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सोमवार, 3 जुलाई 2023

गैस चूल्हे से है दमे की बीमारी का खतरा

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बहुत तेज आंच पर इस्तेमाल किए गए सिंगल गैस बर्नर चूल्हे से ज्यादा मात्रा में बेंजीन केमिकल निकलता है. बेंजीन कैंसर की एक वजह बन सकता है. बहुत तेज आंच पर इस्तेमाल किए गए सिंगल गैस बर्नर चूल्हे से बहुत ज्यादा मात्रा में बेंजीन रसायन निकलता है. बेंजीन दमा समेत कई तरह की खतरनाक बीमारियों की एक वजह बन सकता है. आमतौर पर घरों में खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला गैस का चूल्हा दमे समेत कईं बीमारियों को जन्म देता है. इसके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है लेकिन अमेरिका में हुआ शोध इसका दावा करता है. स्टैनफर्ड रिसर्चरों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि इन चूल्हों से निकलने वाले हानिकारक गैसों से सांस की बीमारियों के अलावा भी कई खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं. इनमें ल्युकेमिया और लिंफोमा जैसे कैंसर भी शामिल हैं. चूल्हे का एक भी हॉब अगर 45 मिनट तक खुला छोड़ दिया जाए तो वह बेंजीन के स्तर को इतना बढ़ा सकता जिसका असर किसी सिगरेट पीने वाले के बगल में खड़े रहने से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है. लाइफस्टाइलएशिया गैस चूल्हे से है दमे की बीमारी का खतरा 01.07.2023१ जुलाई २०२३ बहुत तेज आंच पर इस्तेमाल किए गए सिंगल गैस बर्नर चूल्हे से ज्यादा मात्रा में बेंजीन केमिकल निकलता है. बेंजीन कैंसर की एक वजह बन सकता है. https://p.dw.com/p/4THYt घरों में खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला गैस का चूल्हा दमे समेत कईं बीमारियों को जन्म दे सकता है घरों में खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला गैस का चूल्हा दमे समेत कईं बीमारियों को जन्म दे सकता हैतस्वीर: Robin Utrecht/picture alliance विज्ञापन बहुत तेज आंच पर इस्तेमाल किए गए सिंगल गैस बर्नर चूल्हे से बहुत ज्यादा मात्रा में बेंजीन रसायन निकलता है. बेंजीन दमा समेत कई तरह की खतरनाक बीमारियों की एक वजह बन सकता है. आमतौर पर घरों में खाना बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला गैस का चूल्हा दमे समेत कईं बीमारियों को जन्म देता है. इसके बारे में लोगों को जानकारी नहीं है लेकिन अमेरिका में हुआ शोध इसका दावा करता है. स्टैनफर्ड रिसर्चरों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि इन चूल्हों से निकलने वाले हानिकारक गैसों से सांस की बीमारियों के अलावा भी कई खतरनाक बीमारियां हो सकती हैं. इनमें ल्युकेमिया और लिंफोमा जैसे कैंसर भी शामिल हैं. चूल्हे का एक भी हॉब अगर 45 मिनट तक खुला छोड़ दिया जाए तो वह बेंजीन के स्तर को इतना बढ़ा सकता जिसका असर किसी सिगरेट पीने वाले के बगल में खड़े रहने