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शनिवार, 1 जुलाई 2023

कम पैसे में अपनी कंपनी के मालिक कैसे बने

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प्रधानमंत्री द्वारा स्टार्टअप योजना शुरू की है जिसके लिए रजिस्ट्रेशन कराके अपना कार्य किया जा सकता है जिससे अपने साथ काफी लोगो को रोजगार दिया जा सकता है इस यूट्यूब वीडियो में बताया गया है की आप अपने कंपनी का मालिक कैसे बन सकते है लोगो को रोजगार देने के साथ साथ देश के विकास में अपना योगदान दे सकते

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मंगलवार, 27 जून 2023

महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है

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महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है खजुआ गांव के ग्रमीण द्वारा बताया गया यह किला आल्हा उदल के किले के नाम से जाना जाता है उत्तर की ओर चहारदीवारी में तीन बड़े-बड़े कुएं तैयार किए गए थे, जो हजारों फीट गहरे हैं। ये कुएं आज भी यहां देखे जा सकते हैं। इनमें बड़ी-बड़ी जंजीरें पड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि इन कुओं से बगीचे में पानी पहुंचाया जाता था। यहां महोबा के सेनापति आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल द्वारा बनवाया गया किला आज भी खजुआ गांव में स्थित है पश्चिम में एक बड़ा गेट है, जबकि दूसरा गेट खजुहा गांव की ओर है। इन दरवाजों के ऊपर चढ़कर पूरे बागबादशाही का दृश्य देखा जा सकता है। गांव के अंदर चारों ओर दीवारें बनी हुई हैं और बड़े फाटक तैयार किए गए हैं। कहा जाता है कि यहां पर एक बड़ा हॉल हुआ करता था जिसमें घोड़े और सिपाही रहते थे। ​ फतेह पुर जिले के खजुआ कसबे में आल्हा उदल द्वारा बनवाये गए किला मौजूद है जो बाद में औरंगज़ेब के बेटे शाहशुजा के कब्जे में आ गया था शाहशुजा से औरंगज़ेब के कब्जे में आ गया फिर औरंगज़ेब ने इसमें कुछ निर्माण करवाया रहस्यमयी सुरंग’ गांव के ही बृजबिहारी बाजपेयी की मानें तो ये सुरंग कोलकाता से पेशावर तक जाती है। हालांकि, अब इसे बंद करा दिया गया है। जानकार बताते हैं कि उस वक्त यहां पर शाहजहां के बेटे शाहशुजा का राज था। औरंगजेब ने इसे हड़पने को के लिए अनेक बार यहां पर अटैक किया लेकिन पराजित हुआ। इसके बाद 5 जनवरी, 1659 को औरंगजेब ने फिर से यहां पर अटैक किया और शाहशुजा को पराजित कर कब्जा कर लिया। रहस्यमयी सुरंग’ में जो गया वो नहीं आया वापस, सैकड़ों लोग आज भी लापता kile में एक ऐसी रहस्यमयी सुरंग आज भी मौजूद है जहां जाने वाले कभी लौटकर वापस नहीं आये। सुरंग के आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि इस सुरंग को 350 साल पहले मुगल शासक औरंगजेब ने बनवाया था। इसका नाम बागबाद शाही है। फतेहपुर जिले के खजुहा गांव में आज भी ये मौजूद है। आल्हा चन्देल राजा परमर्दिदेव (परमल के रूप में भी जाना जाता है) के एक महान सेनापति थे, जिन्होंने 1182 ई० में पृथ्वीराज चौहान से लड़ाई लड़ी, जो आल्हा-खाण्डबॉल में अमर हो गए ऊदल ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए ऊदल वीरगति प्राप्त हुए आल्हा को अपने छोटे भाई की वीरगति की खबर सुनकर अपना अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े आल्हा के सामने जो आया मारा गया 1 घण्टे के घनघोर युद्ध की के बाद पृथ्वीराज और आल्हा आमने-सामने थे दोनों में भीषण युद्ध हुआ पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल हुए आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया और बुन्देलखण्ड के महा योद्धा आल्हा ने नाथ पन्थ स्वीकार कर लिया sabhr vikipidia amarujala.com

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गुरुवार, 22 जून 2023

प्रेम में डूबी बहादुर लड़कियो, हिंसक रिश्ते से बाहर निकलना ज़रूरी है: ब्लॉग

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 मुंबई से एक और लड़की की हत्या की दिल दहला देने वाली ख़बर आई है.


पिछले छह महीनों के दौरान अनेक ख़बरें सामने आई हैं, जहां लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही लड़कियों की हत्या उनके ही प्रेमी साथियों ने की है.

इससे पहले अपनी पसंद के लड़कों के साथ ज़िंदगी गुज़ारने का फ़ैसला करने वाली लड़कियों के मां-पिता या रिश्तेदारों द्वारा उनके मारे जाने की ख़बरें ज़्यादा आम हुआ करती थीं. अब उनका साथ देने का वादा करने वाले उनके साथी भी उनका ख़ून कर रहे हैं

.सामने आने वाली हर घटना पहली वाली से ज़्यादा ख़ौफ़नाक और दिल दहला देने वाली है.


