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शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

कुत्ता जिसने दुनिया को परमाणु युद्ध से बचा लिया

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पुशिंका

शीतयुद्ध के दौरान सोवियत नेता ख्रुश्चेव और अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी नियमित रूप से पत्राचार कर रहे थे. दोनों देशों के बीच जारी शत्रुता के बीच इन दोनों नेताओं ने उपहारों का लेन-देन भी किया. इन उपहारों में पुशिंका नाम का कुत्ता भी शामिल था, जिसकी माँ लाइका अंतरिक्ष में जाकर जीवित लौटने वाली पहली कुतिया थी.
जापान में अमरीका की राजदूत क्लिक करेंकैरोलिन कैनेडी कहती हैं, "मेरी माँ ने मुझे एक मज़ेदार कहानी सुनाई थी." वे करीब पचास साल पहले व्हाइट हाऊस में एक बच्ची के रूप में बड़ी हो रही थीं.

कहां से आया पिल्ला
कैरोलिन कैनेडी वियना में आयोजित एक सरकारी भोज के दौरान ख्रुश्चेव के बगल में बैठी थीं. वह ढेर सारी चीज़ों के बारे में लगातार बातें कर रही थीं, उन्होंने कुत्ते स्ट्रेलका के बारे में भी पूछा, जिसे रूस ने अंतरिक्ष में भेजा था. इस बातचीत के दौरान मेरी माँ ने स्ट्रेका के पिल्लों के बारे में पूछा.
"पुश्किना काफ़ी आकर्षक और रोयेंदार थी, वास्तव में अपने रूसी नाम के अर्थ की तरह काफी नर्म रोयें वाली थी."
कैरोलिन कैनेडी, जॉन एफ़ कैनेडी की बेटी
कुछ महीनों बाद मेरे घर एक पिल्ला आया और मेरे पिता को पता नहीं था कि वह कहाँ से आया है और उनको यक़ीन नहीं हो रहा था कि मेरी माँ ने इसे मुमकिन बनाया है.
वह पिल्ला स्ट्रेलका का था जिसका नाम था पुशिंका, जिसे उसके आधिकारिक पंजीकरण प्रमाणपत्र में संकर प्रजाति का बताया गया था.
कैनेडी कहती हैं, "पुशिंका काफ़ी आकर्षक और रोयेंदार थी, वास्तव में अपने रूसी नाम के अर्थ की तरह काफी नर्म रोयें वाली थी."
कैनेडी ने ख्रुश्चेव को 21 क्लिक करेंजून 1961 के लिखे पत्र में सुंदर उपहार के लिए शुक्रिया कहा है.
इतिहासकार मार्टिन सैंडलेर ने कैनेडी के पत्रों का दो संग्रह प्रकाशित किया है. वह कहते हैं, "पत्रों में संवाद की गर्माहट काफ़ी रोचक है. उन दोनों को पता है कि वे दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति हैं."
लेकिन वह कहते हैं, "पूरे पत्राचार के दौरान दोनों एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश करते हैं."

आगे निकलने की होड़

जॉन एफ़ कैनेडी और निकिता ख्रुशचेव
जॉन एफ़ कैनेडी और निकिता ख्रुशचेव के बीच शीत युद्ध के दौरान लगातार संवाद जारी था.
कैनेडी साल 1960 के अंत तक चाँद की धरती पर एक इंसान को उतारने की कोशिश के बाद काफ़ी ख़ुश थे. स्पुतनिक के जाने के बाद बाकी अमरीकियों की तरह वह ख़ुशी से अभिभूत थे.
पुशिंका की माँ स्ट्रेलका और एक अन्य कुत्ता बेल्का धरती से अंतरिक्ष में जाने वाले और जीवित रहने वाले पहले प्राणी थे. इससे यह तथ्य रेखांकित होता है कि सोवियत यूनियन अंतरिक्ष की दौड़ में अमरीका से काफ़ी आगे था.
एक कर्मचारी ट्रैफ्स ब्रायन के मुताबिक़, पुशिंका जल्दी ही व्हाइट हाऊस में पहुंचा दी गई थी.
ब्रायन ने जॉन एफ़ कैनेडी प्रेसिडेंशियल लायब्रेरी एण्ड म्युज़ियम को बताया कि पुशिंका सीढ़ियां चढ़कर कैरोलाइन प्लेहाऊस तक जा सकती थी."
उन्होंने बताया, "राष्ट्रपति कैनेडी ने मुझसे पूछा कि मैंने उसे सीढ़ियों पर चढ़ना कैसे सिखाया? तो मैंने बताया कि हर स्टेप पर मूँगफली रखकर उसे सीढ़ियां चढ़ना सिखाया. जब मैंने उन्हें तस्वीरें दिखायीं तो वो हँस पड़े थे."

"उसे मूँगफली मत खिलाओ"

"उनके पिता ने सोचा कि यह उपहार परिवार के लिए बेहद सुंदर होगा और राजनीति के लिए भी अच्छा होगा."
सर्गेई ख्रुशचेव, निकिता ख्रुशचेव के बेटे
ब्रायन ने बताया,"कैरोलिन ने मुझसे एक बार कहा कि पुशिंका को मूँगफली मत खिलाओ. जानवरों के डॉक्टर का कहना है कि यह उसके लिए अच्छा नहीं है. तबसे मैंने उसे मूँगफली खिलाना छोड़ दिया."
राजदूत कैरोलिन ने बताया, ''कैनेडी के एक अन्य कुत्ते से पुशिंका को पिल्ले होने पर मैं बेहद ख़ुश थी. मैंने उनको ब्लैकी, व्हाइट टिप्स, बटरफ्लाई और स्ट्रीकर जैसे नाम दिए.''
राष्ट्रपति कैनेडी उन्हें 'द पपनिक्स' कहकर बुलाते थे. ब्रायन ने बताया कि उन्हें पिल्लों के बारे में सवाल पूछना अच्छा लगता था. वो कई सवाल पूछते थे जैसे, "कब तक उनकी आँखें बंद रहेंगी? कब वे खाना शुरू करेंगे? कितने दिनों में वे चलने लगेंगे? वे घास के लॉन में खेलने कब तर जा सकेंगे? उनके बाल छोटे होंगे या बड़े?"
राष्ट्रपति ने ब्रायन से कहा कि एक दिन वह पुशिंका और उसके पिल्लों को घर लाएं ताकि बच्चों को हैरान किया जा सके.
उन पिल्लों को पाने के लिए करीब पाँच हज़ार लोगों ने व्हाइट हाउस को पत्र लिखा. इसके कारण बटरफ्लाई और स्ट्रीकर को मिडवेस्ट के बच्चों को दे दिया गया, जबकि टिप्स और ब्लैकी को परिवार के मित्रों के घर पहुंचा दिया गया.

उपहार और कूटनीति

जॉन एफ़ कैनेडी अपने परिवार के साथ
जॉन एफ़ कैनेडी अपने परिवार के साथ पुशिंका के बच्चों के साथ.
पुशिंका ने परिवार के लोगों के साथ खेलने का समय कम कर दिया था.
जापान में राजूदत रहीं कैरोलिन ने बताया कि पुशिंका को एक साइंस लैब में विकसित किया गया था.
इस बीच सर्गेई ख्रुश्चेव और कैनेडी के बीच लगातार बातचीत आगे बढ़ रही थी जो अक्सर काफ़ी गुप्त तरीके से होती थी.
निकिता ख्रुश्चेव के बेटे, सर्गेई ख्रुश्चेव जो अमरीका में रहते हैं उन्होंने बताया, "उनके पिता ने सोचा कि यह उपहार परिवार के लिए बेहद सुंदर होगा और राजनीति के लिए भी अच्छा होगा."
उन्होंने कहा, "मेरे पिता लोगों से नियमित रूप से संवाद करते थे क्योंकि वो तनाव को कम करना चाहते थे और नाभिकीय परीक्षणों को रोकना चाहते थे."
सर्गेई ख्रुश्चेव ने उन मीडिया ख़बरों को ख़ारिज कर दिया कि उनके पिता कैनेडी को कमज़ोर और अनुभवहीन समझते थे. उन्होंने कहा कि वास्तव में उनके पिता साल 1961 में कैनेडी की तरफ़ से वियना वार्ता तोड़ने की बात न कहने के कारण काफ़ी सम्मान करते थे.

