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शनिवार, 15 जुलाई 2023

निवेश के लिए दुनिया की पहली पसंद भारतः रिपोर्ट

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 निवेश करने के लिए लगातार दूसरे साल भारत दुनिया की सबसे पहली पसंद के रूप में कायम है. अब सरकारें प्रतिबंधों के डर से अपना सोना विदेशों से वापस ला रही हैं.

दुनिया में ऐसे देशों की संख्या बढ़ रही है जो अपने यहां सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं क्योंकि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाये गये प्रतिबंधों के बाद वे खुद को सुरक्षित करना चाहते हैं. सोमवार को प्रकाशित एक सर्वेक्षण में यह बात कही गयी है. इन्वेस्को नामक संस्था ने केंद्रीय बैंकों और वेल्थ फंड्स के सर्वे के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है.


पिछले साल वित्तीय बाजार में मची उथल-पुथल से सरकारी फंड्स को खासा नुकसान उठाना पड़ा था. लिहाजा अब वे अपनी रणनीतियों में आमूल-चूल बदलाव करने पर विचार कर रहे हैं. ये बदलाव इस बात पर आधारित हैं कि उच्च मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बना रहेगा.



निवेश के लिए दुनिया की पहली पसंद भारतः रिपोर्ट

निवेश करने के लिए लगातार दूसरे साल भारत दुनिया की सबसे पहली पसंद के रूप में कायम है. अब सरकारें प्रतिबंधों के डर से अपना सोना विदेशों से वापस ला रही 



दुनिया में ऐसे देशों की संख्या बढ़ रही है जो अपने यहां सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं क्योंकि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाये गये प्रतिबंधों के बाद वे खुद को सुरक्षित करना चाहते हैं. सोमवार को प्रकाशित एक सर्वेक्षण में यह बात कही गयी है. इन्वेस्को नामक संस्था ने केंद्रीय बैंकों और वेल्थ फंड्स के सर्वे के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है.


पिछले साल वित्तीय बाजार में मची उथल-पुथल से सरकारी फंड्स को खासा नुकसान उठाना पड़ा था. लिहाजा अब वे अपनी रणनीतियों में आमूल-चूल बदलाव करने पर विचार कर रहे हैं. ये बदलाव इस बात पर आधारित हैं कि उच्च मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बना रहेगा.

इन्वेस्को ग्लोबल सॉवरिन एसेट मैनेजमेंट स्टडी नाम से हुए इस सर्वेक्षण में 57 केंद्रीय बैंकों और 85 सरकारी निवेश फंड शामिल हुए थे. इनमें से 85 फीसदी ने कहा कि उन्हें लगता है कि मुद्रास्फीति इस दशक में तो उच्च स्तर पर बनी रहेगी.


सोना सबसे अच्छा विकल्प

ऐसे माहौल में सोना और उभरते बाजारों के बॉन्ड अच्छा निवेश विकल्प माने जा रहे हैं. लेकिन पिछले साल जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो पश्चिमी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाते हुए उसके 640 अरब डॉलर का सोना और विदेशी मुद्रा भंडार फ्रीज कर दिया. इस बात ने भी निवेशकों की रणनीति को प्रभावित किया है.


भारत: विमानन क्षेत्र में एक कंपनी के एकाधिकार का खतरा


सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि रूस के मामले में कायम की गई मिसाल से बड़ी संख्या में केंद्रीय बैंक चिंतित हैं. लगभग 60 फीसदी बैंकों ने कहा कि इससे सोने का आकर्षण बढ़ा है जबकि 68 फीसदी ने कहा कि अपने विदेशी मुद्रा भंडार को विदेश में निवेश करने के बजाय घर पर रखना ज्यादा सुरक्षित है. 2020 में ऐसा मानने वालों की संख्या 50 फीसदी थी.


एक केंद्रीय बैंक ने कहा, "हमारा सोना पहले लंदन में था लेकिन हमने उसे वापस स्वदेश भेज दिया है ताकि उसे सुरक्षित रखा जा सके.”


इन्वेस्को में आधिकारिक संस्थानों के प्रमुख रोड रिंगरो कहते हैं कि अब आमतौर पर सरकारें इसी तरह सोच रही हैं. उन्होंने कहा, ”पिछले एक साल का मंत्र यही रहा है कि अगर मेरे पास सोना है तो वो मेरे घर में होना चाहिए.”


