रविवार, 17 जनवरी 2021
दिमाग का बैकअप लिया जा सकता है अमरता की ओर
0इंसान सदियों से गुफ़ाओं की दीवारों पर चित्र उकेरकर अपनी यादों को विस्मृत होने से बचाने की कोशिश कर रहा है.पिछले काफ़ी समय से मौखिक इतिहास, डायरी, पत्र, आत्मकथा, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म और कविता इस कोशिश में इंसान के हथियार रहे हैं.आज हम अपनी यादें बचाए रखने के लिए इंटरनेट के पेचीदा सर्वर पर - फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, जीमेल चैट, यू-ट्यूब पर भी भरोसा कर रहे हैं.ये इंसान की अमर बने रहने की चाह ही हो सकती है कि इटर्नी डॉट मी नाम की वेबसाइट तो मौत के बाद लोगों की यादों को सहेज कर ऑनलाइन रखने की पेशकश करती है.लेकिन आपको किस तरह से याद किया जाना चाहिए?
अब तो ये भी संभव है कि हमारी आने वाली पुश्तों के लिए हमारे दिमाग को संरक्षित करके रखा जा सके.मतलब ये कि यदि आपके ब्रेन को हार्ड ड्राइव पर सेव करना संभव हो, तो क्या आप ऐसा करना चाहेंगे दादी ने सहेजना बंद किया अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले, मेरी दादी ने एक फ़ैसला किया. उन्होंने 1950 के दशक से परिवार के सदस्यों के फ़ोटो, दादा को लिखे प्रेम पत्र और कई और चीज़ों को संभालकर रखा था.पर मृत्यु से कुछ महीने पहले, इन यादों को सहेजने की बजाय उन्होंने इन्हें साझा करना शुरु कर दिया. मैं जब उन्हें मिलकर आती तो मेरी कार में उनकी भीगी और पुरानी किताबें, शीशे के खाली जार, धुँधलाते पुराने फ़ोटोग्राफ्स भरे होते थे.अपने अनुभवों से भरे पत्र उन्होंने अपने बच्चों, पोते-पोतियों और मित्रों को भेज दिए. जिस रात उन्होेंने अंतिम सांस ली, उससे पहले की दोपहर को उन्होंने अपने स्वर्गीय पति के एक घनिष्ठ मित्र को डाक से एक पत्र और कुछ फ़ोटो भेजे और लिखा - “ये फ़ोटो आपके पास अवश्य होने चाहिए.” यह एक मांग थी, पर एक आग्रह भी था.आज हम अपनी यादों का संग्रहण और रक्षण पहले के मुक़ाबले कहीं ज्यादा व्यापक रूप से करते हैं.
क्या यह पर्याप्त है? हम उसे सेव करते हैं जिसे महत्वपूर्ण समझते हैं. लेकिन क्या होगा अगर हम उसे खो दें जो महत्वपूर्ण है? या, क्या होगा जब हमारे शब्दों और चित्रों के ज़रूरी संदर्भ खो जाएँ?आपके दिमाग़ की हू-ब-हू कॉपी क्या सब कुछ सेव करना कितना बेहतर होगा? न सिर्फ कुछ लिखे हुए विचारों को, बल्कि पूरे मस्तिष्क को, हर उस चीज़ को जिसे हम जानते हैं और जो हमें याद है, हमारे प्रेम-प्रसंग और दिलों का टूटना, विजयी और शर्मनाक क्षण, हमारे झूठ और सच.ये सवाल कुछ लोग हमसे जल्द पूछेंगे. ये वो इंजीनियर हैं जो ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो हमारे दिमाग़ और याददाश्त की हू-ब-हू कॉपी बनाकर रख पाएँगे.अगर वो सफल रहे, तो क्या मौत से हमारा संबंध ही हमेशा के लिए बदल जाएगा?सेन फ्रांसिस्को के एरोन सनशाइन की दादी का हाल ही में निधन हुआ. 30 वर्षीय सनशाइन कहते हैं, “मुझे ये बात खटकी कि उनके पीछे उनकी कुछ ही यादें रह गई हैं. उनकी टी-शर्ट, जो मैं कभी-कभी पहनता हूँ, उनकी संपत्ति है पर वो तो किसी भी डॉलर के नोट के समान है...”उनकी मौत ने सनशाइन को इटर्नी डॉट मी वेब सर्विस में साइनअप करने के लिए प्रेरित किया.
इस वेब सर्विस का दावा है कि ये आपकी याद को मृत्यु के बाद ऑनलाइन कायम रखेगी.जब तक आप ज़िंदा हैं तब तक आप इसे अपने फ़ेसबुक, ट्विटर और ईमेल तक पहुँचने की इजाज़त देते हैं, फ़ोटो अपलोड करते हैं और यहाँ तक कि गूगल ग्लास से उन चीजों की रिकॉर्डिंग भी दे सकते हैं जिन्हें आपने देखा है.
वो इस तरह आपके बारे में डेटा का संग्रह करते हैं, उसको फिल्टर करते हैं और फिर उस अवतार को ट्रांस्फ़र कर देते हैं जो आपके चेहरे के लुक और आपके व्यक्तित्व की नकल करता है.आपका अवतारजीते जी आप अवतार से जितनी ज़्यादा बात करते हैं, वह आपके बारे में उतना ही ज़्यादा जान पाता है. समय बीतने के साथ वह आपकी पर्सनेलिटी को अपना लेता है.इटर्नी डॉट मी के सह संस्थापकों में से एक मारियस उर्साच का कहना है, “उद्देश्य एक ‘इंटरएक्टिव लेगेसी’ तैयार करने और भविष्य में पूरी तरह भुला दिए जाने से बचना है. आपकी नाती-पोते के भी नाती-पोते आपके बारे में जानने के लिए किसी सर्च इंजन या टाइमलाइन का प्रयोग करने के बजाय इसका प्रयोग करेंगे."इटर्नी डॉट मी और इसी तरह की अन्य सेवाएं समय बीतने के साथ-साथ खो जाने वाली यादों को सहेजने का तरीका इजाद कर रहे हैं.गूगल, यूएस, ईयू, ऑक्सफ़ोर्ड...हमें डिजिटल फॉर्म में क्या रखना है और क्या छोड़ना है, इसके चुनाव में सिर खपाने से क्या ये बेहतर न हो कि मस्तिष्क की विषय वस्तु को ही पूरी तरह रिकॉर्ड कर लिया जाए?यह काम न तो विज्ञान की काल्पनिक कथा की परिधि में आता है और न ही यह अति महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक कार्य है.सैद्धान्तिक रूप से, इस प्रक्रिया की सफलता के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें जरूरी हैं.वैज्ञानिकों को सबसे पहले यह पता लगाना पड़ेगा कि मरने के बाद किसी के मस्तिष्क को बचाकर रखा जाए कि वह नष्ट न हो.दूसरा, इस मस्तिष्क में मौजूद विवरणों का विश्लेषण और उसकी रिकॉर्डिंग ज़रूरी होंगे.और अंततः इस तरह इंसानी दिमाग़ के अंदर की बातों को “कैप्चर” करने के बाद सिम्यूलेशन से इसी तरह के दिमाग़ का निर्माण.इसके लिए ज़रूरी है कि पहले एक कृतिम मानव दिमाग़ बनाया जाए. जिसमें याददाश्त के बैकअप को 'रन' किया जा सके.