नाभिकीय विनाश का ख़तरा

वियना वार्ता के ठीक 16 महीनों बाद अक्टूबर 1962 में अमरीका और सोवियत यूनियन परमाणु युद्ध की कगार पर खड़े थे, इसके थोड़े दिनों बाद पुशिंका को अमरीका पहुंचाया गया था.
अमरीका के पास तस्वीरें थीं कि रूस की मिसाइलें क्यूबा में तैनात थीं और ये हथियार वॉशिंगटन और अमरीका के अन्य शहरों को तबाह करने में सक्षम थीं.
आख़िर में ख्रुश्चेव मिसाइलों को वापस लेने पर सहमत हो गए और मिसाइलों को सोवियत यूनियन भेज दिया गया था.
इसके बदले में अमरीका ने वादा किया था कि वह क्यूबा पर हमला नहीं करेगा.
सैंडलर मानते हैं कि दोनों नेताओं के बीच होने वाले संचार और उपहारों के आदान-प्रदान (जिसमें यह कुत्ता भी शामिल है) से काफ़ी फर्क़ पड़ा.

आख़िर में वह कहते हैं कि इसने दुनिया को नाभिकीय विनाश से बचा लिया.  sabhar :http://www.bbc.co.uk

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'ॐ' के प्रणव नाम से जुड़ी शक्तियों, स्वरूप व प्रभाव के गहरे रहस्य

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'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते

सनातन धर्म और ईश्वर में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति देव उपासना के दौरान शास्त्रों, ग्रंथों में या भजन और कीर्तन के दौरान 'ॐ' महामंत्र को कई बार पढ़ता, सुनता या बोलता है। धर्मशास्त्रों में यही 'ॐ' प्रणव नाम से भी पुकारा गया है। असल में इस पवित्र अक्षर व नाम से गहरे अर्थ व दिव्य शक्तियां जुड़ीं हैं, जो अलग-अलग पुराणों और शास्त्रों में कई तरह से उजागर हैं।
खासतौर पर शिवपुराण में 'ॐ' के प्रणव नाम से जुड़ी शक्तियों, स्वरूप व प्रभाव के गहरे रहस्य बताए हैं। अगली स्लाइड्स पर क्लिक कर जानिए शिवपुराण के अलावा अन्य धर्मग्रंथों की मान्यता व विज्ञान के नजरिए से 'ॐ' बोलने के शुभ प्रभाव क्या हैं-  
'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते

शिवपुराण में प्रणव यानी  'ॐ' के अलग-अलग शाब्दिक अर्थ, शक्ति और भाव बताए गए हैं। इनके मुताबिक-  
- प्र यानी प्रपंच, न यानी नहीं और व: यानी तुम लोगों के लिए। सार यही है कि प्रणव मंत्र सांसारिक जीवन में प्रपंच यानी कलह और दु:ख दूर कर जीवन के सबसे अहम लक्ष्य यानी मोक्ष तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि ॐ को प्रणव नाम से जाना जाता है। 
- दूसरे अर्थों में प्रनव को 'प्र' यानी यानी प्रकृति से बने संसार रूपी सागर को पार कराने वाली 'नव' यानी नाव बताया गया है। 
- इसी तरह ऋषि-मुनियों की दृष्टि से 'प्र' - प्रकर्षेण, 'न' - नयेत् और 'व:' युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणव: बताया गया है। इसका सरल शब्दों में मतलब है हर भक्त को शक्ति देकर जनम-मरण के बंधन से मुक्त करने वाला होने से यह प्रणव है। 
- धार्मिक दृष्टि से परब्रह्म या महेश्वर स्वरूप भी नव या नया और पवित्र माना जाता  है। प्रणव मंत्र से उपासक नया ज्ञान और शिव स्वरूप पा लेता है। इसलिए भी यह प्रणव कहा गया है।

'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते

शिवपुराण की तरह अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों में भी प्रणव यानी ॐ ऐसा अक्षर स्वरूप साक्षात् ईश्वर माना जाता है और मंत्र भी। इसलिए यह एकाक्षर ब्रह्म भी कहलाता है। धार्मिक मान्यताओं में प्रणव मंत्र में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सामूहिक शक्ति समाई है। यह गायत्री और वेद रूपी ज्ञान शक्ति का भी स्त्रोत माना गया है। 
'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते

आध्यात्मिक दर्शन है कि प्रणय यानी ॐ बोलने या ध्यान से शरीर, मन और विचारों पर शुभ प्रभाव होता है। वैज्ञानिक नजरिए से भी प्रणव मंत्र यानी ॐ बोलते वक्त पैदा हुई शब्द शक्ति और ऊर्जा के साथ शरीर के अंगों जैसे मुंह, नाक, गले और फेफड़ो से आने-जाने वाली शुद्ध वायु मानव शरीर के स्वास्थ्य के लिए जरूरी अनेक हार्मोन और खून के दबाव को नियंत्रित करती है। 
इसके असर से मन-मस्तिष्क् शांत रहने के साथ ही खून के भी स्वच्छ होने से दिल भी सेहतमंद रहता है। जिससे मानसिक एकाग्रता व कार्य क्षमता बढ़ती है। व्यक्ति मानसिक और दिल की बीमारियों से मुक्त रहता है।
'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते

इसी तरह देव पूजा-पाठ के दौरान आपने गौर किया होगा कि वैदिक, पौराणिक या बीज मंत्र सभी की शुरुआत ऊँकार से होती है। असल में, मंत्रों के आगे 'ॐ' लगाने के पीछे का रहस्य धर्मशास्त्रों में मिलता है। अगली स्लाइड्स पर जानिए – 
शास्त्रों के मुताबिक पूरी प्रकृति तीन गुणों से बनी है। ये तीन गुण है - रज, सत और तम। वहीं 'ॐ' को एकाक्षर ब्रह्म माना गया है, जो पूरी प्रकृति की रचना, स्थिति और संहार का कारण है। इस तरह इन तीनों गुणों का ईश्वर 'ॐ' है। चूंकि भगवान गणेश भी परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। उनके नाम का एक मतलब गणों के ईश ही नहीं गुणों का ईश भी है। 
यही वजह है कि 'ॐ' को प्रणवाकार गणेश की मूर्ति भी माना गया है। 

'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते

श्रीगणेश मंगलमूर्ति होकर प्रथम पूजनीय देवता भी हैं। इसलिए 'ॐ' यानी प्रणव को श्री गणेश का प्रत्यक्ष रूप मानकर वेदमंत्रों के आगे विशेष रूप से लगाकर उच्चारण किया जाता है, जिसमें मंत्रों के आगे श्रीगणेश की प्रतिष्ठा, ध्यान और नाम जप का भाव होता है, जो पूरे संसार के लिए बहुत ही मंगलकारी, शुभ और शांति देने वाला होता है। 