डॉलर का आकर्षण घटा

भू-राजनीतिक चिंताएं और उभरते बाजारों में बढ़ते मौके मिलकर केंद्रीय बैंकों को डॉलर से विमुख होकर अन्य निवेश विकल्पों पर विचार के लिए उकसा रहे हैं. इसमें अमेरिका का 7 प्रतिशत की दर से बढ़ता कर्ज और ज्यादा योगदान दे रहा है. हालांकि ज्यादातर मानते हैं कि फिलहाल वैश्विक मुद्रा के तौर पर डॉलर का कोई विकल्प नहीं है. बल्कि युआन को डॉलर के विकल्प के तौर पर देखने वालों की संख्या पिछले साल के 29 फीसदी से घटकर 18 फीसदी रह गयी है.


निवेश करने के लिए लगातार दूसरे साल भारत दुनिया की सबसे पहली पसंद के रूप में कायम है. अब सरकारें प्रतिबंधों के डर से अपना सोना विदेशों से वापस ला रही हैं.




दुनिया में ऐसे देशों की संख्या बढ़ रही है जो अपने यहां सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं क्योंकि पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाये गये प्रतिबंधों के बाद वे खुद को सुरक्षित करना चाहते हैं. सोमवार को प्रकाशित एक सर्वेक्षण में यह बात कही गयी है. इन्वेस्को नामक संस्था ने केंद्रीय बैंकों और वेल्थ फंड्स के सर्वे के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है.


पिछले साल वित्तीय बाजार में मची उथल-पुथल से सरकारी फंड्स को खासा नुकसान उठाना पड़ा था. लिहाजा अब वे अपनी रणनीतियों में आमूल-चूल बदलाव करने पर विचार कर रहे हैं. ये बदलाव इस बात पर आधारित हैं कि उच्च मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक तनाव लंबे समय तक बना रहेगा. sabhar Dw.de https://www.dw.com










इन्वेस्को ग्लोबल सॉवरिन एसेट मैनेजमेंट स्टडी नाम से हुए इस सर्वेक्षण में 57 केंद्रीय बैंकों और 85 सरकारी निवेश फंड शामिल हुए थे. इनमें से 85 फीसदी ने कहा कि उन्हें लगता है कि मुद्रास्फीति इस दशक में तो उच्च स्तर पर बनी रहेगी.


सोना सबसे अच्छा विकल्प

ऐसे माहौल में सोना और उभरते बाजारों के बॉन्ड अच्छा निवेश विकल्प माने जा रहे हैं. लेकिन पिछले साल जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो पश्चिमी देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाते हुए उसके 640 अरब डॉलर का सोना और विदेशी मुद्रा भंडार फ्रीज कर दिया. इस बात ने भी निवेशकों की रणनीति को प्रभावित किया है.


भारत: विमानन क्षेत्र में एक कंपनी के एकाधिकार का खतरा


सर्वे की रिपोर्ट कहती है कि रूस के मामले में कायम की गई मिसाल से बड़ी संख्या में केंद्रीय बैंक चिंतित हैं. लगभग 60 फीसदी बैंकों ने कहा कि इससे सोने का आकर्षण बढ़ा है जबकि 68 फीसदी ने कहा कि अपने विदेशी मुद्रा भंडार को विदेश में निवेश करने के बजाय घर पर रखना ज्यादा सुरक्षित है. 2020 में ऐसा मानने वालों की संख्या 50 फीसदी थी.


एक केंद्रीय बैंक ने कहा, "हमारा सोना पहले लंदन में था लेकिन हमने उसे वापस स्वदेश भेज दिया है ताकि उसे सुरक्षित रखा जा सके.”


इन्वेस्को में आधिकारिक संस्थानों के प्रमुख रोड रिंगरो कहते हैं कि अब आमतौर पर सरकारें इसी तरह सोच रही हैं. उन्होंने कहा, ”पिछले एक साल का मंत्र यही रहा है कि अगर मेरे पास सोना है तो वो मेरे घर में होना चाहिए.”