पहले लड़की की हत्या. फ़िर शव को काटना. काटने के लिए तरह-तरह के तरीक़े और औज़ारों का इस्तेमाल करना. काटे हुए शरीर के साथ उसी घर में रहना. फ़िर बारी-बारी से शरीर के हिस्सों को ठिकाने लगाना. उन्हें जलाना, उबालना, फेंकना, कुत्ते को खिलाना, सूटकेस में भर देना, फ्रीज़ में डाल देना… और यह सब करते हुए अपनी दुनिया मज़े से रमे रहना.


यह सब उनके साथ किया जा रहा है, जिनके साथ, साथ जीने मरने के क़समें-वादे किये गये थे.


लव-इन यानी सह-जीवन में दो लोग अपनी मर्जी से साथ रहना तय करते हैं. यह जीने का बेहतरीन तरीक़ा हो सकता है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि इस रिश्ते में बराबरी और इज़्ज़त होगी, अहिंसा होगी और मोहब्बत तो होगी ही.


मगर अब ये रिश्ते भी दागदार किये जा रहे हैं. हालांकि, ऐसी कुछ कहानियों का इस्तेमाल लिव-इन के विचार के ख़िलाफ़ करना चालाकी होगी. Sabhar BBC.comhttps://www.bbc.com

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बुधवार, 21 जून 2023

बीमा कंपनी रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस ने 344 करोड़ रुपये का सालाना बोनस देने की घोषणा की

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 बीमा कंपनी रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए अपने भागीदार पॉलिसीधारकों को 344 करोड़ रुपये का सालाना बोनस देने की  घोषणा की।

कंपनी के मुख्य कार्यकारी आशीष वोहरा ने कहा कि इस बोनस से 5.69 लाख भागीदार पॉलिसीधारकों को लाभ होगा।


रिलायंस निप्पॉन लाइफ के प्रबंधन के तहत 30,609 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां हैं। मार्च, 2023 तक कंपनी की कुल बीमित राशि 85,950 करोड़ रुपये थी। sabhar https://www.ibc24.in

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रविवार, 11 जून 2023

फतेह सिंह राठौड़

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 एक राजपूत परिवार से थे।

उनका परिवार जोधपुर के पास स्थित शेरगढ़ तहशील के चोरडिया नामक गाँव से निकला हुआ है।


कई अन्य कामों में असफल होने के बाद उनका वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में आना महज एक संयोग था।


उनके एक रिश्तेदार के कहने पर उनको सरिस्का में वन विभाग में रेंजर के रूप में नौकरी मिल गई।

धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लगा। 


यह वह समय था जब फतेह जंगल की बारीकियों को सीख रहे थे। थ्योरी से ज्यादा उनका मन ज़मीनी काम करने में लगता था।


जंगल में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण उनके कई विरोधी भी बन गए थे।

उनका मानना था की जमीनी स्तर पर काम करके ही ज्यादा अनुभव हो सकते हैं जो डिग्रियों एवं थ्योरी से नहीं मिलते।


बीसवीं सदी में बाघों की संख्या 40000 थी जो सत्तर के दशक तक आते-आते मात्र 1800  रह गई थी। इसके चलते 1970 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने पर वन्यजीवों के शिकार को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया।


प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 1973 में हुई जिसमें रणथम्भौर के साथ आठ अन्य अभ्यारण्य भी शामिल थे। अलग अलग तरह के विभिन्न पर्यावासों में बाघ संरक्षण को प्रोत्साहित करना इस परियोजना का लक्ष्य था। रणथम्भौर एक उष्ण पर्णपाती वन है।


फतेह को इस नए पार्क का विकास करने की जिमेदारी सौंपी गई थी। उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे एस. आर. चौधरी एवं प्रोजेक्ट टाइगर के पहले निदेशक कैलाश सांखला का बहुत योगदान था। 


एस. आर. चौधरी ने फतेह को देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में पढ़ाया था।


कुल मिलाकर इन दोनों ने फतेह की काबिलियत को समझा और भविष्य में फतेह भी उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे। फतेह ने पार्क में ऐसी रोड बनाने का काम किया जो सीधी न होकर घुमावदार हों एवं  पानी के स्त्रोत तक पहुंचती हों। जब फतेह ने काम संभाला तब पार्क की हालत बहुत खराब थी।


पार्क से लगते हुए 16  गांवो के लोग मवेशियों को पार्क में चराने ले आया करते थे। जलाने के लिए पुराने पेड़ काटे जा रहे थे। मवेशियों की बेरोकटोक आवाजाही ने पार्क की बड़ी घास एवं पेड़ पौधों को खत्म कर दिया था। वन्यजीवों के नाम पर कभी कभार बाघ के पगमार्क दिखाई दे जाया करते थे।


