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गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

वृद्धावस्था को रोकने आजीवन युवा रहने के लिए कुछ रिसर्च

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स्किन सेल्स से बन सकेंगे नए ऑर्गन्स


लंदन 
वैज्ञानिकों ने इंसानी शरीर की त्वचा की कोशिकाओं (स्किन सेल्स) से स्टेम सेल्स तैयार करने से जुड़ी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन स्टेम स्टेल्स में एंब्रियो या भ्रूण में तब्दील होने की क्षमता है। एक टॉप साइंटिस्ट ने 'द इंडिपेंडेंट' को रविवार को यह जानकारी दी। इस तकनीक का परीक्षण चूहों पर पूरी तरह से कामयाब रहा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह इंसानों के लिए भी बिलकुल फिट रहेगा। ऐसे में इंसानों में होने वाली असाध्य बीमारियों मसलन पार्किन्सन, हार्ट डिजीज आदि के बेहतर इलाज की संभावनाएं और मजबूत हो चली हैं। दरअसल, इस तकनीक के जरिए बीमारी से ग्रस्त अंगों को मरीज के स्टेम सेल्स के जरिए दोबारा से तैयार किया जा सकता है।

जर्म सेल्स भी किए जा सकते हैं तैयार 
हालांकि, स्किन सेल्स से इंसानी भ्रूण तैयार करने की फिलहाल कोई मंशा नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसा किया जाना सैद्धांतिक तौर पर मुमकिन है। प्रयोग के दौरान चूहों के भ्रूण तैयार करने में कामयाबी मिलना इस बात का संकेत देते हैं कि इन भ्रूण से किसी खास तरह के टिशू (ऊतक) तैयार किए जा सकते हैं, जो अंग विकसित करने की दिशा में अहम साबित होगा। यहां तक कि इस तकनीक से जर्म सेल्स भी तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे स्पर्म और डिंब (एग्स) बनते हैं।



मशीनी अवतार से अमर बनेगा मनुष्य


मुकुल व्यास

मनुष्य अनंतकाल से अमृत की तलाश कर रहा है और अब विज्ञान भी अमरत्व के नुस्खे खोजने में जुट गया है। वृद्धावस्था को रोकने या आजीवन युवा रहने के लिए कुछ रिसर्च वैज्ञानिक आधार पर हो रही हैं और कुछ बातें कल्पना लोक में तैर रही हैं। एक रूसी धनकुबेर द्मित्री इत्स्कोव अपने अति महत्वाकांक्षी 'अवतार' प्रोजेक्ट के जरिए मनुष्य को टर्मिनेटर जैसे साइबोर्ग के रूप में अमर बनाने का सपना देख रहे हैं। उनका इरादा 2045 तक मनुष्य की चेतना को एक मशीन में हस्तांतरित करने का है, जहां उसकी पर्सनैलिटी और यादें हमेशा जिंदा रहेंगी। इस अवतार का कोई भौतिक रूप नहीं होगा।

इसका अस्तित्व सिर्फ इंटरनेट जैसे नेटवर्क में होगा। इस तरह के साइबोर्ग होलोग्राम के माध्यम से अपने माहौल के साथ संवाद करेंगे। इत्स्कोव के प्रोजेक्ट में इस समय साइंस कम और साइंस-फिक्शन ज्यादा दिखता है, लेकिन वह अपने इरादों के प्रति गंभीर हैं और इसके लिए वैज्ञानिकों की भर्ती कर रहे हैं। समाज को 'नव-मानवता' की ओर ले जाने के लिए वह संयुक्त राष्ट्र महासचिव की मदद भी मांग रहे हैं।यह तो वक्त ही बताएगा कि इत्स्कोव अपनी योजना को कितना आगे बढ़ा पाएंगे, लेकिन भविष्य में एजिंग के दुष्प्रभावों को रोकना संभव हो सकता है। बहुत मुमकिन है कि मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने का कोई कारगर तरीका भी हाथ लग जाए। वैज्ञानिक एजिंग की प्रक्रिया के पीछे आणविक और आनुवंशिक कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। बर्कली स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन को इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है, साथ ही इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद भी जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई ब्लड स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं।

दीर्घायु जीन का नाम 'सर्ट-3' है। यह दरअसल 'सर्ट' समूह का प्रोटीन है, जो ब्लड स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है। प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार यह खोज बहुत रोमांचक है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के तरीके विकसित करने का रास्ता खुल गया है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। वृद्धावस्था को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश है। चेन के मुताबिक एक अकेले जीन के म्यूटेशन या परिवर्तन से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को सचमुच पलट सकते हैं?

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों के ब्लड सिस्टम का अध्ययन कियाजिनमें सर्ट-3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रियकर दिया गया था। रिसर्च से पता चलता है कि युवा कोशिकाओं में ब्लड स्टेम कोशिकाएं अच्छे ढंग से काम करतीहैं और उन्हें बहुत कम 'ऑक्सीडेटिव स्ट्रेसका सामना करना पड़ता है। आक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतरमेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एक नुकसानदायक बायप्राडक्ट है। इससेशरीर पर बोझ बढ़ता है। मेटाबोलिज्म के दौरान ऑक्सीजन का एक स्वतंत्र अणु निकलता हैजिसे फ्री रेडिकलभी कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है। यदि इस अणु को किसी एंटी ऑक्सीडेंट से तुरंत न्यूट्रलाइजनहीं किया जाता तो यह और ज्यादा फ्री रेडिकल उत्पन्न करता है। इससे कोशिका की दीवार के प्रोटीन और यहांतक कि कोशिका के डीएनए को भी नुकसान पहुंचता है। फ्री रेडिकलों का एक्शन एक कटे हुए सेब के भूरा पड़नेया लोहे के जंग खाने जैसा ही है। शरीर पर दिखने वाले बुढ़ापे के लक्षण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण ही होते हैं।वृद्धावस्था की कई बीमारियां भी इसी वजह से होती हैं।

युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली कम स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती हैलेकिन उम्र बढ़ने के साथहमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं या उसे हटानहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट-3 की जरूरतपड़ती हैलेकिन उम्र के साथ सर्ट-3 का लेवल भी कम हो जाता है। एंटी-एजिंग उपायों के लिए कुछ जीव-जंतुओंमें पाए जाने दीर्घायु संबंधी गुणों का भी अध्ययन किया जा रहा है। अमेरिकी और इस्राइली रिसर्चर यह पतालगाने की कोशिश कर रहे हैं कि पूर्वी अफ्रीका में पाए जाने वाले नेकेड मोल रैट के लंबे और सक्रिय जीवन काराज क्या है। चूहे के इस अनोखे रिश्तेदार में एनआरजी-1 नामक प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई हैजोकिअसामान्य बात है। मानव शरीर की तुलना में इस चूहे के शरीर पर एजिंग का प्रतिकूल प्रभाव बहुत कम पड़ताहै। 10 से 30 साल तक जीने वाला यह जंतु अंत-अंत तक अपनी बौद्धिक क्षमताप्रजनन शक्ति और बोन हेल्थ कोबनाए रखता हैजबकि सामान्य चूहा औसतन तीन साल में जर्जर बूढ़ा होकर मर जाता है।

