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बुधवार, 8 जनवरी 2014

चेतना का रहस्य और आदमी का दिमाग

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 photo : google photo

मधुसूदन आनन्द 

क्या आपने वी. एस. रामचन्द्रन का नाम सुना है? रामचन्द्रन साइकॉलजी और न्यूरो साइंस के जाने-माने प्रोफेसर हैं जिन्होंने 'फैंटम्स इन द ब्रेन' और 'द इमर्जिंग माइन्ड' जैसी किताबें लिखकर दुनिया में धूम मचा रखी है। न्यूजवीक ने उन्हें दुनिया के उन 100 मशहूर लोगों की सूची में रखा है, जिनके काम से 21वीं सदी में कुछ अभूतपूर्व, कुछ क्रान्तिकारी निष्कर्ष सामने आने वाले हैं। चेन्नै के ये चमत्कारी अनुसंधानकर्ता अमेरिका के कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में मस्तिष्क एवं संज्ञान केन्द्र के निदेशक हैं, जो मानवीय मस्तिष्क के रहस्यों की खोज करने में लगे हैं। उनकी खोज न्यूरो साइंस, फिलॉसफी और चेतना की गुत्थियों को खोल सकती है। 

आदमी का दिमाग एक अद्भुत मायालोक है, हालांकि आज हम जानते हैं कि हमारे दिल का धड़कना, हमारा सांस लेना, अंग संचालन, व्यवहार, स्मृति, भाषा, विचार, भावनाएं, तर्क शक्ति, कामनाएं, अवधारणाएं, कलाएं, सौन्दर्य शास्त्र, साहित्य और हमारा दर्शनशास्त्र आदि दिमाग से ही निकलते और नियंत्रित होते हैं। आज हम मोटे तौर पर दिमाग के उन हिस्सों को जानते हैं जिनसे हमारा बोलना-चालना, हाथ पैरों का चलना वगैरह नियंत्रित होता है, लेकिन फिर भी न्यूरो साइंस यानी मस्तिष्क संरचना और संचालन का विज्ञान अभी अपनी शैशव अवस्था में ही है। आम धारणाओं के विपरीत एक से डेढ़ किलो के बीच का औसत भार वाला वयस्क दिमाग बेहद कोमल होता है, कुछ-कुछ जैली की तरह और सुर्ख लाल। एक दिमाग एक सेकंड में 100 खरब संकेतों को प्रोसेस कर सकता है। जाहिर है दुनिया का कोई कम्प्यूटर आज ऐसा करने में सक्षम नहीं। आज एम.आर.आई. के जरिए हम दिमाग की मोटी-मोटी गतिविधियों को देख सकते हैं। जबकि मॉलिक्यूलर विश्लेषण से पता चलता है कि एक अंग के रूप में दिमाग क्या काम करता है लेकिन सोचने-समझने जैसी उच्च क्रियाओं में दिमाग कैसे काम करता है, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं। दिमाग में लाखों-करोड़ों न्यूरॉन या तंत्रिकाएं हैं। उनके बीच क्या आपसी सम्बन्ध है, वे कैसे काम करती हैं, यह हमें ठीक-ठीक मालूम नहीं, लेकिन यह सही है कि न्यूरो साइंस के जरिए पता चल रहा है कि दिमाग के अन्दर क्या-क्या घट रहा है। 
 फ्रंटलाइन' पत्रिका के ताजा अंक में रामचन्द्रन के साथ शशि कुमार का एक विचारोत्तेजक इंटरव्यू छपा है। इस इंटरव्यू में रामचन्द्रन कहते हैं कि एक दिन यह सम्भव होगा कि न्यूरो साइंस की प्रगति दर्शनशास्त्र के तमाम बुनियादी प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दे। एक जिज्ञासु और सोचने वाला दिमाग बार-बार प्रश्न करता है- मैं कौन हूँ? मैं यहां (इस संसार में) क्यों हूँ? यह संसार क्यों है? कुछ होने की बजाय कुछ भी नहीं होता, तो क्या होता? आदि-आदि। रामचन्द्रन कहते हैं कि ये प्रश्न साइंस के नहीं हैं। साइंस इनसे नहीं टकराती। ये ज्ञान मीमांसा के प्रश्न हैं। ये प्रश्न, हो सकता है, अनुत्तरित रहें, लेकिन चेतना का प्रश्न शायद हल हो जाए। चेतना यानी दिमाग को चलाने वाली चीज। चेतना क्या है? न्यूरॉन्स और उनकी गतिविधि को ही मोटे तौर पर चेतना के रूप में देखा जा सकता है। चेतना यानी होने का संज्ञान। साइंस में इसे क्वालिया कहा गया है। यह हमारी मानसिक स्थितियों का चरित्र या गुण है। मसलन गंध अनुभव करना, दर्द महसूस करना या डर जाना ऐसे अनुभव हैं, जिन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। लेकिन ये हैं और इन्हें महसूस करने वाली चेतना को क्वालिया कहा गया है। लेकिन न्यूरॉन्स की ऐसी गतिविधियां भी चलती रहती हैं जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं होता या वे चेतना में नहीं आतीं। हमें उनके होने का कोई अनुभव नहीं होता। अगर एक बार वे समझ में आ जाएं तो कई भेद खुल सकते हैं। दर्शनशास्त्र के कई प्रश्न हल हो सकते हैं। 

