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वाशिंगटन : पैसे भले पेड़ पर न फलें, लेकिन जल्द ही पेड़ पर बिजली फलेगी क्योंकि अब वैज्ञानिकों ने एकबायोमेट्रिक पेड़ विकसित किया है जिसमें उसके कृत्रिम पत्तियों से हवा गुजरने से बिजली पैदा होगी।
अमेरिका की आइओवा स्टेट युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह तकनीक विकसित की है। इससे लोग बिना किसी बड़े पवन टर्बाइन के बिजली के अपने घरेलू उपकरण चला सकेंगे। वैज्ञानिकों ने जो उपकरण बनाया है जो किसी प्रोपेलर या कॉटनवुड के पेड़ की शाखाओं और पत्तियों से मिलता जुलता है और जब तेज हवा में उसकी कृत्रिम पत्तियां उड़ती हैं तो बिजली पैदा होती है।
इस उपकरण के डिजाइन का नेतृत्व करने वाले माइक मैकक्लोस्की ने कहा कि यह पवन टरबाइन की जगह नहीं लेगा, लेकिन इससे तेज हवा को बिजली में बदलने वाली छोटी मशीनों का एक बाजार बन सकता है।
लंदन : वैज्ञानिकों ने उन्नत श्रेणी के कम्प्यूटर ‘क्वांटम कम्प्यूर्ट्स के निर्माण का पहला ब्लूप्रिंट जारी किया है। इसे पृथ्वी का सर्वाधिक शक्तिशाली कम्प्यूटर माना जा रहा है जो उद्योग, विज्ञान, चिकित्सा और वाणिज्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।
लंदन की यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और गूगल के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए इस खाके में एक एैसी शक्तिशाली मशीन के निर्माण के लिए वास्तविक औद्योगिक ब्लूप्रिंट दिखाया गया है जो कि अब तक निर्मित किसी भी कम्प्यूटर के मुकाबले अनेकों समस्याओं को कम समय में अधिक सटीकता से हल कर सकता है।
क्वांटम कम्प्यूर्ट्स, अंतरिक्ष के अभी तक अनछुये पहलुओं तक पहुंचने और उनके रहस्यों से पर्दा उठाने में भी सहायता कर सकते हैं। इसके साथ ही यह उन समस्याओं को आसानी से हल कर सकेगा जिन्हें हल करने में साधारण कम्प्यूटर को लाखों वर्ष लग सकते हैं।
इस प्रारूप में एक नई तकनीक को शमिल किया है जिसमें वास्तविक क्वांटम बिट्स (छोटे टुकडे) को प्रत्येक कम्प्यूटिंग माड्यूल के बीच संचारित किया जाता है। इससे पहले वैज्ञानिकों का प्रस्ताव था कि प्रत्येक कम्प्यूटर माड्यूल को फाइबर ऑप्टिक्स के जरिए जोड़ा जाना चाहिए लेकिन नई खोज के अनुसार एक माड्यूल को दूसरे मॉड्यूल से इलेक्ट्रिक क्षेत्रों के जरिए जोड़ा जाए जो कि चार्ज अणुओं को एक माड्यूल से दूसरे तक पहुंचने में मदद करते हैं।
इस शोध के अगुवाकार यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के प्रोफेसर विनफ्राइड़ हेनसिंगर ने कहा कि काफी वषरें तक लोग कहते थे कि वास्तविक क्वांटम कम्प्यूर्ट्स का निर्माण लगभग असंभव है, लेकिन हमने अपने कामों से न केवल यह साबित किया कि इन्हें बनाया जा सकता है बल्कि इस शक्तिशाली मशीन के निर्माण के लिए नट और बोल्ट प्लांट लगाने पर भी विचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस शक्तिशाली कम्प्यूटर का आकार छोटा ही होगा।
