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मंगलवार, 15 जुलाई 2014

5000 सालों से खुद जल देवता करते आ रहे हैं इस शिवलिंग का अभिषेक

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5000 सालों से खुद जल देवता करते आ रहे हैं इस शिवलिंग का अभिषेक

मोसाद (गुजरात)। भोलेनाथ की आराधाना के पावन महीने सावन की शुरुआत हो चुकी है। इसके साथ ही पूरे राज्य में हर-हर महादेव की गूंज सुनाई देनी शुरू हो गई है। इसी मौके पर आज हम आपको गुजरात के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे बहुत कम ही लोग जानते हैं।

यह मंदिर नर्मदा जिला, देडियापाडा तालुका के कोकम गांव में स्थित है। इस मंदिर को जलेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि यह शिवलिंग 5000 साल पुराना है।
मोसाद शहर से लगभग 14 किमी की दूरी पर स्थित महादेव का यह मंदिर पूर्वा नदी के तट पर है। यह नदी पूर्व दिशा की ओर बहती है, इसीलिए इसे पूर्वा नदी के नाम से पहचाना जाता है। 
5000 सालों से खुद जल देवता करते आ रहे हैं इस शिवलिंग का अभिषेक

यहां महादेव के मंदिर के अलावा हनुमानजी का भी एक मंदिर है। आमतौर पर हनुमानजी का मंदिर दक्षिणमुखी होता है, लेकिन यहां मंदिर पूर्वमुखी है। सूर्योदय के समय सूर्य की किरणों सीधे इस मंदिर में स्थापित हनुमानजी की प्रतिमा पर पड़ती है।
 
हनुमानजी के इसी मंदिर के ठीक पीछे जमीन से 3 फुट नीचे एक शिवलिंग है। इसी शिवलिंग को जलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।  इसके बारे में एक दंतकथा यह भी है कि वनवास के दरमियान पांडवों ने शिव को प्रसन्न करने के लिए इसी शिवलिंग की पूजा की थी।
5000 सालों से खुद जल देवता करते आ रहे हैं इस शिवलिंग का अभिषेक


आमतौर पर शिवलिंग का अभिषेक दूध और जल से भक्त किया करते हैं, लेकिन इस शिवलिंग की विशेषता यह है कि इसका अभिषेक बारहों महीनें और चौबीसों घंटे होता रहता है। शिवलिंग का अभिषेक खुद जलदेवता ही करते हैं। जहां शिवलिंग स्थित है, वहीं एक हाथ गड्ढा खोदने पर ही पानी निकल आता है।
 
यहां सबसे आश्चर्य की बात यह है कि लगातार इतना सारा पानी जमीन से ही आता है और वापस जमीन में ही पहुंच जाता है। पानी की यह धारा अनंत समय से ही फूट रही है। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि शिवलिंग पर पानी न बरसा हो।

sabhar :http://www.bhaskar.com/

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क्या यौन संक्रमण से होता है प्रॉस्टेट कैंसर?

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प्रॉस्टैट कैंसर की कोशिकाएं

वैज्ञानिकों का कहना है कि हो सकता है कि प्रॉस्टेट कैंसर एक यौन संचारित रोग (एसटीडी) हो, जो संभोग के समय संक्रमण की वजह से होता हो.
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसे साबित करने के लिए अभी और प्रमाण की ज़रूरत है.

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इंसानी ब्रिटेन की संस्था कैंसर रिसर्च यूके का कहना है कि हालांकि कुछ कैंसर संक्रमण की वजह से होते हैं. लेकिन इस सूची में प्रॉस्टेट कैंसर को जोड़ना अभी जल्दबाज़ी होगी.
क्लिक करेंप्रॉस्टेट कोशिकाओं का प्रयोगशाला में परीक्षण किया.