वैज्ञानिक नजरिए से देखिए, हम क्या हैं? कई रसायनों और प्रणालियों का एक चलता-फिरता कारखाना। जटिल जीवन की एक मामूली कड़ी, डी.एन.ए. के जरिए अपने माता-पिता से जुड़ी। रामचन्द्रन प्रसिद्ध विज्ञानी फ्रांसिस क्रिक को उद्धृत करते हुए व्यंग्य में पूछते हैं कि मनुष्य क्या सचमुच सिर्फ न्यूरॉन का एक पुंज है, और फिर कहते हैं हम यह बात भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते। हमें अगनोस्टिक-अज्ञेयवादी होना पड़ता है। यानी इस बात को हम जान नहीं सकते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दार्शनिक मुद्रा अपना लें। जैसे हम जानते हैं कि दिमाग के कुछ खास हिस्सों तक ही कुछ क्रियाएं सीमित रहती हैं, यानी दिमाग के अलग-अलग हिस्सों का अलग-अलग काम है, जैसे रंग सम्बन्धी सूचना के विश्लेषण के लिए फूसीफार्म गाइरस का दिमाग में स्थान है या संज्ञान लेनेवाली तमाम गतिविधियां दिमाग के एक हिस्से तक ही केन्द्रित हैं, तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हम तो यह जान ही चुके हैं, अब आगे जानने को क्या रह गया है। हम जानना चाहेंगे कि दिमाग में कौन सी ऐसी क्रियाएं हैं, जो खास हिस्सों तक केन्द्रित हैं। वे किस हद तक और कहां केन्द्रित हैं। वे एक उदाहरण देते हैं : मान लीजिए, आप जानना चाहते हैं कि कार कैसे काम करती है, तो इसके लिए आपको कार को खोलना होगा और इसका मैकेनिजम समझना होगा। ऐसा ही दिमाग के मामले में हैं। आनुवांशिकता और डीएनए अपनी जगह सही हैं, लेकिन दिमाग को समझने के लिए विशुद्ध सैद्धान्तिक या कार्यप्रणालीवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। पिछले 30 वर्षों में प्रयोगवादी दृष्टिकोण ही ज्यादा सफल हुए हैं। सिर्फ दिमाग की संरचना- उसके स्ट्रक्चर के आधार पर ही कुछ नया नहीं खोजा जा सकता। वे मंगलग्रह के एक प्राणी का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लीजिए अमीबा जैसा कोई प्राणी यहां आता है और मनुष्य की चीरफाड़ करते हुए अण्डकोश पाता है और उन्हें समझने की कोशिश करता है। वह देखता है वहां कुरकुर करते तमाम स्पर्म (शुक्राणु) हैं। वह चूंकि एक कोशिका वाला प्राणी है जो विभाजित होता रहता है और सेक्स से अनभिज्ञ है, अत: वह समझेगा, ये जरूर परजीवी होंगे। इसलिए स्ट्रक्चर के आधार पर ही दिमाग को नहीं समझा जा सकता। देखना यह भी होता है कि उसकी कार्यपद्धति क्या है और वह कैसे होती है। यानी दिमाग की संरचना और संचालन दोनों ही माध्यमों को अपनाकर हम कहीं पहुंच सकेंगे। दार्शनिकों के साथ दिक्कत यह है कि वे बिना समझे अनापशनाप शास्त्रार्थ में उलझे रहते हैं।

शायद यहां वे आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी बहस की ओर इशारा करना चाहते हैं, जिसमें चेतना को लेकर तरह-तरह की बातें हैं। प्राय: सभी धर्मों में आत्मा को माना गया है लेकिन दिमाग के बारे में हुए अनुसन्धानों से साइंस ने पता लगा लिया है कि दिमाग में एक ऐसा केन्द्र भी होता है जो हमें धामिर्क अनुष्ठानों और ईश-प्रेम के लिए मजबूर करता है। यानी धार्मिक होने में कहीं आपके डीएनए और न्यूरॉन्स की भी भूमिका है। पर रामचन्द्रन कहते हैं कि दर्शन नहीं, न्यूरो साइंस से ही चेतना की प्रकृति का राज खुलेगा। लेकिन एक सच्चे साइंसदान की तरह वे यह भी कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि हम सब गुत्थियां सुलझा लेंगे। मसलन कलाओं और संगीत की एक ज्ञानातीत प्रकृति भी होती है, जरूरी नहीं कि इसका रहस्य भी खुल जाए। यह पता चल ही जाए कि साहित्य और कलाएं कभी-कभी क्यों अनुभवातीत हो जाती हैं। वे कहते हैं कि मैं कौन हूँ, क्यों हूँ, क्या मेरा जन्म एक दुर्घटनावश हुआ है- इन प्रश्नों को ज्ञानमीमांसा के लिए छोड़ दीजिए, चेतना को जरा अलग तरह से समझिए। जीवन की तरह चेतना शब्द का इस्तेमाल भी कई तरीकों से होता है। यह वस्तुत: कई मेकेनिजम का समुच्चय है। एक तो क्वालिया है और दूसरा स्व है। यानी वह चीज, जो जागरूक है, जगी हुई है। जो जान रही है कि यह लाल है, यह गुलाब है। लेकिन अगर आप यह नहीं जानते कि आप जानते हैं, तब जानना शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। 

