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रविवार, 15 अप्रैल 2012

ये है 'बाबाओं' के रहस्यमयी शक्तियों और चमत्कारों का राज!

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नई दिल्ली. अपनी रहस्यमयी शक्तियों के जरिए लोगों के कल्याण का दावा करने वाला बाबाओं का 'सच' धीरे-धीरे सामने आ रहा है। उनके चमत्कार के कायल लोगों के आंखों पर से अंधविश्वास की पट्टी धीरे-धीरे हट रही है। कहीं बिना गए वहां के बारे में बता देना। किसी से बिना मिले उस तक अपनी बात पहुंचा देना। यह जादू या चमत्कार नहीं बल्कि टेलीपैथी है।

टेलीपैथी परामनोविज्ञान की एक शाखा है। इसका मतलब है दूर रहकर आपसी सूचनाओं का बगैर किसी भौतिक साधनों के आदान-प्रदान करना। यह एक ऐसी मानसिक तकनीक है जो दूरियों के बावजूद हमारी बातों को इच्छित लक्ष्य तक पहुंचा देती है। हालांकि इसे अभी विज्ञान की कसौटी पर कसा जा रहा है। इस पर शोध हो रहे हैं। अब तक हुए शोधों में शोधकर्ताओं को सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता। यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं होता है।

टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्तिमें यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। इंसानों को तो इस विद्या को सीखना पड़ता है किन्तु जीव-जन्तुओं में टेलीपैथी की विद्या जन्मजात पाई जाती है। ऐसा ही एक प्राणी है कछुआ जिसे इस विद्या में महारत हासिल है।

टेलीपैथी के उदाहरण हमें अत्यंत प्राचीन काल से ही देखने को मिलते हैं। वैदिक काल के ऋषि-मुनियों में इस विद्या का प्रयोग होना एक सामान्य बात थी। ऐसा ही उदाहरण रामायण में भी देखने को मिलता है। सीता की खोज करने का वचन देकर जब सुग्रीव नहीं निभाता है तो यह विचार राम के मन में खेद उत्पन्न करता है। ठीक उसी समय हनुमान के मन भी संप्रेषित हो जाता है। हनुमान तत्काल राम का विचार सुग्रीव तक पहुंचा देते हैं।

इंग्लैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मानव के स्त्रायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े। उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा। sabhar : bhaskar.com

 
 

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रात के अंधेरे में भी दिखता है इस अद्भुत बच्चे को

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उसकी आंखें जन्म के समय आम इंसान की तरह काली या भूरे रंग की नहीं थीं। उसकी आंखें नीले रंग की थीं। विलक्षण आंखों वाला ये बच्चा अपने माता-पिता के साथ चीन के एक सुदूर गांव ग्वांज़ी में रहता है। उसका नाम नॉग यूहुई (nong youhui) है।



उसकी आंखों की एक और विशेषता ये है कि आंखों पर जब रोशनी पड़ती है, तो वो हल्की नीली होकर और भी चमकने लगती हैं। ठीक वैसे ही, जैसे किसी जानवर या बिल्ली की आंखों पर रोशनी पड़ते ही वो चमकने लगती हैं। जब पहली बार उसके माता-पिता को इस बारे में पता चला तो वे चिंतिंत हो गए।



ऐसा होना लाजिमी था। इसलिए उन्होंने नॉग यूहुई को स्थानीय डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने कहा कि बढ़ती उम्र के साथ ही इसकी आंखों का रंग भी अपने-आप ठीक हो जाएगा। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। ऐसे ही दिन बीतने लगे।



यह घटना 2009 की है। एक दिन उसे स्कूल में दिन के वक्त ही सूरज के उजाले में देखने पर परेशानी हुई तो उसके एक सहपाठी ने मज़ाक में कहा कि उसकी आंखें बिल्ली की आंखों की तरह दिख रही हैं। नॉग यूहुई के शिक्षक को जब इस बारे में पता चला, तो उन्होंने कंफर्म करने के लिए उसकी आंखों को टॉर्च की रोशनी में देखा। वह चौंक गईं। रोशनी पड़ते ही यूहुई की आंखें सचमुच चमक उठीं।



इसके बाद शिक्षक ने रात के अंधेरे में भी उसकी आंखें चैक की तो वह हैरान रह गए। रात के अंधेरे में उसे सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था। नॉग यूहुई ने बताया कि वह अंधेरे में दिन की अपेक्षा ज्य़ादा स्पष्ट देख सकता है। वह अंधेरे में झींगुर को भी आसानी से पकड़ लेता है। इस घटना के बाद से ही इस अनोखी आंखों वाले लड़के की जैसे जिंदगी ही बदल गई हो।



इस बात की भनक जब कुछ देशों के डॉक्टर और वैज्ञानिकों को लगी, तो वे इसकी आंखें टैस्ट करने के लिए इसके पास आने लगे। देखते ही देखते वह पूरी दुनिया में मशहूर हो गया। उसे लोग बिल्ली जैसी आंखों वाला कहकर पुकारने लगे।



