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नई दिल्ली: अगर आप अपनी सेक्स क्षमता में कमी से परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज आपके घर में ही है। सेक्स क्षमता यानी सेक्स पावर बढ़ाने में हींग बहुत ही फायदेमंद है। हींग का इस्तेमाल सदियों से पुरुषों के नपुसंकता की समस्या का समाधान घरेलू नुस्खे के रूप में किया जाता रहा है। हींग कामोत्तेजक के रूप में काम करती है। इसलिए जिन पुरुषों को समय पूर्व स्खलन की समस्या होती है उनके इस समस्या को हींग नैचुरल तरीके से ठीक करने में बहुत मदद करती है।
हर्ब दैट हील: नैचुरल रेमिडी फॉर गुड हेल्थ पुस्तक के अनुसार 40 दिनों तक 6 सेंटीग्राम (0.06 ग्राम) हींग का सेवन करने से आप सेक्स ड्राइव को बेहतर बना सकते हैं। मिक्सचर के रूप में लगभग 0.06 ग्राम हींग को घी में फ्राई करें और उसमें शहद और बरगद के पेड़ का लैटेक्स मिलाकर इस मिश्रण को बना लें। नपुसंकता को ठीक करने के लिए सुबह सूर्य निकलने के पहले इस मिश्रण का सेवन खाली पेट 40 दिनों तक करें।
इरेक्टाइल डिसफंक्शन और समय पूर्व स्खलन की समस्या को अगर आप नैचुरल तरीके से ठीक करना चाहते हैं तो हींग एक अच्छा विकल्प बन सकता है। एक गिलास गुनगुना गर्म पानी में एक चुटकी हींग का पाउडर मिलाकर सेवन करना फायदेमंद होता है। हींग का इस्तेमाल डायट के रूप में करना सबसे अच्छा तरीका होता है। किसी-किसी को इसका ड्राई रूप में सेवन करना अच्छा नहीं लगता है इसलिए हींग को तड़के के रूप में इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। असल में हींग इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या को बिना किसी साइड इफेक्ट के दूर करने में बहुत सहायता करती है। हींग शरीर के प्रजनन अंग में रक्त संचार को बढ़ाकर काम के उत्तेजना को बढ़ाती है।
लंदन : वैज्ञानिकों ने एक अनूठा सोनिक ट्रैक्टर बीम विकसित किया है जो ध्वनि तरंगों का उपयोग कर वस्तुओं को उठाने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सक्षम होगा। इस खोज में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है।
यह ट्रैक्टर बीम एक ध्वनिक होलोग्राम उत्पन्न करने के लिए उच्च क्षमता के ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करता है जो छोटी वस्तुओं को उठाने और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सक्षम होता है।
ट्रैक्टर बीम ऐसा उपकरण है जो शारीरिक संपर्क के बगैर किसी भी वस्तु को खींच लेता है। विज्ञान कथा लेखकों की रचनाओं और स्टार ट्रेक जैसे प्रोगामों में सामान को पकड़ने, उठाने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ट्रैक्टर बीम की अवधारणा का उपयोग किया गया है, जिससे वैज्ञानिक और इंजीनियर बहुत हद तक प्रभावित हुए।
अल्ट्राहैप्टिक्स के सहयोग से ब्रिस्टल और ससेक्स विश्वविद्यालयों के अनुसंधानकर्ताओं ने इस तकनीक का विकास किया। आने वाले समय में व्यापक तौर पर इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। इस अध्ययन का प्रकाशन नेचर कम्युनिकेशन्स नामक जर्नल में हुआ है।
क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे? कार टेकनोलॉजी से जुड़े ताज़ा शोध इस पूरे उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहे हैं और ये बिलकुल संभव है कि आप आने वाले समय में 3डी प्रिंटर पर बनी कार ही चलाएँ.
अमरीकी ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने 3डी प्रिंटर पर न केवल स्पोर्ट्स कार बनाई बल्कि 2015 के डीट्रॉयट ऑटो शो में इसे प्रदर्शित भी किया है.
पहली नजर में तैयार की गई शेलबी कोबरा कार आम स्पोर्ट्स कार जैसी ही लगती है, चाहे ये प्लास्टिक से बनी है. हालांकि ये स्टील से भी बनाई जा सकती है.
