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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

पता चल गया, शरीर में आत्मा आखिर कहां रहती है

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तो मृत्यु जैसा अनुभव होता है

तो मृत्यु जैसा अनुभव होता है


मृत्यु को बहुत करीब से महसूस करने वाले लोगों के अनुभव सुनकर विज्ञान फिलहाल इस नतीजे पर पहुंचा है कि आत्मा या जीवन का केंद्र मस्तिष्क के उस स्थान पर है रहता है जहां योग की भाषा में सहस्रार चक्र है।

यह चक्र सिर में उस जगह बताया जाता है, जहां लोग चोटी या शिखा रखते हैं। इस अध्ययन के मुताबिक तंत्रिका प्रणाली से जब आत्मा का आभास कराने वाला क्वांटम पदार्थ कम होने लगता है तो मृत्यु जैसा अनुभव होता है।

दूसरे जन्म के लिए ब्रह्मांड में लीन  हो जाती है

दूसरे जन्म के लिए ब्रह्मांड में लीन हो जाती है

शास्त्रीय मान्यता के अऩुसार भी आत्मा मूलतः मस्तिष्क में निवास करती है। मृत्यु के बाद यहां से निकलकर दूसरे जन्म के लिए ब्रह्मांड में लीन हो जाती है, जैसे भीड़ में खो गई हो।

एरिजोना विश्वविद्यालय में एनेस्थिसियोलॉजी और मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एमरेटस और वहीं रिसर्च विभाग निदेशक डॉ. स्टुवर्ट हेमेराफ के मुताबिक आत्मा के केंद्र का यह निष्कर्ष उस क्वांटम सिद्धांत की भी पुष्टि करता है, जो ब्रिटिश मनोविज्ञानी सर रोजर पेनरोस ने निरूपित किया है।

कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में आत्मा

कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में आत्मा

माना जाता है कि मस्तिष्क में क्वांटम कंप्यूटर के लिए चेतना एक प्रोग्राम की तरह काम करती है। यह ब्रह्मांड में परिव्याप्त रहती है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे 'माइथाट्युब्स' कहते हैं।

दोनों वैज्ञानिकों ने तर्क दिया कि 'माइथाट्युब्स' पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण के कारण हमें चेतना का अनुभव होता है। इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है।
काल के जन्म से ही व्याप्त थी आत्मा

काल के जन्म से ही व्याप्त थी आत्मा

इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी।

भारत में सदियों से पारंपरिक रूप से यह माना जाता रहा है कि आत्मा का अस्तित्व होता है और श्राद्ध पक्ष में उनका आह्वान भी किया जाता है। sabhar : http://www.amarujala.com/

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गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

यूरी गगारिन ने कहा था : 'उड़नतश्तरियाँ सचमुच होती हैं'

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यूरी गगारिन ने कहा था : 'उड़नतश्तरियाँ सचमुच होती हैं'

12  अप्रैल 1961 को सोवियत संघ के नागरिक, सोवियत वायुसेना में मेजर यूरी गगारिन ने मानव इतिहास में