'ॐ' में समाई इन अद्भुत शक्तियों के बारे में कई लोग नहीं जानते
इसी तरह देव पूजा-पाठ के दौरान आपने गौर किया होगा कि वैदिक, पौराणिक या बीज मंत्र सभी की शुरुआत ऊँकार से होती है। असल में, मंत्रों के आगे 'ॐ' लगाने के पीछे का रहस्य धर्मशास्त्रों में मिलता है। अगली स्लाइड्स पर जानिए – 
शास्त्रों के मुताबिक पूरी प्रकृति तीन गुणों से बनी है। ये तीन गुण है - रज, सत और तम। वहीं 'ॐ' को एकाक्षर ब्रह्म माना गया है, जो पूरी प्रकृति की रचना, स्थिति और संहार का कारण है। इस तरह इन तीनों गुणों का ईश्वर 'ॐ' है। चूंकि भगवान गणेश भी परब्रह्म का ही स्वरूप हैं। उनके नाम का एक मतलब गणों के ईश ही नहीं गुणों का ईश भी है। 
यही वजह है कि 'ॐ' को प्रणवाकार गणेश की मूर्ति भी माना गया है। 



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गुरुवार, 9 जनवरी 2014

इंसानी दिमाग़ के रहस्य

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आंखों से ज्यादा देख सकता है मस्तिष्क

नए अध्ययन के मुताबिक एक जटिल तस्वीर को देखने के लिए दृष्टि के मुकाबले मस्तिष्क द्वारा प्रकाश के बिन्दुओं का विश्लेषण करने की क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण है।

वर्जिनिया विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि मक्खी के लार्वा की महज 24 फोटोरिसेप्टर वाली आंखें पर्याप्त मात्रा में प्रकाश या फिर तस्वीरों का इनपुट भेजती हैं जिन्हें मस्तिष्क विश्लेषित कर तस्वीरों में बदल देता है।

अनुसंधानकर्ता बेरी कोड्रोन ने कहा, ‘यह दृष्टि के प्रति हमारी समझ को बढ़ाता है। यह बताता है कि देखने के लिए विजुअल इनपुट इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है जितना कि उसके पीछे काम करने वाला मस्तिष्क। इस मामले में तो मस्तिष्क बहुत कम मात्रा में मिले विजुअल इनपुट से भी काम चला सकता है।’ इन अनुसंधान के परिणाम ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। (भाषा)

इटली के वैज्ञानिकों ने आखिरकार मस्तिष्क के उन हिस्सों का पता लगाने में कामयाबी हासिल कर ली है। जहाँ से पारलौकिक ज्ञान उत्पन्न होता है। इससे यह बात संभवतः प्रमाणित हो गई है कि मस्तिष्क के कुछ विशेष हिस्सों से ईश्वरीय ज्ञान की अनुभूति होती है।

इटली के उदीन विश्वविद्यालय के संवेदी तंत्रिका विज्ञानी कोसिमो उरगेसी, रोम के सैपिएंजा विश्वविद्यालय के संवेदी तंत्रिका विज्ञानी साल्वातोर एग्लिओती ने मस्तिष्क ट्यूमर के 88 मरीजों के साथ साक्षात्कार के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। इन मरीजों से ऑपरेशन से पहले और उसके बाद कुछ सच्चे या झूठे सवाल पूछकर उनके आध्यात्मिक स्तर का आकलन किया गया। उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने खुद को कालातीत अनुभव किया। किसी अन्य व्यक्ति और प्रकृति के साथ उन्हें तादात्म्य की अनुभूति हुई और क्या वह किसी उच्च सत्ता में विश्वास रखते हैं।

अध्ययन से पता चला कि मस्तिष्क ट्यूमर के जिन मरीजों के पैरिएटल कोर्टेक्स (पार्श्विक प्रांतस्था) में मस्तिष्क के पिछले हिस्से से ट्यूमर हटा दिया गया। उन्होंने ऑपरेशन के तीन से सात दिन के बाद दिव्य ज्ञान की गहरी अनुभूति होने की बात कही, लेकिन जिन मरीजों के मस्तिष्क के आगे के हिस्से से ट्यूमर निकाला गया था। उनके साथ यह घटना नहीं हुई।

एग्लिओती ने कहा कि यह माना जाता था कि पारलौकिक ज्ञान का चिंतन दार्शनिकों और नए जमाने के झक्की लोगों का विषय है, लेकिन यह वास्तव में आध्यात्मिकता पर पहला गहन अध्ययन है। हम एक जटिल तथ्य का अध्ययन कर रहे हैं, जो मनुष्य होने का सारतत्व समझने के करीब की बात है।

ND
शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के दो हिस्सों की तरफ इशारा किया है, जो नष्ट होने पर आध्यात्मिकता के विकास की तरफ ले जाते हैं। पहला है- कान के पास बगल में नीचे की तरफ का हिस्सा और दूसरा है- दाहिनी तरफ कोणीय जाइरस (कर्णक)। ये दोनों मस्तिष्क के पिछले भाग में स्थित हैं और इन्हीं से पता लगता है कि व्यक्ति आकाशीय तत्व में अपने शरीर को बाहरी दुनिया से किस तरह जोड़ लेता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके निष्कर्ष अलौकिक अनुभवों और शरीर से अलग होने पर होने वाली अनुभूति के बीच संबंध को प्रमाणित करते हैं।

पहले के अध्ययनों में बताया गया था कि मस्तिष्क के आगे और पीछे का एक व्यापक संजाल धार्मिक विश्वासों को रेखांकित करता है, लेकिन ऐसा लगता है कि पारलौकिक ज्ञान में मस्तिष्क के वही हिस्से शामिल नहीं है जिनसे धार्मिक ज्ञान का पता लगता है। तंत्रिका विज्ञानियों ने पहले भी क्षतिग्रस्त मस्तिष्क वाले मरीजों में आध्यात्मिक बदलावों का निरीक्षण किया है, लेकिन इसका वह व्यवस्थित ढंग से मूल्यांकन नहीं कर पाए थे।

बेल्जियम के ल्यूवेन में गैस्थुइसबर्ग मेडिकल विश्वविद्यालय के तंत्रिका विज्ञानी रिक वंडेनबर्ग का कहना है। हम सामान्यतः इससे दूर ही रहे। इसलिए नहीं कि यह महत्वपूर्ण विषय नहीं है बल्कि इसकी वजह यह थी कि यह नितांत व्यक्तिगत मामला है। हालाँकि यह शोध काफी दिलचस्प है, लेकिन कई पुरोगामी अध्ययनों की तरह इससे भी कई सवाल उठते हैं। आँकडों का सावधानी के साथ विश्लेषण कि या जाना चाहिए। यह बड़ी असंभावित बात है कि इंद्रियातीत ज्ञान का मस्तिष्क के केवल दो हिस्सों में स्थान निर्धारित किया जाए।

वह कहते हैं कि पारलौकिक ज्ञान एक अमूर्त धारणा है और विभिन्न लोग अलग-अलग तरीके से इसका मतलब लगाते हैं। परानुभूति की बात कहने वाला मरीज हमेशा सही नहीं हो सकता। अधिक कड़े व्यावहारिक उपायों से आध्यात्मिकता और उन विशेष विचारों और भावनाओं का ठीक-ठीक पता लगाना, जो इसे बनाते हैं। निश्चित रूप से अगला कदम होगा।

विस्कांसिन मैडिसन विश्वविद्यालय के संवेदी तंत्रिका विज्ञानी रिचर्ड डेविडसन का भी कुछ यही मत है। उनका कहना है कि शोधकर्ताओं ने जिस तरीके से इंद्रियातीत अनुभव को मापा है, वह संभवतः इस अध्ययन का सबसे चिन्ताजनक पहलू है। सबसे महत्वपूर्ण यह मानना है कि पूरा अध्ययन आत्मानुभूति के एक मापदंड में आए बदलावों पर आधारित है। जो एक अपरिष्कृत मापदंड है और जिसमें कुछ अजीबोगरीब बातें हैं। डेविडसन कहते हैं कि भविष्य में यह समझना महत्वपूर्ण होगा कि क्यों पैरिएटल कोर्टेक्स में क्षति से इस पैमाने पर बदलाव हो जाता है। (वार्ता) sabhar :webdunia.com

खुल जाएंगे दिमाग़ के रहस्य


इंसानी दिमाग


सदियों से इंसानी दिमाग़ एक रहस्य रहा है. हालांकि पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिक इसके कुछ रहस्यों से पर्दा उठाने में सफल रहे हैं.
हाल के कुछ सालों में नई तकनीक और शक्तिशाली कंप्यूटरों की मदद से कुछ प्रमुख खोजें हो सकी हैं.