इसमें कहीं भी स्टील के पैनल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. ये कार 85 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलाई जा सकती है.
थ्री-डायमेंशनल तरीके से कार प्रिंटिंग?
थ्री डायमेंशनल प्रिटिंग वो नई तकनीक है जिसके इस्तेमाल में पहले कंप्यूटर में डिज़ाइन बनाया जाता है.
फिर उक्त कमांड के ज़रिए 3डी प्रिंटर, या ये कहें कि इंडस्ट्रियल रोबोट उस डिज़ाइन को, सही पदार्थ (मेटीरियल) का इस्तेमाल करते हुए परत दर परत प्रिंट करता है या बनाता है.
इस प्रयोग में पिघले हुए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए उसे मनचाहा आकार दिया जाता है. ऐसा मेटल से भी किया जा सकता है.
इस तकनीक को अंजाम देने वाले उपकरण को थ्री-डी प्रिंटर या फिर इंडस्ट्रियल रोबोट कहा जाता है.
छह सप्ताह में कार तैयार
इस लैब के डॉक्टर चैड ड्यूटी ने बीबीसी फ्यूचर को बताया, "हमने इसे प्लास्टिक की परतों से बनाया है. 24 घंटे में प्लास्टिक से बॉडी को प्रिंट किया (बनाया) जा सकता है."
Image copyrightBBC FUTURE
वो बताते हैं, "बाद में इसमें इंजन और उपरी बाडी, लाइट, ब्रेक, गियर, और अन्य चीजों को असेंबल किया जाता है. कुल 6 सप्ताह में 6 लोग ऐसी कार तैयार कर लेते हैं. ख़ास बात यह है कि इसको बाद में डि-असेंबल कर पूरी तरह से अलग किया जा सकता है."
दरअसल प्लास्टिक की परत दर परत प्रिंट करके कार तैयार करने का मतलब केवल ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि कार के अलग अलग हिस्सों को थ्री-डायमेंशनल प्रिटिंग के जरिए पहले प्रिंट करना और फिर उन्हें असेंबल करना है.
ज़ाहिर है ये कार फ़िलहाल बिक्री के लिए नहीं बनी है. इसे प्रयोग के दौरान तैयार किया गया है. लेकिन इसने दूसरे कार निर्माताओं को ऐसी कार तैयार करने का विकल्प तो दे ही दिया है.
बेहद सस्ती होगी कार
अमरीकी कार निर्माता लोकल मोटर ने प्रिंट करके कार को तैयार किया है जिसे डीट्रॉयट ऑटो शो में प्रदर्शित किया गया.
Image copyrightBBC FUTURE
लोकल मोटर्स के जे रोजर्स कहते हैं, "इस कार को बनाना आसान है और ये काफी कम खर्चे में बनाई जा सकती है. इसके रख रखाव का खर्च भी बेहद कम हो जाता है. मेरे ख्याल से यही भविष्य की कार होगी."
ऐसे में जाहिर है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री एक नए युग के लिए तैयारी करती दिख रही है.
जापान की कार निर्माता कंपनी टोयोटा की योजना हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली कार का निर्माण बढ़ाना है. इसलिए अब टोयोटा इससे जुड़े अपने हज़ारों पेटेंट्स को दूसरी कार निर्माता कंपनियों के साथ साझा करने जा रही है.
टोयोटा ने इसी साल जापान के अलावा अपनी मिराई कार का निर्यात ब्रिटेन, अमरीका, जर्मनी और डेनमार्क को किया है. यह कार हाइड्रोजन से चलती है.
टोयोटा की इस कार की क़ीमत ब्रिटेन में 66 हज़ार पाउंड यानी लगभग 66 लाख रूपए है. अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में इस कार पर 25 फ़ीसदी सब्सिडी है जबकि जापान में 40 फ़ीसदी से ज़्यादा सब्सिडी दी जा रही है.
ब्रिटेन में इस पर कोई सब्सिडी नहीं है. कंपनी को उम्मीद है कि पेटेंट साझा करने से दूसरी कंपनियां भी हाइड्रोजन ईंधन की सस्ती कार बनाएगी.