से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है. रसोईघर से निकलने वाली बेंजीन पूरे घर में फैलकर नुकसान पहुंचा सकती हैरसोईघर से निकलने वाली बेंजीन पूरे घर में फैलकर नुकसान पहुंचा सकती है तस्वीर: Action Pictures/IMAGO नशा हो तो खाना बनाने के लिए ये रेसिपी आजमायें बेंजीन का हानिकारक असर इस अध्ययन में चूल्हे से निकलने वाली बेंजीन गैस को काफी हानिकारक बताया गया है. यह केवल रसोईघर तक सीमित नहीं रहती बल्कि धीरे-धीरे पूरे घर में फैलकर, दूसरे कमरों में रह रहे लोगों को भी नुकसान पहुंचा सकती है. उदाहरण के लिए, चूल्हे के बंद होने के बाद भी बेडरूम में बेंजीन खतरनाक मात्रा में घंटों तक हवा में रहता है. इससे पैदा हुए प्रदूषण की तुलना किसी तेल या गैस सयंत्र के नजदीकी इलाकों में होने वाले प्रदूषण से की जा सकती है और यह इलेक्ट्रिक तारों वाले चूल्हे से 10 से 25 फीसदी ज्यादा है. रिसर्चरों का दावा है कि इंडक्शन चूल्हों से इतनी मात्रा में बेंजीन निकलने का कोई सुबूत नहीं है. इस शोध के लिए 2022 में कैलिफोर्निया और कोलोराडो के 87 घरों में गैस और प्रोपेन के चूल्हों का अध्ययन किया गया. पता चला कि 30 प्रतिशत रसोईघरों में एक सिंगल गैस बर्नर चूल्हा जो हाई सेटिंग पर इस्तेमाल किया गया, उससे इतनी ज्यादा बेंजीन निकली जो किसी सिगरेट पीते इंसान के बगल में खड़े होकर धुआं निगलने से कहीं ज्यादा नुकसानदायक है. यह अमेरिका में 'एनवायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी' (ईपीए) और विश्व स्वस्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए स्वास्थ्य मानकों से कहीं ज्यादा है. यह रिसर्च पेपर 'एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी' जर्नल में प्रकाशित हुआ है. गैस चूल्हे या विलेन एक और रिसर्च में अमेरिका में छोटे बच्चों में दमा के लगभग 13 प्रतिशत मामलों को घर में गैस चूल्हे से जोड़ा गया. सेहत के लिए ही नहीं, गैस के चूल्हे जलवायु के लिए भी एक खतरा हैं. स्टैनफर्ड ने पहले एक अध्ययन में यह कहा था कि गैस के चूल्हे से मीथेन और दूसरे हानिकारक गैस का रिसाव होता है, तब भी जब वह बंद हों. मीथेन एक अति-शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो जलवायु परिवर्तन में योगदान करती है. यह रिसर्च रिपोर्ट लिखने वाले रॉब जैक्सन ने कहा, "जहां घरों में अच्छा वेंटिलेशन प्रदूषक की मात्रा को काम करने में मदद करता है, वहीं एग्जॉस्ट पंखे बेंजीन की मात्रा को घटाने में ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए," 2013 में किए गए एक मेटा-विश्लेषण में यह सामने आया कि गैस चूल्हों वाले घरों में रह रहे बच्चों में दमा का खतरा उन बच्चों के मुकाबले 42 प्रतिशत ज्यादा है जो बिना गैस चूल्हे के घरों में रहते हैं. वहीं 2022 के एक विश्लेषण में पता चला कि अमेरिका में लगभग 12.7 प्रतिशत बच्चों में दमा का कारण गैस का चूल्हा है. एचवी/एसबी (रॉयटर्स) sabhar Dw.de

