गुरुवार, 21 जनवरी 2021
नमक का स्थान ले सकता है समुद्री शैवाल
0आप अगर आप को नमक का सेवन करना है तो आप उसकी जगह समुद्री शैवाल का इस्तेमाल कर सकते हैं वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री शैवाल के दानों ग्रेनल का इस्तेमाल अधिक नमक खाने से होने वाली परेशानियों को दूर कर सकता है ब्रिटेन के से फील्ड हां लायन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि समुद्री शैवाल के दानों को खाने में मिलाने से अच्छा स्वाद आता है और उसमें नमक की मात्रा कम होती है दूसरी तरफ अधिक नमक के इस्तेमाल से प्रत्येक वर्ष दुनिया में हजारों लोगों के असमय मौत हो जाती है वैज्ञानिकों का दावा है कि ब्रेड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में नमक की जगह इसका इस्तेमाल करने से उच्च रक्तचाप हृदयाघात और मृत्यु के खतरे से बचा जा सकता है शैवाल का नमक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल तो बहुत इसका एकमात्र पहलू है सवाल में बहुत गुण है इसमें समुद्री सेवा में बड़ी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जिससे पेट भरा हुआ महसूस होता है इसलिए मोटापा घटाने में भी सहायक है इसलिए यह मोटापा घटाने में भी सहायक है जिन वैज्ञानिकों ने इस परियोजना पर शोध किया उन्होंने पाया कि सहवाग के दानों में सोडियम का स्तर मात्र तीन 3.5 था जैविक खाद उद्योगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले मन में यह 40% था वैज्ञानिकों का मानना है कि सवाल जो कि लंबे समय से चीन और जापान के भोजन में शामिल है बढ़ती जनसंख्या को नया भोजन स्रोत उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है वैज्ञानिक आर्कटिक में पाए जाने वाले शैवाल के ग्रैनुअल के लिए व्यवसायिक आपूर्तिकर्ता से बातचीत कर रहे हैं और ब्रिटेन के पांच प्रमुख सुपर मार्केट में से दो इसका इस्तेमाल ब्रेड में करने का विचार कर रहे हैं विशेषज्ञों का कहना है कि 11 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को 1 दिन में 6 ग्राम से अधिक नमक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए
170 वर्ष बाद मिली अंधेरे में चमकने वाली मशरूम
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जनवरी 21, 2021 in 170 वर्ष, बाद मिली अंधेरे में चमकने वाली, मशरूम
ब्राजील के वर्षा वनों में वैज्ञानिकों को फिर से वह मशरूम मिल गई है जो 1840 के बाद से नहीं देखी गई थी इस चमकदार मशरूम की खोज सन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस डेस जार्डिन और उनकी टीम द्वारा की गई है या मशरूम अंधेरे में इतनी तेजी से चमकती है कि उसके प्रकाश में अखबार पढ़ा जा सकता है शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इसकी खोज के बाद वे इस बात का पता लगाने में सफल होंगे कि क्यों कुछ फंगस में चमकने की क्षमता होती है वैज्ञानिकों ने इस मशरूम को फिर से नियमों को पाना गार्डनर के नाम से वर्गीकृत किया है न्यू नोट ओपनस गार्डनर को आखरी बार 1840 में ब्रिटिश वनस्पति विज्ञानी जॉर्ज गार्डनर ने तब देखा था जब कुछ बच्चे इस प्रकार चमकदार मशरूम से खेल रहे थे इस मशरूम के हरे प्रकाश का पता लगाने के लिए डॉ डेस जारटिन और उनके सहयोगियों को कई सप्ताह तक अंधेरी रातों में ब्राजील के जंगलों में भटकना पड़ा तथा डिजिटल कैमरों की मदद से वे रात में चमक रहे इस मशरूम की फोटो कैमरे में उतारने में सफल रहे जेलीफिश और जुगनू ऐसे ही कुछ जंतु है जो चमक पैदा करते हैं बैटरी ओं से संगी संगी और मछली से की रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा इस तरह चमक पैदा करते हैं लेकिन खोजे के मसलों को लेकर अभी यह स्पष्ट नहीं है या किस प्रकार अंधेरे में चमक पैदा करता है
वैज्ञानिकों ने विकसित किया इलेक्ट्रॉनिक पौधा, विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत "
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जनवरी 21, 2021 in
लन्दन में ;वैज्ञानिकों ने पौधे के संवहन तंत्र में सर्किट लगाकर एक इलेक्ट्रॉनिक पौधे का निर्माण किया है। इससे विज्ञान के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत हो सकती है।स्वीडन के लिकोंपिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के दल ने पौधों के अंदर लगाए गए तारों, डिजिटल लॉजिक और प्रदर्शनकारी तत्वों को दिखाया गया है, जो आर्गेनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के नए अनुप्रयोगों और वनस्पति विज्ञान में नए उपकरण विकसित करने में मददगार हो सकते हैं।उमीआ प्लांट साइंस सेंटर के निदेशक और प्लांट रिप्रोडक्शन बायलॉजी के प्रोफेसर ओव निल्सन ने कहा, इससे पहले वैज्ञानिकों के पास जीवित पौधे में विभिन्न अणुओं के सकेंद्रण को मापने के लिए कोई अच्छा उपकरण नहीं था, लेकिन इस शोध के बाद हम पौधों का विकास करने वाले उन विभिन्न पदार्थो की मात्रा को प्रभावित करने में सक्षम हैं।शोधकर्ताओं ने कहा, पौधों में रासायनिक मार्गो पर नियंत्रण से प्रकाश संश्लेषण आधारित ईंधन सेल, सेंसर्स (ज्ञानेंद्रियों) और वृद्धि नियामकों के लिए रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही ऐसे उपकरण भी तैयार किए जा सकते हैं, जो पौधों की आंतरिक क्रियाओं को व्यवस्थित कर सकें।उन्होंने कहा, यह सफलता वनस्पति विज्ञान और ऑर्गेनिक साइंस के विविध क्षेत्रों के विलय की ओर पहला कदम है। हमारा उद्देश्य उर्जा की मदद से पर्यावरण और वनस्पति विज्ञान के नए रास्तों को खोजना है। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है sabhar : zeenews