हो सकता है बहुत ही जल्द उसका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में एक ऐसे लड़के के रूप में दर्ज़ हो जाए, जो आसानी से रात के अंधेरे में देख सकता है। कई दफा वह बार-बार के टैस्ट को लेकर और मिलने वालों से परेशान भी हो जाता है sabhar : bhaskar.com

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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

मैं निर्मल बाबा के साथ हूं

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मैं निर्मल बाबा के साथ हूं. कम से कम अब तो साथ हूं. दिल खोल के साथ हु निर्मल बाबा अकेले नहीं है संसार में अनेको ढोगी बाबा है जो ढोग का लिवास पहन कर लोगो को मुर्ख बना रहे है  । आखिर निर्मल बाबा का क्यों विरोध हो रहा है , अगर ढंग से बाबाओ की छवि सामने आये तो बड़े बड़े मठाधीश नंगे हो जायेगे ।  ये बाबा लोग  टीवी चेंनेल पर प्रवचन देते सुबह शाम देखे जाते है और बाबाओ के पैसे  से ही टीवी चेंनेल चल रहे है ।

फिर निर्मल बाबा के खिलाफ क्यों अभियान छेड़ा जा रहा है । अगर ढंग से बाबाओ  की कुंडली खंगाली जाये तो उनके  अतीत का काल सच बहुत खतरनाक होगा । आज निर्मल बाबा के विज्ञापन ३५ चेनल पर नजर आते है । हर तरफ निर्मल कृपा बरस रही है । लोग जमकर निर्मल बाबा की विरोध में लिख  रहे है मै पूछता हु  आखिर क्यों ?क्या आप  लोगो में हिम्मत  है जो  अन्य  बाबा   टीवी चेनल पर आते है और  जो बाबा टीवी चेनल  पर  नहीं दिखाई   देते है  कल तक साइकिल से रपटने वाले बाबा रामदेव जी के  पास  अपार धन कहा से आ गया ।  क्या वह पैसा नहीं लेते है । सच यह है १०० में १ बाबा पाक साफ़ है ।बाकि सब ढोगी है ।  मै सब ढोगी पाखंडी बाबाओ के खिलाफ हु जो धर्म के नाम पर झूट बेच कर अपनी तिजोरी भर रहे  है । ,

एडिटर
सुशील गंगवार 
साक्षात्कार डाट .कॉम 
मीडिया दलाल डाट .कॉम 

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दवा पहुंचेगी अब माइक्रोचिप से

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कुछ समय पहले वैज्ञानिक कह रहे थे कि वे एक ऎसे माइक्रोचिप बनाना चाहते हैं जिसे मरीजों की त्वचा के नीचे लगा दिया जाए और वह समय-समय पर दवा की संतुलित मात्रा मरीज को देता रहे। तब लगता था कि वे कोई खयाली पुलाव पका रहे हैं, लेकिन अब यह परिकल्पना सच के एक कदम और करीब पहुंच गई है। 