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रविवार, 2 जुलाई 2023

प्रदेश के 16 जनपदों मे खुलेंगे सैनिक स्कूल

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*लखनऊ.... यूपी* *◆प्रदेश के 16 जनपदों मे खुलेंगे सैनिक स्कूल,प्रशासन ने सभी जिलाधिकारियों को भेजा पत्र...* ◆जनपदों मे सभी सैनिक स्कूल पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के आधार पर खोले जायेंगे... ◆रक्षा मंत्रालय के सैनिक स्कूल सोसायटी की ओर से राज्य सरकार को मिला पत्र... ◆इन जनपदों मे खुलेंगे सैनिक स्कूल,आगरा, अलीगढ़, प्रयागराज, आजमगढ़, बस्ती, बरेली,मुरादाबाद, बाँदा, झांसी, देवीपाटन, अयोध्या, कानपुरनगर,मेरठ,सहारनपुर, मिर्जापुर,एव वाराणसी... ◆बेसिक एव माध्यमिक शिक्षा के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार की तरफ सभी जिलाधिकारियों को भेजे गये पत्र...

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अजित पवार महाराष्ट्र सरकार के नए उप मुख्यमंत्री

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अजित पवार महाराष्ट्र सरकार के नए उप मुख्यमंत्री अजित पवार शरद पवार से बगावत करके महाराष्ट्र के नए उप मुख्यमंत्री बन गये है एकनाथ सिंदे बीजेपी सरकार में शामिल होकर एन डि ए गठबंधन का हिस्सा बन गए है पहले भी अजित पवार बीजेपी के साथ सरकार बना चुके है

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शनिवार, 1 जुलाई 2023

कम पैसे में अपनी कंपनी के मालिक कैसे बने

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प्रधानमंत्री द्वारा स्टार्टअप योजना शुरू की है जिसके लिए रजिस्ट्रेशन कराके अपना कार्य किया जा सकता है जिससे अपने साथ काफी लोगो को रोजगार दिया जा सकता है इस यूट्यूब वीडियो में बताया गया है की आप अपने कंपनी का मालिक कैसे बन सकते है लोगो को रोजगार देने के साथ साथ देश के विकास में अपना योगदान दे सकते

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मंगलवार, 27 जून 2023

महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है

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महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है खजुआ गांव के ग्रमीण द्वारा बताया गया यह किला आल्हा उदल के किले के नाम से जाना जाता है उत्तर की ओर चहारदीवारी में तीन बड़े-बड़े कुएं तैयार किए गए थे, जो हजारों फीट गहरे हैं। ये कुएं आज भी यहां देखे जा सकते हैं। इनमें बड़ी-बड़ी जंजीरें पड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि इन कुओं से बगीचे में पानी पहुंचाया जाता था। यहां महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है पश्चिम में एक बड़ा गेट है, जबकि दूसरा गेट खजुहा गांव की ओर है। इन दरवाजों के ऊपर चढ़कर पूरे बागबादशाही का दृश्य देखा जा सकता है। गांव के अंदर चारों ओर दीवारें बनी हुई हैं और बड़े फाटक तैयार किए गए हैं। कहा जाता है कि यहां पर एक बड़ा हॉल हुआ करता था जिसमें घोड़े और सिपाही रहते थे। ​ फतेह पुर जिले के खजुआ कसबे में आल्हा उदल द्वारा बनवाये गए किला मौजूद है जो बाद में औरंगज़ेब के बेटे शाहशुजा के कब्जे में आ गया था शाहशुजा से औरंगज़ेब के कब्जे में आ गया फिर औरंगज़ेब ने इसमें कुछ निर्माण करवाया रहस्यमयी सुरंग’ गांव के ही बृजबिहारी बाजपेयी की मानें तो ये सुरंग कोलकाता से पेशावर तक जाती है। हालांकि, अब इसे बंद करा दिया गया है। जानकार बताते हैं कि उस वक्त यहां पर शाहजहां के बेटे शाहशुजा का राज था। औरंगजेब ने इसे हड़पने को के लिए अनेक बार यहां पर अटैक किया लेकिन पराजित हुआ। इसके बाद 5 जनवरी, 1659 को औरंगजेब ने फिर से यहां पर अटैक किया और शाहशुजा को पराजित कर कब्जा कर लिया। रहस्यमयी सुरंग’ में जो गया वो नहीं आया वापस, सैकड़ों लोग आज भी लापता kile में एक ऐसी रहस्यमयी सुरंग आज भी मौजूद है जहां जाने वाले कभी लौटकर वापस नहीं आये। सुरंग के आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि इस सुरंग को 350 साल पहले मुगल शासक औरंगजेब ने बनवाया था। इसका नाम बागबाद शाही है। फतेहपुर जिले के खजुहा गांव में आज भी ये मौजूद है। आल्हा चन्देल राजा परमर्दिदेव (परमल के रूप में भी जाना जाता है) के एक महान सेनापति थे, जिन्होंने 1182 ई० में पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई लड़ी, जो आल्हा-खाण्डबॉल में अमर हो गए ऊदल ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल वीरगति प्राप्त हुए आल्हा को अपने छोटे भाई की वीरगति की खबर सुनकर अपना अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े आल्हा के सामने जो आया मारा गया 1 घण्टे के घनघोर युद्ध की के बाद पृथ्वीराज और आल्हा आमने-सामने थे दोनों में भीषण युद्ध हुआ पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल हुए आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया और बुन्देलखण्ड के महा योद्धा आल्हा ने नाथ पन्थ स्वीकार कर लिया sabhr vikipidia amarujala.com

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गुरुवार, 22 जून 2023

प्रेम में डूबी बहादुर लड़कियो, हिंसक रिश्ते से बाहर निकलना ज़रूरी है: ब्लॉग

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 मुंबई से एक और लड़की की हत्या की दिल दहला देने वाली ख़बर आई है.


