स्वामी ओमानंद तीर्थ के अनुसार छठी इंद्रिय या अतींद्रीय ज्ञान की शक्ति जगाने के लिए योग में अनेक उपाय बताए गए हैं। इसे परामनोविज्ञान का विषय भी माना जाता है। असल में यह संवेदी बोध का मामला योगीजनों का मानना है कि इस का केंद्र ब्रह्मरंध्र है। जो दोनों आंखो के बीच भ्रूमध्य स्थान से कुछ ऊपर कपाल के ठीक बीच में है। मनुष्य के शरीर में जिन सूक्ष्म नाड़ियों का जाल फैला हुआ है उनमें तीन प्रमुख है इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।� सुषुम्ना मध्य में स्थित है और जब नासिका के दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि उसके सक्रिय होने के लिए उपयुक्त स्थिति जाती है। इस सक्रियता से अतींद्रिय ज्ञान जाग्रत होता है। इन तीन नाड़ियों के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियां होती हैं। प्राणायाम और आसनों से इनकी शुद्धि होती है और शुद्धि के बाद अतींद्रिय ज्ञान जगाने का अभ्यास किया जाता है। अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और स्वच्छ वातावरण, जहां फेफड़ों में ताजी हवा भरी जा सके।स्वच्छ वातावरण में किए गए प्राणायाम का अभ्यास किया जा सकता है। फिर ध्यान का अभ्यास शुरु होता है। भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अंधेरे को देखते रहें और बोध करते रहें कि श्वास अंदर और बाहर हो रही है। मौन ध्यान और साधनासे मन की क्षमता का विकास होता जाता है, जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है।इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झांकने की क्षमता� भी बढ़ती है। यही अतींद्रिय ज्ञान के विकास की शुरुआत है। कोई हमारे पीछे चल रहा है या दरवाजे पर खड़ा है जैसी बातों का आभास होने लगता धैर्य के साथ नियत समय पर, नियत अवधि तक नियमित अभ्यास किया जाए तो इस शक्ति का विकास होने लगता है। इस विकास के साथ अनागत को जानने की क्षमता तो बढ़ती ही है, मन की शांति और स्थिरता भी बढने लगती है। दरअसल इस साधन अभ्यास का यही मुख्य लाभ है
रविवार, 1 नवंबर 2015
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