यूएस ब्रेन प्रौजेक्ट, ईयू ब्रेन प्रौजेक्ट लाखों न्यूरॉन्स से दिमाग़ में होने वाली हरकतों को रिकॉर्ड कर इसके मॉडल तैयार कर रहे हैं.ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इन्स्टीच्यूट से जुड़े एंडर्स सैंडबर्ग के 2008 में लिखे शोध पत्र ने इन प्रयासों को सीढ़ी बताया है.उन्होंने कहा कि यह इंसानी मस्तिष्कका पूर्ण तरीके से अनुकरण करने की दिशा में महत्वपूर्ण है.गूगल ने ब्रेन एम्यूलेशन के क्षेत्र में ख़ासा पूँजी निवेश किया है और रे कुर्ज़वेल को गूगल ब्रेन प्रौजेक्ट का निदेशक बनाया है.वर्ष 2011 में एक रूसी उद्यमी दिमित्री इत्स्कोव ने "2045 इनिशिएटिव" शुरु किया.ये नाम रे कुर्जवेल की इस भविष्यवाणी पर आधारित था कि वर्ष 2045 में हम अपने दिमाग़ का क्लाउड तकनीक पर बैक-अप बना पाएंगे मेमोरी डंप इंसानी दिमाग़ की नकल करना एक बात है और याददाश्त का डिजिटल रिकॉर्ड बनाना दूसरी बात.यह साधारण सी प्रक्रिया उपयोगी होगी कि नहीं इस बारे में सैंडबर्ग थोड़े आशंकित हैं.
सैंडबर्ग कहते हैं, "यादें कम्यूटर में सफ़ाई से उन फाइलों की तरह स्टोर नहीं की जातीं, जिनको हम एक इंडेक्स के माध्यम से खोज सकें.एक समस्या यह भी है कि किसी व्यक्ति के दिमाग़ से उसकी याददाश्त को निकालने की प्रक्रिया को, दिमाग़ को क्षति पहुंचाए बिना कैसे अंजा सैंडबर्ग का कहना है कि दिमाग़ को क्षति पहुंचाएं बिना इसको स्कैन कर पाएँगे, इस बारे में शक़ है.पर वे इस बात से सहमत हैं कि अगर हम सिम्यूलेटिड दिमाग़ को पूरी तरह से 'रन' कर पाते हैं तो किसी व्यक्ति विशेष की यादों का डिज इसके नैतिक और नीतिगत मुद्दों पर भी ग़ौर करना पड़ेगा. जैसे वॉलाटियर्स का चुनाव, विशेषकर तब जब स्कैनिंग से शरीर को क्षति पहुँच सकती हो. नए तरह के अधिकारों की भी बात उठेगी."थिंकस्टॉक इम किसी व्यक्ति की निजता की सीमाएँ क्या हैं और उसकी विशेष यादों के स्वामित्व का मामला भी जटिल है.अपने आत्मलेख में आप अपनी किन यादों को रिकॉर्ड करना चाहते हैं इसका चुनाव आप कर सकते हैं.
अगर आपकी किन यादों तक कोई पहुँच सकता है, यह तय करने की आप में क्षमता ही नहीं है तो यह एक बहुत ही अलग तरह का मामला बन जाता है.
और फिर यह सवाल कि क्या किसी 'एम्यूलेटिड दिमाग़' को हम इंसान मान सकते हैअसमंजस कायम मैं सनशाइन से पूछता हूं कि वह क्यों अपने जीवन को इस तरह रिकॉर्ड कराना चाहते हैं"थिंकस्टॉक इमेज" वह कहते हैं, "सच पूछो तो मुझे पता नहीं है. मेरी जिंदगी के जो यादगार लम्हे हैं वो हैं दावतें, संभोग, दोस्ती का आनंद. और इनमें सब इतने क्षणिक हैं कि इनको किसी सार्थक तरीके से संरक्षित नहीं किया जा सकता सनशाइन कहते हैं, "मेरा एक मन चाहता है मेरे लिए कोई स्मारक हो और दूसरा कहता है पूरी तरह से बिना कोई निशान छोड़े गायमुझे लगता है कि हम सब इसी तरह से सोचते हैं.