यौन संक्रमण

इस दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि ट्रीकोमोनियासिस नाम के एक यौन संक्रमण ने क्लिक करेंकैंसर बढ़ाने में भूमिका निभाई.
"इस अध्ययन में एक संभव तरीके से यह पता चलता है कि परजीवी ट्रिकोमोनस वाजिनालिस प्रॉस्टैट कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को बढ़ावा दे सकता है और इसे तेज़ी से विकसित कर सकता है"
निकोला स्मिथ, कैंसर रिसर्च यूके
प्रोसिडिंग ऑफ़ द नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंस (पीएनएस) नाम की विज्ञान पत्रिका का कहना है कि इसे साबित करने के लिए अभी और शोध किए जाने की ज़रूरत है.
माना जाता है कि दुनियाभर में 27.5 करोड़ लोग ट्रीकोमोनियासिस से संक्रमित हैं. यह विषाणुओं के बिना होने वाला सबसे आम यौन संक्रमण है.
इससे संक्रमित व्यक्ति में इसका कोई लक्षण नहीं दिखाई देता है. इसलिए उसे इसकी जानकारी नहीं होती.
इससे संक्रमित पुरुष पेशाब करने के बाद या संभोग के दौरान स्खलन के बाद लिंग के अंदर जलन और खुजली महसूस करता है या उसके लिंग से सफेद रंग का तरल पदार्थ निकलता है.
वहीं इससे संक्रमित क्लिक करेंमहिलाओं के जननांगों में खुजली या दर्द, पेशाब करते समय बेचैनी या मछली जैसी दुर्गंध वाले पदार्थ का निकल महसूस कर सकती हैं.
ट्रीकोमोनियासिस और प्रॉस्टेट कैंसर के बीच संबंध बताने वाला यह पहला शोध नहीं है. साल 2009 में हुए एक अध्ययन में पाया गया था कि प्रॉस्टेट कैंसर से पीड़ित एक चौथाई पुरुषों में ट्रीकोमोनियासिस के लक्षण पाए गए. इन लोगों में कैंसर का एडवांस ट्यूमर होने की आशंका थी.

प्रॉस्टेट कैंसर का कारण

प्रॉस्टैट कैंसर की कोशिकाएं
पीएनएस के अध्ययन नें बताया गया है कि यौन संबंध बनाने के दौरान हुआ संक्रमण कैसे पुरुषों में प्रॉस्टेटक्लिक करेंकैंसर फैलने का ख़तरा बढ़ा सकता है. हालांकि दोनों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए यह निश्चित प्रमाण नहीं है.
प्रोफ़ेसर पैट्रिका जॉनसन और उनके सहयोगियों ने पाया कि ट्रिकोमोनियासिस पैदा करने वाला परजीवी ( ट्रिकोमोनस वाजिनालिस) प्रोटीन का स्राव करता है, जो जलन पैदा करता है और प्रॉस्टेट कैंसर की कोशिकाओं में वृद्धि करता है.
उनका कहना है कि इसमें और निश्चितता स्थापित करने के लिए और अध्ययन की ज़रूरत है. ख़ासकर इसलिए भी क्योंकि हमें अभी तक यह भी नहीं पता है कि प्रॉस्टेट कैंसर कैसे होता है.
कैंसर रिसर्च यूके की स्वास्थ्य सूचना अधिकारी निकोला स्मिथ ने कहा, ''इस अध्ययन में एक संभव तरीके़ से यह पता चलता है कि परजीवी ट्रिकोमोनस से एक ऐसे तरव पदार्थ का स्त्राव होता है जिससे जलन होती है और जो इस तरह की कोशिकाओं को बढ़ावा दे सकता है जिसका प्रभाव बाद में ज़ाहिर हो.''
वो कहती हैं, ''यह अध्ययन अभी केवल प्रयोगशाला में हुआ है और पहले के प्रमाण प्रॉस्टेट कैंसर और सामान्य यौन संक्रमण में कोई संबंध स्थापित करने में नाकाम रहे.''
निकोला स्मिथ कहती हैं, ''प्रॉस्टेट कैंसर के ख़तरे के बारे में पता लगाने के लिए बहुत अध्ययन हुए हैं और हम इस पहेली को सुलझाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं.''
वो कहती हैं, ''लेकिन जीवनशैली इसका कारण है या नहीं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. ये कहना कठिन है कि क्या इससे संक्रमण बढ़ सकता है और इन दोनों में कोई संबध है.''
वो कहती है कि उम्र बढ़ने के साथ ही प्रॉस्टेट कैंसर का ख़तरा बढ़ता जाता है.