कुछ वैज्ञानिक मनुष्यों को ज्यादा समय तक युवा बनाए रखने और उनके जीवन को लंबा करने के लिए फ्रूटफ्लाइज का अध्ययन कर रहे हैं। फ्रूट फ्लाइज और मनुष्यों के जीनों में करीब 60 प्रतिशत तक समानता होती है।दोनों में एजिंग की प्रक्रिया भी लगभग एक जैसी है। यूनिवर्सिटी कालेज लंदन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजिंगके वैज्ञानिक बुढ़ापे से निपटने के मकसद से आनुवंशिकी और लाइफ स्टाइल फैक्टरों का अध्ययन कर रहे हैं।इंस्टीट्यूट में रिसर्च टीम से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक मैथ्यू पाइपर का कहना है कि यदि हमें एजिंग से जुड़े जीन मिलजाते हैं तो एजिंग की घड़ी को हम आगे खिसका सकते हैं। डॉपाइपर के मुताबिक फू्रट फ्लाइज मनुष्यों की तरहही बूढ़ी होती हैं। प्रयोगशाला में जीनों के म्यूटेशन से भी कुछ जीव-जंतुओं का जीवन बढ़ाने में सफलता मिली है।जीवन को लंबा करने का एक और तरीका है आहार पर नियंत्रण। डॉपाइपर का कहना है कि यदि आप किसी चूहेके आहार में 40 प्रतिशत की कमी कर दें तो वह 20 या 30 प्रतिशत ज्यादा जीवित रहेगा। वैज्ञानिकों का दावा हैकि आहार पर नियंत्रण से मनुष्य का जीवन काल भी बढ़ाया जा सकता है।

 

हो रहा है बुढ़ापा रोकने का इंतजाम

भविष्य में एजिंग (बुढ़ापा) के इफेक्ट्स को रोकना संभव हो सकता है और बहुत मुमकिन है कि मनुष्य का जीवनकाल बढ़ाने का कोई कारगर तरीका भी हाथ लग जाए। वैज्ञानिक एजिंग की प्रक्रिया के पीछे मौजूद आणविक कारणों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

बर्कली स्थित युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (यूसी) में किए गए एक अध्ययन में इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता दर्ज की गई है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के नए तरीके विकसित करने की उम्मीद जग गई है। यूसी के रिसर्चरों ने अपने एक प्रयोग में एक बूढ़े चूहे की रक्त स्टेम कोशिका में एक दीर्घायु जीन मिला कर उसकी आणविक घड़ी को पीछे खिसका दिया। इससे बूढ़ी स्टेम कोशिकाओं में नई जान आ गई और वे फिर से नई ब्लड स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में समर्थ हो गईं। दीर्घायु जीन का नाम 'सर्ट 3' है।

यह दरअसल 'सर्ट' समूह का प्रोटीन है, जो ब्लड स्टेम कोशिकाओं को स्ट्रेस से निपटने में मदद करता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहे की ब्लड स्टेम कोशिकाओं में 'सर्ट 3' मिलाया तो नई ब्लड स्टेम कोशिका बनने लगी। यह इस बात का सबूत था कि बूढ़ी ब्लड स्टेम कोशिका के फंक्शन में वृद्धावस्था से जुड़ी गिरावट न सिर्फ रुक गई, बल्कि उसमें पुनर्जीवित होने की क्षमता भी उत्पन्न हो गई। जीव वैज्ञानिकों को पहले से इस बात की जानकारी थी कि सर्ट ग्रुप के प्रोटीन बुढ़ापे की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, लेकिन यूसी टीम के अध्ययन में पहली बार यह साबित हुआ कि यह प्रोटीन स्वास्थ्य में आने वाली बुढ़ापे से जुड़ी गिरावट को भी पलट सकता है।
प्रमुख रिसर्चर डेनिका चेन के अनुसार यह खोज बहुत रोमांचक है और इससे बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों के इलाज के तरीके विकसित करने का रास्ता खुल गया है। पिछले 10-20 वर्षों में वैज्ञानिकों को बुढ़ापे की प्रक्रिया को समझने में कई सफलताएं मिली हैं। वृद्धावस्था को अब अनियंत्रित और बेतरतीब प्रक्रिया नहीं माना जाता। यह बहुत ही नियंत्रित प्रक्रिया है, लेकिन इसमें फेरबदल की गुंजाइश मौजूद है। चेन के मुताबिक एक अकेले जीन के म्यूटेशन या परिवर्तन से जीवनकाल बढ़ाया जा सकता है। प्रश्न यह है कि क्या हम इस प्रक्रिया को समझ कर वृद्धावस्था को सचमुच पलट सकते हैं?

बुढ़ापे की प्रक्रिया में सर्ट ग्रुप के प्रोटीन की भूमिका स्पष्ट होने के बाद वैज्ञानिक इसे और ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश कर रहे हैं। सर्ट 3 प्रोटीन कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में पाया जाता है। कोशिका का यह हिस्सा उसका पावरहाउस कहलाता है और यह उसके विकास और मृत्यु को नियंत्रित करने में मदद करता है। पिछले अध्ययनों में पता चला था कि सट र्3 जीन कैलोरी में कटौती के दौरान सक्रिय होता है। प्रयोगों के दौरान एक बात यह भी सामने आई कि कैलोरी में कटौती अनेक प्रजातियों में जीवन काल बढ़ाने में सहायक होती है।

एजिंग के प्रभावों को समझने के लिए रिसर्चरों ने वयस्क स्टेम कोशिकाओं के काम का अध्ययन किया। वयस्कस्टेम कोशिकाएं टिशूज के रखरखाव और उनकी मरम्मत के लिए जिम्मेदार होती हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्टेमकोशिकाओं के इस फंक्शन में कमी आने लगती है। रिसर्चरों ने अपने अध्ययन के लिए रक्त स्टेम कोशिकाओं कोचुना क्योंकि वे ब्लड सिस्टम को पूरी तरह से पुनर्गठित करने की क्षमता रखती हैं।