फतेह जानते थे की अगर पार्क को जिन्दा रखना है तो ग्रामीणों को पार्क से बाहर विस्थापित करना बहुत जरूरी है। इस काम को फतेह ने बड़ी सूझबूझ के साथ किया, विस्थापित ग्रामीणों को इसके लिए समझाया और उचित मुआवजा दिलवाने का प्रबंध करवाया। मुआवजे में 18 वर्ष से ऊपर के सभी ग्रामीणों को पैसों के अलावा पांच बीघा अतिरिक्त जमीन भी दी गई।


इसके साथ ही घर बनवाने के लिए, कुए खोदने के लिए आर्थिक मदद की गई साथ ही ग्रामीणों के लिए स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की भी उचित व्यवस्था की गई। कैलाश सांखला के सम्मान में नए गांव का नाम कैलाशपुरी रखा गया। विस्थापन के साथ ही धीरे-धीरे पार्क वापस हरा-भरा होने लगा।


1976  में पहली बार फतेह ने पार्क में एक बाघिन को देखा जिसका नाम उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के ऊपर रखा; पद्मिनी। फतेह ने इस बाघिन एवं उसके चार शावकों ( पांचवा शावक जल्द ही मर गया था ) की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की । फतेह के जमीनी स्तर पर किये गए प्रयासों से यह पार्क बाघ देखने के दुनिया में सबसे उपयुक्त पार्कों में से एक माना जाने लगा।


उन दिनों रणथम्भौर जयपुर महाराज के शिकारगाहों में शामिल था। जनवरी 1961 में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के बनने से पहले उन्हें इस पार्क में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ II के लिए शिकार आयोजन की व्यवस्था करना था


उन दिनों वन्यजीव पर्यटन का मतलब ही शिकार करना होता था और कई महाराजा विदेशी सैलानियों से आय के लिए शिकार का आयोजन करते थे।


फतेह सिंह राठौड़ का एक ही उद्देश्य हुआ करता था बाघों को बचाना और अगर उन्हें लगता की इस काम में कुछ गलत हो रहा है  तो वह उसके खिलाफ आवाज उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे।


जब भी वे पार्क से किसी बाघ के गायब होने का मुद्दा उठाते तो वन विभाग इसके विपरीत उनकी बात को गलत साबित करने का प्रयास करते जिसके लिए वन विभाग द्वारा उन्हें कई बार प्रताड़ित भी किया गया। हालाँकि बाद में फतेह का दावा ही सही निकलता था।


अंतिम समय में फतेह को देखना बहुत कठिन समय था। उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था। उन दिनों उन्हें बोलने में भी परेशानी रहने लगी थी। जरा सा भी पानी लेने पर बहुत दर्द होता था।


फिर भी फतेह अपने परिवार जनों एवं दोस्तों के साथ उसी जिंदादिली से रहते थे। एक मार्च की सुबह उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली, फतेह अब नहीं थे।अंतिम संस्कार अगले दिन हुआ, पहले उनकी पार्थिव देह रणथम्भौर में पहाड़ियों के किनारे बने उनके घर में रखा गया जहाँ कई गणमान्य हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी उसी दिन लगभग चार बजे उनके निवास से महज 50  मीटर की दूरी पर एक बाघ तीन बार दहाड़ा साथ ही दुसरे पशु पक्षियों की कॉल  सुनाई दी। ऐसा लग रहा था मानों ये सब अपने पिता यानि फतेह को श्रद्धांजलि देने आये थे! Sabhar Facebook wall

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शुक्रवार, 26 मई 2023

अवचेतन मन और विज्ञान :टेलीपैथी

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अवचेतन मन और विज्ञान के बीच संबंध एक रोमचक और गहरा विषय है। विज्ञान मनोविज्ञान या मनोविज्ञान के द्वारा मन के अध्ययन को समझने का प्रयास करता है। विज्ञान में माना जाता है कि मन और चेतना शारीरिक प्रक्रियाओं और न्यूरोवेव्स (न्यूरोन्स) की गतिविधियों का परिणाम हैं। न्यूरोवेव्स के मध्यम से विभिन्न भागों में तरंगों के रूप में सिग्नल भेजे जाते हैं, जो मन की गतिविधि को निर्धारित करते हैं। यह न्यूरोलॉजी और न्यूरोसाइंस के अध्ययन के अंतर्गत आता है। अवचेतन मन का विज्ञानिक अध्ययन भी किया जाता है, जहां मन की गतिविधियों के पीछे के कारणों को समझने का प्रयास किया जाता है। यह प्रयास मानव न्यूरोसाइंस, कंप्यूटर साइंस, और कोग्निटिव साइंस के तत्वों को समाहित करता है। टेलीपैथी (Telepathy) एक प्राकृतिक और अतींद्रिय शक्ति की परिभाषा के रूप में आपसी मनोवैज्ञानिक संचार को दर्शाने के लिए उपयोग होती है। यह अवधारित की जाती है कि इसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के मन के भाव, विचार, या ज्ञान को निर्देशित कर सकता है बिना किसी संपर्क के। इस शक्ति के माध्यम से संवाद या संचार की क्षमता के बारे में वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं और इसे अभी तक वैज्ञानिक समुदाय में स्वीकार्य रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है। बहुत से लोग टेलीपैथी के अनुभवों का साक्षात्कार करते हैं और उन्हें यह मानते हैं कि यह शक्ति अस्तित्व रखती है, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय इसकी वैधता के बारे में अभी भी विवादित है। वैज्ञानिक समुदाय ने टेलीपैथी के विज्ञानिक व्याख्यान के रूप में भविष्यवाणी की है जहां दूसरे संचार माध्यमों के बिना व्यक्ति-से-व्यक्ति के मन की संचार को संभव माना जाए