बुधवार, 20 जनवरी 2021
अमेरिकी लोग योग के बाद ध्यान में प्रविष्ट हो रहे है
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जनवरी 20, 2021 in अमेरिकी, के बाद ध्यान, में प्रविष्ट हो रहे है, लोग योग
बाहरी दुनिया शोर गुल से भरी है और भीतर मन की उथल पुथल है. ऐसे में क्या ध्यान शांति दे पाएगा? योग के बाद अब ध्यान अमेरिका को अपनी आगोश में ले रहा शाम के पांच बजते ही 31 साल की जूलिया लायंस अपना काम काज समेटती हैं. न्यू यॉर्क से सटे शहर मैनहटन में रहने वाली जूलिया सीधे ध्यान केंद्र की ओर बढ़ती हैं. वहां वह आधे घंटे गहरे ध्यान में डूबने की कोशिश करेंगी. जूलिया इनवेस्टमेंट बैंकर हैं. अप्रैल 2016 में अचानक उन्होंने ध्यान शुरू किया. ध्यान केंद्र के सोफे में बैठकर वह कहती हैं, "मैं शांति का एक लम्हा चाहती हूं. इस शहर में आप हमेशा भाग रहे होते हैं और यहां कोई भी ऐसा कोना नहीं जहां शांति हो."योग भले ही दुनिया भर में मशहूर हो चुका हो, लेकिन ध्यान अभी भी चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है. पश्चिम में अब तक ध्यान को आध्यात्मिकता की ओर् झुके हुए लोगों से जोड़कर देखा जाता रहा है. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. अमेरिका के कई अस्पतालों में गंभीर बीमारियों के इलाज में ध्यान की मदद ली जा रही है. स्कूलों में टेलिविजन के जरिये ध्यान सिखाया जा रहा है. स्मार्टफोन तक सिमट चुकी जिंदगी का ही नतीजा है कि अमेरिका में अब निर्वाण और ध्यान बड़ा कारोबार बन रहा है.2015 में ग्रीनविच नाम के गांव में लोड्रो रिंजलर ने मेडिटेशन स्टूडियो खोला. अब ब्रुकलिन और मैनहटन में भी उनके दो स्टूडियो हैं. लॉस एजेंलेस, मियामी, वॉशिंगटन और बॉस्टन में भी कई मेडिटेशन स्टूडियो खुल चुके हैं. रिंजलर कहते हैं, "यहां न्यू यॉर्क के समाज के हर तबके के लोग आते हैं. सब एक ही बात कहते हैं कि मुझे बहुत तनाव है. मैं जानना चाहता हूं कि अपने मन को को कैसे एकाग्र करू और भाग दौड़ से भरी जिंदगी"से मुक्ति मिले तनाव और भाग दौड़ से भरी जिंदगी ज्यादातर शहरों में ध्यान के आधे घंटे का सेशन 10 डॉलर का है. स्टूडियो में हल्की रोशनी होती है, खास तरह की सुगंध होती है और ऑर्गेनिक टी भी मिलती है.सिलिकॉन वैली की कई कंपनियां भी अपने कर्मचारियों के लिए ध्यान के कोर्स आयोजित कर रही हैं. हॉलीवुड की पूर्व अभिनेत्री एमिली फ्लेचर ने 2012 में कंपनियों के कर्मचारियों के लिए मेडिटेशन कोर्स शुरू किया. शुरूआत में सिर्फ 150 लोग थे. आज यह संख्या 7,000 से ज्यादा है. ऑनलाइन कोर्स के जरिये वह क्लीवलैंड, ओहायो और फ्लोरिडा जैसे शहरों तक पहुंचना चाहती हैं.जीवा मेडिटेशन की प्रमुख एमिली फ्लेचर कहती हैं, "मैं कंपनियों के सीईओ को ध्यान सिखाती हूं और इससे उन्हें फायदा होता है और वो मुझे अपनी कंपनी तक ले जाते हैं. शुरूआत में कर्मचारी स्वार्थ के कारण ध्यान सत्र में हिस्सा लेते हैं. एमिली के मुताबिक, "वे बेहतर ढंग से बात करना चाहते हैं, अपने बॉस को खुश रखना चाहते हैं, ज्यादा पैसा कमाना चाहते हैं या फिर सेक्स लाइफ बेहतर करना चाहते हैं."लेकिन एमिली उनसे एक ही बात कहती हैं, "अगर आप ध्यान करने लगेंगे तो आप अपने जीवन का आनंद लेने लगेंगे, आपका मस्तिष्क बेहतर ढंग से काम करेगा, आपके शरीर को अच्छा अहसास होगा, आप कम बीमार पड़ेंगे." अमेरिका में अब ध्यान के ऐप्स भी तेजी से फैलने लगे हैं. सबसे लोकप्रिय ऐप्स में से एक है, हेडस्पेस. अब तक इसे 1.1 करोड़ बार डाउनलोड किया जा चुका है. इसके 4,00,000 पेड यूजर्स हैं. साभार dw de
बुद्धि को प्रखर बनाती हैं ये 5 आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां
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जनवरी 20, 2021 in को प्रखर, जड़ी बूटियां, बनाती हैं ये 5 आयुर्वेदिक, बुद्धि
आज के समय ज्यादातर जॉब्स ऐसे हैं, जिनमें शार्प ब्रेन की जरूरत होती है। साथ ही लगातार मेंटल प्रेशर लेते हुए सही तरह से काम कर सकनेवाले इंप्लॉयज ही हर किसी को चाहिए होते हैं। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता है यह जानना कि आखिर हम अपने ब्रेन को लगातार ऐक्टिव कैसे रख सकते हैं। प्रकृति ने हमें बहुत सारी जड़ी-बूटियां और औषधियां दी हैं, जो हमारे शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने का काम करती हैं।
दिमाग को लगातार ऊर्जा देनेवाली इन प्राकृतिक औषधियों को आयुर्वेद में एक खास वर्ग में रखा गया है, इसे आयुर्वेद मेध्या और नॉट्रोपिक ग्रुप कहते हैं। आइए, यहां जानते हैं कि ये जड़ी-बूटियां किस तरह ब्रेन को ऐक्टिव रखने में मदद करती हैं...