पिछले छह महीनों के दौरान अनेक ख़बरें सामने आई हैं, जहां लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही लड़कियों की हत्या उनके ही प्रेमी साथियों ने की है.

इससे पहले अपनी पसंद के लड़कों के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का फ़ैसला करने वाली लड़कियों के मां-पिता या रिश्तेदारों द्वारा उनके मारे जाने की ख़बरें ज़्यादा आम हुआ करती थीं. अब उनका साथ देने का वादा करने वाले उनके साथी भी उनका ख़ून कर रहे हैं

.सामने आने वाली हर घटना पहली वाली से ज़्यादा ख़ौफ़नाक और दिल दहला देने वाली है.


पहले लड़की की हत्या. फ़िर शव को काटना. काटने के लिए तरह-तरह के तरीक़े और औज़ारों का इस्तेमाल करना. काटे हुए शरीर के साथ उसी घर में रहना. फ़िर बारी-बारी से शरीर के हिस्सों को ठिकाने लगाना. उन्हें जलाना, उबालना, फेंकना, कुत्ते को खिलाना, सूटकेस में भर देना, फ्रीज़ में डाल देना… और यह सब करते हुए अपनी दुनिया मज़े से रमे रहना.


यह सब उनके साथ किया जा रहा है, जिनके साथ, साथ जीने मरने के क़समें-वादे किये गये थे.


लव-इन यानी सह-जीवन में दो लोग अपनी मर्जी से साथ रहना तय करते हैं. यह जीने का बेहतरीन तरीक़ा हो सकता है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि इस रिश्ते में बराबरी और इज़्ज़त होगी, अहिंसा होगी और मोहब्बत तो होगी ही.


मगर अब ये रिश्ते भी दागदार किये जा रहे हैं. हालांकि, ऐसी कुछ कहानियों का इस्तेमाल लिव-इन के विचार के ख़िलाफ़ करना चालाकी होगी. Sabhar BBC.comhttps://www.bbc.com

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बुधवार, 21 जून 2023

बीमा कंपनी रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस ने 344 करोड़ रुपये का सालाना बोनस देने की घोषणा की

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 बीमा कंपनी रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए अपने भागीदार पॉलिसीधारकों को 344 करोड़ रुपये का सालाना बोनस देने की  घोषणा की।

कंपनी के मुख्य कार्यकारी आशीष वोहरा ने कहा कि इस बोनस से 5.69 लाख भागीदार पॉलिसीधारकों को लाभ होगा।


रिलायंस निप्पॉन लाइफ के प्रबंधन के तहत 30,609 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां हैं। मार्च, 2023 तक कंपनी की कुल बीमित राशि 85,950 करोड़ रुपये थी। sabhar https://www.ibc24.in

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रविवार, 11 जून 2023

फतेह सिंह राठौड़

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 एक राजपूत परिवार से थे।

उनका परिवार जोधपुर के पास स्थित शेरगढ़ तहशील के चोरडिया नामक गाँव से निकला हुआ है।


कई अन्य कामों में असफल होने के बाद उनका वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में आना महज एक संयोग था।


उनके एक रिश्तेदार के कहने पर उनको सरिस्का में वन विभाग में रेंजर के रूप में नौकरी मिल गई।

धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लगा। 


यह वह समय था जब फतेह जंगल की बारीकियों को सीख रहे थे। थ्योरी से ज्यादा उनका मन ज़मीनी काम करने में लगता था।


जंगल में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण उनके कई विरोधी भी बन गए थे।

उनका मानना था की जमीनी स्तर पर काम करके ही ज्यादा अनुभव हो सकते हैं जो डिग्रियों एवं थ्योरी से नहीं मिलते।


बीसवीं सदी में बाघों की संख्या 40000 थी जो सत्तर के दशक तक आते-आते मात्र 1800  रह गई थी। इसके चलते 1970 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने पर वन्यजीवों के शिकार को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया।


प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 1973 में हुई जिसमें रणथम्भौर के साथ आठ अन्य अभ्यारण्य भी शामिल थे। अलग अलग तरह के विभिन्न पर्यावासों में बाघ संरक्षण को प्रोत्साहित करना इस परियोजना का लक्ष्य था। रणथम्भौर एक उष्ण पर्णपाती वन है।