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गुरुवार, 25 मई 2023

तुर्की में अर्दोआन की हार-जीत का असर दुनिया पर क्या पड़ेगा

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 जेरेमी हॉवेल

पदनाम,संवाददाता, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

2 घंटे पहले

अगर तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन 28 मई को होने वाले मतदान में राष्ट्रपति पद से बाहर हो जाते हैं, तब तुर्की के दुनिया के बाक़ी देशों के साथ रिश्तों में बड़ा बदलाव आ जाएगा.


अर्दोआन के नेतृत्व में, तुर्की ने रूस के साथ नज़दीकी संबंध स्थापित किए और इससे उसके पश्चिमी सहयोगी देश नाराज़ हुए. यही नहीं अर्दोआन ने इराक़, सीरिया और लीबिया के संघर्षों में तुर्क सैनिक भी भेजे.


विपक्ष के उम्मीदवार, कमाल कलचदारलू ने वादा किया है कि वो पश्चिम के अधिक क़रीब रहेंगे और दूसरे देशों के मामलों में कम हस्तक्षेप करेंगे.


तुर्की सीरिया के शरणार्थियों के साथ क्या करेगा?

अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक तुर्की में इस समय सीरिया के 37 लाख शरणार्थी पंजीकृत हैं जो अपने देश के गृहयुद्ध से भागकर यहां पहुंचे हैं. इसके अलावा तुर्की में अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों से आए शरणार्थी भी रहते हैं.

तुर्की सीरिया के शरणार्थियों के साथ क्या करेगा?

अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक तुर्की में इस समय सीरिया के 37 लाख शरणार्थी पंजीकृत हैं जो अपने देश के गृहयुद्ध से भागकर यहां पहुंचे हैं. इसके अलावा तुर्की में अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों से आए शरणार्थी भी रहते हैं.

लेकिन इसका मतलब ये होगा कि इन लोगों को फिर से सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के सत्तावादी शासन में रहना होगा.


इसी महीने, तुर्की के मीडिया में प्रसारित एक बयान में कलचदारलू ने कहा, “राष्ट्रपति बनने के बाद में सभी शरणार्थियों को वापस उनके देश भेज दूंगा. इस पर और कई बात नहीं होगी.”


उन्होंने यूरोपीय संघ के साथ शरणार्थियों को लेकर हुए तुर्की के समझौते से भी पीछे हटने की चेतावनी दी है. इस समझौते के तहत तुर्की सीरिया से आ रहे शरणार्थियों को अपने देश में रहने की अनुमति देने के लिए तैयार हुआ था. इससे शरणार्थियों को यूरोप के देशों में जाने से रोका गया था.


कलचदारलू का कहना है कि यूरोपीय संघ ने समझौते के तहत अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई है. Sabhar BBC.com

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गुरुवार, 18 मई 2023

स्मार्टफ़ोन कैसे कर रहा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का नुक़सान

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 अगर आपको लगता है कि कम उम्र में ही बच्चे के हाथ में स्मार्टफ़ोन या टैबलेट देने से उसके ज्ञान में बढ़ोतरी होगी या डिजिटल दुनिया की उसकी समझ बढ़ेगी, तो आप ग़लत सोच रहे हैं.

ये कहना है अमेरिकी ग़ैर-सरकारी संस्था 'सेपियन लैब्स' का.

ये संस्था साल 2016 से लोगों के दिमाग़ को समझने के मिशन पर काम कर रही है.

कोरोना काल के दौरान जब बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू हुई थी तो ये बहस तेज़ हुई थी कि बच्चों का मोबाइल पर स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए?

रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

सेपियन लैब्स की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, कम उम्र में जब बच्चों को स्मार्टफ़ोन दिए जाते हैं तो युवावस्था आते-आते उनके दिमाग़ पर विपरीत असर दिखने लगता है.




ये रिपोर्ट 40 देशों के 2,76,969 युवाओं से बातचीत करके तैयार की गई है और ये सर्वेक्षण इसी साल जनवरी से अप्रैल महीने में किया गया.


इन 40 देशों में भारत भी शामिल है.


इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 74 फ़ीसदी महिलाएँ, जिन्हें 6 साल की उम्र में स्मार्टफ़ोन दिया गया था, उन्हें युवावस्था में मेंटल हेल्थ को लेकर परेशानी आई.


एमसीक्यू (मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आकलन) में इन महिलाओं का स्तर कम रहा.


जिन लड़कियों को 10 साल की उम्र में स्मार्टफ़ोन दिया गया, उनमें 61 फ़ीसदी का एमसीक्यू स्तर कम या ख़राब रहा.


कुछ ऐसा ही हाल 15 साल की 61 फ़ीसदी लड़कियों का रहा.


दूसरी ओर 18 साल की लड़कियों को जब स्मार्टफ़ोन मिला, तो ये आँकड़ा 48 फ़ीसदी ही रहा.


वहीं जब छह साल के लड़कों को स्मार्टफ़ोन दिया गया, तो केवल 42 फ़ीसदी में ही एमसीक्यू के स्तर में कमी देखी गई.


सफ़दरजंग अस्पताल में काम कर चुके पूर्व मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर पंकज कुमार वर्मा कहते हैं कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं दिखता और इसे पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है.


उन्होंने बताया कि इसका एक कारण ये हो सकता है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों में किशोरावस्था पहले आती है जिसमें मानसिक और शारीरिक बदलाव शामिल हैं.


जब लड़कियों का एक्सपोज़र कम उम्र में होता है तो इस अवस्था में आते-आते लड़कों के मुक़ाबले वे ज़्यादा प्रभावित होती हैं.


इस शोध ये भी कहा गया है जिन बच्चों को कम उम्र में स्मार्टफ़ोन दिए गए, उनमें आत्महत्या के विचार, दूसरों के प्रति ग़ुस्सा, सच्चाई से दूर रहना और हेलोसिनेशन होना शामिल है.

Sabhar https://www.bbc.com/hindi/science-65607053

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म्यांमार मिलिट्री को भारत से मिले 420 करोड़ के हथियार:UN का दावा- इनसे आम लोगों को मारा; भारत बोला- पिछली सरकार में हुआ समझौता

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 म्यांमार की मिलिट्री ने 2021 में तख्तापलट के बाद 1 बिलियन डॉलर यानी 8 हजार करोड़ के हथियार खरीदे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक्सपर्ट के मुताबिक ये खरीद म्यांमार की सेना ने उस पर लगी पाबंदियों के बावजूद की है। ज्यादातर हथियार रूस, चीन और सिंगापुर की कंपनियों से खरीदे गए हैं। वहीं, भारत की कंपनियों से भी म्यांमार की सेना को पिछले 2 सालों में 420 करोड़ के हथियार और उससे जुड़ा सामान मिला है।

UN की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि सेना ने इन हथियारों का इस्तेमाल लोगों के खिलाफ हिंसा करने में किया है। इसके बावजूद कुछ देशों ने बिना रुके सेना को हथियार पहुंचाए हैं।

भारत की सरकारी कंपनियों से भी म्यांमार को मिले हथियार
म्यांमार की सेना को हथियार देने के मामले में रूस सबसे आगे है। 2 सालों में रूस ने म्यांमार को 4 हजार करोड़ रुपए के हथियार दिए हैं। वहीं, 2 हजार करोड़ के हथियार उन्हें चीन की तरफ से मिले हैं। रिपोर्ट में दावा किया है कि म्यांमार को हथियार और उन्हें बनाने का सामान पहुंचाने में रूस, चीन और भारत की सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं। UN के एक्सपर्ट ने जब अपनी जानकारी इन देशों की सरकारों से साझा की तो रूस और चीन ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

जबकि भारत की सरकार ने कहा कि हथियार देने का समझौता पिछली सरकार में हुआ था। वहीं, 1 बिलियन डॉलर में से 947 मिलियन डॉलर के हथियारों की डील सीधे म्यांमार की सेना से जुड़ी कंपनियों के साथ की गई। इसका मतलब ये है कि हथियार सप्लाई करने वाले देशों को पता था कि वो सीधे वहां की सेना के साथ डील कर रहे हैं।

पिछले महीने रूस के फाइटर जेट से सेना ने लोगों पर 250 किलो के बम बरसाए
पिछले महीने ही म्यांमार की सेना ने वहां के सागैंग के पजिगी गांव में हमला किया था। इस दौरान पजिगी इलाके में सेना के पास रूसी फाइटर जेट्स याक-130 देखे गए थे। जिनसे सेना ने 300 लोगों पर 250 किलो के बम बरसाए थे। हमला इतना तेज था कि लोगों के शव पहचान में भी नहीं आ रहे थे। इसके अलावा सेना ने लगातार 20 मिनट तक फायरिंग भी की थी। इसमें 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

फरवरी 2021 में म्यांमार मे हुआ था तख्तापलट
म्यांमार में फरवरी 2021 में सेना ने तख्तापलट कर दिया था। वहां की पुलिस नें नेता आंग सान सू की पर कई आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया था।