पुरुषों के लिए एक जरूरी खबर ये है कि अगर सेक्स की इच्छा कम हो गई है तो जरूरी नहीं कि जड़ी बूटियों या यौन वर्धक दवाओं की तरफ रुख करें। बिना पैसे का एक आसान सा नुस्खा आपकी मदद करेगा।ये हम नहीं ये शोध कहता है। इटली के शोधकर्ताओं ने 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को इस शोध में शामिल किया है।इस शोध की प्रेरणा इस बात से मिली की पुरुषों में कामेच्छा मौसम के हिसाब से बदल जाती है। खासतौर से सर्दी के मौसम में ये बदलाव ज्यादा नजर आता है।शोधकर्ताओं ने पाया कि जो लोग रोज रोशनी में काफी समय बिताते हैं उनका टेस्टेस्टोरॉन का स्तर बढ़ जाता है जिससे सेक्स की इच्छा में इजाफा होता है।शोध के दौरान 38 पुरुषों को शामिल किया गया था। इनमें से इन्हें दो ग्रुपों में बांटा गया। कुछ को कम रोशनी तो कुछ को ज्यादा रोशनी में रखा गया। शोध के बाद ज्यादा रोशनी में रखे गए लोगों ने स्वीकारा कि उनकी सेक्स लाइफ पहले से तीन गुना ज्यादा बेहतर हो गई है।
हम सब समय में यात्रा करते हैं. पिछले साल से में एक साल समय में आगे बढ़ चूका हूँ. दूसरें शब्दों में कहूँ तो हम सब प्रति घंटे 1 घंटा की दर से समय में यात्रा करते हैं. लेकिन यहाँ पर सवाल यह है कि क्या हम प्रति घंटे 1 घंटा की दर से भी ज्यादा तेजी से यात्रा कर सकते है? क्या हम समय में पीछे जा सकते हैं? क्या हम प्रति घंटे 2 घंटे की रफ़्तार से यात्रा कर सकते है? 20 वी सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने विशेष सापेक्षता (Special Relativity) नामक सिद्धांत विकसित किया था. विशेष सापेक्षता के सिध्धांत के बारे में तो कल्पना करना भी मुश्किल हैं क्योंकि यह रोजमर्रा की जिंदगी से कुछ अलग तरह की ही चीज़े उजागर करता हैं. इस सिध्धांत के मुताबिक समय और अंतरिक्ष एक ही चीज़ हैं. दोनों एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. जिसे space-time भी कहते हैं. space-time में कोई भी चीज़ यात्रा कर रही हो उसकी गति की एक सीमा हैं- 3 लाख किलोमीटर. यह प्रकाश की गति हैं.विशेष सापेक्षता का सिध्धांत यह भी दर्शाता हैं की space-time में यात्रा करते वक्त कई आश्चर्यजनक चीजे होती हैं, खास कर के जब आप प्रकाश की गति या उसके आसपास की गति पा लेते हैं. जिन लोगो को आपने पृथ्वी पर पीछे छोड़ दिया हैं उनकी तुलना में आपके लिए समय की गति कम हो जाएगी. आप इस असर को वापस आए बिना नोटिस नहीं कर सकते हैं. सोचिए की आपकी उम्र अभी 15 साल की हैं और आप एक अंतरिक्ष यान में प्रकाश की गति की तुलना में 99.5% तक की गति पा लेते हैं. अपनी यात्रा के दौरान आपने अपने 5 जनमदिन सेलिब्रेट किए, यानी आपने अंतरिक्ष यान में 5 साल बिताए. 5 साल के सफ़र के बाद आप 20 साल की उम्र में अपने घर वापस आते हैं. आप देखेंगे की आपकी उम्र के आपके दोस्त 65 साल के हो गए होंगे. क्योंकि अंतरिक्ष यान में समय आपके लिए ज्यादा धीरे से बिता था. आपने जितने समय में 5 साल अनुभव किए उनते ही समय में आपके दोस्तों ने 50 साल महसूस किए.आइंस्टीन के General Relativity के सिध्धांत के मुताबिक किसी भी तरह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में समय की रफ़्तार कम हो जाती हैं. जैसे समय की गति हमारी पृथ्वी पर अंतरिक्ष की तुलना में कम होगी. जैसे की किसी ब्लैक होल के नजदीक गुरुत्वाकर्षण बहुत तीव्र हो जाता हैं. ऐसी जगह पर समय की रफ़्तार बहुत ही कम हो जाती हैं. तीव्र गुरुत्वाकर्षण की वजह से space-time में कई विकृतियाँ पैदा हो जाती हैं. ऐसी विकृतियों से worm holes पैदा हो सकते हैं, जो की space-time में सफ़र करने के लिए शार्टकट हो सकते हैं. कुछ वैज्ञानिक तो ऐसा ही मानते हैं. जो भी हो मेरा तो यहीं मानना हैं की समय यात्रा सिर्फ भविष्य की ही मुमकिन हो सकती हैं. क्योंकि समय में पीछे जाना मुमकिन ही नहीं हैं. क्योंकि जो हो गया वह हम कभी बदल नहीं सकते लेकिन जो होनेवाला हैं वह अभी भी हाथ में हैं. हम शायद भविष्य की सैर कर सकते हैं लेकिन उसके लिए हमे बहुत ही उम्दा टेक्नोलॉजी की जरुरत होगी और बहुत ज्यादा उर्जा की भी जरुरत होगी. साभार http://www.universeinhindi.com