शायद हम सभी यही चाहते हैं कि हमारे बारे में वो याद रखा जाए जो याद रखने लायक है. बाक़ी को छोड़ देना ही बेहतर
साभार :बीबीसी डाट काम
आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका
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जनवरी 17, 2021 in आध्यात्म, कामेच्छा की उचित भूमिका, द्वारा नियन्त्रित जीवन में
हिंदू धर्म में आद्यात्मिक काम विज्ञानं का बहुत महत्व है तंत्र विद्या जिसके जनक भगवान शिव माने जाते है पुरुष और प्रकृति के सयोग पे आधारित है सम्भोग से समाधी में जो विचार शून्यता की अनुभूति सेक्स के चरम पे होती है वही विचार शून्यता की अनुभूति समाधी में होती है धयान की ११२ विधियों में से सम्भोग से समाधी भी एक बिधि है सम्भोग के चरम में जब विचार शून्य हो जाते है स्त्री पुरुष को शिव शक्ति का स्वरुप मानकर साधना मन को एकाग्र करने के लिए की जाती है यानि ऋणात्मक शक्ति धनात्मक शक्ति एक हो जाती है जो की ब्रम्ह की अवस्था है हर कण कण में शिव और शक्ति का वास है काम सूत्र की रचना नंदी ने शिव और पार्वती के प्रणय सम्बाद पे आधारित भगवान शिव की इच्छा पे संसार के लिए किया ताकि लोगो को आध्यात्मिक काम का ज्ञान मिल सके इसी पे आधारित वात्सायन ने काम सूत्र की रचना की और चंदेल राजाओ ने खजुराहो के काम मंदिर की स्थापना की आगे चल के ओशो ने सम्भोग से समाधी का समर्थन किया और इसकी विवेचना की यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी महिमा बरवान की गयी है। परंतु आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका को अस्वीकार नहीं किया गया है। उसकी उचित मांग स्वीकार की गयी है किंतु उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देने से इंकार किया गया है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है तब यौन-आकर्षण स्व्यं ही विलीन हो जाता है; उसका निग्रह करने के लिए मनुष्य को प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वह पके फल की भाँति झड जाता है। इन विषयों में मनुष्य को अब और रूचि नहीं रह जाती। समस्या केवल तभी होती है जब मनुष्य चाहे सकारात्मक चाहे नकारात्मक रूप में कामेच्छा में तल्लीन या उससे ग्रस्त होता है।) दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य यौन चिंतन करता है व ऊर्जा का उपव्यय करता रहता है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि जब हम यौन ऊर्जा के सरंक्षण की या ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तब प्रश्न यह नहीं होता कि कामवृत्ति बुरी है या अच्छी, पाप है या पुण्य। यह तो प्रकृति की एक देन है। प्रत्येक मानव शरीर में कुछ द्रव्य होते हैं, ज्यों-ज्यों शरीर का विकास होता है वे संचित होते जाते हैं शारीरिक विकास की एक विशेष अवस्था आने पर प्रकृति जोर लगाने व दबाव डालने का तरीका काम में लेती है ताकि वे यौन द्रव्य बाहर निक्षिप्त कर दिए जांए और मानव जाति की अगली कडी (पीढ़ी) का निर्माण हो सकें। अब जो व्यक्ति प्रकृति का अतिक्रमण करना चाहता है, प्रकृति के नियम का अनुसरण करने, और प्रकृति की सुविधाजनक मंथर गति आगे बढ़ने से संतुष्ट नहीं होता वह अपनी शक्ति के संचय संरक्षण के लिए यत्नशील होता है, जिसे वह बाहर निक्षिप्त नहीं होने देता। यदि इस शक्ति की तुलना पानी से की जाए तो जब यह संचित हो जाती है तब शरीर में गरमी की, उष्णता की एक विशेष मात्रा उत्पन्न होती हैं यह उष्णता ‘तपस्’ प्रदीप्त ऊष्मा कहलाती है। वह संकल्प शक्ति को, कार्य निष्पादन की सक्रिय शक्तियों को अधिक प्रभावशाली बनाती है। शरीर में अधिक उष्णता, अधिक ऊष्मा होने से मनुष्य अधिक सक्षम बनता है, अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य संपादन कर सकता है और संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है। यदि वह दृढ़तापूर्वक इस प्रयत्न में लगा रहे, अपनी शक्ति को और भी अधिक संचित करता रहे तो धीरे-धीरे यह ऊष्मा प्रकाश में, ‘तेजस्’ में रूपांतरित हो जाती है। जब यह शक्ति प्रकाश में परिवर्तित होती है तब मस्तिष्क स्वयं प्रकाश से भर जाता है, स्मरणशक्ति बलवान हो जाती है और मानसिक शक्तियों की वृद्धि और विस्तार होता है। यदि रूपातंर की अधिक प्रारंभिक अवस्था में सक्रिय शक्ति को अधिक बल मिलता है तो प्रकाश में परिवर्तन रूपांतर की इस अवस्था में मन की, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है। इससे भी आगे शक्ति-संरक्षण की साधना से ऊष्मा और प्रकाश दोनों ही विद्युत् में, एक आंतरिक वैद्युत् शक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं जिसमें संकल्प शक्ति और मस्तिष्क दोनों की ही प्रवृद्ध क्षमताएं संयुक्त हो जाती है। दोनों ही स्तरों पर व्यक्ति को असाधारण सामथ्र्य प्राप्त हो जाती है। स्वाभाविक है कि व्यक्ति और आगे बढ़ता रहेगा और तब यह विद्युत् उस तत्व में बदल जाती है जिसे 'ओजस्' कहते हैं। ओजस् अस आद्या सूक्ष्म ऊर्जा ‘सर्जक ऊर्जा’ के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द है जो भौतिक सृष्टि की रचना से पूर्व वायुमडंल में विद्यमान होती है। व्यक्ति इस सूक्ष्म शक्ति को जो एक सृजनात्मक शक्ति है, प्राप्त कर लेता है और वह शक्ति उसे सृजन की व निर्माण की यह असाधारण क्षमता प्रदान करती है। यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी महिमा बरवान की गयी है। परंतु आध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका को अस्वीकार नहीं किया गया है। उसकी उचित मांग स्वीकार की गयी है किंतु उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देने से इंकार किया गया है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है तब यौन-आकर्षण स्व्यं ही विलीन हो जाता है; उसका निग्रह करने के लिए मनुष्य को प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वह पके फल की भाँति झड जाता है। इन विषयों में मनुष्य को अब और रूचि नहीं रह जाती। समस्या केवल तभी होती है जब मनुष्य चाहे सकारात्मक चाहे नकारात्मक रूप में कामेच्छा में तल्लीन या उससे ग्रस्त होता है।) दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य यौन चिंतन करता है व ऊर्जा का उपव्यय करता रहता है।इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि जब हम यौन ऊर्जा के सरंक्षण की या ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तब प्रश्न यह नहीं होता कि कामवृत्ति बुरी है या अच्छी, पाप है या पुण्य। यह तो प्रकृति की एक देन है। प्रत्येक मानव शरीर में कुछ द्रव्य होते हैं, ज्यों-ज्यों शरीर का विकास होता है वे संचित होते जाते हैं शारीरिक विकास की एक विशेष अवस्था आने पर प्रकृति जोर लगाने व दबाव डालने का तरीका काम में लेती है ताकि वे यौन द्रव्य बाहर निक्षिप्त कर दिए जांए और मानव जाति की अगली कडी (पीढ़ी) का निर्माण हो सकें। अब जो व्यक्ति प्रकृति का अतिक्रमण करना चाहता है, प्रकृति के नियम का अनुसरण करने, और प्रकृति की सुविधाजनक मंथर गति आगे बढ़ने से संतुष्ट नहीं होता वह अपनी शक्ति के संचय संरक्षण के लिए यत्नशील होता है, जिसे वह बाहर निक्षिप्त नहीं होने देता। यदि इस शक्ति की तुलना पानी से की जाए तो जब यह संचित हो जाती है तब शरीर में गरमी की, उष्णता की एक विशेष मात्रा उत्पन्न होती हैं यह उष्णता ‘तपस्’ प्रदीप्त ऊष्मा कहलाती है। वह संकल्प शक्ति को, कार्य निष्पादन की सक्रिय शक्तियों को अधिक प्रभावशाली बनाती है। शरीर में अधिक उष्णता, अधिक ऊष्मा होने से मनुष्य अधिक सक्षम बनता है, अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य संपादन कर सकता है और संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है। यदि वह दृढ़तापूर्वक इस प्रयत्न में लगा रहे, अपनी शक्ति को और भी अधिक संचित करता रहे तो धीरे-धीरे यह ऊष्मा प्रकाश में, ‘तेजस्’ में रूपांतरित हो जाती है। जब यह शक्ति प्रकाश में परिवर्तित होती है तब मस्तिष्क स्वयं प्रकाश से भर जाता है, स्मरणशक्ति बलवान हो जाती है और मानसिक शक्तियों की वृद्धि और विस्तार होता है। यदि रूपातंर की अधिक प्रारंभिक अवस्था में सक्रिय शक्ति को अधिक बल मिलता है तो प्रकाश में परिवर्तन रूपांतर की इस अवस्था में मन की, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है। इससे भी आगे शक्ति-संरक्षण की साधना से ऊष्मा और प्रकाश दोनों ही विद्युत् में, एक आंतरिक वैद्युत् शक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं जिसमें संकल्प शक्ति और मस्तिष्क दोनों की ही प्रवृद्ध क्षमताएं संयुक्त हो जाती है। दोनों ही स्तरों पर व्यक्ति को असाधारण सामथ्र्य प्राप्त हो जाती है। स्वाभाविक है कि व्यक्ति और आगे बढ़ता रहेगा और तब यह विद्युत् उस तत्व में बदल जाती है जिसे 'ओजस्' कहते हैं। ओजस् अस आद्या सूक्ष्म ऊर्जा ‘सर्जक ऊर्जा’ के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द है जो भौतिक सृष्टि की रचना से पूर्व वायुमडंल में विद्यमान होती है। व्यक्ति इस सूक्ष्म शक्ति को जो एक सृजनात्मक शक्ति है, प्राप्त कर लेता है और वह शक्ति उसे सृजन की व निर्माण की यह असाधारण क्षमता प्रदान करती है। (सुंदर जीवन, माधव पण्डित पाण्डिचरी) स्रोत speakingtree.in
शादीशुदा पुरुष किशमिश के साथ करें इस 1 चीज का सेवन, होते हैं ये जबर्दस्त 6 फायदे
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जनवरी 17, 2021 in किशमिश क, शादीशुदा पुरुष
किशमिश के फायदे के बारे में आपने पहले भी जरूर पढ़ा होगा लेकिन यहां पर वैज्ञानिक रिसर्च पर आधारित कुछ ऐसे बेहतरीन फैक्ट बताए जा रहे हैं जो शादीशुदा पुरुषों की जिंदगी को खुशनुमा बना सकते हमारे घर में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद होते हैं जिनका हम किसी विशेष पकवान के जरिए ही सेवन करते हैं। इन्हीं में से एक ऐसा ही खाद्य पदार्थ किशमिश है जो ड्राई फ्रूट की श्रेणी में आता है। इसका सेवन आमतौर पर लोग दूध के साथ ज्यादा करते हैं। जबकि शादीशुदा पुरुषों के द्वारा अगर किशमिश का सेवन एक अन्य फूड के साथ किया जाए तो यह बेहतरीन और जबर्दस्त फायदे पहुंचा सकता है। देखा जाए तो ज्यादातर घरों में यह चीज हमेशा मौजूद रहती है और लोग उसे अलग-अलग तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं।आइए अब सबसे पहले यह जानते हैं कि किशमिश का किस चीज के साथ सेवन करना है जिससे शादीशुदा पुरुषों को बेहतरीन फायदे मिल सकते हैं।: शादीशुदा पुरुष किशमिश के साथ करें इस 1 चीज का सेवन, होते हैं ये जबर्दस्त 6 फायदे" किशमिश के साथ शहद का सेवन किया जाए तो शादीशुदा पुरुषों को बेहतरीन फायदा मिल सकता है। इसके वैज्ञानिक कारण को अगर समझने की कोशिश की जाए तो यह और भी आसान हो जाएगा। दरअसल, किशमिश और शहद दोनों ही टेस्टोस्टोरोन बूस्टिंग फूड्स की श्रेणी में गिने जाते हैं। यह एक ऐसा हार्मोन है जो पुरुषों की सेक्सुअल समस्याओं को दूर करने और उनकी विभिन्न शारीरिक समस्याओं को दूर करने के लिए प्रभावी रूप से कार्य करता है। इसी गुण के कारण यह शादीशुदा पुरुषों के लिए और भी बेहतरीन साबित हो जाता है ऑफिस का वर्क लोड और कई सारी जिम्मेदारियां कुछ पुरुषों पर भारी पड़ जाती है। इसका असर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बढ़ता है बल्कि पौरुष शक्ति कमजोर हो जाने के कारण रोमांटिक लाइफ में भी खलल बढ़ जाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए शहद और किशमिश के साथ आप चाहे तो दूध का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। एक हफ्ते तक लगातार इसका सेवन करने के बाद आपको खुद ही इससे होने वाले फायदे को महसूस करने लगेंगे। स्पर्म काउंट को बढ़ाने में जिन पुरुषों को लो स्पर्म काउंट की शिकायत है उन्हें सबसे पहले अल्कोहल और स्मोकिंग को पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। इसके बाद उन्हें अपने खाने पीने पर विशेष ध्यान देने की भी जरूरत होती है। वहीं, शहद और किशमिश का एक साथ किया गया सेवन प्रभावी रूप से स्पर्म काउंट को बढ़ाने में सक्रियरूप से अपना असर दिखाता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी लेकिन यह सच है कि इसकी कई प्रकार की क्वालिटी भी होती है। पतला स्पर्म मोटेलिटी की क्रिया में काफी धीमा होता है और इससे प्रजनन क्षमता पर भी विपरीत असर पड़ सकता है। जबकि शहद और किशमिश में ऐसे विशेष औषधीय गुण पाए जाते हैं जो स्पर्म की क्वालिटी को बेहतरीन बनाने में प्रभावी रूप से मददगार हो सकते हैं।