12  अप्रैल 1961 को सोवियत संघ के नागरिक, सोवियत वायुसेना में मेजर यूरी गगारिन ने मानव इतिहास में पहली बार 'वस्तोक-1' नामक अन्तरिक्ष यान में सवार होकर पृथ्वी की निकटतम परिधि  पर अंतरिक्ष की यात्रा की थी।
आज ऐसा लगता है मानो हम यूरी गगारिन की उस पहली उड़ान के बारे में सब कुछ जानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। एक विषय ऐसा है, जिसकी औपचारिक सूचना साधनों ने अक्सर उपेक्षा की है। यह विषय है —  उड़नतश्तरियाँ। जबकि यूरी गगारिन ने अपने संस्मरणों में लिखा है — 'उड़नतश्तरियाँ  एक वास्तविकता हैं। अगर आप मुझे इज़ाजत देंगे तो मैं उनके बारे में और भी बहुत-कुछ बता सकता हूँ।'
यह वाक्य सचमुच आश्चर्यजनक है क्योंकि तब, आज से चालीस-पचास साल पहले, सोवियत संघ में उड़नतश्तरियों के बारे में अंतरिक्ष यात्रियों और पत्रकारों को कुछ भी कहने या बताने की छूट नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद उड़नतश्तरियों के साथ विभिन्न अंतरिक्ष-यात्रियों की मुलाक़ातों के बारे में बहुत-सी सामग्री इकट्ठी हो गई है। इनमें से कुछ बातें अब हम आपको बताते हैं।
गेरमन तितोव गगारिन के बाद अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि 1961 में अपनी अन्तरिक्ष उड़ान के दौरान उन्होंने 7 उड़नतश्तरियाँ देखी थीं, जो उनके अन्तरिक्ष-यान के आसपास 'नाच' रही थीं।
26  फ़रवरी 1962  के दिन  'मरकरी फ़्रेंडशिप-7'  नामक अंतरिक्ष यान में उड़ान भर रहे  अमरीकी अंतरिक्ष-यात्री जॉन ग्लेनी ने  सिगार की शक़्ल की तरह की कोई अपरिचित चीज़ अंतरिक्ष में देखकर उसकी तस्वीरें ली थीं। सिगारनुमा इस यान के क़रीब एक भारी प्रकाशपुँज चमक रहा था। यह तस्वीर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है।
12  अक्तूबर 1964  को 'वस्ख़ोद' नामक अंतरिक्ष-यान में पहली बार एक साथ तीन अंतरिक्ष-यात्री सवार होकर अंतरिक्ष में गए थे। कमारव, फ़िआक्तीस्तव और येगोरव नाम के इन तीनों अंतरिक्ष-यात्रियों ने पृथ्वी पर बने उड़ान संचालन केन्द्र को यह सूचना दी कि उनके यान को भयानक तेज़ी से उड़ रहीं डिस्क की शक़्ल की चीज़ों ने घेर लिया है। 5 दिवसीय इस उड़ान को यह सूचना मिलने के तुरन्त बाद बीच में ही  स्थगित कर दिया गया।
1968   में अमरीकी अंतरिक्ष-यात्रियों बोरमन, लॉवेल और एंड्रे जब 'अपोलो-8'  नामक अंतरिक्ष-यान में सवार होकर अंतरिक्ष में पहुँचे तो उन्होंने डिस्क की तरह गोल कुछ चीज़ों को देखा, जो ग्यारह हज़ार किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार से उड़ रही थीं। इन उड़नतश्तरियों के वहाँ पहुँचते ही 'अपोलो-8'  के सभी यंत्र-उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया  तथा अमरीकी नगर ह्यूस्टन में बने उड़ान-संचालन केन्द्र से 'अपोलो-8'  का सम्बन्ध  टूट गया। इसके बाद इन रहस्यमयी चीज़ों ने 'अपोलो' को तेज़ रोशनी में नहला दिया और अपोलो  ऐसे  झूलने लगा, मानो कोई उसे झूले में झुला रहा  हो। इसके बाद एक बड़ी भयानक आवाज़ गूँजनी शुरू हो गई। इस आवाज़ से तीनों अंतरिक्ष-यात्रियों के कान के पर्दे जैसे फटने लगे और उनके कानों में  भयानक दर्द होना शुरू हो गया। कुछ पलों तक यही स्थिति रही। लेकिन कुछ ही मिनट बाद  अचानक ये  उड़नतश्तरियाँ कहीं ग़ायब हो गईं और वह भयानक आवाज़ तथा तेज़ रोशनी भी बंद हो गई। लेकिन  कुछ ही देर बाद 'अपोलो-8'  के पास डिस्क की तरह की ही एक और उड़नतश्तरी उभर आई जो  पहले वाली उड़नतश्तरियों से बहुत ज़्यादा बड़ी थी। अमरीकी अंतरिक्ष-यात्रियों के सारे शरीर में भयानक दर्द होने लगा। परन्तु 11 मिनट बाद यह उड़नतश्तरी भी ग़ायब हो गई और सब-कुछ पहले जैसा ही सामान्य हो गया। ह्यूस्टन के साथ सम्पर्क-लाइन भी तुरन्त ही काम करने लगी।
21  अप्रैल 1969  के दिन 'अपोलो-11'  नामक अंतरिक्ष-यान चाँद पर उतरा। यान से बाहर आकर अंतरिक्ष-यात्रियों आर्मस्ट्राँग और ओल्डरिन ने अपने सिर के ऊपर दो  उड़नतश्तरियों को देखा। उन्हें कुछ दूरी पर कुछ और उड़नतश्तरियाँ चन्द्रमा की सतह पर खड़ी दिखाई दीं। नासा अंतरिक्ष संगठन के भूतपूर्व सहकर्मी ओट्टो बिन्देर ने बताया कि   रेडियो-प्रेमियों ने 'अपोलो-11'   से आने वाले इस तरह के संदेश को  रिकार्ड किया था, जिसमें अंतरिक्ष-यात्री  कह रहे थे  — "हे भगवान!  ...आपको शायद ही इस बात पर विश्वास होगा कि यहाँ कुछ दूसरे यान भी दिखाई दे रहे हैं... जो कुछ ही दूर खड़े हुए हैं... क्रेटर के उस दूर वाले किनारे पर। वे हमें देख रहे हैं !"
अप्रैल 1975   में पृथ्वी से 195  किलोमीटर की ऊँचाई पर वाहक-रॉकेट के दुर्घटनाग्रस्त होने से अन्तरिक्ष-यान 'सोयूज-18'  का यात्री-कैपसूल उससे अलग हो गया। यह यात्री-कैपसूल पैराशूट के सहारे लाज़रेव और मकारव नाम के अंतरिक्ष-यात्रियों के साथ साईबेरिया के अल्ताई नामक पहाड़ी इलाके में सुरक्षित उतर आया। रात को इन अंतरिक्ष-यात्रियों के शिविर पर अचानक बैंगनी रंग की तेज़ रोशनी फैल गई। बाद में अचानक वह रोशनी ग़ायब हो गई। फिर वर्ष 1996 में लाज़रेव ने   बताया कि उनका यह मानना है कि इस  बैंगनी रोशनी फेंकने वाली चीज़ की वज़ह से ही वे दोनों अंतरिक्ष-यात्री एकदम पूरी तरह से सुरक्षित पृथ्वी पर लौट आए थे।
1978   में जब अंतरिक्ष-यात्री पपोविच एक यात्री-विमान में सवार होकर वाशिंगटन से मास्को लौट रहे थे तो  धरती से 10  हज़ार मीटर की ऊँचाई पर अपने विमान से क़रीब 1500  मीटर की दूरी पर उन्होंने आकाश में एक तिकोनी चीज़ को देखा, जो किसी नौका के पाल या बादबान की तरह लग रही थी।
5  मई 1981  को 'सल्यूत-6'  नामक अंतरिक्ष स्टेशन के कमांडर कवालेनक ने स्टेशन की खिड़की के बाहर एक अपरिचित बड़ी-सी गोल चीज़ को देखा, जो बाद में दो  घेरों में विभाजित हो गई। ये घेरे एक  कॉरीडोर जैसी चीज़ से जुड़े हुए थे।
1985  में  'सल्यूत-7'  नामक अंतरिक्ष-स्टेशन की उड़ान के 155 वे दिन अंतरिक्ष-स्टेशन पर उपस्थित  छह अंतरिक्ष-यात्रियों — कीज़िम, अत्कोफ़, सलाव्योव, सवीत्सकया, वोल्क और जानिबेकव ने स्टेशन की खिड़की के बाहर खुले अंतरिक्ष में सात बड़े-बड़े जीव देखे।  इन जीवों की बहुत कम चर्चा करते हुए उन्होंने इन्हें  'अंतरिक्षीय देवदूत'  कहा है। इन जीवों  की शक़्लें एक-दूसरे से अलग-अलग थीं।  लेकिन ये सभी जीव  ख़ुशी से मुस्करा रहे थे। क़रीब दस मिनट तक अंतरिक्ष-स्टेशन के पास बने रहकर ये  'देवदूत' अचानक ग़ायब हो गए। वर्ष 2007 में टेलिस्कोप 'हेब्ब्ल' ने भी पृथ्वी की परिधि पर सात चमकती हुई चीज़ों को नोट किया और उनकी तस्वीरें लीं। इन तस्वीरों में इन चीज़ों का आकार पंखों वाले किसी जीव की तरह था। 
1990  में अंतरिक्ष-स्टेशन 'मीर' में कार्यरत अंतरिक्ष-यात्रियों स्त्रेलकोव और मनाकव ने अपनी खिड़की के बाहर कुछ सैकंड तक एक गोल घेरे को चमकते हुए देखा जो किसी जलते हुए लट्टू की तरह लग रहा था।
1991  में अंतरिक्ष-यात्री मूसा मनारव ने अंतरिक्ष-स्टेशन 'मीर'  के बाहर एक अजीब-सी चीज़ देखी।  शुरू में उन्होंने सोचा कि यह एंटेना है, लेकिन कुछ ही देर में  वह एंटेनानुमा चीज़ अंतरिक्ष स्टेशन से बड़ी तेज़ी से दूर होती चली गई।
औपचारिक तौर पर रूस और अमरीका के अंतरिक्ष संगठन या तो इस तरह की सूचनाओं पर कोई टिप्पणी नहीं करते, या फिर इन्हें पत्रकारों की कपोल-कल्पना बताते हैं। लेकिन   उड़नतश्तरियों को देखे जाने की जो सूचनाएँ लगातार मिलती रहती हैं, वे यह सोचने को  बाध्य करती हैं कि धुआँ बिना आग के तो पैदा नहीं होता sabhar :http://hindi.ruvr.ru/
और पढ़ें: http://hindi.ruvr.ru/2012_04_11/71375385/