डॉलर का आकर्षण घटा

भू-राजनीतिक चिंताएं और उभरते बाजारों में बढ़ते मौके मिलकर केंद्रीय बैंकों को डॉलर से विमुख होकर अन्य निवेश विकल्पों पर विचार के लिए उकसा रहे हैं. इसमें अमेरिका का 7 प्रतिशत की दर से बढ़ता कर्ज और ज्यादा योगदान दे रहा है. हालांकि ज्यादातर मानते हैं कि फिलहाल वैश्विक मुद्रा के तौर पर डॉलर का कोई विकल्प नहीं है. बल्कि युआन को डॉलर के विकल्प के तौर पर देखने वालों की संख्या पिछले साल के 29 फीसदी से घटकर 18 फीसदी रह गयी है.









सर्वे में शामिल कुल 142 संस्थानों में से लगभग 80 प्रतिशत ने माना है कि भू-राजनीतिक तनाव अगले दशक तक सबसे बड़ा खतरा बना रहेगा जबकि 83 फीसदी ने इसे अगले 12 महीने के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में देखा है.


इस वक्त विकास ढांचे को सबसे आकर्षक निवेश विकल्प माना जा रहा है, खासतौर पर वे परियोजनाएं जो अक्षय ऊर्जा से जुड़ी हैं.


भारत सबसे ऊपर

चीन को लेकर पश्चिमी जगत की चिंताओं का अर्थ यह है कि लगातार दूसरे साल भारत निवेशकों की पहली पसंद के रूप में कायम है. इस बात का चलन भी बढ़ रहा है कि फैक्ट्रियां वहां लगाई जाएं जहां उत्पाद बेचे जा रहे हैं. इसलिए मेक्सिको, इंडोनेशिया और ब्राजील आदि की ओर आकर्षण भी बढ़ रहा है.


चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को अलग करना असंभवः अमेरिका


चीन, ब्रिटेन और इटली को सबसे कम आकर्षक देश माना गया है जबकि कोविड-19 के दौरान ऑनलाइन खरीदारी और घर से काम करने वाले लोगों की संख्या बढ़ने के कारण अब प्रॉपर्टी सबसे कम आकर्षक निजी संपत्ति हो गयी है.


रिंगरो कहते हैं कि पिछले साल जिन वेल्थ फंडों ने अच्छा प्रदर्शन किया वे वही थे जो अपने पोर्टफोलियो की जरूरत से ज्यादा बढ़ी कीमत के खतरों को पहचान पाये और अपने निवेश में विविधता ला पाये. ऐसा आगे भी जारी रहेगा.


रिंगरो कहते हैं, "फंड्स और केंद्रीय बैंक अब ऊंची मुद्रास्फीति दर के साथ जीने की आदत डाल रहे हैं. यह सबसे बड़ा बदलाव है.”


वीके/एए (रॉयटर्स) sabhar Dw.de

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शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

बुधवार, 12 जुलाई 2023

सैक्स में ज्यादा सुख किसको आता है

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सेक्स ऐसा अनुभव है, जिसकी ओर व्यक्ति बार-बार आकर्षित होता 

मानव जाति की पांच इन्द्रियां होती हैं।


1.आंख का काम है रूप या वस्तुओं को देखना। देखने के पश्चात अगर रूप लुभावना है, सुंदर है तो उसमें आनंदित होना। अगर रूप सौंदर्य विहीन है, कुरूप है तो उससे घृणा करना एवं उससे दूरी बनाने की कोशिश करना।


2.कान का काम है शब्दों को सुनना। शब्द अगर मधुर है, मोहक हैं, प्रशंसीय है तो कान उनको बार बार सुनना चाहेगा। अगर शब्द दुर्भावना,क्रोध, कटुता एवं कर्कशता से युक्त हैं तो कान फिर से शब्दों से बचेगा।


3.जिह्य(जीभ) का काम है रस का आस्वादन करना। अगर रस मधुर एवं स्वादिष्ट है तो जीभ उसमें बार बार चखना चाहेगी। कड़वे एवं फीके पदार्थों को जीभ कभी नहीं चाहती है।


4.नाक का काम है सुगंध को ग्रहण करना।सुगंधित महक को ग्रहण करने को लालायित रहती है एवं दुर्गंध से बचाना चाहती है।


