सोमवार, 3 जुलाई 2023
गैस चूल्हे से है दमे की बीमारी का खतरा
0रविवार, 2 जुलाई 2023
प्रदेश के 16 जनपदों मे खुलेंगे सैनिक स्कूल
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अजित पवार महाराष्ट्र सरकार के नए उप मुख्यमंत्री
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शनिवार, 1 जुलाई 2023
कम पैसे में अपनी कंपनी के मालिक कैसे बने
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मंगलवार, 27 जून 2023
महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है
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गुरुवार, 22 जून 2023
प्रेम में डूबी बहादुर लड़कियो, हिंसक रिश्ते से बाहर निकलना ज़रूरी है: ब्लॉग
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मुंबई से एक और लड़की की हत्या की दिल दहला देने वाली ख़बर आई है.
पिछले छह महीनों के दौरान अनेक ख़बरें सामने आई हैं, जहां लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही लड़कियों की हत्या उनके ही प्रेमी साथियों ने की है.
इससे पहले अपनी पसंद के लड़कों के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का फ़ैसला करने वाली लड़कियों के मां-पिता या रिश्तेदारों द्वारा उनके मारे जाने की ख़बरें ज़्यादा आम हुआ करती थीं. अब उनका साथ देने का वादा करने वाले उनके साथी भी उनका ख़ून कर रहे हैं
.सामने आने वाली हर घटना पहली वाली से ज़्यादा ख़ौफ़नाक और दिल दहला देने वाली है.
पहले लड़की की हत्या. फ़िर शव को काटना. काटने के लिए तरह-तरह के तरीक़े और औज़ारों का इस्तेमाल करना. काटे हुए शरीर के साथ उसी घर में रहना. फ़िर बारी-बारी से शरीर के हिस्सों को ठिकाने लगाना. उन्हें जलाना, उबालना, फेंकना, कुत्ते को खिलाना, सूटकेस में भर देना, फ्रीज़ में डाल देना… और यह सब करते हुए अपनी दुनिया मज़े से रमे रहना.
यह सब उनके साथ किया जा रहा है, जिनके साथ, साथ जीने मरने के क़समें-वादे किये गये थे.
लव-इन यानी सह-जीवन में दो लोग अपनी मर्जी से साथ रहना तय करते हैं. यह जीने का बेहतरीन तरीक़ा हो सकता है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि इस रिश्ते में बराबरी और इज़्ज़त होगी, अहिंसा होगी और मोहब्बत तो होगी ही.
मगर अब ये रिश्ते भी दागदार किये जा रहे हैं. हालांकि, ऐसी कुछ कहानियों का इस्तेमाल लिव-इन के विचार के ख़िलाफ़ करना चालाकी होगी. Sabhar BBC.comhttps://www.bbc.com
बुधवार, 21 जून 2023
बीमा कंपनी रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस ने 344 करोड़ रुपये का सालाना बोनस देने की घोषणा की
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बीमा कंपनी रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए अपने भागीदार पॉलिसीधारकों को 344 करोड़ रुपये का सालाना बोनस देने की घोषणा की।
कंपनी के मुख्य कार्यकारी आशीष वोहरा ने कहा कि इस बोनस से 5.69 लाख भागीदार पॉलिसीधारकों को लाभ होगा।
रिलायंस निप्पॉन लाइफ के प्रबंधन के तहत 30,609 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां हैं। मार्च, 2023 तक कंपनी की कुल बीमित राशि 85,950 करोड़ रुपये थी। sabhar https://www.ibc24.in
रविवार, 11 जून 2023
फतेह सिंह राठौड़
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एक राजपूत परिवार से थे।
उनका परिवार जोधपुर के पास स्थित शेरगढ़ तहशील के चोरडिया नामक गाँव से निकला हुआ है।
कई अन्य कामों में असफल होने के बाद उनका वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में आना महज एक संयोग था।