ब्राह्मी (बकोपा मोननेरी)
-ब्राह्मी एक एडाप्टोजेनिक जड़ी बूटी है। यह ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर जैसे सेरोटोनिन, डोपामाइन और गाबा को संशोधित करने का काम करती है। साथ ही तंत्रिका तंतुओं के कुशल संचरण में सुधार करती है।
-ब्राह्मी का सेवन करनेवाले लोगों के दिमाग पर तनाव में का बहुत अधिक असर नहीं हो पाता है। क्योंकि ब्राह्मी मस्तिष्क की कोशिकाओं में लचीलापन बढ़ाने का काम करती है। इससे याददाश्त बढ़ती है, सीखने की क्षमता बढ़ती है और ताजगी बनी रहती है।
वाचा (एकोरस कैलमस)
-वाचा में चिंता, भय और अवसाद जैसे लक्षणों को दूर करने के गुण पाए जाते हैं। यह सेंट्रल नर्वस सिस्टम (सीएनएस) पर काम करती है और इससे अवसाद के लक्षणों और कारणों से मुक्ति मिलती है।
-वाचा व्यक्ति के मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में मोनोमाइन स्तरों में परिवर्तन करती है। मानसिक संतुलन बनाए रखनेवाली इलेक्ट्रॉनिक वेव्स को सही बनाए रखने के कार्य में मदद करती है।
जटामांसी (नारदोस्तच्स जटामांसी)
-जटामांसी केंद्रीय मोनोमाइन और निरोधात्मक अमीनो एसिड के स्तर को बढ़ाती है, जिसमें सेरोटोनिन, 5-हाइड्रॉक्सिंडोल एसिटिक एसिड, (जीएबीए) गामा-एमिनो ब्यूटेनिक एसिड और टॉरिन के स्तर में बदलाव शामिल है। ये सभी तत्व निराशा को दिमाग पर हावी होने से रोकते हैं और डिप्रेशन से बचाते हैं।
मंडुकपर्णी (सेंटेला एशियाटिक)
-मंडुकपर्णी मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता में सुधार करती है और न्यूरोट्रांसमीटर्स - डोपामाइन, नॉरपेनेफ्रिन या सेरोटोनिन स्राव को संतुलित करती है। इसके सेवन से न्यूरॉन्स (मस्तिष्क की कोशिकाओं) को पुनर्जीवित होती हैं और मानसिक तनाव को कम करती हैं।शंखपुष्पी (एवलवुलस अलसिनोइड्स)
-शंखपुष्पी तनाव बढ़ानेवाले हॉर्मोन कोर्टिसोल के स्तर को नियंत्रित करती है। इससे तनाव आपके दिमाग पर हावी नहीं हो पाता है। शंखपुष्पी के सेवन से मन को शांत बनाए रखने में सहायता मिलती है। शंखपुष्पी तंत्रिका तंत्र को शांत करती है और अनिद्रा से निपटने में बेहद प्रभावी है।
sabhar :navbharattimes.indiatimes.com
गंजेपन का इलाज
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जनवरी 20, 2021 in
न्यूयॉर्क।अगर आपके सिर के बाल पूरी तरह से झड़ गए हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है। अमेरिका के कुछ रिसर्चर्स ने ऐसी दवा खोजने का दावा किया है जो गंजे लोगों के सिर पर बाल उगाने में मददगार हो सकेगी। अभी इस दवा का यूज कैंसर के इलाज के लिए किया जा रहा है यह दावा अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में किए गए एक एक्सपेरिमेंट के बाद किया गया है। रिसर्चर्स एन्जेला क्रिस्टियानो और सहयोगियों द्वारा किए गए इस एक्सपेरिमेंट में कैंसर के इलाज के काम आ रही रुक्सोलिटाइनिब और टोफासिटाइनिब नामक दवाएं गंजेपन के इलाज में भी यूजफुल पाई गई है। रिसचर्च ने चूहों पर यह सफल एक्सपेरिमेंट किया है। जिन चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया गया, उनके शरीर के सारे बाल गिर चुके थे। रिसर्चर्स का कहना है कि बाल झड़ने की समस्या वाले इन चूहों की स्किन पर इन दवाओं का पांच दिनों तक लेप किया गया और दस दिनों के भीतर ही बालों की जड़ें फूटनें लगीं। लगभग तीन हफ्ते में ही काफी घने बाल आ गए।रिसर्चर्स ने एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी के इलाज के लिए चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया था। मेल पैटर्न बाल्डनैस के लिए ज़िम्मेदार एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी बालों की जड़ों के इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी के कारण पैदा होती है क्या है एलोपेशिया एरिटा (Alopecia Areata) एलोपेशिया गंजेपन की बीमारी है। एलोपेशिया की बीमारी कई तरह की होती है जिनमें से एक टाइप को ‘एलोपेशिया एरिटा’ कहते। एलोपेशिया एरिटा में बाल झड़ने लगते हैं। इससे बाल जड़ों से ही पैचेस के रूप में झड़ने लगते हैं। सिर के अलावा दाढ़ी मूछों के बालों पर भी ये बीमारी अटैक करती है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में से किसी को भी हो सकती है। अधिकांश मामलों में एलोपेशिया एरिटा की बीमारी परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आती है और कम उम्र के पुरुष भी इसका शिकार हो जाते हैं भारतीय आयुर्वेद में भी हैं एलोपेशिया एरिटा का इलाज एलोपेशिया एरिटा की बीमारी को संस्कृत में इंद्रलुप्त भी कहा जाता है। भारतीय आयुर्वेद में इस बीमारी के इलाज के कई नुस्खे मिलते हैं।आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ.बी.एस. राठोर बता रहे हैं एलोपेशिया एरिटा के इलाज के तीन आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में. त्रिफला चूर्ण और भृंगराज की पत्तियों का तेल एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए घर पर ही हेयर ऑइल बनाया जा सकता है। इसके लिए चाहिए त्रिफला चूर्ण 300 ग्राम, भृंगराज की पत्तियों का जूस 300 मिलीग्राम और काला तिल का ऑइल 300 मिलीग्राम ( ये सारी चीज़ें पंसारी या जड़ी बूटी बेचने वालों की दुकान पर मिलेंगी)। इन सारी चीज़ों को आपस में मिला लें और धीमी आंच पर तब तक उबालें, जब तक कि पूरा पानी भाप बनकर उड़ न जाए और सिर्फ गाढ़े हरे रंग का तेल बाकी रहे। इस मिक्सचर को छान लें और एक बोतल में भर कर अंधेरे स्थान पर रखें। रोज रात को इस तेल की मालिश अफैक्टेड एरिया में करें और सुबह शिकाकाई व रीठा पाउडर से धो लें। इससे बालों की ग्रोथ होने की संभावना बढ़ जाती है। ध्यान रहे कि बालों पर केमिकल बेस शैम्पू का इस्तेमाल न करें।कच्ची प्याज का रस ;प्याज सल्फर का एक रिच सोर्स है और सल्फर ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने में काफी मददगार है। ऐसे में एलोपेशिया एरिटा से निजात पाने के लिए प्याज का रस काफी असरदार साबित हुआ है। कई एक्सपेरिमेंट्स में प्याज के रस का यूज़ करने के अच्छे रिज़ल्ट मिले हैं। प्याज का रस न केवल बाल झड़ने से रोकता है बल्कि एलोपेशिया एरिटा की वजह से हुआ गंजापन दूर करने में भी इफैक्टिव है। प्याज का रस और पेस्ट अफैक्टेड एरिया पर सीधे लगाना काफी फायदेमंद है। इसके लिए बस कच्ची प्याज़ लीजिए और उसका रस निकाल लीजिए। इस रस और पेस्ट को सीधे स्कैल्प में लगाएं और चालीस मिनट तक लगा रहने दें। इसके बाद किसी माइल्ड शैम्पू से धो लें। और बेहतर रिजल्ट के लिए प्याज के रस में दो चम्मच शहद और एक चम्मच नारियल का तेल भी मिलाया जा सकता है।. टमाटर की पत्तियों का जूस एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए टमाटर की पत्तियों का जूस भी काफी इफैक्टिव माना गया है। टमाटर की पत्तियों का जूस अफेक्टेड एरिया पर मालिश करने के अलावा इन पत्तियों का तीन चम्मच जूस रोज पीने से भी बाल आने शुरू हो जाते हैं। shabhar : bhaskar.com
मंगलवार, 19 जनवरी 2021
हींग का सेवन पुरूषो की पौरूष छमता बढ़ाते है
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जनवरी 19, 2021 in छमता बढ़ाते है, पुरूषो की पौरूष, हींग का सेवन
"पान चबाइए, सेक्स पावर बढ़ाइए!" ;अगर आप अपनी सेक्स क्षमता में कमी से परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज आपके घर में ही है। सेक्स क्षमता यानी सेक्स पावर बढ़ाने में हींग बहुत ही फायदेमंद है। हींग का इस्तेमाल सदियों से पुरुषों के नपुसंकता की समस्या का समाधान घरेलू नुस्खे के रूप में किया जाता रहा है। हींग कामोत्तेजक के रूप में काम करती है। इसलिए जिन पुरुषों को समय पूर्व स्खलन की समस्या होती है उनके इस समस्या को हींग नैचुरल तरीके से ठीक करने में बहुत मदद करती है।हर्ब दैट हील: नैचुरल रेमिडी फॉर गुड हेल्थ पुस्तक के अनुसार 40 दिनों तक 6 सेंटीग्राम (0.06 ग्राम) हींग का सेवन करने से आप सेक्स ड्राइव को बेहतर बना सकते हैं। मिक्सचर के रूप में लगभग 0.06 ग्राम हींग को घी में फ्राई करें और उसमें शहद और बरगद के पेड़ का लैटेक्स मिलाकर इस मिश्रण को बना लें। नपुसंकता को ठीक करने के लिए सुबह सूर्य निकलने के पहले इस मिश्रण का सेवन खाली पेट 40 दिनों तक करें।