सेना ने तख्तापलट को ये कहते हुए सही ठहराया था कि म्यामांर में 2020 में हुए चुनावों में धांधली हुई थी। इन चुनावों में आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने एकतरफ़ा जीत हासिल की थी। sabhar :https://www.bhaskar.com/international/news/myanmar-military-arms-purchase-after-coup-131297352.html




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मंगलवार, 16 मई 2023

श्रीराम के वंशज थे अर्कबंधु गौतम बुद्ध :गौतम क्षत्रिय वंश

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 श्रीराम के #वंशज थे #अर्कबंधु_गौतम_बुद्ध :- #गौतम_क्षत्रिय वंश जिसमे राजा सिद्धार्थ का #जन्म हुआ था और बाद मे वो ही महात्मा बुद्ध बने थे..जिन्हे स्वय:भू #मूलनिवासी अपना कहते नही #थकते और हमे (सूर्यवंशी क्षत्रिय मौर्य) को विदेशी #बताते है... वंश- #सूर्यवंश_इच्छवाकु_शाक्य गोत्र- #गौतम #कुलदेवी- चामुण्ङा माता, बन्दी माता, दुर्गा माता देवता - महादेव योगेश्वर, #श्रीरामचन्द्र जी वेद - यजुर्वेद प्रसिद्ध महापुरुष- #भगवान_बुद्ध ( #सिद्धार्थ) #गौतम_वंश का महामंत्र-- रेणुका: सूकरह काशी काल बटेश्वर:। कालिंजर महाकाय अश्वबलांगनव मुक्तद:॥ प्राचीन राज्य- कपिलवस्तु, अर्गल, मेहनगर, कोरांव, बारां(उन्नाव), लशकरपुर ओईया(बदायूं) #गौतम_सूर्यवंशी_क्षत्रिय राजपूत हैं ये अयोध्या के #सूर्यवंश से अलग हुई शाखा है इन्हें #शाक्यवंश भी कहा जाता है। Note-- Alexander Cunningham (1871:349) relates the Sakya to the modern Gautam Rajputs, who were residing in the contemporary Indian districts Nagar & Amoddha of U.P. गौतम ऋषि द्वारा दीक्षित होने के कारण इनका ऋषि गोत्र गौतम हुआ जिसके बाद ये गौतम क्षत्रिय कहलाए जाने लगे। भगवान राम के वंशज ने प्राचीन काल मे अपना राज्य नेपाल मे स्थापित किया । इसी वंश मे #महाराणा शाक्य सिंह हुए जिनके नाम से यह शाक्य वंश कहा जाने लगा। इसकी राजधानी कपिलवस्तु ( गोरखपुर ) थी। इसी वंश में आगे चलकर शुध्दोधन हुये जिनकी बडी रानी से सिद्धार्थ उत्पन्न हुये जो " गौतम " नाम से सुविख्यात हुये । जो संसार से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन हो गये । संसार से विरक्त होने से पहले इनकी रानी यशोधरा को पुत्र (राहुल ) #उत्पन्न हो चुका था। इन्हीं गौतम बुद्ध के वंशज " गौतम " राजपूत कहलाते हैं । प्रसिद्ध गौतम राजा अंगददेव ने अपने नाम का रिन्द नदी के किनारे "अर्गल" नाम की आबादी को आबाद #करवाया और गौतम के खानदान की राजधानी स्थापित किया राजा अंगददेव. की लडकी अंगारमती राजा कर्णदेव को ब्याही थी राजा अंगददेव ने अर्गल से ३मील दक्षिण की तरफ एक किला बनवाया और इस किले का नाम "सीकरी कोट" यह किला गए में #ध्वंसावशेष के रूप में आज भी विद्यमान है। १- राजा अंगददेव २- बलिभद्रदेव ३- राजा श्रीमानदेव ४- राजा ध्वजमान देव ५- राजा शिवमान देव :- राजा शिवमान देव ने अर्गल से १मील दक्षिण रिन्द नदी के किनारे अर्गलेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया यहाँ आज भी #शिवव्रत का मेला लगता है। अर्गल राजा कलिंग देव ने रिन्द नदी के किनारे कोडे (कोरा) का किला बनवाया। 13वीं शताब्दी में भरो द्वारा अर्गल का हिस्सा दबा लिया था।उस समय अर्गल राज्य में #अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर बांदा के कुछ क्षेत्र आते थे। 