ब्रिटेन के पुरुषों में प्रॉस्टेट कैंसर बहुत आम है. नौ में से एक पुरुष में इसका पाया जाना आम है. यह 70 साल से अधिक आयु के लोगों में बहुत आम है.sabhar :http://www.bbc.co.uk/

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सोमवार, 14 जुलाई 2014

आम ही आम, अब नहीं गुठली का काम

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बिहार के लोगों के लिए एक अच्छी खबर है. अब तक तो यहां के लोग गुठली वाला आम ही खाया करते थे लेकिन अब बगैर गुठली वाले आम का भी मजा लेंगे. बिहार कृषि विश्वविद्यालय ने महाराष्ट्र में विकसित सिन्धु प्रभेद का पौध लगा कर सफल प्रयोग किया है. तीन वर्षे के पौध में पहला फलन लगा आम इसके सफलता का द्योतक है. विश्व में पहली बार कोंकण विद्यापीठ संस्थान, महाराष्ट्र ने बगैर गुठली के आम को विकसित किया है. उस प्रभेद को विश्वविद्यालय के अखिल भारतीय समन्वित फल परियोजना प्रक्षेत्र में लगाया गया है. पौध से इस बार बेहतर फलन प्राप्त हुए हैं. इससे इतना स्पष्ट हो गया है कि अब आने वाले समय में बिहार की धरती पर भी इसका उत्पादन किया जा सकता है. बीएयू के उद्यान विभाग (फल) के विभागाध्यक्ष डॉ. वी.बी. पटेल कहते हैं सघन बागवानी के लिए भी यह उपयुक्त प्रभेद है.इसे आम्रपाली की तरह किचन गार्डन में भी लगाया जा सकता है. तीसरे वर्ष से फलन प्रारंभ हो जाता है. यह जुलाई के मध्य तक पकता है और इसमें गुठली नहीं के बराबर होती है.



फल लाल रंग का, कम रेशायुक्त होता है. प्रत्येक वर्ष फल देने वाला होता है. फल गुच्छे में आते हैं. गुदा गहरे पीले रंग का होता है.




इसका वजन 200 ग्राम के आस पास होता है. यह किस्म रतना और अलफांसो के संकरण से विकसित की गई है






बीएयू के कुलपति डॉ. मेवालाल चौधरी ने बताया कि गुठली रहित आम बिहार के आम उत्पादकों के लिए वरदान होगा. विविद्यालय में इसका फलन इसके सफल प्रयोग का गवाह है.


उत्साहित विश्वविद्यालय सिन्धु प्रभेद के इस पौध को अब किसानों तक उपलब्ध कराने पर विचार कर रहा है. यदि सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले समय में बिहार के किसान विश्वविद्यालय से इसका पौध आसानी से प्राप्त कर सकेंगे और देश का पहला गुठली रहित आम घर-घर के थाली में होगा.आने वाले समय में यदि बेहतर ढंग से बिहार के किसान इसका उत्पादन करें तो इस प्रभेद की मांग विदेशों में बहुत ज्यादा हो सकती है.




अपने इस प्रभेद को लेकर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बिहार की विशेष पहचान बन सकती है.यहां यह बता दें कि विश्व में पहली बार इस प्रकार के नए प्रभेद को महाराष्ट्र में विकसित किया गया है जिसके उत्पादन का सफल प्रयोग बीएयू ने किया है. sabhar :
http://www.samaylive.com/






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पेपर की तरह मोड़ सकेंगे टीवी को?