इरेक्टाइल डिसफंक्शन और समय पूर्व स्खलन की समस्या को अगर आप नैचुरल तरीके से ठीक करना चाहते हैं तो हींग एक अच्छा विकल्प बन सकता है। एक गिलास गुनगुना गर्म पानी में एक चुटकी हींग का पाउडर मिलाकर सेवन करना फायदेमंद होता है। हींग का इस्तेमाल डायट के रूप में करना सबसे अच्छा तरीका होता है। किसी-किसी को इसका ड्राई रूप में सेवन करना अच्छा नहीं लगता है इसलिए हींग को तड़के के रूप में इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। असल में हींग इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या को बिना किसी साइड इफेक्ट के दूर करने में बहुत सहायता करती है। हींग शरीर के प्रजनन अंग में रक्त संचार को बढ़ाकर काम के उत्तेजना को बढ़ाती है।
कैसी होंगी आने वाली समय की दवाएं
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जनवरी 19, 2021 in कैसी होंगी आने वाली समय की, दवाएं
अगर इस संदेशवाहक आरएनए के साथ बैक्टीरिया या वायरस के प्रोटीन को शरीर में भेजा जाए तो शरीर का प्रतिरोधी तंत्र ऐसे प्रोटीन की पहचान करना सीख जाता है और उसके लिए प्रतिक्रिया देता है. नए तरह के इलाज में किसी कृत्रिम चीज को शरीर में नहीं डाला जाएगा, बल्कि प्राकृतिक रूप से संदेशवाहक आरएनए में कुछ ऐसे अंश मिलाए जा रहे हैं, जिससे उसकी गुणवत्ता बढ़ाई जा सके.रिसर्चर इन बायोमॉलिक्यूल्स की मदद से कैंसर के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता तक हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका मानना है कि इससे कई तरह के संक्रमण वाली बीमारियों के खिलाफ टीके विकसित किए जा सकते हैं. बायोकेमिस्ट्री के विशेषज्ञ फ्लोरियान फॉन डेय मुएलबे बताते हैं, "आरएनए के इस्तेमाल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां हम एक ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिसमें हर बार एक ही तरीके का इस्तेमाल होगा. चाहे कैंसर हो या फिर कोई और बीमारी, टीका बनाने का तरीका हमेशा एक जैसा ही होगा. फर्क सिर्फ इतना होगा कि हम प्रक्रिया को शुरू करने के लिए मैसेंजर आरएनए को जानकारी अलग अलग तरह की देंगे.2014 में इस रिसर्च कॉन्सेप्ट को यूरोपीय संघ ने अपने पहले 'इनोवेशन इंड्यूसमेंट प्राइज' से सम्मानित किया. यह पुरस्कार ऐसी रिसर्चरों को दिया जाता है जो पूरी दुनिया के सामने खड़ी समस्याओं के नए हल खोजने में जुटे हैं. इसकी संभावनाएं अपार हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इसे उत्पाद यानि दवाइयों और टीकों में कैसे बदला जाए. इस पर जर्मन फार्मा कंपनी क्योर वैक के सीईओ, इंगमार होएर कहते हैं, "फिलहाल हम प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों पर टेस्ट कर रहे हैं. शुरुआती नतीजे अच्छे हैं. अगर शोध के नतीजे ऐसे ही रहे, तो इसका मतलब होगा कि हम इस तकनीक पर आधारित पहली दवा को बाजार में उतारने के अपने लक्ष्य के बहुत करीब हैं."भविष्य में ऐसी दवाओं और टीकों पर भी काम शुरू हो सकता है, जिन्हें रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज की जरूरत ना हो. खास कर फेफड़ों के कैंसर के इलाज में यह तरीका मील का पत्थर साबित हो सकता ह
सोमवार, 18 जनवरी 2021
सौंफ में हैं इतने सारे गुण
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जनवरी 18, 2021 in में हैं इतने सारे गुण, सौंफ
;भारत में सदियों से किसी भी रोग को ठीक करने के लिए आयुर्वेद का सहारा लिया जाता रहा है। प्राचीनकाल के वैद्य बड़ी से बड़ी बीमारी को आयुर्वेदिक तरीके से जड़ी-बूटियों से ठीक कर देते थे। आज भी आयुर्वेदिक तरीकों का प्रयोग भारत में किया जाता है। अब तो भारतीय आयुर्वेद पद्धति को विदेशों में भी अपनाया जाने लगा है।हमारे घर में कुछ ऐसी आयुर्वेदिक चीजें उपलब्ध होती हैं, जिनके गुण के बारे में कम ही लोग जानते हैं। इनमें से एक बहुत गुणकारी वस्तु है सौंफ। अक्सर जब आप कहीं खाना खाने बाहर जाते हैं तो वहां आपको सौंफ देखने को मिलती ही है। जब आप खाना खाकर बिल चुकाने जाते हैं तो वहीं पास में सौंफ और मिश्री रखी होती हैपाचन क्रिया ठीक करने में सहायक है सौंफ:दरअसल सौंफ बहुत पहले से ही पाचन क्रिया को ठीक करने में इस्तेमाल की जाती रही है। ठीक इसी तरह सौंफ के अन्य बहुत से फायदें हैं, जिनसे ज्यादातर लोग अनजान हैं। आज हम आपको सौंफ के कुछ ऐसे ही फायदों के बारे में रूबरू करवाने वाले हैं।