1320 के पास अर्गल के गौतम राजा नचिकेत सिंह व #बैस_ठाकुर अभय सिंह व निर्भय सिंह का जिक्र आता है। उस समय #बैसवारा में सम्राट हर्षवर्धन के वंशज बैस #ठाकुरों का उदय हो रहा था। उनके नाम पर ही इस क्षेत्र को बैसवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह और उनकी पत्नी को गंगा स्नान के समय विरोधी मुस्लिम सेना ने घेर लिया तो निर्भय व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें #निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। राजा ने अभय सिंह की #बहादुरी से खुश होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी और दहेज में उसे #डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह #रायबरेली में आता था) और फतेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह बैस यहां के राजा हुए थे। यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में अभय सिंह की दो पीढिया लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्र आता है। अर्गल के #गौतम राजा द्वारा चौसा के युद्ध में हुमायूँ को #हराया गया जिससे शेरशाह सूरी को मुगलो को अपदस्थ कर भारत का सम्राट बनने में सहायता मिली। जब मुगलों का भारत में दुबारा अधिपत्य हुआ तो उन्होंने बदले की भावना से अर्गल राज्य पर हमला किया और यह राज्य नष्ट हो गया। फिर भी #बस्ती गोरखपुर क्षेत्र में गौतम राजपूतो की प्रभुसत्ता बनी रही और ब्रिटिश काल तक गौतम राजपूतो के एक #जमीदार परिवार शिवराम सिंह "लाला" को अर्गल नरेश की उपाधि बनी रही। अर्गल के गौतम राजपूतो की एक शाखा पूर्वांचल गयी वहां मेहनगर के राजा विक्रमजीत गौतम ने किसी मुस्लिम स्त्री से विवाह कर लिया जिससे उन्हें राजपूत समाज से बाहर कर दिया गया। #बस्ती जिले में नगर के #गौतम राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांति में बढ़ #चढ़कर भाग लिया तथा अंग्रेजो को कई बार मात दी। लेकिन उनके कुछ दुष्ट #सहयोगियों द्वारा विश्वासघात करने के कारण वो पकड़े गए तथा उन्हें अंग्रेजो द्वारा मृत्युदण्ड की सजा दी गयी। आज गौतम राजपूत #गाजीपुर, फतेहपुर , मुरादाबाद , बदायुं, कानपुर , बलिया , आजमगढ़ , #फैजाबाद , बांदा, प्रतापगढ, फर्रूखाबाद, शाहाबाद, गोरखपुर , बनारस , बहराइच, जिले(उत्तर प्रदेश ) आरा, छपरा, दरभंगा(बिहार ) #चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर), रायपुर (मध्यप्रदेश ) आदि जिलों में बासे हैं । "कण्ङवार" - दूधेला, पहाड़ी चक जिला #छपरा बिहार में बहुसंख्या में बसे हैं । #चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर) में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से आकर गौतम राजपूत बसे हैं । कुछ #गौतम_राजपूत पंजाब के पटियाला और हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर हमीरपुर कांगड़ा चम्बा में भी मिलते हैं #गौतम_राजपूतों की एक शाखा.. गाज़ीपुर के जमानियां. करंडा बेल्ट में भी है। विधायक #राजकुमार_सिंह_गौतम करंडा क्षेत्र के मैनपुर गांव के ही निवासी हैं जो गौतम ठाकुरों का काफी दबंग गांव है।.. बाकि गौतमों की एक पट्टी आजमगढ़ के मेंहनगर लालगंज बेल्ट में भी है। #गौतम_क्षत्रिय की खापें निम्नलिखित हैं। (१) #गौतमिया_गौतम :-- उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गोरखपुर जिलों में हैं। (२) #गोनिहा_गौतम :-- बलिया,शाहबाद (बिहार) आदि जिलों में हैं। (३) #कण्डवार_गौतम :-- कण्डावेनघाट के पास रहने वाले गौतम क्षत्रिय कण्डवार गौतम कहे जाने लगे। ये बिहार के छपरा आदि जिलों में हैं। (४) #अण्टैया_गौतम :-- इन्होंने अपनी जागीर अंटसंट (व्यर्थ) में खो दी।इसीलिए #अण्टैया_गौतम कहलाते हैं।ये सरयू नदी के किनारे चकिया, श्रीनगर,जमालपुर,नारायणगढ़ आदि गांवों में बताये गए हैं। (५) #मौर्य_गौतम:-- इस वंश के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के मथुरा,फतेहपुर सीकरी,मध्य प्रदेश के उज्जैन,इन्दौर,तथा निमाड़ बिहार के आरा जिलों में पाए जाते हैं। (६) #रावत_क्षत्रिय - गौत्र - भारद्वाज। प्रवर - तीन - भारद्वाज, वृहस्पति, अंगीरस। वेद -यजुर्वेद। देवी -चण्डी। #गौतम_वंश की उपशाखा है। इन #क्षत्रियों का निवास #उन्नाव तथा #फ़तेहपुर जिलों में हैं। #उन्नाव जिले में बारा की स्टेट गौतम #राजपूतो की है इसके #महिपाल_सिंह जमिदार थे।। कोरांव का दुर्ग भी #गौतम_राजपूतो द्वारा ही बनवाया गया था। #बौद्ध_ग्रंथ के अनुसार #शाक्य_क्षत्रिय भी गौतम क्षत्रियों की एक #शाखा है...... जय माँ #भवानी 