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मुड़ने वाली स्क्रीन


इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी एलजी ने पेपर जैसे पतले दो नए टीवी स्क्रीन लॉन्च किए हैं जिनमें से एक इतना लचीला है कि उसे तीन सेंटीमीटर की गोलाई में मोड़ा जा सकता है.
क्लिक करेंकंपनी का कहना है कि इसके ज़रिए अब टीवी को नई तरह से इस्तेमाल किया जा सकेगा.
मुड़ने वाली स्क्रीन
इस नए टीवी स्क्रीन का रेज़ोल्यूशन 1,200x810 है जिसकी वजह से इसे मोड़ने के बाद भी तस्वीरें बिगड़ती नहीं.
कंपनी को विश्वास है कि 2017 तक वो इसके ज़रिए 60 इंच का मुड़ने वाला टीवी बनाने में कामयाब होंगे.
पारदर्शी स्क्रीन
स्टफ़ टीवी के संपादक स्टीफ़न ग्रेव्स के मुताबिक, "मुड़ने वाली स्क्रीन एक बेहतरीन तकनीक है जो नए रास्ते खोलती है. ये परंपरागत स्क्रीन से ज्यादा टिकाऊ होगी. इसका मतलब है कि हम हवाई जहाज़ जैसी जगहों पर बड़ी और बेहतर स्क्रीन की उम्मीद कर सकते हैं."

कंपनी ने इस साल की शुरूआत में अपने पहले 'लचीले टीवी' की घोषणा एक इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड शो में की थी.

sabhar :

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लड़कियों ने दिखाए योग के कमाल, तस्वीरों में देखिए अलग-अलग आसन

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लड़कियों ने दिखाए योग के कमाल, तस्वीरों में देखिए अलग-अलग आसन

रांची. झारखंड योग एसोसिएशन के द्वारा रांची जिला योग संघ व परमहंस योगानन्द योगाश्रम के संयुक्त तत्वावधान में रांची के अग्रसेन भवन में चल रहे 13वीं झारखंड राज्य योग चैंपियनशिप के दूसरे दिन शनिवार को रांची और केआईवाई जमशेदपुर के प्रतिभागियों का दबदबा रहा। प्रतियोगिता के दूसरे दिन पूर्वी क्षेत्र के पर्यवेक्षक डॉ. आसवित आईच एवं अध्यक्ष प्रवीर कर्मकार ने दीप प्रज्ज्वलित कर प्रतियोगिता का शुभारंभ किया। प्रतियोगिता में शनिवार को 11 से 14 वर्ष की लड़कियों के बीच मुकाबला हुआ। जिसमें इन लड़कियों ने कमाल के आसन दिखाए। इस दौरान अलग- अलग वर्गो में कई प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया।प्रतियोगिता के 11 से 14 वर्ष बालिका में कोमल कुमारी (रांची), सलोनी कुमारी (रांची), निलांजना कुमारी (रांची), उषा कुमारी (पलामू), 17 से 21 महिला में वंदना कुमारी, सिन्धु महतो, ज्योत्सना (सभी रांची), 21 से 25 वर्ष महिला में इंदु महतो (रांची), कुसुम महतो (धनबाद), 35 वर्ष से ऊपर महिला लक्ष्मी रंजना (रांची), श्रावणी चक्रवर्ती (केआईवाई), 25 से 35 वर्ष महिला प्रियंका भट्टाचार्य (केआईवाई), पिंकी घोष (केआईवाई), अर्चना कुमारी (रांची), 21 से 25 वर्ष पुरुष उज्जवल शर्मा (केआईवाई), सन्नी (पश्चिम सिंहभूम), चंदन कुमार (चाईबासा), 25 से 35 वर्ष पुरुष अजय कुमार (रांची), सुब्रतो जोश (केआईवाई), डॉ. मनीष कुमार (रांची), 11 से 14 वर्ष बालक आयुष (जमशेदपुर), कुमार मानवेन्द्र (रांची), केतन कुमार (रांची), दीपक कुमार (पलामू) ने क्रमश अपने-अपने आयु वर्गों में प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त किए।
लड़कियों ने दिखाए योग के कमाल, तस्वीरों में देखिए अलग-अलग आसन