अमरीका में वैज्ञानिक ऎसे एक माइRोचिप का एक महिला पर परीक्षण कर रहे हैं जिसे ऑस्टियोपोरोसिस है, ये एक ऎसा रोग है जिसमें हçaयां कैल्शियम की कमी से कमजोर हो जाती हैं। एक माईक्रोचिप  को उनकी कमर में लगाया गया है और उसे रिमोट कंट्रोल के जरिए शुरू कर दिया गया है। साइंस ट्रांसलेशनल मेडिसिन में प्रकाशित विवरण के अनुसार इस माइक्रोचिप के क्लिनिकल ट्रायल से पता चला है कि चिप सही मात्रा में शरीर को दवा दे रहा है और उसके कोई साइड इफेक्ट भी नहीं हैं। इस प्रयोग के बारे में अमरीकन एसोसिएशन ऑफ एडवांसमेंट ऑफ साइंस में भी चर्चा की गई है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माईक्रोचिप   है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।    मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माइRोचिप है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।
मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के प्रोफेसर रॉबर्ट लैंगर इस चिप का निर्माण करने वालों में से एक हैं। ये नाखून के आकार का माइRोचिप है जो दवा के छोटे-छोटे पैकेट से जुड़ा होता है। वे दावा करते हैं कि नियंत्रित हो सकने वाले इस चिप ने चिकित्सा के क्षेत्र में नई संभावनाओं को द्वार खोल दिए हैं। वे कहते हैं, "सच कहें तो आप इस चिप में दवा की दुकान डाल सकते हैं।" माइक्रोचिप लगे उपकरण को महिलाओं के कमर के पास लगाया गया है।  वे बताते हैं कि इस उपकरण में ऎसी सामग्री का प्रयोग किया गया है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते और इस उपकरण के भीतर इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हुए है। जिसमें दवा और दवा के पैकेट दोनों होते हैं। इसके काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि हर दवा के छोटे पैकेट को प्लेटिनम और टिटेनियम की पतली झिçल्लयों से ढक कर रखा गया है। 
वे बताते हैं कि इस उपकरण में ऎसी सामग्री का प्रयोग किया गया है, जो शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाते और इस उपकरण के भीतर इलेक्ट्रॉनिक्स लगे हुए है। जिसमें दवा और दवा के पैकेट दोनों होते हैं। इसके काम करने की पद्धति के बारे में बताते हैं कि हर दवा के छोटे पैकेट को प्लेटिनम और टिटेनियम की पतली झिçल्लयों से ढक कर रखा गया है। इस माइRोचिप को विकसित करने का काम भी साथ में चल रहा है। इस उपकरण का प्रयोग डेनमार्क में सात महिलाओं पर किया जा रहा है, जिनकी उम्र 65 से 70 वर्ष के बीच है। वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र में बताया है कि इस उपकरण के जरिए दवा दिया जाना ठीक उसी तरह से प्रभावशाली साबित हो रहा है जैसा पेन-इंजेक्शन के जरिए दवा देने पर होता है और इससे हçaयों में सुधार हो रहा है। उनका कहना है कि अब तक कोई साइड इफैक्ट देखने में नहीं आया है। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया है कि किसी दवा का प्रभावशाली होना न होना इस प्रयोग का हिस्सा नहीं है और ये प्रयोग सिर्फ इस उपकरण के लिए किया जा रहा है। हालांकि इस प्रयोग की शुरूआत मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हुई थी लेकिन अब इसका विकास माइRोचिप इंक नाम की एक कंपनी कर रही है।  अब ये कंपनी इस उपकरण को और विकसित करने की कोशिश कर रही है जिससे कि इसमें दवा की और खुराकें डाली जा सकें। अभी जो प्रयोग किया जा रहा है उसमें उपकरण में दवा की सिर्फ 20 खुराकें ही हैं लेकिन कंपनी मानती है कि इस उपकरण में सैंकड़ों खुराक डालना संभव है। हालांकि इस उपररण को बाजार में आने में अभी भी पाँच साल का समय लगेगा।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डियागो में बायोइंजीनियरिंग के प्रोफेसर जॉन वाटसन ने इस शोध पर टिप्पणी करते इस उपकरण में सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा, "शोध के दौरान एक मरीज पर ये उपकरण कारगर नहीं रहा। वह आठवीं महिला थी जिसका जिक्र शोध पत्र में नहीं किया गया है।यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डियागो में बायोइंजीनियरिंग के प्रोफेसर जॉन वाटसन ने इस शोध पर टिप्पणी करते इस उपकरण में सुधार की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा, "शोध के दौरान एक मरीज पर ये उपकरण कारगर नहीं रहा। वह आठवीं महिला थी जिसका जिक्र शोध पत्र में नहीं किया गया है।
उनका कहना है कि इंजेक्शन लगाने के इंझट से मुक्त होने के लिए लोग इसे अपना लेंगे, खासकर ऑस्टियोपोरोसिस के मामले में जिसमें महिलाओं को पैराथॉयराइड का इंजेक्शन खुद लेना होता है। वे कहती हैं, "हालांकि ये प्रयोग अभी बहुत छोटा है लेकिन इसके नतीजे उत्साहित करने वाले हैं।" मैसाच्युसेट्स के शोधकर्ता कहते हैं कि अब इस पर विचार किया जा सकता है कि चिप्स अलग-अलग तरह की दवाओं पर नियंत्रण करे और मरीज के शरीर की स्थिति के अनरूप दवा की मात्रा तय कर सके।



    

sabhar : patrika.com

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दूध के दांत बचा सकते हैं जिंदगी

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कहा जाता है कि सभी बीमारियों में रक्त सम्बंधी बीमारियां केवल चार प्रतिशत ही होती हैं।"
स्टेम सेल थेरेपी में मरीज के शरीर के क्षतिग्रस्त ऊतकों में या घाव में स्वस्थ व नई कोशिकाएं स्थापित की जाती हैं। स्टेमेड बायोटेक के संस्थापक व प्रबंध निदेशक शैलेष गडरे ने आईएएनएनई दिल्ली। क्या आपके बच्चे के दूध के दांत टूटने वाले हैं... तो उन्हें फेंकने की बजाए आप उन्हें डेंटल स्टेम सेल बैंक में भविष्य में इस्तेमाल के लिए सहेज कर रख सकते हैं। बच्चे के आगे के जीवन में गम्भीर बीमारियों की दशा में ये दांत स्टेम कोशिकाओं के निर्माण में प्रयुक्त हो सकते हैं। भारत में डेंटल स्टेम सेल बैंकिंग नई है लेकिन फिर भी इसे अम्बलीकल कॉर्ड ब्लड बैंकिंग की अपेक्षा अधिक कारगर विकल्प माना जा रहा है। स्टेम सेल थेरेपी में मरीज के शरीर के क्षतिग्रस्त ऊतकों में या घाव में स्वस्थ व नई कोशिकाएं स्थापित की जाती हैं। स्टेमेड बायोटेक के संस्थापक व प्रबंध निदेशक शैलेष गडरे ने आईएएनएस से कहा, "अम्बलीकल कॉर्ड रक्त सम्बंधी कोशिकाओं की अच्छी स्त्रोत है। खून सम्बंधी बीमारियों जैसे रक्त कैंसर में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। वैसे 
स से कहा, "अम्बलीकल कॉर्ड रक्त सम्बंधी कोशिकाओं की अच्छी स्त्रोत है। खून सम्बंधी बीमारियों जैसे रक्त कैंसर में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। वैसे कहा जाता है कि सभी बीमारियों में रक्त सम्बंधी बीमारियां केवल चार प्रतिशत ही होती हैं।"बच्चों के दांत सम्बंधी रोगों की विशेषज्ञ सविता मेनन कहती हैं कि पांच से 12 साल उम्र के बच्चों के दूध के दांतों से स्टेम कोशिकाएं आसानी से निकाली जा सकती हैं। इसके लिए जब बच्चे का कोई दांत हिलने लगे तब उसे निकालकर उससे बिना किसी शल्यक्रिया के स्टेम कोशिकाएं इकट्ठी की जा सकती हैं।भारत में डेंटल स्टेम सेल बैंकिंग की सुविधा देने वाली कम्पनियों की संख्या अभी बहुत कम हैं। इनमें स्टेमेड व स्टोर योर सेल्स जैसी कम्पनियां शामिल हैं। स्टेम कोशिकाओं को 21 साल की अवधि तक रखने पर १००००० का खर्च आता है ।
साभार : पत्रिका.कॉम  