पुरुषों को प्रोस्टेट कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है और इसकी चपेट में कई सारे लोग आ भी जाते हैं। जबकि वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार शहद और किशमिश दोनों में एंटी कैंसर गुण पाया जाता है। एंटी कैंसर गुण शरीर के किसी भी अंग में कैंसर सेल्स को विकसित होने से रोकती हैं और आपको कैंसर की चपेट में आने से बचाए भी रख सकती हैं। इस कैंसर से बचने के लिए भी आपको किशमिश और शहद के फायदे काफी लाभ पहुंचा सकते हैं।शरीर के विभिन्न अंगों का विकास होना बहुत जरूरी है। मांसपेशियों और कोशिकाओं के निर्माण के लिए हमें बेहद जरूरी और पावरफुल पौष्टिक तत्वों की जरूरत होती है। सेहतमंद बने रहने के लिए शहद और किशमिश का सेवन काफी लंबे समय से किया जा रहा है। जबकि इनमें मौजूद टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बूस्टिंग का गुण शारीरिक विकास को बढ़ावा देने में भी विशेष रूप से सहयोग प्रदान कर सकता है ब्लड प्रेशर की समस्या महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को ज्यादा परेशान करती है और यह उनकी दिनचर्या में शामिल खराब आदत व खानपान पर ठीक तरह से ध्यान न देने के कारण भी होता है। इससे बचे रहने के लिए शहद और किशमिश में मैग्नीशियम की मात्रा पाई जाती है जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में बेहतरीन पोषक तत्व की भूमिका निभाती है। आप इसे नियमित रूप से भी अपनी डायट में शामिल कर सकते हैं।
साभार नवभारत टाइम्स
शनिवार, 16 जनवरी 2021
कत्युर_राजवंश (पाल सूर्यवंशी )
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जनवरी 16, 2021 in (पाल सूर्यवंशी ), कत्युर_राजवंश
#कत्युर_राजवंश (पाल सूर्यवंशी )आज आपको उत्तराखंड के सबसे पुराने राजवंश से अवगत करवाते है ।उत्तराखंड पर आज तक कत्यूरियो के अतिरिक्त कोई भी राजवंश एकछत्र राज नही कर पाया चाहे गढ़वाल का परमार राजवंश हो या चंद राजवंश ।उत्तराखंड का सबसे पुराना राजवंश है ।कत्यूरियो के राज स्थापना के बारे मैं अलग अलग राय है ईसा के 2500 पूर्व से 7वी सदी तक इनका शासन एक छत्र रहा । उसके बाद चंद राजाओं ने इनके शासन का अंत किया ।इनकी राजधानी अस्कोट है कहा जाता है एक समय वह अस्सी कोट थे इस वजह से अस्कोट नाम भी पड़ा जो अब भी पिथोरागढ़ जिले में है ।कत्युरी प्राचीन सूर्यवंशी राजपूत माने जाते है शालिवाहन देव इनके मूल पुरुष है जो अयोध्या से आकर यहाँ अपना साम्राज्य बनाया ।
इनके राज्य का विस्तार पूर्व में सिक्किम से पश्चिम में काबुल तक था बंगाल में मिले शिलालेखो इनके शिलालेखों से मिलते है जिस से इनके राज्य के विस्तार के संभावना बनती है । कुछ शिलालेख बिहार के मुंगेर और भागलपुर से भी मिले है जो वैसे ही है जैसे शिलालेख कत्यूरियो के है एकमात्र सूर्य मंदिर जो उत्तराखंड में है वो कत्युरी राजाओ का ही बनाया हुआ है इसके आलावा अस्कोट का किला भी इन्होने ही बनवाया और भी कई किलो का निर्माण कराया नौले बनवाए शिव मंदिर बनवाये ।इस से राज्य विस्तार की उड़ीसा और बिहार तक होने की सम्भावनाये है । इसमें कोई संदेह नही की ये प्रतापी राजा हुए है । 13वी शताब्दी में इनकी एक शाखा भारी सेना लेकर नए राज्य स्थापना को अलखदेव और तिलकदेव के नेतृतव में गोंडा बस्ती गोरखपुर की और आई और अपना नया राज्य बसाया जो की महासु स्टेट के नाम से आज भी स्थित है जो की बस्ती जिला उत्तरप्रदेश में है ।चन्द राजाओ के आअने के बाद इनका राज्य छिन भिन्न हो गया कई जगहों से चंदो ने इनको निकाल भगाया कई जगहों पर ये चंदो के अधीन छोटे मोटे जमींदार या प्रशासक बन गये ।राजघराने के लोग अब रजबार कहलाते है
रजबार मल्ल ,शाही,बम,मनराल, कड़ाकोटि,कैंतुरा गुसाई आदि शाखाओ में बंट गये
शाही --अर्जुनदेव के वंशज ।
चोकोट के रजबार -किशनदेव के वंशज ।
मनराल -लाडदेव के वंशज ।
डोटी के मल्ल - नागमल्ल के वंशज ।
कुछ लोग गुसाई पदवी का प्रयोग सरनेम की तरह करते है ।
चोकोट में इनकी कुलदेवी का मन्दिर है
कुछ लोग मनिला देवी को भी इनकी कुलदेवी कहते है जो सल्ट पट्टी अल्मोड़ा मे है ।
यधपि पोस्ट में सभी जानकारिया जांच परख कर तथ्यों को देखते हुए दी गयी है यदि कुछ जानकारी पर संदेह हो तो कमेंट में तथ्यों के साथ बताये ।
https://palrajvancehariharpur.blogspot.com
कत्यूरी राजवंश: उत्तराखण्ड का शक्तिशाली साम्राज्य
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जनवरी 16, 2021 in उत्तराखण्ड का शक्तिशाली साम्राज्य, कत्यूरी राजवंश:
>कत्यूरी राजवंश ने उत्तराखण्ड पर लगभग तीन शताब्दियों तक एकछत्र राज किया. कत्यूरी राजवंश की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने अजेय मानी जाने वाली मगध की विजयवाहिनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. (Katyuri Dynasty of Uttarakhand)
कत्यूरी राजवंश की पृष्ठभूमि, प्रवर्तक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में उभरने का कोई प्रमाणिक लेखा-जोखा नहीं मिलता है. यह इतिहासकारों के लिए अभी शोध का विषय ही है. इस सम्बन्ध में मिलने वाले अभिलेखों से कत्यूरी शासकों का परिचय तो मिलता है लेकिन इसके काल निर्धारण में सहायता नहीं करते. इसी वजह से कत्यूरी शासन के कालखंड को लेकर इतिहासकारों में मतभेद बने हुए हैं.