लड़कियों ने दिखाए योग के कमाल, तस्वीरों में देखिए अलग-अलग आसन

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लड़कियों ने दिखाए योग के कमाल, तस्वीरों में देखिए अलग-अलग आसन

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लड़कियों ने दिखाए योग के कमाल, तस्वीरों में देखिए अलग-अलग आसन

sabhar : bhaskar.com



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शनिवार, 12 जुलाई 2014

बादाम खाने से आपका ‘दिल’ रहेगा स्वस्थ

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बादाम खाने से आपका ‘दिल’ रहेगा स्वस्थ

लंदन : एक अध्ययन के मुताबिक हर दिन मुट्ठीभर बादाम दिल की बीमारियों के खतरे को कम करता है। अध्ययन का दावा है कि बादाम खाने से हृदय की रक्त वाहिकाएं स्वस्थ रहती हैं। ब्रिटेन में एश्टन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि बादाम खाने से रक्त में एंटीऑक्सिडेंट की मात्रा में उल्लेखनीय रूप से बढ़ोत्तरी होती है जिसके कारण रक्तचाप बढ़ता है और रक्त प्रवाह में सुधार होता है।
शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये नए तथ्य उस अवधारणा की पुष्टि करते हैं कि भूमध्यसागरीय क्षेत्र में बादाम से भरपूर भोजन स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है। यह अध्ययन एश्टन यूनिवर्सिटी में बायोमेडिकल साइंसेज में प्रोफेसर और स्कूल ऑफ लाइफ एंड हेल्थ साइंसेज में कार्यकारी डीन प्रोफेसर हेलेन ग्रीफिथ के नेतृत्व में किया गया था।
शोध के दौरान शोधकर्ताओं ने स्वस्थ युवाओं, अधेड़ उम्र के व्यक्तियों और हृदय की बीमारियों से ग्रस्त युवा व्यक्तियों के समूहों के बीच अल्प अवधि के लिए बादामयुक्त भोजन के प्रभाव को लेकर शोध किया था। शोध में उच्च रक्तचाप या अधिक वजन की समस्या से ग्रस्त व्यक्तियों को भी शामिल किया गया था। sabhar :http://zeenews.india.com/

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शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

वैज्ञानिकों ने इन्सानों में ऑन-ऑफ बटन खोजा

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वॉशिंगटन

वैज्ञानिकों ने इन्सान के मस्तिष्क में ऑन-ऑफ स्विच खोजने का दावा किया है। साइंटिस्ट्स का दावा है कि इस बटन से इन्सान को बेहोश किया जा सकता है या बेहोशी से बाहर लाया जा सकता है। 

जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के डॉ. मोहम्मद कुबैसी और उनकी टीम ने एक मरीज पर स्टडी के दौरान पाया कि दिमाग के एक खास हिस्से से निकल रही तरंगें उन्हें बार-बार सुला देती थीं। अगर इन तरंगों को रोका गया तो वह जग गईं लेकिन उन्हें बिल्कुल याद नहीं था कि इस दौरान क्या हुआ। इन्सान का होश में होना या बेहोश होना कैसे काम करता है, यह अभी तक एक रहस्य है। इस वजह से वैज्ञानिकों के बीच नींद एक बहस का मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में, न्यू साइंटिस्ट मैगजीन में छपी यह नई खोज काफी मददगार साबित हो सकती है। sabhar :http://navbharattimes.indiatimes.com/

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