रिसर्चरों ने सबसे पहले ऐसे चूहों के ब्लड सिस्टम का अध्ययन किया, जिनमंे सर्ट 3 प्रोटीन के जीन को निष्क्रियकर दिया गया था। हैरानी की बात यह थी कि युवा चूहों में सर्ट 3 की गैरमौजूदगी से कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिनजैसे-जैसे इन चूहों की उम्र बढ़ी, सर्ट 3 से युक्त सामान्य चूहों की तुलना में उनमें रक्त स्टेम कोशिकाओं की संख्याघटती गई और नई ब्लड कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने की उनकी क्षमता भी कम हो गई। इससे पता चलता हैकि युवा कोशिकाओं में ब्लड स्टेम कोशिकाएं ठीकठाक ढंग से काम करती हैं और उन्हें बहुत कम 'ऑक्सीडेटिवस्ट्रेस' का सामना करना पड़ता है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस शरीर के भीतर मेटाबोलिज्म अथवा कोशिकाओं में कुदरती रासायनिक प्रक्रियाओं का एकनुकसानदायक बायप्रॉडक्ट है। इससे शरीर पर बोझ बढ़ता है। मेटाबोलिज्म के दौरान ऑक्सीजन का एक स्वतंत्रअणु निकलता है, जिसे फ्री रेडिकल भी कहा जाता है। इसमें इलेक्ट्रिकल चार्ज होता है। यदि इस अणु को किसीएंटी ऑक्सीडेंट से तुरंत न्यूट्रलाइज नहीं किया जाता है तो यह और ज्यादा फ्री रेडिकल उत्पन्न करता है। इससेकोशिका की दीवार बनाने वाले प्रोटीन और यहां तक कि कोशिका के डीएनए को भी नुकसान पहुंचता है। फ्रीरेडिकलों का एक्शन एक कटे हुए सेब के भूरा पड़ने या लोहे के जंग खाने जैसा ही है। शरीर पर दिखने वालेबुढ़ापे के लक्षण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण होते हैं और वृद्धावस्था से जुड़ी कई बीमारियां भी इसी वजह से होतीहैं।

युवावस्था में शरीर की एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली थोड़े-बहुत स्ट्रेस को आसानी से झेल सकती है, लेकिन उम्र बढ़नेके साथ हमारा सिस्टम ठीक से काम नहीं करता क्योंकि हम या तो ज्यादा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस उत्पन्न करते हैं याउसे हटा नहीं पाते। इन स्थितियों में हमारी सामान्य एंटी-ऑक्सीडेंट प्रणाली काम नहीं करती और हमें सर्ट 3 कीजरूरत पड़ती है, लेकिन उम्र के साथ सर्ट 3 का लेवल भी कम हो जाता है। रिसर्चरों ने जब बूढ़े चूहों में सर्ट3 कालेवल बढ़ाया तो उनकी रक्त स्टेम कोशिकाएं पुनर्जीवित होने लगीं। इसके चलते उनकी ब्लड कोशिकाओं काउत्पादन बढ़ गया।

अभी यह देखना बाकी है कि सर्ट 3 की अत्यधिक अभिव्यक्ति क्या सचमुच में किसी की उम्र बढ़ा सकती है। लेकिनवैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन काल बढ़ाना ही इस रिसर्च का एकमात्र लक्ष्य नहीं है। आनुवंशिक नियंत्रण केज्ञान का उपयोग वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों के लिए किया जाएगा और यह एजिंग से संबंधित रिसर्च का एकप्रमुख लक्ष्य है। यूसी बर्कली में चेन की लैब में काम करने वाली एक अन्य वैज्ञानिक कैथरीन ब्राउन का कहना हैकि इस रिसर्च में सर्ट 3 से काफी उम्मीदें हैं। हमें इसमें काफी संभावनाएं दिखाई देती हैं। कुछ अन्य रिसर्चर इसप्रोटीन में ट्यूमर को दबाने के गुण को पहले ही उजागर कर चुके हैं। 

मानव क्लोनिंग अचानक करीब

वैज्ञानिकों ने त्वचा की स्टेम कोशिकाओं को प्रारंभिक भ्रूणों में बदल कर मानव क्लोनिंग में एक बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की है। स्टेम कोशिकाएं वे कोशिकाएं होती हैं, जो विभाजित होने के बाद शरीर की किसी भी विशिष्ट कोशिका के रूप में विकसित हो सकती हैं। नई तकनीक से उत्पन्न भ्रूणों का इस्तेमाल प्रत्यारोपण ऑपरेशनों के लिए विशिष्ट मानव टिशू उत्पन्न करने में किया गया है। क्लोनिंग तकनीक में यह सफलता डॉली नामक भेड़ के जन्म के 17 के बाद हासिल हुई है और इससे हृदय रोग और पार्किंसन जैसे बीमारियों के बेहतर इलाज की उम्मीदें जग गई हैं। लेकिन इस सफलता से कुछ नए विवाद खड़े हो सकते हैं। कुछ लोग मेडिकल उद्देश्यों के लिए मानव भ्रूण उत्पन्न करने पर नैतिक सवाल उठाएंगे। सबसे बड़ा खतरा यह है कि शिशु क्लोन चाहने वाले दंपतियों के लिए इसी तकनीक से परखनली भ्रूण उत्पन्न किए जा सकते हैं। बहरहाल, नई तकनीक विकसित करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि उनकी रिसर्च का मुख्य उद्देश्य मरीज की अपनी स्टेम कोशिकाओं से ऐसे विशिष्ट टिशू उत्पन्न करने का है, जिन्हें प्रत्यारोपण के लिए इस्तेमाल किया जा सके। उनका यह भी कहना है कि इस तकनीक का प्रजनन से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन दूसरे वैज्ञानिकों का मानना है कि इस उपलब्धि से हम शिशु क्लोन की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ गए हैं।
मरीज की स्टेम कोशिकाओं से समुचित मात्रा में भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करना चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती थी। अमेरिका में पोर्टलैंड स्थित ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के प्रमुख रिसर्चर शोहरत मितालिपोव ने बताया कि उन्होंने बहुत कम मात्रा में मानव अंडाणुओं से भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने के लिए सेल के कल्चर में कैफीन मिलाई थी। पहले यह सोचा गया था कि ऐसा करने के लिए हजारों मानव अंडाणुओं की जरूरत पड़ेगी। लेकिन मितालिपोव की टीम ने सिर्फ दो मानव अंडाणुओं से एक भ्रूण स्टेम कोशिका उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की। डॉ. मितालिपोव का कहना है कि यह तरीका मेडिकल इस्तेमाल के लिए ज्यादा कारगर और व्यावहारिक है। इस विधि से उन मरीजों के लिए स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न की जा सकती हैं, जिनके अंग बेकार या अशक्त हो चुके हैं। इससे उन रोगों से छुटकारा पाने मदद मिलेगी, जो दुनिया में लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं।
रिसर्चरों ने अपनी नई तकनीक में आनुवांशिक रोग वाले शिशु की स्किन कोशिकाएं निकाल कर उन्हें डोनेट किए गए मानव अंडाणुओं में प्रत्यारोपित कर दिया। इस विधि से उत्पन्न मानव भ्रूण आनुवंशिक दृष्टि से आठ महीने के भ्रूण से मिलते जुलते थे। भ्रूण से उत्पन्न कोशिकाओं में मरीज का ही डीएनए था, लिहाजा इन्हें बेहिचक मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जा सकता था। शरीर की प्रतिरोधी प्रणाली द्वारा उन्हें ठुकराने का कोई खतरा नहीं था। प्रयोगशाला में चूहों और बंदरों जैसे जानवरों में इस तकनीक से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में सफलता मिल गई थी, लेकिन मनुष्यों में इसको दोहराने के प्रयास विफल हो रहे थे क्योंकि मानव अंडाणु कोशिकाएं बेहद नाजुक होती हैं।