कहा जाता है कि कत्यूरी शासक अयोध्या के सूर्यवंशियों के वंशज थे, हालाँकि इसका भी सुस्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. कत्यूरों ने स्थानीय खश शासकों को पराजित करके यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया था.
इतिहासकारों का मानना है कि इसके प्रथम शासक प्रतापी राजा ललित सूरदेव हुए. ललित सूरदेव से लेकर वीरदेव तक कत्यूरों की 13 पीढ़ियों ने उत्तराखण्ड में शासन किया, हालाँकि इसका क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता.
माना जाता है कि कत्यूरी शासन का आरंभ 850 ई. के लगभग हुआ, जो कि 1015 तक रहा. लेकिन समुद्रगुप्त (335 से 375 ई.) के मंत्री हरिषेणकृत प्रयाग स्तम्भ पर उत्कीर्ण प्रशस्ति के अनुसार कर्तिकेयपुर का राज्य अन्य सीमावर्ती राज्यों से समृद्ध राज्य था. इसके अवशेष आज भी बैजनाथ में रणचूलाकोट, तैलिहाट, सेलिहाट में देखे जा सकते हैं.
कत्यूरी साम्राज्य का विस्तार पूर्व में डोटी से लेकर पश्चिम में यमुना तक तथा उत्तर में मानसरोवर से दक्षिण में रूहेलखंड तक हुआ करता था.
कत्यूरी शासनकाल में कलाकौशल के क्षेत्र में भारी तरक्की हुई. इस दौरान कई भव्य मंदिरों, मूर्तियों तथा उत्कृष्ट शिल्प वाले भवनों का निर्माण हुआ. (Katyuri Dynasty of Uttarakhand)
कत्यूरी साम्राज्य का प्रशासनिक ढांचा गणतांत्रिक हुआ करता था. इसका संचालन 18 सदस्यों वाली ‘अधिष्ठान’ द्वारा किया जाता था. उत्तरवर्ती काल में इसकी जगह ‘रजबार अधिष्ठान’ ने ले ली, जिसे 12 राजाओं की सभा भी कहा जाता था.
इतिहासकारों के अनुसार कत्यूरों की राजधानी मूलतः जोशीमठ में हुआ करती थी, जिसे ब्रह्मपुर नाम से पहचाना जाता था. राजा असन्तिदेव के समय में इसे कत्यूर (बैजनाथ) में स्थानांतरित कर दिया गया.
अटकिंसन ने अस्कोट, डोटी, पालीपछाऊँ से प्राप्त गुरुपादुका नामक पुस्तक के आधार पर एक चौथी वंशावली का भी वर्णन किया है. इसे अन्य तीनों की अपेक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसमें वंशावली के अलावा कई राज कर्मचारियों के अलावा महत्वपूर्ण राजनीतिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन भी मिलता है. इसके अनुसार जोशीमठ से शासन करने वाले कत्यूरी शासक थे— 1. अग्निराय, 2. फेलाराय, 3. सुबतीराय, 4. केशवराय, 5. बगड़राय, 6. आसन्तीराय, 7. वासन्तीराय, 8. गोरारे, 9. श्यामलराय, 10. इलणा देव, 11. प्रितमदेव, 12. धामदेव.
प्रख्यात इतिहासकार मदनचन्द्र भट्ट के अनुसार के अनुसार कट कत्यूरी युग 1200 से 1545 ई. तक माना जा सकता है. इस समय कत्यूरी शासन की राजधानी रणचूलाकोट में थी. इसी के पश्चिम में 2 राजधानियां वैराट (चौखुटिया और लखनपुर) थी तथा पूर्व में हाटथर्प (डीडीहाट) और ऊकू (नेपाल) थीं.
रामायण प्रदीप के अनुसार देवलगढ़ का राजा अजयपाल (1500 से 1548 ई.) कत्यूरियों का सोने का सिंहासन छीनकर श्रीनगर ले गया था. अतः कत्यूरी राज्य का पतन अजयपाल के अभुदय के बाद ही हुआ.