हिन्दू धर्म और टाइम मशीन का रहस्य क्या है
इंग्लैंड के मशहूर लेखक हर्बट जार्ज वेल्स ने 1895 में 'द टाइम मशीन' नामक एक उपन्यास प्रकाशित किया, तो समूचे योरप में तहलका मच गया। इस उपन्यास में वेल्स ने 'टाइम मशीन' की अद्भुत कल्पना की। यह उनकी कल्पना का एक ऐसा आविष्कार था, जिसे विश्व भर में विज्ञान लेखक आज तक उपयोग कर रहे हैं। उपन्यास से प्रेरित होकर इस विषय पर और भी कई तरह के कथा साहित्य रचे गए। इस कॉन्सेप्ट पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी। हालांकि वेल्स के उपन्यास में व्यावहारिक रूप से कई विसंगतियां है।
टाइम मशीन अभी एक कल्पना है। टाइम ट्रेवल और टाइम मशीन, यह एक ऐसे उपकरण की कल्पना है जिसमें बैठकर कोई भी मनुष्य भूतकाल या भविष्य के किसी भी समय में सशरीर अपनी पूरी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं के साथ जा सकता है। अधिकतर वैज्ञानिक मानते हैं कि यह कल्पना ही रहेगी कभी हकीकत नहीं बन सकती, क्योंकि यह अतार्किक बात है कि कोई कैसे अतीत में या भविष्य में जाकर अतीत या भविष्य के सच को जान कर उसे बदल दे। जैसे कोई भविष्य में से आकर आपसे कहे कि वह आपका पोता है या अतीत में से आकर कहे कि वह आपका परदादा है, जो यह संभव नहीं है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि दरअसल, जो घटना घट चुकी है उसका दृश्य और साउंड ब्रह्मांड में मौजूद जरूर रहेगा। जिस तरह आप एक फिल्म देखते हैं उसी तरह वह टाइम मशीन के द्वारा दिखाई देगा। आप उसमें कुछ भी बदलाव नहीं कर सकते। यदि ऐसा करने गए तो वह पार्टिकल्स बिखरकर और अस्पष्ट हो जाएंगे। दूसरा यह कि आप टाइम ट्रैवल से जो घटना नहीं घटी है, लेकिन जो घटने वाली है उसे भी देख सकते हैं, क्योंकि सभी कार्य और कारण की श्रृखंला में बंधे हुए हैं। हालांकि विद्वान यह भी मानते हैं कि भविष्य को जानकर वर्तमान में कुछ सुधारकर भविष्य को बदला जा सकता है, लेकिन अतीत को नहीं।
प्राचीनकाल में सनतकुमार, नारद, अश्विन कुमार आदि कई हिन्दू देवता टाइम ट्रैवल करते थे। टाइम मशीन की कल्पना भी भारतीय धर्मग्रंथों से प्रेरित है। आप सोचेंगे कैसे? वेद और पुराणों में ऐसी कई घटनाओं का जिक्र है। उदाहरणार्थ रेवत नाम का एक राजा ब्रह्मा के पास मिलने ब्रह्मलोक गया और जब वह धरती पर पुन: लौटा तो यहां एक चार युग बीत चुके थे। रेवती के पिता रेवत अपनी पुत्री को लेकर ब्रह्मा के पास योग्य वर की तलाश में गए थे। ब्रह्मा के लोक में उस समय हाहा, हूहू नामक दो गंधर्व गान प्रस्तुत कर रहे थे। गान समाप्त होने के उपरांत रेवत ने ब्रह्मा से पूछा अपनी पुत्री के वरों के बारे में।
ब्रह्मा ने कहा, 'यह गान जो तुम्हें अल्पकालिक लगा, वह चतुर्युग तक चला। जिन वरों की तुम चर्चा कर रहे हो, उनके पुत्र-पौत्र भी अब जीवित नहीं हैं। अब तुम धरती पर जाओ और शेषनाग के साथ इसका पाणिग्रहण कर दो जो वह बलराम के रूप में अवतरित हैं।' अब सवाल यह उठता है कि कोई व्यक्ति चार युग तक कैसे जी सकता है? कुछ ऋषि और मुनि सतयुग में भी थे, त्रेता में भी थे और द्वापर में भी। इसका यह मतलब कि क्या वे टाइम ट्रैवल करके पुन: धरती पर समय समय पर लौट आते थे?