उनके एक रिश्तेदार के कहने पर उनको सरिस्का में वन विभाग में रेंजर के रूप में नौकरी मिल गई।
धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लगा।
यह वह समय था जब फतेह जंगल की बारीकियों को सीख रहे थे। थ्योरी से ज्यादा उनका मन ज़मीनी काम करने में लगता था।
जंगल में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण उनके कई विरोधी भी बन गए थे।
उनका मानना था की जमीनी स्तर पर काम करके ही ज्यादा अनुभव हो सकते हैं जो डिग्रियों एवं थ्योरी से नहीं मिलते।
बीसवीं सदी में बाघों की संख्या 40000 थी जो सत्तर के दशक तक आते-आते मात्र 1800 रह गई थी। इसके चलते 1970 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने पर वन्यजीवों के शिकार को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया।
प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 1973 में हुई जिसमें रणथम्भौर के साथ आठ अन्य अभ्यारण्य भी शामिल थे। अलग अलग तरह के विभिन्न पर्यावासों में बाघ संरक्षण को प्रोत्साहित करना इस परियोजना का लक्ष्य था। रणथम्भौर एक उष्ण पर्णपाती वन है।
फतेह को इस नए पार्क का विकास करने की जिमेदारी सौंपी गई थी। उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे एस. आर. चौधरी एवं प्रोजेक्ट टाइगर के पहले निदेशक कैलाश सांखला का बहुत योगदान था।
एस. आर. चौधरी ने फतेह को देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में पढ़ाया था।
कुल मिलाकर इन दोनों ने फतेह की काबिलियत को समझा और भविष्य में फतेह भी उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे। फतेह ने पार्क में ऐसी रोड बनाने का काम किया जो सीधी न होकर घुमावदार हों एवं पानी के स्त्रोत तक पहुंचती हों। जब फतेह ने काम संभाला तब पार्क की हालत बहुत खराब थी।
पार्क से लगते हुए 16 गांवो के लोग मवेशियों को पार्क में चराने ले आया करते थे। जलाने के लिए पुराने पेड़ काटे जा रहे थे। मवेशियों की बेरोकटोक आवाजाही ने पार्क की बड़ी घास एवं पेड़ पौधों को खत्म कर दिया था। वन्यजीवों के नाम पर कभी कभार बाघ के पगमार्क दिखाई दे जाया करते थे।
फतेह जानते थे की अगर पार्क को जिन्दा रखना है तो ग्रामीणों को पार्क से बाहर विस्थापित करना बहुत जरूरी है। इस काम को फतेह ने बड़ी सूझबूझ के साथ किया, विस्थापित ग्रामीणों को इसके लिए समझाया और उचित मुआवजा दिलवाने का प्रबंध करवाया। मुआवजे में 18 वर्ष से ऊपर के सभी ग्रामीणों को पैसों के अलावा पांच बीघा अतिरिक्त जमीन भी दी गई।
इसके साथ ही घर बनवाने के लिए, कुए खोदने के लिए आर्थिक मदद की गई साथ ही ग्रामीणों के लिए स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की भी उचित व्यवस्था की गई। कैलाश सांखला के सम्मान में नए गांव का नाम कैलाशपुरी रखा गया। विस्थापन के साथ ही धीरे-धीरे पार्क वापस हरा-भरा होने लगा।
1976 में पहली बार फतेह ने पार्क में एक बाघिन को देखा जिसका नाम उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के ऊपर रखा; पद्मिनी। फतेह ने इस बाघिन एवं उसके चार शावकों ( पांचवा शावक जल्द ही मर गया था ) की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की । फतेह के जमीनी स्तर पर किये गए प्रयासों से यह पार्क बाघ देखने के दुनिया में सबसे उपयुक्त पार्कों में से एक माना जाने लगा।
उन दिनों रणथम्भौर जयपुर महाराज के शिकारगाहों में शामिल था। जनवरी 1961 में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के बनने से पहले उन्हें इस पार्क में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ II के लिए शिकार आयोजन की व्यवस्था करना था