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समुद्र के अंदर का वर्चुअली आनंद "अंडरवाटर अर्थ" से

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मेलबर्न। अब तक गूगल अर्थ से पृथ्वी का स्थल भाग ही नजर आता था, पर जल्द ही इस सेवा का विस्तारित रूप देखने को मिलेगा और पृथ्वी के समुद्र के अंदर की हलचल को यूजर्स देख सकेंगे। इतना ही नहीं, वे ग्रेट बैरियर रीफ के आस-पास तैरने का वर्चुअल आनंद भी ले सकेंगे।
प्रोजेक्ट में 50 हजार से अधिक फोटोग्राफ इस प्रोजेक्ट को प्रवाल शैलमाला के स्वास्थ्य और उनकी संरचना पर पहले व्यापक अध्ययन के अंश के रूप में जाना जा रहा है। 
गूगल ने इस प्रोजेक्ट को अंजाम देने के लिए ग्लोब के चारों कोनों पर कैमरे लगाए हैं और इनसे पूरी बारीकी के साथ स्ट्रीट स्तर की फोटोग्राफी जैसा ऑनलाइन संग्रह (आर्काइव) तैयार हो रहा है।इसके लिए विशेषज्ञ गोताखोरों ने कई-कई महीने पानी के अंदर के 360 डिग्री के सुंदर स्थलों की चित्रमाला कैमरे में खींची है। इन्हीं में से 50,000 से अधिक फोटोज को जोड़कर केटलिन सीव्यू सर्वे तैयार किया है। केटलिन सीव्यू, गूगल के स्ट्रीट व्यू का ही उप-जलीय संस्करण है। इन 50,000 से अधिक फोटोज से समुद्र की सतह से 100 मीटर नीचे एक वर्चुअल डाइव (गोताखोरी) के लिए दृश्य/असर निर्माण हो सका है।
 इसके लिए यूजर्स को कहीं और जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वो अपने कंप्यूटर पर ऑनलाइन होते ही 
प्रवाल शैलमाला के विस्तृत इलाकों में भ्रमण कर सकेंगे और समुद्र की खूबसूरत दुनिया से परिचित हो सकेंगे। फिलहाल यूजर्स केवल केटलिन सीव्यू सर्वे के नक्शे को देख सकते हैं। इस प्रोजेक्ट से वैज्ञानिक भी आशान्वित है। वे मानते हैं कि प्रोजेक्ट में मिलने वाले आंकड़े मौसम और ग्रेट बैरियर रीफ जैसे समुद्री इलाकों पर अन्य पर्यावरण अवस्था से प्रभावित पारस्थितितंत्र को अधिक बेहतरी समझ सकेंगे। क्वींसलैंड क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के ग्लोबल चेंज इंस्टीट्यूट के प्रो. ओवे होइग-गुल्डबर्ग का मानना है कि इस प्रोजेक्ट का विजुअल नेचर, वैज्ञानिक जानकारियों और जनता की जागरूकता के  बीच पुल का काम करेगा। sabhar : patrika.com 


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सेक्स करने पर पड़ गए लेने के देने!