इसका जवाब है कि हमारी समय की अवधारणा धरती के मान से है लेकिन जैसे ही हम अंतरिक्ष में जाते हैं, समय बदल जाता है। जो व्यक्ति ब्रह्मलोक होकर लौटा उसके लिए तो उसके मान से 1 वर्ष ही लगा। लेकिन अंतरिक्ष के उक्त 1 वर्ष में धरती पर एक युग बीत गया, बुध ग्रह पर तो 4 युग बीत गए होंगे, क्योंकि बुध ग्रह का 1 वर्ष तो 88 दिनों का ही होता है।
पहले यह माना जाता था कि समय निरपेक्ष और सार्वभौम है अर्थात सभी के लिए समान है यानी यदि धरती पर 10 बज रहे हैं तो क्या यह मानें कि मंगल ग्रह पर भी 10 ही बज रहे होंगे? लेकिन आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार ऐसा नहीं है। समय की धारणा अलग-अलग है।
आइंस्टीन ने कहा कि दो घटनाओं के बीच का मापा गया समय इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें देखने वाला किस गति से जा रहा है। मान लीजिए की दो जुड़वां भाई हैं- A और B। एक अत्यंत तीव्र गति के अंतरिक्ष यान से किसी ग्रह पर जाता है और कुछ समय बाद पृथ्वी पर लौट आता है जबकि B घर पर ही रहता है। A के लिए यह सफर हो सकता है 1 वर्ष का रहा हो, लेकिन जब वह पृथ्वी पर लौटता है तो 10 साल बीत चुके होते हैं। उसका भाई B अब 9 वर्ष बड़ा हो चुका है, जबकि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था। यानी A 10 साल भविष्य में पहुंच गया है। अब वहां पहुंचकर वह वहीं से धरती पर चल रही घटना को देखता है तो वह अतीत को देख रहा होता है।
जैसे एक गोली छूट गई लेकिन यदि आपको उसको देखना है तो उस गोली से भी तेज गति से आगे जाकर उसे क्रॉस करना होगा और फिर पलटकर उसको देखना होगा तभी वह तुम्हें दिखाई देगी। इसी तरह ब्रह्मांड में कई आवाजें, चित्र और घटनाएं जो घटित हो चुकी हैं वे फैलती जा रही हैं। वे जहां तक पहुंच गई हैं वहां पहुंचकर उनको पकड़कर सुना होगा।
यदि ऐसा हुआ तो...? कुछ ब्रह्मांडीय किरणें प्रकाश की गति से चलती हैं। उन्हें एक आकाशगंगा पार करने में कुछ क्षण लगते हैं लेकिन पृथ्वी के समय के हिसाब से ये दसियों हजार वर्ष हुए।
भौतिकशास्त्र की दृष्टि से यह सत्य है लेकिन अभी तक ऐसी कोई टाइम मशीन नहीं बनी जिससे हम अतीत या भविष्य में पहुंच सकें। यदि ऐसे हो गया तो बहुत बड़ी क्रांति हो जाएगी। मानव जहां खुद की उम्र बढ़ाने में सक्षम होगा वहीं वह भविष्य को बदलना भी सीख जाएगा। इतिहास फिर से लिखा जाएगा।
एक और उदाहारण से समझें। आप कार ड्राइव कर रहे हैं आपको पता नहीं है कि 10 किलोमीटर आगे जाकर रास्ता बंद है और वहां एक बड़ा-सा गड्डा है, जो अचानक से दिखाई नहीं देता। आपकी कार तेज गति से चल रही है। अब आप सोचिए कि आपके साथ क्या होने वाला है? लेकिन एक व्यक्ति हेलीकॉप्टर में बैठा है और उसे यह सब कुछ दिखाई दे रहा है अर्थात यह कि वह आपका भविष्य देख रहा है। यदि आपको किसी तकनीक से पता चल जाए कि आगे एक गड्ढा है तो आप बच जाएंगे। भारत का ज्योतिष भी यही करता है कि वह आपको गड्ढे की जानकारी दे देता है।
लेकिन एक अतार्किक उदाहरण भी दिया जा सकता है, जैसे कि एक व्यक्ति विवाह करने से पहले अपने पुत्र को देखने जाता है टाइम मशीन से। वहां जाकर उसे पता चलता है कि उनका पुत्र तो जेल के अंदर देशद्रोह के मामले में सजा काट रहा है तो... तब वह दो काम कर सकता है या तो वह किसी अन्य महिला से विवाह करे या विवाह करने का विचार ही त्याग दे।
साभार http://hindi.webdunia.com
इंग्लैंड के वैज्ञानिक ने किया दावा, बना सकता है Time Machine
• क्या प्रकाश के लेज़र Tunnel से भविष्य में संदेश भेजा जा सकता है?
• अगर ऐसा हो सकता है, तो भविष्य के लोग हमसे क्या कहेंगे?