सेल पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च में वैज्ञानिकों ने अंडाणु के विकास में आने वाली समस्याओं से बचने के तरीके बताए और सिद्ध किया कि इस तकनीक से दिल, लिवर और स्नायु कोशिकाएं विकसित की जा सकती हैं। रिसर्चरों का विचार है कि पिछली क्लोनिंग तकनीकों की तुलना में नई विधि नैतिक दृष्टि से ज्यादा स्वीकार्य है क्योंकि इसमें निषेचित भ्रूणों का प्रयोग नहीं किया जाता। जापानी रिसर्चरों ने कुछ समय पहले मानव त्वचा से स्टेम सेल निकालने का तरीका विकसित किया था, लेकिन इसमें उन्होंने रसायनों का इस्तेमाल किया था। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरीके से जीनों में हानिकारक बदलाव हो सकते हैं।दक्षिण कोरिया की सोल नेशनल यूनिवर्सिटी के वू सुक ह्वांग के नेतृत्व में कुछ वैज्ञानिकों ने 2004 में क्लोनिंग से मानव भ्रूण उत्पन्न करने का दावा किया था। बाद में उन्होंने इन भ्रूणों से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं भी निकालने का दावा किया था। लेकिन अनैतिक आचरण और धोखाधड़ी के आरोपों के बाद उन्हें रिसर्च के नतीजों को वापस लेना पड़ा। इस प्रकरण से ह्वांग की काफी बदनामी भी हुई। कुछ अन्य रिसर्चरों ने भी क्लोनिंग से मानव भ्रूण उत्पन्न करने का दावा किया, लेकिन इनमें कोई भी यह साबित नहीं कर सका कि इन भ्रूणों से समुचित मात्रा में ऐसी भ्रूणीय कोशिकाएं उत्पन्न करना संभव है, जिन्हें प्रयोगशाला में विशिष्ट टिशू में बदला जा सके। डॉ. मितालिपोव की तकनीक की खास बात यह यह है कि क्लोन किए गए मानव भ्रूण 150 कोशिकाओं वाली अवस्था तक जीवित रह सकते हैं। इस अवस्था को ब्लास्टोसिस्ट भी कहते हैं। इस अवस्था से भ्रूण स्टेम कोशिकाएं निकाली जा सकती हैं, जिन्हें बाद में स्नायु कोशिकाओं, हृदय कोशिकाओं या जिगर की कोशिकाओं के रूप में विकसित किया जा सकता है। प्रत्यारोपण के दौरान मरीज द्वारा इन्हें खारिज किए जाने की कोई आशंका नहीं है क्योंकि इन कोशिकाओं को मरीज की अपनी आनुवंशिक सामग्री से ही उत्पन्न किया गया है।
इस क्लोनिंग तकनीक का दुरुपयोग संभव है। ह्यूमन जेनेटिक्स अलर्ट के निदेशक डेविड किंग का कहना है कि वैज्ञानिकों ने अंतत: वह रास्ता दिखा दिया है, जिसका मानव क्लोन बनाने में जुटे रिसर्चरों को बेसब्री से इंतजार था। उन्होंने कहा कि नई रिसर्च को प्रकाशित करना एक गैरजिम्मेदाराना कदम है। इस संबंध में और आगे रिसर्च शुरू होने से पहले ही हमें मानव क्लोनिंग पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने पर शीघ्र विचार करना चाहिए। कमेंट ऑन रीप्रॉडक्शन एथिक्स की जोसेफीन क्विंटावाल ने इस रिसर्च के औचित्य पर ही सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि स्टेम कोशिका उत्पन्न करने के गैरविवादित तरीके पहले से उपलब्ध हैं। ऐसे में इस रिसर्च की जरूरत क्या थी।

हमें उम्मीद करनी चाहिए कि इस रिसर्च को प्रजनन क्लोनिंग की तरफ मोड़ने की कोशिश नहीं की जाएगी। डॉ. मितालिपोव का कहना है कि वह क्लोनिंग के जरिए बंदर शिशु उत्पन्न करने में असफल रहे हैं। अत: इस बात की संभावना बहुत कम है कि इस तकनीक का प्रयोग मनुष्य के क्लोन उत्पन्न करने के लिए किया जाएगा। ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर मैरी हर्बर्ट का मानना है कि नई तकनीक शरीर को अशक्त बनाने वाली बीमारियों के इलाज के लिए मरीज की जरूरत के हिसाब से स्टेम कोशिकाएं उत्पन्न करने में मदद कर सकती है। एडिनबरा विश्वविद्यालय के डॉ. पॉल डि सूजा का मानना है कि महिलाओं के अंडाणुओं के बारे में हमारी बेहतर समझदारी से इनफर्टिलिटी के नए इलाज खोजे जा सकते हैं। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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ताजा मामला श्रृद्घा और आदित्य कपूर का

ताजा मामला श्रृद्घा और आदित्य कपूर का


आशिकी 2 की हिट जोड़ी आदित्य कपूर और श्रृद्घा कपूर के बीच कुछ चल रहा है ऐसी बातें इस फिल्‍म के रिलीज हाने के बाद से ही चर्चाओं में रही हैं।

अब इस बात पर मोहर लग गई। मुंबई के रेस्तरां में आधी रात के बाद इन दोनों को एकसाथ निकलते हुए देखा गया। कैमरे से बेपरवाह यह दोनों प्रेमी-प्रेमिका की तरह बिहेव कर रहे थे। 