Image copyrightToyota Motor Sales
टोयोटा के एक अधिकारी स्कॉट ब्राउनली का कहना है, "हमने अपनी कार को काफ़ी सुरक्षित बनाया है. हाइड्रोजन ज्वलनशील होती है इसलिए हमने आग से बचाव की व्यवस्था की है. इसके अलावा इस कार के ईंधन की टंकी पर 150 टन का दबाव भी है और उस लिहाज़ से भी हमारी कार सुरक्षित है."
इस कार के लिए हौन्डा कंपनी के हाइड्रोनन स्टेशन तैयार किए हैं, जहां हाइड्रोजन गैस का निर्माण होता है और उसे एकत्र किया जाता है.
नई दिल्ली. सोशल नैटवर्किंग साइट फेसबुक अपने यूजर्रस के लिए एक नया फीचर लांच करने वाली है इस फीचर की मदद से यूजर ई-कॉमर्स साइट की तरह फेसबुक को यूज कर सकेंगे. फिलहाल फेसबुक इस फीचर पर काम कर रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक 'लोकल मार्किट' नाम से एक फीचर पर काम कर रहा है. टेस्टिंग पर चल रह ये फेसबुक का नया फीचर सामान खरीदने वाला प्लेटफार्म बन जाएगा. न्यूज के मुताबिक, फेसबुक के कई यूजर ने यह जानकारी दी है कि उनके आईफोन के फेसबुक एप्प में मेसेंजर बटन की जगह पर बेहद कम समय के लिए नया फचर दिखाई दिया.
फेसबुक के इस फीचर की मदद से यूजर जिस सामान को बेचना चाहते है वो इस प्लेटफार्म पर पोस्ट कर सकेंगे. 'लोकल मार्किट' नाम के इस फीचर में सामान बेचने के साथ-साथ खरीदने का भी ऑप्शन है. OLX और क्विकर जैसे फेसबुक के इस फीचर में सामान की कीमत और फोटो भी दिखाई देगी sabhar :http://palpalindia.com/
स्वामी ओमानंद तीर्थ के अनुसार छठी इंद्रिय या अतींद्रीय ज्ञान की शक्ति जगाने के लिए योग में अनेक उपाय बताए गए हैं। इसे परामनोविज्ञान का विषय भी माना जाता है। असल में यह संवेदी बोध का मामला योगीजनों का मानना है कि इस का केंद्र ब्रह्मरंध्र है। जो दोनों आंखो के बीच भ्रूमध्य स्थान से कुछ ऊपर कपाल के ठीक बीच में है। मनुष्य के शरीर में जिन सूक्ष्म नाड़ियों का जाल फैला हुआ है उनमें तीन प्रमुख है इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।� सुषुम्ना मध्य में स्थित है और जब नासिका के दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि उसके सक्रिय होने के लिए उपयुक्त स्थिति जाती है।
इस सक्रियता से अतींद्रिय ज्ञान जाग्रत होता है। इन तीन नाड़ियों के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियां होती हैं। प्राणायाम और आसनों से इनकी शुद्धि होती है और शुद्धि के बाद अतींद्रिय ज्ञान जगाने का अभ्यास किया जाता है। अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और स्वच्छ वातावरण, जहां फेफड़ों में ताजी हवा भरी जा सके।स्वच्छ वातावरण में किए गए प्राणायाम का अभ्यास किया जा सकता है। फिर ध्यान का अभ्यास शुरु होता है। भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अंधेरे को देखते रहें और बोध करते रहें कि श्वास अंदर और बाहर हो रही है। मौन ध्यान और साधनासे मन की क्षमता का विकास होता जाता है, जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है।इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झांकने की क्षमता� भी बढ़ती है। यही अतींद्रिय ज्ञान के विकास की शुरुआत है। कोई हमारे पीछे चल रहा है या दरवाजे पर खड़ा है जैसी बातों का आभास होने लगता धैर्य के साथ नियत समय पर, नियत अवधि तक नियमित अभ्यास किया जाए तो इस शक्ति का विकास होने लगता है। इस विकास के साथ अनागत को जानने की क्षमता तो बढ़ती ही है, मन की शांति और स्थिरता भी बढने लगती है। दरअसल इस साधन अभ्यास का यही मुख्य लाभ है
कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.