वे कहते हैं कि न्यूरॉन्स द्वारा यह पता लगाया जा चुका है कि जब किसी को दर्द होता है तो उसका अनुभव दूसरे को भी हो सकता है। ये ऐसे न्यूरॉन्स हैं जो आपके और दूसरों के बीच की दीवार तोड़ते हैं। आप दूसरों से सहानुभूति करते हैं। रामचन्द्रन इन न्यूरॉन्स को जिन्हें मिरर न्यूरॉन्स कहा जाता है, दलाईलामा न्यूरॉन्स कहते हैं। इनकी खोज का मनोविज्ञान में आज वही स्थान बन गया है, जो जीवविज्ञान में डीएनए का है। इस खोज से मानवीय चेतना के अनेक अनजाने पहलुओं पर रोशनी पड़ेगी। रामचंद्रन ने पता लगाया है कि मिरर न्यूरॉन्स की कमी के कारण ही बच्चे चुपचाप और एकाकी महसूस करते हैं। न्यूरॉन्स ने आपको दूसरों के व्यक्तित्व में घुसने का रास्ता बता दिया है। वे कहते हैं कि कल्पना कीजिए चार-पांच शताब्दी के बाद कोई साइंसदान आपके दिमाग को बिल गेट्स के दिमाग में तब्दील कर दे तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। और फिर खुद ही जवाब देते हैं कि 90 प्रतिशत लोग ऐसा कृत्रिम दिमाग लेने के बजाय अपना दिमाग ही अपने पास रखना चाहेंगे, क्योंकि वह सिर्फ रसायनों का संसार नहीं है, उसमें संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, परंपरा और समाजशास्त्र है। इन तमाम बातों की उसमें प्रोग्रामिंग नहीं की जा सकती। 

रामचंद्रन का यह इंटरव्यू पठनीय है, लेकिन यह जितने सवाल उठाता है, उतने जवाब नहीं मिलते। जैसे वे कहते हैं कि चेतना इस तरह के प्रश्नों से भी जुड़ी है कि मैं यहां क्यों हूं। मगर इसका उत्तर उनके पास नहीं है। वे कहते हैं यह ज्ञानमीमांसा का प्रश्न है, फिजिक्स, बायॉलजी या साइकॉलजी का नहीं। क्या पता चेतना के रहस्यों का पता लगाते-लगाते वे इन सवालों पर भी रोशनी डाल सकें क्योंकि वे पौर्वात्य धर्मों और हिन्दू धर्म में ऐसी जिज्ञासाओं के उल्लेख की ओर बार-बार इशारा करते हैं। sabhar :
http://navbharattimes.indiatimes.com

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कैंसर ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल'

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कैंसर को ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल्स' ख़ून में ट्यूमर की कोशिकाएं नष्ट कर सकती हैं और इस तरह कैंसर को फैलने से रोक सकती हैं.
ट्यूमर की सबसे ख़तरनाक अवस्था वह होती है, जब वह पूरे शरीर में फैलना शुरू करता है.

इस शोध की शुरुआती जांच में कहा गया कि इसके प्रभाव "नाटकीय" हैं लेकिन अभी "बहुत सारा काम किए जाने की ज़रूरत" है.अमरीका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने ऐसे नैनो पार्टिकल यानी अति सूक्ष्म अणु बनाए हैं, जो रक्त प्रवाह में बने रहते हैं और बाहर से आने वाली कैंसर की कोशिकाओं के संपर्क में आने पर उन्हें नष्ट कर देते हैं.
कैंसर का पता चलने के बाद ज़िंदा रहने की संभावना में सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य होता है कि कहीं ट्यूमर मेटास्टेटिक कैंसर में तो नहीं बदल गया है.
मुख्य शोधकर्ता प्रोफ़ेसर माइकल किंग कहते हैं, "कैंसर से होने वाली क़रीब 90 फ़ीसद मौतें मेटास्टेसिस की वजह से होती हैं."

नाटकीय असर

"दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं."
प्रोफ़ेसर माइकल किंग, मुख्य शोधकर्ता
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध दल ने इस समस्या से निजात पाने के लिए एक नया तरीका आज़माया.
उन्होंने कैंसर ख़त्म करने वाला, ट्रेल, नाम का प्रोटीन-क्लिक करेंजिसे पहले ही कैंसर प्रयोगों में इस्तेमाल किया जा चुका है- और अन्य चिपकने वाले प्रोटीनों को एक सूक्ष्म गोले या नैनोपार्टिकल से चिपकाया.
जब इन गोलों को ख़ून में डाला गया, तो वे सफ़ेद रक्त कोशिकाओं से चिपक गए.
कैंसर
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध में ट्यूमर के फैलाव को रोकने में "स्टिकी बॉल्स" के नाटकीय प्रभाव दिखे.
प्रयोगों से पता चला कि उछलते-कूदते रक्त में सफ़ेद रक्त कोशिकाएं उन ट्यूमर कोशिकाओं से टकरातीं थीं, जो मुख्य ट्यूमर से टूटकर फैलने की कोशिश कर रहे हैं.
क्लिक करेंनेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस की कार्यवाही में शामिल रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रेल प्रोटीन के संपर्क में आने से ट्यूमर कोशिकाएं ख़त्म हो गईं.
प्रोफ़ेसर किंग ने बीबीसी को बताया, "ये आँकड़े नाटकीय प्रभाव प्रदर्शित कर रहे है. यह कैंसर कोशिकाओं की संख्या में मामूली बदलाव नहीं है. दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं."