कुछ दिन पहले अनुष्का का मामला

कुछ दिन पहले अनुष्का का मामला

कुछ दिनों पहले अनुष्का शर्मा और क्रिकेटर विराट कोहली को एक साथ एक साथ एक-दूसरे की बाहें थामें हुए देखा गया। विराट उस समय क्रिकेट के दौर पर न्यूजीलैंड में थे और अनुष्का उनसे मिलने के लिए वहां गईं थीं। कई ‌बार रणबीर-कैट भी

कई ‌बार रणबीर-कैट भी

रणबीर और कैटरीना में जब मोहब्बत परवान चढ़नी शुरू हुई तब इन्हें एक नहीं कई बार आधी रात के बाद रेस्तरां और बार से निकलते हुए देखा गया। कई बार कैटरीना अपनी शक्ल को ढकती हुई नजर आईं। इन दोनों को सार्वजनिक तौर पर विदेश में एक बीच पर बहुत कम कपडों में देखा गया। 
प्रियंका निकली शाहरुख के ऑफिस से

प्रियंका निकली शाहरुख के ऑफिस से

यह उन दिनों की बात है जब प्रियंका चोपड़ा और शाहरुख के बीच अफेयर की बाते लगातार चर्चाओं में थी। एक रात की बात है जब प्रियंका चोपड़ा शाहरुख खान के ऑफिस से रात 3 बजे निकलीं। यह उस समय की बात है जब डॉन 2 फिल्म बन रही थी। डॉन में शाहरुख और ‌प्रियंका चोपड़ा की जोड़ी थी। 

रणबीर-दीपिका भी

रणबीर-दीपिका भी

रणवीर सिंह और दीपिका पाद़कोन के साथ भी ऐसा कई बार हुआ जब कैमरे ने इन्हें रंगे हाथों पकड़ा। रणवीर सिंह और दीपिका सामान्य तरीके से दिखे भी नहीं। वह एक-दूसरे को चूमते हुए दिखे और ऐसा करना उन्हें सुर्खियों में ले आया। इनके साथ एक और किस्सा हेमा मालिनी की बेटी की शादी में हुआ। जहां ये एक-दूजे को चूमते हुए दिखे। sabhar :http://www.amarujala.com/

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सिर्फ अक्लमंद मर्दों की तरफ आकर्षित होती है ये लड़की

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Attracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria

हॉलीवुड अभिनेत्री इवा लोंगोरिया को पुरुषों की अक्लमंदी भाती है। फोटोः इंस्ताग्राम

Attracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria

सिर्फ अक्लमंद ही नहीं हंसमुख स्वभाव के मर्द भी इवा को बहुत भाते हैं।



सिर्फ अक्लमंAttracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria


इवा फिलहाल लैटिन अमेरिका की टेलिविसा मीडिया कंपनी के अध्यक्ष जोस एंटोनियो बेस्टन के साथ डेटिंग कर रही हैं।

Attracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria

पीपल' ऑनलाइन के मुताबिक, 2011 में टोनी पार्कर से तलाक लेने वाली इवा ने कहा, "मैं किसी पुरुष के हंसमुख स्वभाव और उनकी समझदारी से आकर्षित होती हूं।"


Attracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria

इवा (39) अपनी बढ़ती उम्र को लेकर चिंतित नहीं हैं। इवा का कहना है, "उम्र आपके नियंत्रण में नहीं होती, फिर इसे लेकर चिंतित क्यों होना?


Attracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria

इवा कहती हैं कि मैंने कभी नहीं चाहा कि मेरा 20वां दशक वापस आए। मैं उम्र का बाहें फैलाकर स्वागत करती हूं, क्योंकि मैं एक इंसान की तरह बढ़ना चाहती हूं और अधिक ज्ञान पाना चाहती हूं।
Attracted to humour, intellect in a man: Eva Longoria

इवा कहती हैं कि मेरे पास करने के लिए बहुत कुछ है और इसे बढ़ती उम्र के साथ ही किया जा सकता है।

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द ही नहीं हंसमुख स्वभाव के मर्द भी इवा को बहुत भाते हैं।

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बुधवार, 2 अप्रैल 2014

ट्रांसजेंडर्स के लिए भगवान है यह डॉक्टर, बौद्ध भिक्षु की भी कर चुका है सेक्स चेंज सर्जरी

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ट्रांसजेंडर्स के लिए भगवान है यह डॉक्टर, बौद्ध भिक्षु की भी कर चुका है सेक्स चेंज सर्जरी

सियोल। ट्रांसप्लांट सर्जरी, मेडिकल क्षेत्र में एक बहुत बड़ा कदम है। इसे ना सिर्फ लोगों की खोई हुई पहचान लौटाई, बल्कि तमाम मौकों पर नई जिंदगी भी दी। इस सर्जरी के मामले में दक्षिण कोरिया काफी तेजी से आगे निकल गया है। यहां आम सर्जरी के साथ ही लिंग परिवर्तन सर्जरी का चलन भी तेज़ी से बढ़ है। ऑपरेशन के जरिए लिंग परिवर्तन करने वाले डॉ. किम सियोक यहां ट्रांसजेंडर लोगों के लिए किसी भगवान से कम नहीं हैं। 
 
बौद्ध भिक्षु और जानी-मानी अभिनेत्री का लिंग परिवर्तन करने वाले डॉ. किम जानते हैं कि रूढ़ियों में फंसे इस देश में उनका काम बैचेनी पैदा कर देगा। एक बौद्ध भिक्षु को सर्जरी के जरिए पुरुष बनाने से पहले किम ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्होंने ईश्वरीय शक्ति को चुनौती देने का फैसला किया है। 
 
किम ने बताया कि उन्हें बहुत दर्दनाक लगा कि ये ऑपरेशन करना चाहिए या नहीं क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि वो कहीं भगवान को चुनौती तो नहीं दे रहे। किम ने कहा कि किसी तरह से उन्होंने शर्म की भावना से खुद को निकाला। उनके मरीजों के लिए ये सर्जरी बहुत जरूरी थी। बिना इसके वो अपनी ही जान ले लेते। 
 
28 वर्षों में किए 320 ऑपरेशन
 
डॉ. किम दक्षिण कोरिया में लैंगिकता और लिंग को लेकर धीरे-धीरे बदल रहे विचारों के प्रवर्तक हैं। दक्षिण कोरिया में लैंगिकता जैसे विषय पर विचार-विमर्श वर्जित माना जाता है। डॉ किम ने 28 बरसों में लिंग परिवर्तन के 320 ऑपरेशन किए हैं। देश में शायद ही किसी डॉक्टर ने इतने ऑपरेशन किए हों। 
 