5.त्वचा अर्थात मानव शरीर स्पर्श चाहता है।स्पर्श अगर सुखदाई है तो उससे चिपकना चाहता है। स्पर्श अगर सुखद अनुभूति नहीं देता तो व्यक्ति उससे अलगाव चाहता है।


6. मन इन सभी इंद्रियों का राजा का काम करता है। मन के अधीन ये पांचों इन्द्रियां अपना अपना साम्राज्य स्थापित कर अपनी तानाशाही चलाती हैं। मन के भी अपने अपने कई विभाग होते हैं जैसे चित,बुद्धि,अहंकार आदि। इनके फीडबैक के आधार पर ही अपनी अधिनस्थ कर्मचारी अर्थात इंद्रियों से उचित या अनुचित काम संपन्न करवाता है।


अब सवाल यह है कि इंद्रियों द्वारा भीगे गए मनचाहे सुख को अनुभव करने की मात्रा को लिंग अर्थात स्त्री एवं पुरुष के आधार पर मापा जा सकता है?


इसका उत्तर है नही।


इसका उत्तर नही होने का कारण यह है कि मानव शरीर में स्थापित सभी इंद्रियों को संसार का सुख भोगने एवं अनुभव करने के लिए ही निर्मित किया गया है। सभी इंद्रियजनीत सुखों को भोगना ही जीवन का परम उद्देश्य है। इसके लिए जीवन के चार लक्ष्य बताए गए हैं काम,अर्थ,धर्म एवं मोक्ष। यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है जब जीवन में संतुलन हो।


लिंग के आधार पर इंद्रिजनित सुख का विभाजन संभव नहीं। क्यों?


चाहे स्त्री हो या पुरुष सभी इंद्रियों के सुख को प्राप्त करना चाहते हैं। तथा उससे होने वाले दुख से बचाना चाहते हैं। सीमित मात्रा में सुख की चाहत बिलकुल न्यायसंगत एवं तर्कसंगत है परंतु जब इन्द्रियां आनंद की चाहत में उन्मादी एवं व्याकुल हो जाती हैं तो व्यक्ति मर्यादाओं की सारी सीमाओं को त्याग देता है। इस प्रवृति का लिंग के आधार पर वर्गीकरण संभव ही नहीं है।कई बार पुरुष अधिक कामुक होता है तो कई बार स्त्री अधिक। यह पूर्णतया प्रत्येक व्यक्ति पर अलग अलग तरीके से लागू होता है। कुछ पुरुष स्पर्श सुख में पागल तक हो जाते हैं जबकि कुछ के लिए यह साधारण शारीरिक आपूर्ति मात्र है। जो स्त्रियां संयमित एवम मर्यादित होती हैं उनके लिए भी यह आनंद एवं भोग विलास का काम न होकर शुद्ध एवं पवित्र प्राकृतिक आनंद की अनुभूति है।


अब यह प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक सोच पर निर्भर करता है की स्पर्श सुख अर्थात स्त्री पुरुष के शारीरिक संबंध में कौन अधिक सुखद अनुभूति करता हैं। यह कोई सार्वभौमिक नियम नही है कि अमुक लिंग को अधिक सुख प्राप्त होता है।


यह अनेक कारकों पर निर्भर है। वैसे इस तरह के कठिन सवाल का उत्तर देने में महान विद्वान शंकराचार्य को भी नाकों चने चबाने पड़े थे। उनकी कहानी अत्यंत ही विस्मयकारी एवं जानने योग्य है।

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भोजन को "दोने पत्तल" पर परोसने का महत्व

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 एक बहुत छोटी सी बात है पर हमने उसे विस्मृत कर दिया हमारी भोजन संस्कृति, इस भोजन संस्कृति में बैठकर खाना और उस भोजन को "दोने पत्तल" पर परोसने का बड़ा महत्व था कोई भी मांगलिक कार्य हो उस समय भोजन एक पंक्ति में बैठकर खाया जाता था और वो भोजन पत्तल पर परोसा जाता था जो विभिन्न प्रकार की वनस्पति के पत्तो से निर्मित होती थी.


