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गुरुवार, 9 जनवरी 2014

सौर ऊर्जा चार्जिंग गैजेट्स

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इन दिनों गैजेट्स की बढ़ती लोकप्रियता और बढ़ते प्रयोग के कारण इनकी चार्जिंग में भी काफी ऊर्जा की खपत होने लगी है. अगर आप चाहें तो अपने गैजेट्स को चार्ज करने के लिए ग्रीन चार्जिंग यानी वैकल्पिक स्रोतों का प्रयोग कर सकते हैं. इसी काम के लिए कुछ कमाल के गैजेट्स बाजार में मौजूद हैं. ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों का प्रयोग करके जहां आप पर्यावरण संरक्षण में योगदान देंगे वहीं आपको कहीं भी और किसी भी समय अपने गैजेट्स को चार्ज कर सकने की स्वतंत्रता मिल जाती है. इस प्रकार के चार्जर आपके पास हों तो आपको बिजली न होने या घर से बाहर होने या यात्रा पर होने पर बैटरी लो हो जाने पर अपने मोबाइल फोन आदि गैजेट्स को चार्ज करने में कभी कोई दिक्कत नहीं आती.
सोलर बैग
गैजेट्स को चार्ज करने के लिए सौर ऊर्जा का प्रयोग करने के लिए सोलर बैग्स से बढिय़ा और कुछ नहीं हो सकता. इन बैग्स के सामने की ओर एक फ्लैक्सी सोलर पैनल लगा होता है यानी सूर्य की रोशनी में चलते-फिरते समय बिल्ट इन 7.2 वाल्ट की लिथियम आयन बैटरी में सौर ऊर्जा जमा होती रहती है. इसमें अपना अन्य जरूरी सामान रखने के अलावा इसके साथ आने वाले यूएसबी, केबल एवं एडैप्टर्स से आप इस बैग के भीतर रखे अपने सैलफोन्स, आई पॉड्स एवं अन्य गैजेट्स को चार्ज कर सकते हैं. बादल भरे दिनों के लिए इसकी बैटरी को बिजली से चार्ज करके रखा जा सकता है. बैग और इस पर लगा सोलर पैनल आमतौर पर दोनों वाटरप्रूफ होते हैं.
हैंडहैल्ड डायनैमो
अब हर समय तो सौर ऊर्जा काम नहीं कर सकती है. ऐसे में बेहद छोटा हाथों में पकड़ा जा सकने वाला एक डायनैमो जैसा योजैन नामक गैजेट काफी काम का सिद्ध हो सकता है. मोबाइल आदि हल्के गैजेट्स को चार्ज करने के लिए इस डायनैमो के साथ उन्हें अटैच करके इसमें लगी रस्सी को कुछ मिनट अंदर-बाहर खींचना होगा और आपके गैजेट कुछ देर के लिए काम करने लायक चार्ज हो जाएंगे. इसमें लगी रस्सी को अंदर-बाहर खींचने से इसमें बना छोटा-सा डायनैमो किसी जैनेरेटर की ही भांति थोड़ी मात्रा में बिजली पैदा करता है जिसमें गैजेट्स चार्ज किए जा सकते हैं.
MP3 डायनैमो
एक अन्य डायनैमो जैसा गैजेट है वेरियो विंडअप MP3 प्लेयर. कमाल की बात है कि इसमें MP3 प्लेयर और फ्लैशलाइट बिल्ट इन हैं. यानी इसके हैंडल को कुछ मिनट घुमा कर मोबाइल फोन आदि चार्ज करने के साथ ही आप इसमें सेव किए गीत भी सुन सकते हैं. वेरियो के हैंडल को एक मिनट घुमा कर 15 से 30 मिनट तक संगीत का आनंद ले सकते हैं जबकि 3 मिनट घुमाने पर मोबाइल फोन को 10 मिनट टॉकटाइम के लिए ऊर्जा प्रदान की जा सकती है. इसमें लगी लैड फ्लैशलाइट को 50 मिनट तक प्रयोग करने के लिए बस 1 मिनट तक हैंडल घुमाना होगा.sabhar :http://www.palpalindia.com

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भारतीय महिलाएं धूम्रपान करने में अमेरिका के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर हैं।

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भारतीय महिलाएं धूम्रपान में विश्व में दूसरे स्थान पर



न्यूयार्क : कौन नहीं चाहेगा कि महिलाएं हर क्षेत्र में विकास करें, लेकिन हाल ही में आए एक अध्ययन में भारत की महिलाओं ने जिस क्षेत्र में विकास किया है उसे शायद ही कोई सराहे, और वह है धूम्रपान। एक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय महिलाएं धूम्रपान करने में अमेरिका के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर हैं। 

अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जहां धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले तीन दशकों में सात फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं भारत में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या में 200 फीसदी से भी अधिक का इजाफा हुआ है। 1980 में भारत में जहां 53 लाख महिलाएं धूम्रपान करती थीं, वहीं 2012 में यह संख्या बढ़कर 1.21 करोड़ हो चुकी है। 