डॉ किम ने बताया 11 घंटे की सर्जरी कराने वाले बौद्ध भिक्षु इंटरव्यू के जरिए दुनिया के सामने नहीं आना चाहते, क्योंकि उन्हें डर है कि इस बात से उनके मंदिर के बौद्ध भिक्षुओं को ठेस ना पहुंचे। डॉ किम ने बताया कि बौद्ध भिक्षु हार्मोन थैरेपी ले रहे हैं और वो लंबे समय तक एक पुरुष की तरह जिंदगी जी सकते हैं।
ट्रांसजेंडर्स के लिए भगवान है यह डॉक्टर, बौद्ध भिक्षु की भी कर चुका है सेक्स चेंज सर्जरी

डॉ किम कब से कर रहे हैं सर्जरी
 
डॉ किम एक प्लास्टिक सर्जन के तौर पर बुसान के डॉन्ग-ए यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में काम कर रहे हैं। इन्हें सर्जरी के जरिए चेहरे की विकृतियां दूर करने में महारथ हासिल है। उन्होंने लिंग परिवर्तन ऑपरेशन करने की शुरुआत 1986 में की, जब बहुत से ट्रांसजेंडर लोगों ने उनसे जननांग के निर्माण की बात कही। किम ने बताया कि सबसे पहले आने वाले शख्स ने भी अपना लिंग परिवर्तन कराया था।
 
डॉ किम उन्हें समझा-बुझाकर वापस भेज देते, क्योंकि उन्हें लिंग परिवर्तन सर्जरी की ज्यादा जानकारी नहीं थी। हालांकि, उन्होंने इस बारे में सोचना शुरू किया और इस बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। कुछ साल बाद उन्होंने सर्जरी करने की शुरुआत कर दी। 
 
किम कहते हैं कि कुछ लोग बिना जननांगों या फिर कटे हुए कान, ओंठ और अंगुलियों के साथ पैदा होते हैं। ईश्वर क्यों लोगों को ऐसे बनाता है, क्या ये ईश्वर की गलती नहीं? क्या ट्रांसजेंडर लोग ईश्वर की गलती नहीं? डॉ किम को इस बात की बहुत खुशी है कि उन्हें ऐसे लोगों की मदद करने का मौका मिला, जिन्हें लगता है कि उन्हें गलत शरीर मिल गया। किम का विश्वास है कि वो भगवान से हुई गलतियों को दुरुस्त कर रहे हैं।

ट्रांसजेंडर्स के लिए भगवान है यह डॉक्टर, बौद्ध भिक्षु की भी कर चुका है सेक्स चेंज सर्जरी


किम ने कैसे विरोध का किया सामना
 
डॉ किम ने जब पहली बार इस तरह की सर्जरी करनी शुरू की, तो उनके पादरी ने इसका विरोध किया। उनके दोस्तों और सहयोगी डॉक्टरों ने तो यहां तक कह डाला कि अगर उन्होंने ये काम बंद नहीं किया तो वो नरक में जाएंगे। 
 
दक्षिण कोरिया में यौन अलपसंख्यकों के खिलाफ बहुत जबरदस्त पूर्वाग्रह है। कन्फ्यूशियस मत के मुताबिक ऐसे बच्चों को कभी भी अपने शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, जो उन्हें उनके माता-पिता से मिला है। देश में रुढ़िवादी ईसाई समुदाय और पिछले सेना समर्थित तानाशाह यौन अल्पसंख्यकों की आवाज को अनसुना करते हैं। 
 
सियोल में क्रिश्चियन काउंसिल के अध्यक्ष हॉन्ग जे चुल ने कहा कि लिंग परिवर्तन ऑपरेशन ईश्वर की निंदा है और ये दुनिया को बेहद तकलीफदेह जगह बनाती है। उन्होंने डॉ किम को घृणा योग्य और बेचारा करार दिया।

ट्रांसजेंडर्स के लिए भगवान है यह डॉक्टर, बौद्ध भिक्षु की भी कर चुका है सेक्स चेंज सर्जरी

डॉ किम की खास मरीज एक्ट्रेस हरिसु
 
डॉ किम की सबसे बेहतरीन मरीजों में दक्षिण कोरिया की सबसे लोकप्रिय ट्रांससेक्सुअल इंटरटेनर हरिसु हैं, जिन्होंने 2007 में मेल सिंगर से शादी कर ली। सियोल में एक इंटरव्यू के दौरान हरिसु ने बताया कि 1995 में जब उन्होंने सर्जरी कराई थी, तो वो दौर उनके बेहद दर्द से भरा रहा। कुछ दिनों बाद हॉस्पिटल से बाहर आने पर हरिसु को ऐसा लगा कि जैसे उन्हें दूसरा जन्म मिल गया हो। डॉ किम से सर्जरी कराने वाले ज्यादातर मरीज इस वक्त अपनी जिंदगी के 40 से 50 से दशक में हैं। 
 
शुरुआती दौर में कभी-कभी मां-बाप सर्जरी से पहले गुस्सा करते हैं और उन्हें स्वीकार करने से मना कर देते हैं। हालांकि, आज के वक्त में लिंग परिवर्तन ऑपरेशन करवाने वालों में 20 साल में उम्र के लोग भी शामिल हैं और उनके माता-पिता सर्जरी के लिए उनकी हर तरह की मदद भी करते हैं। पुरुष से महिला बनने के क्रम में करीब 10,210 से 13,920 डॉलर तक का खर्च है। वहीं, महिला से पुरुष बनने की प्रक्रिया में करीब 28,760 डॉलर का खर्च आता है। sabhar :http://www.bhaskar.com/

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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

यहां कैमरे में सामने सेक्स करना पसंद करती हैं लड़कियां: सर्वे

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क्या कहता है सर्वे


क्या कहता है सर्वे


एक सर्वे के मुताबिक, एक ऐसा देश है जहां 40 से कम उम्र की लड़कियां कैमरे के सामने सेक्स करती हैं। जानिए, और क्या कहता है ये सर्वे।

डेली मेल पर प्रकाशित, एक ताजा जानकारी के अनुसार ब्रिटेन की 40 साल की कम उम्र की 21 फीसदी महिलाओं किसी न किसी तरीके से कैमरे के सामने सेक्स किया है, जबकि दस में से तीन ने खुद की न्यूड तस्वीर खींचती हैं।

किस उम्र की लड़कियां करती हैं कैमरे के सामने सेक्स

यूगोव के एक सर्वे में 15 फीसदी महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे वेबकेम के सामने न्यूड हुई है जबकि तीस फीसदी लोगों ने बताया कि उन्‍होंने पारंपरिक या मोबाइल कैमरे से अपनी न्यूड तस्वीर ली है।