69 वर्षीय Ronald Mallett का यह मानना है कि उन्होंने एक ऐसा Tunnel डिज़ाइन किया है, जो समय से आगे संदेश भेज सकता है. उनका ये कहना है कि इस शताब्दी की ये पहली Time Machine सिद्ध होगी. Mallett अभी University of Connecticut में ख्याति-प्राप्त Theoretical Physicist हैं. वो फ़िलहाल एक डॉक्यूमेंटरी पर काम कर रहे हैं, जिसका विषय है ‘How To Build a Time Machine’.
टाइम मशीन बनाने की खोज Mallett ने 10 वर्ष की उम्र से ही शुरु कर दी थी. अपने पिता की मौत के बाद Mallett ने इसे पूरा करने की ठान ली. अपने डॉक्यूमेंटरी ‘How To Build A Time Machine’ के बारे में Ronald Mallett कहते हैं कि, उन्हें ये निर्णय बिलकुल सही लगा, क्योंकि वो अपने मृत पिता को वापस देखना चाहते थे. Mallett के दिमाग में ये सवाल था कि क्या कोई समय पर नियंत्रण कर सकता है?
Mallett का ये कहना है, “मेरा व्यक्तित्व, मेरा एक सफल Physicist बनना ये सब बस मेरा पिता से प्यार की वजह से है. मेरा एक एक Mission है, जिसका लक्ष्य है ये पता लगाना कि टाइम मशीन कैसे बनाते हैं?”
टाइम मशीन कैसे काम करेगी?
Mallett की टाइम मशीन का मूल आधार Einstein की Theory of Relativity है. इस सिद्धांत के अनुसार ये बताया गया है कि प्रकाश की किरणें भी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र पैदा कर सकती हैं. एक Scientific Paper में Mallett ने लिखा कि प्रकाश के एक अस्थायी Cylinder के संदर्भ में मजबूत गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र उत्पन्न करने के लिए मेरे पास एक सटीक समाधान है, जो Einstein के आंतरिक और बाह्य गुरुत्वाकर्षण और प्रकाश के समीकरणों के विश्लेषण पर आधारित है.
जुड़े हुए Timelike लाइन्स की उपस्थिति भविष्य और भूत में समय यात्रा करने का संकेत देती हैं. इस संकेत से ही प्रकाश के अस्थायी Cylinder की सहायता से टाइम मशीन के निर्माण की संभावना दिखती है. Mallett का ये मानना है कि भौतिक सिद्धांत पर समय यात्रा असंभव है, पर वो ऐसा सोचते है कि अगर समय के साथ सन्देश भेजा जा सकता है, तो प्रकाश के Tunnel की मदद से Neutrons भी भेजे जा सकेंगे. Mallett कहते हैं कि 1 को Spin Up की दिशा में लगाने पर और 0 को Spin Down की दिशा में लगाने पर हम Neutron Spin के द्वारा बाइनरी कोड भी भेज सकते हैं.
अगर वाकई टाइम मशीन बन सकती है तो क्या ये सपनों की दुनिया में जीना जैसा नहीं होगा? विकास की दिशा में ये पहल एक चमत्कारी वरदान की भांति सिद्ध होगी. भविष्य और अतीत में सफ़र करना मनुष्य के लिए अत्यंत रोमांचकारी होगा.
