इलाकों में भ्रमण कर सकेंगे और समुद्र की खूबसूरत दुनिया से परिचित हो सकेंगे। फिलहाल यूजर्स केवल केटलिन सीव्यू सर्वे के नक्शे को देख सकते हैं। इस प्रोजेक्ट से वैज्ञानिक भी आशान्वित है। वे मानते हैं कि प्रोजेक्ट में मिलने वाले आंकड़े मौसम और ग्रेट बैरियर रीफ जैसे समुद्री इलाकों पर अन्य पर्यावरण अवस्था से प्रभावित पारस्थितितंत्र को अधिक बेहतरी समझ सकेंगे। क्वींसलैंड क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के ग्लोबल चेंज इंस्टीट्यूट के प्रो. ओवे होइग-गुल्डबर्ग का मानना है कि इस प्रोजेक्ट का विजुअल नेचर, वैज्ञानिक जानकारियों और जनता की जागरूकता के  बीच पुल का काम करेगा। sabhar : patrika.com 


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सेक्स करने पर पड़ गए लेने के देने!

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म्यूनिख। जर्मनी के म्यूनिख शहर में एक शख्स को महिला से सेक्स करना भारी पड़ गया। महिला की सेक्स की भूख शांत नहीं होने पर इस व्यक्ति को अपनी जान बचाने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। पुलिस महिला के खिलाफ यौन दुर्व्यवहार का केस दर्ज कर सकती है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस व्यक्ति की म्यूनिख के एक बार में एक महिला से मुलाकात हुई। 
दोनों ने रात साथ गुजारने का फैसला किया। उम्र में चार साल बड़ी महिला उसे अपने फ्लैट पर ले गई। कई बार सेक्स के बाद भी महिला और सेक्स की मांग करने लगी। एक समय ऎसा आया कि 43 वर्ष का वो आदमी बदहवासी में भागकर महिला के फ्लैट की बॉलकनी तक पहुंचा और वहीं से चिल्ला कर पुलिस को बुलाने लगा। कहानी में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब उस व्यक्ति को बचाने के लिए मौके पर पहुंचे पुलिस वालों को भी महिला ने यौन आमंत्रण दे डाला। 
sabhar : patrika.com 

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