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शनि के चांद पर पानी होने की संभावना

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शनि चंद्रमा

सौरमंडल के दूसरे सबसे बड़े ग्रह शनि के एक चंद्रमा इन्सेलादस की सतह के नीचे पानी का 'सागर' होने के पर्याप्त सबूत मिले है. इस नए खोज ने ब्रह्मांड में पृथ्वी के बाहर जीवन होने की संभावना को बढ़ा दिया है
जब से अंतरिक्ष में जेट विमानों ने इसके दक्षिणी ध्रुव से बर्फीली चीज़ों को टूट कर गिरते देखा है तब से वैज्ञानिक उत्साहित है.

साइंस पत्रिका ने इसकी विस्तृत रिपोर्ट छापी है.नासा के अंतरिक्ष यान कासिनी की मदद से शोधकर्ता पानी के अत्यंत सूक्षम गुरुत्वाकर्षण संकेत का भी पता लगाएंगें.
प्रोफ़ेसर लुसियानो लेस ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "हमने जो मापा है उसके हिसाब से यह उत्तरी अमेरिका के सुपीरियर झील के आकार के एक बड़े जलाशय के अस्तित्व में होने की संभावना है. "
यह इटली के गार्डा झील से 245 गुना बड़ा हो सकता है.

अनुकूल परिस्थितियाँ

इन्सेलादस
कासिनी से मिले आकड़ों के मुताबिक़ इन्सेलादस के बर्फिले सतह के 40 किमी नीचे तरल पदार्थ है.
प्रोफ़ेसर लेस और उनकी टीम के निष्कर्षों के मुताबिक़ 500 किमी चौड़ा यह चंद्रमा सूक्षमजीवों के जीवन के अस्तित्व के लिहाज़ से पृथ्वी के बाद सबसे उपयुक्त जगह होगी.
कासिनी से मिले आकड़ों के मुताबिक़ इन्सेलादस के बर्फ़ीले सतह के 40 किमी नीचे तरल पदार्थ है.
कासिनी ने सबसे पहले 2005 में इस चंद्रमा पर फैले हुए वातावरण का पता लगाया था तब से वहाँ पानी के सागर होने की संभावना को बल मिला है.
कासिनी जब पहली बार शनि ग्रह में पहुँचा था तो वहां पर अंधेरा था. उस वक्त शनि में सर्दी का मौसम चल रहा था.
इसके वातावरण में खनिज और जल वाष्प होने के संकेत मिले है.
"मैं सोचता हूँ जीवन मौजूद होने की संभावनाओं वाली सूची में इन्सेलादस का नाम सबसे ऊपर है."
प्रोफेसर एंड्रयू कोट्स, ब्रिटेन कासिनी वैज्ञानिक
कासिनी लवण और कार्बन युक्त जैविक अणुओं का पता भी लगा रहा है.
इन्सेलादस के चारों ओर की कक्षा विकेन्द्रीत है. यह गोलाकार नहीं है. इसलिए इस विशाल ग्रह के द्वारा इन्सेलादस के बर्फ को गर्म कर के और पिघला के गुरुत्वाकर्षण को कम और ज़्यादा करने की संभावना रहती है.
सौर मंडल में कई कैसे चंद्रमाएँ है जिस पर जीवन होने की मजबूत संभावनाएँ है. शनि का सबसे बड़ा उपग्रह टाइटन , बृहस्पति के चन्द्रमाओं यूरोपा, गेनीमेड और कैलिस्टो और नेपच्यून के ट्राइटन इस श्रेणी में आते हैं.
चट्टान में पानी की मौजूदगी होने की वज़ह से इनमें से इन्सेलादस और यूरोपा पर जीवन होने की अधिक संभावना है.