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म्यूनिख। जर्मनी के म्यूनिख शहर में एक शख्स को महिला से सेक्स करना भारी पड़ गया। महिला की सेक्स की भूख शांत नहीं होने पर इस व्यक्ति को अपनी जान बचाने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। पुलिस महिला के खिलाफ यौन दुर्व्यवहार का केस दर्ज कर सकती है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक इस व्यक्ति की म्यूनिख के एक बार में एक महिला से मुलाकात हुई। 
दोनों ने रात साथ गुजारने का फैसला किया। उम्र में चार साल बड़ी महिला उसे अपने फ्लैट पर ले गई। कई बार सेक्स के बाद भी महिला और सेक्स की मांग करने लगी। एक समय ऎसा आया कि 43 वर्ष का वो आदमी बदहवासी में भागकर महिला के फ्लैट की बॉलकनी तक पहुंचा और वहीं से चिल्ला कर पुलिस को बुलाने लगा। कहानी में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब उस व्यक्ति को बचाने के लिए मौके पर पहुंचे पुलिस वालों को भी महिला ने यौन आमंत्रण दे डाला। 
sabhar : patrika.com 

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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

ब्रह्मांड में "हम अकेले नहीं हैं"

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एक पूर्व अमेरिकी चंद्रयात्री को पूरा भरोसा है कि इस दुनिया के अलावा भी दुनियाएं हैं, जहां बुद्धिमान प्राणी रहते और कभी कभी पृथ्वी पर भी आते हैं. अमेरिका जैसे देशों की सरकारें यह जानती हैं, पर इस बारे में तथ्य छिपाती हैं.
भूतपूर्व चंद्रयात्री एडगर मिचेल का कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि "हम अकेले नहीं हैं." उन्हें इस बात में कोई शक नहीं है कि ET, यानी मनुष्यों जैसे इतरलोकीय प्राणियों का भी अस्तित्व है. अमेरिका की सरकार उनके अस्तित्व के बारे में जानती है, लेकिन जनता को जानबूझ कर अंधेरे में रख रही है
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कथित उड़न तश्तरी का 13 वर्ष के एक ब्रिटिश लड़के द्वारा 15 फ़रवरी 1954 में लिया गया चित्र