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सोमवार, 15 मई 2023

सभी धर्मों का मूल उद्देश्य : आत्मसाक्षात्कार‼️

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विश्व में अनेक धर्म-संप्रदाय प्रचलित हैं। इनमें से हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, मुसलिम, बौद्ध, यहूदी, ताओ, कन्फ्यूशियन, शिंतो आदि विभिन्न नामों से प्रचलित धर्म-संप्रदाओं का गहनतापूर्वक अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि उनके बाह्य स्वरूप एवं क्रिया-कृत्यों में जमीन-आसमान जितना अंतर है। क्रिया कृत्यों में यह अंतर होना उचित भी है क्योंकि जिस वातावरण व जिन परिस्थितियों में वे पनपे और फैले हैं, उनकी छाप उन पर पड़ना स्वाभाविक है। मूर्द्धन्य मनीषियों, अवतारी महामानवों ने देश-काल-परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए श्रेष्ठता संवर्द्धन एवं निकृष्टता निवारण के लिए जो सिद्धांत एवं आचारशास्त्र विनिर्मित किए, कालांतर में वे ही धर्म संप्रदाओं के नाम से जाने-पहचाने लगे।


जहाँ तक मौलिक सिद्धांतों की बात है, वे सभी धर्मों में एक ही हैं। सभी ने एक सार्वभौम चेतनसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना मानव का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया है। मनुष्य का गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार, पवित्रता, प्रखरता एवं उत्कृष्टता से ओत-प्रोत हो जाए, अनुप्राणित हो जाए, सभी धर्मो का यही चरम लक्ष्य है। आदिकाल से ही धर्म इस बात के लिए सचेष्ट रहा है कि मनुष्य के भीतर सत्प्रेरणाएँ उभरें और वह दिव्य जीवन जीने की ओर अग्रसर हो तथा आत्मिक विकास की अपनी चरम सीमा पर पहुँचकर वह उन अलौकिक अनुभूतियों का रसास्वादन कर सके, जिसे ईश्वरानुभूति के रूप में निरूपित किया गया है।


धर्म की महान गरिमा एवं उपादेयता को स्पष्ट करते हुए महाभारत, स्वर्गारोहण पर्व (5/62) में कहा गया है- धर्मात् अर्थश्च कामश्च, स किमर्थं न सेव्यते। अर्थात " धर्म से संपत्ति तथा कामनाओं की प्राप्ति होती है, फिर उसकी अभ्यर्थना क्यों नहीं की जाती!" वस्तुतः जिन्होंने धर्म के सही स्वरूप एवं लक्ष्य को समझा, उनने एक मत से कहा कि धर्म मानवीय विकास के लिए एक अनिवार्य तत्त्व है। धर्मतत्त्व का गहराई से अध्ययन करने वाले मूर्द्धन्य विचारक बर्नार्ड शॉ को एक बार तो कहना ही पड़ा था-"यदि हम वास्तव में कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं तो हमारा कोई धर्म होना चाहिए। यदि हमारी सभ्यता को वर्तमान भयंकर स्थिति से निकालने के लिए कुछ किया जाना है, तो यह ऐसे व्यक्तियों द्वारा किया जाना है, जिनका कोई धर्म है। जिन लोगों का कोई धर्म नहीं होता, वे कायर एवं असभ्य होते हैं।" सुविख्यात दार्शनिक कांट का भी कहना है-"हम धर्म से दूर नहीं जा सकते; क्योंकि उसके बिना जीवन में समग्रता एवं परिपूर्णता नहीं आ सकती। यदि धर्म अपने विकसित रूप में जीवन में अभिव्यक्त होने लगे तो मनुष्य अमरता को प्राप्त कर सकता है और यह वैयक्तिक तथा सामाजिक प्रगति का सूत्रधार बन सकता है।"


विश्व में प्रचलित सभी धर्म एक ही सार्वभौम सत्य का उद्घाटन करते हैं कि मनुष्य को सर्वव्यापी एवं सर्वसमर्थ न्यायकारी ईश्वरीय चेतना से जुड़ना और लोक- मंगल के लिए समर्पित भाव से जीवनयापन करना चाहिए। विविध धर्मों के बाह्य कलेवर जो भी हों, किंतु उन सबका उद्देश्य एक ही है-अपने उद्गमस्थल तक पहुँचना, आत्मसाक्षात्कार करना अर्थात ईश्वरमिलन । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में स्पष्ट कहा है- 'सभी मनुष्य भिन्न-भिन्न पथों से चलकर अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं।" प्रसिद्ध संत जरदुश्त के अनुसार- "हम संसार के उन सभी धर्मों को मानते और पूजते हैं, जो नेकी सिखाते हैं।" चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस का कहना है-" अलग-अलग धर्मों की प्रेरणाएँ एकदूसरे की विरोधी नहीं, पूरक हैं।" सभी धर्मों में समाहित मौलिक एकता पर दृष्टि रखी जा सके तो संसार से समस्त विग्रहों का समापन सुनिश्चित है।🙏

---युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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