क्या हमने कभी जानने की कोशिश की कि ये #भोजन पत्तल पर परोसकर ही क्यो खाया जाता था?नही क्योकि हम उस महत्व को जानते तो देश मे कभी ये "बुफे"जैसी खड़े रहकर भोजन करने की संस्कृति आ ही नही पाती.

जैसा कि हम जानते है पत्तले अनेक प्रकार के पेड़ो के पत्तों से बनाई जा सकती है इसलिए अलग-अलग पत्तों से बनी पत्तलों में गुण भी अलग-अलग होते है| तो आइए जानते है कि कौन से पत्तों से बनी पत्तल में भोजन करने से क्या फायदा होता है? 


लकवा से पीड़ित #व्यक्ति को अमलतास के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना फायदेमंद होता है| 

जिन लोगों को जोड़ो के #दर्द की समस्या है ,उन्हें करंज के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना चाहिए| 

जिनकी मानसिक स्थिति सही नहीं होती है ,उन्हें पीपल के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना चाहिए| 

पलाश के पत्तों से बनी #पत्तल में भोजन करने से खून साफ होता है और बवासीर के रोग में भी फायदा मिलता है| 

केले के पत्ते पर भोजन करना तो सबसे शुभ माना जाता है ,इसमें बहुत से ऐसे तत्व होते है जो हमें अनेक बीमारियों से भी सुरक्षित रखते है| 

पत्तल में भोजन करने से पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता है क्योंकि पत्तले आसानी से नष्ट हो जाती है| 

पत्तलों के नष्ट होने के बाद जो खाद बनती है वो खेती के लिए बहुत लाभदायक होती है| 

पत्तले #प्राकतिक रूप से स्वच्छ होती है इसलिए इस पर भोजन करने से हमारे शरीर को किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती है| 

अगर हम पत्तलों का अधिक से अधिक उपयोग करेंगे तो गांव के लोगों को #रोजगार भी अधिक मिलेगा क्योंकि पेड़ सबसे ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रो में ही पाये जाते है| 


अगर पत्तलों की मांग बढ़ेगी तो लोग पेड़ भी ज्यादा लगायेंगे जिससे #प्रदूषण कम होगा| 

डिस्पोजल के कारण जो हमारी #मिट्टी, नदियों ,तालाबों में प्रदूषण फैल रहा है ,पत्तल के अधिक उपयोग से वह कम हो जायेगा| 


जो मासूम #जानवर इन #प्लास्टिक को खाने से बीमार हो जाते है या फिर मर जाते है वे भी सुरक्षित हो जायेंगे ,क्योंकि अगर कोई जानवर पत्तलों को खा भी लेता है तो इससे उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा| 


सबसे बड़ी बात पत्तले, डिस्पोजल से बहुत सस्ती भी होती है|


ये बदलाव आप और हम ही ला सकते है अपनी #संस्कृति को अपनाने से हम छोटे नही हो जाएंगे बल्कि हमे इस बात का गर्व होना चाहिए कि हम हमारी संस्कृति का #विश्व मे कोई सानी नही है।  sabhar Rajiv ratan pal facebook wall

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भारत गौरव हिमरू हस्तशिप फैब्रिक! मशरू और हिमरू हस्तशिप फैब्रिक