एडगर मिचेल अपने सहयात्रियों एलन शेपर्ड और स्टुअर्ट रूसा के साथ अपोलो-14 चंद्रयान से 5 फ़रवरी 1971 को चंद्रमा पर उतरे थे. उन्होंने एलन शेपर्ड के साथ 9 घंटे 17 मिनट तक चंद्रमा पर विचरण किया था, जो चंद्रविचरण का अब तक का रेकॉर्ड समय है.
विज्ञान के छात्र रहे और एरोनॉटिक्स में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त मिचेल अब 78 वर्ष के हो चले हैं. जुलाई 2008 में भी उन्होंने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा था कि वे जानते हैं कि इतरलोकीय प्राणी उड़न तश्तरी जैसी चीज़ों में कई बार पृथ्वी पर आ चुके हैं, हम मनुष्यों से संपर्क करने के प्रयास भी कर चुके हैं.
जब वह अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा के लिए काम कर रहे थे, तब इस तरह के "एलियन" के संपर्क में रह चुके "जानकार सूत्र" उन्हें बताया करते थे कि वे "छोटे कद वाले अजीब-से लोग" होते हैं. मिचेल का समझना है कि किसी दूसरी दुनिया से आने वाले ये प्राणी इस पारंपरिक मान्यता से बहुत अलग नहीं हैं कि उनका कद छोटा, आंखें बड़ी-बड़ी और सिर भी काफ़ी बड़ा होता है
एडगर मिचेल ने अमेरिकी टेलीविज़न चैनल सीएनएन के साथ बातचीत में सोमवार 21 अप्रैल को अपनी पिछली कुछ बातें दुहरायीं और राष्ट्रपति बराक ओबामा की सरकार से आग्रह किया कि उड़न तश्तरियों और इतरलोकीय प्राणियों के बारे में अब तक की जानकारियों को सार्वजनिक किया जाये.
जुलाई 2008 वाले रेडियो इंटरव्यू में मिचेल ने कहा था कि "यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं इस तथ्य को जानता हूँ कि इतरलोकीय प्राणी हमारे ग्रह पर आते रहे हैं और UFO (उड़न तश्तिरियों) के आने जैसी बातें सच हैं. हमारी सरकारें पिछले कोई 60 वर्षों से इस पर पर्दा डालती रही हैं. लेकिन, धीरे-धीरे यह जानकारी बाहर आ रही है और हम में से कुछ का सौभाग्य रहा है कि हमें इस बारे में बताया गया है. मैं ऐसे सैनिक और गुप्तचर दायरों में रहा हूं, जो जानते हैं कि सार्वजनिक जानकारी वाली सतह के नीचे, हां, इस तरह के यात्री यहां आये हैं
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एडगर मिचेल न्यू मेक्सिको में रॉसवेल नाम के जिस स्थान पर पले-बढ़े हैं, वहां के लोगों का विश्वास है कि 1947 में वहां एक रहस्यमय उड़न वस्तु अपने यात्रियों के साथ ज़मीन से टकरा कर ध्वस्त हो गयी थी. लोग यह भी मानते हैं कि अमेरिकी सेना ने इस घटना पर पर्दा डालने और प्रत्यक्षदर्शियों के मुंह बंद कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मिचेल के अनुसार रॉसवेल का निवासी होने के नाते उन्हें इस घटना का अब अच्छी तरह पता चल गया है. स्थानीय लोगों ने तथा "गोपनीयता की शपथ के बावजूद" सेना और गुपतचर सेवाओं के लोगों ने उन्हें इतना कुछ बताया है कि वे इस घटना पर पड़ा पर्दा उठाने में लग गये हैं.
सीएनएन को एडगर मिचेल ने यह भी बताया कि वे एकमात्र ऐसे अंतरिक्षयात्री हैं, जिसने दस साल पहले भी अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागॉन को अपनी बात सुनाने का प्रयास किया था. वहां उन्होंने एक एडमिरल से बात की थी, जिसने रॉसवेल वाली घटना की "पुष्टि" की थी. लेकिन, बाद में उस एडमिरल ने जब और जानकारियां पाने की कोशिश की, तो उसे ऐसा करने से रोक दिया गया. मिचेल ने शिकायत की अब यह एडमिरल भी सारे मामले को ही झुठला रहा है.
अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा ने पिछले वर्ष भी और इस बार भी कहा कि उसे न तो उड़न तश्तरियों से कोई मतलब है और न ही वह तोपने-ढांपने की किसी गतिविधि से जुड़ा हुआ है.
1947 में रॉसवेल में ज़मीन से टकरा कर नष्ट हो गयी अज्ञात उड़न वस्तु के बारे में कहा जाता है कि उसके मलबे के बीच से छोटे कद के मनुष्य जैसे एक इतरलोकीय प्राणी का शरीर भी मिला था. उसकी चीरफाड़ कर उसकी शारीरिक बनावट को जानने का प्रयास भी हुआ था. लेकिन आधिकारिक तौर बाद में इस सब का खंडन किया जाने लगा.
अमेरिकी सरकार तो नहीं, लेकिन ब्रिटिश सरकार के बारे में सुनने में आया है कि वह उड़न तश्तरियों संबंधी अवलोकनों और प्रत्यक्षदर्शी बयानों वाली कोई 200 चुनी हुई फ़ाइलें इस वर्ष सार्वजनिक करेगी. यह भी सुनने में आया है कि ब्रिटेन से जुड़े इस तरह के 90 प्रतिशत मामले रफ़ादफ़ा किये जा सकते हैं. शेष 10 प्रतिशत को आसानी से रफ़ादफ़ा नहीं किया जा सकता.
पृथ्वी पर उड़न तश्तरियां और इतरलोकीय प्राणी तभी आ सकते हैं, जब पृथ्वी के अलवा भी कहीं बुद्धिमान प्राणधारियों का अस्तित्व हो. अभी तक तो भू और अंतरिक्ष आधारित
हमारे सारे दूरदर्शियों को ऐसे किसी अस्तित्व का रत्ती भर भी कोई संकेत नहीं मिला है.
अमेरिका ने गत 6 मार्च को केपलर नाम का एक ऐसा नया दूरदर्शी अंतिरक्ष में भेजा है. वह पृथ्वी से 600 से 3000 प्रकाश वर्ष दूर के दो तारकमंडलों में एक लाख तारों की छानबीन करते हुए यह जानने की कोशिश करेगा कि क्या उन में से किसी के पास ऐसे ग्रह भी हैं, जहां जीवन संभव है. वैज्ञानिक सौरमंडल के बाहर अब तक जिन 300 ग्रहों का पता लगा पाये हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं प्रतीत होता, जहां पृथ्वी जैसा जीवन संभव हो.
  जर्मनी में म्युनिक विश्वविद्यालय में खगोल भौतिकी के प्रोफ़ेसर डॉ. हाराल्ड लेश का कहना है, "मुझे पूरा विश्वास है कि अंतरिक्ष में बहुत सारे ग्रहों पर किसी-न-किसी प्रकार का जीवन है. लेकिन, हम धरती वाले अपने साधनों से जब तक उनका पता लगा पायेंगे, तब तक शायद 15 वर्ष और लग जायेंगे. तब भी हम शायद एक-आध छोटी-छोटी कोषिकाएं ही इधर-उधर घूमते देखेंगे."
जब पृथ्वी के निकटतम बाह्यग्रहों की दूरियां भी सैकड़ों-हज़ारों प्रकाश वर्ष हों, तब गंभीर क़िस्म के वैज्ञानिकों के लिए यह मानना कठिन हो जाता है कि क्या कहीं ऐसे बुद्धिमान प्राणी भी हो सकते हैं, जो प्रकाश की गति से यात्रा कर सकते हैं और हज़ारों-लाखों प्रकाश वर्ष की दूरियां एक ही जीवनकाल में पूरी कर पृथ्वी पर पहुंच सकते हैं?
sabhar : dw.de"
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हर तरह के कैंसर के लिए एक टीका

