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रविवार, 17 जुलाई 2022

जैव विविधता: पूरी दुनिया का पेट भर सकती हैं जंगली प्रजातियां

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 जैव विविधता के विशेषज्ञ विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी जंगली प्रजातियों के संरक्षण का आह्वान कर रहे हैं. इन प्रजातियों के संरक्षण से अरबों लोगों को भोजन मिल सकता है. साथ ही, आमदनी बढ़ सकती है.

इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) की दो ऐतिहासिक रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि जंगली प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने और मानव जीवन के लिए आवश्यक पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करने के लिए "परिवर्तनकारी बदलाव" की जरूरत है.

इन रिपोर्ट में शैवाल, जानवरों, फफुंद के साथ-साथ जमीन और जल में मौजूद पौधों के स्थायी इस्तेमाल के विकल्पों की जांच की गई है. रिपोर्ट को तैयार करने में लगभग 400 विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों के साथ ही स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे. कुल मिलाकर, उन्होंने हजारों वैज्ञानिक स्रोतों का मूल्यांकन किया. इस सप्ताह इससे जुड़ी अहम जानकारी जारी की गई. आईपीबीईएस के सह-अध्यक्ष जॉन डोनाल्डसन ने कहा, "दुनिया की लगभग आधी आबादी वास्तव में जंगली प्रजातियों के इस्तेमाल पर बहुत ज्यादा या कुछ हद तक निर्भर है. लोग जितना सोचते हैं उससे ज्यादा वे जंगली प्रजातियों पर निर्भर हैं.”

10 लाख से ज्यादा प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा

फिलहाल, दुनिया भर में लगभग दस लाख प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है, क्योंकि जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. इससे दुनिया भर के लोगों के स्वास्थ्य और उनकी जीवन की गुणवत्ता को नुकसान पहुंच रहा है. साथ ही, वे आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं. इंसानी गतिविधियों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण, धरती का तापमान पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में सदी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. इस वजह से विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों के लिए 10 गुना खतरा बढ़ जाएगा.

शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बड़े स्तर पर प्रजातियों के विलुप्त होने का छठा चरण पहले से ही शुरू हो चुका है. रिपोर्ट में बताया गया है कि स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण और उसकी सुरक्षा के लिए मछली, कीड़े, फफूंद, शैवाल, जंगली फल, जंगल और पक्षियों की जंगली प्रजातियों का संरक्षण जरूरी है.

जंगली प्रजातियों से लोगों को फायदा

रिपोर्ट में कहा गया है कि जंगली प्रजातियों और उनके पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा करने से लाखों लोगों की आजीविका सुरक्षित होगी. जंगली प्रजातियों का लगातार बेहतर प्रबंधन, गरीबी और भूख से लड़ने के लिए संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में से एक को और मजबूत करेगा.  उदाहरण के लिए, सभी खाद्य फसलों का दो-तिहाई हिस्सा बड़े पैमाने पर जंगली परागणकों पर निर्भर करता है. दूसरे शब्दों में कहें, तो पक्षी, हवा, कीड़े या किसी अन्य माध्यम से बीज जंगल में एक जगह से दूसरे जगह फैलते हैं. दुनिया भर में पाई जाने वाली दो-तिहाई से ज्यादा फसलें परागण के लिए कीटों पर निर्भर हैं. बिना इन कीटों के परागण संभव नहीं और बिना परागण के फसल संभव नहीं है. आज स्थिति यह है कि इन कीटों की करीब एक तिहाई आबादी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है. ऐसे में न तो परागण होगा और न ही फसल होगी. जब फसल ही नहीं होगी, तो इंसानों को भोजन नहीं मिलेगा. जंगली पौधे, फफूंद और शैवाल दुनिया की 20 फीसदी आबादी के भोजन का हिस्सा हैं.

दुनिया में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों में से 70 फीसदी लोग जंगली प्रजातियों पर सीधे तौर पर निर्भर हैं. जंगली पेड़ों से ही लाखों लोगों का जीवन-बसर होता है. यह उनकी आमदनी का मुख्य स्रोत है. हालांकि, इसके साथ ही जिन 2 अरब लोगों को खाना पकाने के लिए लकड़ी की जरूरत होती है वे जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं. वनों की कटाई के कारण हर साल लगभग 50 लाख हेक्टेयर जंगल नष्ट हो जाते हैं. जबकि, लोगों को यह समझना होगा कि पेड़ों को काटे बिना भी जंगली प्रजातियों से कमाई की जा सकती है. 