भारत में हालांकि पुरुषों में भी धूम्रपान करने की लत में पिछले तीन दशकों में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। भारत में तीन दशक पहले जहां धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों की संख्या 7.45 करोड़ थी, वहीं आज लगभग 11 करोड़ व्यक्ति धूम्रपान की लत के शिकार हैं, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। अमेरिका हालांकि इस बीच तंबाकू सेवन से छुटकारा पाने वालों में सबसे आगे रहा, बावजूद इसके अमेरिकी महिलाएं धूम्रपान में विश्व में पहले स्थान पर हैं। अध्ययन में कहा गया कि भारत, बांग्लादेश, चीन और इंडोनेशिया सहित कई एशियाई देशों में 2006 के बाद से धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।

उन्होंने आगे कहा कि कई देशों में नियंत्रणकारी नीतियां पहले ही लागू कर दी गई हैं, इसके बावजूद जिन देशों में धूम्रपान करने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है वहां तंबाकू सेवन पर नियंत्रण लगाने के लिए सघन प्रयास किए जाने की जरूरत है। वैश्विक स्तर पर धूम्रपान की लत में 41 फीसदी का इजाफा हुआ है। अध्ययन में कहा गया है कि एशियाई देशों में 15 वर्ष की आयु से अधिक की आबादी में तेजी से वृद्धि होने के कारण धूम्रपान करने वालों की संख्या में तेज इजाफा देखने को मिला है। (एजेंसी)

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भय आत्मा को कमजोर करता है :ओशो

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शरीर के बिना कुछ आनंद लिए जा सकते हैं। जैसे समझें, एक विचारक है। तो विचारक का जो आनंद है, वह शरीर के बिना भी उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि विचार का शरीर से कोई संबंध नहीं है। तो अगर एक विचारक की आत्मा भटक जाए, शरीर न मिले, तो उस आत्मा को शरीर लेने की कोई तीव्रता नहीं होती, क्योंकि विचार का आंनद तब भी लिया जा सकता है। 

लेकिन समझो कि एक भोजन करने में रस लेने वाला आदमी है, वह शरीर के बिना भोजन का रस नहीं ले सकता है। उसके प्राण छटपटाने लगते हैं कि वह कैसे शरीर में प्रवेश कर जाए। और जब उसके योग्य गर्भ नही मिलता है, तब वह कमजोर आत्मा -कमजोर आत्मा से मतलब है ऐसी आत्मा, जो अपने शरीर का मालिक नहीं है-उस शरीर में वह प्रवेश कर सकता है, किसी कमजोर आत्मा की भय की स्थिति में।

और ध्यान रहे, भय का एक बहुत गहरा अर्थ है। भय का अर्थ है जो सिकोड़ दे। जब आप भयभीत होते हैं, तो आप सिकुड़ जाते हैं। जब आप प्रफुल्लित होते हैं, तो आप फैल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति भयभीत होता है, तो उसकी आत्मा सिकुड़ जाती है और उसके शरीर में बहुत जगह छूट जाती है, जहां कोई दूसरी आत्मा प्रवेश कर सकती है। 

एक नहीं, बहुत आत्माएं भी एकदम से प्रवेश कर सकती हैं। इसलिए भय की स्थिति में कोई आत्मा किसी शरीर में जाती है। और ऐसा करने का कुल कारण इतना होता है कि उसके जो रस हैं, वह शरीर से बंधे हैं। इसलिए वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करके रस लेने की कोशिश करती है। इसकी पूरी संभावना है, इसके पूरे तथ्य हैं, इसकी पूरी वास्तविकता है। 

इसका यह मतलब हुआ कि एक तो भयभीत व्यक्ति हमेशा खतरे में है। जो भयभीत है, उसे खतरा हो सकता है। क्योंकि वह सिकुड़ी हुई हालत में होता है। वह अपने मकान में, अपने घर के एक कमरे में रहता है, बाकी कमरे उसके खाली पड़े रहते हैं। बाकी कमरों में दूसरे लोग मेहमान बन सकते हैं। कभी-कभी श्रेष्ठ आत्माएं भी शरीर में प्रवेश करती हैं, कभी-कभी। 

लेकिन उनका प्रवेश दूसरे कारणों से होता है। कुछ कृत्य हैं करूणा के, जो शरीर के बिना नहीं किये जा सकते। जैसे समझें, एक घर में आग लगी है और कोई उस घर को आग से बचाने नहीं जा रहा है। भीड़ बाहर घिरी खड़ी है, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती है कि आग में बढ़ जाए। और तब अचानक एक आदमी बढ़ जाता है। और वह आदमी बाद में बताता है कि मुझे समझ में नहीं आया कि मैं किस ताकत के प्रभाव में बढ़ गया। 

मेरी तो हिम्मत न थी। और वह बढ़ जाता है, और आग बुझाने लगता है, और आग बुझा लेता है, और किसी को बचाकर बाहर निकल आता है। वह आदमी खुद कहता है कि ऐसा लगता है कि मेरे हाथ की बात नहीं है यह, किसी और ने मुझसे करवा लिया है। ऐसी किसी घड़ी में जहां कि किसी शुभ कार्य के लिए आदमी हिम्मत नहीं जुटा पाता हो, कोई श्रेष्ठ आत्मा भी प्रवेश कर सकती है। लेकिन ये घटनाएं कम होती हैं।

साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली
पुस्तकः मैं मृत्यु सिखाता हूं
प्रवचन नं. 5 से संकलित

परिचय

ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये।

ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।sdabhar :http://www.amarujala.com

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मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

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मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

 मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है, जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं।
 
मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।- गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं। 
मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

- मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं। वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है। नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है। मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

- यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं।

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में
 इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है। वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकारमय मार्ग से यमलोक ले जाते हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है, चार कोस यानी 13-16 कि.मी) दूर है। वहां पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसे भयानक यातना देते हैं। यह याताना भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।
मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

- घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में

 जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

मरने के 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, ये होता है रास्ते में
- गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है। यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।- यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है। मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है। - इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है। sabhar : bhaskar.com


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बुधवार, 8 जनवरी 2014

चेतना का रहस्य और आदमी का दिमाग

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मधुसूदन आनन्द 

क्या आपने वी. एस. रामचन्द्रन का नाम सुना है? रामचन्द्रन साइकॉलजी और न्यूरो साइंस के जाने-माने प्रोफेसर हैं जिन्होंने 'फैंटम्स इन द ब्रेन' और 'द इमर्जिंग माइन्ड' जैसी किताबें लिखकर दुनिया में धूम मचा रखी है। न्यूजवीक ने उन्हें दुनिया के उन 100 मशहूर लोगों की सूची में रखा है, जिनके काम से 21वीं सदी में कुछ अभूतपूर्व, कुछ क्रान्तिकारी निष्कर्ष सामने आने वाले हैं। चेन्नै के ये चमत्कारी अनुसंधानकर्ता अमेरिका के कैलिफॉर्निया विश्वविद्यालय में मस्तिष्क एवं संज्ञान केन्द्र के निदेशक हैं, जो मानवीय मस्तिष्क के रहस्यों की खोज करने में लगे हैं। उनकी खोज न्यूरो साइंस, फिलॉसफी और चेतना की गुत्थियों को खोल सकती है। 

आदमी का दिमाग एक अद्भुत मायालोक है, हालांकि आज हम जानते हैं कि हमारे दिल का धड़कना, हमारा सांस लेना, अंग संचालन, व्यवहार, स्मृति, भाषा, विचार, भावनाएं, तर्क शक्ति, कामनाएं, अवधारणाएं, कलाएं, सौन्दर्य शास्त्र, साहित्य और हमारा दर्शनशास्त्र आदि दिमाग से ही निकलते और नियंत्रित होते हैं। आज हम मोटे तौर पर दिमाग के उन हिस्सों को जानते हैं जिनसे हमारा बोलना-चालना, हाथ पैरों का चलना वगैरह नियंत्रित होता है, लेकिन फिर भी न्यूरो साइंस यानी मस्तिष्क संरचना और संचालन का विज्ञान अभी अपनी शैशव अवस्था में ही है। आम धारणाओं के विपरीत एक से डेढ़ किलो के बीच का औसत भार वाला वयस्क दिमाग बेहद कोमल होता है, कुछ-कुछ जैली की तरह और सुर्ख लाल। एक दिमाग एक सेकंड में 100 खरब संकेतों को प्रोसेस कर सकता है। जाहिर है दुनिया का कोई कम्प्यूटर आज ऐसा करने में सक्षम नहीं। आज एम.आर.आई. के जरिए हम दिमाग की मोटी-मोटी गतिविधियों को देख सकते हैं। जबकि मॉलिक्यूलर विश्लेषण से पता चलता है कि एक अंग के रूप में दिमाग क्या काम करता है लेकिन सोचने-समझने जैसी उच्च क्रियाओं में दिमाग कैसे काम करता है, यह ठीक-ठीक मालूम नहीं। दिमाग में लाखों-करोड़ों न्यूरॉन या तंत्रिकाएं हैं। उनके बीच क्या आपसी सम्बन्ध है, वे कैसे काम करती हैं, यह हमें ठीक-ठीक मालूम नहीं, लेकिन यह सही है कि न्यूरो साइंस के जरिए पता चल रहा है कि दिमाग के अन्दर क्या-क्या घट रहा है। 
 फ्रंटलाइन' पत्रिका के ताजा अंक में रामचन्द्रन के साथ शशि कुमार का एक विचारोत्तेजक इंटरव्यू छपा है। इस इंटरव्यू में रामचन्द्रन कहते हैं कि एक दिन यह सम्भव होगा कि न्यूरो साइंस की प्रगति दर्शनशास्त्र के तमाम बुनियादी प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दे। एक जिज्ञासु और सोचने वाला दिमाग बार-बार प्रश्न करता है- मैं कौन हूँ? मैं यहां (इस संसार में) क्यों हूँ? यह संसार क्यों है? कुछ होने की बजाय कुछ भी नहीं होता, तो क्या होता? आदि-आदि। रामचन्द्रन कहते हैं कि ये प्रश्न साइंस के नहीं हैं। साइंस इनसे नहीं टकराती। ये ज्ञान मीमांसा के प्रश्न हैं। ये प्रश्न, हो सकता है, अनुत्तरित रहें, लेकिन चेतना का प्रश्न शायद हल हो जाए। चेतना यानी दिमाग को चलाने वाली चीज। चेतना क्या है? न्यूरॉन्स और उनकी गतिविधि को ही मोटे तौर पर चेतना के रूप में देखा जा सकता है। चेतना यानी होने का संज्ञान। साइंस में इसे क्वालिया कहा गया है। यह हमारी मानसिक स्थितियों का चरित्र या गुण है। मसलन गंध अनुभव करना, दर्द महसूस करना या डर जाना ऐसे अनुभव हैं, जिन्हें व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। लेकिन ये हैं और इन्हें महसूस करने वाली चेतना को क्वालिया कहा गया है। लेकिन न्यूरॉन्स की ऐसी गतिविधियां भी चलती रहती हैं जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं होता या वे चेतना में नहीं आतीं। हमें उनके होने का कोई अनुभव नहीं होता। अगर एक बार वे समझ में आ जाएं तो कई भेद खुल सकते हैं। दर्शनशास्त्र के कई प्रश्न हल हो सकते हैं। 