रेडियोथेरेपी से पहले

प्रोफ़ेसर किंग का मानना है कि नैनोपार्टिकल्स को सर्जरी या रेडियोथेरेपी से पहले इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे मुख्य ट्यूमर से ट्यूमर कोशिकाओं को निकाला जा सकता है.
इसे बहुत आक्रामक ट्यूमर वाले मरीज़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि ट्यूमर का फैलाव रोका जा सके.
हालांकि इंसानों पर जांच से पहले चूहों और बड़े जानवरों पर काफ़ी अधिक सुरक्षा जांच की ज़रूरत पड़ेगी.
अभी तक के सबूतों से लगता है कि इस पद्धति का प्रतिरोधी तंत्र पर कोई शुरुआती असर नहीं है और यह रक्त कोशिकाओं या रक्त धमनियों की परत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाता.

मगर प्रोफ़ेसर किंग चेतावनी देते हैं, "अभी बहुत काम किया जाना बाक़ी है. मरीज़ को इसका लाभ मिलने से पहले कई महत्वपूर्ण खोजें होनी बाक़ी हैं." sabhar :http://www.bbc.co.uk

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किसी चीज के प्रति अधिक संवदेनशील और भय क्यों प्रकट करता है। ‘

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आपने देखा या सुना होगा कि कुछ लोग पानी से डरते हैं। कुछ लोगों को ऊंचाई से डर लगता है तो कुछ किसी अनजाने भय से घबराए रहते हैं। यह डर यूं ही हमें नहीं डराते हैं। इस डर का कारण पिछले जन्म की यादों में छुपा होता है जो हमारे अवचेतन मन में कहीं दबा हुआ होता है।

prebirth memory cause of fear


एक टेलीविजन चैनल पर कुछ समय पहले एक धारावाहिक दिखाया जा रहा था जिसका नाम था 'राज पिछले जन्म का'। इस धारावाहिक में कई ऐसी घटनाओं को दिखाया गया जिसमें मेडिटेशन के द्वारा पूर्व जन्म की घटनाओं की जांच पड़ताल करके व्यक्ति का उपचार किया गया।

मेडिकल साइंस भले ही इस बात को स्वीकार करने में हिचकता हो कि पुनर्जन्म होता है लेकिन इस बात को वह भी स्वीकार करते हैं कि मेडिटेशन के द्वारा मन में बसे अवचेतन यादों को उभार कर डर और दूसरे कई रोगों का उपचार संभव है।रिग्रेशन थैरेपिस्ट उन कारणों का पता लगा सकते हैं कि व्यक्ति किसी चीज के प्रति अधिक संवदेनशील और भय क्यों प्रकट करता है। ‘हीलिंग पास्ट लाइफ थ्रू ड्रीम्स’ के लेखक जे डी ने लिखा है कि बचपन से ही उन्हें हाथ पांव सिकोड़ कर बैठने से डर लगता था।

इस डर की वजह वह समझ नहीं पा रहे थे। लेकिन एक रात उन्होंने ऐसा सपना देखा जिसमें उन्हें अपने डर का कारण पता चल गया। एक लड़के को कुछ लोगों ने हाथ पैर बांधकर कंबल में लपेट दिया था और उसकी पिटाई कर रहे थे। लोगों ने उसे एक अंधेरे कुएं में ढकेल कर मरने के लिए छोड़ दिया। जे डी देखा वह लड़का कोई और नहीं वह खुद थे।

उन्हें लगा कि यह उनके पूर्वजन्म की घटना थी। इसी घटना के कारण वह था कि वह पांव सिकोड़ कर बैठने से डरते थे। जब पूर्व जन्म का रहस्य पता चल गया तो उनका डर दूर हो गया। इन्होंने माना कि अवचेतन मन में बसी पूर्व जन्म की यादें ही इस जन्म में डर की वजह होती हैं। sabhar :http://www.amarujala.com

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80 साल पुराने जिम महिलाएं यहां आकर अपने फिगर का खास ध्यान

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ऐसे थे 80 साल पुराने जिम, यहां आकर फिगर को मेंटेन रखती थीं महिलाएं
आज के समय में जिम जाना प्रतिष्ठा की बात समझी जाती है। पश्चिम में यह बहुत पहले से ही हो रहा है, लेकिन भारत में जिम जाने की आदत पिछले एक दशक में लगीहै। इसमें महिलाओं की संख्या की तेजी से बढ़ रही है। भले ही भारत में महिलाएं इसके प्रति अब जाकर सजग हुई हों, लेकिन पश्चिमी देशों में यह चलन 70-80 साल पहले से ही शुरू हो गया था।
 