हालांकि इंसान के दिमाग़ के बारे में अभी भी बहुत कुछ समझना बाक़ी है. यहाँ हम आपको उन पांच महत्पूर्ण विषयों के बारे में बता रहे हैं जिनके पता लगने पर इंसानी दिमाग़ के अनसुलझे रहस्यों का राज़ जाना जा सकता है.
इंसानी दिमाग
वैज्ञानिक डॉ एटीकस हैंसवर्थ का कहना है कि दिमाग के व्हाइट मैटर और इसमें होने वाली ख़ून की सप्लाई महत्वपूर्ण है.
जब हम सोचते हैं, चलते हैं, बोलते हैं, सपने देखते हैं और जब हम प्रेम करते हैं तो यह सब दिमाग़ के ग्रे मैटर में होते हैं. लेकिन हमारे क्लिक करेंदिमाग़ में केवल ग्रे मैटर ही नहीं है बल्कि व्हाइट मैटर की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है.
डिमेंशिया नाम की बीमारी के बारे में जब शोध किया जाता है तो क्लिक करेंदिमाग़ में मौजूद ग्रे मैटर के भीतर बीटा एमिलॉइड और टाउ प्रोटीन के एक दूसरे के साथ होने वाले रिएक्शन पर ग़ौर किया जाता है.
लेकिन एक ब्रितानी वैज्ञानिक डॉ. एटीकस हैंसवर्थ का कहना है कि दिमाग़ के व्हाइट मैटर और इसमें होने वाली ख़ून की सप्लाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
व्हाइट मैटर तंत्रिका कोशिका के आख़िरी छोर 'एक्जॉन' के आसपास चर्बी के कारण बनता है. एक्जॉन तंत्रिका कोशिकाओं को एक दूसरे से जोड़ते हैं. यही तंत्रिका तंत्र को आपस में तालमेल बिठाने में मदद करते हैं.
डॉ. एटीकस हैंसवर्थ इसके बारे में अधिक जानकारी का पता लगाने के लिए ऑक्सफ़ोर्ड और शीफ़ील्ड में दान दिए गए क्लिक करेंमस्तिष्क के बैंक का प्रयोग कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "कुछ मामलों में हमारे पास सीटी स्कैन और एमआरआई मौजूद हैं. इनसे हमें यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि क्या बीमारी की वजह व्हाइट मैटर था और अगर था तो इसकी क्या वजह हो सकती है ?
अगर डिमेंशिया की वजह ख़ून ले जाने वाली नाड़ियों में रिसाव है तो यह नई चिकित्सा प्रणालियों के लिए नया रास्ता मुहैया करा सकती है.

होनहार कैसे बनें ?

इंसानी दिमाग
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के तंत्रिका तंत्र पर काम करने वाली वैज्ञानिक बारबरा सहाकियान ऐसी दवाइयों का पता लगा रही हैं जो हमें और बुद्दिमान बना सकती हैं.
कई सालों तक सतर्कता बढ़ाने के लिए कैफ़ीन का प्रयोग होता था. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के तंत्रिका तंत्र पर काम करने वाली वैज्ञानिक बारबरा सहाकियान ऐसी दवाओं का पता लगा रही हैं, जो हमें और बुद्धिमान बना सकती हैं.
वह इस बात का अध्ययन कर रही हैं कि इन दवाओं का प्रयोग कर सर्जनों और पायलेटों का प्रदर्शन कैसे सुधारा जा सकता है और क्या इनसे आम इंसान की काम करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी की जा सकती है ?
लेकिन वह चेतावनी देती हैं कि इन दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल करने का बुरा असर भी हो सकता है. एक समाज के तौर पर हमें इस बारे में चर्चा करने की आवश्यकता है.
उनका कहना है कि मस्तिष्क में डोपामाइन और नॉरएड्रीनलीन जैसे रसायनों के बनने को प्रभावित करने वाली दवाओं से सामने आई वैज्ञानिक और नैतिक चुनौतियों पर बहस की आवश्यकता है. इस बहस में किसी परीक्षा से पहले परीक्षा देने वाले का टेस्ट होना भी शामिल है, जिसमें पता लगाया जाएगा कि कहीं उसने इन दवाओं का प्रयोग तो नहीं किया है.
डॉक्टर सहाकियान कहती हैं, "मैं विद्यार्थियों से इन दवाओं के बारे में अक्सर बात करती हूँ और बहुत से विद्यार्थी पढ़ने और परीक्षा देने के लिए यह दवाएं खाते हैं."
साथ ही उन्होंने कहा, "मगर बहुत से विद्यार्थी इससे नाराज़ होते हैं. उन्हें लगता है कि दवाएं लेने वाले विद्यार्थी बेईमानी कर रहे हैं."

अवचेतन से काम कैसे लें?

इंसानी दिमाग
बार बार संगीत की एक ही धुन बजाने से उसके सबसे मुश्किल हिस्से को भी बेहतरीन ढंग से बजाया जा सकता है.
किसी वाद्ययंत्र को बजाने के लिए या किसी बम को निष्क्रिय करने जैसे काम के लिए बहुत अच्छी कुशलता चाहिए होती है.
शोध यह बताते हैं कि हमारा अवचेतन दिमाग़ हमें सबसे बेहतर प्रदर्शन करने में मदद कर सकता है.
बार-बार संगीत की एक ही धुन बजाने से उसके सबसे मुश्किल हिस्से को भी बेहतरीन ढंग से बजाया जा सकता है.
लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ म्यूज़िक के सेंटर फॉर परफॉर्मेस साइंस में काम करने वाली सेलिएस्ट तानिया लिस्बोआ कहती हैं, "इससे संगीत की धुन का सबसे मुश्किल हिस्सा हमारे दिमाग़ के चेतन हिस्से से अवचेतन हिस्से में भी चला जाता है."
वह कहती हैं, "कई घंटे तक रियाज़ करने के बाद एक पारंगत संगीतज्ञ के दिमाग़ के पिछले हिस्से सेरेब्रम में इसकी जानकारी चली जाती है."
ससेक्स विश्विद्यालय के तंत्रिका वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अनिल सेठ कहते हैं," सेरेब्रम में दिमाग़ के बाक़ी हिस्से की तुलना में ज़्यादा ब्रेन सेल होती हैं. "

सपने किसके लिए?