उन दिनों वन्यजीव पर्यटन का मतलब ही शिकार करना होता था और कई महाराजा विदेशी सैलानियों से आय के लिए शिकार का आयोजन करते थे।
फतेह सिंह राठौड़ का एक ही उद्देश्य हुआ करता था बाघों को बचाना और अगर उन्हें लगता की इस काम में कुछ गलत हो रहा है तो वह उसके खिलाफ आवाज उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे।
जब भी वे पार्क से किसी बाघ के गायब होने का मुद्दा उठाते तो वन विभाग इसके विपरीत उनकी बात को गलत साबित करने का प्रयास करते जिसके लिए वन विभाग द्वारा उन्हें कई बार प्रताड़ित भी किया गया। हालाँकि बाद में फतेह का दावा ही सही निकलता था।
अंतिम समय में फतेह को देखना बहुत कठिन समय था। उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था। उन दिनों उन्हें बोलने में भी परेशानी रहने लगी थी। जरा सा भी पानी लेने पर बहुत दर्द होता था।
फिर भी फतेह अपने परिवार जनों एवं दोस्तों के साथ उसी जिंदादिली से रहते थे। एक मार्च की सुबह उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली, फतेह अब नहीं थे।अंतिम संस्कार अगले दिन हुआ, पहले उनकी पार्थिव देह रणथम्भौर में पहाड़ियों के किनारे बने उनके घर में रखा गया जहाँ कई गणमान्य हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी उसी दिन लगभग चार बजे उनके निवास से महज 50 मीटर की दूरी पर एक बाघ तीन बार दहाड़ा साथ ही दुसरे पशु पक्षियों की कॉल सुनाई दी। ऐसा लग रहा था मानों ये सब अपने पिता यानि फतेह को श्रद्धांजलि देने आये थे! Sabhar Facebook wall
शुक्रवार, 26 मई 2023
अवचेतन मन और विज्ञान :टेलीपैथी
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गुरुवार, 25 मई 2023
तुर्की में अर्दोआन की हार-जीत का असर दुनिया पर क्या पड़ेगा
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जेरेमी हॉवेल
पदनाम,संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
2 घंटे पहले
अगर तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन 28 मई को होने वाले मतदान में राष्ट्रपति पद से बाहर हो जाते हैं, तब तुर्की के दुनिया के बाक़ी देशों के साथ रिश्तों में बड़ा बदलाव आ जाएगा.
अर्दोआन के नेतृत्व में, तुर्की ने रूस के साथ नज़दीकी संबंध स्थापित किए और इससे उसके पश्चिमी सहयोगी देश नाराज़ हुए. यही नहीं अर्दोआन ने इराक़, सीरिया और लीबिया के संघर्षों में तुर्क सैनिक भी भेजे.
विपक्ष के उम्मीदवार, कमाल कलचदारलू ने वादा किया है कि वो पश्चिम के अधिक क़रीब रहेंगे और दूसरे देशों के मामलों में कम हस्तक्षेप करेंगे.
तुर्की सीरिया के शरणार्थियों के साथ क्या करेगा?
अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक तुर्की में इस समय सीरिया के 37 लाख शरणार्थी पंजीकृत हैं जो अपने देश के गृहयुद्ध से भागकर यहां पहुंचे हैं. इसके अलावा तुर्की में अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों से आए शरणार्थी भी रहते हैं.
तुर्की सीरिया के शरणार्थियों के साथ क्या करेगा?
अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक तुर्की में इस समय सीरिया के 37 लाख शरणार्थी पंजीकृत हैं जो अपने देश के गृहयुद्ध से भागकर यहां पहुंचे हैं. इसके अलावा तुर्की में अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों से आए शरणार्थी भी रहते हैं.
लेकिन इसका मतलब ये होगा कि इन लोगों को फिर से सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के सत्तावादी शासन में रहना होगा.