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वैज्ञानिकों ने हर तरह के कैंसर के लिए एक टीका तैयार करने का दावा किया है. यह शरीर को ऐसे तैयार करेगा कि वह कैंसर को खुद पहचाने लगेगा और उसे खत्म करने लगेगा. हर तरह के कैंसर में एक खास समानता के कारण ही यह रास्ता निकला.
इस्राएल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी और दवा कंपनी वैक्सिल बायोथेरापुटिक्स के मुताबिक कैंसर के 90 फीसदी मामलों में हमेशा एक अणु देखा जाता है. इसी अणु की मदद से कैंसर की पहचान की जाएगी. उम्मीद है कि जल्द ही एक यूनिवर्सल इंजेक्शन बाजार में लाया जा सकेगा. इसकी मदद से सभी मरीजों का रोग प्रतिरोधी तंत्र इतना मजबूत हो जाएगा कि वह कई तरह के कैंसरों से लड़ता रहेगा.
टीके का फिलहाल परीक्षण चल रहा है. प्रारंभिक परीक्षणों में पता चला है कि यह टीका मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत कर रहा है और बीमारी के स्तर को भी कम कर रहा है. अब वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर परीक्षण करना चाहते हैं. तभी पता चलेगा कि क्या यह टीका वाकई हर तरह के कैंसर से लड़ सकता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर प्रारंभिक चरण में ही किसी छोटे ट्यूमर की पहचान हो जाए, तो यह टीका उसे भी खत्म कर सकता है. नई दवा सर्जरी करा चुके लोगों में दोबारा ट्यूमर या कैंसर के लौटने की संभावना को भी खत्म करती दिख रही है.
शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र कैंसर कोशिकाओं को खतरे की तरह नहीं देखता है. इसलिए कैंसर कोशिकाएं रोग प्रतिरोधी तंत्र से बच निकलती हैं. सामान्यतया रोग प्रतिरोधी तंत्र बाहरी कोशिकाओं के हमलों जैसे बैक्टीरिया आदि से लड़ता है. लेकिन ट्यूमर शरीर के अंदर किसी कोशिका के खराब होने से पनपता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक कैंसर कोशिकाओं में एक अणु बड़ी संख्या में पाया जाता है. इसे एमयूसीआई नाम दिया गया है. इसी की मदद से शरीर के रोग प्रतिरोधी तंत्र को ट्यूमर की पहचान हो सकती है. वैक्सीन में एमयूसीआई अणुओं का ही इस्तेमाल किया गया है, ताकि यह शरीर के अंदर जाकर कैंसर को पहचाने और उसे खत्म करना शुरू कर दें.
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फ्रांस के इस गांव से बनते हैं राष्ट्रपति