इंसानी दिमाग
प्रोफ़ेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड का मानना है कि याददाश्त से संबंधित कार्य को आगे बढ़ाने में सपनों की अहम भूमिका होती है.
सपनों को लेकर हमारा आकर्षण तक़रीबन पांच हज़ार साल पुराना है. प्राचीन मेसोपिटामिया की सभ्यता के दौरान मान्यता थी कि सपने में हम जिस जगह को देखते हैं वहाँ हमारी आत्मा सोते हुए शरीर से निकलकर विचरण करती है.
बोस्टन के बेथ इस्राइल डिएकोनेस मेडिकल सेंटर फ़ॉर स्लीप एंड कॉग्निशन के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड का मानना है कि याददाश्त से संबंधित कार्य को आगे बढ़ाने में सपनों की अहम भूमिका होती है.
वह जापान की स्कैनिंग रिसर्च के मुरीद हैं. इसमें वैज्ञानिक किसी एमआरआई स्कैन की तरह सपनों को पढ़ सकते हैं.
लेकिन उनका कहना है कि शोर-शराबे वाले महंगे स्कैनर में किसी व्यक्ति को सुलाना मुश्किल है.
तो भविष्य में क्या? प्रोफ़ेसर रॉबर्ट स्टिकगोल्ड कहते हैं, " मैं ऐसे अध्ययन होते देखना चाहूँगा, जहाँ सपनों के बनने के नियम पता लगाए जा सकें और यह पता लगाया जाए कि नींद के दौरान याददाश्त कैसे काम करती है?"
अगर ऐसा होता है, तो यह भी पता लगा सकते हैं कि केवल अच्छे सपने कैसे देखें और बुरे सपनों से कैसे बचें?

दर्द दूर हो सकता है?

इंसानी दिमाग
बहुत तेज़ दर्द से निपटना चिकित्सा विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.
बहुत तेज़ दर्द से निपटना चिकित्सा विज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.
सर्जक अब इस सिद्धांत का परीक्षण कर रहे हैं कि डीप ब्रेन स्टिमुलेशन से दर्द से राहत दिलाई जा सकती है.
डीप ब्रेन स्टिमुलेशन मस्तिष्क के ऑपरेशन की वह तकनीक है, जिसमें दिमाग़ के भीतर गहरे में अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए दिमाग़ में इलेक्ट्रोड्स डाले जाते हैं.
इससे पहले इस तकनीक का प्रयोग पर्किंसन और अवसाद जैसी बीमारियां ठीक करने में किया गया है. अब इसका प्रयोग ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर और असहनीय दर्द को ठीक करने में भी किया जा रहा है.
ऑक्सफ़ोर्ड के जॉन रेडक्लिफ अस्पताल के प्रोफ़ेसर टीपू अज़ीज़ इस तकनीक की शुरुआत करने वालों में से एक हैं. इस तकनीक के प्रयोग से वह अपने मरीज़ों का दर्द भी काफ़ी हद तक दूर कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "दिमाग़ में इलेक्ट्रोड डालकर याददाश्त सुधारी जा सकती है या फिर आप सैनिकों पर इसका प्रयोग कर उन्हें ख़तरे से बेख़बर भी बना सकते हैं.
sabhar : bbc.co.uk





































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सौर ऊर्जा चार्जिंग गैजेट्स

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इन दिनों गैजेट्स की बढ़ती लोकप्रियता और बढ़ते प्रयोग के कारण इनकी चार्जिंग में भी काफी ऊर्जा की खपत होने लगी है. अगर आप चाहें तो अपने गैजेट्स को चार्ज करने के लिए ग्रीन चार्जिंग यानी वैकल्पिक स्रोतों का प्रयोग कर सकते हैं. इसी काम के लिए कुछ कमाल के गैजेट्स बाजार में मौजूद हैं. ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों का प्रयोग करके जहां आप पर्यावरण संरक्षण में योगदान देंगे वहीं आपको कहीं भी और किसी भी समय अपने गैजेट्स को चार्ज कर सकने की स्वतंत्रता मिल जाती है. इस प्रकार के चार्जर आपके पास हों तो आपको बिजली न होने या घर से बाहर होने या यात्रा पर होने पर बैटरी लो हो जाने पर अपने मोबाइल फोन आदि गैजेट्स को चार्ज करने में कभी कोई दिक्कत नहीं आती.
सोलर बैग
गैजेट्स को चार्ज करने के लिए सौर ऊर्जा का प्रयोग करने के लिए सोलर बैग्स से बढिय़ा और कुछ नहीं हो सकता. इन बैग्स के सामने की ओर एक फ्लैक्सी सोलर पैनल लगा होता है यानी सूर्य की रोशनी में चलते-फिरते समय बिल्ट इन 7.2 वाल्ट की लिथियम आयन बैटरी में सौर ऊर्जा जमा होती रहती है. इसमें अपना अन्य जरूरी सामान रखने के अलावा इसके साथ आने वाले यूएसबी, केबल एवं एडैप्टर्स से आप इस बैग के भीतर रखे अपने सैलफोन्स, आई पॉड्स एवं अन्य गैजेट्स को चार्ज कर सकते हैं. बादल भरे दिनों के लिए इसकी बैटरी को बिजली से चार्ज करके रखा जा सकता है. बैग और इस पर लगा सोलर पैनल आमतौर पर दोनों वाटरप्रूफ होते हैं.
हैंडहैल्ड डायनैमो
अब हर समय तो सौर ऊर्जा काम नहीं कर सकती है. ऐसे में बेहद छोटा हाथों में पकड़ा जा सकने वाला एक डायनैमो जैसा योजैन नामक गैजेट काफी काम का सिद्ध हो सकता है. मोबाइल आदि हल्के गैजेट्स को चार्ज करने के लिए इस डायनैमो के साथ उन्हें अटैच करके इसमें लगी रस्सी को कुछ मिनट अंदर-बाहर खींचना होगा और आपके गैजेट कुछ देर के लिए काम करने लायक चार्ज हो जाएंगे. इसमें लगी रस्सी को अंदर-बाहर खींचने से इसमें बना छोटा-सा डायनैमो किसी जैनेरेटर की ही भांति थोड़ी मात्रा में बिजली पैदा करता है जिसमें गैजेट्स चार्ज किए जा सकते हैं.
MP3 डायनैमो
एक अन्य डायनैमो जैसा गैजेट है वेरियो विंडअप MP3 प्लेयर. कमाल की बात है कि इसमें MP3 प्लेयर और फ्लैशलाइट बिल्ट इन हैं. यानी इसके हैंडल को कुछ मिनट घुमा कर मोबाइल फोन आदि चार्ज करने के साथ ही आप इसमें सेव किए गीत भी सुन सकते हैं. वेरियो के हैंडल को एक मिनट घुमा कर 15 से 30 मिनट तक संगीत का आनंद ले सकते हैं जबकि 3 मिनट घुमाने पर मोबाइल फोन को 10 मिनट टॉकटाइम के लिए ऊर्जा प्रदान की जा सकती है. इसमें लगी लैड फ्लैशलाइट को 50 मिनट तक प्रयोग करने के लिए बस 1 मिनट तक हैंडल घुमाना होगा.sabhar :http://www.palpalindia.com

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भारतीय महिलाएं धूम्रपान करने में अमेरिका के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर हैं।

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भारतीय महिलाएं धूम्रपान में विश्व में दूसरे स्थान पर



न्यूयार्क : कौन नहीं चाहेगा कि महिलाएं हर क्षेत्र में विकास करें, लेकिन हाल ही में आए एक अध्ययन में भारत की महिलाओं ने जिस क्षेत्र में विकास किया है उसे शायद ही कोई सराहे, और वह है धूम्रपान। एक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय महिलाएं धूम्रपान करने में अमेरिका के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर हैं। 

अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जहां धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले तीन दशकों में सात फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं भारत में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या में 200 फीसदी से भी अधिक का इजाफा हुआ है। 1980 में भारत में जहां 53 लाख महिलाएं धूम्रपान करती थीं, वहीं 2012 में यह संख्या बढ़कर 1.21 करोड़ हो चुकी है। 