स्कूबा डाइविंग, जंगल की सैर या वन्यजीव देखने जैसे प्रकृति पर्यटन से 2018 में 120 अरब डॉलर की कमाई हुई. कोरोना महामारी से पहले राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों से हर साल करीब 600 अरब डॉलर की कमाई हुई.

पर्यावरण के नुकसान की लागत

लेखकों का कहना है कि राजनीतिक और आर्थिक निर्णय लेते समय प्रकृति को कम आंकना वैश्विक स्तर पर जैव विविधता के संकट को बढ़ा रहा है. आर्थिक विचारों पर आधारित नीतिगत निर्णय लेने के दौरान इस बात की अनदेखी की जाती है कि पर्यावरण में होने वाले बदलाव लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं. उदाहरण के लिए, क्षणिक लाभ और सकल घरेलू उत्पाद के रूप में विकास को मापने पर ध्यान केंद्रित करने से अत्यधिक दोहन या सामाजिक अन्याय जैसे नकारात्मक प्रभावों का आकलन नहीं हो पाता.

दोनों रिपोर्ट में से एक के सह-लेखक पेट्रीसिया बलवनेरा ने कहा, "नीति-निर्माण में प्रकृति के मूल्यों को शामिल करना, 'विकास' और 'जीवन की अच्छी गुणवत्ता' को फिर से परिभाषित करने जैसा है. साथ ही, उन तरीकों की पहचान करना है जिससे लोग प्रकृति के ज्यादा करीब आ सकते हैं

सुशी के प्रचार से टूना मछली की आबादी बचाने तक

डोनाल्डसन ने बताया, "सुशी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण 1980 के दशक में ब्लूफिन टूना मछली विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई थी. इसे बचाने के लिए कई उपाय अपनाए गए. जैसे, मछली पकड़ने की समयावधि कम की गई, मछली पकड़ने की गतिविधियों की निगरानी की गई, छोटे आकार की मछली पकड़ने पर रोक लगाई गई, कम मछली पकड़ी गई, मछलियों को फलने फूलेन का मौका दिया गया. इन सब उपायों के बेहतर नतीजे देखने को मिले.”

उन्होंने आगे कहा, "जब स्थिति को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जाता है, तो इससे न सिर्फ स्थिरता आती है, बल्कि इन्हें उन जगहों पर इस्तेमाल किया जा सकता है जहां से ज्यादा फायदा हो.”  लेखक लकड़ी उद्योग में भी इसी तरह के उपायों को लागू करने की सलाह देते हैं. इसके तहत अवैध कटाई पर रोक, कड़े नियम लागू करना, बेहतर निगरानी प्रणाली स्थापित करना वगैरह शामिल है. साथ ही, लेखकों ने ऐसे नियम बनाने की भी मांग की जिससे जमीन का अधिकार स्थानीय लोगों के हाथ में हो और जो मोनोकल्चर की जगह जंगली प्रजातियों को बढ़ावा देती हो.

जैव विविधता: पूरी दुनिया का पेट भर सकती हैं जंगली प्रजातियां

जैव विविधता के विशेषज्ञ विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी जंगली प्रजातियों के संरक्षण का आह्वान कर रहे हैं. इन प्रजातियों के संरक्षण से अरबों लोगों को भोजन मिल सकता है. साथ ही, आमदनी बढ़ सकती है.

इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) की दो ऐतिहासिक रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि जंगली प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने और मानव जीवन के लिए आवश्यक पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करने के लिए "परिवर्तनकारी बदलाव" की जरूरत है.

इन रिपोर्ट में शैवाल, जानवरों, फफुंद के साथ-साथ जमीन और जल में मौजूद पौधों के स्थायी इस्तेमाल के विकल्पों की जांच की गई है. रिपोर्ट को तैयार करने में लगभग 400 विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों के साथ ही स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधि शामिल थे. कुल मिलाकर, उन्होंने हजारों वैज्ञानिक स्रोतों का मूल्यांकन किया. इस सप्ताह इससे जुड़ी अहम जानकारी जारी की गई. आईपीबीईएस के सह-अध्यक्ष जॉन डोनाल्डसन ने कहा, "दुनिया की लगभग आधी आबादी वास्तव में जंगली प्रजातियों के इस्तेमाल पर बहुत ज्यादा या कुछ हद तक निर्भर है. लोग जितना सोचते हैं उससे ज्यादा वे जंगली प्रजातियों पर निर्भर हैं.”