आज हम आपको 1920-30 के दशक की कुछ दुर्लभ और हंसाने वाली तस्वीरों से रूबरू करवा रहे हैं, जिनमें महिलाएं अपने फिगर का खास ध्यान रखने के लिए स्लिमिंग मशीन और साइक्लिंग का इस्तेमाल कर रही हैं।

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं




19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं
19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

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आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा

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नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

अगर आप ये सोचते हैं कि दुनिया में सबसे आसान जिंदगी साधुओं की है, तो आप गलत हैं। जितने समय में लोग डॉक्टर, इंजीनियर या कोई भी ऊंचा पद पा सकते हैं, उससे कई ज्यादा समय एक आम आदमी को नागा साधु बनने में लगता है। साधु बनने की प्रक्रिया जितनी कठिन है उतनी ही रोचक भी है।
साधु बनने के लिए इतनी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद कोई आम आदमी इसे पार ही नहीं कर पाए। जूना अखाड़े के महंत विजय गिरि महाराज के मुताबिक नागाओं को सेना की तरह तैयार किया जाता है। उनको आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है। इस प्रक्रिया में सालों लग जाते हैं

नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

तहकीकात - जब भी कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता। अखाड़ा अपने स्तर पर ये तहकीकात करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है। उसका पूरी पृष्ठभूमि देखी जाती है। अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है तो उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है। 
व्रत पालन - अखाड़े में प्रवेश के बाद उसके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है। इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक लग जाते हैं। जब तक कि अखाड़ा इस बात से निश्चिंत ना हो जाए कि वह व्यक्ति वासना और इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। अगर अखाड़ा और उस व्यक्ति का गुरु यह निश्चित कर लें कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है। 
नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश
महापुरुष - अगर व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है। तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है। उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं। ये पांच गुरु पंच देव या पंच परमेश्वर (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं। इन्हें भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं
नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

अवधूत - महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है। इसमें सबसे पहले उसे अपने बाल कटवाने होते हैं। इसके लिए अखाड़ा परिषद की रसीद भी कटती है। अवधूत रूप में दीक्षा लेने वाले को खुद का तर्पण और पिंडदान करना होता है। ये पिंडदान अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं। ये संसार और परिवार के लिए मृत हो जाते हैं। इनका एक ही उद्देश्य होता है सनातन और वैदिक धर्म की रक्षा।
नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

लिंग भंग - इस प्रक्रिया के लिए उन्हें 24 घंटे नागा रूप में अखाड़े के ध्वज के नीचे बिना कुछ खाए-पीए खड़ा होना पड़ता है। इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है। इस दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर रखे होते हैं। इसके बाद अखाड़े के साधु द्वारा उनके लिंग को वैदिक मंत्रों के साथ झटके देकर निष्क्रिय किया जाता है। यह कार्य भी अखाड़े के ध्वज के नीचे किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है। 

नागाओं के कई पद और अधिकार - नागा साधुओं के कई पद होते हैं। एक बार नागा साधु बनने के बाद उसके पद और अधिकार भी बढ़ते जाते हैं। नागा साधु के बाद महंत, श्रीमहंत, जमातिया महंत, थानापति महंत, पीर महंत, दिगंबरश्री, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर जैसे पदों तक जा सकता है। sabhar : bhaskar.com





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सोमवार, 6 जनवरी 2014

बिपाशा ने किए हैं कभी ऐसे बेडरुम और किस सीन

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एक्सपोजर की वजह से चर्चाओं में

एक्सपोजर की वजह से चर्चाओं में


7 जनवरी से 34 साल की हो रही बिपाशा बसु के पास इन दिनों बहुत फिल्में नहीं हैं। अब चूंकि बॉलीवुड में उनसे भी ज्यादा एक्सपोज करने वाली लड़कियां आ गई हैं इसलिए बिपाशा की वैसी पूछ नहीं होती।

लेकिन आज से दस साल पहले का समय याद कीजिए। जिस्म, मदहोशी, राज जैसी फिल्मों में बिपाशा बसु ने बोल्डनेस की नई परिभाषा गढ़ी थी। इन दृश्यों की वजह से बिपाशा आज तक याद की जाती है।

आज भी याद आती है जिस्म

आज भी याद आती है जिस्म

बिपाशा बसु की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक फिल्म जिस्म रही है। जिस्म में उनकी जोड़ी उनकी प्रेमी जॉन अब्राहम के साथ बनी। इस फिल्‍म में बिपाशा ने जमकर एक्सपोज किया। यह फिल्म अपने समय की सबसे बोल्ड फिल्म मानी जाती रही है।
मदहोशी में भी वही

मदहोशी में भी वही

जवानी के दिनो में ही बिपाशा द्वारा की गई एक और फिल्म मदहोशी भी खूब चर्चित रही। यह फिल्म भले ही बहुत बड़ी हिट साबित न हुई हो लेकिन इस फिल्म के बोल्ड सीन इसे खूब चर्चाओं में लेकर आए। 