इसलिए इस्तेमाल की जाती है सौंफ: खाना खाने के बाद हर दिन आधा चम्मच सौंफ खाने से पेट सम्बन्धी सभी बीमारियां दूर हो जाती हैं। आंखों में जलन हो रही हो, आंखें लाल हों या आंखें थकी-थकी लग रही हों तो आप सौंफ के पत्ते के रस और सौंफ के पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।- अगर बहुत ज्यादा खांसी से परेशान हैं तो सौंफ के अर्क को लेकर उसे शहद में मिलाकर लें। खांसी से राहत मिलेगीसौंफ में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। यह शरीर के रक्त से कोलेस्ट्राल को कम करने में मदद करता है। यह हानिकारक एलडीएल की मात्रा को शरीर से कम करके दिल की बीमारियों से रक्षा करता है। हाथ-पांव में जलन होने पर बराबर मात्रा में सौंफ और धनिया लेकर उसे अच्छी तरह कूट लें। अब इसमें मिश्री मिलाकर खाना खाने के बाद 6-7 ग्राम लें। कुछ ही दिनों में समस्या से राहत मिलेगी।सौंफ की तासीर ठंढी होती है, यही वजह है कि यह ठंढाई में भी मिलाई जाती है। यह गर्मी के दिनों में शरीर के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। यह शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी ठंढा रखता है।
रविवार, 17 जनवरी 2021
नपुंसकता कारण सरल इलाज
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जनवरी 17, 2021 in ;नपुंसकता, इलाज, कारण, सरल
;नपुंसकता के मरीज़ लगातार बढ़ रहे है। ज़्यादातर मरीज़ो में तनाव मुख्य वजह है। एक रिसर्च के मुताबिक ज़्यादातर मरीज युवा होते है। इनकी उम्र 25 से 40 के बीच होती है। साथ ही यह ज़रूरी नहीं की बॉडी बिल्डर व्यक्ति इस समस्या से ग्रहसित नहीं होते। यह किसी को भी हो सकती है। यह कहना हैकेजीएमसी के आयुर्वेदिक चिक्त्सिक डॉ सुनित कुमार मिश्र का। उन्होंने बताया कीं नपुंसकता के दो कारण होते हैं। शारीरिक और मानसिक। चिन्ता और तनाव से ज्यादा घिरे रहने से मानसिक रोग होता है।नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण भी होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को यदि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है;नपुंसकता शरीर की कमजोरी के कारण भी होती है। ज्यादा मेहनत करने वाले व्यक्ति को यदि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और नपुंसकता पैदा हो सकती है।नपुंसकता के रोगी को अपने खाने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आहार में पौष्टिक खाद्य पदार्थों घी, दूध, मक्खन के साथ सलाद भी ज़रूर खाना चाहिए। फ़ल और फ़लों के रस के सेवन से शारीरिक क्षमता बढ़ती है। नपुंसकता की चिकित्सा के चलते रोगी को अश्लील वातावरण और फिल्मों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इसका मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इससे बुरे सपने भी आते हैं, जिसमें वीर्यस्खलन होता है। के आयुर्वेदिक चिक्त् डॉ सुनित कुमार मिश्र की माने तो इन नुस्खों से आप घर में अपने आयुर्वेदिक औषधियां बनाकर सरल इलाज कर सकते है।-सफेद प्याज़ का रस 8 मिलीलीटर, अदरक का रस 6 मिलीलीटर और शहद 4 ग्राम, घी 3 ग्राम मिलाकर 6 हफ्ते खाने से नपुंसकता खत्म हो सकती है। sabhar patrika.com
दिमाग का बैकअप लिया जा सकता है अमरता की ओर
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जनवरी 17, 2021 in का बैकअप, दिमाग, लिया जा सकता है अमरता. की ओर
इंसान सदियों से गुफ़ाओं की दीवारों पर चित्र उकेरकर अपनी यादों को विस्मृत होने से बचाने की कोशिश कर रहा है.पिछले काफ़ी समय से मौखिक इतिहास, डायरी, पत्र, आत्मकथा, फ़ोटोग्राफ़ी, फ़िल्म और कविता इस कोशिश में इंसान के हथियार रहे हैं.आज हम अपनी यादें बचाए रखने के लिए इंटरनेट के पेचीदा सर्वर पर - फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, जीमेल चैट, यू-ट्यूब पर भी भरोसा कर रहे हैं.ये इंसान की अमर बने रहने की चाह ही हो सकती है कि इटर्नी डॉट मी नाम की वेबसाइट तो मौत के बाद लोगों की यादों को सहेज कर ऑनलाइन रखने की पेशकश करती है.लेकिन आपको किस तरह से याद किया जाना चाहिए?