पूरी तरह रोबोटिक
आइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हाथों से शुरु
जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप. बेहद सटीक
डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने में कामयाबी पाई और इसे एक्सो-स्केलेटन में भी डाल सके.
रूस का रिमोट कंट्रोल
केवल जर्मन ही नहीं, रूसी रिसर्चर भी रिमोट कंट्रोल सिस्टम वाले एक्सो-स्केलेटन बना चुके हैं. डीएफकेआई ब्रेमन के रिसर्चरों को 2013 में रूसी रोबोट को देखने का अवसर मिला. इसके अलावा रूसी साइंटिस्ट भी आइला रोबोट पर अपना हाथ आजमा चुके हैं. बिल्कुल असली से हाथ
दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.
भार ढोएंगे रोबोटिक पैर
डीएफकेआई 2017 से रोबोटिक हाथों के साथ साथ पैरों का एक्सो-स्केलेटन भी पेश करेगा. यह इंसान की लगभग सभी शारीरिक हरकतों की नकल कर सकेगा. अब तक एक्सो-स्केलेटन को पीठ पर लादना पड़ता था, लेकिन भविष्य में रोबोट के पैर पूरा बोझ उठा सकेंगे.
लकवे के मरीजों की मदद
इन एक्सो-स्केलेटनों का इस्तेमाल लकवे के मरीजों की सहायता के लिए हो रहा है. ब्राजील में हुए 2014 फुटबॉल विश्व कप के उद्घाटन समारोह में वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी उपलब्धि को पेश किया था. आगे चलकर इन एक्सो-स्केलेटन में बैटरियां लगी होंगी और इन्हें काफी हल्के पदार्थ से बनाया जाएगा.
अंतरिक्ष में रोबोट
फिलहाल इन एक्सो-स्केलेटन की अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता का परीक्षण त्रिआयामी सिमुलेशन के द्वारा किया जा रहा है. इन्हें लेकर एक महात्वाकांक्षी सपना ये है कि ऐसे रोबोटों को दूर दूर के ग्रहों पर रखा जाए और उनका नियंत्रण धरती के रिमोट से किया जा सके. भविष्य में खतरनाक मिशनों पर अंतरिक्षयात्रियों की जगह रोबोटों को भेजा जा सकता है.
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हाथों से बिल्कुल असली से हाथ
दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.शुरु
जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप.
भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां आज भी तीनों वक्त का खाना गर्म खाया जाता है और जहां रोटी भी ताजा ही बनाई जाती है. मां के हाथ ही रोटी का स्वाद तो सबको पसंद होता है लेकिन आज कल की भाग दौड़ की जिंदगी में उस स्वाद के लिए कई बार लोग तरस जाते हैं. खास कर अगर महिला और पुरुष दोनों ही कामकाजी हों, तो खाना पकाने का वक्त कम ही मिल पाता है.इस समस्या से निपटने के लिए भारत में लोग रसोइये रख लेते हैं. लेकिन जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, उनके पास यह विकल्प भी नहीं है. उन्हीं को ध्यान में रखते हुए यह रोटी बनाने वाला रोबोट तैयार किया गया है. इसे बनाने वाली कंपनी का दावा है कि उनकी मशीन आटा गूंथने से ले कर, पेड़े बनाने, बेलने और रोटी को सेंकने तक का सारा काम खुद ही कुछ मिनटों में कर लेती है. हालांकि इसके दाम को देख कर लगता नहीं है कि बहुत लोग इसे खरीदेंगे. एक रोटी मेकर के लिए एक हजार डॉलर यानि 65 हजार रुपये तक खर्च करने होंगे.