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भारत के हर हिस्से में एक अलग संस्कृति और विविधता नज़र आती है और यही हमारे देश को दुनिया से अलग बनाती हैं। भारत देश की इसी सांस्कृतिक विरासत में शामिल है औरंगाबाद का मशरू और हिमरू हस्तशिप फैब्रिक! मशरू और हिमरू की उत्पत्ति महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के औरंगाबाद जिले से हुई और एक समय इनका उपयोग केवल रईसों के कपड़े बनाने के लिए किया जाता था। इन्हें तैयार करने के लिए कपास और रेशम को एक विशेष करघे के उपयोग से एक साथ बुना जाता है, जिससे ये खास तरह का फैब्रिक बनता है.. जो बहुत ही कोमल और खूबसूरत होता है। पुराने समय में इसमें सोने और चांदी के तारों का उपयोग किया जाता था। धागे इतने पतले और महीन होते थे कि पूरा कपड़ा सोने के कपड़े का आभास देता था। हिमरू को 'किम ख्वाब' के नाम से भी जाना जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, इन दोनों कलाओं का मूल फ़ारसी है। ऐसा माना जाता है कि यह कला औरंगाबाद में तब आई जब 14वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से औरंगाबाद स्थानांतरित की। लेकिन जब सम्राट ने अपनी राजधानी वापस दिल्ली स्थानांतरित कर दी तो कई बुनकर औरंगाबाद में ही रुक गए। क्योंकि मशरू और हिमरू बहुत अनोखे और अलग मटेरियल हैं, इसलिए ये कपड़े शाही परिवार के सदस्यों और अन्य बड़े लोगों द्वारा बहुत पसंद किए गए। उस समय इसकी प्रसिद्धि का अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि मार्को पोलो जब एशिया में मीलों लंबे फ़ासले पार कर दक्कन पहुंचा था, तो स्वागत में उसे हिमरू की शॉल भेंट की गई थी। उस शॉल की नफ़ासत का ज़िक्र करते हुए मार्को पोलो ने अपने संस्मरण में लिखा था- "वो शॉल इतनी नाज़ुक और बारीक बुनाई वाली थी, मानो मकड़ी का महीन जाला हो। कोई भी अपने कलेक्शन में उसे रखना चाहेगा।”

दुखद यह है कि राजे–रजवाड़ों के सिमटने, नवाबों के दौर पलटने के साथ जो हश्र दूसरी कई कलाओं-शिल्‍पों का हुआ, वही हाल इस कला का भी हुआ। आज यह कला लगभग लुप्त होने के कगार पर है। लेकिन रोशनी की किरण हैं औरंगाबाद के कई ऐसे कारीगर जो इसे ज़िंदा रखे हुए हैं। क्या आप कपड़े बुनने की इस कला के बारे में जानते थे? हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। sabhar batar India facebook wall


#BharatGaurav #IndianArt #Art #Maharashtra

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मंगलवार, 11 जुलाई 2023

पारंपरिक दोना और पत्तल के बारे में

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 पत्तल और दोना के पत्ते प्रकृति में पर्यावरण के अनुकूल हैं जो साल के पत्तों से बने होते हैं । प्लेट एक गोलाकार आकार में होती है जिसमें छह से आठ पत्तियाँ एक संकीर्ण लकड़ी की छड़ियों से जुड़ी होती हैं। इसका उपयोग मुख्य रूप से मंदिरों में भगवान को प्रसाद चढ़ाने के लिए किया जाता है। इस पत्तल और दोना पत्तों का उपयोग प्राचीन काल से ही इसकी पवित्रता के लिए किया जाता रहा है। कागज के दोना पत्तल में भोजन की गुणवत्ता बरकरार रहती है। यह प्लास्टिक का एक आदर्श विकल्प है, स्वास्थ्य और वन्य जीवन के लिए अच्छा है।https://plantsinformation.com/all-you-need-to-know-about-the-traditional-dona-pattal/amp/

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लोगों को नरभक्षी बनाने वाले ड्रग

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इस ड्रग के सेवन से Zombie बन रहे लोग, दे रहा Hulk जैसी ताकत, पुलिस ने जारी की चेतावनी


इंग्लैंड में एक नए तरह के स्ट्रीट ड्रग ने हलचल मचा दी है। कहा जा रहा है कि 'मंकी डस्ट' नाम के इस ड्रग को लेने से लोगों में 'सुपरहीरो हल्क' जैसी शक्तियां आ रही हैं। इस ड्रग का असर लेने वाले पर इस कदर है कि वो जॉम्बी की तरह लोगों पर हमला कर रहा है। बाकी ड्रग्स के मुकाबले 'मंकी डस्ट' काफी सस्ता है और आसानी से लोगों की पहुंच में है। ये कहा जा सकता है कि ये ड्रग लोगों को जानवर बना रहा है। व्यक्ति पर करता है भयावह असर 'मंकी डस्ट' नाम के सिंथेटिक ड्रग ने कई देशों में खौफ पैदा कर दिया है। इसड्रग को 'जॉम्बी डस्ट' और 'कैनिबल डस्ट' भी कहा जाता है, और ये व्यक्ति पर अपने भयावह असर के लिए जाना जाता है। जो भी व्यक्ति इस ड्रग का सेवन करता है, उसे किसी भी तरह का दर्द महसूस नहीं होता, बल्कि वो हैलुसिनेशन, एंग्जाइटी और पैरानोआ महसूस करते हैं। हल्क जैसी शक्तियां देता है ये ड्रग इस ड्रग का सेवन शरीर में खून का तापमान भी बढ़ा देता है, जिससे हाइपोथर्मिया का खतरा बढ़ जाता है। ये ड्रग व्यक्ति को काफी ताकतवर भी बना देता है। डेली मेल की खबर के मुताबिक एक पुलिसवाले ने बताया कि ये ड्रग लेने वाले व्यक्ति को लगता है कि उसमें हल्क जैसी शक्तियां हैं, वो वाकई काफी ताकतवर होते हैं। ब्रिटेन में ये खतरनाक ड्रग्स केवल 176 रुपये में मिल रहा है। ब्रिटेन में ये स्ट्रीट ड्रग दो साल पहले आया था लेकिन हाल ही के दिनों में इसके इस्तेमाल में तेजी देखी गई https://hi.quora.com