वैज्ञानिक नजरिए से देखिए, हम क्या हैं? कई रसायनों और प्रणालियों का एक चलता-फिरता कारखाना। जटिल जीवन की एक मामूली कड़ी, डी.एन.ए. के जरिए अपने माता-पिता से जुड़ी। रामचन्द्रन प्रसिद्ध विज्ञानी फ्रांसिस क्रिक को उद्धृत करते हुए व्यंग्य में पूछते हैं कि मनुष्य क्या सचमुच सिर्फ न्यूरॉन का एक पुंज है, और फिर कहते हैं हम यह बात भी निश्चित तौर पर नहीं कह सकते। हमें अगनोस्टिक-अज्ञेयवादी होना पड़ता है। यानी इस बात को हम जान नहीं सकते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दार्शनिक मुद्रा अपना लें। जैसे हम जानते हैं कि दिमाग के कुछ खास हिस्सों तक ही कुछ क्रियाएं सीमित रहती हैं, यानी दिमाग के अलग-अलग हिस्सों का अलग-अलग काम है, जैसे रंग सम्बन्धी सूचना के विश्लेषण के लिए फूसीफार्म गाइरस का दिमाग में स्थान है या संज्ञान लेनेवाली तमाम गतिविधियां दिमाग के एक हिस्से तक ही केन्द्रित हैं, तो इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि हम तो यह जान ही चुके हैं, अब आगे जानने को क्या रह गया है। हम जानना चाहेंगे कि दिमाग में कौन सी ऐसी क्रियाएं हैं, जो खास हिस्सों तक केन्द्रित हैं। वे किस हद तक और कहां केन्द्रित हैं। वे एक उदाहरण देते हैं : मान लीजिए, आप जानना चाहते हैं कि कार कैसे काम करती है, तो इसके लिए आपको कार को खोलना होगा और इसका मैकेनिजम समझना होगा। ऐसा ही दिमाग के मामले में हैं। आनुवांशिकता और डीएनए अपनी जगह सही हैं, लेकिन दिमाग को समझने के लिए विशुद्ध सैद्धान्तिक या कार्यप्रणालीवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया जा सकता। पिछले 30 वर्षों में प्रयोगवादी दृष्टिकोण ही ज्यादा सफल हुए हैं। सिर्फ दिमाग की संरचना- उसके स्ट्रक्चर के आधार पर ही कुछ नया नहीं खोजा जा सकता। वे मंगलग्रह के एक प्राणी का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लीजिए अमीबा जैसा कोई प्राणी यहां आता है और मनुष्य की चीरफाड़ करते हुए अण्डकोश पाता है और उन्हें समझने की कोशिश करता है। वह देखता है वहां कुरकुर करते तमाम स्पर्म (शुक्राणु) हैं। वह चूंकि एक कोशिका वाला प्राणी है जो विभाजित होता रहता है और सेक्स से अनभिज्ञ है, अत: वह समझेगा, ये जरूर परजीवी होंगे। इसलिए स्ट्रक्चर के आधार पर ही दिमाग को नहीं समझा जा सकता। देखना यह भी होता है कि उसकी कार्यपद्धति क्या है और वह कैसे होती है। यानी दिमाग की संरचना और संचालन दोनों ही माध्यमों को अपनाकर हम कहीं पहुंच सकेंगे। दार्शनिकों के साथ दिक्कत यह है कि वे बिना समझे अनापशनाप शास्त्रार्थ में उलझे रहते हैं।