दिलचस्प बात यह है कैमरे के सामने न्यूड होने का चलन बड़ी महिलाओं में नहीं पाया गया। चालीस साल की उम्र से बड़ी केवल आठ फीसदी महिलाओं ने इस बात को स्वीकार किया कि वो कैमरे के सामने न्यूड हुई हैं।

अंजान लोग कर रहे हैं ऑनलाइन सेक्स

सर्वे में पाया गया साइबर सेक्स के लिए 34 फीसदी पुरुषों ने सेक्सी और अश्लील फोटोज वेबकेम या वीडियो फ़ोन के माध्यम से भेजे हैं।

स्टडी में यह भी पाया गया कि 60 फीसदी लोगों ने वैसे लोगों के साथ ऑनलाइन सेक्स में हिस्सा लिया है जिन्हे वे पहले से नहीं जानते थे।

ऑनलाइन सेक्स का जरिया क्या है

कुल मिलकर 18 की उम्र से ज्यादा 1612 पुरुषों और महिलाओं ने स्वीकार किया कि वे नियमित रूप से सेक्सुअली सक्रिय हैं।

डिजिटल सेक्स का सबसे लोकप्रिय माध्यम है सेक्सटिंग(37 फीसदी), दूसरे नंबर पर आता है वीडियोफोन (30 ) फीसदी और तीसरे नंबर पर था वेबकेम सेक्स (26 फीसदी)।

छह फीसदी लोगों ने बताया कि वे ऐसे लोगों के साथ इंटरैक्ट करते है जो उनके मौजूदा पार्टनर नहीं हैं और ऑनलाइन सेक्सुअल रिलेशनशिप एकमात्र जरिया है जिसके माध्यम से वे एक दूसरे से बात कर सकते हैं या देख सकते हैं। sabhar :http://www.amarujala.com/


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ऐप बचाएगा अनचाही मुलाकातों से

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चाहे पूर्व प्रेमी हो या पुराना दुश्मन, अगर कोई आप को फूटी आंख नहीं सुहाता या कोई आपको नापसंद करता है तो अब एक ऐप आपको ऐसे लोगों से मुलाकातें रोकने में मदद कर सकता है.
frau im boot Handy


कभी न कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ होगा जब दफ्तर या मुहल्ले में आपकी किसी से बहस या काफी तेज झड़प हुई हो और मजबूरी में हर दिन जाना वहीं पड़ता हो. ऐसी अटपटी स्थिति से निकलने में मदद करने के लिए अब तकनीक आ गई है. अब किसी ऐसे इंसान के सामने आकर अपना मूड खराब करने की कोई जरूरत नहीं जिससे आप नहीं मिलना चाहते. इसमें तकनीक आपकी मदद कर सकती है. करना सिर्फ यह होगा कि अपने स्मार्टफोन के फेसबुक या ऐसे किसी दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल करते हुए आपको फोन में अपनी लोकेशन बताने वाला बटन ऑन रखना होगा. इसके अलावा इस ऐप में आपको उस इंसान का नाम और संबंधित जानकारियां भी देनी होगी जिसे आप देखना भी नहीं चाहते.
आपकी सही लोकेशन पता होने के कारण आपके फोन का ऐप न सिर्फ आपको आगाह कर देगा कि वह व्यक्ति आपके आसपास है. बल्कि उस जगह के नक्शे का इस्तेमाल कर आपको वहां से निकलने का रास्ता भी बता देगा. इस तरह आप एक ऐसे अनुभव से खुद को बचा पाएंगे जो आपके लिए बहुत सुखद नहीं होता. लेकिन यह भी जाहिर है कि ऐसे व्यक्ति के बारे में कुछ जानकारियां आपके पास होनी चाहिए. वह इंसान जिससे आप मिलना नहीं चाहते, वह आपके सोशल नेटवर्क का हिस्सा होना चाहिए. यह एक दुविधा भी है कि अगर आप किसी से दूर रहना चाहते हैं तो भला उसे फेसबुक या किसी अन्य साइट पर जुड़े क्यों रहेंगे.
बाजार में एक से बढ़ कर एक नए नए ऐप आ रहे हैं. पिछले दिनों लंदन की एक कंपनी ने एएसएपी54 नाम का एक बहुत दिलचस्प ऐप बनाया है. मान लीजिए कि आपने सड़क पर जा रहे किसी के कपड़े या जूते पसंद आते हैं लेकिन आप उस अनजान व्यक्ति से जाकर पूछ नहीं सकते कि उसने वह चीज कहां से खरीदी. ऐसे में यह एएसएपी54 ऐप आपको बता देगा कि उसे कहां से खरीदा जा सकता है और वह आपके लिए उस कपड़े या जूते को ऑनलाइन बुक भी कर सकता है. जाहिर है कि ऐप चीजों को तभी पहचान सकता है अगर आपके फोन का कैमरा अच्छा है और तस्वीर साफ आई हो.
रिपोर्ट: ऋतिका राय (रॉयटर्स)
संपादन: आभा मोंढे
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क्रिस गोपालकृष्णन : पहले शख्स जिन्होंने साइंस के लिए दिए 225 करोड़ रुपए

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क्रिस गोपालकृष्णन : पहले शख्स जिन्होंने साइंस के लिए दिए 225 करोड़ रुपए

परिवार : पिता- पीजी सेनापति (प्लंबिंग का बिज़नेस), पत्नी- सुधा (‘प्रतीक्षा’ ट्रस्ट की सह-संस्थापक), 14 वर्षीय बेटी मेघना
 
क्यों चर्चा में- उनके ट्रस्ट ‘प्रतीक्षा’ ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस को ब्रेन रिसर्च सेंटर बनाने के लिए 225 करोड़ रु. दिए हैं। आईआईएससी के 105 सालों के इतिहास में पहली बार किसी एक व्यक्ति ने इतनी बड़ी राशि दान दी। 
 
क्रिस का सांइस से लगाव बचपन से था। जिस उम्र में बच्चे खेलते-कूदते, वे चीज़ें बनाते, बिगाड़ते और दोबारा बनाने लगते। ऐसा करने से उनके अभिभावकों ने न कभी रोका, न प्रोत्साहित किया। वे इंजीनियर बनना चाहते थे। परिवार में कोई डॉक्टर नहीं था, इसलिए पिता ने मेडिसिन पढ़ने को कहा।
 