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फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति जाक शिराक इस बार के चुनाव में फ्रांसोआ ओलांद को क्यों वोट देंगे अगर यह समझना है तो कोरेज आना होगा. पैरिस से 400 किलोमीटर दूर बसे गांव ने देश को एक राष्ट्रपति दिया है और दूसरे की तैयारी है.
फ्रेंच भाषा में इसे ला फ्रांस प्रोफोंड भी कह सकते हैं यानी भीतरी फ्रांस. छोटे से गांव में थोड़े से लोग हैं और मुट्ठी भर पैसे. लेकिन इसी गांव में कई दशकों तक रह कर जाक शिराक ने अपना करियर बनाया. मौजूदा चुनाव में जिस उम्मीदवार के जीतने की बात कही जा रही है उन्होंने भी एक दो नहीं पूरे तीस साल तक इसी गांव में रह कर अपनी क्षमताओं को धारदार बनाया है
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मौजूदा दक्षिणपंथी राष्ट्रपति निकोला सारकोजी इस हिसाब से फ्रांस की राजनीति में अनोखे हैं क्योंकि उन्होंने अपने करियर का ज्यादा वक्त फ्रांस के गांवों की बजाय पैरिस के आलीशान उपनगर में बिताया है. जाहिर है कि इन प्रांतों में वो ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं. 1995 से 2007 तक फ्रांस के राष्ट्रपति रहे जाक शिराक कोरेज के स्थानीय नागरिक हैं. पिछले साल अपनी रुढ़िवादी टोपी उतार कर उन्होंने एलान किया कि वो अपने उत्तराधिकारी सारकोजी की बजाय ओलांद को वोट देंगे. ऐसा नहीं है कि दोनों दक्षिणपंथी नेताओं का आपसी प्रेम खत्म हो गया हो तो भी 79 साल के शिराक यह नहीं कह सके कि वो सारकोजी को चुनेंगे और कोरेज के ज्यादातर लोग मानते हैं कि वो ओलांद को ही वोट देंगे.
ओलांद 1981 में पहली बार शिराक को चुनौती देने के लिए अपने गृहनगर नॉरमैन्डी से आए थे. उस वक्त उन्हें बाहर से भेजा उम्मीदवार कहा गया जिसके टिकने की उम्मीद नहीं थे. वे हारे जरूर लेकिन डिगे नहीं. 1981 में फ्रांसोआ मितराँ जब फ्रांस के पहले समाजवादी राष्ट्रपति बने तो उनकी पार्टी का कोई सदस्य शिराक के खिलाफ खड़ा होने के तैयार नहीं था. पूर्व प्रधानमंत्री और भविष्य के राष्ट्रपति से टकराने का साहस कम ही लोगों में था. ऐसे वक्त में मितराँ ने इकोल नेशनल एडमिनिशट्रेशन स्कूल के ग्रेजुएट 26 साल के ओलांद को यहां भेजा. तब शिराक ने यह कह कर कि "उनसे ज्यादा तो लोग मितराँ के कुत्ते को जानते हैं," उन्हें खारिज किया था. पूर्व समाजवादी कार्यकर्ता 74 साल के क्लोद मेनो याद करते हैं, "उनके हाथों में बस्ता था और वो हाई स्कूल के छात्र जैसे दिखते थे.
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आखिरकार इस कोरेज का क्या असर है कि यहां से लोग राजनीति की बुलंदी छूते हैं. ऐसी जगह जहां कम्युनिस्ट दक्षिणपंथियों के लिए वोट देते हैं और रूढ़िवादी समाजवादियों के लिए, जहां नेताओं की छवि उनके आदर्शों पर भारी पड़ जाती है. यह इलाका गरीब है लेकिन खुबसूरत और आजाद ख्याल वाला. यहां की जमीन रजवाड़ों या बुर्जुआ समाज की बजाय किसानों के पास है और एक वक्त ऐसा भी था जब पैरिस की सत्ता के गलियारे में यहां के हितों की बात करने वाला कोई नहीं था. स्थानीय पत्रकार अलाँ एल्बिनेट कहते हैं, "कोरेज को अपने अस्तित्व के लिए राजनीति की जरूरत है. हम केवल अपने दम पर नहीं रह सकते. हमें पैरिस में संपर्क की जरूरत पड़ती है जिससे कि सड़कें बन सकें विकास हो."
हालांकि पास के एक छोटे शहर एग्लेटाँस के मेयर और सारकोजी की पार्टी यूएमपी की स्थानीय शाखा के प्रमुख माइकल पाइलासो नहीं मानते कि कोरेज की मिट्टी में ऐसा कुछ है जो राष्ट्रपति उगाती हो. एग्लेटाँस के दफ्तर में शिराक की एक बड़ी तस्वीर नजर आती है लेकिन सारकोजी की नहीं. वो कहते हैं, "दूसरी जगहों के मुकाबले अब यह राजनेताओं की जमीन नहीं रही."
जन्मभूमि चाहे अलग रही हो लेकिन शिराक और ओलांद ने कोरेज में बराबर वक्त गुजारा है. ओलांद की छवि सर्वसम्मति से चलने वाले की है तो शिराक को सामंती मिजाज वाला माना जाता है. राष्ट्रपति बनने से पहले शिराक 1977 से 1995 तक पैरिस के मेयर रहे हैं. दोनों ही पदों पर रहते हुए उनकी छवि ऐसी नीति पर चलने वाले की रही जिसमें कोरेज के लोगों को प्रमुखता दी गई. इस मामले में अब तो उन्हें एक अपराध का दोषी भी करार दिया गया है. उनके मेयर रहने के दौरान पैरिस के सिटी हॉल में कोरेज के 2000 लोग काम करते थे. जानकार बताते हैं कि उनके राष्ट्रपति रहने के दौरान एलिसी पैलेस में खास अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी जो कोरेज से जुड़े मामले देखते थे.
1969 में तब के राष्ट्रपति जॉर्ज पोन्पीदू की सरकार के सबसे युवा सदस्य के रूप में चुने जाने के दो साल बाद शिराक ने कोरेज में सातो दी बिटी नाम का विला खरीदा था. बीमार चल रहे शिराक अब ज्यादा वक्त पैरिस में बिताते हैं लेकिन इस छोटे विला से गुजरने वाली सड़क अब भी अनिवासियों के लिए बंद है. विला के आस पास 300 मीटर के दायरे में कार रोकना अब भी गैरकानूनी है और उपग्रह से ली जाने वाली तस्वीरों में इसे धुंधला कर दिया गया है.
शिराक की केवल अपने घर की चिंता करने वाली छवि से उलट ओलांद समेत सारे समाजवादियों का जोर सर्वसम्मति वाली नीतियां अपनाने पर है. वैसे इतना तो सब जानते हैं कि ओलांद राष्ट्रपति बन गए तो भी कोरेज का बहुत भला नहीं होने वाला. इसलिए नहीं क्योंकि उनके और शिराक के बीच राजनीतिक मतभेद हैं बल्कि इसलिए क्योंकि सरकार के पास पैसा ही नहीं है.

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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

टीवी शो में वीना मलिक ने यूं दिखाए जलवे, देखिए तस्वीरें

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पाकिस्तानी अभिनेत्री वीना मलिक हाल ही में शेखर सुमन के शो 'मूवर्स एंड शेखर्स' में नजर आईं|



इस शो में वीना ने शेखर के सभी सवालों के बेबाकी से जवाब दिए| वीना इस मौके पर काफी ग्लैमरस लुक में नजर आईं|



उन्होंने लाल रंग की ऑफ शोल्डर ड्रेस में शेखर के साथ पोज देकर खूब जलवे दिखाए| देखिए शो पर वीना के अंदाज इन तस्वीरों में: sabhar : bhsakar.com
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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