नई दिल्ली: अगर आप अपनी सेक्स क्षमता में कमी से परेशान हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। इसका इलाज आपके घर में ही है। सेक्स क्षमता यानी सेक्स पावर बढ़ाने में हींग बहुत ही फायदेमंद है। हींग का इस्तेमाल सदियों से पुरुषों के नपुसंकता की समस्या का समाधान घरेलू नुस्खे के रूप में किया जाता रहा है। हींग कामोत्तेजक के रूप में काम करती है। इसलिए जिन पुरुषों को समय पूर्व स्खलन की समस्या होती है उनके इस समस्या को हींग नैचुरल तरीके से ठीक करने में बहुत मदद करती है।
हर्ब दैट हील: नैचुरल रेमिडी फॉर गुड हेल्थ पुस्तक के अनुसार 40 दिनों तक 6 सेंटीग्राम (0.06 ग्राम) हींग का सेवन करने से आप सेक्स ड्राइव को बेहतर बना सकते हैं। मिक्सचर के रूप में लगभग 0.06 ग्राम हींग को घी में फ्राई करें और उसमें शहद और बरगद के पेड़ का लैटेक्स मिलाकर इस मिश्रण को बना लें। नपुसंकता को ठीक करने के लिए सुबह सूर्य निकलने के पहले इस मिश्रण का सेवन खाली पेट 40 दिनों तक करें।
इरेक्टाइल डिसफंक्शन और समय पूर्व स्खलन की समस्या को अगर आप नैचुरल तरीके से ठीक करना चाहते हैं तो हींग एक अच्छा विकल्प बन सकता है। एक गिलास गुनगुना गर्म पानी में एक चुटकी हींग का पाउडर मिलाकर सेवन करना फायदेमंद होता है। हींग का इस्तेमाल डायट के रूप में करना सबसे अच्छा तरीका होता है। किसी-किसी को इसका ड्राई रूप में सेवन करना अच्छा नहीं लगता है इसलिए हींग को तड़के के रूप में इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा विकल्प होता है। असल में हींग इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या को बिना किसी साइड इफेक्ट के दूर करने में बहुत सहायता करती है। हींग शरीर के प्रजनन अंग में रक्त संचार को बढ़ाकर काम के उत्तेजना को बढ़ाती है।
लंदन : वैज्ञानिकों ने एक अनूठा सोनिक ट्रैक्टर बीम विकसित किया है जो ध्वनि तरंगों का उपयोग कर वस्तुओं को उठाने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सक्षम होगा। इस खोज में भारतीय मूल का एक वैज्ञानिक भी शामिल है।
यह ट्रैक्टर बीम एक ध्वनिक होलोग्राम उत्पन्न करने के लिए उच्च क्षमता के ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करता है जो छोटी वस्तुओं को उठाने और एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में सक्षम होता है।
ट्रैक्टर बीम ऐसा उपकरण है जो शारीरिक संपर्क के बगैर किसी भी वस्तु को खींच लेता है। विज्ञान कथा लेखकों की रचनाओं और स्टार ट्रेक जैसे प्रोगामों में सामान को पकड़ने, उठाने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ट्रैक्टर बीम की अवधारणा का उपयोग किया गया है, जिससे वैज्ञानिक और इंजीनियर बहुत हद तक प्रभावित हुए।
अल्ट्राहैप्टिक्स के सहयोग से ब्रिस्टल और ससेक्स विश्वविद्यालयों के अनुसंधानकर्ताओं ने इस तकनीक का विकास किया। आने वाले समय में व्यापक तौर पर इस तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। इस अध्ययन का प्रकाशन नेचर कम्युनिकेशन्स नामक जर्नल में हुआ है।
क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे? कार टेकनोलॉजी से जुड़े ताज़ा शोध इस पूरे उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहे हैं और ये बिलकुल संभव है कि आप आने वाले समय में 3डी प्रिंटर पर बनी कार ही चलाएँ.
अमरीकी ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला ओक रिज नेशनल लेबोरेटरी ने 3डी प्रिंटर पर न केवल स्पोर्ट्स कार बनाई बल्कि 2015 के डीट्रॉयट ऑटो शो में इसे प्रदर्शित भी किया है.
पहली नजर में तैयार की गई शेलबी कोबरा कार आम स्पोर्ट्स कार जैसी ही लगती है, चाहे ये प्लास्टिक से बनी है. हालांकि ये स्टील से भी बनाई जा सकती है.
इसमें कहीं भी स्टील के पैनल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. ये कार 85 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलाई जा सकती है.
थ्री-डायमेंशनल तरीके से कार प्रिंटिंग?
थ्री डायमेंशनल प्रिटिंग वो नई तकनीक है जिसके इस्तेमाल में पहले कंप्यूटर में डिज़ाइन बनाया जाता है.
फिर उक्त कमांड के ज़रिए 3डी प्रिंटर, या ये कहें कि इंडस्ट्रियल रोबोट उस डिज़ाइन को, सही पदार्थ (मेटीरियल) का इस्तेमाल करते हुए परत दर परत प्रिंट करता है या बनाता है.
इस प्रयोग में पिघले हुए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए उसे मनचाहा आकार दिया जाता है. ऐसा मेटल से भी किया जा सकता है.
इस तकनीक को अंजाम देने वाले उपकरण को थ्री-डी प्रिंटर या फिर इंडस्ट्रियल रोबोट कहा जाता है.
छह सप्ताह में कार तैयार
इस लैब के डॉक्टर चैड ड्यूटी ने बीबीसी फ्यूचर को बताया, "हमने इसे प्लास्टिक की परतों से बनाया है. 24 घंटे में प्लास्टिक से बॉडी को प्रिंट किया (बनाया) जा सकता है."
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वो बताते हैं, "बाद में इसमें इंजन और उपरी बाडी, लाइट, ब्रेक, गियर, और अन्य चीजों को असेंबल किया जाता है. कुल 6 सप्ताह में 6 लोग ऐसी कार तैयार कर लेते हैं. ख़ास बात यह है कि इसको बाद में डि-असेंबल कर पूरी तरह से अलग किया जा सकता है."