फतेह को इस नए पार्क का विकास करने की जिमेदारी सौंपी गई थी। उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे एस. आर. चौधरी एवं प्रोजेक्ट टाइगर के पहले निदेशक कैलाश सांखला का बहुत योगदान था। 


एस. आर. चौधरी ने फतेह को देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में पढ़ाया था।


कुल मिलाकर इन दोनों ने फतेह की काबिलियत को समझा और भविष्य में फतेह भी उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे। फतेह ने पार्क में ऐसी रोड बनाने का काम किया जो सीधी न होकर घुमावदार हों एवं  पानी के स्त्रोत तक पहुंचती हों। जब फतेह ने काम संभाला तब पार्क की हालत बहुत खराब थी।


पार्क से लगते हुए 16  गांवो के लोग मवेशियों को पार्क में चराने ले आया करते थे। जलाने के लिए पुराने पेड़ काटे जा रहे थे। मवेशियों की बेरोकटोक आवाजाही ने पार्क की बड़ी घास एवं पेड़ पौधों को खत्म कर दिया था। वन्यजीवों के नाम पर कभी कभार बाघ के पगमार्क दिखाई दे जाया करते थे।


फतेह जानते थे की अगर पार्क को जिन्दा रखना है तो ग्रामीणों को पार्क से बाहर विस्थापित करना बहुत जरूरी है। इस काम को फतेह ने बड़ी सूझबूझ के साथ किया, विस्थापित ग्रामीणों को इसके लिए समझाया और उचित मुआवजा दिलवाने का प्रबंध करवाया। मुआवजे में 18 वर्ष से ऊपर के सभी ग्रामीणों को पैसों के अलावा पांच बीघा अतिरिक्त जमीन भी दी गई।


इसके साथ ही घर बनवाने के लिए, कुए खोदने के लिए आर्थिक मदद की गई साथ ही ग्रामीणों के लिए स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की भी उचित व्यवस्था की गई। कैलाश सांखला के सम्मान में नए गांव का नाम कैलाशपुरी रखा गया। विस्थापन के साथ ही धीरे-धीरे पार्क वापस हरा-भरा होने लगा।


1976  में पहली बार फतेह ने पार्क में एक बाघिन को देखा जिसका नाम उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के ऊपर रखा; पद्मिनी। फतेह ने इस बाघिन एवं उसके चार शावकों ( पांचवा शावक जल्द ही मर गया था ) की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की । फतेह के जमीनी स्तर पर किये गए प्रयासों से यह पार्क बाघ देखने के दुनिया में सबसे उपयुक्त पार्कों में से एक माना जाने लगा।


उन दिनों रणथम्भौर जयपुर महाराज के शिकारगाहों में शामिल था। जनवरी 1961 में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के बनने से पहले उन्हें इस पार्क में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ II के लिए शिकार आयोजन की व्यवस्था करना था


उन दिनों वन्यजीव पर्यटन का मतलब ही शिकार करना होता था और कई महाराजा विदेशी सैलानियों से आय के लिए शिकार का आयोजन करते थे।


फतेह सिंह राठौड़ का एक ही उद्देश्य हुआ करता था बाघों को बचाना और अगर उन्हें लगता की इस काम में कुछ गलत हो रहा है  तो वह उसके खिलाफ आवाज उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे।


जब भी वे पार्क से किसी बाघ के गायब होने का मुद्दा उठाते तो वन विभाग इसके विपरीत उनकी बात को गलत साबित करने का प्रयास करते जिसके लिए वन विभाग द्वारा उन्हें कई बार प्रताड़ित भी किया गया। हालाँकि बाद में फतेह का दावा ही सही निकलता था।


अंतिम समय में फतेह को देखना बहुत कठिन समय था। उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था। उन दिनों उन्हें बोलने में भी परेशानी रहने लगी थी। जरा सा भी पानी लेने पर बहुत दर्द होता था।


फिर भी फतेह अपने परिवार जनों एवं दोस्तों के साथ उसी जिंदादिली से रहते थे। एक मार्च की सुबह उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली, फतेह अब नहीं थे।अंतिम संस्कार अगले दिन हुआ, पहले उनकी पार्थिव देह रणथम्भौर में पहाड़ियों के किनारे बने उनके घर में रखा गया जहाँ कई गणमान्य हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी उसी दिन लगभग चार बजे उनके निवास से महज 50  मीटर की दूरी पर एक बाघ तीन बार दहाड़ा साथ ही दुसरे पशु पक्षियों की कॉल  सुनाई दी। ऐसा लग रहा था मानों ये सब अपने पिता यानि फतेह को श्रद्धांजलि देने आये थे! Sabhar Facebook wall