दुनिया में जैव विविधता के लिहाज से बहुत ही समृद्ध हैं भारत के पश्चिमी घाट के जंगल

10 लाख से ज्यादा प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा

फिलहाल, दुनिया भर में लगभग दस लाख प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है, क्योंकि जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. इससे दुनिया भर के लोगों के स्वास्थ्य और उनकी जीवन की गुणवत्ता को नुकसान पहुंच रहा है. साथ ही, वे आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं. इंसानी गतिविधियों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण, धरती का तापमान पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में सदी के अंत तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है. इस वजह से विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी प्रजातियों के लिए 10 गुना खतरा बढ़ जाएगा.

शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि बड़े स्तर पर प्रजातियों के विलुप्त होने का छठा चरण पहले से ही शुरू हो चुका है. रिपोर्ट में बताया गया है कि स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण और उसकी सुरक्षा के लिए मछली, कीड़े, फफूंद, शैवाल, जंगली फल, जंगल और पक्षियों की जंगली प्रजातियों का संरक्षण जरूरी है.

जंगली प्रजातियों से लोगों को फायदा

रिपोर्ट में कहा गया है कि जंगली प्रजातियों और उनके पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा करने से लाखों लोगों की आजीविका सुरक्षित होगी. जंगली प्रजातियों का लगातार बेहतर प्रबंधन, गरीबी और भूख से लड़ने के लिए संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में से एक को और मजबूत करेगा.  उदाहरण के लिए, सभी खाद्य फसलों का दो-तिहाई हिस्सा बड़े पैमाने पर जंगली परागणकों पर निर्भर करता है. दूसरे शब्दों में कहें, तो पक्षी, हवा, कीड़े या किसी अन्य माध्यम से बीज जंगल में एक जगह से दूसरे जगह फैलते हैं. दुनिया भर में पाई जाने वाली दो-तिहाई से ज्यादा फसलें परागण के लिए कीटों पर निर्भर हैं. बिना इन कीटों के परागण संभव नहीं और बिना परागण के फसल संभव नहीं है. आज स्थिति यह है कि इन कीटों की करीब एक तिहाई आबादी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है. ऐसे में न तो परागण होगा और न ही फसल होगी. जब फसल ही नहीं होगी, तो इंसानों को भोजन नहीं मिलेगा. जंगली पौधे, फफूंद और शैवाल दुनिया की 20 फीसदी आबादी के भोजन का हिस्सा हैं.

दक्षिण पूर्वी एशिया के मेकॉन्ग इलाके में हाल में जीवों की 224 नई प्रजातियां पता चलीं

दुनिया में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों में से 70 फीसदी लोग जंगली प्रजातियों पर सीधे तौर पर निर्भर हैं. जंगली पेड़ों से ही लाखों लोगों का जीवन-बसर होता है. यह उनकी आमदनी का मुख्य स्रोत है. हालांकि, इसके साथ ही जिन 2 अरब लोगों को खाना पकाने के लिए लकड़ी की जरूरत होती है वे जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं. वनों की कटाई के कारण हर साल लगभग 50 लाख हेक्टेयर जंगल नष्ट हो जाते हैं. जबकि, लोगों को यह समझना होगा कि पेड़ों को काटे बिना भी जंगली प्रजातियों से कमाई की जा सकती है. 

स्कूबा डाइविंग, जंगल की सैर या वन्यजीव देखने जैसे प्रकृति पर्यटन से 2018 में 120 अरब डॉलर की कमाई हुई. कोरोना महामारी से पहले राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों से हर साल करीब 600 अरब डॉलर की कमाई हुई.

पर्यावरण के नुकसान की लागत

लेखकों का कहना है कि राजनीतिक और आर्थिक निर्णय लेते समय प्रकृति को कम आंकना वैश्विक स्तर पर जैव विविधता के संकट को बढ़ा रहा है. आर्थिक विचारों पर आधारित नीतिगत निर्णय लेने के दौरान इस बात की अनदेखी की जाती है कि पर्यावरण में होने वाले बदलाव लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं. उदाहरण के लिए, क्षणिक लाभ और सकल घरेलू उत्पाद के रूप में विकास को मापने पर ध्यान केंद्रित करने से अत्यधिक दोहन या सामाजिक अन्याय जैसे नकारात्मक प्रभावों का आकलन नहीं हो पाता.