शायद यहां वे आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी बहस की ओर इशारा करना चाहते हैं, जिसमें चेतना को लेकर तरह-तरह की बातें हैं। प्राय: सभी धर्मों में आत्मा को माना गया है लेकिन दिमाग के बारे में हुए अनुसन्धानों से साइंस ने पता लगा लिया है कि दिमाग में एक ऐसा केन्द्र भी होता है जो हमें धामिर्क अनुष्ठानों और ईश-प्रेम के लिए मजबूर करता है। यानी धार्मिक होने में कहीं आपके डीएनए और न्यूरॉन्स की भी भूमिका है। पर रामचन्द्रन कहते हैं कि दर्शन नहीं, न्यूरो साइंस से ही चेतना की प्रकृति का राज खुलेगा। लेकिन एक सच्चे साइंसदान की तरह वे यह भी कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि हम सब गुत्थियां सुलझा लेंगे। मसलन कलाओं और संगीत की एक ज्ञानातीत प्रकृति भी होती है, जरूरी नहीं कि इसका रहस्य भी खुल जाए। यह पता चल ही जाए कि साहित्य और कलाएं कभी-कभी क्यों अनुभवातीत हो जाती हैं। वे कहते हैं कि मैं कौन हूँ, क्यों हूँ, क्या मेरा जन्म एक दुर्घटनावश हुआ है- इन प्रश्नों को ज्ञानमीमांसा के लिए छोड़ दीजिए, चेतना को जरा अलग तरह से समझिए। जीवन की तरह चेतना शब्द का इस्तेमाल भी कई तरीकों से होता है। यह वस्तुत: कई मेकेनिजम का समुच्चय है। एक तो क्वालिया है और दूसरा स्व है। यानी वह चीज, जो जागरूक है, जगी हुई है। जो जान रही है कि यह लाल है, यह गुलाब है। लेकिन अगर आप यह नहीं जानते कि आप जानते हैं, तब जानना शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता। 

वे कहते हैं कि न्यूरॉन्स द्वारा यह पता लगाया जा चुका है कि जब किसी को दर्द होता है तो उसका अनुभव दूसरे को भी हो सकता है। ये ऐसे न्यूरॉन्स हैं जो आपके और दूसरों के बीच की दीवार तोड़ते हैं। आप दूसरों से सहानुभूति करते हैं। रामचन्द्रन इन न्यूरॉन्स को जिन्हें मिरर न्यूरॉन्स कहा जाता है, दलाईलामा न्यूरॉन्स कहते हैं। इनकी खोज का मनोविज्ञान में आज वही स्थान बन गया है, जो जीवविज्ञान में डीएनए का है। इस खोज से मानवीय चेतना के अनेक अनजाने पहलुओं पर रोशनी पड़ेगी। रामचंद्रन ने पता लगाया है कि मिरर न्यूरॉन्स की कमी के कारण ही बच्चे चुपचाप और एकाकी महसूस करते हैं। न्यूरॉन्स ने आपको दूसरों के व्यक्तित्व में घुसने का रास्ता बता दिया है। वे कहते हैं कि कल्पना कीजिए चार-पांच शताब्दी के बाद कोई साइंसदान आपके दिमाग को बिल गेट्स के दिमाग में तब्दील कर दे तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। और फिर खुद ही जवाब देते हैं कि 90 प्रतिशत लोग ऐसा कृत्रिम दिमाग लेने के बजाय अपना दिमाग ही अपने पास रखना चाहेंगे, क्योंकि वह सिर्फ रसायनों का संसार नहीं है, उसमें संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, परंपरा और समाजशास्त्र है। इन तमाम बातों की उसमें प्रोग्रामिंग नहीं की जा सकती। 

रामचंद्रन का यह इंटरव्यू पठनीय है, लेकिन यह जितने सवाल उठाता है, उतने जवाब नहीं मिलते। जैसे वे कहते हैं कि चेतना इस तरह के प्रश्नों से भी जुड़ी है कि मैं यहां क्यों हूं। मगर इसका उत्तर उनके पास नहीं है। वे कहते हैं यह ज्ञानमीमांसा का प्रश्न है, फिजिक्स, बायॉलजी या साइकॉलजी का नहीं। क्या पता चेतना के रहस्यों का पता लगाते-लगाते वे इन सवालों पर भी रोशनी डाल सकें क्योंकि वे पौर्वात्य धर्मों और हिन्दू धर्म में ऐसी जिज्ञासाओं के उल्लेख की ओर बार-बार इशारा करते हैं। sabhar :
http://navbharattimes.indiatimes.com

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कैंसर ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल'

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कैंसर को ख़त्म करने वाली 'स्टिकी बॉल्स' ख़ून में ट्यूमर की कोशिकाएं नष्ट कर सकती हैं और इस तरह कैंसर को फैलने से रोक सकती हैं.
ट्यूमर की सबसे ख़तरनाक अवस्था वह होती है, जब वह पूरे शरीर में फैलना शुरू करता है.