इसी महीने, तुर्की के मीडिया में प्रसारित एक बयान में कलचदारलू ने कहा, “राष्ट्रपति बनने के बाद में सभी शरणार्थियों को वापस उनके देश भेज दूंगा. इस पर और कई बात नहीं होगी.”
उन्होंने यूरोपीय संघ के साथ शरणार्थियों को लेकर हुए तुर्की के समझौते से भी पीछे हटने की चेतावनी दी है. इस समझौते के तहत तुर्की सीरिया से आ रहे शरणार्थियों को अपने देश में रहने की अनुमति देने के लिए तैयार हुआ था. इससे शरणार्थियों को यूरोप के देशों में जाने से रोका गया था.
कलचदारलू का कहना है कि यूरोपीय संघ ने समझौते के तहत अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई है. Sabhar BBC.com
गुरुवार, 18 मई 2023
स्मार्टफ़ोन कैसे कर रहा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का नुक़सान
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अगर आपको लगता है कि कम उम्र में ही बच्चे के हाथ में स्मार्टफ़ोन या टैबलेट देने से उसके ज्ञान में बढ़ोतरी होगी या डिजिटल दुनिया की उसकी समझ बढ़ेगी, तो आप ग़लत सोच रहे हैं.
ये कहना है अमेरिकी ग़ैर-सरकारी संस्था 'सेपियन लैब्स' का.
ये संस्था साल 2016 से लोगों के दिमाग़ को समझने के मिशन पर काम कर रही है.
कोरोना काल के दौरान जब बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू हुई थी तो ये बहस तेज़ हुई थी कि बच्चों का मोबाइल पर स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए?
रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
सेपियन लैब्स की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, कम उम्र में जब बच्चों को स्मार्टफ़ोन दिए जाते हैं तो युवावस्था आते-आते उनके दिमाग़ पर विपरीत असर दिखने लगता है.
ये रिपोर्ट 40 देशों के 2,76,969 युवाओं से बातचीत करके तैयार की गई है और ये सर्वेक्षण इसी साल जनवरी से अप्रैल महीने में किया गया.
इन 40 देशों में भारत भी शामिल है.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 74 फ़ीसदी महिलाएँ, जिन्हें 6 साल की उम्र में स्मार्टफ़ोन दिया गया था, उन्हें युवावस्था में मेंटल हेल्थ को लेकर परेशानी आई.
एमसीक्यू (मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आकलन) में इन महिलाओं का स्तर कम रहा.
जिन लड़कियों को 10 साल की उम्र में स्मार्टफ़ोन दिया गया, उनमें 61 फ़ीसदी का एमसीक्यू स्तर कम या ख़राब रहा.
कुछ ऐसा ही हाल 15 साल की 61 फ़ीसदी लड़कियों का रहा.
दूसरी ओर 18 साल की लड़कियों को जब स्मार्टफ़ोन मिला, तो ये आँकड़ा 48 फ़ीसदी ही रहा.
वहीं जब छह साल के लड़कों को स्मार्टफ़ोन दिया गया, तो केवल 42 फ़ीसदी में ही एमसीक्यू के स्तर में कमी देखी गई.
सफ़दरजंग अस्पताल में काम कर चुके पूर्व मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर पंकज कुमार वर्मा कहते हैं कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं दिखता और इसे पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है.
उन्होंने बताया कि इसका एक कारण ये हो सकता है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों में किशोरावस्था पहले आती है जिसमें मानसिक और शारीरिक बदलाव शामिल हैं.
जब लड़कियों का एक्सपोज़र कम उम्र में होता है तो इस अवस्था में आते-आते लड़कों के मुक़ाबले वे ज़्यादा प्रभावित होती हैं.
इस शोध ये भी कहा गया है जिन बच्चों को कम उम्र में स्मार्टफ़ोन दिए गए, उनमें आत्महत्या के विचार, दूसरों के प्रति ग़ुस्सा, सच्चाई से दूर रहना और हेलोसिनेशन होना शामिल है.
Sabhar https://www.bbc.com/hindi/science-65607053
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