दोनों रिपोर्ट में से एक के सह-लेखक पेट्रीसिया बलवनेरा ने कहा, "नीति-निर्माण में प्रकृति के मूल्यों को शामिल करना, 'विकास' और 'जीवन की अच्छी गुणवत्ता' को फिर से परिभाषित करने जैसा है. साथ ही, उन तरीकों की पहचान करना है जिससे लोग प्रकृति के ज्यादा करीब आ सकते हैं.”

टूना मछली

सुशी के प्रचार से टूना मछली की आबादी बचाने तक

डोनाल्डसन ने बताया, "सुशी की बढ़ती लोकप्रियता के कारण 1980 के दशक में ब्लूफिन टूना मछली विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई थी. इसे बचाने के लिए कई उपाय अपनाए गए. जैसे, मछली पकड़ने की समयावधि कम की गई, मछली पकड़ने की गतिविधियों की निगरानी की गई, छोटे आकार की मछली पकड़ने पर रोक लगाई गई, कम मछली पकड़ी गई, मछलियों को फलने फूलेन का मौका दिया गया. इन सब उपायों के बेहतर नतीजे देखने को मिले.”

उन्होंने आगे कहा, "जब स्थिति को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जाता है, तो इससे न सिर्फ स्थिरता आती है, बल्कि इन्हें उन जगहों पर इस्तेमाल किया जा सकता है जहां से ज्यादा फायदा हो.”  लेखक लकड़ी उद्योग में भी इसी तरह के उपायों को लागू करने की सलाह देते हैं. इसके तहत अवैध कटाई पर रोक, कड़े नियम लागू करना, बेहतर निगरानी प्रणाली स्थापित करना वगैरह शामिल है. साथ ही, लेखकों ने ऐसे नियम बनाने की भी मांग की जिससे जमीन का अधिकार स्थानीय लोगों के हाथ में हो और जो मोनोकल्चर की जगह जंगली प्रजातियों को बढ़ावा देती हो.


चीन में बायमा लेक नेशनल वेटलैंड पार्क

स्थानीय समुदायों को ‘कम आंका गया'

रिपोर्ट में स्थानीय समुदायों की भूमिका की भी चर्चा की गई. साथ ही, यह प्रस्ताव दिया गया कि पारिस्थितिक तंत्र को कैसे बेहतर ढंग से संरक्षित और इस्तेमाल किया जा सकता है.  स्थानीय लोग एक ही जमीन पर हर साल अलग-अलग फसल लगाते हैं, ताकि उसकी उर्वरा बनी रहे. वे पशुओं के चरने का मौसम भी निर्धारित करते हैं. कुछ विशेष मौसम के दौरान विशेष प्रजातियों की कटाई नहीं करते हैं. यह सब जैव विविधता को बनाए रखने या बढ़ाने के लक्ष्य के साथ किया जाता है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय रहते हैं, वहां वनों की कटाई कम होती है. स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों ने रिपोर्ट तैयार करने में सीधे तौर पर योगदान दिया है. इसमें प्रकृति से जरूरत से अधिक न लेने की उनकी साझा संस्कृति पर प्रकाश डाला गया है. जैव विविधता पर अंतरराष्ट्रीय स्थानीय मंच के विवियाना फिगेरोआ कहते हैं, "स्थानीय ज्ञान की यह मान्यता ‘प्रगति' है. स्थानीय लोग किसी से कोई पैसा लिए बिना प्रजातियों के संरक्षण का काम कर रहे हैं.”  इस व्यापक योगदान के बावजूद, कई समुदायों को मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना करना पड़ रहा है. कई समुदायों को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा, तो कुछ हिंसा के शिकार हुए. कइयों को जबरन उनकी जमीन से बेदखल कर दिया गया. 