इस शोध की शुरुआती जांच में कहा गया कि इसके प्रभाव "नाटकीय" हैं लेकिन अभी "बहुत सारा काम किए जाने की ज़रूरत" है.अमरीका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने ऐसे नैनो पार्टिकल यानी अति सूक्ष्म अणु बनाए हैं, जो रक्त प्रवाह में बने रहते हैं और बाहर से आने वाली कैंसर की कोशिकाओं के संपर्क में आने पर उन्हें नष्ट कर देते हैं.
कैंसर का पता चलने के बाद ज़िंदा रहने की संभावना में सबसे महत्वपूर्ण यह तथ्य होता है कि कहीं ट्यूमर मेटास्टेटिक कैंसर में तो नहीं बदल गया है.
मुख्य शोधकर्ता प्रोफ़ेसर माइकल किंग कहते हैं, "कैंसर से होने वाली क़रीब 90 फ़ीसद मौतें मेटास्टेसिस की वजह से होती हैं."

नाटकीय असर

"दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं."
प्रोफ़ेसर माइकल किंग, मुख्य शोधकर्ता
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध दल ने इस समस्या से निजात पाने के लिए एक नया तरीका आज़माया.
उन्होंने कैंसर ख़त्म करने वाला, ट्रेल, नाम का प्रोटीन-क्लिक करेंजिसे पहले ही कैंसर प्रयोगों में इस्तेमाल किया जा चुका है- और अन्य चिपकने वाले प्रोटीनों को एक सूक्ष्म गोले या नैनोपार्टिकल से चिपकाया.
जब इन गोलों को ख़ून में डाला गया, तो वे सफ़ेद रक्त कोशिकाओं से चिपक गए.
कैंसर
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध में ट्यूमर के फैलाव को रोकने में "स्टिकी बॉल्स" के नाटकीय प्रभाव दिखे.
प्रयोगों से पता चला कि उछलते-कूदते रक्त में सफ़ेद रक्त कोशिकाएं उन ट्यूमर कोशिकाओं से टकरातीं थीं, जो मुख्य ट्यूमर से टूटकर फैलने की कोशिश कर रहे हैं.
क्लिक करेंनेशनल अकेडमी ऑफ़ साइंस की कार्यवाही में शामिल रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रेल प्रोटीन के संपर्क में आने से ट्यूमर कोशिकाएं ख़त्म हो गईं.
प्रोफ़ेसर किंग ने बीबीसी को बताया, "ये आँकड़े नाटकीय प्रभाव प्रदर्शित कर रहे है. यह कैंसर कोशिकाओं की संख्या में मामूली बदलाव नहीं है. दरअसल इंसान और चूहे के रक्त में ये परिणाम सचमुच असाधारण हैं. दो घंटे के रक्त प्रवाह के बाद ट्यूमर कोशिकाएं विघटित हो गईं."

रेडियोथेरेपी से पहले

प्रोफ़ेसर किंग का मानना है कि नैनोपार्टिकल्स को सर्जरी या रेडियोथेरेपी से पहले इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे मुख्य ट्यूमर से ट्यूमर कोशिकाओं को निकाला जा सकता है.
इसे बहुत आक्रामक ट्यूमर वाले मरीज़ों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि ट्यूमर का फैलाव रोका जा सके.
हालांकि इंसानों पर जांच से पहले चूहों और बड़े जानवरों पर काफ़ी अधिक सुरक्षा जांच की ज़रूरत पड़ेगी.
अभी तक के सबूतों से लगता है कि इस पद्धति का प्रतिरोधी तंत्र पर कोई शुरुआती असर नहीं है और यह रक्त कोशिकाओं या रक्त धमनियों की परत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाता.

मगर प्रोफ़ेसर किंग चेतावनी देते हैं, "अभी बहुत काम किया जाना बाक़ी है. मरीज़ को इसका लाभ मिलने से पहले कई महत्वपूर्ण खोजें होनी बाक़ी हैं." sabhar :http://www.bbc.co.uk

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किसी चीज के प्रति अधिक संवदेनशील और भय क्यों प्रकट करता है। ‘

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आपने देखा या सुना होगा कि कुछ लोग पानी से डरते हैं। कुछ लोगों को ऊंचाई से डर लगता है तो कुछ किसी अनजाने भय से घबराए रहते हैं। यह डर यूं ही हमें नहीं डराते हैं। इस डर का कारण पिछले जन्म की यादों में छुपा होता है जो हमारे अवचेतन मन में कहीं दबा हुआ होता है।

prebirth memory cause of fear


एक टेलीविजन चैनल पर कुछ समय पहले एक धारावाहिक दिखाया जा रहा था जिसका नाम था 'राज पिछले जन्म का'। इस धारावाहिक में कई ऐसी घटनाओं को दिखाया गया जिसमें मेडिटेशन के द्वारा पूर्व जन्म की घटनाओं की जांच पड़ताल करके व्यक्ति का उपचार किया गया।

मेडिकल साइंस भले ही इस बात को स्वीकार करने में हिचकता हो कि पुनर्जन्म होता है लेकिन इस बात को वह भी स्वीकार करते हैं कि मेडिटेशन के द्वारा मन में बसे अवचेतन यादों को उभार कर डर और दूसरे कई रोगों का उपचार संभव है।रिग्रेशन थैरेपिस्ट उन कारणों का पता लगा सकते हैं कि व्यक्ति किसी चीज के प्रति अधिक संवदेनशील और भय क्यों प्रकट करता है। ‘हीलिंग पास्ट लाइफ थ्रू ड्रीम्स’ के लेखक जे डी ने लिखा है कि बचपन से ही उन्हें हाथ पांव सिकोड़ कर बैठने से डर लगता था।