दरअसल प्लास्टिक की परत दर परत प्रिंट करके कार तैयार करने का मतलब केवल ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि कार के अलग अलग हिस्सों को थ्री-डायमेंशनल प्रिटिंग के जरिए पहले प्रिंट करना और फिर उन्हें असेंबल करना है.
ज़ाहिर है ये कार फ़िलहाल बिक्री के लिए नहीं बनी है. इसे प्रयोग के दौरान तैयार किया गया है. लेकिन इसने दूसरे कार निर्माताओं को ऐसी कार तैयार करने का विकल्प तो दे ही दिया है.
बेहद सस्ती होगी कार
अमरीकी कार निर्माता लोकल मोटर ने प्रिंट करके कार को तैयार किया है जिसे डीट्रॉयट ऑटो शो में प्रदर्शित किया गया.
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लोकल मोटर्स के जे रोजर्स कहते हैं, "इस कार को बनाना आसान है और ये काफी कम खर्चे में बनाई जा सकती है. इसके रख रखाव का खर्च भी बेहद कम हो जाता है. मेरे ख्याल से यही भविष्य की कार होगी."
ऐसे में जाहिर है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री एक नए युग के लिए तैयारी करती दिख रही है.
जापान की कार निर्माता कंपनी टोयोटा की योजना हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली कार का निर्माण बढ़ाना है. इसलिए अब टोयोटा इससे जुड़े अपने हज़ारों पेटेंट्स को दूसरी कार निर्माता कंपनियों के साथ साझा करने जा रही है.
टोयोटा ने इसी साल जापान के अलावा अपनी मिराई कार का निर्यात ब्रिटेन, अमरीका, जर्मनी और डेनमार्क को किया है. यह कार हाइड्रोजन से चलती है.
टोयोटा की इस कार की क़ीमत ब्रिटेन में 66 हज़ार पाउंड यानी लगभग 66 लाख रूपए है. अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में इस कार पर 25 फ़ीसदी सब्सिडी है जबकि जापान में 40 फ़ीसदी से ज़्यादा सब्सिडी दी जा रही है.
ब्रिटेन में इस पर कोई सब्सिडी नहीं है. कंपनी को उम्मीद है कि पेटेंट साझा करने से दूसरी कंपनियां भी हाइड्रोजन ईंधन की सस्ती कार बनाएगी.
Image copyrightToyota Motor Sales
टोयोटा के एक अधिकारी स्कॉट ब्राउनली का कहना है, "हमने अपनी कार को काफ़ी सुरक्षित बनाया है. हाइड्रोजन ज्वलनशील होती है इसलिए हमने आग से बचाव की व्यवस्था की है. इसके अलावा इस कार के ईंधन की टंकी पर 150 टन का दबाव भी है और उस लिहाज़ से भी हमारी कार सुरक्षित है."
इस कार के लिए हौन्डा कंपनी के हाइड्रोनन स्टेशन तैयार किए हैं, जहां हाइड्रोजन गैस का निर्माण होता है और उसे एकत्र किया जाता है.
नई दिल्ली. सोशल नैटवर्किंग साइट फेसबुक अपने यूजर्रस के लिए एक नया फीचर लांच करने वाली है इस फीचर की मदद से यूजर ई-कॉमर्स साइट की तरह फेसबुक को यूज कर सकेंगे. फिलहाल फेसबुक इस फीचर पर काम कर रही है.
रिपोर्ट के मुताबिक, फेसबुक 'लोकल मार्किट' नाम से एक फीचर पर काम कर रहा है. टेस्टिंग पर चल रह ये फेसबुक का नया फीचर सामान खरीदने वाला प्लेटफार्म बन जाएगा. न्यूज के मुताबिक, फेसबुक के कई यूजर ने यह जानकारी दी है कि उनके आईफोन के फेसबुक एप्प में मेसेंजर बटन की जगह पर बेहद कम समय के लिए नया फचर दिखाई दिया.