अब तो ये भी संभव है कि हमारी आने वाली पुश्तों के लिए हमारे दिमाग को संरक्षित करके रखा जा सके.मतलब ये कि यदि आपके ब्रेन को हार्ड ड्राइव पर सेव करना संभव हो, तो क्या आप ऐसा करना चाहेंगे दादी ने सहेजना बंद किया अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले, मेरी दादी ने एक फ़ैसला किया. उन्होंने 1950 के दशक से परिवार के सदस्यों के फ़ोटो, दादा को लिखे प्रेम पत्र और कई और चीज़ों को संभालकर रखा था.पर मृत्यु से कुछ महीने पहले, इन यादों को सहेजने की बजाय उन्होंने इन्हें साझा करना शुरु कर दिया. मैं जब उन्हें मिलकर आती तो मेरी कार में उनकी भीगी और पुरानी किताबें, शीशे के खाली जार, धुँधलाते पुराने फ़ोटोग्राफ्स भरे होते थे.अपने अनुभवों से भरे पत्र उन्होंने अपने बच्चों, पोते-पोतियों और मित्रों को भेज दिए. जिस रात उन्होेंने अंतिम सांस ली, उससे पहले की दोपहर को उन्होंने अपने स्वर्गीय पति के एक घनिष्ठ मित्र को डाक से एक पत्र और कुछ फ़ोटो भेजे और लिखा - “ये फ़ोटो आपके पास अवश्य होने चाहिए.” यह एक मांग थी, पर एक आग्रह भी था.आज हम अपनी यादों का संग्रहण और रक्षण पहले के मुक़ाबले कहीं ज्यादा व्यापक रूप से करते हैं.
क्या यह पर्याप्त है? हम उसे सेव करते हैं जिसे महत्वपूर्ण समझते हैं. लेकिन क्या होगा अगर हम उसे खो दें जो महत्वपूर्ण है? या, क्या होगा जब हमारे शब्दों और चित्रों के ज़रूरी संदर्भ खो जाएँ?आपके दिमाग़ की हू-ब-हू कॉपी क्या सब कुछ सेव करना कितना बेहतर होगा? न सिर्फ कुछ लिखे हुए विचारों को, बल्कि पूरे मस्तिष्क को, हर उस चीज़ को जिसे हम जानते हैं और जो हमें याद है, हमारे प्रेम-प्रसंग और दिलों का टूटना, विजयी और शर्मनाक क्षण, हमारे झूठ और सच.ये सवाल कुछ लोग हमसे जल्द पूछेंगे. ये वो इंजीनियर हैं जो ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो हमारे दिमाग़ और याददाश्त की हू-ब-हू कॉपी बनाकर रख पाएँगे.अगर वो सफल रहे, तो क्या मौत से हमारा संबंध ही हमेशा के लिए बदल जाएगा?सेन फ्रांसिस्को के एरोन सनशाइन की दादी का हाल ही में निधन हुआ. 30 वर्षीय सनशाइन कहते हैं, “मुझे ये बात खटकी कि उनके पीछे उनकी कुछ ही यादें रह गई हैं. उनकी टी-शर्ट, जो मैं कभी-कभी पहनता हूँ, उनकी संपत्ति है पर वो तो किसी भी डॉलर के नोट के समान है...”उनकी मौत ने सनशाइन को इटर्नी डॉट मी वेब सर्विस में साइनअप करने के लिए प्रेरित किया.
इस वेब सर्विस का दावा है कि ये आपकी याद को मृत्यु के बाद ऑनलाइन कायम रखेगी.जब तक आप ज़िंदा हैं तब तक आप इसे अपने फ़ेसबुक, ट्विटर और ईमेल तक पहुँचने की इजाज़त देते हैं, फ़ोटो अपलोड करते हैं और यहाँ तक कि गूगल ग्लास से उन चीजों की रिकॉर्डिंग भी दे सकते हैं जिन्हें आपने देखा है.
वो इस तरह आपके बारे में डेटा का संग्रह करते हैं, उसको फिल्टर करते हैं और फिर उस अवतार को ट्रांस्फ़र कर देते हैं जो आपके चेहरे के लुक और आपके व्यक्तित्व की नकल करता है.आपका अवतारजीते जी आप अवतार से जितनी ज़्यादा बात करते हैं, वह आपके बारे में उतना ही ज़्यादा जान पाता है. समय बीतने के साथ वह आपकी पर्सनेलिटी को अपना लेता है.इटर्नी डॉट मी के सह संस्थापकों में से एक मारियस उर्साच का कहना है, “उद्देश्य एक ‘इंटरएक्टिव लेगेसी’ तैयार करने और भविष्य में पूरी तरह भुला दिए जाने से बचना है. आपकी नाती-पोते के भी नाती-पोते आपके बारे में जानने के लिए किसी सर्च इंजन या टाइमलाइन का प्रयोग करने के बजाय इसका प्रयोग करेंगे."इटर्नी डॉट मी और इसी तरह की अन्य सेवाएं समय बीतने के साथ-साथ खो जाने वाली यादों को सहेजने का तरीका इजाद कर रहे हैं.गूगल, यूएस, ईयू, ऑक्सफ़ोर्ड...हमें डिजिटल फॉर्म में क्या रखना है और क्या छोड़ना है, इसके चुनाव में सिर खपाने से क्या ये बेहतर न हो कि मस्तिष्क की विषय वस्तु को ही पूरी तरह रिकॉर्ड कर लिया जाए?यह काम न तो विज्ञान की काल्पनिक कथा की परिधि में आता है और न ही यह अति महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक कार्य है.सैद्धान्तिक रूप से, इस प्रक्रिया की सफलता के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें जरूरी हैं.वैज्ञानिकों को सबसे पहले यह पता लगाना पड़ेगा कि मरने के बाद किसी के मस्तिष्क को बचाकर रखा जाए कि वह नष्ट न हो.दूसरा, इस मस्तिष्क में मौजूद विवरणों का विश्लेषण और उसकी रिकॉर्डिंग ज़रूरी होंगे.और अंततः इस तरह इंसानी दिमाग़ के अंदर की बातों को “कैप्चर” करने के बाद सिम्यूलेशन से इसी तरह के दिमाग़ का निर्माण.इसके लिए ज़रूरी है कि पहले एक कृतिम मानव दिमाग़ बनाया जाए. जिसमें याददाश्त के बैकअप को 'रन' किया जा सके.