इस डर की वजह वह समझ नहीं पा रहे थे। लेकिन एक रात उन्होंने ऐसा सपना देखा जिसमें उन्हें अपने डर का कारण पता चल गया। एक लड़के को कुछ लोगों ने हाथ पैर बांधकर कंबल में लपेट दिया था और उसकी पिटाई कर रहे थे। लोगों ने उसे एक अंधेरे कुएं में ढकेल कर मरने के लिए छोड़ दिया। जे डी देखा वह लड़का कोई और नहीं वह खुद थे।

उन्हें लगा कि यह उनके पूर्वजन्म की घटना थी। इसी घटना के कारण वह था कि वह पांव सिकोड़ कर बैठने से डरते थे। जब पूर्व जन्म का रहस्य पता चल गया तो उनका डर दूर हो गया। इन्होंने माना कि अवचेतन मन में बसी पूर्व जन्म की यादें ही इस जन्म में डर की वजह होती हैं। sabhar :http://www.amarujala.com

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80 साल पुराने जिम महिलाएं यहां आकर अपने फिगर का खास ध्यान

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ऐसे थे 80 साल पुराने जिम, यहां आकर फिगर को मेंटेन रखती थीं महिलाएं
आज के समय में जिम जाना प्रतिष्ठा की बात समझी जाती है। पश्चिम में यह बहुत पहले से ही हो रहा है, लेकिन भारत में जिम जाने की आदत पिछले एक दशक में लगीहै। इसमें महिलाओं की संख्या की तेजी से बढ़ रही है। भले ही भारत में महिलाएं इसके प्रति अब जाकर सजग हुई हों, लेकिन पश्चिमी देशों में यह चलन 70-80 साल पहले से ही शुरू हो गया था।
 
आज हम आपको 1920-30 के दशक की कुछ दुर्लभ और हंसाने वाली तस्वीरों से रूबरू करवा रहे हैं, जिनमें महिलाएं अपने फिगर का खास ध्यान रखने के लिए स्लिमिंग मशीन और साइक्लिंग का इस्तेमाल कर रही हैं।

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं




19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं
19वीं सदी में इस तरह के जिम जाकर फिगर को मेंटेन रखती थीं वेस्टर्न महिलाएं

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आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा

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नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

अगर आप ये सोचते हैं कि दुनिया में सबसे आसान जिंदगी साधुओं की है, तो आप गलत हैं। जितने समय में लोग डॉक्टर, इंजीनियर या कोई भी ऊंचा पद पा सकते हैं, उससे कई ज्यादा समय एक आम आदमी को नागा साधु बनने में लगता है। साधु बनने की प्रक्रिया जितनी कठिन है उतनी ही रोचक भी है।
साधु बनने के लिए इतनी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद कोई आम आदमी इसे पार ही नहीं कर पाए। जूना अखाड़े के महंत विजय गिरि महाराज के मुताबिक नागाओं को सेना की तरह तैयार किया जाता है। उनको आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है। इस प्रक्रिया में सालों लग जाते हैं

नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

तहकीकात - जब भी कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता। अखाड़ा अपने स्तर पर ये तहकीकात करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है। उसका पूरी पृष्ठभूमि देखी जाती है। अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है तो उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है। 
व्रत पालन - अखाड़े में प्रवेश के बाद उसके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है। इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक लग जाते हैं। जब तक कि अखाड़ा इस बात से निश्चिंत ना हो जाए कि वह व्यक्ति वासना और इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। अगर अखाड़ा और उस व्यक्ति का गुरु यह निश्चित कर लें कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है। 
नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश
महापुरुष - अगर व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है। तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है। उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं। ये पांच गुरु पंच देव या पंच परमेश्वर (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं। इन्हें भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं
नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

अवधूत - महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है। इसमें सबसे पहले उसे अपने बाल कटवाने होते हैं। इसके लिए अखाड़ा परिषद की रसीद भी कटती है। अवधूत रूप में दीक्षा लेने वाले को खुद का तर्पण और पिंडदान करना होता है। ये पिंडदान अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं। ये संसार और परिवार के लिए मृत हो जाते हैं। इनका एक ही उद्देश्य होता है सनातन और वैदिक धर्म की रक्षा।
नागा साधु देते हैं ब्रह्मचर्य की परीक्षा, आसानी से नहीं मिलता अखाड़े में प्रवेश

लिंग भंग - इस प्रक्रिया के लिए उन्हें 24 घंटे नागा रूप में अखाड़े के ध्वज के नीचे बिना कुछ खाए-पीए खड़ा होना पड़ता है। इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है। इस दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर रखे होते हैं। इसके बाद अखाड़े के साधु द्वारा उनके लिंग को वैदिक मंत्रों के साथ झटके देकर निष्क्रिय किया जाता है। यह कार्य भी अखाड़े के ध्वज के नीचे किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है। 