क्योंकि इससे रसायनिक प्रक्रियाओं की संभावना बढ़ जाती है जो जीवन उत्पन्न होने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार करती है.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक

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गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन

रायपुर.  मशरूम की खेती के लिए 69 साल की नानी को सवा लाख रुपए का उपकरण चाहिए था। घर की माली हालत खराब थी। 
 
एनआईटी पास मैकेनिकल इंजीनियर धीरज साहू ने जब नानी (अगास बाई) की परेशानी देखी तो महंगे उपकरण की सस्ती तकनीक वाला वर्जन बनाने की जिद ठान ली। जज्बा काम आया। कुछ दिनों की मेहनत से वैसा ही उपकरण ‘इनाकुलेशन चैंबर’ मात्र 1200 रुपए में तैयार हो गया। इसकी मदद से नानी ने मशरूम उत्पादन शुरू किया। अब आर्थिक स्थिति सुधरने लगी है।
 
सपना साकार हुआ 
 
धीरज के माता-पिता नानी के साथ कांकेर जिले के सिंगारभाट में रहते हैं। नानी ने मशरूम उगाने का प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केंद्र से लिया। अगास बाई चाहती थीं कि मशरूम बीज उत्पादन से जुड़ें, लेकिन महंगी मशीन रोड़ा बन रही थी। जब नाती ने इनाकुलेशन चैंबर बना दिया तो सपना हकीकत बन गया।
 
दो महीने में 17 हजार कमाए  
 
मशरूम बीज उत्पादन में तीन हजार रुपए खर्च निकालने के बाद भी दो महीने में 17 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हुआ है। अब तो दामाद यानी धीरज के पिता घनश्याम साहू भी सिलाई का काम छोड़कर मशरूम बीज तैयार करने में जुट गए हैं।
 
गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन
ऐसे बनाई मशीन
 
धीरज के अनुसार बीज उत्पादन में लेमिनर फ्लो नामक उपकरण की जरूरत पड़ती है। यह बैक्टीरिया और फंगस खत्म करता है। उसने इस मशीन के काम करने के तरीके की जानकारी जुटाई। कांकेर के कृषि केंद्र में रखे इसी तरह के एक मॉडल का अध्ययन किया। इसके बाद अपनी तकनीक इजाद की और बीज बनाने की नई मशीन तैयार हो गई।
 
विवि प्रमोट करेगा
 
यह अच्छा इनोवेशन है। विशेषज्ञों से छोटी-मोटी खामियां दूर करवाकर इस तकनीक को प्रमोट करेंगे। इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) को भी सक्सेस स्टोरी भेजेंगे। उम्मीद है, यह तकनीक किसानों के लिए मददगार साबित होगी।
 
डॉ. एसके पाटिल, कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विवि, रायपुर 
 
फोटो- धीरज साहू की नानी (अगास बाई)

मां का दर्द सह न सका, खोज निकाली दवा
 
जमशेदपुर.  समस्या, पीड़ा, दर्द हो तो आमतौर पर लोग घबरा जाते हैं। जो इसका डट कर सामना करते हैं, वो कुछ ऐसा कर जाते हैं, जिससे समाज का भला होता है। देश-दुनिया को फायदा पहुंचता है।
 
डॉ अरविंद सिन्हा ऐसे इंसान हैं, जिनसे मां का दर्द सहा नहीं गया और ऐसी दवा खोज निकाली, जिससे आज लाखों लोगों का दुख दूर हो रहा है। डॉ सिन्हा नेशनल मेटलर्जिकल लेबोरेट्री (एनएमएल), जमशेदपुर में सीनियर प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं। उन्होंने ऐसा स्प्रे ईजाद किया है, जिससे टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने में स्टील प्लेट की जरूरत नहीं होती। बल्कि, स्प्रे करने मात्र से हड्डियां जुड़ जाती हैं। 
गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन

40,000 रुपए में बना ली फोर व्हीलर गाड़ी
 
रतलाम. नौगांवा जागीर के किसान अनिल गिरी गोस्वामी ने टू-व्हीलर के रेट में फोर व्हीलर बना दी। यह नैनो कार से भी छोटी है। 
 
इनसे बना वाहन
 
राजदूत के चार पहिए, चेसिस, चार शॉकअप, पानी खींचने के काम में इस्तेमाल होने वाला 5.5 हॉर्स पावर का इंजन,मारुति वैन की स्टेयरिंग और सीट से बनी है यह फोर व्हीलर गाड़ी। 

गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन

ट्रैक्टर का काम करता है बुलेट
 
भारत में बुलेट को शान की सवारी के रूप में जाना जाता है। रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो यह अपनी ताकत से मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचाता है। गुजरात के मनसुख भाई जागनी ने बुलेट को एक अलग ही रूप दे दिया है। मनसुख भाई ने देशी जुगाड़ से बुलेट को ट्रैक्टर बना दिया। यह बुलेट ट्रैक्टर 30 मिनट में एक एकड़ जमीन की जुताई कर सकता है और इस काम में सिर्फ दो लीटर इंधन की खपत होती है।

गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन
पैडल से चलती है यह वॉशिंग मशीन
 
केरल की रेम्या जोसे का जन्म गरीब परिवार में हुआ। मां के बीमार होने पर घर से सारे कपड़े रेम्या को धोने पड़े और उसके पास वॉशिंग मशीन नहीं था। रेम्या ने इस समस्या के हल के लिए पैडल से चलने वाला वॉशिंग मशीन बना लिया। इस मशिन पर बैठकर पैडल मारने पर बॉक्स में रखे गए कपड़े धुलते हैं। 
गरीबी ने बना दिया वैज्ञानिक, सिर्फ 1200 में बनाई 1.25 लाख रुपए की मशीन

हवा से निकलता है पानी
 
असम के मेहतर हुसैन और मुशताक अहमद ने बांस की मदद से पवन चक्की बनाया है। इसकी मदद से जमीन के अंदर से पानी निकाला जा रहा है। गुजरात के नमक के मजदूरों के लिए यह खोज बहुत उपयोगी है। वे इसकी सहायता से पानी हटाते हैं और डीजल की तुलना में कम पैसे में उनका काम हो जाता है। sabhar ;http://www.bhaskar.com/






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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

खुशखबरी: वैज्ञानिकों ने ढूंढा एड्स का इलाज

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लंदन।। वैज्ञानिकों की एक इंटरनैशनल टीम ने एड्स का इलाज खोजने का दावा किया है। इस टीम ने एक ऐसा जिनेटिक तरीका खोजा है जिसके इस्तेमाल से शरीर खुद ब खुद एचआईवी वायरस से मुक्ति पा लेगा। इस टीम को ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की सरकारों का समर्थन है। 

वैज्ञानिकों ने चूहों पर ये एक्सपेरिमेंट किए थे। इसके तहत वे चूहों के इम्यून सिस्टम या प्रतिरोधक क्षमता को इस हद तक बढ़ाने में कामयाब हुए कि सिस्टम ने वायरस को नाकाम कर दिया और उसे शरीर से निकाल फेंका। इस प्रयोग के केंद्र में SOCS-3 नाम का जीन था। जब शरीर में एचआईवी जैसा गंभीर इन्फेक्शन होता है तो यह जीन बहुत ज्यादा सक्रिय हो जाता है और आश्चर्यजनक तौर पर खुद इम्यून सिस्टम को बंद कर देता है। इस वजह से वायरस बिना रोकटोक फलता फूलता है। 

जब वैज्ञानिकों ने आईएल-7 नाम के एक हॉर्मोन का लेवल बढ़ाया तो SOCS-3 जीन ने काम करना बंद कर दिया और चूहे ने धीरे-धीरे एचआईवी वायरस को शरीर से बाहर कर दिया। गौरतलब है कि एड्स वायरस की सबसे बड़ी खूबी है कि यह हमारे इम्यून सिस्टम को नाकाम कर देता है। चूहे पर हुए ताजा प्रयोग के बाद वैज्ञानिकों के दिल में नए किस्म के इलाज की उम्मीद जगी है। उन्हें भरोसा है कि इस तरह से न केवल एचआईवी बल्कि हेपटाइटिस बी, सी और टीबी जैसे गंभीर इन्फेक्शन का भी इलाज हो सकेगा। 
टीम लीडर डॉ. मार्क पैलेग्रिनी का कहना है एचआईवी और हेपटाइटिस बी, सी के वायरस हमारे इम्यून सिस्टम को इतना थका देते हैं कि वह बजाय उनसे लड़ने के हथियार डाल देता है। 

हमारी अप्रोच यह थी कि किसी तरह इम्यून सिस्टम को थकाने वाले कारक की पहचान करके उससे जुड़े जीन में ऐसी फेरबदल की जाए कि प्रतिरोधक क्षमता फिर से काम करने लगे और इन्फेक्शन का मुकाबला करे। अब ऐसी दवाएं डिवेलप की जाएंगी जो SOCS-3 जैसे जीन्स पर कारगर हों और उनके काम करने के तरीके को बदल सके। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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सेक्स की इच्छा होने पर पारदर्शी हो जाएगी ड्रेस

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dress

नई टेक्नॉलजी का यह अद्भुत नमूना है। अब बात स्मार्ट वॉच से आगे बढ़ गई है। एक ऐसी ड्रेस आ गई है जो यह समझ जाएगी कि आपकी सेक्स की इच्छा हो रही है और अपने आप पारदर्शी हो जाएगी। इस ड्रेस को बनाया है स्टूडियो रूसेगार्दे ने। चीन और नीदरलैंड्स की यह कंपनी फैशन, आर्ट और आर्किटेक्चर के क्षेत्र में काम करती है। इस ड्रेस को इंटिमसी 2.0 नाम के एक फैशन प्रॉजेक्ट के तहत तैयार किया गया है। इस प्रॉजेक्ट में अंतरंगता और तकनीक के बीच संबंध पर काम किया जा रहा है।