लंबे-लंबे किस सीन

लंबे-लंबे किस सीन

हिंदी फिल्‍मों में जब भट्ट कैंप ने लंबे-लंबे स्मूच सीन शुरू किए तो बिपाशा बसु ही उन्हें दर्शाने वाला चेहरा बनीं। भट्ट कैंप की जिन फिल्मों को उनके एक्सपोजर और बोल्डनेस की वजह से याद किया जाता है उनमें से कई फिल्में का आधार बिपाशा ही रही हैं।
ज्यादातर प्रेमी के साथ

ज्यादातर प्रेमी के साथ

एक समय बिपाशा बसु और जॉन अब्राहम की जोड़ी सबसे हॉट जोड़ी मानी जाती रही है। रियल लाइफ में भी और रील लाइफ में भी। उनकी कई फिल्मों में जॉन ही उनके प्रेमी और हम बिस्तर बने हैं। चूंकि जॉन उनके रियल लाइफ प्रेमी थे इसलिए उन्हें यह सीन करते हुए दिक्कत भी नहीं हुई।
इमरान हाशमी का भी साथ

इमरान हाशमी का भी साथ

किसर किंग के नाम से मशहूर हीरो इमरान हाशमी के साथ भी बिपाशा बसु की जोड़ी बनी। राज 3 में बिपाशा बसु इमरान हाशमी के साथ नजर आई। इस फिल्‍म के किस और बेडरूम सीन लंबे समय तक चर्चाओं में रहे।


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प्रेगनेंट पिता ने दिया फूल सी बेटी को जन्म

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Pregnant Man Gives Birth To A Baby Girl
सुनने में भले ये आपको अजीब लग रहा हो लेकिन ये सच है। अर्जेंटीना का ट्रांसजेंडर कपल अब एक बच्ची के माता-पिता हैं। बच्ची का जन्म ऑपरेशन से हुआ है। 26 वर्षीय अलेक्सिस टैबोरडा और 28 वर्षीय करेन बेटी के जन्म से बेहद खुश्‍ा हैं।दरअसल, अलेक्सिस का जन्म बतौर लड़की हुआ था लेकिन वो पुरुषों की तरह रहा करती थी। जबकि करेन जन्म के समय लड़का था लेकिन लड़कियों की रहा करता था।अर्जेंटीना में साल 2012 में कानून पास होने के बाद से इन दोनों ने भी कानूनी तौर पर अपना लिंग बदल लिया। लेकिन लिंग बदलने के लिए उन्होंने कोई सर्जरी नहीं कराई। इसका मतलब यही हुआ कि कानूनी तौर लड़का बन चुकी अलेक्सिस ने ही गर्भ धारण किया।आप सोच रहे होंगे कि बच्ची कैसी है? बच्ची का जन्म तय समय से कुछ पहले हो गया है लेकिन वो स्वस्‍थ है। इस जोड़े ने बच्ची का नाम जेनेसिस इवेंजेलिना रखा है। saqbhar :http://www.amarujala.com

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रोजलिन,Sex Scandal में फंसाई जा रही थीं

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Sex Scandal में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, चल रही थी वेबसाइट

मुंबई की गोरेगांव पुलिस ने 5 जनवरी (रविवार) को एक 21 साल की लड़की को गिरफ्तार किया है जो कथित तौर पर बॉलीवुड मॉडल रोजलिन खान के नाम की आड़ में एक एस्कॉर्ट सर्विस चला रही थी। इस लड़की ने rozlynkhanescort.com नाम की एक वेबसाइट बना रखी थी और उसी के जरिए अपना काम कर रही थी।
 
वेबसाइट के लॉन्च होने के बाद से रोजलिन के पास कई ऐसे मैसेजेस आने लगे जिसमें लोग उनसे सेक्स करने और अपनी एक रात की कीमत पूछ रहे थे। जब रोजलिन को पूरी बात पता चली तो उन्होंने पुलिस से संपर्क किया। रोजलिन खान की शिकायत पर गोरेगांव पुलिस ने मामला दर्ज करके आरोपी लड़की को गिरफ्तार कर लिया।
 
रोजलिन ने एडिशनल पुलिस कमिश्नर (नॉर्थ) सुनील पराश्कर से लगभग 15 दिन पहले इस बारे में बात की थी और 5 जनवरी को इस लड़की को गिरफ्तार कर लिया गया।
 सेक्स स्कैंडल में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, हमशक्ल लड़की चला रही थी वेबसाइट

रोजलिन के नाम से हुई इस छेड़छाड़ का मामला तब सामने आया जब लोग फेसबुक, ट्विटर और उनके फोन पर मैसेज करने लगे और उनसे सेक्स की इच्छा जताने लगे। साथ ही लोगों ने रोजलिन से उनकी एक रात की कीमत भी पूछी। पहले तो रोजलिन को कुछ समझ में नहीं आया कि आखिर ये क्यों हो रहा है, लेकिन बाद में उनके दोस्तों ने उन्हें बताया कि उनके नाम से एक वेबसाइट चल रही है जो एस्कॉर्ट सर्विस उपलब्ध करवा रही है
सेक्स स्कैंडल में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, हमशक्ल लड़की चला रही थी वेबसाइट