फेसबुक के इस फीचर की मदद से यूजर जिस सामान को बेचना चाहते है वो इस प्लेटफार्म पर पोस्ट कर सकेंगे. 'लोकल मार्किट' नाम के इस फीचर में सामान बेचने के साथ-साथ खरीदने का भी ऑप्शन है. OLX और क्विकर जैसे फेसबुक के इस फीचर में सामान की कीमत और फोटो भी दिखाई देगी sabhar :http://palpalindia.com/
स्वामी ओमानंद तीर्थ के अनुसार छठी इंद्रिय या अतींद्रीय ज्ञान की शक्ति जगाने के लिए योग में अनेक उपाय बताए गए हैं। इसे परामनोविज्ञान का विषय भी माना जाता है। असल में यह संवेदी बोध का मामला योगीजनों का मानना है कि इस का केंद्र ब्रह्मरंध्र है। जो दोनों आंखो के बीच भ्रूमध्य स्थान से कुछ ऊपर कपाल के ठीक बीच में है। मनुष्य के शरीर में जिन सूक्ष्म नाड़ियों का जाल फैला हुआ है उनमें तीन प्रमुख है इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।� सुषुम्ना मध्य में स्थित है और जब नासिका के दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि उसके सक्रिय होने के लिए उपयुक्त स्थिति जाती है।
इस सक्रियता से अतींद्रिय ज्ञान जाग्रत होता है। इन तीन नाड़ियों के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियां होती हैं। प्राणायाम और आसनों से इनकी शुद्धि होती है और शुद्धि के बाद अतींद्रिय ज्ञान जगाने का अभ्यास किया जाता है। अभ्यास के लिए सर्वप्रथम जरूरी है साफ और स्वच्छ वातावरण, जहां फेफड़ों में ताजी हवा भरी जा सके।स्वच्छ वातावरण में किए गए प्राणायाम का अभ्यास किया जा सकता है। फिर ध्यान का अभ्यास शुरु होता है। भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अंधेरे को देखते रहें और बोध करते रहें कि श्वास अंदर और बाहर हो रही है। मौन ध्यान और साधनासे मन की क्षमता का विकास होता जाता है, जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है।इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झांकने की क्षमता� भी बढ़ती है। यही अतींद्रिय ज्ञान के विकास की शुरुआत है। कोई हमारे पीछे चल रहा है या दरवाजे पर खड़ा है जैसी बातों का आभास होने लगता धैर्य के साथ नियत समय पर, नियत अवधि तक नियमित अभ्यास किया जाए तो इस शक्ति का विकास होने लगता है। इस विकास के साथ अनागत को जानने की क्षमता तो बढ़ती ही है, मन की शांति और स्थिरता भी बढने लगती है। दरअसल इस साधन अभ्यास का यही मुख्य लाभ है
कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.
पूरी तरह रोबोटिक
आइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. हाथों से शुरु
जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप. बेहद सटीक
डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने में कामयाबी पाई और इसे एक्सो-स्केलेटन में भी डाल सके.
रूस का रिमोट कंट्रोल
केवल जर्मन ही नहीं, रूसी रिसर्चर भी रिमोट कंट्रोल सिस्टम वाले एक्सो-स्केलेटन बना चुके हैं. डीएफकेआई ब्रेमन के रिसर्चरों को 2013 में रूसी रोबोट को देखने का अवसर मिला. इसके अलावा रूसी साइंटिस्ट भी आइला रोबोट पर अपना हाथ आजमा चुके हैं. बिल्कुल असली से हाथ
दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.
भार ढोएंगे रोबोटिक पैर
डीएफकेआई 2017 से रोबोटिक हाथों के साथ साथ पैरों का एक्सो-स्केलेटन भी पेश करेगा. यह इंसान की लगभग सभी शारीरिक हरकतों की नकल कर सकेगा. अब तक एक्सो-स्केलेटन को पीठ पर लादना पड़ता था, लेकिन भविष्य में रोबोट के पैर पूरा बोझ उठा सकेंगे.
लकवे के मरीजों की मदद
इन एक्सो-स्केलेटनों का इस्तेमाल लकवे के मरीजों की सहायता के लिए हो रहा है. ब्राजील में हुए 2014 फुटबॉल विश्व कप के उद्घाटन समारोह में वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी उपलब्धि को पेश किया था. आगे चलकर इन एक्सो-स्केलेटन में बैटरियां लगी होंगी और इन्हें काफी हल्के पदार्थ से बनाया जाएगा.
अंतरिक्ष में रोबोट
फिलहाल इन एक्सो-स्केलेटन की अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता का परीक्षण त्रिआयामी सिमुलेशन के द्वारा किया जा रहा है. इन्हें लेकर एक महात्वाकांक्षी सपना ये है कि ऐसे रोबोटों को दूर दूर के ग्रहों पर रखा जाए और उनका नियंत्रण धरती के रिमोट से किया जा सके. भविष्य में खतरनाक मिशनों पर अंतरिक्षयात्रियों की जगह रोबोटों को भेजा जा सकता है.
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हाथों से बिल्कुल असली से हाथ
दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.शुरु
जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप.
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