न्यूयॉर्क। अगर आपके सिर के बाल पूरी तरह से झड़ गए हैं तो आपके लिए एक अच्छी खबर है। अमेरिका के कुछ रिसर्चर्स ने ऐसी दवा खोजने का दावा किया है जो गंजे लोगों के सिर पर बाल उगाने में मददगार हो सकेगी। अभी इस दवा का यूज कैंसर के इलाज के लिए किया जा रहा है। यह दावा अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मेडिकल सेंटर में किए गए एक एक्सपेरिमेंट के बाद किया गया है। रिसर्चर्स एन्जेला क्रिस्टियानो और सहयोगियों द्वारा किए गए इस एक्सपेरिमेंट में कैंसर के इलाज के काम आ रही रुक्सोलिटाइनिब और टोफासिटाइनिब नामक दवाएं गंजेपन के इलाज में भी यूजफुल पाई गई है। रिसचर्च ने चूहों पर यह सफल एक्सपेरिमेंट किया है। जिन चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया गया, उनके शरीर के सारे बाल गिर चुके थे। रिसर्चर्स का कहना है कि बाल झड़ने की समस्या वाले इन चूहों की स्किन पर इन दवाओं का पांच दिनों तक लेप किया गया और दस दिनों के भीतर ही बालों की जड़ें फूटनें लगीं। लगभग तीन हफ्ते में ही काफी घने बाल आ गए।
रिसर्चर्स ने एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी के इलाज के लिए चूहों पर यह एक्सपेरिमेंट किया था। मेल पैटर्न बाल्डनैस के लिए ज़िम्मेदार एलोपेशिया एरिटा नामक बीमारी बालों की जड़ों के इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी के कारण पैदा होती है। क्या है एलोपेशिया एरिटा (Alopecia Areata) : एलोपेशिया गंजेपन की बीमारी है। एलोपेशिया की बीमारी कई तरह की होती है जिनमें से एक टाइप को ‘एलोपेशिया एरिटा’ कहते। एलोपेशिया एरिटा में बाल झड़ने लगते हैं। इससे बाल जड़ों से ही पैचेस के रूप में झड़ने लगते हैं। सिर के अलावा दाढ़ी मूछों के बालों पर भी ये बीमारी अटैक करती है। यह पुरुषों और महिलाओं दोनों में से किसी को भी हो सकती है। अधिकांश मामलों में एलोपेशिया एरिटा की बीमारी परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आती है और कम उम्र के पुरुष भी इसका शिकार हो जाते हैं।
भारतीय आयुर्वेद में भी हैं एलोपेशिया एरिटा का इलाज : एलोपेशिया एरिटा की बीमारी को संस्कृत में इंद्रलुप्त भी कहा जाता है। भारतीय आयुर्वेद में इस बीमारी के इलाज के कई नुस्खे मिलते हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ.बी.एस. राठोर बता रहे हैं एलोपेशिया एरिटा के इलाज के तीन आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में
:2. त्रिफला चूर्ण और भृंगराज की पत्तियों का तेल : एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए घर पर ही हेयर ऑइल बनाया जा सकता है। इसके लिए चाहिए त्रिफला चूर्ण 300 ग्राम, भृंगराज की पत्तियों का जूस 300 मिलीग्राम और काला तिल का ऑइल 300 मिलीग्राम ( ये सारी चीज़ें पंसारी या जड़ी बूटी बेचने वालों की दुकान पर मिलेंगी)। इन सारी चीज़ों को आपस में मिला लें और धीमी आंच पर तब तक उबालें, जब तक कि पूरा पानी भाप बनकर उड़ न जाए और सिर्फ गाढ़े हरे रंग का तेल बाकी रहे। इस मिक्सचर को छान लें और एक बोतल में भर कर अंधेरे स्थान पर रखें। रोज रात को इस तेल की मालिश अफैक्टेड एरिया में करें और सुबह शिकाकाई व रीठा पाउडर से धो लें। इससे बालों की ग्रोथ होने की संभावना बढ़ जाती है। ध्यान रहे कि बालों पर केमिकल बेस शैम्पू का इस्तेमाल न करें।