पारदर्शी होने वाली इस ड्रेस के फिलहाल दो मॉडल उतारे गए हैं, इंटिमेसी वाइट और इंटिमेसी ब्लैक। इसे ऐसे मटिरियल से बनाया गया है जो कुछ खास परिस्थितियों में पारदर्शी हो जाता है। इंटिमेसी 2.0 धड़कनों के बढ़ने के हिसाब से पारदर्शी होती जाती है। मटिरियल में इलेक्ट्रॉनिक वायरिंग होती है और एलईडी लगे होते हैं। जब पहनने वाला व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के करीब जाता है और उसकी धड़कनें बढ़ती हैं तो पारदर्शिता बढ़नी शुरू हो जाती है।

कंपनी की वेबसाइट पर लिखा है ये गाउन किसी समारोह में जाने के लिए सबसे उपयुक्त हैं। और तो और, इसके अडवांस वर्जन पर भी काम शुरू हो गया है। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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सोचने भर से उड़ा लिया हेलिकॉप्टर

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photo : google
लंदन।। वैज्ञानिकों ने एक्सपेरिमेंट के दौरान रिमोट से कंट्रोल हो सकने वाले एक हेलिकॉप्टर को 'मन की शक्ति' से उड़ाने में कामयाबी पाई है। सुनने में थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यह सही है। ऐसा करने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ मिन्नेसोटा के इंस्टिट्यूट ऑफ इंजिनियरिंग इन मेडिसिन में एक स्पेशल 'टोपी' की मदद से बेन के इलेक्ट्रिकल ऐक्टिविटीज को कैप्चर किया गया।

कैसे हुआ एक्सपेरीमेंट? 5 यूजर्स को 64 इलेक्ट्रोड लगी स्पेशल टोपी पहनाई गई। टोपियों को कंप्यूटर से जोड़ा गया और मूवमेंट से जुड़े विचारों के पैटर्न को समझने की कोशिश की गई। दाएं-बाएं मुड़ने, ऊपर जाने या नीचे गिरने की सोचते वक्त ब्रेन में क्या इलेक्ट्रिकल मूवमेंट होते हैं, इसे कंप्यूटर में रेकॉर्ड किया गया। इसके बाद कंप्यूटर से वाईफाई के जरिए हेलिकॉप्टर को उड़ाने की कोशिश शुरू की गई। हेलिकॉप्टर को कंट्रोल करने के लिए केवल यूजर्स के विचारों के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंपलसेज का इस्तेमाल किया गया। बीबीसी न्यूज के मुताबिक, यूजर के बाएं हाथ से मुक्का मारने के बारे में सोचते ही हेलिकॉप्टर भी उसी तरह मूवमेंट करने लगा।

बेहद कामयाब रहा एक्सपेरिमेंट यूनिवर्सिटी कैंपस में जिस जगह यह टेस्ट किया गया, वहां दीवार और दूसरी किस्म की बाधाएं थीं, लेकिन हेलिकॉप्टर अपने उड़ान के दौरान काफी हद तक इनसे टकराने से बचने में कामयाब रहा।
विकलांगों को होगा फायदा इस एक्सपेरिमेंट से जुड़ी टीम का मानना है कि अगर इस खोज को और बेहतर किया गया तो आने वाले वक्त में यह उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकता है, जो चल-फिर नहीं सकते। साइंटिस्ट आने वाले वक्त में इसके जरिए वीलचेयर कंट्रोल करने से लेकर टीवी तक ऑपरेट करना चाहते हैं। इसके अलावा, कृत्रिम अंगों को भी ऑपरेट करने की योजना है।
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मंगल ग्रह पर जीवन ढूंढ़ने गए क्यूरियोसिटी के कैमरे में कैद हुई रहस्यमयी रोशनी

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ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिशें, एक नई रोशनी मिलने से एक बार फिर चमक उठी हैं. मंगल पर तैनात नासा के रोवर क्यूरियोसिटी में लगे दो कैमरों ने मंगल की सतह से उठती रहस्यमयी रोशनी की तस्वीरें ली हैं. हालांकि नासा ने अभी तक इन तस्वीरों के बारे में कुछ कहा नहीं है. लेकिन कई सारी अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं.
'यूएफओ साइटिंग्स डेली' नाम से वेबसाइट चलाने वाले स्कॉट सी वेरिंग ने 6 अप्रैल को ये तस्वीरें पोस्ट की थी. इन तस्वीरों में रोशनी सतह से ऊपर की ओर उठती हुई दिख रही है, जो नीचे से फैली हुई है. वेरिंग का कहना है कि यह इस बात का संकेत है कि वहां इंटेलिजेंट लाइफ मौजूद है जो हमारी तरह ही लाइट का इस्तेमाल करती है. वेरिंग ने अपनी वेबसाइट पर लिखा, 'यह सूर्य की रोशनी नहीं है, ना ही तस्वीर खींचने की कोई कारीगरी'

इस बीच क्यूरियोसिटी रोवर अपने लक्ष्य स्थान 'द किम्बरले' पहुंच गया है. क्यूरियोसिटी यहां चट्टानों के नमूनों की जांच करेगा ताकि मंगल ग्रह के बरसों पुराने वातावरण के बारे में जानकारी जुटाई जा सके. इस जांच का मकसद यह पता लगाना है कि लाल ग्रह पर कभी जीवन था या नहीं?

मंगल ग्रह पर द किम्बरले, वह जगह है जहां चार तरह की चट्टानें एक दूसरे से मिलती है. इसका नामकरण पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के एक क्षेत्र के नाम पर किया गया है.