भारत में हालांकि पुरुषों में भी धूम्रपान करने की लत में पिछले तीन दशकों में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। भारत में तीन दशक पहले जहां धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों की संख्या 7.45 करोड़ थी, वहीं आज लगभग 11 करोड़ व्यक्ति धूम्रपान की लत के शिकार हैं, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। अमेरिका हालांकि इस बीच तंबाकू सेवन से छुटकारा पाने वालों में सबसे आगे रहा, बावजूद इसके अमेरिकी महिलाएं धूम्रपान में विश्व में पहले स्थान पर हैं। अध्ययन में कहा गया कि भारत, बांग्लादेश, चीन और इंडोनेशिया सहित कई एशियाई देशों में 2006 के बाद से धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।

उन्होंने आगे कहा कि कई देशों में नियंत्रणकारी नीतियां पहले ही लागू कर दी गई हैं, इसके बावजूद जिन देशों में धूम्रपान करने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है वहां तंबाकू सेवन पर नियंत्रण लगाने के लिए सघन प्रयास किए जाने की जरूरत है। वैश्विक स्तर पर धूम्रपान की लत में 41 फीसदी का इजाफा हुआ है। अध्ययन में कहा गया है कि एशियाई देशों में 15 वर्ष की आयु से अधिक की आबादी में तेजी से वृद्धि होने के कारण धूम्रपान करने वालों की संख्या में तेज इजाफा देखने को मिला है। (एजेंसी)

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भय आत्मा को कमजोर करता है :ओशो

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शरीर के बिना कुछ आनंद लिए जा सकते हैं। जैसे समझें, एक विचारक है। तो विचारक का जो आनंद है, वह शरीर के बिना भी उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि विचार का शरीर से कोई संबंध नहीं है। तो अगर एक विचारक की आत्मा भटक जाए, शरीर न मिले, तो उस आत्मा को शरीर लेने की कोई तीव्रता नहीं होती, क्योंकि विचार का आंनद तब भी लिया जा सकता है। 

लेकिन समझो कि एक भोजन करने में रस लेने वाला आदमी है, वह शरीर के बिना भोजन का रस नहीं ले सकता है। उसके प्राण छटपटाने लगते हैं कि वह कैसे शरीर में प्रवेश कर जाए। और जब उसके योग्य गर्भ नही मिलता है, तब वह कमजोर आत्मा -कमजोर आत्मा से मतलब है ऐसी आत्मा, जो अपने शरीर का मालिक नहीं है-उस शरीर में वह प्रवेश कर सकता है, किसी कमजोर आत्मा की भय की स्थिति में।

और ध्यान रहे, भय का एक बहुत गहरा अर्थ है। भय का अर्थ है जो सिकोड़ दे। जब आप भयभीत होते हैं, तो आप सिकुड़ जाते हैं। जब आप प्रफुल्लित होते हैं, तो आप फैल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति भयभीत होता है, तो उसकी आत्मा सिकुड़ जाती है और उसके शरीर में बहुत जगह छूट जाती है, जहां कोई दूसरी आत्मा प्रवेश कर सकती है। 

एक नहीं, बहुत आत्माएं भी एकदम से प्रवेश कर सकती हैं। इसलिए भय की स्थिति में कोई आत्मा किसी शरीर में जाती है। और ऐसा करने का कुल कारण इतना होता है कि उसके जो रस हैं, वह शरीर से बंधे हैं। इसलिए वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करके रस लेने की कोशिश करती है। इसकी पूरी संभावना है, इसके पूरे तथ्य हैं, इसकी पूरी वास्तविकता है। 

इसका यह मतलब हुआ कि एक तो भयभीत व्यक्ति हमेशा खतरे में है। जो भयभीत है, उसे खतरा हो सकता है। क्योंकि वह सिकुड़ी हुई हालत में होता है। वह अपने मकान में, अपने घर के एक कमरे में रहता है, बाकी कमरे उसके खाली पड़े रहते हैं। बाकी कमरों में दूसरे लोग मेहमान बन सकते हैं। कभी-कभी श्रेष्ठ आत्माएं भी शरीर में प्रवेश करती हैं, कभी-कभी। 

लेकिन उनका प्रवेश दूसरे कारणों से होता है। कुछ कृत्य हैं करूणा के, जो शरीर के बिना नहीं किये जा सकते। जैसे समझें, एक घर में आग लगी है और कोई उस घर को आग से बचाने नहीं जा रहा है। भीड़ बाहर घिरी खड़ी है, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती है कि आग में बढ़ जाए। और तब अचानक एक आदमी बढ़ जाता है। और वह आदमी बाद में बताता है कि मुझे समझ में नहीं आया कि मैं किस ताकत के प्रभाव में बढ़ गया। 

मेरी तो हिम्मत न थी। और वह बढ़ जाता है, और आग बुझाने लगता है, और आग बुझा लेता है, और किसी को बचाकर बाहर निकल आता है। वह आदमी खुद कहता है कि ऐसा लगता है कि मेरे हाथ की बात नहीं है यह, किसी और ने मुझसे करवा लिया है। ऐसी किसी घड़ी में जहां कि किसी शुभ कार्य के लिए आदमी हिम्मत नहीं जुटा पाता हो, कोई श्रेष्ठ आत्मा भी प्रवेश कर सकती है। लेकिन ये घटनाएं कम होती हैं।

साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली
पुस्तकः मैं मृत्यु सिखाता हूं
प्रवचन नं. 5 से संकलित

परिचय

ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये।

ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।sdabhar :http://www.amarujala.com

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मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

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मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

 मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है, जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं।
 
मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।- गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं। 
मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

- मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं। वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है। नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है। मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

- यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं।

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में
 इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है। वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकारमय मार्ग से यमलोक ले जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है, चार कोस यानी 13-16 कि.मी) दूर है। वहां पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसे भयानक यातना देते हैं। यह याताना भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।
मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

- घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

 जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में
- गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है। यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।- यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है। मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है। - इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है। sabhar : bhaskar.com


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बुधवार, 8 जनवरी 2014

चेतना का रहस्य और आदमी का दिमाग

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मधुसूदन आनन्द 

क्या आपने वी. एस. रामचन्द्रन का नाम सुना है? रामचन्द्रन साइकॉलजी और न्यूरो साइंस के जाने-माने प्रोफेसर हैं जिन्होंने 'फैंटम्स इन द ब्रेन' और 'द इमर्जिंग माइन्ड' जैसी किताबें लिखकर दुनिया में धूम मचा रखी है। न्यूजवीक ने उन्हें दुनिया के उन 100 मशहूर लोगों की सूची में रखा है, जिनके काम से 21वीं सदी में कुछ अभूतपूर्व, कुछ क्रान्तिकारी निष्कर्ष सामने आने वाले हैं। चेन्नै के ये चमत्कारी अनुसंधानकर्ता अमेरिका के कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में मस्तिष्क एवं संज्ञान केन्द्र के निदेशक हैं, जो मानवीय मस्तिष्क के रहस्यों की खोज करने में लगे हैं। उनकी खोज न्यूरो साइंस, फिलॉसफी और चेतना की गुत्थियों को खोल सकती है। 