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सोमवार, 10 जुलाई 2023

चंद्रयान-3 में ज्यादा फ्यूल और सेफ्टी मेजर्स

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 चंद्रयान-3 में ज्यादा फ्यूल और सेफ्टी मेजर्स:लैंडिंग साइट भी बड़ी होगी, इसरो चीफ ने बताई चंद्रयान-2 के फेल होने की वजह

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) शुक्रवार दोपहर 2:35 बजे चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग करेगा। इस बार यान में ज्यादा फ्यूल और कई सेफ्टी मेजर्स किए गए हैं ताकि मिशन नाकाम न हो। साथ ही इस बार लैंडिंग साइट भी बड़ी होगी।

बता दें कि सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी के चलते सितंबर 2019 में चंद्रयान-2 की क्रैश-लैंडिंग हो गई थी।

SIA-इंडिया (सेटकॉम इंडस्ट्री एसोसिएशन) की इंडिया स्पेस कांग्रेस के मौके पर इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने बताया कि चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर जब चंद्रमा की सतह पर 500x500 मीटर लैंडिंग स्पॉट की ओर बढ़ रहा था, तब क्या गलत हुआ था।


इंजनों ने अपेक्षा से ज्यादा थ्रस्ट पैदा किया

सोमनाथ ने बताया कि चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के लिए हमारे पास पांच इंजन थे, जिनका इस्तेमाल वेलॉसिटी को कम करने के लिए किया जाता है, जिसे रिटार्डेशन कहते हैं। इन इंजनों ने अपेक्षा से ज्यादा थ्रस्ट पैदा किया। इसके कारण बहुत सी परेशानियां बढ़ने लगीं।


तेजी से मुड़ना सॉफ्टवेयर से कंट्रोल नहीं हुआ

इसरो प्रमुख ने कहा कि यह दूसरा मुद्दा है। परेशानियां हमारी उम्मीद से कहीं अधिक थीं। लैंडर को बहुत तेजी से मोड़ लेना पड़ा। जब यह बहुत तेजी से मुड़ने लगा, तो सॉफ्टवेयर इसे कंट्रोल नहीं कर सका, क्योंकि हमने कभी इतनी हाई-रेट की उम्मीद नहीं की थी।


लैंडिंग साइट छोटी होना

चंद्रयान 2 के फेल होने का तीसरा कारण अंतरिक्ष यान को उतारने के लिए पहचानी गई 500 मीटर x 500 मीटर की छोटी लैंडिंग साइट थी। उन्होंने कहा- यान की स्पीड बढ़ाकर वहां पहुंचने की कोशिश की जा रही थी। यह चांद की जमीन के करीब था और स्पीड बढ़ती रही।


लैंडिग साइट की साइज इस बार ज्यादा

चंद्रयान-2 में सफलता आधारित डिजाइन के बजाय इसरो ने चंद्रयान-3 में फेल्यूअर बेस्ड डिजाइन का विकल्प चुना है। सोमनाथ ने कहा, 'हमने लैंडिंग साइट को 500 मीटर x 500 मीटर से बढ़ाकर 2.5 किलोमीटर कर दिया है। यह कहीं भी उतर सकता है, इसलिए किसी खास जगह पर नहीं उतरना पड़ेगा। यह उस क्षेत्र के भीतर कहीं भी उतर सकता है।


चंद्रयान-3 को चंद्रमा तक पहुंचाने के तीन हिस्से


इसरो ने स्पेस शिप को चंद्रमा तक पहुंचाने के लिए तीन हिस्से तैयार किए हैं, जिसे टेक्निकल भाषा में मॉड्यूल कहते हैं...