फिगेरोआ कहते हैं, "सरकारों को वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण और स्थायी इस्तेमाल में हमारी सहायता करनी चाहिए. हम चाहते हैं कि इस रिपोर्ट से स्थानीय स्तर पर होने वाली कार्रवाई में भी मदद मिले.”https://m.dw.com/hi/how-can-we-protect-biodiversity/a-62491530

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शनिवार, 16 जुलाई 2022

मोटर एक्सीडेंट क्लेम कैसे लें

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 मोटर एक्सीडेंट क्लेम कैसे लें वीडियो में जानकारी दी गई है आज कल एक्सीडेंट ज्यादा हो जाते हैं इसकी भरपाई के लिए बीमा कंपनियां इंश्योरेंस करती हैं तथा क्लेम का भुगतान करती है कैसे करती हैं इसके लिए इस वीडियो को देखें




 

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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से होम लोन कैसे लें

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इस वीडियो में होम लेने की विस्तृत जानकारी की गई है आजकल लोन की आवश्यकता सबको घर बनाने के लिए होती है


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शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

सर्वाइकल कैंसर क्या होता है?

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https://hi.quora.com
सर्वाइकल कैंसर क्या होता है?

सर्विक्स क्या है?

गर्भाशय या गर्भाशय का निचला हिस्सा, जहां योनि समाप्त होती है और गर्भाशय शुरू होता है उसे ही सर्वाइकल कहते हैं। यहीं से शुक्राणु गर्भाशय से होकर गुजरते हैं और वहां से फैलोपियन ट्यूब में पहुंच जाते हैं जहां शुक्राणु अंडा से जुड़ जाता है और जाईगोट बन जाता है। गर्भाशय ग्रीवा अर्थ सर्वाइकल का वो ट्यूमर जो फैलता जाए उसे ही कैंसर कहा जाता है।यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला कैंसर है जिसमें पहले चरण में गर्भाशय ग्रीवा का आकार बिगड़ जाता है। इसके चार चरण होते हैं। किसी भी स्तर पर इलाज शुरू करने से मरीज की जान बचाई जा सकती है।

महिलाओं के शरीर की यह चौथी सबसे बड़ी जगह है जहां कैंसर ज्यादा देखने को मिलता है

दुनिया भर में हर साल इस कैंसर के 570,000 नए मामले सामने आते हैं, जबकि हर साल 311,000 मौतें इसी कैंसर से हो जाती हैं।

कारण:

90% मामलों में,इस प्रकार के कैंसर का कारण एच पी वी नामक वायरस पाया गया है। यह वही वायरस है जो आपकी त्वचा पर मस्से का कारण बनता है।और इस वायरस की वजह पुरुष या महिला का एक से अधिक संभोग पार्टनर रखना है। महिलाओं में ध्रुमपान की गलत आदत इत्यादि

इलाज :

आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के काढ़ा और परहेज रख कर हर चरण में फायदा उठाया जा सकता है। मैंने कई पेसेंट को अपने काढ़ा से ठीक किया है ।और दस सालों से मैं ये सेवा कर रहा हूं।

जहां तक मेडिकल का इलाज है वो इस प्रकार है

प्रारंभिक चरणों का इलाज कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, लेजर सर्जरी और इलेक्ट्रोथेरेपी से किया जा सकता है, जबकि तीसरे और चौथे चरण में, गर्भाशय का सर्जिकल निष्कासन ही एकमात्र उपचार है।


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Meet the Giant Sequoia, the ‘Super Tree’ Built to Withstand Fire

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https://www.scientificamerican.com


 When the Grizzly Giant sprouted from the ground in what is now Yosemite National Park, the Roman Republic was nearly two centuries away from forming, Buddhism would not develop for at least more than a century, and the geoglyphs making up the Nazca Lines of southern Peru would not be etched for around 200 years.

At an estimated 2,700 years old (and possibly even older), this giant sequoia is one of the oldest trees in the world—a majestic specimen of a remarkable redwood species that has evolved to withstand the flames that periodically sweep through its environment. Some of these trees, which can grow more than 300 feet tall (about as high as a 30-story building) and dozens of feet wide, are the world’s most massive tree and one of the largest organisms on earth.