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शुक्रवार, 26 मई 2023

अवचेतन मन और विज्ञान :टेलीपैथी

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अवचेतन मन और विज्ञान के बीच संबंध एक रोमचक और गहरा विषय है। विज्ञान मनोविज्ञान या मनोविज्ञान के द्वारा मन के अध्ययन को समझने का प्रयास करता है। विज्ञान में माना जाता है कि मन और चेतना शारीरिक प्रक्रियाओं और न्यूरोवेव्स (न्यूरोन्स) की गतिविधियों का परिणाम हैं। न्यूरोवेव्स के मध्यम से विभिन्न भागों में तरंगों के रूप में सिग्नल भेजे जाते हैं, जो मन की गतिविधि को निर्धारित करते हैं। यह न्यूरोलॉजी और न्यूरोसाइंस के अध्ययन के अंतर्गत आता है। अवचेतन मन का विज्ञानिक अध्ययन भी किया जाता है, जहां मन की गतिविधियों के पीछे के कारणों को समझने का प्रयास किया जाता है। यह प्रयास मानव न्यूरोसाइंस, कंप्यूटर साइंस, और कोग्निटिव साइंस के तत्वों को समाहित करता है। टेलीपैथी (Telepathy) एक प्राकृतिक और अतींद्रिय शक्ति की परिभाषा के रूप में आपसी मनोवैज्ञानिक संचार को दर्शाने के लिए उपयोग होती है। यह अवधारित की जाती है कि इसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के मन के भाव, विचार, या ज्ञान को निर्देशित कर सकता है बिना किसी संपर्क के। इस शक्ति के माध्यम से संवाद या संचार की क्षमता के बारे में वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं और इसे अभी तक वैज्ञानिक समुदाय में स्वीकार्य रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है। बहुत से लोग टेलीपैथी के अनुभवों का साक्षात्कार करते हैं और उन्हें यह मानते हैं कि यह शक्ति अस्तित्व रखती है, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय इसकी वैधता के बारे में अभी भी विवादित है। वैज्ञानिक समुदाय ने टेलीपैथी के विज्ञानिक व्याख्यान के रूप में भविष्यवाणी की है जहां दूसरे संचार माध्यमों के बिना व्यक्ति-से-व्यक्ति के मन की संचार को संभव माना जाए

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गुरुवार, 25 मई 2023

तुर्की में अर्दोआन की हार-जीत का असर दुनिया पर क्या पड़ेगा

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 जेरेमी हॉवेल

पदनाम,संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

2 घंटे पहले

अगर तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन 28 मई को होने वाले मतदान में राष्ट्रपति पद से बाहर हो जाते हैं, तब तुर्की के दुनिया के बाक़ी देशों के साथ रिश्तों में बड़ा बदलाव आ जाएगा.


अर्दोआन के नेतृत्व में, तुर्की ने रूस के साथ नज़दीकी संबंध स्थापित किए और इससे उसके पश्चिमी सहयोगी देश नाराज़ हुए. यही नहीं अर्दोआन ने इराक़, सीरिया और लीबिया के संघर्षों में तुर्क सैनिक भी भेजे.


विपक्ष के उम्मीदवार, कमाल कलचदारलू ने वादा किया है कि वो पश्चिम के अधिक क़रीब रहेंगे और दूसरे देशों के मामलों में कम हस्तक्षेप करेंगे.


तुर्की सीरिया के शरणार्थियों के साथ क्या करेगा?

अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक तुर्की में इस समय सीरिया के 37 लाख शरणार्थी पंजीकृत हैं जो अपने देश के गृहयुद्ध से भागकर यहां पहुंचे हैं. इसके अलावा तुर्की में अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों से आए शरणार्थी भी रहते हैं.

तुर्की सीरिया के शरणार्थियों के साथ क्या करेगा?

अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक तुर्की में इस समय सीरिया के 37 लाख शरणार्थी पंजीकृत हैं जो अपने देश के गृहयुद्ध से भागकर यहां पहुंचे हैं. इसके अलावा तुर्की में अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों से आए शरणार्थी भी रहते हैं.