इसके बाद जब रोजलिन ने खुद वेबसाइट देखी तो वो हैरान रह गईं। उस वेबसाइट पर एस्कॉर्ट्स की तस्वीरों की जगह रोजलिन खान की मॉडलिंग वाली तस्वीरें लगी हुई थीं। साथ ही वेबसाइट में रोजलिन खान के नाम का भी इस्तेमाल किया गया था।इसके बाद रोजलिन खान ने एडिशनल पुलिस कमिश्नर (नॉर्थ) सुनील पराश्कर से बात की और उन्हें इस बारे में बताया। ये बात तकरीबन 15 दिन पुरानी है। इसके बाद रोजलिन खान ने खुद इस मामले में फुर्ती दिखाई और वो पुलिस की उस टीम के साथ ही रहीं, जो इस मामले की जांच के लिए बनाई गई थी। इसके बाद पुलिस टीम ने एक प्लान बनाया और आरोपी लड़की को गिरफ्तार कर लिया।
सेक्स स्कैंडल में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, हमशक्ल लड़की चला रही थी वेबसाइट

सेक्स स्कैंडल में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, हमशक्ल लड़की चला रही थी वेबसाइट
वैसे अगर सूत्रों की मानें तो इस आरोपी लड़की की शक्ल काफी हद तक रोजलिन खान से मिलती-जुलती है। यही वजह रही कि उस लड़की ने rozlynkhanescort.com नाम की एक फर्जी वेबसाइट बना डाली। वेबसाइट पर खुद रोजलिन को भी एक एस्कॉर्ट मॉडल के रूप में दिखाया गया था।

सेक्स स्कैंडल में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, हमशक्ल लड़की चला रही थी वेबसाइट

रोजलिन की हालत ऐसी हो गई थी कि वेबसाइट ब्लॉक होने के बाद भी उनके पास लोगों के मैसेज आ रहे थे और लोग उनसे 'वन नाइट स्टैंड' के लिए पूछ रहे थे। इस मामले के लिए पुलिस ने एक टीम बनाई और एक कस्टमर के तौर पर इस वेबसाइट से संपर्क किया। जब वेबसाइट की मालिक लड़की से एस्कॉर्ट उपलब्ध कराने के लिए बात की गई तो उसने पुलिस वालों ने गोरेगांव के एक होटल में मिलने को कहा।जैसे ही वो लड़की होटल में आई, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। वैसे ये देखकर पुलिस वाले भी काफी हैरान थे क्योंकि वो लड़की काफी हद तक रोजलिन खान के जैसी ही लग रही थी। गोरेगांव पुलिस स्टेशन के एक अफसर ने बताया, 'हम एक कस्टमर की तरह व्यवहार कर रहे थे। जो नंबर वेबसाइट पर दिया गया था, उस पर बात करने पर कुछ देर के लिए 50,000 रुपए में डील की गई थी।'
सेक्स स्कैंडल में फंसाई जा रही थीं रोजलिन, हमशक्ल लड़की चला रही थी वेबसाइट

हमने गोरेगांव होटल में एक जाल बिछाया और उस लड़की को गिरफ्तार कर लिया। हांलाकि उस लड़की की शक्ल रोजलिन जैसी ही थी।' वैसे जब इस बारे में रोजलिन से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने साफ मना कर दिया। रोजलिन के मुताबिक जब तक ये केस हल नहीं हो जाता है, वो मीडिया से इस बारे में कोई बात नहीं करेंगी।

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कम उम्र में भी काले खूबसूरत बाल सफेद रंग के कैसे हो जाते हैं?

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कम उम्र में सफेद बाल होने के ये है 6 सबसे बड़े कारण

कम उम्र में बाल अगर एक बार सफेद होने लगे तो उन्हें रोकना थोड़ा मुश्किल होता है। जब कम उम्र में बाल सफेद होने लगते हैं तो मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी कम उम्र में बाल सफेद क्यों हो रहे हैं अगर आपके मन में भी यही सवाल है तो हम आपको आज आपके इसी सवाल का जवाब देने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं आज इसी कारण के बारे में कि कभी-कभी कम उम्र में भी काले खूबसूरत बाल सफेद रंग के कैसे हो जाते हैं?
कम उम्र में सफेद बाल होने के ये है 6 सबसे बड़े कारण
- खाने में प्रोटीन व आयरन की कमी के कारण बाल सफेद होते हैं।भय, प्रदूषण, सोच व तनाव भी बालों की सफेदी का कारण है।
- अनियमित खान-पान व दिनचर्या में अनियमितता के कारण भी कई बार उम्र से पहले बाल सफेद होने लगते है।
कम उम्र में सफेद बाल होने के ये है 6 सबसे बड़े कारण

- बाल सफेद होने का सबसे मुख्य कारण शरीर में उपस्थित सफेद जीन पर निर्भर करता है। अगर ये जीन अधिक प्रभावी होता है तो बाल जल्दी सफेद हो जाते हैं।
- इसके अलावा एनिमिया, एड्स या थायरॉयड के कारण भी बाल जल्दी सफेद हो जाते हैं। कई बार संतुलित भोजन ना मिलने पर या दवाइयों के रिएक्शन्स से भी बाल सफेद हो जाते हैं।- 
हमारे बालों का काला, भूरा या लाल रंग शरीर में उपस्थित मेलेनिन नामक वर्णक के कारण होता है। लेकिन बालों की सफेदी का कारण अधिकांशत: आनुवंशिक होता है।
- भरपूर नींद न लेने से व कमजोरी के कारण भी कुछ लोगों के बाल कम उम्र में सफेद होने लगते हैं। sabhar : bhaskar.com



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किसी शख्स के दो जननांग कैसे हो सकते हैं?