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विज्ञान और अध्यात्म
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जनवरी 16, 2021 in अध्यात्म, विज्ञान और
विज्ञान का सफर आदि काल से शुरू हो गया था | जब मनुष्य कृषि और पत्थर के औंजारो का प्रयोग किया विज्ञान ने जहा हमे तकनीको के द्वार खोल कर जीवन को सरल एवं सुगम्य बनाया है परंतु अध्यात्म के विना जीवन मे शांती नहीं मिल सकती कही ना कही विज्ञान और अध्यात्म एक हो जाते है आगे देखे कैसे तकनीक ने हमारा जीवन आसान कर दिया है
विज्ञान और आत्मा
इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है।
वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी।
अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांड का अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है।
हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है।
हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है | ईश्वर को अनन्त माना गया है , और उसकी लीलाओ को अनन्त कहा गया है | धर्म के अनुसार ईश्वर का वास हर कण मे है और उसकी माया अनन्त है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है | उन्होने अपनी पिछली पुस्तक “द एम्पर्स न्यू माएंड ” मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब ” साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स ” मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है |आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक ‘एओन ‘ या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है | भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है तो क्या वैज्ञानिक कही ना कही ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे
क्या इस ब्रह्मांड में हमारे सिवा भी कोई और है
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जनवरी 16, 2021 in क्या इस, ब्रह्मांड, में हमारे, सिवा भी कोई और है
गुजरे वर्ष में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया तथा कार्नेजी इंस्टिट्यूट ऑफ़ वाशिंगटन से संबंध का गोल विद के एक दल को एक जीवन अनुकूल ग्रह की खोज करने में सफलता मिली जिसे ग्लास 510 नाम दिया गया है हालांकि अब तक सौरमंडल के बाहर सैकड़ों ग्रहों की को खोजा जा चुका है लेकिन इस नए खोजे गए ग्रह के बारे में यह कहा जा रहा है कि जीवन के पनपने योग्य तमाम परिस्थितियों की दृष्टि से यह सर्वाधिक अनुकूल है ग्लास 581 ग्रह का मूल तारा है लाइफ 581 जो एक लाल बोना तारा है यह ग्रह 37 दिन में अपने मूल तारीख की एक प्रतिमा पूरी करता है गौर मतलब है कि लाइफ 581 की ग्रह मालिका प्लेनेटरी सिस्टम में भी और भी ग्रह पाए गए हैं लेकिन ग्लास 581 जी को ही जीवन के अनुकूल पाया गया है हवाई स्थित टेलीस्कोप की मदद से लगातार 11 वर्षों के परीक्षण के बाद लाइफ 58 15 मालिका में आईसीटी ग्रह की खोज करने में सफलता मिली पृथ्वी से 20 प्रकाश वर्ष की दूरी पर तुला तारामंडल में स्थित यह ग्रह पृथ्वी से 3 गुना बड़ा है लेकिन इसका ग्रुप टेबल पृथ्वी के मुकाबले कहीं कम है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसंधानकर्ताओं को बीते वर्ष में कैलीफोर्निया की एक झील में arsanik पर पलटने वाले जीवाणुओं यानी बैटरी या की एक प्रजाति की खोज करने में सफलता मिली सौरमंडल से बाहर जीवन अनुकूल ग्रह की खोज के साथ बैक्टीरिया की इस नई प्रजाति की खोज में फिर से इस तथ्य को रेखांकित किया है कि दुर्गम से दुर्गम और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन पनप सकता है तो क्या इस ब्रह्मांड में हम अकेले नहीं यानी हमारे सिवा भी कोई और है
इस डिवाइस के आते ही बदल जाएगा सेक्स लाइफ
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जनवरी 16, 2021 in इस डिवाइस के आते ही बदल जाएगा सेक्स लाइफ
वायग्रा और सेक्स पिल्स के साइड इफेक्ट को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इन दिनों एक ऐसा डिवाइस बनाया है जो सेक्स लाइफ को लंबे समय तक स्पाइसी बनाए रखता है। वैज्ञानिक इन दिनों एक ऐसे डिवाइस पर काम कर रहे हैं जिसे दिमाग में फिट किया जा सकेगा और इससे सेक्स का आनंद कई गुना बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों ने इसका नाम सेक्स चिप रखा है। प्रयोग के तौर पर वैज्ञानिकों ने इस चिप को एक ऐसे महिला के दिमाग में इंप्लांट कर दिया जिसे सेक्स में कोई इंटरेस्ट नही था। मगर इस चिप के इंप्लांट के बाद उसकी सेक्स रिलेटेड इच्छाएं तेजी से बढ़ गईं। बाद में इस चिप को निकाल दिया गया, क्योंकि वह सामान्य लाइफ और सेक्स लाइफ के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रही थीं। ऑक्सफर्ड में जॉन रेडक्लिफ हॉस्पिटल के प्रोफेसर टीपू अजीज का कहना है कि सेक्स चिप 10 सालों के भीतर एक सचाई बन सकती है। उनका कहना है कि इस चिप की सफलता के सबूत भी हैं। उनका कहना है कि यह तकनीक वायरलेस होगी और सेल्फ पावर्ड ब्रेन चिप्स के सहारे चले sabhar baskar.com
गुरुवार, 14 जनवरी 2021
दिल की धड़कन से चलेंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण
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जनवरी 14, 2021 in दिल. की धड़कन. से चलेंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण
चीन के वैज्ञानिक एक ऐसी सुरक्षा तकनीक विकसित कर रहे हैं जिसमें दिल की धड़कन की मदद से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को संचालित किया जा सकेगा ताइवान के टाइम है है सिंह यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि हर एक इंसान का दिल अलग तरीके से धड़कता है वैज्ञानिकों का कहना है जब तक व्यक्ति जीवित रहता है उसके दिल की धड़कन ए चालू रहती है ऐसे में धड़कनों को करती है प्रणाली में बदलकर कंप्यूटर सुरक्षा तकनीकी हथियार के रूप में विकसित किया जा सकता है दिल अलग तरीके से धड़कने के कारण हर एक व्यक्ति का की दिल की धड़कन का इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम संकेत भी अलग होता है वास्तव में किन्ही दो व्यक्तियों को इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम संकेत एक जैसे नहीं होते इसी विशेषता को नए बायोमेट्रिक हथियार के रूप में विकसित किया जा रहा है प्रमुख शोधकर्ता सुन लिया मैंने कहा है कि इस तकनीकी योग्यता जांचने के लिए हमने 2 लोगों के ; इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम अर्थात ईसीजी संकेतों को उनकी हथेलियों के माध्यम से प्राप्त किया फिर उन्हें गणितीय आंकड़ों में परिवर्तित किया लिन ने कहा हमने पाया कि इन आंकड़ों का इस्तेमाल पासवर्ड के रूप में किया जा सकता है उनका दावा है कि यह अन्य प्राणियों के मुकाबले कहीं अधिक सुरक्षित है अब तक बायोमेट्रिक पहचान सुनिश्चित करने के लिए उंगलियों के निशान आंखों की पुतली का इस्तेमाल होता था इसके बावजूद लोग तस्वीर में से इसे धावली करते हुए पाए गए लेकिन इस तकनीकी में हथेलियों से रिकॉर्ड की गई है दोनों को एक बार करने के बाद हमेशा पासवर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है इसमें धोखाधड़ी किए जाने की आशंका नहीं होगी
कुत्ते से हुआ प्यार, साइंस की छात्रा ने कर दी सारी हदें पार!