यूएस ब्रेन प्रौजेक्ट, ईयू ब्रेन प्रौजेक्ट लाखों न्यूरॉन्स से दिमाग़ में होने वाली हरकतों को रिकॉर्ड कर इसके मॉडल तैयार कर रहे हैं.ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इन्स्टीच्यूट से जुड़े एंडर्स सैंडबर्ग के 2008 में लिखे शोध पत्र ने इन प्रयासों को सीढ़ी बताया है.उन्होंने कहा कि यह इंसानी मस्तिष्कका पूर्ण तरीके से अनुकरण करने की दिशा में महत्वपूर्ण है.गूगल ने ब्रेन एम्यूलेशन के क्षेत्र में ख़ासा पूँजी निवेश किया है और रे कुर्ज़वेल को गूगल ब्रेन प्रौजेक्ट का निदेशक बनाया है.वर्ष 2011 में एक रूसी उद्यमी दिमित्री इत्स्कोव ने "2045 इनिशिएटिव" शुरु किया.ये नाम रे कुर्जवेल की इस भविष्यवाणी पर आधारित था कि वर्ष 2045 में हम अपने दिमाग़ का क्लाउड तकनीक पर बैक-अप बना पाएंगे मेमोरी डंप इंसानी दिमाग़ की नकल करना एक बात है और याददाश्त का डिजिटल रिकॉर्ड बनाना दूसरी बात.यह साधारण सी प्रक्रिया उपयोगी होगी कि नहीं इस बारे में सैंडबर्ग थोड़े आशंकित हैं.
सैंडबर्ग कहते हैं, "यादें कम्यूटर में सफ़ाई से उन फाइलों की तरह स्टोर नहीं की जातीं, जिनको हम एक इंडेक्स के माध्यम से खोज सकें.एक समस्या यह भी है कि किसी व्यक्ति के दिमाग़ से उसकी याददाश्त को निकालने की प्रक्रिया को, दिमाग़ को क्षति पहुंचाए बिना कैसे अंजा सैंडबर्ग का कहना है कि दिमाग़ को क्षति पहुंचाएं बिना इसको स्कैन कर पाएँगे, इस बारे में शक़ है.पर वे इस बात से सहमत हैं कि अगर हम सिम्यूलेटिड दिमाग़ को पूरी तरह से 'रन' कर पाते हैं तो किसी व्यक्ति विशेष की यादों का डिज इसके नैतिक और नीतिगत मुद्दों पर भी ग़ौर करना पड़ेगा. जैसे वॉलाटियर्स का चुनाव, विशेषकर तब जब स्कैनिंग से शरीर को क्षति पहुँच सकती हो. नए तरह के अधिकारों की भी बात उठेगी."थिंकस्टॉक इम किसी व्यक्ति की निजता की सीमाएँ क्या हैं और उसकी विशेष यादों के स्वामित्व का मामला भी जटिल है.अपने आत्मलेख में आप अपनी किन यादों को रिकॉर्ड करना चाहते हैं इसका चुनाव आप कर सकते हैं.
अगर आपकी किन यादों तक कोई पहुँच सकता है, यह तय करने की आप में क्षमता ही नहीं है तो यह एक बहुत ही अलग तरह का मामला बन जाता है.
और फिर यह सवाल कि क्या किसी 'एम्यूलेटिड दिमाग़' को हम इंसान मान सकते हैअसमंजस कायम मैं सनशाइन से पूछता हूं कि वह क्यों अपने जीवन को इस तरह रिकॉर्ड कराना चाहते हैं"थिंकस्टॉक इमेज" वह कहते हैं, "सच पूछो तो मुझे पता नहीं है. मेरी जिंदगी के जो यादगार लम्हे हैं वो हैं दावतें, संभोग, दोस्ती का आनंद. और इनमें सब इतने क्षणिक हैं कि इनको किसी सार्थक तरीके से संरक्षित नहीं किया जा सकता सनशाइन कहते हैं, "मेरा एक मन चाहता है मेरे लिए कोई स्मारक हो और दूसरा कहता है पूरी तरह से बिना कोई निशान छोड़े गायमुझे लगता है कि हम सब इसी तरह से सोचते हैं.
शायद हम सभी यही चाहते हैं कि हमारे बारे में वो याद रखा जाए जो याद रखने लायक है. बाक़ी को छोड़ देना ही बेहतर
साभार :बीबीसी डाट काम
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