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इन पसादेना की मेलिसा राइस ने एक बयान में कहा कि हमारा पूरा प्रयास किंबरले पहुंचने का था, चट्टानों की जांच से महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने की उम्मीद है.

राइस, किंबरले क्षेत्र की चट्टानों की जांच, सैंपल ड्रिलिंग और लैबोरेटरी विश्लेषण की हफ्तों चलने वाली योजनाओं की जिम्मेदारी संभालती हैं. गौरतलब है कि क्यूरियोसिटी अगस्त 2012 में मंगल ग्रह के क्रेटर में उतरा था. इसके बाद किंबरले पहुंचने के लिए उसे 3.8 मील की दूरी तय करनी पड़ी.sabhar :http://aajtak.intoday.in/















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मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

खुलासा! टीवी शो में फिक्स होती हैं दर्शकों की तालियां और हंसी

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मुंबई। घर पर बैठकर टीवी पर शोज देखते समय आपको जरूर ऐसा लगता होगा कि काश हम भी टीवी पर दिखाई दें, भले ही दर्शक के तौर पर। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जो दर्शक शो में हंसते हैं, तालियां बजाते हैं और सवाल पूछते हैं, उनमें से बहुत सारे पैसे देकर शो में बुलाए जाते हैं। चौंकिए मत! ये सच है। उन्हें ये सब करने के लिए पैसे दिए जाते हैं। वे पेड ऑडियंस के तौर पर काम करते हैं।
जी हां हमारे सहयोगी अखबार मिड डे की खबर के मुताबिक ये दर्शक पेड होते हैं। इन्हें पैसों के साथ-साथ 12 घंटे की शिफ्ट के हिसाब से खाना-पीना भी दिया जाता है। टीवी शो में शामिल होने वाला एक दर्शक औसतन 12 घंटे के 1500 रुपए से ज्यादा नहीं कमा पाता। ऐसा नहीं है कि कोई भी दर्शक के तौर पर शो में शामिल होकर कमाई कर सकता है। दर्शकों को उनके लुक और पर्सनेलिटी के हिसाब से उन्हें काम मिलता है।
कास्टिंग एजेंट के तौर पर पिछले 25 साल से इस इंडस्ट्री में काम कर रहे पप्पू लेखराज बताते हैं, 'इंडस्ट्री में काम करने के लिए ये एक अच्छा ऑपशन है। इसे करियर की तरह लिया जाता है। अधिकतर रियलिटी शोज को दर्शकों की जरूरत होती है। कुछ लोगों को डेली बेसिस पर पैसे मिलते हैं। 12 घंटे की शिफ्ट में इन्हें खाना-पीना भी दिया जाता है।
प्रतिज्ञा और खामोशियां जैसे शोज के प्रोडक्शन हेड कहते हैं, 'रियलिटी शोज और बाकी फिक्शन शोज के दर्शक अलग होते हैं। फिक्शन शोज में कई जूनियर आर्टिस्ट भी काम करते हैं। रियलिटी शोज 12 घंटे तक चलते हैं वहीं, फिक्शन शोज 8 घंटे तक चलते हैं। इस दौरान उन दर्शकों को खाना पीना भी दिया जाता है।
सलीम रज्जाक रियलिटी शोज में दर्शक के तौर पर जा रहे हैं। उन्होंने बताया, 'मैं एक साल से बतौर दर्शक काम कर रहा हूं, मुझे महीने में 6 हजार से 8 हजार रुपये मिल जाते हैं। ये एक अच्छा काम है। मैं बहुत प्रोफेश्नल हो गया हूं। मैं बहुत खुश हूं क्योंकि इस बहाने से मुझे अपने फेवरेट स्टार्स से मिलने का मौका मिलता है।'
एक और दर्शक अमित पटेल कहते हैं कि उनके पास कोई काम नहीं था, लेकिन जब उनके दोस्त ने उन्हें इस काम के बारे में बताया तो वे खुश हो गए। उन्होंने कहा, 'आज मैं 4 से 6 हजार कमा लेता हूं। मुझे ज्यादा कुछ नहीं करना होता है। बस भीड़ में बैठकर सभी आदेशों का पालन करना होता है।'sabhar :http://www.jagran.com/