नागाओं के कई पद और अधिकार - नागा साधुओं के कई पद होते हैं। एक बार नागा साधु बनने के बाद उसके पद और अधिकार भी बढ़ते जाते हैं। नागा साधु के बाद महंत, श्रीमहंत, जमातिया महंत, थानापति महंत, पीर महंत, दिगंबरश्री, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर जैसे पदों तक जा सकता है। sabhar : bhaskar.com





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सोमवार, 6 जनवरी 2014

बिपाशा ने किए हैं कभी ऐसे बेडरुम और किस सीन

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एक्सपोजर की वजह से चर्चाओं में

एक्सपोजर की वजह से चर्चाओं में


7 जनवरी से 34 साल की हो रही बिपाशा बसु के पास इन दिनों बहुत फिल्में नहीं हैं। अब चूंकि बॉलीवुड में उनसे भी ज्यादा एक्सपोज करने वाली लड़कियां आ गई हैं इसलिए बिपाशा की वैसी पूछ नहीं होती।

लेकिन आज से दस साल पहले का समय याद कीजिए। जिस्म, मदहोशी, राज जैसी फिल्मों में बिपाशा बसु ने बोल्डनेस की नई परिभाषा गढ़ी थी। इन दृश्यों की वजह से बिपाशा आज तक याद की जाती है।

आज भी याद आती है जिस्म

आज भी याद आती है जिस्म

बिपाशा बसु की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक फिल्म जिस्म रही है। जिस्म में उनकी जोड़ी उनकी प्रेमी जॉन अब्राहम के साथ बनी। इस फिल्‍म में बिपाशा ने जमकर एक्सपोज किया। यह फिल्म अपने समय की सबसे बोल्ड फिल्म मानी जाती रही है।
मदहोशी में भी वही

मदहोशी में भी वही

जवानी के दिनो में ही बिपाशा द्वारा की गई एक और फिल्म मदहोशी भी खूब चर्चित रही। यह फिल्म भले ही बहुत बड़ी हिट साबित न हुई हो लेकिन इस फिल्म के बोल्ड सीन इसे खूब चर्चाओं में लेकर आए। 


लंबे-लंबे किस सीन

लंबे-लंबे किस सीन

हिंदी फिल्‍मों में जब भट्ट कैंप ने लंबे-लंबे स्मूच सीन शुरू किए तो बिपाशा बसु ही उन्हें दर्शाने वाला चेहरा बनीं। भट्ट कैंप की जिन फिल्मों को उनके एक्सपोजर और बोल्डनेस की वजह से याद किया जाता है उनमें से कई फिल्में का आधार बिपाशा ही रही हैं।
ज्यादातर प्रेमी के साथ

ज्यादातर प्रेमी के साथ

एक समय बिपाशा बसु और जॉन अब्राहम की जोड़ी सबसे हॉट जोड़ी मानी जाती रही है। रियल लाइफ में भी और रील लाइफ में भी। उनकी कई फिल्मों में जॉन ही उनके प्रेमी और हम बिस्तर बने हैं। चूंकि जॉन उनके रियल लाइफ प्रेमी थे इसलिए उन्हें यह सीन करते हुए दिक्कत भी नहीं हुई।
इमरान हाशमी का भी साथ

इमरान हाशमी का भी साथ

किसर किंग के नाम से मशहूर हीरो इमरान हाशमी के साथ भी बिपाशा बसु की जोड़ी बनी। राज 3 में बिपाशा बसु इमरान हाशमी के साथ नजर आई। इस फिल्‍म के किस और बेडरूम सीन लंबे समय तक चर्चाओं में रहे।


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प्रेगनेंट पिता ने दिया फूल सी बेटी को जन्म

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Pregnant Man Gives Birth To A Baby Girl
सुनने में भले ये आपको अजीब लग रहा हो लेकिन ये सच है। अर्जेंटीना का ट्रांसजेंडर कपल अब एक बच्ची के माता-पिता हैं। बच्ची का जन्म ऑपरेशन से हुआ है। 26 वर्षीय अलेक्सिस टैबोरडा और 28 वर्षीय करेन बेटी के जन्म से बेहद खुश्‍ा हैं।दरअसल, अलेक्सिस का जन्म बतौर लड़की हुआ था लेकिन वो पुरुषों की तरह रहा करती थी। जबकि करेन जन्म के समय लड़का था लेकिन लड़कियों की रहा करता था।अर्जेंटीना में साल 2012 में कानून पास होने के बाद से इन दोनों ने भी कानूनी तौर पर अपना लिंग बदल लिया। लेकिन लिंग बदलने के लिए उन्होंने कोई सर्जरी नहीं कराई। इसका मतलब यही हुआ कि कानूनी तौर लड़का बन चुकी अलेक्सिस ने ही गर्भ धारण किया।आप सोच रहे होंगे कि बच्ची कैसी है? बच्ची का जन्म तय समय से कुछ पहले हो गया है लेकिन वो स्वस्‍थ है। इस जोड़े ने बच्ची का नाम जेनेसिस इवेंजेलिना रखा है। saqbhar :http://www.amarujala.com

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