उन्होंने मेडिकल एंट्रेंस पास करने के लिए जी-जान लगा दी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मात्र दो नंबरों से मेडिकल सीट हाथ से निकल गई। पिता का मामूली बिज़नेस था। उनके पास डॉक्टरी की सीट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। खुद पर पूरा यकीन था कि डॉक्टर ही बनेंगे इसलिए कोई प्लान-बी था ही नहीं। किसी इंजीनयरिंग कॉलेज का फॉर्म नहीं भरा था। डॉक्टरी की तैयारी में दो साल बर्बाद हो चुके थे। 
 
इस विफलता के बाद पिता ने उन्हें कुछ कहना छोड़ दिया। उनका आत्मविश्वास कांपने लगा, पर संघर्ष जारी रहा। काफी जद्दोजहद के बाद सब्जेक्ट बदल पाए। लोकल कॉलेज से फिजिक्स में बीएससी किया। गणित उनकी समझ से बाहर था। उनका आत्मविश्वास दोबारा डगमगाया।
 
ट्यूशन टीचर सीसी फिलिप्स ने गणित में मदद की। खोया हुआ आत्मविश्वास लौटने लगा और वे यूनिवर्सिटी में पांचवें स्थान पर आए। इसी दौरान किसी ने उन्हें आईआईएम में पढ़ने की सलाह दी और वे फॉर्म भर आए। तैयारी शुरू कर दी। एंट्रेंस टेस्ट पास कर लिया। इंटरव्यू तक पहुंचे। अंग्रेज़ी कमजोर होने के कारण बात नहीं बनीं। किसे मालूम था कि जिस आईआईएम ने उन्हें नकार दिया था, वे एक दिन उसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में होंगे। 

21 साल की उम्र में उन्होंने आईआईटी मद्रास से फिजिक्स में एमएससी और 23वें साल में कंप्यूटर साइंस में एमटेक किया। कैंपस प्लेसमेंट में पटनी कंप्यूटर के संस्थापक नरेंद्र पटनी ने नौकरी दी और कहा, ‘मुझे शांत और मेहनती व्यक्ति की तलाश थी। ये दोनों बातें तुममें हैं’। इंट्रोवर्ट नेचर उनकी ताकत बना। वे पटनी कंप्यूटर्स में कोर टीम के सदस्य बने। एनआर नारायण मूर्ति भी इस टीम में थे जिन्होंने बाद में इन्फोसिस की स्थापना की। 1981 में इन्फोसिस की स्थापना हुई। वे सात संस्थापकों में से एक थे। इन्फोसिस और अमेरिकी कंपनी केएसए के जॉइंट वेंचर की जिम्मेदारी संभालने के लिए 1987 में अमेरिका चले गए और 1994 में भारत लौट आए। उन्हें डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया गया। इन्फोसिस बनने के २६ साल के बाद वे सीईओ बने। 51 वर्षीय क्रिस ने जुलाई 2007 में सीईओ का पद संभाला। इससे पहले वे सीओओ और प्रेसीडेंट थे।
वे गैजेट फ्रीक हैं। यहां तक कि हर महीने लेटेस्ट स्मार्टफोन खरीद सकते हैं। 2009-10 में उन्होंने पत्नी के साथ ‘प्रतीक्षा’ ट्रस्ट बनाया जो पढ़ाई में जरूरतमंद बच्चों की आर्थिक मदद करता है। जनवरी 2011 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था और इसी साल अगस्त से मई 2013 तक एग्ज़ीक्यूटिव को-चेयरमैन रहे और जून 2013 में एग्ज़ीक्यूटिव वाइस चेयरमैन बना दिया गया। हाल ही में प्रतीक्षा ट्रस्ट ने आईआईएससी को ब्रेन रिसर्च सेंटर बनाने के लिए 225 करोड़ रुपए डोनेट किए हैं
sabhar : bhaskar.com



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दुनिया की वो अविश्वसनीय जगहें, जहां आप जरूर जाना चाहेंगे

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दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं जिनके बारे में हमने सुना भी नहीं होगा. यहां हम बता रहे हैं ऐसी ही कुछ अविश्वसनीय जगहें जो देखने में आपको एक पेंटिंग या किसी साइंस फिक्शन फिल्म के सीन की तरह लगेंगी.

झांगे डेक्सिया लैंडफोर्म (Zhangye Danxia Landform), गांसू, चीन
ये रंग-बिरंगी चट्टानें यहां 24 मिलियन सालों से ज्यादा समय से मौजूद लाल बलुआ पत्थर और खनिज भंडारों का नतीजा हैं. हवा और बारिश के कारण इन चट्टानों की आकृति हैरान कर देने वाली हो गई.




युआनयंग काउंटी (Yuanyang County), चीन
ये हैं धान के खेत, जो कि एलाओ माउंटेंस की ढलानों पर दिखते हैं. यहां की खेती की तकनीक और हवाओं के कारण इस तरह का दृश्य बनता है.


फोटो: स्त्रोत : wikimedia.org




वाटरफाल, मोरिशियस आइसलैंड
समुद्री लहरें और उनके साथ आने वाली रेत के कारण ये आकृति बनी. ऐसा लगता है जैसे समंदर में ही झरना हो.
फोटो: स्त्रोत: whenonearth.net



अंडरवाटर रिवर, (Underwater River, Cenote Angelita) मेक्सिको
सीनोट एंजेलिटा के पानी के अंदर भी पानी. ये नदी हाइड्रोजन सल्फेट से लबालब भरी है जो कि सामान्य नमक वाले पानी से भारी होता है.
फोटो: स्त्रोत: anatoly.pro


टरक्वाइज आइस (Turquoise Ice), लेक बैकल, रूस
बैकल झील दुनिया की सबसे पुरानी मीठे पानी की झीलों में से एक है. सर्दियों में ये झील जम जाती है. लेकिन पानी इतना साफ होता है कि बर्फ के अंदर 130 फीट तक आप देख सकते हैं.

फोटो: स्त्रोत: reddit.com





टनल ऑफ लव (Tunnel of Love), क्लेवन, यूक्रेन
यहां के घने पेड़ों से होकर दिन में तीन बार ट्रेन गुजरती थीं. कई सालों बाद इस जगह ने ये आकार ले लिया. अब यहां ट्रेन नहीं आती लेकिन ये एक रोमांटिक स्पॉट है.
फोटो: स्त्रोत: 500px.org



दि ई ऑफ अफ्रीका, मॉरितानिया
ये जगह सहारा रेगिस्तान के बीचोबीच है. इसका व्यास 24 मील का है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसा क्षुद्रगह के कारण हुआ.
फोटो: स्त्रोत : abduzeedo.com



सोकोट्रा, यमन
यहां के ड्रैगन ब्लड पेड़ छतरी जैसे शेप ले लेते हैं.
फोटो: स्त्रोत: mymodernmet.com


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