1.कच्ची प्याज का रस : प्याज सल्फर का एक रिच सोर्स है और सल्फर ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने में काफी मददगार है। ऐसे में एलोपेशिया एरिटा से निजात पाने के लिए प्याज का रस काफी असरदार साबित हुआ है। कई एक्सपेरिमेंट्स में प्याज के रस का यूज़ करने के अच्छे रिज़ल्ट मिले हैं। प्याज का रस न केवल बाल झड़ने से रोकता है बल्कि एलोपेशिया एरिटा की वजह से हुआ गंजापन दूर करने में भी इफैक्टिव है। प्याज का रस और पेस्ट अफैक्टेड एरिया पर सीधे लगाना काफी फायदेमंद है। इसके लिए बस कच्ची प्याज़ लीजिए और उसका रस निकाल लीजिए। इस रस और पेस्ट को सीधे स्कैल्प में लगाएं और चालीस मिनट तक लगा रहने दें। इसके बाद किसी माइल्ड शैम्पू से धो लें। और बेहतर रिजल्ट के लिए प्याज के रस में दो चम्मच शहद और एक चम्मच नारियल का तेल भी मिलाया जा सकता है।
3. टमाटर की पत्तियों का जूस : एलोपेशिया एरिटा के इलाज के लिए टमाटर की पत्तियों का जूस भी काफी इफैक्टिव माना गया है। टमाटर की पत्तियों का जूस अफेक्टेड एरिया पर मालिश करने के अलावा इन पत्तियों का तीन चम्मच जूस रोज पीने से भी बाल आने शुरू हो जाते हैं।
क्या आप जानते हैं अपनी उन आदतों के बारे में जो आपके पौरुष को घटा रही हैं? जाने आनजाने आप ऐसे कई काम करते होंगे जो आपके स्पर्म काउंट के लिए घातक हैं। हो सकता है इसमें से कुछ आप अभी भी कर रहे हों। देखिए क्या हैं वह आदतें और संभल जाइए।गर्म पानी से नहाने में शरीर को तो आराम मिलता है लेकिन यह मर्दानगी के लिए घातक है क्योंकि टेस्टिकल्स का तापमान बढ़ जाता है इसलिए यह स्पर्म काउंट भी घटाता है और उनकी गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।बहुत कसे अंतरवस्त्र पहनने से टेस्टिकल्स में गर्मी बढ़ती है और स्पर्म काउंट घटता है। ब्रीफ के बजाए बॉक्सर पहने तो अच्छा है।सोया से बनीं कोई भी चीज आपके लिए सही नहीं है। इसमें ईसोफ्लेवोन्स होते हैं जो स्पर्म की गुणवत्ता भी खराब करते हैं।स्पर्म काउंट सही रखने के लिए यह भी जरूरी है कि नियमित रूप से सेक्स करते रहें। बहुत समय तक ऐसा न करने से स्पर्म अपना आकार बदल लेते हैं और पुराने होने लगते हैं। मोबाइल और लैपटॉप से निकलने वाले रेडिएशन का भी स्पर्म काउंट पर बुरा असर पड़ता है। खास तौर से लैपटॉप को गोद में रख कर काम करने पर। शराब पीने से भी टेस्टॉसटेरॉन की मात्रा कम होती है। इसलिए इससे दूर रहिए तो बेहतर है। ज्यादातर पुरषों के घटते पौरुष का यही कारण होता है।और ऐसा ही कुछ सिगरेट के लिए है। किसी भी तरह का तंबाकू नपुंसकता की तरफ ले जाता है इसलिए यह न सिर्फ स्पर्म काउंट ही नहीं कम करता बल्कि हमेशा के लिए नपुंसक बना dete haiपड़े पड़े टीवी देखते रहते हैं तो इस आदत को छोड़ दीजिए। यह मोटापा बढ़ाता है और मोटापे से स्पर्म काउंट घटता है। शोध कहता है कि जो पुरुष टीवी देखने के बजाए नियमित कसरत करते हैं उनका पौरुष बढ़ता है।सनस्क्रीन लगाने से सूरज और धूप से तो शरीर को बचा लेंगे लेकिन अपनी मर्दानगी को नुकसान पहुंचाएंगे। शोध कहता है कि सनस्क्रीन में सूरज की खतरनाक किरणों से बबचाने वाला जो केमिकल होता है वह आपके हार्मोन के लिए बुरे हैं। पुरुषों में 30 प्रतिशत तक पौरुष घटा देते हैं।तनाव तो वैसे भी सेहत के लिए बुरा है। मानसिक स्थिति के साथ साथ पौरुष नकारात्मक असर डालता है। sabhar : amar ujala .com
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