लेकिन इसका मतलब ये होगा कि इन लोगों को फिर से सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के सत्तावादी शासन में रहना होगा.


इसी महीने, तुर्की के मीडिया में प्रसारित एक बयान में कलचदारलू ने कहा, “राष्ट्रपति बनने के बाद में सभी शरणार्थियों को वापस उनके देश भेज दूंगा. इस पर और कई बात नहीं होगी.”


उन्होंने यूरोपीय संघ के साथ शरणार्थियों को लेकर हुए तुर्की के समझौते से भी पीछे हटने की चेतावनी दी है. इस समझौते के तहत तुर्की सीरिया से आ रहे शरणार्थियों को अपने देश में रहने की अनुमति देने के लिए तैयार हुआ था. इससे शरणार्थियों को यूरोप के देशों में जाने से रोका गया था.


कलचदारलू का कहना है कि यूरोपीय संघ ने समझौते के तहत अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई है. Sabhar BBC.com

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गुरुवार, 18 मई 2023

स्मार्टफ़ोन कैसे कर रहा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का नुक़सान

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 अगर आपको लगता है कि कम उम्र में ही बच्चे के हाथ में स्मार्टफ़ोन या टैबलेट देने से उसके ज्ञान में बढ़ोतरी होगी या डिजिटल दुनिया की उसकी समझ बढ़ेगी, तो आप ग़लत सोच रहे हैं.

ये कहना है अमेरिकी ग़ैर-सरकारी संस्था 'सेपियन लैब्स' का.

ये संस्था साल 2016 से लोगों के दिमाग़ को समझने के मिशन पर काम कर रही है.

कोरोना काल के दौरान जब बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू हुई थी तो ये बहस तेज़ हुई थी कि बच्चों का मोबाइल पर स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए?

रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

सेपियन लैब्स की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, कम उम्र में जब बच्चों को स्मार्टफ़ोन दिए जाते हैं तो युवावस्था आते-आते उनके दिमाग़ पर विपरीत असर दिखने लगता है.




ये रिपोर्ट 40 देशों के 2,76,969 युवाओं से बातचीत करके तैयार की गई है और ये सर्वेक्षण इसी साल जनवरी से अप्रैल महीने में किया गया.


इन 40 देशों में भारत भी शामिल है.


इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 74 फ़ीसदी महिलाएँ, जिन्हें 6 साल की उम्र में स्मार्टफ़ोन दिया गया था, उन्हें युवावस्था में मेंटल हेल्थ को लेकर परेशानी आई.


एमसीक्यू (मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आकलन) में इन महिलाओं का स्तर कम रहा.


जिन लड़कियों को 10 साल की उम्र में स्मार्टफ़ोन दिया गया, उनमें 61 फ़ीसदी का एमसीक्यू स्तर कम या ख़राब रहा.


कुछ ऐसा ही हाल 15 साल की 61 फ़ीसदी लड़कियों का रहा.


दूसरी ओर 18 साल की लड़कियों को जब स्मार्टफ़ोन मिला, तो ये आँकड़ा 48 फ़ीसदी ही रहा.


वहीं जब छह साल के लड़कों को स्मार्टफ़ोन दिया गया, तो केवल 42 फ़ीसदी में ही एमसीक्यू के स्तर में कमी देखी गई.


सफ़दरजंग अस्पताल में काम कर चुके पूर्व मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर पंकज कुमार वर्मा कहते हैं कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं दिखता और इसे पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है.


उन्होंने बताया कि इसका एक कारण ये हो सकता है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों में किशोरावस्था पहले आती है जिसमें मानसिक और शारीरिक बदलाव शामिल हैं.


जब लड़कियों का एक्सपोज़र कम उम्र में होता है तो इस अवस्था में आते-आते लड़कों के मुक़ाबले वे ज़्यादा प्रभावित होती हैं.


इस शोध ये भी कहा गया है जिन बच्चों को कम उम्र में स्मार्टफ़ोन दिए गए, उनमें आत्महत्या के विचार, दूसरों के प्रति ग़ुस्सा, सच्चाई से दूर रहना और हेलोसिनेशन होना शामिल है.

Sabhar https://www.bbc.com/hindi/science-65607053

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