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सोमवार, 7 अप्रैल 2014

गंगनचुंबी इमारतें बनाएंगे रोबोट

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वाशिंगटन। हारवर्ड में भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने स्वेच्छा से काम करने वाले रोबोट की एक पूरी सेना तैयार कर ली है। ये रोबोट आपसी समायोजन से बिना किसी मानवीय निगरानी के गगनचुंबी इमारतों से लेकर पिरामिड तक बना सकते हैं।
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि इन्हें ठोस ढांचों को खड़ा करने में सक्षम ये रोबोट सामूहिक बुद्धिमत्ता और समायोजन से कार्य करते हैं। इन्हें किसी निगरानी और दिशा-निर्देश देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रणाली को किसी निगरानी और कैमरे से निगरानी की जरूरत नहीं पड़ती है। उनकी सहूलियत के लिए किसी खास किस्म के वातावरण बनाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। हारवर्ड यूनिवर्सिर्टी के वैानिकों ने ये टर्म्स प्रणाली बनाई है। इसके जरिए रोबोट जटिल और तीन आयामों वाले ढांचों को बिना किसी केंद्रीय कमान या निर्देशित नियमों के बाखूबी बना सकते हैं। टर्म्स प्रणाली की मदद से ऊंची इमारतें, महल, पिरामिड फोम ब्रिक से बनाए जा सकते हैं। इस प्रणाली के जरिए इमारत की सामग्री के जरिए खुद ब खुद ऐसी सीढि़यां बनाई जाती हैं। जिससे गुजरकर ये रोबोट ऊंचे स्थानों तक पहुंचते हैं और उस पर जरूरत के हिसाब से ईंटें जमाते जाते हैं। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में ऐसे रोबोट बाढ़ आने पर पानी रोकने के लिए बालू की बोरियां लगाने से लेकर मंगल ग्रह पर निर्माण कार्य में भी बखूबी भाग ले सकते हैं।
इस प्रणाली की सबसे अच्छी बात ये है कि जटिल से जटिल कार्य को सामूहिक रूप से ये रोबोट बिना किसी देखरेख के अंजाम दे सकते हैं। ऐसे में जहां इंसान की हदें खत्म होती हैं वहां भी इन रोबोट से बेहतरीन काम लिया जा सकता है। इन रोबोट को काम कराने के लिए माहौल या वातावरण को बदलने की भी जरूरत नहीं है। जैसे बाढ़ में बचाने वालों के भी जीवन का ख्याल रखना होता है। मंगल ग्रह पर इंसान को भेजने के लिए वहां के वातावरण के अनुकूल ही माहौल बनाना होगा। पर इन रोबोट के लिए ये सीमाएं नहीं हैं। इस प्रोजेक्ट की मुख्य जांचकर्ता हारवर्ड में इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस की प्रोफेसर राधिका नागपाल और फ्रेड कावली हैं। प्रत्येक रोबोट बिल्डिंग बनाने की इस प्रक्त्रिया में दूसरे रोबोट के समानान्तर काम करता है। लेकिन उसे ये नहीं पता होता कि उसी वक्त यही काम और कौन कर रहा है। ऐसे में अगर कोई एक रोबोट टूट गया या काम से हट गया तो इससे दूसरे रोबोट पर असर नहीं पड़ता और वह अपना काम करता रहता है। यानी इस प्रणाली के जरिए एक निर्देश पांच रोबोट या पांच हजार रोबोट को एक साथ दिया जा सकता है। टर्म्स प्रणाली मापने, वितरण प्रणाली और आर्टीफियल इंटेलिजेंस का बेजोड़ नमूना है। नागपाल के इस स्वनियंत्रित प्रणाली अनुसंधान को एलगारिथम के हिसाब से तैयार किया गया है। जिसमें रोबोट का एक समूह एक कालोनी की तरह काम करता है। सभी रोबोट एक समूह में एक इकाई की तरह उच्च स्तरीय काम करते हैं। sabhar :http://www.jagran.com/

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डॉल्फिन ने की वैज्ञानिकों से बात कहा: मेरे पास कचरा पड़ा है

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डॉल्फिन ने की वैज्ञानिकों से बात कहा: मेरे पास कचरा पड़ा है

फ्लोरिडा. वह दिन दूर नहीं जब इंसान डॉल्फिनों से दोस्तों की तरह बात कर सकेंगे। ऐसे ही एक प्रोजेक्ट में शोधकर्ताओं को बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका के फ्लोरिडा में एक डॉल्फिन ने उसके पास पड़े कचरे के बारे में शोध करने वाले बताया। इस प्रोजेक्ट का नाम ह्यूमन-टू-डॉल्फिन ट्रांसलेटर है।
 
प्रोजेक्ट प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. डेनिज हर्जिंग डॉल्फिन के रिस्पॉन्स से बेहद उत्साहित हैं। प्रोजेक्ट में सेटासियन हियरिंग एंड टेलिमेट्री डिवाइस (चैट) इस्तेमाल की गई। इसके जरिए डॉल्फिन का संदेश शोधकर्ताओं तक पहुंचा। चैट डिवाइस एक ट्रांसलेटर मशीन की तरह काम करती है। जो डॉल्फिन के भेजे संकेतों को पढ़ सकती है। 
 
तोते की तरह डॉल्फिन भी पकड़ती हैं शब्द 
 
हर्जिंग ने डॉल्फिन को आठ शब्द सिखाए हैं। यह डॉल्फिन की आवाज से मिलते-जुलते हैं। हर परिस्थिति के लिए अलग आवाजें निकालती हैं। जैसे समुद्री कचरे लिए अलग और तैरने के लिए अलग। हर्जिंग के अनुसार डॉल्फिन के पास इशारा करने के लिए अलग आवाज होती है। किसी परिचित इंसान के पास आने पर यह अलग आवाज निकालती हैं। वहीं खतरे से बचने के लिए अलग आवाज करती हैं। 
 
डॉल्फिन की आवाज होती ट्रांसलेट : चैट डिवाइस में माइक्रोफोन लगा है। जो डॉल्फिन की आवाज को रिकॉर्ड कर लेता है। फिर ट्रांसलेटर इस आवाज को इंसानी भाषा में बदलने की कोशिश करता है। जब डॉल्फिन बोलती है तो ट्रांसलेटर इसे इंसानी शब्दों से मैच कराने की कोशिश करता है। 
 
बनाएंगे डॉल्फिन की बोली की डिक्शनरी :हर्फिंग जॉर्जिया यूनिवर्सिटी के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्सपर्ट थैड स्टार्नर से समझौता करेंगे। दोनों डॉल्फिन की आवाजों का विश्लेषण करेंगे। फिर इसकी डिक्शनरी तैयार होगी। इसे चैट डिवाइस में फीड किया जाएगा। sabhar ; bhaskar.com

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