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ऋषि सौनक बने ब्रिटेन के पीएम

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 नारायण मूर्ति व सुधा मूर्ति के दामाद हैं ऋषि सौनक। जिस ब्रिटेन ने ढाई सौ साल भारत पर हुकुमत की। आज वहां का पीएम एक भारतीय बन गया है।

Rishi Sunak (/ˈrɪʃˈsnæk/; born 12 May 1980) is a British politician who served as Chancellor of the Exchequer from 2020 to 2022, having previously served as Chief Secretary to the Treasury from 2019 to 2020. A member of the Conservative Party, he has been Member of Parliament (MP) for Richmond (Yorks) since 2015. Wikipedia 

 बधाई एवं शुभकामनाएं। #rishisunakmp

#congratulations #rishisunak 

#indianmen #new #PM #UK 💐 💐

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सोमवार, 11 जुलाई 2022

बायोलॉजिकल क्लॉक नियम के अनुसार सेक्स की आवश्यकता

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 बायोलॉजिकल क्लाक नियम के अनुसार महिला को एक माह में पुरुष की सैक्स आवश्यकता दो बार होती है पहली बार गर्भाशय के एन्डोमैट्रियम में जमे पिछले महीने के अनिषेचित अण्ड और कार्पसल्यूटियम को उखाड़ ने के लिए , गर्भाशय में पैरिस्टालटिक मूवमेंट /क्रमाकुंचन गति दर शुरू आती दौर में बढ़ाकर मासिक धर्म की शुरुआत अच्छी करने के लिए , जिसमें एंडोमेट्रियल लेयर गर्भाश्य से पूरी तरह तरह से उखड़ जाये । ऐसे में माहवारी की शुरुआत से पहले पति की शिद्दत से जरूरत महसूस होती है ।

दोबारा ओव्यूलेशन /अण्डा निक्षेपण के बाद अण्डा निषेचन के लिए /गर्भ धारण करने के लिए अर्द्ध मास १३ से १६ दिन के समय दौरान एक बार फिर से निषेचन के समय पति की शिद्दत से की आवश्यकता महसूस होती है ।

बाकी सैक्स शरीर के बढ़े हुए सैक्स टैम्प्रेचर / शरीर के काम वासना के भड़क से बढ़े / ऊर्जा स्तर को गिराने /नार्मल करने की प्रक्रिया है जिससे शरीर का बढ़ता तापमान मैथुन से वीर्य और रज के निकल जाने पर शरीर में शान्ति ठंडकता महसूस होती है । शरीर की बढ़ी हुई प्रज्या ऊर्जा से / बढ़ा शरीर का तापमान घटने से सामान्य और मन का मैथुन जनित तनाव दबाव कम से सामान्य तक कम हो जाता है शरीर को शकून मिलता है अच्छा लगता है कुछ सीमित समय के लिए ।

यह मैथुन आनन्द सुख समस्त संसार के सुख और आनंद से सर्वोपरि श्रेष्ठ है जो केवल मानव जाति के पुरुष स्त्री को उपलब्ध है पशुओं में केवल नर पशु इसे प्राप्त करते हैं मादा पशुओं में केवल स्तनधारी वर्ग के आर्डर कार्निवोरा दंतीले मांसाहारी और प्राइमेट्स की कुछ ही सौभाग्यशाली मादाएं पर्याप्त /अनुभव करती है । मैंने अतृप्त बंदरिया और अतृप्त कुतिया को यौनानन्द की प्राप्ती के लिए नर से पुनः आग्रह , अग्रसर , प्रेरण करते हुए फिर से जल्दी दोबारा मैथुन को लेकर फिर से अग्रसर करते देखा था ।

यौनानन्द यौनाघर्षण क्रिया द्वारा पुरुष को हर बार वीर्य स्खलन पर प्राप्त होता है परन्तु यह सैक्स आनन्द स्त्रियों के लिए एक सपने जैसा होता है जो कभी तो मिल जाता है तो कभी पुरुष के समय पूर्व स्खलित हो जाने पर नहीं मिल पाता है । लेकिन यदि किसी स्त्री को यह सैक्स आनन्द की अनुभूति जिस पुरुष से से एक बार भी हो जाती है तो वह स्त्री फिर उस पुरुष के सानिध्य के लिए पुलकित रहती है । वह उस यौनानन्द दाता पुरुष के लिए जाति, कुल , गोत्र , परिवार ,देश काल आयु के नियमों को ताक पर रखकर उससे अलग होने के बारे में सोचने विचार विमर्श करने को पसंद नहीं करती है । समाज परिवार से बगावत पर उतारू हो जाती है । वह तो उसी में खो जाना चाहती है । वैसे आज कल शिक्षा के प्रभाव से जब से यौनानन्द के एच्छिक विकल्प आ गये हैं स्त्रीयों की यौनानन्द के लिए पुरुष पर निर्भरता कम हो गयी है ।स्त्रियों ने भी पुरुष उपलब्ध न होने पर समलैंगिकता , हस्तमैथुन , डिडलू खिलोना मैथुन जैसे यौनानन्द के विकल्प ढूंढ लिए हैं ।अब समर्थ समर्द्ध स्त्री यौनानन्द के लिए पुरुष पर पूरी तरह निर्भर नहीं है । जिससे अब हिस्टीरिया जैसा मनोरोग जो अक्सर अधिकतर कुंठित यौनानन्द भावना से पैदा होता था वह कम हो गया https://hi.quora.com