आदमी का दिमाग एक अद्भुत मायालोक है, हालांकि आज हम जानते हैं कि हमारे दिल का धड़कना, हमारा सांस लेना, अंग संचालन, व्यवहार, स्मृति, भाषा, विचार, भावनाएं, तर्क शक्ति, कामनाएं, अवधारणाएं, कलाएं, सौन्दर्य शास्त्र, साहित्य और हमारा दर्शनशास्त्र आदि दिमाग से ही निकलते और नियंत्रित होते हैं। आज हम मोटे तौर पर दिमाग के उन हिस्सों को जानते हैं जिनसे हमारा बोलना-चालना, हाथ पैरों का चलना वगैरह नियंत्रित होता है, लेकिन फिर भी न्यूरो साइंस यानी मस्तिष्क संरचना और संचालन का विज्ञान अभी अपनी शैशव अवस्था में ही है। आम धारणाओं के विपरीत एक से डेढ़ किलो के बीच का औसत भार वाला वयस्क दिमाग बेहद कोमल होता है, कुछ-कुछ जैली की तरह और सुर्ख लाल। एक दिमाग एक सेकंड में 100 खरब संकेतों को प्रोसेस कर सकता है। जाहिर है दुनिया का कोई कम्प्यूटर आज ऐसा करने में सक्षम नहीं। आज एम.आर.आई. के जरिए हम दिमाग की मोटी-मोटी गतिविधियों को देख सकते हैं। जबकि मॉलिक्यूलर विश्लेषण से पता चलता है कि एक अंग के रूप में दिमाग क्या काम करता है लेकिन सोचने-समझने जैसी उच्च क्रियाओं में दिमाग कैसे काम करता है, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं। दिमाग में लाखों-करोड़ों न्यूरॉन या तंत्रिकाएं हैं। उनके बीच क्या आपसी सम्बन्ध है, वे कैसे काम करती हैं, यह हमें ठीक-ठीक मालूम नहीं, लेकिन यह सही है कि न्यूरो साइंस के जरिए पता चल रहा है कि दिमाग के अन्दर क्या-क्या घट रहा है। 
 फ्रंटलाइन' पत्रिका के ताजा अंक में रामचन्द्रन के साथ शशि कुमार का एक विचारोत्तेजक इंटरव्यू छपा है। इस इंटरव्यू में रामचन्द्रन कहते हैं कि एक दिन यह सम्भव होगा कि न्यूरो साइंस की प्रगति दर्शनशास्त्र के तमाम बुनियादी प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दे। एक जिज्ञासु और सोचने वाला दिमाग बार-बार प्रश्न करता है- मैं कौन हूँ? मैं यहां (इस संसार में) क्यों हूँ? यह संसार क्यों है? कुछ होने की बजाय कुछ भी नहीं होता, तो क्या होता? आदि-आदि। रामचन्द्रन कहते हैं कि ये प्रश्न साइंस के नहीं हैं। साइंस इनसे नहीं टकराती। ये ज्ञान मीमांसा के प्रश्न हैं। ये प्रश्न, हो सकता है, अनुत्तरित रहें, लेकिन चेतना का प्रश्न शायद हल हो जाए। चेतना यानी दिमाग को चलाने वाली चीज। चेतना क्या है? न्यूरॉन्स और उनकी गतिविधि को ही मोटे तौर पर चेतना के रूप में देखा जा सकता है। चेतना यानी होने का संज्ञान। साइंस में इसे क्वालिया कहा गया है। यह हमारी मानसिक स्थितियों का चरित्र या गुण है। मसलन गंध अनुभव करना, दर्द महसूस करना या डर जाना ऐसे अनुभव हैं, जिन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। लेकिन ये हैं और इन्हें महसूस करने वाली चेतना को क्वालिया कहा गया है। लेकिन न्यूरॉन्स की ऐसी गतिविधियां भी चलती रहती हैं जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं होता या वे चेतना में नहीं आतीं। हमें उनके होने का कोई अनुभव नहीं होता। अगर एक बार वे समझ में आ जाएं तो कई भेद खुल सकते हैं। दर्शनशास्त्र के कई प्रश्न हल हो सकते हैं। 

वैज्ञानिक नजरिए से देखिए, हम क्या हैं? कई रसायनों और प्रणालियों का एक चलता-फिरता कारखाना। जटिल जीवन की एक मामूली कड़ी, डी.एन.ए. के जरिए अपने माता-पिता से जुड़ी। रामचन्द्रन प्रसिद्ध विज्ञानी फ्रांसिस क्रिक को उद्धृत करते हुए व्यंग्य में पूछते हैं कि मनुष्य क्या सचमुच सिर्फ न्यूरॉन का एक पुंज है, और फिर कहते हैं हम यह बात भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते। हमें अगनोस्टिक-अज्ञेयवादी होना पड़ता है। यानी इस बात को हम जान नहीं सकते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दार्शनिक मुद्रा अपना लें। जैसे हम जानते हैं कि दिमाग के कुछ खास हिस्सों तक ही कुछ क्रियाएं सीमित रहती हैं, यानी दिमाग के अलग-अलग हिस्सों का अलग-अलग काम है, जैसे रंग सम्बन्धी सूचना के विश्लेषण के लिए फूसीफार्म गाइरस का दिमाग में स्थान है या संज्ञान लेनेवाली तमाम गतिविधियां दिमाग के एक हिस्से तक ही केन्द्रित हैं, तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हम तो यह जान ही चुके हैं, अब आगे जानने को क्या रह गया है। हम जानना चाहेंगे कि दिमाग में कौन सी ऐसी क्रियाएं हैं, जो खास हिस्सों तक केन्द्रित हैं। वे किस हद तक और कहां केन्द्रित हैं। वे एक उदाहरण देते हैं : मान लीजिए, आप जानना चाहते हैं कि कार कैसे काम करती है, तो इसके लिए आपको कार को खोलना होगा और इसका मैकेनिजम समझना होगा। ऐसा ही दिमाग के मामले में हैं। आनुवांशिकता और डीएनए अपनी जगह सही हैं, लेकिन दिमाग को समझने के लिए विशुद्ध सैद्धान्तिक या कार्यप्रणालीवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। पिछले 30 वर्षों में प्रयोगवादी दृष्टिकोण ही ज्यादा सफल हुए हैं। सिर्फ दिमाग की संरचना- उसके स्ट्रक्चर के आधार पर ही कुछ नया नहीं खोजा जा सकता। वे मंगलग्रह के एक प्राणी का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लीजिए अमीबा जैसा कोई प्राणी यहां आता है और मनुष्य की चीरफाड़ करते हुए अण्डकोश पाता है और उन्हें समझने की कोशिश करता है। वह देखता है वहां कुरकुर करते तमाम स्पर्म (शुक्राणु) हैं। वह चूंकि एक कोशिका वाला प्राणी है जो विभाजित होता रहता है और सेक्स से अनभिज्ञ है, अत: वह समझेगा, ये जरूर परजीवी होंगे। इसलिए स्ट्रक्चर के आधार पर ही दिमाग को नहीं समझा जा सकता। देखना यह भी होता है कि उसकी कार्यपद्धति क्या है और वह कैसे होती है। यानी दिमाग की संरचना और संचालन दोनों ही माध्यमों को अपनाकर हम कहीं पहुंच सकेंगे। दार्शनिकों के साथ दिक्कत यह है कि वे बिना समझे अनापशनाप शास्त्रार्थ में उलझे रहते हैं।