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Man with Two Penises Shares His Story

हैरतअंगेज! इस शख्स को है अजीबोगरीब बीमारी, हैं दो लिंग


ये सुनने में ही काफी अजीब लगता है कि किसी शख्स के दो जननांग कैसे हो सकते हैं? पर ये सच है कि धरती पर एक ऐसा शख्स है, जिसके दो लिंग हैं।

पिछले दिनों दो लिंग वाले इस शख्स ने रेडिट एएमए पर अपने जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में बात की। इस शख्स का असल नाम क्‍या रहा होगा ये तो किसी को नहीं पता लेकिन लोग उन्हें 'डबलडिकडूड' नाम से जानते हैं। 
अकेले नहीं हैं 'डबलडिकडूड'
अगर आपको ये लगता है कि अपनी इस विचित्र स्थिति के चलते इस शख्स की कोई गर्लफ्रेंड नहीं होगी तो आपको बता दें कि 'डबलडिकडूड' बाइसेक्सुअल हैं। उनकी एक गर्लफ्रेंड है और एक ब्वॉयफ्रेंड भी। उनका कहना है कि उनकी गर्लफ्रेंड और उनके ब्वॉयफ्रेंड को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती है और वो इस संबंध से काफी खुश हैं।

दोनों लिंग हैं सक्रिय
दिनचर्या के कामों के लिए 'डबलडिकडूड' दोनों लिंगों का इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है उनके इस असाधारण स्थिति की वजह से उन्हें पोर्न इंडस्ट्री से कई प्रस्ताव आ चुके हैं। लेकिन उन्होंने अभी तक इस पर कोई विचार नहीं किया है। sabhar : http://www.amarujala.com





दो वैजाइना के कारण इस महिला को पोर्न इंडस्ट्री ने दिया करोड़ो का ऑफर




ब्रिटेन में इन दिनों हेजल जोन्सा नामक महिला लगातार चर्चा में है। एक 'खास' शारीरिक दोष ने इस महिला को रातों रात पोर्न इंडस्ट्री का स्टार बना दिया है।

ब्रिटेन के टैब्लॉइड 'द सन' के मुताबिक हेज़ल जोन्स नाम की इस महिला में शारीरिक दोष के कारण पूरी तरह विकसित दो वैजाइना हैं। उनकी इस खासियत के कारण पॉर्न फिल्म इंडस्ट्री की उन पर नजर है। पोर्न इंडस्ट्री इस महिला को 5 करोड़ रूपए का ऑफर दिया है।

हेजल ने बताया कि उन्हें अपने इस शारीरिक दोष के बारे में किशोरवस्था में पता चला। हेज़ल अपनी इस खास शारीरिक बनावट पर कतई शर्मिंदा नहीं हैं। हेज़ल के पति रिकी का कहना है कि 'हेज़ल के शरीर की यही बनावट उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। उन्हें अपनी पत्नी पर गर्व है। रिकी के मुताबिक, 'हेज़ल का शरीर उन्हें दूसरों से अलग बनाता है।

विविड एंटरटेनमेंट के हेट स्टीव हाइरस ने अपनी पॉर्न फिल्म के लिए उन्हें 1 लाख मिलियन डॉलर की रकम का ऑफर दिया है। लेकिन जोन्स् ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई हैं। वह अपने मैरिज लाइफ से खुश हैं।
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एक दो सिर और छह पैर वाली छिपकली

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2-Headed, 6-Legged Baby Lizard Found In Thailand

घर की दीवारों पर छिपकली को चलते देखकर आपने कई बार चीखें निकाली होंगी लेकिन ऐसी छिपकली आपने आज तक नहीं देखी होगी। क्‍योंकि ये छिपकली कोई आम छिपकली नहीं है।

अफ्रीका न्यूज पोस्ट की खबर के अनुसार, थाइलैंड में एक दो सिर और छह पैर वाली छिपकली मिली है। इस अपार्टमेंट में तीन पुरुष ही रहते हैं।इन तीनों ने बताया कि उन्होंने इस छिपकली को अंडे के अंदर ही देख लिया था। उस वक्त तक उसका एक सिर बाहर और एक अंदर था। ये आकार में काफी छोटी है।

प्रिंस ऑफ सोंगखला यूनिवर्सिटी में जीव-विज्ञान के प्रोफेसर डॉक्टर वांगकुलांगकुल की खबर के अनुसार, इस छिपकली का मिलना बेहद खास है। ये काफी दुर्लभ है।उनका कहना है कि ये छिपकली आमतौर पर तो एक साल तक जिंदा रहती है लेकिन इस बेहद दुर्लभ दो सिर और छह पैर वाली छिपकली के जीवन के बारे में कहना काफी मुश्किल है।इसे जिंदा रखने की पूरी कोशिश की जा रही है और उसे काली चीटियों का खाना दिया जा रहा है। sabhar http://www.amarujala.com

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