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पुरुषों की जैसे जैसे उम्र बढ़ती है, पेशाब देर से क्यों आने लगता है?

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पुरुषों की जैसे जैसे उम्र बढ़ती है, पेशाब देर से क्यों आने लगता है?https://hi.quora.com/ और थोड़ा बहुत टपकता क्यों रहता है?

पुरुषों में यूरीन टपकने की समस्या को यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस कहते हैं। आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक आयु के पुरूषों में ये समस्या देखी जाती है, पर इससे कम आयु वालों को भी ये समस्या हो सकती।

पुरुषों में यूरिनरी इनकॉन्टिनेंस होने पर ये लक्षण नजर आते हैं -

  • छींकने, खाँसने, हँसने, कुछ उठाने, पॉश्चर में बदलाव या अन्य किसी कार्य को करने पर ब्लैडर पर दबाव पड़ने पर यूरिन लीक होता है। नुकसान की तीव्रता के आधार पर यह समस्या हल्की या धीरे-धीरे यूरिन लीक हो सकता है।
  • ब्लैडर के गलत समय पर सिकुड़ने पर भी यह समस्या पैदा होती है।
  • यहां तक कि ब्लैडर में कम मात्रा में यूरिन के होने पर भी यह अहसास हो सकता है। ओवरएक्टिव ब्लैडर से यूरिन पास करने का एक मजबूत दबाव बनता है, लेकिन ओवरएक्टिव ब्लैडर वाले हर व्यक्ति का यूरिन लीकेज नहीं होता है।
  • ओवरफ्लो इनकॉन्टिनेंट का मतलब होता है कि आपके ऊपर यूरिन पास करने का दबाव बनता है, लेकिन आप सिर्फ थोड़ी मात्रा में यूरिन पास कर पाते हैं। क्योंकि आपका ब्लैडर खाली नहीं रहता है जैसा कि इसे होना चाहिए, तो यह बाद में यूरिन लीक करता है।
  • हल्की मात्रा में यूरिन का लीक होना।
  • यूरिन का कमजोर प्रवाह।
  • यूरिन पास करते वक्त तनाव होना और ब्लैडर के खाली न होने का एक अहसास होना।
  • रात में तुरंत यूरिन पास करने का अहसास होना।
  • रात में सोते वक्त यूरिन लीकेज होना।

पुरुषों की जैसे जैसे उम्र बढ़ती है, पेशाब देर से क्यों आने लगता है?

इसका कारण प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ना हो सकता है। प्रोस्टेट ग्लैण्ड को पौरुष ग्रंथि भी कहा जाता है।

प्रोस्टेट ग्लैंड ज्यादा बढ़ जाने पर कई लक्षण सामने आने लगते हैं जैसे यूरीन रूक-रूक कर आना, पेशाब करते समय दर्द या जलन और यूरीन ट्रेक्ट इन्फेक्शन बार-बार होना। प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मरीज बार-बार पेशाब करने जाता है मगर वह यूरीन पास नहीं कर पाता।

कभी-कभी ऐसा होना सामान्य होता है पर अगर बार-बार यह परेशानी होती है तो ये प्रोस्टेट ग्लैण्ड बढ़ने की संभावना हो सकती है। 50% से भी ज्यादा पुरुष 60 की उम्र में प्रोस्टेट की समस्या से परेशान होते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, यह ग्रंथि बढ़ने लगती है। इस ग्रंथि का अपने आप में बढ़ना ही हानिकारक होता है और इसे बीपीएच (बीनीग्न प्रोस्टेट हाइपरप्लेसिया) कहते हैं।

इसके बढ़ने से प्रोस्टेट कैंसर भी हो सकता है, जो पुरूषों में सर्वाधिक होने वाले कैंसर का एक प्रकार होता है।

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