शायद यहां वे आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी बहस की ओर इशारा करना चाहते हैं, जिसमें चेतना को लेकर तरह-तरह की बातें हैं। प्राय: सभी धर्मों में आत्मा को माना गया है लेकिन दिमाग के बारे में हुए अनुसन्धानों से साइंस ने पता लगा लिया है कि दिमाग में एक ऐसा केन्द्र भी होता है जो हमें धामिर्क अनुष्ठानों और ईश-प्रेम के लिए मजबूर करता है। यानी धार्मिक होने में कहीं आपके डीएनए और न्यूरॉन्स की भी भूमिका है। पर रामचन्द्रन कहते हैं कि दर्शन नहीं, न्यूरो साइंस से ही चेतना की प्रकृति का राज खुलेगा। लेकिन एक सच्चे साइंसदान की तरह वे यह भी कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि हम सब गुत्थियां सुलझा लेंगे। मसलन कलाओं और संगीत की एक ज्ञानातीत प्रकृति भी होती है, जरूरी नहीं कि इसका रहस्य भी खुल जाए। यह पता चल ही जाए कि साहित्य और कलाएं कभी-कभी क्यों अनुभवातीत हो जाती हैं। वे कहते हैं कि मैं कौन हूँ, क्यों हूँ, क्या मेरा जन्म एक दुर्घटनावश हुआ है- इन प्रश्नों को ज्ञानमीमांसा के लिए छोड़ दीजिए, चेतना को जरा अलग तरह से समझिए। जीवन की तरह चेतना शब्द का इस्तेमाल भी कई तरीकों से होता है। यह वस्तुत: कई मेकेनिजम का समुच्चय है। एक तो क्वालिया है और दूसरा स्व है। यानी वह चीज, जो जागरूक है, जगी हुई है। जो जान रही है कि यह लाल है, यह गुलाब है। लेकिन अगर आप यह नहीं जानते कि आप जानते हैं, तब जानना शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। 

वे कहते हैं कि न्यूरॉन्स द्वारा यह पता लगाया जा चुका है कि जब किसी को दर्द होता है तो उसका अनुभव दूसरे को भी हो सकता है। ये ऐसे न्यूरॉन्स हैं जो आपके और दूसरों के बीच की दीवार तोड़ते हैं। आप दूसरों से सहानुभूति करते हैं। रामचन्द्रन इन न्यूरॉन्स को जिन्हें मिरर न्यूरॉन्स कहा जाता है, दलाईलामा न्यूरॉन्स कहते हैं। इनकी खोज का मनोविज्ञान में आज वही स्थान बन गया है, जो जीवविज्ञान में डीएनए का है। इस खोज से मानवीय चेतना के अनेक अनजाने पहलुओं पर रोशनी पड़ेगी। रामचंद्रन ने पता लगाया है कि मिरर न्यूरॉन्स की कमी के कारण ही बच्चे चुपचाप और एकाकी महसूस करते हैं। न्यूरॉन्स ने आपको दूसरों के व्यक्तित्व में घुसने का रास्ता बता दिया है। वे कहते हैं कि कल्पना कीजिए चार-पांच शताब्दी के बाद कोई साइंसदान आपके दिमाग को बिल गेट्स के दिमाग में तब्दील कर दे तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। और फिर खुद ही जवाब देते हैं कि 90 प्रतिशत लोग ऐसा कृत्रिम दिमाग लेने के बजाय अपना दिमाग ही अपने पास रखना चाहेंगे, क्योंकि वह सिर्फ रसायनों का संसार नहीं है, उसमें संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, परंपरा और समाजशास्त्र है। इन तमाम बातों की उसमें प्रोग्रामिंग नहीं की जा सकती। 

रामचंद्रन का यह इंटरव्यू पठनीय है, लेकिन यह जितने सवाल उठाता है, उतने जवाब नहीं मिलते। जैसे वे कहते हैं कि चेतना इस तरह के प्रश्नों से भी जुड़ी है कि मैं यहां क्यों हूं। मगर इसका उत्तर उनके पास नहीं है। वे कहते हैं यह ज्ञानमीमांसा का प्रश्न है, फिजिक्स, बायॉलजी या साइकॉलजी का नहीं। क्या पता चेतना के रहस्यों का पता लगाते-लगाते वे इन सवालों पर भी रोशनी डाल सकें क्योंकि वे पौर्वात्य धर्मों और हिन्दू धर्म में ऐसी जिज्ञासाओं के उल्लेख की ओर बार-बार इशारा करते हैं। sabhar :
http://navbharattimes.indiatimes.com

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कैंसर ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल'

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कैंसर को ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल्स' ख़ून में ट्यूमर की कोशिकाएं नष्ट कर सकती हैं और इस तरह कैंसर को फैलने से रोक सकती हैं.
ट्यूमर की सबसे ख़तरनाक अवस्था वह होती है, जब वह पूरे शरीर में फैलना शुरू करता है.

इस शोध की शुरुआती जांच में कहा गया कि इसके प्रभाव "नाटकीय" हैं लेकिन अभी "बहुत सारा काम किए जाने की ज़रूरत" है.अमरीका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने ऐसे नैनो पार्टिकल यानी अति सूक्ष्म अणु बनाए हैं, जो रक्त प्रवाह में बने रहते हैं और बाहर से आने वाली कैंसर की कोशिकाओं के संपर्क में आने पर उन्हें नष्ट कर देते हैं.
कैंसर का पता चलने के बाद ज़िंदा रहने की संभावना में सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य होता है कि कहीं ट्यूमर मेटास्टेटिक कैंसर में तो नहीं बदल गया है.
मुख्य शोधकर्ता प्रोफ़ेसर माइकल किंग कहते हैं, "कैंसर से होने वाली क़रीब 90 फ़ीसद मौतें मेटास्टेसिस की वजह से होती हैं."

नाटकीय असर

"दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं."
प्रोफ़ेसर माइकल किंग, मुख्य शोधकर्ता
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध दल ने इस समस्या से निजात पाने के लिए एक नया तरीका आज़माया.
उन्होंने कैंसर ख़त्म करने वाला, ट्रेल, नाम का प्रोटीन-क्लिक करेंजिसे पहले ही कैंसर प्रयोगों में इस्तेमाल किया जा चुका है- और अन्य चिपकने वाले प्रोटीनों को एक सूक्ष्म गोले या नैनोपार्टिकल से चिपकाया.
जब इन गोलों को ख़ून में डाला गया, तो वे सफ़ेद रक्त कोशिकाओं से चिपक गए.
कैंसर
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध में ट्यूमर के फैलाव को रोकने में "स्टिकी बॉल्स" के नाटकीय प्रभाव दिखे.
प्रयोगों से पता चला कि उछलते-कूदते रक्त में सफ़ेद रक्त कोशिकाएं उन ट्यूमर कोशिकाओं से टकरातीं थीं, जो मुख्य ट्यूमर से टूटकर फैलने की कोशिश कर रहे हैं.
क्लिक करेंनेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस की कार्यवाही में शामिल रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रेल प्रोटीन के संपर्क में आने से ट्यूमर कोशिकाएं ख़त्म हो गईं.
प्रोफ़ेसर किंग ने बीबीसी को बताया, "ये आँकड़े नाटकीय प्रभाव प्रदर्शित कर रहे है. यह कैंसर कोशिकाओं की संख्या में मामूली बदलाव नहीं है. दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं."

रेडियोथेरेपी से पहले

प्रोफ़ेसर किंग का मानना है कि नैनोपार्टिकल्स को सर्जरी या रेडियोथेरेपी से पहले इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे मुख्य ट्यूमर से ट्यूमर कोशिकाओं को निकाला जा सकता है.
इसे बहुत आक्रामक ट्यूमर वाले मरीज़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि ट्यूमर का फैलाव रोका जा सके.
हालांकि इंसानों पर जांच से पहले चूहों और बड़े जानवरों पर काफ़ी अधिक सुरक्षा जांच की ज़रूरत पड़ेगी.
अभी तक के सबूतों से लगता है कि इस पद्धति का प्रतिरोधी तंत्र पर कोई शुरुआती असर नहीं है और यह रक्त कोशिकाओं या रक्त धमनियों की परत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाता.

मगर प्रोफ़ेसर किंग चेतावनी देते हैं, "अभी बहुत काम किया जाना बाक़ी है. मरीज़ को इसका लाभ मिलने से पहले कई महत्वपूर्ण खोजें होनी बाक़ी हैं." sabhar :http://www.bbc.co.uk

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