चंद्रयान-2 में इन तीनों के अलावा एक हिस्सा और था, जिसे ऑर्बिटर कहा जाता है। उसे इस बार नहीं भेजा जा रहा है। चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर पहले से ही चंद्रमा के चक्कर काट रहा है। अब इसरो उसका इस्तेमाल चंद्रयान-3 में sabhar https://www.bhaskar.com/

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सेबी के नियम केअनुसार, एक Mutual Fund स्कीम में किसी कंपनी का एक्सपोजर 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है।

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 सेबी के नियम केअनुसार, एक Mutual Fund स्कीम में किसी कंपनी का एक्सपोजर 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है।


SEBISEBI के इस नियम से HDFC के शेयरों पर आ सकती है आफत, अब क्या करेंगी म्यूचुअल फंड कंपनियां 

सेबी के नियम के अनुसार, एक म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) स्कीम में किसी कंपनी का एक्सपोजर 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता है। ऐसे में एचडीएफसी विलय के कारण, यदि सेबी के नियमों को म्यूचुअल फंड कंपनियों को उन्हें 30 दिनों के भीतर स्टॉक में अपनी हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक कम करनी होगी।

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सीमा गुलाम हैदर और सचिन मीणा

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             सीमा गुलाम हैदर और सचिन मीणा
सीमा हैदर के गले में 'राधे-राधे' का दुपट्टा और मंगलसूत्र, सचिन के घर में गूंजते 'जय श्री राम' के नारे- ग्राउंड रिपोर्ट

दो कमरे के घर में चारों तरफ पत्रकारों, कैमरों और माइक से घिरीं सीमा हैदर बहुत आत्मविश्वास के साथ सवालों के जवाब दे रही हैं. पास में ही उनके प्रेमी सचिन मीणा भी कुर्सी पर बैठे हुए हैं.

घर में लगी भीड़ के बीच सीमा के चार बच्चों को आसानी से पहचाना जा सकता है. कुछ पत्रकार इन बच्चों से ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगवा रहे हैं और ऐसा करते हुए बच्चों को अपने कैमरे में शूट कर रहे हैं.


बीच-बीच में कस्बे की कुछ महिलाएं और कुछ हिंदूवादी संगठनों के लोग भी मिलने के लिए आ रहे हैं. ये लोग आशीर्वाद देते हुए सीमा के हाथ में कुछ पैसे पकड़ा रहे हैं और अपनी तस्वीरें खिंचवा रहे हैं.


उमस भरे माहौल के बीच घर में ‘जय श्री राम’ के नारे भी सुनाई देते हैं, तो वहीं कुछ लोग सीमा से घर में लगी तुलसी में पानी देने को भी कहते हैं.


ये दृश्य उत्तर प्रदेश में ग्रेटर नोएडा के रबूपुरा स्थित सचिन मीणा के घर के हैं. दोनों को जमानत मिलने के बाद यहां आने जाने वालों की भीड़ लगी हुई है. Sabhar BBC.com 

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चंद्रयान-3: इसरो ने मुंबई स्थित एयरोस्पेस फर्म से उड़ान भरने के लिए तैयार

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चंद्रयान-3: इसरो ने मुंबई स्थित एयरोस्पेस फर्म से महत्वपूर्ण घटकों को सुरक्षित किया


 चंद्रयान-3: इसरो ने मुंबई स्थित एयरोस्पेस फर्म से महत्वपूर्ण घटकों को सुरक्षित किया

  1. चंद्रयान-3, शुक्रवार (14 जुलाई) को दोपहर 2:35 बजे उड़ान भरने के लिए तैयार है, जो सितंबर 2019 में चंद्रयान-2 की क्रैश-लैंडिंग के बाद एक अनुवर्ती मिशन होगा।

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