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जनवरी 14, 2021 in
अहमदाबाद।शहर के पॉश इलाके में रहने वाली और साइंस (कक्षा 12वीं) की एक छात्रा का एक अजीबो-गरीब मामला सामने आया है। छात्रा को अपने घर पर पले कुत्ते से इस कदर
प्यार हो गया कि अब वह उसे अपना ब्वॉयफ्रेंड मानने लगी है। छात्रा कुत्ते को लेकर सारी हदें पार कर चुकी है। बताया जाता है कि छात्रा के कमरे से उसके परिजनों को अश्लील साहित्य भी मिले हैं। मजबूरीवश अब परिजनों को मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी है। लगभग 5 वर्ष पहले छात्रा के पिता जर्मन शैफर्ड ब्रीड के एक कुत्ते को घर लाए थे। जैसे-जैसे कुत्ता बड़ा होता गया, छात्रा का उससे प्रेम उतना ही बढ़ता गया। अब तो स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि छात्रा रात-दिन कुत्ते के साथ ही रहती थी और उसे कुत्ते से एक पल के लिए भी दूर रहना पसंद नहीं। कुत्ते को लेकर छात्रा का पागलपन इस कदर बढ़ चुका था कि यह बात उसकी सहेलियों तक को पता थी। इन्हीं में से एक सहेली ने यह बात परिजनों बता दी, तब जाकर इस मामले का खुलासा हुआ। पिता ने यह बात सुनते ही कुत्ते को एक स्वैच्छिक संस्था को सौंप दिया। लेकिन छात्रा कुत्ते के प्यार में इस कदर पागल थी कि उसने परिजनों को धमकी दे दी कि अगर कुत्ते को वापस नहीं लाया गया तो वह आत्महत्या कर लेगी। इकलौती बेटी की इस हरकत से परिजन भी घबरा गए और कुत्ते को घर वापस ले आए। परिजन कुत्ते को वापस तो ले आए लेकिन अब उन्होंने कुत्ते को एक पिंजरे में रखना शुरू कर दिया है और उसकी देखभाल के लिए एक वॉचमैन भी रखना पड़ा है।इधर, कुत्ते से अलग रहने पर छात्रा की मानसिक हालत बिगड़ गई और वह डिप्रेशन में चली गई। अन्य चिकित्सकों की सलाह पर पिता ने उसे शहर के जाने-माने मनोचिकित्सक को दिखाया है।
छात्रा के कमरे से मिले अश्लील साहित्य: पुत्री के कुत्ते से इस कदर प्रेम के चलते परिजनों ने जब उसके कमरे और सामानों की तलाशी ली तो काफी मात्रा में अश्लील साहित्य भी बरामद हुआ है।
यह बीमारी ‘जूफिलिया’ कहलाती है: चिकित्सीय भाषा में इस बीमारी को जूफिलिया (जानवरों से अत्यधिक प्रेम व संभोग की स्थिति) कहा जाता है। इसकी शुरुआत ‘अनकंडिशन लव’ के रूप में होती है जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए अंत तक ‘अनकंडिशनल फिजिकलिटी’ में बदल जाती है। पशु के प्रति बढ़ता प्रेम, संभोग तक पहुंच जाता है, जिसे ‘सैक्सुअल परवरजन’ भी कहा जाता है। विज्ञान में इस समस्या का निदान सिर्फ मनोवैज्ञानिक तरीके से ही संभव है।
sabhar : http://rashtriyaujala.com
विशिष्ट गुणों वाली जीएम फसलों का विकास
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जनवरी 14, 2021 in विशिष्ट. गुणों वाली .जीएम फसलों का विकास
आईसीएआर और दिल्ली विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विशिष्ट गुणों वाली जीएम फसलों का विकास किया है फसलों में विभिन्न रोगों की रोकथाम में जीन संपादन द्वारा सफलता प्राप्त करने के बाद वैज्ञानिक अब सूखा
चार पाला और लवण रोड़ी फसलों के विकास के साथ ही खनिज संपदा से भरपूर प्रजातियों के विकास के लिए कार्य कर रहे हैं भारत में सूखा रोधी धान और सरसों की किस्मों पर जीनों के फेरबदल के प्रयोग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और दिल्ली विश्वविद्यालय में किए जा रहे हैं पूसा में डीएम चोपड़ा और उनकी टीम ने सरसों की जय किसान नामक प्रजाति का विकास सोमैक्लोनल वेरिएशन तकनीक
से किया सरसों की फसल सुखा रोटी और अगेती होने के कारण किसानों द्वारा पसंद की गई इसी प्रकार चेन्नई के एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाऊंडेशन की प्रयोगशाला में समुद्र के खारे पानी को चाहने वाले जीन को समुद्री maigro tree से अलग करके तंबाकू में सफलतापूर्वक प्रवेश किया गया अब उसे paddy में प्रविष्ट करा दिया गया है इस प्रकार समुद्र के खारे पानी से धान पैदा होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं भारत में कोल्ड स्टोरेज कोल्ड चीन की सुविधा की कमी और अनियमित बिजली आपूर्ति के कारण फल फूल और सब्जियों को अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता ऐसी स्थिति में यदि जिलों के फेरबदल से इन फसलों को अधिक देर तक टिकाऊ ताजा और सुरक्षित बना दिया जाए तो किसानों के साथ-साथ वक्ताओं को भी लाभ होगा वैज्ञानिक इस दिशा में कार्य कर रहे हैं स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने रॉकफेलर प्रतिष्ठान की सहायता से धान की गोल्डन राइस किस्म को विकसित किया है इसमें विटामिन ए पैदा करने वाला जीन डाला गया है फिलीपींस स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने अधिक लोहे और जस्टिस से युक्त धान के बीजों का विकास किया है यह बी एनीमिया से ग्रस्त बच्चों और महिलाओं के लिए वरदान सिद्ध होगा जीएम फसलों के उत्पादन बढ़ाया जा सकता है वैज्ञानिक शोध पर आधारित विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि विकासशील देशों में जीएम तकनीक से प्रायः सभी फसलों का उत्पादन 25% बढ़ाया जा सकता है चीन के किसानों ने 1997 से बीटी कपास हुआ कर कपास उत्पादन लागत को 8% कम किया है दुनिया में एक तिहाई सिंचित क्षेत्र सिर्फ इस लिए खेती के लिए अनुपयुक्त हो गया है क्योंकि वहां की जमीन छारीय हो चुकी है ऐसी जमीन पर जीएम फसलों को उगाया जा सकता है यह फसलें सूखे को भी काफी हद तक सहन करने के योग्य होती हैं सबसे बड़ी बात है कि हम जीएम फसलों को पूर्णता कृतिम वातावरण में उगने लायक बना सकते हैं
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